Wednesday, 03 June 2026
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कर्मचारी भर्ती पर केन्द्र के फैसले पर अमल क्यो नही

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश सरकार ने पिछले कुछ अरसे से मन्त्रीमण्डल की हर बैठक मे विभिन्न सरकारी विभागों में खाली चले आ रहे पदों को भरने का निर्णय लेने का क्रम शुरू किया है। इस क्रम में अब तक हजारों की संख्या में खाली पदो को भरने के आदेश जारी हो चुके हैं। खाली पदों के अतिरिक्त हजारों की संख्या में नये पदों का सृजन भी किया गया है। सरकार में किसी भी पद को भरने के लिये एक तय प्रक्रिया अपनाई जाती है। इसमें राज्य का लोक सेवा आयोग प्रथम और द्वितीय श्रेणी के राजपत्रित पदों को भरने की जिम्मेदारी निभाता है। गैर राजपत्रित पदों को भरने के लिये अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड अधिकृत है। इन दोनां अदारों के अतिरिक्त और कोई कर्मचारी भर्ती के लिये अधिकृत नहीं है। इन अदारों से हटकर केवल आऊट सोर्सिंग के नाम पर ही भर्ती की जा सकती है और कई विभागों में यह आऊट सोर्सिंग चल रही है। तय प्रक्रिया के तहत किसी भी पद को भरने के लिये कम से कम चार से पांच माह तक का समय लग जाता है। जहां कहीं पहले लिखित परीक्षा और फिर साक्षात्कार की प्रक्रिया रहेगी वहां पर यह समय एक वर्ष तक का भी हो सकता है। इस प्रक्रिया से अनुमान लगाया जा सकता है कि जो पद अब सृजित और विज्ञापित होंगे उन्हें भरने के लिये कितना समय लग जायेगा।
हिमाचल में रोजगार के नाम पर सबसे बड़ा अदारा सरकार और सरकारी नौकरी ही है। सरकारी नौकरी में भर्ती के लिये प्रदेश में 1993 से 1998 के बीच चिटों पर भर्ती का कांड हो चुका है। इसमें सारी तय प्रक्रियाओं को अंगूठा दिखाते हुए हजारों की संख्या में चिटों पर भर्तीयां की गई थी। इन भर्तीयों को लेकर बिठाई गयी जांच रिपोर्टो पर ईमानदारी से कारवाई की जाती तो यहां पर हरियाणा के ओमप्रकाश चौटाला की तर्ज पर कई लोगों की गिरफ्तारी हो जाती। चिटों पर भर्ती कांड के बाद हमीरपुर अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड का कांड हुआ जिसमें अब सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों पर गिरफ्तारीयां हुई है। इन दोनां प्रकरणों से यह प्रमाणित होता है कि हिमाचल में रोजगार का सबसे बड़ा साधन सरकार ही है और उसमें हर बार घपला होने की संभावना बराबर बनी रहती है। प्रदेश में शिक्षित बेरोजगारों का आंकडा लाखों में है और इसी कारण जिन क्लास फोर के पदों के लिये वांच्छित योग्यता मैट्रिक या प्लस टू रहती हैं वहां पर इनके लिये एम ए और पी एच डी तक के आवेदन आ रहे हैं। उद्योग विभाग में तो अधिकारिक तौर पर यह सामने आ चुका है कि क्लास फोर के लिये बी ए, एम ए और पीएचडी के लिये अधिमान देने के लिये अलग अंक रखे गये थे। पटवारियों और सहकारी बैंक की परीक्षाओं पर प्रश्न चिन्ह लग चुके हैं।
प्रदेश में 2017 में विधान सभा चुनाव होने है। लेकिन यह चुनाव तय समय से पहले भी हो सकते है इसकी संभावनाएं भी बराबर बनी हुई हैं बल्कि जिस ढंग से मुख्यमन्त्री ने पिछले दिनों प्रदेश का तूफानी दौरा किया है और सरकार की उपलब्धियों का व्यापक प्रचार-प्रसार किया गया उससे इन अटकलों को और बल मिला है। इस परिदृश्य में यह माना जा रहा है कि इस समय जो नौकरियों का पिटारा खोला गया है वह केवल विधानसभा चुनावों को सामने रखकर ही किया जा रहा है। इससे सरकार की नीयत और नीति को लेकर भी यह सवाल उठते है कि इस समय हजारों की संख्या में जो पदों को भरने की स्थिति आयी है क्या यह पद अभी खाली हुए या पिछले तीन वर्षो से खाली चले आ रहे थे? जो पद अब सृजित किये गये हैं उनके बिना पहले कैसे काम चल रहा था? इसलिये इन पदों के भरे जाने पर अभी भी सन्देह है क्योंकि यदि किसी कारण से विधानसभा चुनावों की स्थिति आ जाती है तो यह सारी प्रक्रिया आचार संहिता के नाम पर रूक जायेगी। ऐसे में यदि सरकार इन पदों को भरने के लिये गंभीर और ईमानदार है तो तुरन्त प्रभाव से केन्द्र की तर्ज पर तीसरी और चौथी श्रेणी के पदों को भरने के लिये परीक्षा और साक्षाकार को समाप्त करके केवल शैक्षणिक योग्यता के अंको के आधार पर ही चयन किया जाना चाहिये। प्रदेश सरकार केन्द्र के इस फैंसले को अपनाने से टाल मटोल करती आ रही है और इसी से उसकी नीयत पर सन्देह पैदा हो जाता है।

