पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव एक बार फिर पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बन गया है। हाल के दिनों में ईरान और खाड़ी क्षेत्र में जिस तरह से सैन्य टकराव और तनाव बढ़ा है, उसने क्षेत्रीय शांति और स्थिरता पर सवाल खड़े कर दिये हैं। स्थिति इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि यह घटनाक्रम रमजान के पवित्र महीने के दौरान सामने आया है। ऐसे समय में बढ़ती हिंसा और संघर्ष यह संकेत देते हैं कि हालात गंभीर होते जा रहे हैं।





पुलिस का मूल दायित्व संविधान और कानून के दायरे में रहकर काम करना है। पुलिस की कार्यप्रणाली किसी राजनीतिक विचारधारा के आधार पर नहीं बल्कि विधि सम्मत प्रावधानों के अनुसार संचालित होती है। भारत में पुलिस की कारवाई मुख्य रूप से दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) और अब लागू भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के प्रावधानों के तहत होती है। इन कानूनों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अपराध की जांच, गिरफ्तारी और न्यायिक प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से हो। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि संप्रभुता किसकी है। भारत एक संघीय लोकतंत्र है, लेकिन संप्रभुता किसी राज्य या व्यक्ति की नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र की होती है। कानून भी पूरे देश में समान रूप से लागू होता है। ऐसे में यदि किसी राज्य में बाहरी प्रदेश के संदिग्धों या अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण मिलने लगे या पुलिस कारवाई को राजनीतिक चश्मे से देखा जाने लगे, तो यह न केवल कानून व्यवस्था बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए भी खतरनाक संकेत है। कानून यह भी स्पष्ट करता है कि अंतरराज्यीय मामलों में पुलिस कैसे कारवाई करती है। गिरफ्तारी, जांच और आरोपी को न्यायालय में प्रस्तुत करने की प्रक्रिया साक्ष्यों, पुलिस रिकॉर्ड और कानूनी धाराओं के आधार पर तय होती है। कई बार परिस्थितियों के अनुसार पुलिस को त्वरित निर्णय लेने पड़ते हैं, जिनका उद्देश्य केवल अपराध की जांच को आगे बढ़ाना होता है। ऐसे मामलों में कानूनी प्रक्रिया की व्याख्या सकारात्मक दृष्टिकोण से की जानी चाहिए, न कि राजनीतिक विवाद के रूप में।
लेकिन जब पुलिस कारवाई को लेकर राजनीतिक ब्यानबाजी शुरू हो जाती है, तो इससे पुलिस की पेशेवर साख और संस्थागत विश्वसनीयता दोनों प्रभावित होती हैं। यदि सरकारी संस्थानों या राज्य के संसाधनों का उपयोग कानून की प्रक्रिया को प्रभावित करने या किसी पक्ष को लाभ पहुंचाने के लिए किया जाए, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन जाती है। पुलिस को यदि राजनीतिक उपकरण की तरह इस्तेमाल किया जाएगा, तो इससे न केवल कानून व्यवस्था कमजोर होगी बल्कि जनता का भरोसा भी टूटेगा। भारत जैसे लोकतंत्र में पुलिस की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। पुलिस केवल अपराधियों को पकड़ने वाली एजेंसी नहीं बल्कि कानून और व्यवस्था की संरक्षक संस्था है। इसलिए पुलिस तंत्र का आधार पेशेवर नैतिकता, निष्पक्षता और संवैधानिक मर्यादा होना चाहिए। यह भी सच है कि आज भी पुलिस विभाग में अनेक अधिकारी पूरी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के साथ काम कर रहे हैं। लेकिन कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जो पूरी व्यवस्था की छवि को प्रभावित कर देती हैं। ऐसे मामलों से एक और महत्वपूर्ण सवाल उठता है क्या हमारी संस्थाएं अपनी गलतियों से सीखने के लिए तैयार हैं? किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में यदि कोई बड़ी प्रशासनिक विफलता सामने आती है, तो उसके बाद तथ्यों की जांच, आत्ममंथन और सुधार की प्रक्रिया शुरू होती है। यह एक स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान होती है। लेकिन यदि इन घटनाओं को केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित कर दिया जाए और संस्थागत सुधार की दिशा में कोई गंभीर प्रयास न हो, तो इससे व्यवस्था में अविश्वास और गहरा हो सकता है। समय की मांग है कि पुलिस तंत्रा को राजनीतिक विवादों से दूर रखा जाए और उसकी पेशेवर स्वतंत्रता और जवाबदेही दोनों को मजबूत किया जाए। न्यायपालिका, शिक्षाविद, मीडिया और जागरूक नागरिक समाज को भी इस दिशा में अपनी भूमिका निभानी होगी। लोकतंत्र