Thursday, 16 April 2026
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पश्चिम एशिया का तनाव और भारत की चिंता

पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव एक बार फिर पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बन गया है। हाल के दिनों में ईरान और खाड़ी क्षेत्र में जिस तरह से सैन्य टकराव और तनाव बढ़ा है, उसने क्षेत्रीय शांति और स्थिरता पर सवाल खड़े कर दिये हैं। स्थिति इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि यह घटनाक्रम रमजान के पवित्र महीने के दौरान सामने आया है। ऐसे समय में बढ़ती हिंसा और संघर्ष यह संकेत देते हैं कि हालात गंभीर होते जा रहे हैं।
पश्चिम एशिया का महत्व केवल उस क्षेत्र तक सीमित नहीं है। यह दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। कई देशों की तेल और गैस की जरूरतें इसी क्षेत्र से पूरी होती हैं। इसके अलावा वैश्विक समुद्री व्यापार के कई महत्वपूर्ण मार्ग भी यहीं से गुजरते हैं। इसलिये जब भी इस क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ती है, उसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और राजनीति पर पड़ता है।
भारत के लिये यह स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। खाड़ी देशों में लगभग एक करोड़ भारतीय नागरिक रहते और काम करते हैं। ये लोग अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते हुए अपने परिवारों का सहारा बनते हैं और भारत की अर्थव्यवस्था में भी योगदान देते हैं। इसलिये इस क्षेत्र में किसी भी तरह की अस्थिरता भारत के लिए चिंता का कारण बनती है। सबसे बड़ी चिंता वहां रहने वाले भारतीयों की सुरक्षा को लेकर होती है।
भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा भी इसी क्षेत्र से आता है। भारत अपनी तेल और गैस की बड़ी मात्रा खाड़ी देशों से आयात करता है। यदि वहां संघर्ष बढ़ता है या आपूर्ति बाधित होती है, तो इसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है। इसके अलावा समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा भी बेहद महत्वपूर्ण है। हाल के दिनों में व्यापारी जहाजों पर हुए हमलों की खबरों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है।
ऐसी परिस्थितियों में भारत ने संयम और कूटनीति का रास्ता अपनाने की अपील की है। भारत की विदेश नीति हमेशा से शांति और बातचीत के सिद्धांतों पर आधारित रही है। भारत का मानना है कि किसी भी विवाद का समाधान युद्ध से नहीं बल्कि संवाद और समझदारी से निकाला जा सकता है। इसलिये भारत लगातार सभी पक्षों से संयम बरतने और बातचीत के माध्यम से समाधान खोजने की अपील कर रहा है।
भारत की एक और प्राथमिकता अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। संबंधित देशों में स्थित भारतीय दूतावास और वाणिज्य दूतावास लगातार भारतीय समुदाय के संपर्क में हैं और उन्हें आवश्यक सलाह और सहायता प्रदान कर रहे हैं। यदि स्थिति और गंभीर होती है तो सरकार अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने में भी सक्षम है।
आज की दुनिया पहले की तुलना में कहीं अधिक आपस में जुड़ी हुई है। किसी एक क्षेत्र में पैदा हुआ संकट जल्दी ही वैश्विक समस्या बन सकता है। इसलिए पश्चिम एशिया में शांति और स्थिरता केवल उस क्षेत्र के देशों के लिए ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी इस स्थिति को गंभीरता से लेते हुए सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। संघर्ष को बढ़ने से रोकने और शांति स्थापित करने के लिए कूटनीतिक प्रयासों को मजबूत करना जरूरी है। युद्ध और हिंसा से केवल नुकसान ही होता है, जबकि संवाद और सहयोग से स्थायी समाधान निकाला जा सकता है।
