शिमला/शैल। क्या हिमाचल में हर बरसात में ऐसे ही जान माल का नुकसान होता रहेगा? यह सवाल इसलिये उठ रहा है क्योंकि 2023 में भी आयी आपदा के दौरान मण्डी के थुनाग में आयी बाढ़ में बड़ी मात्रा में लकड़ी नालों में बहकर आयी थी। इस बार भी सैंज में बादल फटने से जीवा नाला में आयी बाढ़ में टनों के हिसाब से लकड़ी बहकर पंडोह डैम तक पहुंची है। सैंज में जहां बादल फटा है उस क्षेत्र में एक पॉवर प्रोजेक्ट का काम चल रहा था। यह काम एक इंदिरा प्रियदर्शनी कंपनी के पास है और कंपनी के पास सैकड़ो मजदूर काम कर रहे थे। पॉवर प्रोजेक्ट के काम में कई अनियमितताओं के आरोप लगे हैं जो जांच के बाद ही सामने आ पायेंगे। मजदूरों के पंजीकरण का भी आरोप है इसलिये मौतों के सही आंकड़ों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कांगड़ा के धर्मशाला में भी बादल फटने से बाढ़ आयी है जिसमें कई मजदूर बह गये हैं। इस क्षेत्र में भी ‘सोकनी दा कोट’ में एक पॉवर प्रोजेक्ट का काम चल रहा था जिसके निर्माण में कई अनियमितताओं के आरोप हैं। 2023 में जब बरसात में आपदा आयी थी तब नदियों के किनारे हो रहे खनन को इसका बड़ा कारण बनाया गया था। इस पर मंत्रियों में ही विवाद भी हो गया था। इस समय हिमाचल में चंबा से लेकर किन्नौर शिमला तक करीब साढे पांच सौ छोटी-बड़ी पॉवर परियोजनाएं चिन्हित हैं और अधिकांश पर काम चल रहा है। चंबा में रावी पर चल रही पॉवर परियोजनाओं में 65 किलोमीटर तक रावी अपने मूल बहाव से लोप है। यह तथ्य अवय शुक्ला की रिपोर्ट में दर्ज है और प्रदेश उच्च न्यायालय में यह रिपोर्ट दायर है। स्वभाविक है कि जब पानी के मूल रास्ते को रोक दिया जायेगा तो बरसात की किसी भी बारिश में जब पानी बढ़ेगा तो वह तबाही करेगा ही। अवय शुक्ला की रिपोर्ट का संज्ञान लेकर पॉवर परियोजनाओं में इस संबंध में क्या कदम उठाये गये हैं इसको लेकर कोई रिपोर्ट आज तक सामने नहीं आ पायी है। पॉवर परियोजनाओं के निर्माण से पूरे क्षेत्र का पर्यावरण संतुलन प्रभावित हुआ है और इसका असर गलेश्यिरों के पिघलने पर पढ़ रहा है। लाहौल-स्पीति और किन्नौर में कई परियोजनाओं पर स्थानीय लोगों ने आपत्तियां भी उठाई है और धरने प्रदर्शन भी किये हैं। ग्लेशियरों के पिघलने से कालांतर में परियोजनाओं पर भी प्रभाव पड़ेगा। इसलिये समय रहते इस सवाल पर ईमानदारी से विचार करके कुछ ठोस और दीर्घकालिक उपाय करने होंगे अन्यथा भविष्य में और भी गंभीर स्थितियों का सामना करना पड़ेगा।
2023 में जो लकड़ी थुगान में बहकर आयी थी उसका संज्ञान शायद अदालत ने भी लिया था और उस पर एक रिपोर्ट भी तलब की थी। इस रिपोर्ट में क्या सामने आया है इसको लेकर कोई जानकारी आज तक सामने नहीं आयी है। न ही किसी ने यह दावा किया है कि यह लकड़ी उसकी थी। उस अवैधता पर आज तक पर्दा पड़ा हुआ है। अब सैंज में बादल फटने से जो लकड़ी जीवा नाला से होकर पंडोह तक पहुंची है उसको लेकर भी रहस्य बना हुआ है कि यह लकड़ी किसकी है। टनों के हिसाब से पंडोह डैम में लकड़ी पहुंची है। वन निगम जिसके माध्यम से वन विभाग लकड़ी का