Thursday, 23 April 2026
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क्या ऐसा सांई विरोध जायज है?

जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती जी महाराज ने गौ माता को राष्ट्र माता घोषित करवाने के लिये 22 सितम्बर 2024 को अयोध्या धाम पहुंचकर रामकोट की परिक्रमा करके भारत यात्रा का कार्यक्रम शुरू किया है। इस यात्रा में पूर्वाेत्तर के राज्यों में गौ प्रतिष्ठिा ध्वज की स्थापना की जा चुकी है। महाराष्ट्र सरकार के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे गौ माता को राष्ट्र माता घोषित करके इस आशय का अपनी सरकार का प्रस्ताव जगद्गुरु को सौंप चुके हैं। इस यात्रा की यह सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। इस यात्रा में देश के सभी राज्यों में जगद्गुरु जाएंगे और सभी जगह गौ ध्वज की स्थापना करके गौ माता को राष्ट्र माता घोषित करने की मांग करेंगे। इसी यात्रा की कड़ी में जब जगद्गुरु शिमला पहुंचे तो यहां पर राम मंदिर में गौध्वज स्थापना का कार्यक्रम था परन्तु जैसे ही जगद्गुरु को यह सूचना मिली कि राम मंदिर में तो सांई की मूर्ति स्थापित है तो वह इससे नाराज हो गये और राम मंदिर के कार्यक्रम का बहिष्कार करके हनुमान मंदिर जाखू में गौध्वज की स्थापना की गयी। जब राम मंदिर की संचालन समिति ने यह आश्वासन दिया कि वह मंदिर से सांई की मूर्ति हटा देंगे तब जगद्गुरु ने अपने प्रतिनिधि भेज कर वहां भी गौध्वज की स्थापना की। इस अवसर पर अपने उद्बोधन में शंकराचार्य ने कहा कि सरकार गौ माता को राष्ट्रीय माता घोषित करे। हिंदू समाज केवल गौ रक्षक पार्टियों को ही वोट दे। गौ हत्यारी पार्टियों को वोट देकर गौ हत्या का पाप न ले। जिस दिन गौ हत्या रुक जायेगी उस समय हमारा कर्ज उतरना शुरू हो जायेगा।
पूरे देश में श्री सांई को मानने वालों की संख्या करोड़ों में है और सभी धर्मों और जातियों के लोगों की आस्था सांई में है। आस्था बनने के हरेक के व्यक्तिगत आधार होते हैं। ऐसे में यदि सांई में किसी की आस्था है तो क्या इस आस्था को ऐसे बहिष्कार से तोड़ा जा सकता है। शायद नहीं। जगद्गुरु शंकराचार्य का धर्म में एक शीर्ष स्थान है। हरेक धार्मिक मतभेद में शंकराचार्य का निर्णय सर्वोपरी और अंतिम होता है। लेकिन आस्था कोई धार्मिक प्रश्न नहीं है। यह एक विशुद्ध वैयक्तिक विषय है। गौ माता की हत्या नहीं होनी चाहिये। गौ माता एक धार्मिक प्रतीक भी है। गौ माता को राष्ट्र माता घोषित किये जाने की मांग एक राजनीतिक प्रश्न है। क्योंकि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है। यदि सरकार हिन्दू समाज की एक मांग को अधिमान देती है तो उसी गणित से अन्य धर्म को मानने वालों की मांगों को भी अधिमान देना पड़ेगा। शंकराचार्य ने जब अपने उद्बोधन में गौ हत्या करने वाली पार्टियों को वोट न देने की अपील की है तब उन्हें यह भी स्पष्ट करना होगा कि हिन्दूवादी पार्टी के शासन में बीफ के कारोबार का आंकड़ा क्यों बड़ा है। गौ हत्यारी पार्टियों को वोट देना गौ हत्या के पाप में भागीदार बने जैसा है। शंकराचार्य का ऐसा उद्बोधन क्या एक राजनीतिक उद्बोधन नहीं बन जाता है। शंकराचार्य का जो स्थान हिन्दू धर्म में है उसके नाते हिन्दू समाज को यह निर्देश देना कि वह अमुक दल को समर्थन दे और अमुक का बहिष्कार करे अपने में ही एक बड़ा राजनीतिक प्रश्न बन जाता है। फिर जब हिन्दू धर्म के नाते वोट किसे देना है और किसे नहीं देने के निर्देश ऐसे शीर्ष स्तर पर आने शुरू हो जायें तो यह स्थिति अपने में बहुत हास्यास्पद हो जाती है। क्योंकि इसे राजनीति से सीधे-सीधे दखल देने का निर्देश मान लिया जायेगा।
