Thursday, 16 April 2026
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गांधीवादी अर्थव्यवस्था

गांधी जी ने राजनीतिक, सामाजिक आर्थिक या जो भी विचार व्यक्त किए हैं उनका आधार कोई स्वरचित ग्रन्थ नही था वरन् वह मानवतावादी विचारक थे। भारतीय निर्धनों की दशा से द्रवित होकर उन्होने समय -समय पर जो भी विचार प्रतिपादित किये वे उनकी आर्थिक योजनाओं तथा अर्थव्यवस्थाओं पर प्रकाश डालते हैं। गांधी जी, अन्य विचारकों के समान अपने समय की अर्थव्यवस्था से असन्तुष्ट थे क्योंकि तत्कानील पूंजीवादी अर्थव्यवस्था तथा उसकी उत्पादन क्षमता सामाजिक जीवन की आवश्कयताओं को पूरा करने में असमर्थ थी और आज भी है। गांधीजी पूंजीवाद को शोषण पर आधारित व्यवस्था बताते हैं। इसलिए, वह सरल अर्थव्यवस्था प्रतिपादित करने के समर्थक थे। गांधीवादी अर्थव्यवस्था की व्याख्या हम गांधीजी के निम्मलिखित विचारों के आधार पर कर सकते है।
रोटी के लिए श्रम का सिद्धांत (Bread Labour) सर्वप्रथम हम गांधी जी के द्वारा प्रतिपादित रोटी के लिए श्रम का सिद्धांत की व्याख्या करेंगे। यह सिद्धांत ‘जो कार्य नहीं करेगा वह खायेगा भी नहीं’ का सिद्धांत है। गांधी जी का कहना है कि जीवन में रोटी मुनष्य की अनिवार्यतम आवश्यकता है और वह कठिन परिश्रम से प्राप्त होती है। अतः जो व्यक्ति बिना उपयुक्त श्रम के भोजन करता है वह चोर है। वह व्यक्ति जो आधुनिक सभ्यता के आवरण में अपनी आवश्यकताएं बढ़ाए जाते है तथा स्वयं शारीरिक श्रम नहीं करते वे अन्य व्यक्तिों (गरीबो) का शोषण करते हैं। गांधीजी शारीरिक श्रम को अधिक महत्व देते हैं। उनका विचार था कि शारीरिक श्रम करने वाला मेहनती ईमानदार तथा चरित्रवान होता है। प्रत्येक व्यक्ति के निजि परिश्रम से तथा खाने की वस्तु का उत्पादन करने से आर्थिक समानता की नींव पडे़गी। यदि प्रत्येक व्यक्ति ऐसा नहीं कर सकते तो उन्हेें ऐसे कार्य करने चाहिए जिसमें उनका शारीरिक श्रम लगता हो जैसे कताई, बुनाई, काष्ठकला तथा अन्य हस्त कलाएं।
गांधी जी शारीरिक श्रम को प्राकृतिक नियम मानते थे। जिस तरह मानसिक भूख को शांत करने के लिए लौकिक कार्य किये जाते हैं उसी प्रकार शरीर की भूख रोटी से शान्त होती है। गांधी जी का मामना है कि बौद्धिक या मानसिक श्रम करने वाले को भी शारीरिेक श्रम करना चाहिए उसके द्वारा ही वह अपनी बौद्धिक प्रतिभा को अधिक विकसित कर सकता है। यह श्रम ऐच्छिक होना चाहिए, अनिवार्य नहीं, क्योंकि इसकी अनिवार्यता व्यक्ति को असन्तुष्ट बनाए रखेगी ।
पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाः गांधी जी आधुनिक अर्थव्यवस्था को पूंजीवादीे अर्थव्यवस्था बताते थे तथा वह इसके विरूद्ध थे। इस प्रणाली में कुछ बडे-बडे धनाढ्य व्यक्ति अपनी पूंजी का उपयोग बडी बडी मशीनों में लगाते है और मशीनों द्वारा उत्पादन किया जाता है। पूंजीपति उन कारखानों में कार्यरत मजदूरों का शोषण करते है। उद्योगों का सचालन मुटठी भर पूंजीपतियों के हाथों में चला जाता है उन्ही के हाथों में समाज का धन भी केन्द्रित हो जाता है। धन का असमान वितरण और संचय होने से शोषण, भूखमरी और आर्थिक विषमता बढ़ती चली जाती है। पूंजीपति अपने कारखानों के लिए कच्चा माल प्राप्त करने तथा निर्मित माल की मंडिया प्राप्त करने के लिए साम्राज्य निर्माण में प्रवृत हो जाते हैं। राज्य इसी प्रवृति के अधीन होकर कार्य करते हैं, इससे अन्तर्राष्ट्रीय तनाव, अशांति और महायुद्ध उत्पन्न होते हैं।
विकेन्द्रीकरणःगांधी जी ने आर्थिक क्षेत्रों में विकेन्द्रीयकरण के सिन्द्धात का प्रतिपादन किया है वह आर्थिक क्षेत्रों में धन के संकेन्द्रीकरण को सब बुराईयों की जड़ मानते थे। अतः आदर्श अहिंसात्मक राज्य में अर्थव्यवस्था को परिवर्तित किया जाएगा और उत्पादन के साधन पर जनसमूहं का स्वामित्व होगा तथा ईश्वर प्रदत प्राकृतिक साधनों पर सामूूहिक रूप से समाज का आधिपत्य होगा। उत्पादन का विकेन्द्रीकरण ही इस समस्या का समाधान होगा। रक्तिम क्रान्ति उसे समाप्त नही कर सकती।
