शिमला/बलदेव शर्मा
वीरभद्र सरकार के सत्ता में चार वर्ष पूरे हो गये हैं। अगला वर्ष चुनावों का वर्ष है। इस समय प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा दो ही प्रमुख राजनीतिक दल हैं जिसमें अब तक सत्ता की भागीदारी रहती है। प्रदेश में इन दोनों का राजनीतिक विकल्प अब तक नही बना पाया है। इसलिये आज भी प्रदेश की राजनीति का आकलन इन्ही के गिर्द केन्द्रित रहेगा यह एक व्यवहारिक सच्चाई है जिसे स्वीकार करना ही होगा। इस परिदृश्य में बीते चार वर्षों का राजनीतिक आकलन एक तरह से इन्ही का राजनीतिक आकलन रहेगा। वीरभद्र और कांग्रेस का दावा है कि प्रदेश में सातवीं बार वीरभद्र के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनेगी। दूसरी ओर भाजपा का संकल्प है
कि देश को केन्द्र से लेकर राज्यों तक कांग्रेस से मुक्त करना है। केन्द्र में पहली बार भाजपा के नेतृत्व में ऐसी सरकार बनी है जिसमें भाजपा ने गठबन्धन का धर्म निभाते हुए अपने सहयोगी दलों को सरकार में भागीदार बनाया है। अन्यथा भाजपा का अपना ही इतना प्रचण्ड बहुमत है जिसमें उसे किसी अन्य की संख्याबल के लिये आवश्यकता नहीं है। पिछले लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को 1977 के बाद दूसरी बार ऐसी शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा है।
इसमें यह भी महत्वपूर्ण है कि 1977 से लेकर अब तक इन्दिरा गांधी और राजीव गांधी की हत्याओं के परिदृश्य में हुए चुनावों को छोड़कर शेष सारे चुनावों में भ्रष्टाचार ही केन्द्रित मुद्दा रहा है। हिमाचल में भी पिछले तीन दशकों से हर चुनाव में भ्रष्टाचार ही प्रमुख मुद्दा रहा है और यह भ्रष्टाचार के मुद्दा बनने का ही परिणाम है कि कोई भी दल लगातार दो बार सत्ता में नही रह पाया हैं। ऐसे में इस बार कांग्रेस का दावा पूरा होता है या भाजपा का संकल्प फली भूत होता है यह देखना रोचक होगा। लेकिन इसके लिये बीते चार वर्षो में सरकार की कारगुजारीयां और भाजपा की भूमिका दोनों को ही देखना आवश्यक होगा। सरकार के नाते वीरभद्र के नेतृत्व में अन्य मन्त्रीयों और संगठन की भूमिका केवल नाम मात्र की ही रह जाती है। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि वीरभद्र के आगे कांग्रेस हाईकमान भी हर बार बौना ही साबित हुई है। वीरभद्र हर बार आंखे दिखाकर सत्ता पर काबिज हुए है । इस बार तो वीरभद्र के बेटे युवा कांग्रेस के अध्यक्ष विक्रमादित्य सिंह ने भी अभी से ही बाप नक्शे कदम चलना शुरू कर दिया है। चुनावी टिकटों के आवंटन में हाईकमान की भूमिका को लेकर जिस तरह ब्यान वह देते रहे है उससे यह कार्यशैली स्पष्ट हो जाती है। इसलिये प्रदेश में चुनावी परिणाम जो भीे रहेंगे वह केवल वीरभद्र केन्द्रित ही होगें।