निस्तारण करता है उसके उपाध्यक्ष ने साफ कहा है कि यह लकड़ी वन निगम की नहीं है। क्षेत्र के वन विभाग के अधिकारियों ने भी इस लकड़ी के बारे में स्पष्ट कुछ नहीं कहा है इसे बालन की लकड़ी कहकर पल्ला झाड़ने का प्रयास किया है। इस लकड़ी के जो वीडियो सामने आये हैं उनसे स्पष्ट हो जाता है कि यह करोड़ो की लकड़ी है। यदि किसी प्राइवेट आदमी की इतनी मात्रा में वैध लकड़ी इस तरह बह जाती तो वह तो तूफान खड़ा कर देता। परन्तु ऐसा भी कुछ सामने नहीं आया है। टनों के हिसाब से लकड़ी सामने है लेकिन इसका मालिक कोई नहीं है। सरकार के वन विभाग का लकड़ी के निस्तारण का काम वन विभाग के माध्यम से होता है और वन विभाग लकड़ी का मालिक होने से इन्कार कर रहा है तो स्वभाविक है कि यह लकड़ी अवैध कटान की ही है क्योंकि बारिश में आसमान से तो यह टपकी नहीं है? सरकार ने अभी तक इस लकड़ी का स्रोत पता लगाने के लिये कोई कदम नहीं उठाये हैं इस बारे में कोई जांच गठित नहीं की गयी है। वन विभाग का प्रभार स्वयं मुख्यमंत्री के पास है। सरकार में किसी मंत्री ने इस पर कोई सवाल नहीं उठाया है। केवल अखिल भारतीय कांग्रेस प्रवक्ता विधायक कुलदीप राठौर ने इसकी जांच किये जाने की मांग की है। सरकार की ओर से आधिकारिक रूप से इस पर कुछ न कहने से और भी कई सवाल खड़े हो जाते हैं। यहां तक पॉवर प्रोजेक्ट का निर्माण कर रही कंपनी तक सवाल उठने लग पड़े हैं।
शिमला/शैल। प्रदेश कांग्रेस के नये अध्यक्ष का चयन क्यों नहीं हो पा रहा है? यह सवाल अब आम चर्चा का विषय बनता जा रहा है। क्योंकि सात माह पहले प्रदेश अध्यक्षा श्रीमती प्रतिभा सिंह को छोड़कर राज्य से लेकर ब्लॉक स्तर तक की सारी कार्यकारिणीयां भंग कर दी गई थी। तब यह तर्क दिया गया था कि निष्क्रिय पदाधिकारी के स्थान पर नये कर्मठ लोगों को संगठन में जिम्मेदारियां दी जायेंगी। नये लोगों की तलाश के लिये एक पर्यवेक्षकों की टीम भेजी गई थी। इस टीम की रिपोर्ट पर नये पदाधिकारी का चयन होगा। लेकिन कोई परिणाम सामने नहीं आया। इसी बीच राजीव शुक्ला की जगह रजनी पाटिल को प्रभारी बनाकर भेज दिया गया। रजनी पाटिल ने भी बड़े आश्वासन दिये परन्तु स्थितियां नहीं बदली। प्रदेश अध्यक्षा प्रतिभा सिंह ने यह स्वीकार किया कि राहुल गांधी से भी आग्रह किया गया था की नई कार्यकारिणी का गठन शीघ्र किया जाये। लेकिन इसका भी कोई परिणाम नहीं निकला। इसी बीच प्रदेश अध्यक्ष भी नया ही बनाये जाने की चर्चा चल पड़ी है। इस चर्चा पर प्रतिभा सिंह का यह ब्यान आया था कि नया अध्यक्ष रबर स्टैंप नहीं होना चाहिये। पिछले दिनों यह भी चर्चा में रहा कि नया अध्यक्ष अनुसूचित जाति से होगा यह सिद्धांत रूप से तय हो गया है। इस दिशा में कई नाम भी चर्चित हुये और कहा गया कि नया अध्यक्ष और प्रदेश मंत्रिमंडल का विस्तार एक साथ ही हो जायेगा। क्योंकि मंत्रिमंडल में एक स्थान खाली चल रहा है। लेकिन जो परिस्थितियों चल रही हैं उनके अनुसार अभी निकट भविष्य में ऐसा कुछ होता नजर नहीं आ रहा है।