इस समय वक्फ के प्रस्तावित संशोधन के बाद जो राजनीतिक परिदृश्य उभरा है उसमें शंकराचार्य जैसे शीर्ष स्थान से वोट देने और न देने के निर्देश जारी होना एक बहुत ही संवेदनशील मुद्दा बन जाता है। वक्फ के प्रस्तावित संशोधन के बाद जिस तरह का राजनीतिक परिदृश्य उभरा है उसके परिपेक्ष में वोट देने न देने के ऐसे शीर्ष स्थान से निर्देश आना एक बड़ा सवाल बन जाता है। गौ माता को राष्ट्र माता घोषित किये जाने का मांग पत्र क्या केन्द्र सरकार को सौंपा जाना चाहिये या राज्य सरकारों को? फिर किस मंच के नाम से यह मांग रखी जायेगी। यदि इसी तर्ज पर ऐसी ही मांगे दूसरे धर्म को मानने वालों से भी आती हैं तो उन्हें सरकार कैसे इन्कार कर पायेगी? क्या कल जब राम मंदिर संचालन समिति सांई बाबा की मूर्ति को वहां से हटाएगी तब क्या वह इसके कारण पूरी स्पष्टता के साथ समाज में रख पायेगी? तब क्या सांई के भगत इस स्थिति को चुपचाप स्वीकार कर पायेंगे? क्या इससे समग्र हिन्दू समाज में ही बिखराव की स्थितियां नहीं उभरेंगी? मेरा मानना है कि सर्वधर्म समभाव की अवधारणा के तहत ऐसे बहिष्कार समय की मांग नहीं है।

ईवीएम पर उठते सवाल और कांग्रेस की विश्वसनीयता

कांग्रेस हरियाणा विधानसभा चुनाव में हार के लिए ईवीएम मशीनों पर भी दोष डाल रही है। इस बार जो आरोप इन मशीनों पर लगाया जा रहा है वह शायद पहले नहीं लगा है। कुछ विधानसभा क्षेत्रों के कुछ मतगणना केन्द्रों में वोटो की गिनती में ऐसी मशीन सामने आयी हैं जिनकी बैटरी 99 प्रतिशत तक चार्ज थी। जबकि औसत मशीनों की बैटरी 70 प्रतिशत से 80 प्रतिशत थी। ऐसा 20 विधानसभा क्षेत्रों में होने का आरोप है। इसी के साथ चुनावी डाटा भी देर से साइट पर लोड करने का आरोप है। इसी डाटा के कारण तेरह लाख वोट बढ़ गये हैं। चुनाव आयोग से भी यह शिकायतें की गयी है और आयोग ने इन्हें खारिज कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट में भी इस आश्य की याचिका दायर करके 20 विधानसभा क्षेत्रों की ईवीएम मशीने सील करने का आग्रह करके इन क्षेत्रों में पुनः चुनाव की मांग की गयी है। सुप्रीम कोर्ट इस याचिका को सुनवाई के लिये स्वीकार करता है या खारिज कर देता है यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा। लेकिन चुनाव आयोग इन आरोपों को आसानी से स्वीकार नहीं करेगा और इन चुनावों के इससे प्रभावित होने की संभावना बहुत कम है। ईवीएम पर शुरू से आरोप उठते आये हैं। सबसे पहले इस पर भाजपा ने ही सन्देह जताया था। लालकृष्ण आडवाणी ने ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाये। इस पर एक पुस्तिका तक छापी गयी थी। हर विपक्ष हारने के बाद ईवीएम पर सवाल उठाता आया है। लेकिन सत्ता में आने पर इसका पक्षधर बनता आया है। उन्नीस लाख ईवीएम मशीनों का रिकॉर्ड में गायब होने की जानकारी आरटीआई के माध्यम से सामने आ चुकी