मोदी ने मांगा 72 हजार करोड़ का हिसाब

शिमला/शैल। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा प्रदेश की तीन जलवि़द्युत परियोजनाओं के लोकार्पण अवसर पर आयोजित रैली एक सफल रैली रही है इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती है। यह रैली प्रदेश में सत्ता परिवर्तन का सफल संकेत मानी जा सकती है। क्योंकि इस रैली मे प्रधानमंत्री ने जो बुनियादी सवाल उछाले हैं वह आने वाले दिनों में निश्चित रूप से बहस का मुद्दा बनेगे? प्रधानमंत्री ने प्रदेश की जनता को बताया कि केन्द्र ने 15वें वित्तायोग की सिफारिशों के बाद हिमाचल को 72 हजार करोड़ रूपेय का आवंटन किया है। जबकि 14 वें वित्तायोग के तहत यह राशी केवल 21 हजार करोड़ थी। 14वां वित्त आयोग यूपीए सरकार के समय आया था और 15वां अब भाजपा सरकार के दौरान आया है। कांग्रेस के मुकाबले तीन गुणा से भी ज्यादा आंवटन प्रदेश को मिला है। मोदी ने स्पष्ट कहा है कि केन्द्र और प्रदेश की जनता राज्य सरकार से इस पैसे के खर्च का हिसाब मांगेगी। राज्य सरकार का खर्च कितना तर्क संगत होता है? उसमें कितनी फज़ूल खर्ची होती है? इन सवालों पर कभी बहस नही हुई है। क्योंकि जनता को इस तरह के तथ्यों की कभी सीधी जानकारी होती ही नहीं है। यह पहली बार है कि देश के प्रधान मंत्री ने जनता के सामने इतना बड़ा आंकड़ा रखा है। इस आंकड़े को झुठलाना या इस पर कोई और किन्तु/परन्तु उठाना राज्य सरकार के लिये संभव नही होगा।
केन्द्र ने राज्य को 61 राष्ट्रीय उच्च मार्ग दिये हैं इन उच्च मार्गों पर कार्य शुरू हो इसके लिये समय पर इनकी डीपीआर बनकर केन्द्र के पास पहुचनीं चाहिये। डीपीआर राज्य सरकार को बनानी है और मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने पिछले दिनों यह कहा हैं कि डीपीआरज बनाने के लिये उन्हे पैसा नही दिया गया हैं अब मुख्यमंत्री का यह तर्क प्रधान मन्त्री के 72 हजार करोड़ के आंकड़े के नीचे इस कदर दब जायेगा कि
इससे उभरना राज्य सरकार के लिये संभव नहीं हि पायेगा क्योंकि प्रधानमन्त्री ने अपने संबोधन में जहां पूर्व मुख्यमन्त्रीयों शान्ता कुमार और प्रेम कुमार धूमल को विकास का पर्याय बताया वहीं वर वीरभद्र को नाम लिये बगैर ही भ्रष्टाचार का पर्याय करार दिया। प्रधान मन्त्री के इस संकेत से यह भी संदेश उभरता है कि केन्द्र के खिलाफ चल रही जांच के प्रति पूरी तरह गभीर है और सही समय पर उसके परिणाम सामने आयेंगें आज राज्य सरकार का कर्जभार लगातार बढ़ता जा रहा है। इस समय बहुत सारे विकास के कार्य पैसों के अभाव में बन्द हो चुके है। मुख्यमंत्री के अपने विधानसभा क्षेत्र में ठेकेदारों की पैमेन्टस रूकने के कारण ठेकेदारों ने काम बन्द कर दिये है। प्रदेश के पेयजल योजनाओं के लिये आये हजारों करोड़ के उपयोगिता प्रमाण पत्र समय पर न जाने के कारण केन्द्र ने इन योजनाओं के लिये अगले भुगतान के लिये शर्ते कड़ी कर दी है। पर्यटन में फर्जी उपयोगिता पर जांच प्रमाण पत्र सौंपे जाने को लेकर शिकायते केन्द्र के पास पहुंच चुकी हैं और इन शिकायतों पर जांच को रोक पाना संभव नही होगा क्योंकि आर टी आई के तहत इन शिकायतों पर हुई कारवाई की जानकारी भी मांग ली गयी है।