भारत का स्पष्ट मानना है कि शांति और स्थिरता ही विकास का आधार हैं। यदि किसी क्षेत्र में लगातार संघर्ष बना रहता है तो वहां के लोगों का जीवन और भविष्य दोनों प्रभावित होते हैं। इसलिए पश्चिम एशिया में शांति स्थापित होना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। सभी पक्षों को संयम और समझदारी का परिचय देते हुए बातचीत के रास्ते पर आगे बढ़ना होगा। तभी इस संकट का स्थायी समाधान संभव हो सकेगा।
 
 

राजनीतिक टकराव में कानून की अनदेखी लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरा

पिछले दिनों प्रदेश में पुलिस की कारवाई का जो घटनाक्रम सामने आया, उसने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है। क्या हमारे लोकतांत्रिक संस्थान वास्तव में कानून के शासन पर चल रहे हैं या फिर राजनीतिक टकराव का हिस्सा बनते जा रहे हैं? जिस प्रकार हर पक्ष अपने-अपने दावे और तर्कों के साथ सामने आया, उससे आम जनता और देश का जागरूक वर्ग यह सोचने पर मजबूर है।
पुलिस का मूल दायित्व संविधान और कानून के दायरे में रहकर काम करना है। पुलिस की कार्यप्रणाली किसी राजनीतिक विचारधारा के आधार पर नहीं बल्कि विधि सम्मत प्रावधानों के अनुसार संचालित होती है। भारत में पुलिस की कारवाई मुख्य रूप से दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) और अब लागू भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के प्रावधानों के तहत होती है। इन कानूनों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अपराध की जांच, गिरफ्तारी और न्यायिक प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से हो। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि संप्रभुता किसकी है। भारत एक संघीय लोकतंत्र है, लेकिन संप्रभुता किसी राज्य या व्यक्ति की नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र की होती है। कानून भी पूरे देश में समान रूप से लागू होता है। ऐसे में यदि किसी राज्य में बाहरी प्रदेश के संदिग्धों या अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण मिलने लगे या पुलिस कारवाई को राजनीतिक चश्मे से देखा जाने लगे, तो यह न केवल कानून व्यवस्था बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए भी खतरनाक संकेत है। कानून यह भी स्पष्ट करता है कि अंतरराज्यीय मामलों में पुलिस कैसे कारवाई करती है। गिरफ्तारी, जांच और आरोपी को न्यायालय में प्रस्तुत करने की प्रक्रिया साक्ष्यों, पुलिस रिकॉर्ड और कानूनी धाराओं के आधार पर तय होती है। कई बार परिस्थितियों के अनुसार पुलिस को त्वरित निर्णय लेने पड़ते हैं, जिनका उद्देश्य केवल अपराध की जांच को आगे बढ़ाना होता है। ऐसे मामलों में कानूनी प्रक्रिया की व्याख्या सकारात्मक दृष्टिकोण से की जानी चाहिए, न कि राजनीतिक विवाद के रूप में।