गांधीजी आर्थिक क्षेत्र में केन्द्रीकरण को व्यक्ति के विकास में बाधक मानते है। अतः आर्थिक दृष्टि से ग्रामों को स्वावलंबी बनाया जाना चाहिए। गांधीजी ‘हिन्द स्वराज’ नामक ग्रन्थ में अपने आदर्श ग्राम स्वराज्य का चित्रांकन करते हुए बताते है कि उसमें प्रत्येक ग्राम एक पूर्ण गणराज्य होगा वह अपनी आवश्यक वस्तुओं के लिए पड़ोसी राज्यों पर निर्भर नही होगा वरन उनका उत्पादन करेगा। प्रत्येक कार्य सहकारिता के आधार पर किया जाएगा। ग्राम का शासन पंचायत द्वारा संचालित किया जायेगा और इस व्यवस्था का मूलाधार व्यक्ति स्वातंत्रय होगा। इस प्रकार प्रत्येक ग्राम अपने शासन उत्पादन, वितरण आदि का स्वयं स्वामी होगा।
केन्द्रीय उत्पादन को सुधारने के लिए गांधीजी ने व्यक्तिगत स्वामित्व को उस समय तक उचित बताया है जब वे श्रमिकों का स्वर इतना उठाये कि उन्हे अपना भागीदार समझे श्रमिक और पूंजीपति सम्पति को अपने पास धरोहर समझे। यदि वे ऐसा नहीं समझते तो उन पर राज्य का स्वामित्व होना चाहिए। राज्य का कारखानों में स्वामित्व हो जाने पर भी श्रमिक अपने निर्वाचित प्रतिनिधों द्वारा सरकार के प्रतिनिधियों के साथ प्रबन्ध में हाथ बटायेंगे।
भारत की आर्थिक व्यवस्था सुधारने के लिए गांधीजी ने कुटीर उ़द्योग, ग्रामद्योग एवं स्वदेशी पर विशेष जोर दिया है घर-घर में स्त्राी पुरूष और बच्चे सभी कताई-बुनाई करेंगे तो उससे एक ओर नागरिको की बेकारी दूर होगी, दूसरे उन्हे पर्याप्त धन मिल जाता है और उनके जीवन के आर्थिक व्यवधान दूर हो जाते हैं स्वदेशी का महत्व देश को आत्म-निर्भर बनाता है अपनी आवश्यकाओं को पूरा करने के लिए अन्य देशों का मुहं नही ताकना पड़ता है। गांधीजी गांवों में मशीनों के प्रयोग के पक्ष में थे। परन्तु उन्हें शोषण करने के लिए नही किया जाएगा। ग्रामीण मशीन के यदि दास नहीं बनेेगे तो उनका प्रयोग वर्जित नही होगा।
आर्थिक समानता का सिन्द्धातः सामाजिक जीवन में न्याय लाने के लिए आर्थिक समानता एंव स्वतन्त्रता स्थापित करनी चाहिए। गांधीजी का मानना था कि आर्थिक समानता का अर्थ सह नहीं कि हर को अक्षरशः उसी मात्रा में कोई चीज मिले बलिक प्रत्येक एक को अपनी आवश्यकता के लिए काफी मात्रा में मिले गांधी जी का आर्थिक समानता का अर्थ था कि सबको अपनी-अपनी जरूरत के अनुसार मिले, माक्र्स की व्याख्या भी यही है यदि अकेला आदमी भी उतना ही मांगे जितना स्त्री और चार बच्चों वाला व्यक्ति मागें तो यह आर्थिक समानता के सिन्द्धात का भंग होगा। गांधीजी का आर्थिक समानता का सिन्द्धात प्रत्येक को सतुलित भोजन, रहने का अच्छा मकान, बच्चो को शिक्षा और दवा की मदद का है।
वितरण का प्राकृतिक सिन्द्धातः गांधीजी का विचार था कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आवश्यकता को पूरा करने के लिए ही वस्तुओें को प्राप्त करना चाहिए। अपनी आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह करना चोर प्रवृति है। मनुष्य की अधिक से अधिक सग्रंह करने की प्रवृति ही निर्धनता और विषमता उत्पन्न करती हैं क्योंकि अधिक सग्रंह करने पर वह न तो उस व्यक्ति के प्रयोग में आती है और न ही अन्य व्यक्ति उसका लाभ उठा सकते है। सम्पति का कुछ हाथों में सीमित हो जाना विकास में बाधक होता है तथा पतन को आमंत्रित करता है। अतः गांधीजी ने न्याय युक्त वितरण के लिए प्रकृति का सिद्धान्त प्रतिपादित किया है। जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आवश्यकाएं पूरी करने के समान अवसर उपलब्ध हों। प्रकृति उतनी ही वस्तु उत्पन्न करती है जितनी की आवश्यकता होती है।