है। लेकिन इन मशीनों के गायब होने को किसी भी राजनीतिक दल ने अभी तक मुद्दा नहीं बनाया है। इसी से राजनीतिक दलों की मानसिकता स्पष्ट हो जाती है। यहां पर चुनाव हारने के बाद ईवीएम अपनी असफलता उस पर डालने का माध्यम मात्र होकर रह गया है। जबकि विदेशों में ईवीएम पर उठते सवालों के कारण बहुत देश चुनाव में मत पत्रों पर आ गये हैं। हरियाणा में राहुल गांधी की रैलियों में कितनी भीड़ होती थी और प्रधानमंत्री के लिये कितने लोग आते थे यह चुनावी रैलियां में देश देख चुका है। इसी से सारे चुनाव पूर्व के आकलन में कांग्रेस की भारी जीत मानी जा रही थी। आज तक ईवीएम पर उठे सवालों के कारण एक भी चुनाव क्षेत्र का चुनाव रद्द नहीं हो पाया है। जबकि ईवीएम पर सवाल उठना अपने में एक बहुत ही गंभीर मुद्दा है। अब आम आदमी भी ईवीएम को सन्देह की नजरों से देखने लग पड़ा है। दिल्ली विधानसभा क्षेत्र के सदन में ईवीएम हैक करके दिखा दी गयी थी। लेकिन जिसने यह करके दिखाया था उसका बाद में क्या हुआ और यह मुद्दा कहां गायब हो गया कोई नहीं जानता। स्वयं अरविंद केजरीवाल ने भी सदन के बाहर इसे जन मुद्दा नहीं बनाया और केजरीवाल ने ऐसा क्यों किया इसका कोई जवाब भी सामने नहीं आया है। ईवीएम पर उठते सवालों से चुनाव आयोग और केंद्र सरकार की नैतिकता पर कहीं चोट नहीं आती है। ऐसे में राहुल गांधी और कांग्रेस से विनम्र आग्रह हैं कि यदि ईवीएम पर उठते सवालों से आप स्वयं में संतुष्ट है तो एक बार इस मुद्दे को जन मुद्दा बनाकर सड़कों पर उतरने का साहस करो। एक चुनाव का हर राज्य और केंद्र में बहिष्कार कर देने का साहस दिखाओ पता चल जायेगा कि चुनाव आयोग और केंद्र सरकार कांग्रेस के बहिष्कार के बाद ईवीएम से चुनाव करवाने का साहस दिखाते हैं या नहीं। यदि ईवीएम को मुद्दा बनाकर चुनाव बहिष्कार का साहस नहीं है तो फिर ईवीएम पर सवाल उठाने छोड़कर कांग्रेस में विश्वसनीय नेतृत्व राज्यों में लाने का प्रयास करें। इस समय कांग्रेस की सरकारें जिन राज्यों में हैं वहां पर सरकारों की परफॉरमैन्स का ईमानदारी से फीडबैक ले। देखे की गिनती सरकारें जन अपेक्षाओं और अपने ही चुनावी वायदों के आईने में खरा उतर रही है। हिमाचल में जिस तरह से सरकार चल रही है उससे राज्यों के नेतृत्व के बजाये केंद्रीय नेतृत्व की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लग पड़े हैं जो बहुत घातक प्रमाणित होंगे।

राज्यों में विश्वसनीय नेतृत्व का अभाव है-कांग्रेस की समस्या

हरियाणा में कांग्रेस की हार बहुत लोगों के लिये अप्रत्याशित है क्योंकि चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों और आकलनों में किसी ने भी इस हार के प्रति इंगित नहीं किया था। जब प्रधानमंत्री ने हिमाचल की सुक्खू सरकार की असफलताओं को हरियाणा और जम्मू-कश्मीर में चुनावी मुद्दा बनाकर उछाला तब शैल को यह आशंका हो गयी थी कि चुनाव परिणाम उम्मीदों के विपरीत होंगे। शैल के पाठक जानते हैं कि हमने 16 सितम्बर के अंक में पूरे विस्तार से लिखा था कांग्रेस केंद्र में सत्ता में नहीं है। केवल हिमाचल, कर्नाटक और तेलंगाना राज्य में उसकी सरकारें हैं। इसलिये कांग्रेस जब भी किसी राज्य के चुनाव में अपने घोषणा पत्र के माध्यम से उस राज्य के लिये अपने वायदे रखेगी तो उन वायदों की पड़ताल उसकी राज्य सरकारों की परफारमैन्स से की जायेगी यह स्वभाविक है। हिमाचल हरियाणा का पड़ोसी राज्य है। 