प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बने अढ़ाई वर्ष का समय हो गया है। विधानसभा चुनाव के दौरान प्रतिभा सिंह प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष थी लेकिन जब मुख्यमंत्री के चयन की बात आयी तब प्रदेश अध्यक्ष कि उस चयन में कितनी भागीदारी रही यह पूरा प्रदेश जानता है। बल्कि मुख्यमंत्री के बाद जब मंत्री परिषद का विस्तार और इस विस्तार से पहले कितना अभियान दिया गया यह भी पूरा प्रदेश जानता है। बल्कि मंत्रिमंडल के विस्तार के बाद तो संगठन और सरकार सीधे-सीधे दो अलग ध्रुवों की तरह जनता के सामने आते चले गये। सक्रिय कार्यकर्ताओं को सरकार में सम्मानजनक समायोजन दिया जाये इसके लिये हाईकमान तक से शिकायतें हुई और एक कोआर्डिनेशन कमेटी तक का गठन हुआ लेकिन इस कमेटी से कितनी सलाह ली गयी यह सब भी जग जाहिर हो चुका है। व्यवहारिक रूप से सरकार के सामने संगठन की भूमिका ही नहीं रह गयी है। संगठन की भूमिका ही सरकार के आगे पूरी तरह से गौण हो चुकी है। आज सरकार के सामने संगठन का कोई स्थान ही नहीं रह गया है और निकट भविष्य में इसमें कोई बदलाव आने की भी संभावना नहीं दिख रही है। आज यह स्थिति बन गयी है की सरकार की भी संभावना नहीं दिख रही है। आज यह स्थिति बन गयी है कि सरकार के सामने संगठन की शायद कोई आवश्यकता ही नहीं रह गयी है। इसलिये अगला अध्यक्ष कौन बनता है और उसकी कार्यकारिणी की क्या शक्ल होती है इसका तब तक कोई अर्थ नहीं होगा जब तक सरकार के अपने आचरण में परिवर्तन नहीं होता।
क्योंकि संगठन तो सरकार के फैसलों को जनता में ले जाने का माध्यम होता है। लेकिन आज प्रदेश सरकार जिस तरह के फैसले लेती जा रही है उससे सरकार और आम जनता में लगातार दूरी बढ़ती जा रही है। कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव के दौरान लोगों को जो दस गारंटियां दी थी उनकी व्यवहारिक अनुपालना शून्य है। कांग्रेस का कार्यकर्ता सरकार का क्या संदेश लेकर जनता के बीच में जायेगा। राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जीतने विवादित होते जा रहे हैं उसी अनुपात में प्रदेश सरकार केंद्र पर आश्रित होती जा रही है। प्रदेश भाजपा इस स्थिति का पूरा-पूरा राजनीतिक लाभ उठाती जा रही है। वित्तीय स्थिति इस कदर बिगड़ चुकी है कि उसकी आड़ लेकर केंद्र कब प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू कर दे यह आशंका बराबर बनी हुई है। जिस सरकार के मुख्यमंत्री के अपने प्रभार के विभाग में एक वरिष्ठ अधिकारी की मौत के कारणों की जांच उच्च न्यायालय को सी.बी.आई. को सौंपनी पड़ जाये और वह मौत आत्महत्या की जगह हत्या की ओर इंगित होती जाये उस सरकार की सामान्य स्थिति को क्या कहा जायेगा। यही नहीं इसी सरकार के मुख्य सचिव के सेवा विस्तार का मामला जिस मोड़ पर उच्च न्यायालय में खड़ा है क्या वह केंद्र और राज्य के संबंधों की व्यवहारिकता की ओर एक बड़ा संकेत नहीं है। आने वाले दिनों में प्रदेश सरकार के यह फैसले राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनेंगे यह तय है।