कैग रिपोर्टो में सरकार के खर्चो को लेकर एक लम्बे समय से सवाल उठते रहे हैं लेकिन यह सवाल कभी बहस का मुद्दा नही बन पाये है। आज प्रधान मन्त्री द्वारा एक खुले मंच से 72 हजार करोड़ के आंकड़े की जानकारी आम आदमी के बीच आने से स्वाभाविक रूप से इस पर बहस उठेगी ही। क्योंकि यह आम आदमी का पैसा है और उसे यह हक हासिल है कि वह इस खर्च का हिसाब मांगे। प्रधानमंत्री ने जनता से स्पष्ट कहा है कि वह इस खर्च का सरकार से हिसाब मांगे। मोदी के इस आंकडे़ के हथौड़े से राज्य सरकार का बचना अंसभव है।

72 हजार करोड़ के आंकडे़ का हथौड़ा

शिमला/शैल। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा प्रदेश की तीन जलवि़द्युत परियोजनाओं के लोकार्पण अवसर पर आयोजित रैली एक सफल रैली रही है इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती है। यह रैली प्रदेश में सत्ता परिवर्तन का सफल संकेत मानी जा सकती है। क्योंकि इस रैली मे प्रधानमंत्री ने जो बुनियादी सवाल उछाले हैं वह आने वाले दिनों में निश्चित रूप से बहस का मुद्दा बनेगे? प्रधानमंत्री ने प्रदेश की जनता को बताया कि केन्द्र ने 15वें वित्तायोग की सिफारिशों के बाद हिमाचल को 72 हजार करोड़ रूपेय का आवंटन किया है। जबकि 14 वें वित्तायोग के तहत यह राशी केवल 21 हजार करोड़ थी। 14वां वित्त आयोग यूपीए सरकार के समय आया था और 15वां अब भाजपा सरकार के दौरान आया है। कांग्रेस के मुकाबले तीन गुणा से भी ज्यादा आंवटन प्रदेश को मिला है। मोदी ने स्पष्ट कहा है कि केन्द्र और प्रदेश की जनता राज्य सरकार से इस पैसे के खर्च का हिसाब मांगेगी। राज्य सरकार का खर्च कितना तर्क संगत होता है? उसमें कितनी फज़ूल खर्ची होती है? इन सवालों पर कभी बहस नही हुई है। क्योंकि जनता को इस तरह के तथ्यों की कभी सीधी जानकारी होती ही नहीं है। यह पहली बार है कि देश के प्रधान मंत्री ने जनता के सामने इतना बड़ा आंकड़ा रखा है। इस आंकड़े को झुठलाना या इस पर कोई और किन्तु/परन्तु उठाना राज्य सरकार के लिये संभव नही होगा।