लेकिन जब पुलिस कारवाई को लेकर राजनीतिक ब्यानबाजी शुरू हो जाती है, तो इससे पुलिस की पेशेवर साख और संस्थागत विश्वसनीयता दोनों प्रभावित होती हैं। यदि सरकारी संस्थानों या राज्य के संसाधनों का उपयोग कानून की प्रक्रिया को प्रभावित करने या किसी पक्ष को लाभ पहुंचाने के लिए किया जाए, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन जाती है। पुलिस को यदि राजनीतिक उपकरण की तरह इस्तेमाल किया जाएगा, तो इससे न केवल कानून व्यवस्था कमजोर होगी बल्कि जनता का भरोसा भी टूटेगा। भारत जैसे लोकतंत्र में पुलिस की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। पुलिस केवल अपराधियों को पकड़ने वाली एजेंसी नहीं बल्कि कानून और व्यवस्था की संरक्षक संस्था है। इसलिए पुलिस तंत्र का आधार पेशेवर नैतिकता, निष्पक्षता और संवैधानिक मर्यादा होना चाहिए। यह भी सच है कि आज भी पुलिस विभाग में अनेक अधिकारी पूरी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के साथ काम कर रहे हैं। लेकिन कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जो पूरी व्यवस्था की छवि को प्रभावित कर देती हैं। ऐसे मामलों से एक और महत्वपूर्ण सवाल उठता है क्या हमारी संस्थाएं अपनी गलतियों से सीखने के लिए तैयार हैं? किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में यदि कोई बड़ी प्रशासनिक विफलता सामने आती है, तो उसके बाद तथ्यों की जांच, आत्ममंथन और सुधार की प्रक्रिया शुरू होती है। यह एक स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान होती है। लेकिन यदि इन घटनाओं को केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित कर दिया जाए और संस्थागत सुधार की दिशा में कोई गंभीर प्रयास न हो, तो इससे व्यवस्था में अविश्वास और गहरा हो सकता है। समय की मांग है कि पुलिस तंत्रा को राजनीतिक विवादों से दूर रखा जाए और उसकी पेशेवर स्वतंत्रता और जवाबदेही दोनों को मजबूत किया जाए। न्यायपालिका, शिक्षाविद, मीडिया और जागरूक नागरिक समाज को भी इस दिशा में अपनी भूमिका निभानी होगी। लोकतंत्र केवल चुनावों से मजबूत नहीं होता, बल्कि मजबूत संस्थाओं, पारदर्शिता और कानून के समान अनुपालन से मजबूत होता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि नागरिक भी अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों के प्रति सजग रहें। अन्याय को देखकर चुप रहना किसी भी समाज के लिए खतरनाक हो सकता है। एक जागरूक समाज ही लोकतंत्र की असली ताकत होता है, जो संस्थाओं को जवाबदेह बनाता है और कानून के शासन को मजबूत करता है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसका संविधान और कानून का शासन है। यदि इन मूल्यों की रक्षा नहीं की गई, तो राजनीतिक टकराव और संस्थागत अविश्वास का यह दौर आगे चलकर और गंभीर रूप ले सकता है। इसलिए यह समय आत्ममंथन और सुधार का है, ताकि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और जनता का विश्वास दोनों सुरक्षित रह सकें।

हिंसा और अराजकता राष्ट्रीय प्रश्नों के विकल्प नहीं हो सकते

लोकतंत्र तब खतरे में आ जाता है जब इसके सबसे बड़े मंच संसद में राष्ट्रीय प्रश्नों पर बहस न हो पाये। विपक्ष के सवालों का जवाब लोकसभा में न आ पाये। बल्कि इन सवालों से बचने के लिए प्रधानमंत्री लोकसभा में ही न आये। संसद के बाहर अराजकता, भय और हिंसा का वातावरण निर्मित होने में सरकार की सक्रिय भूमिका पर प्रश्न खड़े होने शुरू हो जाये। इस समय दुर्भाग्य से यह सब घट रहा है। राष्ट्रीय प्रश्नों को जब शीर्ष न्यायपालिका भी लंबाने की नीति पर चल पड़े तो निश्चित रूप से यह मानना ही पड़ेगा कि लोकतंत्र सही में खतरे में है। इस समय