1966 में पंजाब पुनर्गठन से हरियाणा और वर्तमान हिमाचल निकला है। भाखड़ा विस्थापितों का पुनर्वास भी हरियाणा में हुआ है। लगभग एक दर्जन विधानसभा सीटों पर इन विस्थापितों का निर्णायक प्रभाव है। यह विस्थापित हिमाचल से हर समय जुड़े हुये हैं। इसलिये हिमाचल सरकार की परफॉरमैन्स के लिये इन्हें किसी अन्य के प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं रहती। हिमाचल सरकार की परफॉरमैन्स अपने ही कारणों से अपनी ही दी हुई गारंटीयों के आईने में पूरी तरह असफल रही है। इस असफलता के कारण हरियाणा का मतदाता कांग्रेस के वायदों पर विश्वास नहीं कर पाया। कर्नाटक में मुख्यमंत्री स्वयं विवादों में धिरे हुये हैं। इसलिये कांग्रेस पर विश्वसनीयता बना पाने में आम आदमी निर्णायक नहीं हो पा रहा है।
हरियाणा में कांग्रेस की हार निश्चित रूप से राष्ट्रीय स्तर पर एक गंभीर मुद्दा है। हरियाणा में भाजपा ने भी मुफ्ती की घोषणाओं के सहारे सत्ता पायी है। मुफ्ती के वायदों पर आरटीआई से लेकर सर्वाेच्च न्यायालय तक का जो रुख रहा है उसका हरियाणा के चुनाव पर कोई असर नहीं दिखा है। भाजपा और कांग्रेस जैसे बड़े दलों ने आरबीआई और सर्वाेच्च न्यायालय को खुलकर अंगूठा दिखाया है। मुफ्ती के वायदों को भाजपा कैसे पूरा करती है और उसका हरियाणा की अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ता है यह आने वाला समय ही बतायेगा। इस समय हरियाणा बेरोजगारी में शायद देश में पहले स्थान पर है। किसान आन्दोलन का केंद्र हरियाणा रहा है। शायद इसी के कारण यह माना जा रहा था कि अब भाजपा प्रदेश की सत्ता से बाहर हो जायेगी। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। क्योंकि जब नरेन्द्र मोदी का रथ लोक सभा चुनाव में चार सौ पार के नारे के बाद दो सौ चालीस पर रुक गया और नीतीश तथा चन्द्रबाबू नायडू के सहारे सत्ता तक पहुंचे तब यह स्पष्ट हो गया था कि अब जिस भी राज्य में विधानसभा चुनाव होंगे उन्हें येनकेन प्रकरेण भाजपा जीतने का प्रयास करेगी। हरियाणा में चुनाव से पहले मुख्यमंत्री का बदला जाना भी इसी रणनीति का हिस्सा था। इसी रणनीति के तहत वक्फ संशोधन विधेयक लाना और उस पर राष्ट्रीय बहस चलवाना तथा इसी बीच एक देश एक चुनाव की रिपोर्ट आना कुछ ऐसे संकेत बन जाते हैं जिन से भविष्य का बहुत कुछ समझा जा सकता है। कांग्रेस के रणनीतिकार और विश्लेषक इसका आकलन नहीं कर पाये।
इस समय जो राजनीतिक वातावरण निर्मित हो रहा है उसमें अधिकांश दलों में और विशेषकर कांग्रेस के अन्दर ऐसे लोगों की संख्या बहुत है जो अनचाहे और बिना समझे ही हिन्दू एजैण्डे के ध्वजवाहक बने हुये हैं। जबकि यह एजैण्डा एक राजनीतिक एजैण्डा बनकर रह गया है। इस स्थिति को समझने की आवश्यकता है। सारा एजैण्डा आर्थिक मुद्दों से ध्यान हटाने की रणनीति है। इसलिये आज कांग्रेस को अपनी विश्वसनीयता बनाने की आवश्यकता है। इसके लिये राज्य सरकारों की परफॉरमैन्स पर ध्यान देने की आवश्यकता है। क्योंकि कांग्रेस को लोग राहुल गांधी के ब्यानों से ज्यादा पार्टी की राज्य सरकारों की परफारमैन्स से आंकेंगे। क्योंकि जब से