केन्द्र ने राज्य को 61 राष्ट्रीय उच्च मार्ग दिये हैं इन उच्च मार्गों पर कार्य शुरू हो इसके लिये समय पर इनकी डीपीआर बनकर केन्द्र के पास पहुचनीं चाहिये। डीपीआर राज्य सरकार को बनानी है और मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने पिछले दिनों यह कहा हैं कि डीपीआरज बनाने के लिये उन्हे पैसा नही दिया गया हैं अब मुख्यमंत्री का यह तर्क प्रधान मन्त्री के 72 हजार करोड़ के आंकड़े के नीचे इस कदर दब जायेगा कि इससे उभरना राज्य सरकार के लिये संभव नहीं हो पायेगा क्योंकि प्रधानमन्त्राी ने अपने संबोधन में जहां पूर्व मुख्यमन्त्रीयों शान्ता कुमार और प्रेम कुमार धूमल को विकास का पर्याय बताया वहीं वर वीरभद्र को नाम लिये बगैर ही भ्रष्टाचार का पर्याय करार दिया। प्रधान मन्त्री के इस संकेत से यह भी संदेश उभरता है कि केन्द्र के खिलाफ चल रही जांच के प्रति पूरी तरह गभीर है और सही समय पर उसके परिणाम सामने आयेंगें आज राज्य सरकार का कर्जभार लगातार बढ़ता जा रहा है। इस समय बहुत सारे विकास के कार्य पैसों के अभाव में बन्द हो चुके है। मुख्यमंत्री के अपने विधानसभा क्षेत्रा में ठेकेदारों की पैमेन्टस रूकने के कारण ठेकेदारों ने काम बन्द कर दिये है। प्रदेश के पेयजल योजनाओं के लिये आयेे हजारों करोड़ के उपयोगिता प्रमाण पत्रा समय पर न जाने के कारण केन्द्र ने इन योजनाओं के लिये अगले भुगतान के लिये शर्ते कड़ी कर दी है। पर्यटन में फर्जी उपयोगिता पर जांच प्रमाण पत्रा सौंपे जाने को लेकर शिकायते केन्द्र के पास पहंुच चुकी है और इन शिकायतों पर जांच को रोक पाना संभव नही होगा क्योंकि आर टी आई के तहत इन शिकायतों पर हुई कारवाई की जानकारी भी मांग ली गयी है।
कैग रिपोर्टो में सरकार के खर्चो को लेकर एक लम्बे समय से सवाल उठते रहे है लेकिन यह सवाल कभी बहस का मुद्दा नही बन पाये है। आज प्रधान मन्त्री द्वारा एक खुले मंच से 72 हजार करोड़ के आंकड़े की जानकारी आम आदमी के बीच आने से स्वाभाविक रूप से इस पर बहस उठेगी ही। क्योंकि यह आम आदमी का पैसा है और उसे यह हक हासिल है कि वह इस खर्च का हिसाब मांगे। प्रधानमंत्री ने जनता से स्पष्ट कहा है कि वह इस खर्च का सरकार से हिसाब मांगे। मोदी के इस आंकडे़ के हथौड़े से राज्य सरकार का बचना अंसभव है।