वोट चोरी से लेकर एपस्टिन फाइल तक जितने भी राष्ट्रीय प्रश्न उठे हैं एक पर भी संसद के अन्दर बहस नहीं हुई है। जब-जब यह सवाल उठे हैं तब-तब प्रधानमंत्री लोकसभा में आये ही नहीं। विपक्ष को लोकसभा में बोलनेे ही नहीं दिया गया। बल्कि कुछ महिला सांसदों से प्रधानमंत्री को खतरा हो सकता है यह जानकारी स्वयं लोकसभा अध्यक्ष प्रधानमंत्री को देते हैं और प्रधानमंत्री लोकसभा में आने की बजाये राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर हुई चर्चा पर अपना धन्यवाद प्रस्ताव रखते हैं। लेकिन उन महिला सांसदों को चिन्हित करके उन पर कोई कारवाई नहीं की जाती है। संसद के बाहर एक भक्त इन सांसदों और राहुल गांधी को घर में घुसकर गोली मारने की बात करता है। पुलिस जब इस व्यक्ति के खिलाफ कारवाई करती है तब इसका आपराधिक रिकॉर्ड सामने आता है। इसी तरह एक सनातन सम्मेलन में जहां पर धार्मिक उन्माद और वैमनस्य बढ़ाने के आयोजकों द्वारा भाषण दिये जाते हैं तब आरटीआई की एक सूचना के माध्यम से यह जानकारी आती है कि इस सनातन सम्मेलन को संस्कृति मंत्रालय द्वारा तरेसठ लाख का अनुदान दिया गया है। इस सम्मेलन में हिन्दू राष्ट्र के लिये धार्मिक वैमन्सय का वातावरण निर्मित किया जाता है। ऐसे और भी कई प्रसंग है जहां हिन्दू राष्ट्र के लिये धार्मिक और जातीय भेदभाव को उकसाया गया है। ऐसे संकेत और संदेश उभर रहे हैं जहां हिन्दू राष्ट्र के लिये धार्मिक और जातिय हिंसा को बढ़ावा देने के उपक्रम किये जा रहे हैं। राष्ट्रीय प्रश्नों को हिंसा और अराजकता से दबाने के खुले प्रयास हो रहे हैं। सरकार कब तक राष्ट्रीय प्रश्नों से बचती रहेगी यह अब एक आम चर्चा का विषय बनता जा रहा है। क्योंकि जिस अनुपात में इन प्रश्नों से ध्यान भटकाने का प्रयास कर रही है उस अनुपात में यह सवाल और बड़े होते जा रहे हैं। सरकार की इस नीति और नीयत के कारण ही आज स्थितियां लोकसभा अध्यक्ष और चुनाव आयोग के अध्यक्ष के खिलाफ लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव तक आ गये हैं। आज जिस तरह से अमेरिका के साथ हुये व्यापार समझौते में देश के किसान पर संकट आया है उससे किसान के पास सड़क पर उतरने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं होगा। कृषि कानूनों के विरोध में देश किसान आन्दोलन को देख चुका है और सरकार भोग चुकी है। अब अमरिकी व्यापार समझौते के साथ ही पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवाणे की किताब का मुद्दा भी सरकार से जवाब मांग रहा है। जिस तरह से यह किताब चर्चा में आई है उसके परिणामस्वरुप इसका कथ्य हर आदमी तक पहुंच गया है। सरकार राष्ट्रीय प्रश्नों से बचने के लिये जितने प्रयास कर रही है उसके कारण उसकी हिन्दू राष्ट्र की मंशा जन चर्चा में आती जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस ढंग से पूरी भाजपा का प्रायः बन गये थे आज शायद पूरी भाजपा उनके अपने ही भार से दबने के कगार पर पहुंचती जा रही है। यही स्थिति भाजपा के लिये नुकसानदेह होगी। क्योंकि राष्ट्रीय प्रश्नों के साथ महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और काले धन के मुद्दे जुड़ जाएंगे। व्यवहारिक रूप से इन मुद्दों का आकार आज 2014 से कई गुना बढ़ गया है। इस बढ़ते आकार के साये में राष्ट्रीय प्रश्नों पर बहस की मांग को हिंसा और अराजकता से दबाना असंभव हो जाएगा।

महामहिम राज्यपाल का अभिभाषण पर आचरण क्या संकेत है?