गांधी जी ने धन के समान बंटवारे के लिए दैनिक आवश्यकताओं को कम से कम करने पर जोरे दिया है। गांधीजी ने लिखा है अब हम इस बात का विचार करे कि अहिंसा के द्वारा समान वितरण कैसे कराया जा सकता है? इस दिशा में पहला कदम यह होगा कि जिसने इस आदर्श को अपने जीवन का अंग बना लिया है वह अपने व्यक्तिगत जीवन में तदानुसार जरूरी परिवर्तन करेगा। भारत की दरिद्रता को ध्यान में रखते हुए वह अपनी जरूरतें कम कर लेगा उसकी कमाई बेईमानी से मुक्त होगी। जीवन के हर क्षेत्र मेें वह संयम का पालन करेगा। जब वह अपने ही जीवन में जो कुछ हो सकता है वह सब कर लेगा तभी वह इस स्थिति में होगा कि वह अपने साथियों और पडोसियों में इस आदर्श का प्रचार करेगा।
समान वितरण के लिए संरक्षकता या प्रन्यास पद्धति: गांधीजी ने आर्थिक क्षेत्र में विकेन्द्रीकरण के सिद्धांत का प्रतिपादन करते हुए पूंजीपतियों के लिए न्यास या प्रन्यास की विचार धारा का प्रतिपादन किया हैं उन्होनें लिखा है ‘‘अगर धनवान लोग अपने धन का और उसके कारण मिलने वाली सत्ता को खुद राजी -खुशी से छोडकर और सबके कल्याण के लिए सबके साथ मिलकर बरतनेे को तैयारे न होगें, तो यह समझिए कि हमारे देश में हिंसक और खूंखार क्रान्ति हुए बिना न रहेगी।’’
समान वितरण का सिद्धांत कहता है कि अमीरों को अपने पडोसियों से एक रूपया भी अधिक नही रखना चाहिए। यह सब कैसे किया जाये? अहिंसा के द्वारा या धनवानों की सम्पति छीनकर? सम्पति छीनने के लिए हमें स्वाभाविक रूप से हिंसा का आश्रय लेना पडेगा। यह हिसंक कार्यवाही समाज को लाभ नही पहुंचा सकती। समाज उल्टा घाटे में रहेगा क्योंकि वह उस आदमी के गुणों से वंचित हो जायेगा जो धन इकटठा करता है। इसलिए अहिसक उपाय स्पष्ट ही श्रेष्ठ है। धनवान आदमी के पास उसका धन रहने दिया जाएगा परन्तु उसका उतना ही भाग वहअपने काम में लेगा जितना उसे अपनी जरूरतांे के लिए उचित रूप में चाहिए, बाकी को वह समाज के उपयोग के लिए धरोहर (संरक्षक) समझेगा।
गांधी जी का मत था कि आर्थिक व्यवस्था को सुधारने के लिए विषमता को मिटना आवश्यक है यह विषयमता दो प्रकार से मिटाई जा सकती है। एक साम्यवादी-उपाय से जो पूंजीपतियों की सम्पति छीन कर क्रान्ति द्वारा समानता लाना चाहते है। गांधीजी क्रांन्ति के द्वारा समानता के पक्ष मंे नही थे। दूसरा उपाय है कि पूंजीपति स्वेेच्छा से अपनी सम्पति दूसरों के हित के लिए प्रयोग करें। अतः गांधी जी साम्यवादी नीति के स्थान पर प्रन्यास (न्यास) सिद्धांत के समर्थक थे।
प्रन्यास सिद्धांत विशुद्ध भारतीय है। गांधीजी ने इसकी व्याख्या वेदान्त और ईसाई धर्म की मान्यताओं के अनुसार की है। हिन्दु धर्म के अनुसार सम्पति एक पवित्रा प्राप्ति है। यह उसी व्यक्ति के पास होनी चाहिए, जो उसे सामान्य हित के लिये प्रयोग करे।
यह विचारधारा गीता के अपरिग्रह (Non - possession) सिद्धान्त के अनुकूल है। अपरिग्रह का अर्थ है कि मनुष्य अपने पास अपने जीवन की आवश्यकताओं से अधिक वस्तुओं का संचय ना करे। यह सिद्धान्त ईशावास्योपनिषद् के प्रथम भाग के अनुकूल है जिसके अनुसार ईश्वर ही सम्पति आदि सभी वस्तुओं का उत्पादन है। यदि किसी के पास इससे अधिक सम्पति है तो उसे वह अपनी ना समझकर ईश्वर या समाज की समझनी चाहिए। संग्रहकर्ता को ईश्वरीय दृष्टि से प्रत्येक वस्तु को अपने साथियो की सेवा में लगाकर उन्हे देवार्पण करनी चाहिए। सम्पति का त्यागपूर्वक उपयोग किया जाना चाहिए।
गांधी जी का प्रन्यास सिद्धान्त पूर्णतः अहिंसात्मक है। वह साध्य और साधन में उचित सम्बन्ध रखना चाहते थे। उचित साधनो द्वारा ही उचित साध्य होता है। हिंसा के अनुचित साधनों द्वारा जो समानता लाई जाएगी वह हितकारी नहीं हो सकती और न ही स्थायी। यदि पूंजीपति हृदय परिवर्तन करके अपनी ही अतिरिक्त सम्पति तथा कारखानों आदि का न्यासी मान लेता है तो यह अहिंसात्मक है।