और मोदी ने कर दिखाया

शिमला! उरी और पठानकोट के आतंकी हमलों का पाक अधिकृत कश्मीर में चल रहे आतंक के ट्रेनिंग पर हमला करके जिस तरह का जबाव पाकिस्तान को दिया गया है उसके लिये प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी बधाई के पात्र है। क्योंकि एक देश के लम्बे अरसे से आतंकी गतिविधियों का शिकार होता आ रहा था जिसके पठानकोट और उरी ताजा उदाहरण थे। सैंकड़ों लोग इस आतंक का शिकार होकर अपने प्राण गंवा चुके है। देश के दो प्रधानमंत्री एक मुख्य मन्त्री और संसद तक आतंक का शिकार हो चुके है। हर आतंकी घटना के पीछे सीमा पार से समर्थन और साजिश दोनों के प्रमाणिक सबूत मिलते रहे है। लेकिन पाकिस्तान ने हर बार इन सबूतों को मानने से इन्कार किया। विश्व समुदाय भी आतंक की निन्दा करने से अधिक कुछ नही कर पाया। पाकिस्तान में बैठे आतंकी सरगनों की सूची लगातार पाकिस्तान को दी जाती रही लेकिन इसका असर उस पर नहीं हुआ। उसके समर्थन और सरंक्षण में आतंक की फौज लगातार बढ़ती रही उसके लिये बाकायदा ट्रेनिंग कैंप संचालित होते रहे। भारत भी सबूत सौंपने और माकूल जबाव देने के ब्यानो से आगे नही बढ़ा। देश का राजनीतिक नेतृत्व इस तरह की कारवाई करने का फैसला नहीं ले पाया। जबकि इस तरह का फैसला लेना लगातार बाध्यता बनता जा रहा है। ऐसा फैसला लेने से पहले अपने पडा़ेसी देशों और विश्व समुदाय के सामने पाकिस्तान की इस हकीकत का खुलासा रखा जाना आवश्यक था। इसके लिये प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने सत्ता संभालने के बाद जिस तरह से विदेश यात्राओं की रणनीति अपनाई और उसकी शुरूआत सार्क देशों से की उसके परिणाम आज सार्क सम्मेलन के स्थगित होने की नौबत तक पहुंचने से सामने आ रहे हैं। आज पाकिस्तान को मोदी ने सफलता पूर्वक सार्क देशों में ही अगल थलग कर दिया है यह उनकी कूटनीतिक सफलता है। पाक अधिकृत कश्मीर में हुई सर्जिकल कारवाई में आतंकवादियों के साथ पाकिस्तान के दो सैनिक भी मारे गये है। लेकिन पाक इस कारवाई को स्वीकार भी नही कर पा रहा है क्योंकि यह कारवाई आतंकी कैंपो पर हुई है यदि पाक इसे स्वीकार कर लेता है तो इसका अर्थ होगा कि उसने उसके यहां आतंक ट्रेनिंग कैंपों का होना स्वीकार कर लिया है और इस स्वीकार के साथ ही वह विश्व समुदाय के सामने बेनकाब हो जाता है क्यांकि वह ऐसे कैंपो के होने से ही इन्कार करता आया है। जब पाकिस्तान ने इन कैंपो को आबादी वाले इलाकों में शिफ्ट करने का काम किया था तो संभवतः उसकी नीति यह रही होगी कि यदि भारत की ओर से कोई सैनिक कारवाई होती है तो उसमें आम नागरिकों को भी हानि पंहुचेगी और वह भारत को विश्व समुदाय के सामने एक आक्रामक करार दे पायेगा। लेकिन किसी भी नागरिक को कोई नुकसान न होने से भारत इस संभावित आक्षेप से बच गया। यही कारण है कि पाक इस कारवाई को स्वीकार नही कर पा रहा है। 