इस समय हिमाचल सरकार के सामने राजस्व घाटा अनुदान बहाल करवाने तथा राज्यसभा चुनाव में अपने प्रत्याशी को विजयी बनाने और पंचायत चुनाव में पार्टी तथा हाईकमान की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की चुनौतियां एक साथ सामने आ गयी हैं। राज्यसभा चुनाव 16 मार्च को और पंचायती चुनाव मई के अन्त तक होने हैं। क्या सरकार इन चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना कर पायेगी यह सवाल हर आदमी के सामने खड़ा है। क्योंकि पिछली बार भी कांग्रेस की सरकार होते हुये भी राज्यसभा भाजपा छीन कर ले गयी थी। भाजपा इस बार भी चुनाव लड़ेगी और जब भाजपा चुनावी मैदान में होगी तो कांग्रेस हार की आशंका से मुक्त नहीं हो सकती। पार्टी और सरकार के भीतर जो राजनीतिक परिस्थितियां पिछले चुनाव के दौरान थी वह शायद इस बार पहले से ज्यादा मुखर है। पिछली बार कांग्रेस का संगठन था परन्तु इस बार यह संगठन जिला अध्यक्षों की नियुक्तियों से अभी तक आगे नहीं बढ़ पाया है। पिछली बार कांग्रेस के नाराज लोगों ने अपनी नाराजगी हाईकमान तक पहुंचाने के लिये चिट्ठी पत्र का माध्यम चुना था। इस बार सरकार के मंत्रियों और विधायकों ने खुलेआम अफसरशाही पर निशाना साधते हुये अपरोक्ष में मुख्यमंत्री और हाईकमान दोनों को एक साथ इंगित कर दिया है। ऐसे ही वातावरण में वीरभद्र कांग्रेस के गठन की संभावनाएं भी गंभीरता से तैरना शुरू हो गई है। क्योंकि अनचाहे ही यह संदेश और संकेत खुलेआम चले गये हैं कि मुख्यमंत्री वीरभद्र समर्थकों को किनारे लगातेे चले आ रहे हैं। शिमला, सोलन, सिरमौर और मण्डी संसदीय क्षेत्र से ताल्लुक रखने वाले कांग्रेसियों के क्षेत्र से जितने कार्यकर्ताओं को राजनीतिक तजापोशियां दी गयी हैं उनसे अनचाहे ही कई मंत्रियों और दूसरे प्रभावी नेताओं के सामने इन नियुक्तियों के माध्यम से समानान्तर सत्ता केन्द्र स्थापित किये जा रहे हैं। वैसे भी इन ताजपोशियों में क्षेत्रीय संतुलन को लगभग नजरअन्दाज कर दिया गया है। पिछली बार राज्यसभा सीट इस कारण हारी थी क्योंकि उम्मीदवार प्रदेश से बाहर का व्यक्ति था। इस बार भी यदि पिछले ही क्रम को दोहराया गया तो पहले जैसा ही आचरण होने की संभावनाएं शायद बढ़ जायेगी। फिर पंचायत चुनाव टालने की सरकार ने हर संभव कोशिश कर ली है। सर्वाेच्च न्यायालय तक दस्तक दे दी। लेकिन अन्त में अदालत के फैसले से चुनाव करवाने की बाध्यता आ गयी। इससे भी सरकार के पक्ष में कोई सकारात्मक संदेश नहीं गया। इसी वस्तुस्थिति में राजस्व घाटा अनुदान बन्द होने का फैसला आ गया। सरकार ने 16वें वित्त आयोग के सामने जो भी पक्ष रखा उसका कोई लाभ नहीं मिला। लेकिन इसी संकट के बीच जब एपीएमसी की गाड़ी खरीद का प्रकरण सामने आ गया तो सरकार के प्रति जन सहयोग और सहमति पर स्वतः ही प्रश्न चिन्ह लग गये। सरकार द्वारा की गई सारी राजनीतिक ताजपोशियां चर्चा में आ गयी। क्योंकि