इस वस्तु स्थिति में यह सवाल बराबर ध्यान आकर्षित करता है कि क्या कांग्रेस हाईकमान के सामने प्रदेश के यह मुद्दे नहीं पहुंचे हैं? क्या हाईकमान इतने गंभीर मामलों के बारे में अभी तक अनभिज्ञ ही है? कांग्रेस जहां भी चुनाव में जायेगी वहीं पर उसे कुछ आश्वासन देने पड़ेंगे। कुछ घोषणाएं करनी पड़ेगी। क्या उस समय कांग्रेस हाईकमान की विश्वसनीयता पर हिमाचल की कांग्रेस सरकार का आचरण प्रश्नचिन्ह नहीं लगायेगा? क्या यह हाईकमान के संज्ञान में यथास्थिति लाना प्रदेश प्रभारी की जिम्मेदारी नहीं बनती? क्या किसी प्रदेश की वित्तीय स्थिति और वहां के संसाधनों का अनुमान लगाये बिना क्या कोई चुनावी वायदे किये जाने चाहिए? क्या वित्तीय स्थिति का प्रभाव सरकार के अपने आचरण पर नहीं दिखना चाहिए? इस मानक पर हिमाचल सरकार बुरी तरह उलझी हुई है। आज हिमाचल में कोई भी नेता संगठन की जिम्मेदारी लेने के लिये शायद तैयार नहीं है। कोई भी मंत्री अपना मंत्री पद छोड़कर संगठन की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है और इसी से सरकार के व्यवहारिक प्रभाव का पता चल जाता है।
शिमला/शैल। क्या विमल नेगी की मौत का प्रकरण दूसरा गुड़िया कांड बनने जा रहा है? क्या यह प्रकरण कांग्रेस संगठन और सरकार दोनों के लिए घातक प्रमाणित होगा? क्या यह राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनने जा रहा है? यह सारी आशंकाएं इसलिये उभरी हैं क्योंकि प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा इस मामले की जांच सी.बी.आई. को सौंपने पर जिस तरह की प्रतिक्रियाएं इस पर एस.पी. शिमला और प्रदेश महाधिवक्ता की पत्रकार वार्ताओं के माध्यम से सामने आयी हैं उनसे यह संकेत उभरे हैं। विमल नेगी दस मार्च को अपने कार्यालय से गायब हुये। इस गायब होने पर उनके परिजनों ने उन्हें तलाशने की गुहार लगाई और डी.जी.पी. ने इस पर एक एस.आई.टी. गठित कर दी। लेकिन यह तलाश कुछ परिणाम लाती उससे पहले ही विमल नेगी का शव 18 मार्च को गोविंद सागर झील में मिल गया। 19 मार्च को इस मृतक शरीर का पोस्टमार्टम एम्स बिलासपुर में करवाया गया। जो पोस्टमार्टम रिपोर्ट सामने आयी है उसके मुताबिक मृतक की मौत पांच दिन पहले हो चुकी थी। पोस्टमार्टम के मुताबिक विमल नेगी की मौत बारह/तेरह मार्च को हो चुकी थी। इस रिपोर्ट से यह सवाल उठता है कि यदि मौत बारह/तेरह मार्च को हो गयी थी और शव अठारह मार्च को गोविंद सागर झील में मिला तो क्या यह मृतक शरीर करीब एक सप्ताह पानी में रहा? क्या मृतक के शरीर पर ऐसे साक्ष्य मिले हैं जो यह प्रमाणित करते हैं कि मृतक शरीर इतना समय पानी में रहा है? क्योंकि इतना समय पानी में रहने से मृतक शरीर पर बदलाव आ जाता है। फिर मृतक के शरीर से पैन ड्राइव और मोबाइल फोन भी मिले हैं। क्या इन उपकरणों पर एक सप्ताह पानी में रहने से बदलाव नहीं आया होगा। लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट का जितना जिक्र उच्च न्यायालय के फैसले में आया है उसमें इस ओर कोई संकेत नहीं है। इस वस्तुस्थिति में यह सवाल उभरता है कि शायद यह आत्महत्या का मामला न होकर हत्या का मामला तो नहीं है?