आरटीआई और सर्वाेच्च न्यायालय ने मुफ्ती की घोषणाओं पर कड़ा रुख दिखाया है तब से आम आदमी सरकारों की कर्ज संस्कृति पर भी नजर रख रहा है। आज हिमाचल में सरकार जिस तरह से प्रदेश को कर्ज के चक्रव्यूह में डालकर घी पीने का काम कर रही है उसे आम आदमी पसन्द नहीं कर रहा है। इसलिये हरियाणा की हार को ईवीएम गड़बड़ी करार देने से पहले कांग्रेस को अपनी राज्य सरकारों की जन स्वीकार्यता का आकलन करना होगा। क्योंकि हरियाणा की हार की कीमत महाराष्ट्र और झारखंड में चुकानी पड़ सकती है। इंडिया के सहयोगी दल भी कांग्रेस के प्रति अलग राय बनने पर विवश हो जाएंगे। जब तक राज्यों में विश्वसनीय नेतृत्व नहीं आ पाता है तब तक कांग्रेस के लिये भविष्य आसान नहीं होगा।

व्यवस्था परिवर्तन से कहां पहुंचा प्रदेश

हिमाचल विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस ने प्रदेश की जनता को दस गारंटीयां दी थी और इन पर भरोसा करने के लिए कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी ने गवाही दी थी। इस गवाही पर भरोसा करके प्रदेश की जनता ने सत्ता की बागडोर कांग्रेस को सौंप दी। लेकिन सत्ता संभालते ही यह घोषणा कर दी गयी की सुक्खू सरकार व्यवस्था परिवर्तन के लिये काम करेगी। परन्तु इस व्यवस्था परिवर्तन को कभी परिभाषित नहीं किया गया। आज कांग्रेस के आम कार्यकर्ता से लेकर शीर्ष नेताओं तक कोई भी इस व्यवस्था परिवर्तन की व्याख्या कर पाने की स्थिति में नहीं है। इसलिये व्यवस्था परिवर्तन के इस सूत्र को समझने के लिये सरकार द्वारा अब तक लिये गये महत्वपूर्ण फैसलों पर नजर डालना आवश्यक हो जाता है। इस कड़ी में सबसे पहले प्रदेश की जनता को यह बताया गया कि प्रदेश के हालात कभी भी श्रीलंका जैसे हो सकते हैं और पिछली सरकार द्वारा अन्तिम छः माह में लिये गये फैसलों को पलटते हुये सैकड़ो नये खोले गये संस्थान बन्द कर दिये गये। मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों के आवासों में रिपेयर का दौर शुरू हुआ और मुख्यमंत्री को लम्बे समय तक पीटरहॉप में रहना पड़ा। हिमाचल बेरोजगारी में देश के पहले छः राज्यों में शामिल है इसलिये कांग्रेस ने प्रतिवर्ष एक लाख लोगों को रोजगार उपलब्ध करवाने की गारंटी दी थी। लेकिन इस गारंटी पर काम करने से पहले ही उस संस्थान को भ्रष्टाचार के आरोपों की आड़ में भंग कर दिया जिसके जिम्मे रोजगार देने की प्रक्रिया संबंधी जिम्मेदारी थी। इसीलिये रोजगार उपलब्ध करवाने की जानकारी मांगने वाले हर सवाल का विधानसभा में एक ही जवाब आता है कि सूचना एकत्रित की जा रही है।
वित्तीय संकट के मामले में बीस माह के कार्यकाल में 27,000 करोड़ का कर्ज लेने का आंकड़ा पूर्व केंद्रीय मंत्री और हमीरपुर के सांसद अनुराग ठाकुर ने जारी किया है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी.नड्डा ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि केन्द्र के सहयोग के बिना यह सरकार एक दिन नहीं चल सकती। केन्द्र द्वारा दी गयी आपदा राहत में घपले किये जाने का आरोप कंगना रनौत से लेकर नड्डा तक लगा चुके हैं। अब तो कांग्रेस के नेता भी इस पर मुखर होने लग गये हैं। वित्तीय संकट के नाम पर इतना वित्तीय बोझ आम आदमी पर डाल दिया गया है कि आम आदमी इस डर में जी रहा है कि सरकार कब कौन सा टैक्स किस कारण से लगा दे इसका अन्दाजा लगाना ही असंभव हो गया है। लेकिन जनता पर इतना वित्तीय बोझ डालने और हर माह एक हजार करोड़ से अधिक का कर्ज लेने के बाद भी यह सरकार समय पर वेतन और पैन्शन का भुगतान क्यों नहीं कर पा रही है। आज हिमाचल सरकार की परफॉरमैन्स हरियाणा विधानसभा के चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री और अन्य भाजपा नेताओं के हाथ में कांग्रेस के खिलाफ एक बड़ा हथियार आ गया है। इस हथियार से कांग्रेस का नुकसान होना तय है। परफॉरमैन्स के लिहाज से हिमाचल में कांग्रेस बीस वर्ष तक पिछड़ गयी है।
ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि कांग्रेस हाईकमान हिमाचल के हालात का संज्ञान लेकर कोई सुधारात्मक कदम क्यों नहीं उठा पा रही है। आज हिमाचल से लोकसभा और राज्यसभा में कोई भी सांसद न होना एक बड़ा कारण बन गया है। क्योंकि हर पार्टी का हाईकमान किसी भी राज्य की जानकारी के लिये उस प्रदेश से आये सांसदों और मंत्रियों यदि केंद्र में उस पार्टी की सरकार हो तो उनकी राय पर बहुत निर्भर रहता है। लेकिन प्रदेश में कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद संसद में प्रदेश से कोई कांग्रेस सांसद नहीं है। सांसदों के बाद पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष की राय को अधिमान दिया जाता है। यहां पर पार्टी अध्यक्ष को पहले ही विवादित बना दिया गया है। पार्टी अध्यक्ष के बाद प्रैस की सूचनाओं पर निर्भरता की बात आती है। इस दिशा में इस सरकार ने प्रैस का गला ऐसे घोंट कर रखा है कि कहीं कोई आवाज बची ही नहीं है। इस सरकार ने 1971 से लागू हुये लैण्ड सीलिंग एक्ट को 2023 में संशोधित करके उन संशोधनों को 1971 से ही लागू करने की सिफारिश की है। आज पचास वर्ष बाद ऐसे संशोधन की आवश्यकता क्यों आ खड़ी हुई? क्या आज भी प्रदेश में ऐसे लोग हैं जिनके पास लैण्ड सीलिंग सीमा से अधिक जमीन है? इस मुद्दे पर न तो विपक्षी दल भाजपा ने कोई सवाल उठाया है और न ही मीडिया ने। जहां इस तरह की स्थितियां हो वहां पर अन्दाजा लगाया जा सकता है की सरकार के व्यवस्था परिवर्तन सूत्र ने क्या कुछ बदल दिया होगा। ऐसे हालात का प्रदेश की जनता पर क्या प्रभाव पड़ेगा और सत्तारूढ़ दल उससे कितना मजबूत होगा यह सामान्य समझ का विषय है।

भाजपा और कांग्रेस दोनों के केंद्रीय नेतृत्व की परीक्षा होंगे यह चुनाव परिणाम

हरियाणा और जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं इन चुनावों के परिणाम देश की राजनीति पर गंभीर प्रभाव डालेंगे यह तय है। क्योंकि जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने और केन्द्र शासित प्रदेश बनाने के लम्बे समय बाद शीर्ष अदालत के निर्देशों की अनुपालना करते हुये यह चुनाव हो रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में मुस्लिम समुदाय बहुसंख्यक है। मुस्लिम समुदाय के प्रति भाजपा का राजनीतिक दृष्टिकोण क्या और कैसा है इसका पता इसी से चल जाता है कि पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने शायद एक भी मुस्लिम को अपना उम्मीदवार नहीं बनाया था और केंद्रीय मंत्री परिषद में इस समुदाय से कोई भी मंत्री नहीं है। इसी दौरान प्रस्तावित