अब जहां मोदी इसके लिये समर्थन और बधाई के पात्र हैं वहीं पर उनसे यह भी उम्मीद है कि भारत जिन आतंकी सरगनाओं की पाक से मांग करता आ रहा है आज उन लोगों के खिलाफ भी इसी स्तर की कारवाई हो जानी चाहिये। जिस हाफिज सईद, अजहर मसूद और दाऊद इब्राहिम की तलाश भारत को है और वह पाकिस्तान में बैठे हुए हैं पाक उनको आतंकी नही मानता। उनके पाक में होने से भी इन्कार करता है। उनके खिलाफ आज इसी तरह की कारवाई की आवश्यकता है। आज पूरे देश का मनोबल इस पर बना हुआ है। फिर जब तक आतंक का संचालन करने वाले यह लोग बैठे है और उनको वहां की सरकार का समर्थन हासिल है तब तक आतंकी साजिशों की संभावना बराबर बनी रहेगी। ऐसी संभावनाओं को पूरी तरह से खत्म करने के लिये ऐसी ही सर्जिकल कारवाई की आवश्यकता है। फिर जब अमेरिका लादेन के लिये ऐसा कर सकता है तो भारत क्यों नहीं। ऐसी कारवाई की अपेक्षा अब मोदी से की जाने लगी है और उन पर देश को भरोसा भी अब होने लगा है।

युद्ध ही विकल्प नही हो सकता

उरी मे हुए आंतकी हमले को लेकर पूरे देश में रोष और आक्रोश हैं उरी से पहले पठानकोट में ऐसा आतंकी हमला हो चुका है। दोनों  बार सेना के ठिकानो का निशाना बनाया गया है। दोनों घटनाओं के पीछे पाकिस्तान का हाथ होना सामने आ चुका है इसके सबूत मिल चुके है। पठानकोट में तो पाकिस्तान को स्वंय आकर मौका देखने का अवसर दिया गया है। लेकिन उसने इसमें अपना हाथ होने से साफ इन्कार कर दिया है। आज तक देश के अन्दर जितनी भी आंतकी घटनाएं हुई है।