18 मार्च को शव बरामद होने के बाद 19 मार्च को पुलिस मृतक की पत्नी किरण नेगी की शिकायत पर एफ.आई.आर. दर्ज कर लेती हैं। एक एस.आई.टी. बनाकर एफ.आई.आर. पर जांच शुरू हो जाती है। सरकार प्रशासनिक जांच भी आदेशित कर देती है और इसकी जिम्मेदारी अतिरिक्त मुख्य सचिव गृह को सौंप दी जाती है और पन्द्रह दिन के भीतर जांच पूरी करने को कहा जाता है। दूसरी ओर विमल नेगी की पत्नी किरण नेगी सरकार की कार्यप्रणाली से अप्रसन्न होकर सी.बी.आई. जांच के अनुरोध की याचिका प्रदेश उच्च न्यायालय में दायर कर देती है। इस याचिका पर उच्च न्यायालय डी.जी.पी., ए.सी.एस. होम और एस.पी. शिमला से स्टेटस रिपोर्ट तलब कर लेता है। प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश की अनुपालना में ए.सी.एस. होम और डी.जी.पी. तथा एस.पी. अपनी रिपोर्ट्स उच्च न्यायालय को सौंपते हैं। तीनों ही रिपोर्टें अन्तः विरोधी हैं। उच्च न्यायालय तीनों अन्तः विरोधी रिपोर्टें देखकर इस मामले की जांच सी.बी.आई. को सौंप देता है।
उच्च न्यायालय का सी.बी.आई.जांच का फैसला आते ही इस पर एस.पी. शिमला डी.जी.पी. के खिलाफ मोर्चा खोल देते हैं। पत्रकार वार्ता के माध्यम से डी.जी.पी. और ए.सी.एस गृह के खिलाफ गंभीर आरोप लगा देते हैं। यही नहीं प्रदेश के मुख्य सचिव के खिलाफ भी गंभीर आरोप लगा देते हैं। एस.पी. शिमला के इस व्यवहार पर डी.जी.पी. एस.पी. को तुरंत प्रभाव से निलंबित करने के लिये गृह सचिव को पत्र भेज देते हैं। इसी प्रकरण में प्रदेश के महाधिवक्ता भी पत्रकार वार्ता के माध्यम से ए.सी.एस. होम ओंकार शर्मा और डी.जी.पी. के खिलाफ मोर्चा खोल देते हैं। इस मोर्चा खोलने पर प्रदेश के महाधिवक्ता भी डी.जी.पी. और ए.सी.एस. होम की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर देते हैं। विमल नेगी प्रकरण की जांच से परोक्ष/अपरोक्ष में जुड़े अधिकारियों का आचरण स्पष्ट कर देता है कि निश्चित रूप से पुलिस जांच पूरे प्रकरण को आत्महत्या की ओर ले जा रही थी। जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक हत्या होने की ओर भी पर्याप्त संकेत उभरते हैं। ए.सी.एस. होम की जांच में जो शपथ पत्र इंजीनियर सुनील ग्रोवर का ब्यान आया है उसमें पावर कॉरपोरेशन की शौंग टौंग जल विद्युत परियोजना में सैकड़ो करोड़ का घोटाला हुआ है और पेखूबेला सोलर परियोजना में सौ करोड़ का घपला हुआ है। इन घपलों के लिये विमल नेगी पर अनुचित दबाव डाला जा रहा था। दबाव और प्रताड़ना के आरोप ए.सी.एस. होम की रिपोर्ट में भी आये हैं। पुलिस की जांच इसे आत्महत्या का मामला मान रही है जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत 12-13 मार्च को ही हो जाना हत्या होने की ओर बड़ा संकेत बनता है। इसलिये सी.बी.आई. की जांच से ही स्पष्ट हो पायेगा कि यह हत्या है या आत्महत्या और इसके लिये पावर कॉरपोरेशन की परियोजनाओं पर लग रहे सैकड़ो करोड़ के भ्रष्टाचार के आरोपों की क्या भूमिका रही है। जिस तरह से बड़े अधिकारियों में अपने में ही घमासान शुरू हुआ है उससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि कुछ छुपाने और दबाने के प्रयास हो रहे थे। इसी से इस मामले की गुड़िया कांड पार्ट दो बनने की संभावना बनती जा रही है।