इस आर्थिक संकट के बीच राजनीतिक ताजपोशी पाये एक भी मित्र ने अपने वेतन भत्ते त्यागने या पद छोड़ने की पेशकश नहीं की। इसी कारण सरकार की आज तक की सारी कार्यप्रणाली और फैसले जन समीक्षा का केन्द्र बन गये हैं। जिन अफसरशाहों को उनके दिल्ली से मधुर संपर्क को और रिश्तों के नाम पर सेवानिवृत्ति के बाद भी सेवा विस्तार और पुनः नियुक्तियों से नवाजा गया था वह भी इस आर्थिक संकट में कोई ठोस सहायता नहीं दे पाये। इस समय कुल मिलाकर जो परिस्थितियां निर्मित हो गयी हैं उनसे जो वातावरण बन चुका है उससे राजनीतिक खतरा बहुत ज्यादा बढ़ गया है। यह स्वभाविक है कि जो लोग सरकार की कार्य प्रणाली पर मत भिन्नता रखते हैं उन्हें अपने रोष को हवा देने का पूरा-पूरा संयोग खड़ा हो गया है। क्योंकि विधानसभा में जिस तरह से महामहिम राज्यपाल ने अपने अभिभाषण में वित्त आयोग पर आई टिप्पणियों को नहीं पढ़ा है उसका संकेत और संदेश बहुत दूरगामी है यह तय है। इस परिदृश्य में यह संभावना बहुत प्रबल हो गयी है कि इस सब का प्रतिफल सहज नहीं होगा। इसे आने वाले संकट का संकेत मानना ही होगा।

 

आरडीजी की समाप्ति और वित्तीय संकट का असली चेहरा

हिमाचल प्रदेश की वित्तीय स्थिति आज किसी एक फैसले या एक वर्ष की उपज नहीं है, बल्कि वर्षों की लापरवाही, अव्यावहारिक वादों और कमजोर वित्तीय अनुशासन का परिणाम बन चुकी है। सुक्खू सरकार ने सत्ता संभालते समय जिस ‘‘व्यवस्था परिवर्तन’’ का नारा दिया था, वह आज अपने ही बोझ तले दबता दिखाई दे रहा है। संविधान के तहत चलने वाली स्थापित प्रशासनिक व्यवस्था, वित्तीय नियमों और जवाबदेही के ढांचे से ऊपर आखिर क्या बदला जाना था, यह सवाल आज भी प्रदेश की जनता के सामने अनुत्तरित है। जनता ने कांग्रेस को सत्ता इसलिए सौंपी थी क्योंकि वह पिछली सरकार से असंतुष्ट थी और कांग्रेस ने दस गारंटियों के रूप में एक वैकल्पिक भरोसा प्रस्तुत किया था। लेकिन सत्ता में आते ही जिस तरह श्रीलंका जैसे हालात की चेतावनी देकर भय का माहौल बनाया गया, उससे यह उम्मीद बनी थी कि सरकार खर्च पर लगाम लगाएगी और वित्तीय अनुशासन को प्राथमिकता देगी। व्यवहार में हुआ ठीक इसके विपरीत।
राजस्व घाटा अनुदान यानी आरडीजी की समाप्ति ने सरकार की असल तैयारी और सोच को पूरी तरह उजागर कर दिया है। आरडीजी कोई स्थायी आय का साधन नहीं था, बल्कि सीमित अवधि के लिए दी जाने वाली राहत थी, जिसकी समाप्ति पूर्वनिर्धारित थी। इसके बावजूद राज्य सरकार ने अपनी योजनाओं और खर्च संरचना को इस अनुदान पर निर्भर बना लिया। अब जब यह सहायता बंद हुई है, तो संकट के लिए केंद्र को दोषी ठहराने की कोशिश की जा रही है, जबकि वास्तविक समस्या राज्य के भीतर है। बीते तीन वर्षों में सरकार ने जनता पर करों और उपकरों का भारी बोझ डालकर करोड़ों रुपये अतिरिक्त राजस्व जुटाया, फिर भी वित्तीय संतुलन नहीं बन पाया। जब सरकार सत्ता में आई थी, तब प्रदेश का कर्ज लगभग 76 हजार करोड़ रुपये था, जो अब बढ़कर एक लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच चुका है। यह कर्ज किस विकास में लगा, इसका ठोस और पारदर्शी विवरण आज तक जनता के सामने नहीं रखा जा सका है।