उनमें अधिकांश के तार पाकिस्तान से जुड़े हुए मिले है। लेकिन पाकिस्तान ने इस सच्च को कभी स्वीकारा नही है। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर यू एन मंच से लेकर अधिकांश देशों ने भी पाकिस्तान को बढ़ते आंतक के लिये जिम्मेदार मान लिया है। परन्तु इस सबके बावजूद पाकिस्तान की आंतक के प्रति नीयत और नीति में कोई अन्तर नही आया है। बल्कि अब यह धारणा बनती जा रही है कि संभवतः आंतक उसकी रणनीति का ही एक हिस्सा है। लेकिन पाकिस्तान की इस नीति के लिये अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है क्योंकि किसी भी देश ने पाकिस्तान की निर्देश करने के अतिरिक्त उसके साथ अपने व्यापारिक और दूसरे रिश्ते समाप्त नहीं किये हैं। कहीं से भी कोई प्रतिबंध पाकिस्तान पर नहीं आये है क्योंकि हम जो इन आंतकी घटनाओं की सीधी कीमत चुका रहे हैं हमने भी अपने रिश्ते समाप्त नही किये है। हम भी कड़े ब्यानो और पाकिस्तान के राजदूत को बुलाकर अपना रोष अधिकारिक रूप से वहां की हकूमत तक पहुंचाने से ज्यादा कुछ नहीं करते रहे है। पाकिस्तान को सामरिक हथियार उपलब्ध करवाने के लिये कभी चीन, कभी अमेरिका तो कभी को अन्य देश हर समय आगे आता ही रहा है और यही पाकिस्मान की सबसे बड़ी ताकत बन जाता है।  आज देश के भीतर पाकिस्तान के खिलाफ निर्णायक सैन्य कारवाई की मांग जोर पकड़ती जा रही है। सरकार और सेना की ओर से भी युद्धको अन्तिम विकल्प के रूप में लेने पर विचार किया जा रहा है। सैन्य बल के रूप में हम पाकिस्तान पर हर बार भारी पड़ते आये है और आज भी पडेंगे इसमें कोई दो राय नहीं है। बढ़ती आतंकी घटनाओं का जवाब यदि सैन्य कारवाई के रूप में दिया जाता है तो अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय भी इसके लिये हमें दोष नही दे सकता। क्योंकि पाकिस्तान की सच्चाई हम विश्व समुदाय के सामने ला चुके हैं। लेकिन यदि सैन्य कारवाई का विकल्प चुना जाता है तो उसके परिणाम क्या होंगे उस पर गंभीरता से विचार करना होगा। अमेरीका, फ्रांस, इंग्लैण्ड आदि कई देशों में पिछले कुछ अरसे से ऐसी आंतकी घटनाएं देखने को मिली है। बढ़ता आंतकवाद विश्व समस्या बनता जा रहा है। इन आंतकीयों के पास हर तरह के सैन्य हथियार/ उपकरण पहुंच रहे हैं। इन्हें यह सब कहां से और कैसे उपलब्ध हो रहा है? इसके लिये धन कंहा से आ रहा है? क्यांेकि आतंकवाद इन संसाधनोेें के सहारे ही तो बढ़ रहा है। आज के अधिकांश देशों के पास परमाणु और रसायनिक हथियार उपलब्ध है। हर रोज इनके परीक्षण हो रहे है और अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय इनकी निंदा करने से अधिक कुछ कर नही पा रहा है। हर देश के बजट का बड़ा भाग सामरिक रिसर्च और सामरिक हथियारोें के उत्पादन पर खर्च हो रहा है। कुछ देशों की अर्थव्यवस्था का तो सबसे बड़ा आधार ही हथियारों का उत्पादन बन गया है। यदि इन हथियारों का कोई खरीददार न हो तो उनका उत्पादन ही रूक जायेगा और उसकी अर्थव्यस्था ही डगमगा जायेगी। आज बढ़ते आंतकवाद के पीछे हथियारों का यह उत्पादन और उनकी सहज उपलब्धता ही सबसे बड़ा कारण है। हथियारों के उत्पादक देश आतंकवाद की निंदा के साथ ही आतंकियों को यह हथियार भी उपलब्ध करवा रहे हैं। क्योंकि आज तक ओसामा विन लादेन जैसे बड़े आतंकी को लेकर यह भी सामने नही आया है कि वह हथियार भी स्वयं बनता था। ऐसे में बहुत स्पष्ट है कि जब आतंकवादियों के खिलाफ खुली सैन्य कारवाई अमल में लायी जायेगी तो फिर उसमें परमाणु और रसायनिक हथियार कब आतंकियों तक पहुंच जायें और उनका इस्तेमाल हो जाये यह आशंका और संभावना बराबर बनी रहेगी।  इसलिये युद्ध का विकल्प चुनने से पहले इन सारे सवालों पर विचार करना आवश्यक होगा। लादेन के लिये जिस तरह की कारवाई पाकिस्तान में घुसकर अमेरिका ने की थी आज वैसी ही कारवाई के लिये अन्तर्राष्ट्रीय मंचो पर सहमति बनाने का प्रयास किया जाना चाहिये। अमेरिका ने कारवाई की पूरा विश्व समुदाय खड़ा देखता रहा उसकी निन्दा तक कोई नही कर पाया। आज भारत पूरे विश्व को पाकिस्तान की इस हकीकत से अवगत करवा चूका है। विश्व समुदाय ने इसे स्वीकार भी कर लिया है और यह स्थिति अमेरिका जैसी कारवाई के लिये बहुत ही उपयुक्त अवसर है। क्योंकि युद्ध के विकल्प से आतंकियों से अधिक सामान्य नागरिकों का नुकसान होता है और वह नही होना चाहिये।

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