शिमला/शैल। क्या युद्ध चन्द बैंस को हिमाचल सरकार सुरक्षा उपलब्ध करवायेगी? क्या युद्ध चन्द बैंस की शिकायत में नामितों को विजिलैन्स की एस.आई.टी. जांच के लिये बुलायेगी? यह प्रश्न बैंस द्वारा 19 मई को डी.जी.पी. के नाम भेजी शिकायत एवं आग्रह के बाद चर्चा में आ गये हैं। बैंस ने इस पत्र की प्रत्तियां प्रदेश के राज्यपाल, मुख्य सचिव और गृह सचिव तथा एस.पी. विजिलैन्स को भी भेजी है। बैंस ने इस पत्र में खुलासा किया है कि उसने सितम्बर 2024 में व्यास नदी के किनारे हो रहे अवैध खनन और कांगड़ा केन्द्रीय सहकारी बैंक धर्मशाला में हो रहे भ्रष्टाचार को लेकर नई दिल्ली स्थित ई.डी. कार्यालय में एक शिकायत दर्ज करवाई थी। इस शिकायत पर हुई प्रारंभिक जांच के बाद अवैध खनन प्रकरण में ज्ञानचन्द और संजय धीमान ई.डी की हिरासत में चल रहे हैं। बैंस की ई.डी. में इस शिकायत के बाद प्रदेश विजिलैन्स ने उसके खिलाफ 8 जनवरी 2025 को ऊना में उसके ऋण प्रकरण पर एक आपराधिक मामला दर्ज कर लिया। यह आपराधिक मामला दर्ज होने के बाद बैंस ने प्रदेश उच्च न्यायालय से अग्रिम जमानत की गुहार लगा दी। इस पर उच्च न्यायालय ने बैंस को जांच में शामिल होने की शर्त पर अस्थायी जमानत दे दी। जमानत की शर्तों की अनुपालना में बैंस नियमित रूप से जांच में शामिल होता रहा। विजिलैन्स की हर जांच के बाद उसकी स्टेटस रिपोर्ट भी उच्च न्यायालय को सौंपी जाती रही। इसी जांच के दौरान बैंस ने कांगड़ा सहकारी बैंक को लेकर एक विधिवत शिकायत विजिलैन्स में दायर कर दी। उच्च न्यायालय ने विजिलैन्स द्वारा समय-समय पर सौंपी गयी स्टेटस रिपोर्टों के आधार पर बैंस को नियमित जमानत दे दी।
बैंस विजिलैन्स द्वारा बुलाये जाने पर हर बार जांच में शामिल होता रहा है। लेकिन बैंस के मुताबिक विजिलैन्स ने उसकी शिकायत में नामितों से एक बार भी पूछताछ नहीं की है। जबकि उसने बैंक अधिकारियों और अन्य के खिलाफ गंभीर आरोप लगाये हैं। यह सामान्य समझ की बात है कि एक अपराधी को भी दूसरे के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाने का पूरा अधिकार है। उसकी शिकायत को बिना जांच के खत्म नहीं किया जा सकता। बैंस ने जिन लोगों के खिलाफ शिकायत दर्ज करवा रखी है वह सरकार में बड़े नाम हैं और बैंस का दावा है कि उसके पास इन लोगों के खिलाफ पर्याप्त दस्तावेजी प्रमाण है। बैंस के इस दावे और एस.आई.टी. द्वारा अब तक की गयी एक पक्षीय जांच और एस.आई.टी की कार्य प्रणाली पर इस पत्र में उठाये गये सवाल अपने में महत्वपूर्ण हो जाते हैं। यह स्पष्ट है की बैंस के खिलाफ चल रही जांच में तब तक अदालत में चालान नहीं सौंपा जा सकता जब तक एस.आई.टी. बैंस की शिकायत पर भी उसी प्रक्रिया में जांच नहीं कर लेती है। ऐसे में बैंस ने जो प्रदेश सरकार से सुरक्षा मांग रखी है उस आग्रह को ठुकराना इन परिस्थितियों में आसान नहीं होगा।
यह है बैंस का डी.जी.पी. के नामपत्र
To
Director General of Police,
Himachal Police Headquarters ,Nigam Vihar
Shimla ,Himachal Pradesh (171002)
Subject – Request for Security Cover Within Himachal Pradesh
Sir,
I Yudh Chand Bains ,a resident of District Mandi had made a complaint against the Illegal mining within beas basin and Corruption within Kangra Central Cooperative Bank, Dharmshala in September 2024 with Enforcement Directorate Office ,New Delhi. The Complaint involved Chief Minister Sukhwinder Singh Sukhu ,his close associate Gyan Chand (already arrested), Sanjay Dhiman (already arrested), Political adviser to CM Sunil Bittu,Principal Secreatry to CM Vivek Bhatia,Doon MLA Ram Kumar Chaudhary, Secretary Cooperative C Paulrasu ,Kangra Central Cooperative Bank Chairman Kuldeep Pathania, Vicky Handa( Jeweller Close to Kuldeep Pathania and Sunil Bittu ).