गांधीजी ने संरक्षकता (ट्रस्टीशिप) के सिद्धान्त के असफल होने पर मजदूरों द्वारा असहयोग और सविनय अवज्ञा का सुझाव दिया है। गांधीजी कहते हैं ‘‘यदि भरसक कोशिशों के बावजूद धनवान लोग सच्चे अर्थ में निर्धनों के संरक्षक ना बनें, और गरीबों को अधिकाधिक कुचला जाए और वे भूख से मरे, तो क्या किया जाए? इस पहेली का हल ढूंढने के प्रयत्न में मुझे अहिंसक असहयोग और सविनय अवज्ञा भंग का सही और अचूक उपाय सूझा है। धनवान लोग समाज के गरीबों के सहयोग के बिना धन संग्रह नहीं कर सकते। यदि ज्ञान गरीबों में प्रवेश करके फैल जाए तो वे बलवान हो जायेंगे और अहिंसा के द्वारा अपने आप को उन कुचलने वाली असमानताओं से मुक्त करना सीख लेंगे। जिन्होने उन्हें भूखमरी के किनारे पहुंचा दिया है।
इस विचारधारा के अनुसार पूंजीपतियों को अपनी सम्पति समाज की धरोहर समझने के लिए समझाना चाहिए। वे उस समाज की धरोहर में से जीविका निर्वाह के लिए आवश्यक धनराशि ले सकते हैं। शेष धनराशि को समाज के हितकारी कार्यों में लगा देना चाहिए इसका अर्थ यह नहीं है कि वे उस सम्पति को निर्धन व्यक्तियों में बांट दें। क्योंकि यदि ऐसा किया जाएगा तो निर्धन उसका दुरूप्योग करेंगे और इस प्रकार वितरण करने से सम्पति उपभोग में आकर शीघ्र नष्ट हो जाएगी। व्यक्ति स्वावलम्भी बनकर धन कमाने में उदासीन रहेंगे। उस सम्पति को ऐसे, उद्योग धन्धों में लगाया जाना चाहिए, जिससे जनसाधारण को रोजगार मिल सके अथवा उत्पादन बढ़ा कर सार्वजनिक हित की वृद्धि की जा सके। माक्र्सवादी तथा अन्य विचारक यह मानने के लिए तैयार नहीं है कि धनी लोग स्वेच्छापूर्वक अपनी सम्पति का त्याग कर देंगे किन्तु गांधीजी को मानवीय प्रकृति की उदारता, दिव्यता तथा सुधार में अगाध विश्वास था। उनकी धारणा थी कि प्रारम्भ में दो-चार साधु स्वभाव वाले पूंजीपति कत्र्तव्य भावना से प्रेरित होकर इस सिद्धान्त का अनुसरण करेंगे, बाद में अन्य पूंजीपति भी उनकी प्रेरणा ग्रहण करके उनका अनुसरण करने लगे। फिर भी यदि वह स्वेच्छापूर्वक अपनी सम्पति का परित्याग करने को तैयार ना हो तो अहिंसात्मक असहयोग और सत्याग्रह के बह्मास्त्र से उन्हें विवश किया जा सकता है।
यह कहा जा सकता है कि गांधी जी का प्रन्यास सिद्धान्त विश्व को भारत की देन है। उनके अनुयायी विनोवा भावे के भूदान आन्दोलन द्वारा गांधी जी के प्रन्यास सिद्धान्त को क्रियान्वित करते हुए हजारों एकड़ भूमि भूमिहीन किसानों को दिलवाई। यह सही है कि प्रन्यास सिद्धान्तों को अपनाकर आर्थिक समानता और शोषणविहीन समाज की स्थापना की जा सकती हैः पर सत्य यह है कि कोई भी पूंजीपति कभी भी अपनी सम्पति को समाज की धरोहर नहीं समझ सकता। यदि एकाध पूंजीपति इस सिद्धान्त का अनुसरण कर भी ले तो पूंजीवाद समाप्त नहीं हो जाएगा। शायद गांधीजी पूंजीपतियों की सही प्रवृति को पहचान नहीं सके। सम्पति को पूंजीपतियों के नियन्त्रण और निर्देशन में रखने से उनका लाभ आम जनता को मिल जाएगा, ऐसी आशा रखना सदैव निराशाजनक ही रहा है। पूंजीपति हमेशा से शोषक रहे हैं और कुछ गिने चुने चन्द पूंजीपतियों के उदाहरण से सामान्य नियम नहीं बनाए जा सकते। सम्पति के जनहितकारी उत्पादन, विनिमय, वितरण आदि पर प्रभावशाली नियन्त्रण और निर्देशन, तथा जागरूक शासन की शक्ति होना आवश्यक है।

जांच ऐजैन्सीयों की विश्वसनीयता

शिमला। भ्रष्टाचार से देश का आम आदमी कितना और किस कदर आहत है इसका प्रमाण जनता ने 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को एक तरफा समर्थन देकर दे दिया है। लेकिन इस भ्रष्टाचार से छुटकारा कैसे मिलेगा? भ्रष्टाचारियों को सजा कब मिलेगी? भ्रष्टाचार की निष्पक्ष और निडर जांच कौन करेगा? यह सवाल केन्द्र में हुए इतने बड़े सत्ता परिवर्तन के बाद और भी जटिल और गंभीर हो गये हैं क्योंकि मालेगांव और ईशरत जहां जैसे बडे मामलों पर आज हमारी जांच ऐजैन्सीयों का जो चेहरा सामने आया है उससे जांच ऐजैन्सीयां की विश्वसनीयता पर ही गंभीर सवाल और संकट खड़ा हो गया है। आज कोई भी व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि जांच ऐजैन्सीयां तब सही थी। या आज सही हैं। अभी हैलीकाप्टर खरीद घोटाला