केवल चुनावों से मजबूत नहीं होता, बल्कि मजबूत संस्थाओं, पारदर्शिता और कानून के समान अनुपालन से मजबूत होता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि नागरिक भी अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों के प्रति सजग रहें। अन्याय को देखकर चुप रहना किसी भी समाज के लिए खतरनाक हो सकता है। एक जागरूक समाज ही लोकतंत्र की असली ताकत होता है, जो संस्थाओं को जवाबदेह बनाता है और कानून के शासन को मजबूत करता है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसका संविधान और कानून का शासन है। यदि इन मूल्यों की रक्षा नहीं की गई, तो राजनीतिक टकराव और संस्थागत अविश्वास का यह दौर आगे चलकर और गंभीर रूप ले सकता है। इसलिए यह समय आत्ममंथन और सुधार का है, ताकि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और जनता का विश्वास दोनों सुरक्षित रह सकें।


















राजस्व घाटा अनुदान यानी आरडीजी की समाप्ति ने सरकार की असल तैयारी और सोच को पूरी तरह उजागर कर दिया है। आरडीजी कोई स्थायी आय का साधन नहीं था, बल्कि सीमित अवधि के लिए दी जाने वाली राहत थी, जिसकी समाप्ति पूर्वनिर्धारित थी। इसके बावजूद राज्य सरकार ने अपनी योजनाओं और खर्च संरचना को इस अनुदान पर निर्भर बना लिया। अब जब यह सहायता बंद हुई है, तो संकट के लिए केंद्र को दोषी ठहराने की कोशिश की जा रही है, जबकि वास्तविक समस्या राज्य के भीतर है। बीते तीन वर्षों में सरकार ने जनता पर करों और उपकरों का भारी बोझ डालकर करोड़ों रुपये अतिरिक्त राजस्व जुटाया, फिर भी वित्तीय संतुलन नहीं बन पाया। जब सरकार सत्ता में आई थी, तब प्रदेश का कर्ज लगभग 76 हजार करोड़ रुपये था, जो अब बढ़कर एक लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच चुका है। यह कर्ज किस विकास में लगा, इसका ठोस और पारदर्शी विवरण आज तक जनता के सामने नहीं रखा जा सका है।
कैग रिपोर्ट ने इस वित्तीय अव्यवस्था की पुष्टि आधिकारिक तौर पर कर दी है। रिपोर्ट के अनुसार सरकार द्वारा लिए जा रहे कर्ज का बड़ा हिस्सा वेतन, पेंशन और ब्याज जैसे प्रतिबद्ध खर्चों में जा रहा है, जबकि विकासात्मक कार्यों के लिए सीमित धन ही बच पा रहा है। नियमों के तहत कर्ज केवल उन्हीं परियोजनाओं के लिए लिया जाना चाहिए जिनसे भविष्य में आय उत्पन्न हो, लेकिन हिमाचल में विकास के नाम पर लिया गया कर्ज रोजमर्रा के खर्चों की भरपाई में झोंका जा रहा है। यही कारण है कि भारी कर्ज और बढ़े हुए करों के बावजूद कर्मचारियों को समय पर वेतन और पेंशनरों को समय पर पेंशन नहीं मिल पा रही है।
सरकार की गारंटियों की जमीनी हकीकत भी वित्तीय प्रबंधन की कमजोरी को उजागर करती है। प्रतिवर्ष एक लाख रोजगार देने का वादा बेरोजगारी के बढ़ते आंकड़ों के सामने दम तोड़ता नजर आता है। महिलाओं को 1500 रुपये प्रतिमाह देने की गारंटी कुछ सीमित क्षेत्रों तक ही सिमट गई है। अन्य गारंटियों में लगातार शर्तें जोड़कर उनके दायरे को कम किया जा रहा है। यह सवाल अब स्वाभाविक है कि क्या कांग्रेस को सत्ता में आने से पहले प्रदेश की वास्तविक आर्थिक स्थिति का आकलन नहीं था, या फिर सत्ता प्राप्ति के लिए जानबूझकर ऐसे वादे किए गए जिन्हें निभाना संभव ही नहीं था।
वित्तीय संकट के बीच सरकार के फैसले विरोधाभासों से भरे रहे हैं। एक ओर जनता से त्याग की अपील की जाती है, दूसरी ओर राजनीतिक नियुक्तियां, सलाहकारों की नियुक्ति, निगमों और बोर्डों में मानदेय वृद्धि और प्रशासनिक खर्च लगातार बढ़ते रहे हैं। जिसका सीधा असर प्रदेश की वित्तीय सेहत पर पड़ना स्वाभाविक है।
आरडीजी की समाप्ति के बाद आने वाला समय हिमाचल के लिए और भी चुनौतीपूर्ण होने वाला है। ऐसे में वेतन, पेंशन, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सेवाओं का सुचारु संचालन सरकार के लिए सबसे बड़ी परीक्षा बनने जा रहा है।
हिमाचल की वित्तीय हकीकत अब नारों और आरोप-प्रत्यारोप से परे है। आरडीजी की समाप्ति कोई अचानक आया तूफान नहीं है, बल्कि पहले से तय प्रक्रिया थी, जिसके लिए समय रहते तैयारी की जा सकती थी। लेकिन सरकार ने खर्च नियंत्रण, राजस्व बढ़ाने और पारदर्शी वित्तीय प्रबंधन की बजाये अल्पकालिक राजनीतिक लाभ को प्राथमिकता दी। परिणामस्वरूप आज प्रदेश कर्ज, करों और अनिश्चित भविष्य के चक्रव्यूह में फंसता जा रहा है। यदि अब भी ठोस सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट केवल सरकार का नहीं, बल्कि पूरे हिमाचल के भविष्य का संकट बन जाएगा।