Since the submission of my Complaint with the ED Office ,I have been pressurized through different channels, with both lucrative offers as well as threat,, to withdraw my complaint. When every attempt to coerce me into withdrawing my complaint failed ,a fabricated and politically motivated FIR was filed against me on 8.01.2025 at SV & ACB,Police Station Una.
Using this FIR as a revenge tool, I have been summoned regularly for attending Inquiry at Vigilance Headquarters ,Shimla. Since January,2025 i have been constantly harassed on the pretext of Inquiry and it has been more than 4 months now that I am still being summoned again and again despite the fact that all the questions raised by Inquiry Officer had been answered multiple times , all the record along with documents at my disposal have been already either seized by SIT or has been handed over by myself Voluntarily.
Sir, the conduct of Members of SIT seems questionable and motivated by ulterior designs for following reasons
• Summons to call me are being used to track my locations and whereabouts with the motive of leaking my confidential information to miscreants ,causing a threat to my personal security. To Justify this Claim, in the starting weeks of this planned inquiry ,I was being called at 10:30AM and Inquiry Officers allowed me to leave only after 6:00PM. I have Security from Ministry of Home Affairs and sensing this design of allowing me to leave inquiry only after it was dark outside, my PSO’s got alert. On one such evening ,PSO’s accompanying warned me of a suspicious vehicle following us as soon as we left Vigilance HQ. Apprising the danger to my Safety, the PSO’s stopped the vehicle and confronted the people siting inside. To my Surprise ,all occupants were staffed at Police HQ and even the vehicle was registered with Police HQ with registration number HP 03 C 7354. What was the need of following my vehicle, on whose direction was i being followed and to whom my locations were being shared ?
• I have submitted a Formal written Complaint with the SIT at Vigilance Office, Shimla highlighting how money was extorted from me on the pretext of OTS in Kangra Central Cooperative Bank and saving my properties along with the names of those involved in this corrupt extortion racket from CM Office To Chairman of Kangra Central Cooperative Bank (as have been named in Complaint to ED). Since January,2025, I have attended the said inquiry more than 30 times ,but not once those named in my formal complaint have been summoned ,why ? Is this a one way inquiry, sole motive of which is to somehow fabricate me in a false case and coerce me into withdrawing my complaint ?
Sir, I have a potential threat to my life, for mycomplaint against the powerful and influential and this act of constantly summoning me ,making me to wait for whole day in waiting room, seems suspicious and part of a bigger conspiracy to track my movement and somehow cause harm to me through miscreants. Supporters of these powerful and influential named in my complaint can take the form of a Mob at public places to harm me. This threat to my life is the only reason which has forced me to relocate myself out of Himachal Pradesh. If anything happens either to me or my family, then those named in my complaint shall be held responsible.
I thus request your good office to please take note of this grave issue and provide me with ample security cover whenever I am summoned to attend the inquiry ,from the time I enter the boundary of Himachal Pradesh and till I leave the state boundary. I have been Summoned to attend inquiry on 20th May, 2025 at Shimla Vigilance Office at 10:30 AM. My fight is scheduled to land at Shimla airport at 7:30 AM on 20th May, 2025.
I Further request your good office to please direct SP ,SV &ACB ,Shimla and members of SIT to act on my formal written complaint submitted with them and involve and Include all those named in my complaint within the ambit of this inquiry.
“Justice must not only be done, but must also be seen to be done”
Regards
Yudh Chand Bains
R/O Village Bhiura,P.O. Rajgarh,Tehsil Balh, Distt.
Mandi ,Himachal Pradesh (175027)
Contact – 9041049507
Dated-19th May, 2025
• Copy to Hon’ble Governor, Himachal Pradesh
• Copy to Chief Secreatry ,Govt. Of Himachal Pradesh
• Copy to Secreatry Home ,Govt. Of Himachal Pradesh
• Copy to SP, SV & ACB,Shimla