वक्फ संशोधन विधेयक के बाद पूरे देश में वक्फ संपत्तियों को लेकर जो वातावरण उभरा है उसकी राजनीतिक पृष्ठभूमि में जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनाव परिणामों का देश की राजनीति पर एक दूरगामी प्रभाव पढ़ना निश्चित है। इसी तरह हरियाणा में तीन कृषि कानूनों का आना और किसान आन्दोलन के बाद उनका वापस लिया जाना तथा अब फिर उन कृषि कानूनों को भाजपा सांसद कंगना रनौत द्वारा लागू किये जाने की मांग के साथ ही हरियाणा का चुनावी परिदृश्य रोचक हो गया है। दोनों प्रदेशों में चुनाव प्रचार के केन्द्रीय ध्रुव प्रधानमंत्री और गृह मंत्री हैं।
भाजपा और संघ के रिश्ते न चाहते हुये भी पिछले लोकसभा चुनावों से जन चर्चा का विषय बन गये हैं। इन्हें जन चर्चा में लाने के लिये भाजपा अध्यक्ष ज.ेपी. नड्डा का वह ब्यान जिम्मेदार है जिसमें उन्होंने कहा था कि भाजपा को संघ के मार्गदर्शन की आवश्यकता नहीं है। तब यह उम्मीद थी की राम मंदिर की पृष्ठभूमि में भाजपा अकेले ही चुनावों में चार सौ का आंकड़ा छू लेगी। लेकिन चुनाव परिणामों ने सारा परिदृश्य ही बदल दिया। भाजपा अकेले सरकार बनाने लायक बहुमत नहीं ला पायी। अब भाजपा अगला राष्ट्रीय अध्यक्ष चुनने में ही उलझ गयी है। इसमें भाजपा और संघ का टकराव न चाहते हुये भी सार्वजनिक चर्चा में आ गया है। ऐसे में इन दो राज्यों में हो रहे चुनाव प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के लिये अपने को प्रमाणित करने का अवसर बन गये हैं कि उनके बिना भाजपा का भविष्य सुरक्षित नहीं है। इन दोनों राज्यों में भाजपा को केवल कांग्रेस से ही चुनौती है। इस चुनौती में कांग्रेस की राज्य सरकारों की परफॉरमैन्स को प्रधानमंत्री और गृहमंत्री दोनों ही बड़ा मुद्दा बनाकर उछाल रहे हैं।
हिमाचल के वित्तीय संकट के परिदृश्य में कांग्रेस द्वारा चुनावों में दी गयी गारंटीयां और प्रदेश सरकार द्वारा लिये जा रहे फैसले स्वतः ही व्यवहारिक अविश्वसनीयता का शिकार होते जा रहे हैं। कर्नाटक में मुख्यमंत्री के अपने खिलाफ जांच के आदेश हो चुके हैं। मामला गंभीर है। लेकिन इसी बीच कर्नाटक की ही एक अदालत चुनावी बाण्डज़ प्रकरण में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा, कर्नाटक भाजपा के नेता और ई डी अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने से जो स्थिति निर्मित हुई है उसका वांच्छित राजनीतिक लाभ मिल पाना इतना आसान नहीं होगा। भले ही यह एफ आई आर पूरी कानूनी प्रक्रिया से गुजर कर हुई है और यह राष्ट्रीय स्तर पर एक समय इसके मायने बहुत गंभीर हो जायेंगे यह भी तय है। लेकिन यह एफ आई आर मुख्यमंत्री के अपने खिलाफ आये जांच आदेशों के बाद हुई है। इसलिये तात्कालिक रूप से इसका चुनावी परिदृश्य पर कोई बड़ा असर पढ़ने की संभावनाएं बहुत कम हैं। इस परिदृश्य में इन दोनों राज्यों के चुनाव परिणाम कांग्रेस से ज्यादा भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व पर ज्यादा प्रभाव डालेंगे। कांग्रेस शासित राज्य सरकारों की परफॉरमैन्स का यदि केंद्रीय नेतृत्व कड़ा संज्ञान लेकर कोई कारवाई नहीं करता है तो उसका असर इसके बाद आने वाले राज्यों के चुनावों पर पड़ेगा।

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