सामने आया है। इसमें इटली की अदालत घूस देने वालों को सजा दे चुकी है। इस सौदे के लिये घूस दी गयी थी यह प्रमाणित हो चुका है। घूस देने वाले कौन हैं उनकी पकड़ और पहचान की जिम्मेदारी भारत सरकार की है। लेकिन इन घूसखोरों के खिलाफ तुरन्त प्रभाव से कारवाई करने की बजाये उस पर राजनीति शुरू हो गयी है। इस राजनीति में इटली के प्रधानमन्त्री और हमारे प्रधानमंत्री के बीच सांठगांठ होने तक के आरोप लग गये हैं। इन आरोपों से एक तरह से इटली की न्यायव्यवस्था पर भी सवाल उठ गये हैं। जो भी वस्तुस्थिति इस पूरे प्रकरण में अब तक उभर चुकी है उससे लगता है कि निकट भविष्य में इस घूस कांड पर से पर्दा उठना संभव नही है।
भ्रष्टाचार के जितने भी बडे़ मामलें आज तक सामने आये हैं उनमें बहुत कम पर सजा हुई है। बल्कि जिन मामलों में बड़े राजनेताओं की संलिप्तता सामने आती है उन मामलों में कारवाई भी उनके राजनीतिक कद के मुताबिक ही सामने आती है। जयललिता और मायावती के मामले इसके बडे़ प्रमाण है। आज मोदी सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ उठे अन्ना के आन्दोलन का ही प्रतिफल है लेकिन क्या अब तक भ्रष्टाचार के मामलांे पर राजनीति के अतिरिक्त और कुछ हो पाया है? मालेगांव और ईशरत जंहा मामलों में जहां आरोपों की सूई संघ से प्रत्यक्ष /अप्रत्यक्ष ताल्लुक रखने वालोें की ओर घूमी थी आज उस सूई का रूख मोड़ कर जांच ऐजैन्सी की विश्वसनीयता को ही सवालों के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया गया है।
यदि मालेगांव और ईशरत जहां मामलों में अब हुए खुलासे सही है तो ऐसा करने वालों के खिलाफ अब तक कारवाई करके उन्हें अदालत से दण्डित नहीं करवा दिया जाता है तब तक इन खुलासों पर विश्वास कर पाना कठिन होगा। क्योंकि आज मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्रीयों के खिलाफ भी भ्रष्टाचार के बडे़ मामले चर्चा में हैं जिन पर हो रही कारवाई से देश की जनता कतई संतुष्ट नही है। बल्कि यह हो रहा है कांग्रेस के घोटाले को भाजपा के घोटाले से बड़ा /छोटा प्रमाणित करने की राजनीतिक कवायद हो रही है।
ऐसे में आज मोदी सरकार की देश को यही बड़ी देन होगी यदि देश की सारी जांच ऐजैन्सीयों को केन्द्र और राज्य सरकारों के प्रभाव/दबाव से मुक्त रखने की कोई व्यवस्था कर पाये। क्योंकि जो जांच अधिकारी मामले की जांच शुरू करता है मामले का चालान अदालत तक ले जाने तक वह मामले से अलग हो चुका होता है । जब तक जांच अधिकारी को जांच से लेकर अदालत तक उसे सफल बनाने की जिम्मेदारी से बांध कर नही रखा जाता है तब तक भ्र्रष्टाचार के मामलों में कमी नही आयेगी और न ही सरकारों तथा जांच ऐजैन्सीयों की विश्वसनीयता बन पायेगी। क्योंकि आज जिसकी सरकार उसी की जांच ऐजैन्सी वाली धारणा बनती जा रही है। यह धारणा कालान्तर में देश के लिये अति हानिकारक सिद्ध होगी।

प्रधान न्यायाधीश के आसूं

शिमला/शैल। पिछले दिनोें राज्यों के मुख्यमंत्रीयों और देश के उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों का सम्मेलन था। विधि मन्त्रालय द्वारा आयोजित इस सम्मेलन में देश के सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश, देश के प्रधानमन्त्री और कानूनी मन्त्री शिरकत कर रहे थे। सम्मेलन में देश की न्यायव्यवस्था चिन्तन और चिन्ता का विषय थी। इस अवसर पर प्रधान न्यायधीश अपने संबोधन में इतने भावुक हो गये की उनकी आखोें से आसूं छलक आये। प्रधानमंत्री इस भावुकता से इतने संवेदित हो गये की उन्होने भी इस सम्मेलन को संबोधित करने और प्रधान न्यायाधीश के आसूओं का जवाब देने के लिए इस सम्मेलन को सबोंधित करने का फैसला लिया। सम्मेलन मंे पूरी न्यायव्यवस्था की जो तस्वीर प्रधान न्यायधीश ने देश के सामने रखी है वह निश्चित तौर पर गंभीर चिन्ता और चिन्तन का विषय है। यह व्यवस्था देश के प्रधान मन्त्री और राज्यों के मुख्यमन्त्रीयों