कैग रिपोर्ट ने इस वित्तीय अव्यवस्था की पुष्टि आधिकारिक तौर पर कर दी है। रिपोर्ट के अनुसार सरकार द्वारा लिए जा रहे कर्ज का बड़ा हिस्सा वेतन, पेंशन और ब्याज जैसे प्रतिबद्ध खर्चों में जा रहा है, जबकि विकासात्मक कार्यों के लिए सीमित धन ही बच पा रहा है। नियमों के तहत कर्ज केवल उन्हीं परियोजनाओं के लिए लिया जाना चाहिए जिनसे भविष्य में आय उत्पन्न हो, लेकिन हिमाचल में विकास के नाम पर लिया गया कर्ज रोजमर्रा के खर्चों की भरपाई में झोंका जा रहा है। यही कारण है कि भारी कर्ज और बढ़े हुए करों के बावजूद कर्मचारियों को समय पर वेतन और पेंशनरों को समय पर पेंशन नहीं मिल पा रही है।
सरकार की गारंटियों की जमीनी हकीकत भी वित्तीय प्रबंधन की कमजोरी को उजागर करती है। प्रतिवर्ष एक लाख रोजगार देने का वादा बेरोजगारी के बढ़ते आंकड़ों के सामने दम तोड़ता नजर आता है। महिलाओं को 1500 रुपये प्रतिमाह देने की गारंटी कुछ सीमित क्षेत्रों तक ही सिमट गई है। अन्य गारंटियों में लगातार शर्तें जोड़कर उनके दायरे को कम किया जा रहा है। यह सवाल अब स्वाभाविक है कि क्या कांग्रेस को सत्ता में आने से पहले प्रदेश की वास्तविक आर्थिक स्थिति का आकलन नहीं था, या फिर सत्ता प्राप्ति के लिए जानबूझकर ऐसे वादे किए गए जिन्हें निभाना संभव ही नहीं था।
वित्तीय संकट के बीच सरकार के फैसले विरोधाभासों से भरे रहे हैं। एक ओर जनता से त्याग की अपील की जाती है, दूसरी ओर राजनीतिक नियुक्तियां, सलाहकारों की नियुक्ति, निगमों और बोर्डों में मानदेय वृद्धि और प्रशासनिक खर्च लगातार बढ़ते रहे हैं। जिसका सीधा असर प्रदेश की वित्तीय सेहत पर पड़ना स्वाभाविक है।
आरडीजी की समाप्ति के बाद आने वाला समय हिमाचल के लिए और भी चुनौतीपूर्ण होने वाला है। ऐसे में वेतन, पेंशन, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सेवाओं का सुचारु संचालन सरकार के लिए सबसे बड़ी परीक्षा बनने जा रहा है।
हिमाचल की वित्तीय हकीकत अब नारों और आरोप-प्रत्यारोप से परे है। आरडीजी की समाप्ति कोई अचानक आया तूफान नहीं है, बल्कि पहले से तय प्रक्रिया थी, जिसके लिए समय रहते तैयारी की जा सकती थी। लेकिन सरकार ने खर्च नियंत्रण, राजस्व बढ़ाने और पारदर्शी वित्तीय प्रबंधन की बजाये अल्पकालिक राजनीतिक लाभ को प्राथमिकता दी। परिणामस्वरूप आज प्रदेश कर्ज, करों और अनिश्चित भविष्य के चक्रव्यूह में फंसता जा रहा है। यदि अब भी ठोस सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट केवल सरकार का नहीं, बल्कि पूरे हिमाचल के भविष्य का संकट बन जाएगा।

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