और मुख्यन्यायधीशों के सामने सार्वजनिक रूप से आ गयी है। यह सब लोग देश की सर्वोच्च सत्ता हैं जिन पर देश की 125 करोड़ जनता की जिम्मेदारी है और इस जनता की सबसे बड़ी समस्या ही यह है कि उसे न्याय नहीं मिल रहा है। पीढ़ी दर पीढ़ी न्याय के लिए तरसना पड़ रहा है । इस व्यवस्था के लिये अपरोक्ष में प्रधानमंत्री और प्रधानन्यायधीश ने अपने पूर्व वत्तीयों को जिम्मेदार ठहराया है। यह जिम्मेदार ठहराना कितना सही है यह एक अलग बहस का विषय है लेकिन इसमें महत्वपूर्ण यह है कि यह लोग अब इस समस्या का हल क्या और कितनी जल्द देश को देते हैं। 

लेकिन इस समय जो व्यवस्था है और उसमें जो नये प्रावधान सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न आदेशों / निर्देशों के माध्यम से देश के सामने आ चुके हैं उनकी अनुपालना कितनी होे पा रही है। सर्वोच्च न्यायलय ने निर्देश दे रखे हैं कि विधायकों/सासंदो के खिलाफ आये आपराधिक मामलों का निपटारा ट्रायल कोर्ट एक वर्ष के भीतर सुनिश्चित करे। इन निर्देशों के बाद राज्य सरकारों को भी यह कहा गया था कि यदि इसके लिये और अधीनस्थ न्यायालयों का गठन करना पड़े तो वह किया जाये। केन्द्र सरकार इसके लिये राज्यों को पूरा आर्थिक सहयोग देगी क्या इन निर्देशों की अनुपालना हो पायी है नहीं। आज हर राज्य में ऐसे विधायक/सांसद मिल जायेगें जिनके खिलाफ आपराधिक मामले कई-कई वर्षों से अदालतों में लबिंत चल रहे हैं। हिमाचल में ही ऐसे कई मामले चल रहे हैं और इन पर सर्वोच्च न्यायालय के इन निर्देशों का कोई असर ही नही है। इसी तरह सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी व्यवस्था दे रखी है कि जांच ऐजैन्सीयों के पास आयी हर शिकायत पर एक सप्ताह के भीतर विधिवत एफ.आई.आर. दर्ज हो जानी चाहिए। यदि जांच अधिकारी को ऐसा लगे की इसमें एफ.आई.आर. दर्ज करने की गुंजाईश नहीं है उसे ऐसा कारण रिकार्ड पर दर्ज करके शिकायतकर्ता को तय समय सीमा के भीतर इसकी लिखित में जानकारी देनी होगी। लेकिन इस व्यवस्था की भी कोई अनुपालना नही हो रही है। हर मामले की एफ.आई.आर. तुरन्त प्रभाव से वैबसाईड पर डालकर सार्वजनिक की जानी चाहिये। इन निर्देशों के बावजूद शिकायतकर्ताओं को एफ.आई.आर. नही दिये जाने के मामले हर रोज सामने आते हैं।
यही नही बहुत सारे महत्वपूर्ण मामलों को उच्च न्यायालय स्वतः संज्ञान लेकर उनमें एस.आई.टी. गठित करके जांच के निर्देश दे देते हैं। हमारे ही प्रदेश में पीलिया के मामले में उच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेकर एस.आई.टी. गठित की है लेकिन आज इस पूरे मामले की स्थिति क्या है इसे लोग भूल चुके हैं। इसी तरह नालागढ़ में एक समय लगे थर्मल पावर प्लांट पर कड़ा रूख अपनाते हुए उच्च न्यायालय ने एस.आई.टी. गठित करके जांच करवायी थी। इस एस.आई.टी. की रिपोर्ट भी उच्च न्यायालय में आ चुकी है लेकिन आज तक यह सामने नही आ पाया है कि अन्त में इसमें हुआ क्या है। ऐसे दर्जनों मामले हैं जहां मामलों के शुरू होने की तो जानकारी है लेकिन उनके अन्तिम परिणाम की कोई जानकारी नही है। यह ऐसी स्थितियां हैं जिनसे उच्च न्यायपालिका पर से भी आम आदमी का भरोसा उठने लग पड़ा है। ऐसे में यह सबसे पहली आवश्यकता है कि न्यायपालिका के पास जितने भी उपलब्ध साधन है उनसे वह आम आदमी के भरोसे को बहाल करने की पहल करे। क्यांेकि यदि एक बार न्यायपालिका पर से भरोसा उठ गया तो उनके परिणाम स्वरूप जो अराजकता पैदा होगी वह बहुत ही भयानक हो जायेगी ।

केजरीवाल बनाम भाजपा-कांग्रेस

शिमला। आज की राजनीति में केजरीवाल एक ऐसा नाम बन गया है जिसका किये बिना कोई भी राजनीतिक चिन्तन /बहस पूरी नहीं हो सकती। ऐसा इसलिये हैे कि 2014 के लोकसभा चुनावों में देश की जनता भाजपा के पक्ष में एकतरफा फैसला देकर जो संकेत दिया था उसे दिल्ली और बिहार विधान सभा चुनावों में एकदम पलट दिया। दिल्ली में केजरीवाल की आप ऐसा राजनितिक इतिहास रचा है शायद उसे ’’आप’’ भी दूसरी बार दोहरा सके। बिहार में भी आप ने स्वयं चुनाव न लडकर नीतिश, लालू और कांग्रेस के गठबधन को सक्रिय समर्थन देकर अपने को राजनीतिक गणना और विश्लेषण में बनाये रखा है। आज आप पंजाब विधानसभा चुनावों के लिये कांग्रेस तथा अकाली भाजपा गठनबन्धन के विकल्प के रूप में चर्चित होता जा रहा है। पंजाब की अंतिम राजनीतिक तस्वीर क्या उभरती है यह तो आने वाला समय ही बतायेगा लेकिन यह तय है कि वहां पर आप को अनदेखा करना संभव नही है। 2014 के लोक सभा चुनावों में आप पहली बार राजनीतिक पटल पर उभरी और आज भाजपा -कांग्रेस के संभावित विकल्प की गणना तक पहुंच चुकी है। यह अपने में एक बडी उपलब्धि है । आप को इस मुकाम तक पहुंचाने मे केजरीवाल की भूमिका प्रमुख रही है। बल्कि यह कहना ज्यादा संगत होगा कि कांग्रेस के अन्दर जो स्थान नेहरू गांधी परिवार का है आप में वही स्थान केजरीवाल का बनता जा रहा है। केजरीवाल एक तरह से आप का प्लस और माईनस दोनों बन चुका है। ऐसा होने के बहुत सारे कारण है जिन पर चर्चा की जा सकती है। केजरीवाल का बतौर मुख्य मन्त्री अपने पास एक भी विभाग को न रखना । एक ऐसा हथिहार बन गया है जिसके कारण वह निःसंकोच भ्रष्टाचार की हर शिकायत पर कारवाई करने का दम दियाा रहे है।
लेकिन आज आप को राष्ट्रीय पटल पर स्थापित करने के लिये उन्हें हर राज्य में अपनी टीम का चनय करते समय यह ध्यान रखना होगा कि वहां भी उन्हेे दूसरे केजरीवल ही मिले। आज केजरीवाल और मोदी की केन्द्र सरकार में हर समय टकराव चल रहा है। केजरीवाल के 67 विधायकों की टीम में बहुत सारे चेहरे ऐसे भी रहे होगें जिनके बारे में सारी जानकारियां उनके विधायक बनने के बाद मिली हो क्योंकि चुनाव के समय एक लहर थी जिसमें गुण दोष की परख कर पाना संभव नहीं था। लेकिन आज अन्य राज्यों में संगठन खडा़ करते समय गुण दोष को नजर अन्दाज करना हितकर नही रहेगा। केजरीवाल ने जिस तरह से भाजपा के नितिन गडकरी के खिलाफ पूर्ति उ़द्योग समूह को लेकर हमला बोला था उसके कारण गडकरी को अध्यक्षता का दूसरा कार्यकाल नहीं मिल पाया था। लेकिन गडकरी ने जब अपने उपर लगे आरोपों को लेकर अदालत में मानहानि दायर किया तब केजरीवाल को वह आरोप प्रमाणित करने भारी पड गये थे। परन्तु अब जब उसी तर्ज पर केजरीवाल ने क्रिकेट के मुद्दे पर अरूण जेटली को घेरा है तब स्थितियां अलग है। क्योंकि आज दिल्ली सरकार की अपनी जांच रिपोर्ट और भाजपा सासंद कीर्ति आजाद के जेटली पर आरोप केजरीवाल के स्टाक में मौजूद है।
लेकिन जिस ढंग से केजरीवाल ने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को चुनौति दे रखी उसका राजनीतिक बदला लेने के लिये भाजपा राज्यों में अपने लोगों को आप मे भेजने की रणनीति बनाकर आप को तोड़ने का प्रयास अवश्य करेगी । क्योंकि भाजपा औकर आप का सत्ता में आना अन्ना आन्दोलन का ही प्रतिफल है । लेकिन यह भी एक कडवा सच है कि अन्ना का सारा आदोंलन संघ प्रायोजित था और आज उसी आन्दोलन का नाम लेकर भाजपा और उसके समर्थित संगठनों के लेाग आप में घुसने का प्रयास करेगें ।क्योंकि आज भाजपा को जो राजनितिक चुनौती आप से है वह कांग्रेस से नहीं है। भले ही कांग्रेस आज भी सबसे बडा राजनितिक संगठन है और भाजपा जन समर्थन खोती जा रही है लेकिन कांग्रेस के ऊपर भ्रष्टाचार के जो आरोप लग चुके है उनके साये से वह अभी तक उक्त नहीं हो पायी है। कांग्रेस ने अपने किसी भी नेता को भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते हटाया नही बल्कि यदि ध्यान से देखा जाये तो मोदी सरकार ने भी कांग्रेस पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों पर से ध्यान हटाना शुरू कर दिया है। जबकि देश में सत्ता परिवर्तन भ्रष्टाचार के कारण हुआ है। लेकिन आज भ्रष्टाचार की जगह कुछ दूसरे मुद्दे उछाल दिये गये है और भ्रष्टाचार पृष्ठभूमि में चला गया है। केजरीवाल और आप को भाजपा और कांग्रेस का विकल्प बनने के लिये इस स्थिति पर विचार करना होगा।

महामहिम राज्यपाल की एक और पहल

प्रदेश के राज्यपाल महामहिम आर्चाय डा. देवव्रत प्रदेश के विश्वविद्यालयों के पदेन चांसलर और इस नाते इन संस्थनों के सर्वोच्च हैं। महामहिम वैदिक संस्कारों और सस्कृति के लिये कितने प्रतिबद्ध है इसकी झलक पिछले दिनों राजभवन में स्थायी यज्ञशाला के निर्माण से सामने आ गयी है। राजभवन में स्थायी रूप से यज्ञशाला की स्थापना को लेकर शैल का महामहिम से मतभेद है और मतभेद के पक्षों को हम अपने पाठकों के सामने रख भी चुकें हैं। लेकिन राज्यपाल द्वारा राजभवन में प्रतिदिन वैदिक हवन किये जीने पर हमारा कोई एतराज नही है। बल्कि इसके लिये वह प्रशंसा और बधाई के पात्र हैं कि वह एक सच्चे और प्रतिबद्ध आर्यसमाजी की मान्यताओं का अपने निजि जीेवन मे निर्वहन कर रहें हैं। लेकिन वह राज्यपाल के रूप में प्रदेश के संवैधानिक प्रमुख हैं और इस नाते उन्हे ऐसी परम्पराओं की स्थायी स्थापना से भी परहेज करना होगा जिनका निर्वहन करना उनके बाद आने वाले राज्यपालों के लिये कठिन और विवादित न बन जाये।
लेकिन अब राज्यपाल ने सरकार को पत्र लिखकर प्रदेश के विश्वविद्यालयों और उनके अधीन आने वाले अन्य शैक्षणिक संस्थानांे के दीक्षांत समारोहों के लिये अब तक चली आ रही ड्रेस कोड को बदलने का आग्रह किया है। राज्यपाल के इस पत्र के कारण ही टांडा मैडिकल कालिज दीक्षांत समारोह कुछ दिनों के लिये स्थगित किया गया है। राज्यपाल के इस आग्रह पर हिमाचल विश्वविद्यालय ने नया ड्रेस कोड सुझाने के लिये एक कमेटी का गठन किया था। इस कमेटी ने लम्बे चैडे़ विचार विमर्श के बाद विशुद्ध हिमाचली परिवेश पर आधारित एक डेªस कोड तैयार करके ई सी के सामने रखा है। ई सी ने इस डेªस कोड को स्वीकार करते हुए राज्य सरकार को भेज दिया है। इस नये प्रस्तावित डेªस कोड पर सरकार क्या फैसला लेती है यह तो आने वाले समय में ही पता चलेगा। लेकिन
राज्यपाल की यही पहल स्वागत योग्य है और इसे पूरा समर्थन मिलना चाहिये। अब तक चला आ रहा ड्रेस कोड निश्चित रूप से हमारी संस्कृति का प्रतीक नही है। ऐसे बदलाव ऐसे ही शैक्षणिक स्तरांे पर आने चाहिये। बल्कि ऐसा ही कोई डेªस कोड न्यायपालिका के लिये भी सुझाया जाना चाहिये। राज्यपाल की इस पहल का समर्थन देते हुए विश्वहिन्दु परिषद ने एक कदम आगे जाते हुए प्रदेश के कई नगरां के नाम बदलने का भी सुझाव दिया हें परिषद का सुझाव हे कि ब्रिटिश शासन का याद दिलाने वाले सभी प्रतीकों को बदल दिया जाना चाहिये।

विश्वहिन्दु परिषद का यह सुझाव स्वागत योग्य हैे लेकिन इस सुझाव के साथ ही एक सवाल भी खड़ा होता हैं आज हेरिटेज के नाम पर अंग्रेजी शासन की पहचान इन चुके बहुत सारे पुराने भवनों और अन्य समारकों को हैरिटेज के नाम पर संरक्षित रखने के प्रयास किये जा रहे हैं। बल्कि हैरिटेज के नाम पर मिल रहे धन के लालच में ज्यादा भवनों के संरक्षण का काम चल रहा है। संरक्षण के इस काम में भारत सरकार एशियन विकास बैंक से ऋण लेकर राज्य सरकार को धन उपलब्ध करवा रही है। इस परिदृश्य में यह सवाल उठता है कि एक ओर हम अंग्रेजी शासन के दिये हुए नामों को बदलने का प्रयास कर रहें हैं और इस प्रयास में हम अपनी सस्कृति के नाम पर किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। लेकिन दूसरी ओर अंग्रेजी शासन का प्रतीक बन चुकी पुरानी इमारतों को कर्ज लेकर संरक्षित करने में लगे हुए हैं। ऐसा क्यों हो रहा है? क्या यह हमारी सोच खोखले पन को नही उजागर करना है। यदि हम सही मायनों में आने वाली पीढ़ीयों को अंगे्रजी शासन के प्रतीकों से मुक्त रखना चाहतें हैं तो उसके लिये नाम बदलने से पहले कर्ज लेकर गुलामी के प्रतीकों को सहजने और संरक्षित रखने के कदमों पर विचार करना होगा।

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