2012 के विधानसभा चुनावों के दौरान यदि धूमल शासन के खिलाफ हिमाचल को बेचने के आरोप न लगते तो तय था कि धूमल पुनः सत्ता पर काबिज हो जाते। केवल इस एक आरोप के प्रचार ने भाजपा और धूमल को सत्ता से बाहर कर दिया था। जबकि इस बहुप्रचारित आरोप की दिशा में वीरभद्र सरकार एक भी मामला सामने नही ला पायी है। बल्कि वीरभद्र सरकार ने जो भी मामले धूमल शासन को लेकर उठाये हैं वह सारे एचपीसीए के गिर्द ही केन्द्रित हैं और उनमें भी किसी मामले में अभी तक सफलता नहीं मिली है। एचपीसीए से हटकर ए एन शर्मा का मामला बनाया गया था और उसमें सरकार की भारी फजीहत हुई है। इसी तरह धूमल की संपत्तियों को लेकर जो भी दावे वीरभद्र करते रहे हैं वह सब अन्त में केवल राजनीतिक ब्यान मात्रा ही होकर रह गये हैं। ऐसे में आज भाजपा या धूमल के खिलाफ चुनावों में उछालने लायक एक भी मुद्दा वीरभद्र या कांग्रेस के पास नही है। 
दूसरी ओर आज सरकार के चार वर्ष पूरे होनेे के बाद सरकार के खिलाफ भाजपा का एक ऐसा आरोप पत्र खड़ा हो गया जिसमें वीरभद्र और उनका करीब पूरा मन्त्रीमण्डल गंभीर आरोपों के साये में आ गया है। इस आरोप पत्र को लेकर कांग्रेस के नेता चाहेे कोई भी प्रतिक्रिया देते रहें लेकिन इसकी छाया संबधित प्रशासन पर साफ देखी जा सकती है। बल्कि आज सीबीआई और ईडी में जो मामले चल रहे हैं उनको लेकर वीरभद्र जिस ढंग से जेटली, धूमल और अनुराग को कोसते आये हैं उससे यह झलकता है कि वीरभद्र को राजनीतिक तौर पर केवल धूमल से ही खतरा है। अब तो आयकर के अपील ट्रिब्यूनल और उसके बाद हिमाचल उच्च न्यायालय के फैसलों ने सीबीआई और ईडी के आधार को और पुख्ता कर दिया है। ऐसे में यह फैसले भाजपा के हाथ में एक ऐसा हथियार बन जायेंगे जिस की काट से वीरभद्र और कांग्रेस को बचना आसान नहीं होगा।
शिमला/बलदेव शर्मा
आठ नवम्बर को रात आठ बजे प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी ने यह घोषणा की कि आज रात बारह बजेे के बाद पांच सौ और एक हजार के नोट लीगल टैण्डर नहीं रहेंगे। यह केवल कागज के टुकड़े रह जायेंगे। इन नोटों के स्थान पर पांच सौ और दो हजार के नये नोट जारी किये गये है। प्रधान मन्त्री ने इस फैंसले को कालाधन और उसके धारकों के खिलाफ बडा़ कदम बताते हुए आम को भरोसा दिलाया था कि इस फैंसले से जो व्यवहारिक पेरशानीयां सामने आयेंगी वह पचास दिन में
समाप्त हो जायेंगी। मोदी ने देश से पचास दिन का बिना शर्त सहयोग मांगा था और देश ने यह सहयोग उन्हें दिया है। प्रधान मन्त्री नेे यह भी दावा किया गया था कि इससे मंहगाई कम होगी। आठ नवम्बर को यह घोषित नही किया था कि पुराने नोट कितने समय तक कहां कहां उपयोग में रहेंगे। इसके लिये समय -समय पर नियमों में संशोधन होता रहा और पुराने नोटों के उपयोग की सहूलियत मिलती रही। इसी में कालेधन के धारकों को भी यह सुवधा दी गयी कि वह भी अपना धन घोषित कर सकते है उनके खिलाफ कोई कारवाई नहीं की जायेगी उनसे कुछ पुछा नहीं जायेगा। केवल उनके लिये टैक्स आदि की मात्रा बढ़ा दी गयी। इस सब में जो फैसला नहीं बदला वह यही कि पुराने नोटों का चलन बाजार के लिये बन्द हो गया। अब पुराने नोट केवल रिजर्व बैंक की धरोहर रह जायेंगे। पुराने नोटों को जमा करवाने की समय सीमा में जो बढौत्तरी होती रही है उसके लिये यह तर्क आता रहा है कि रिजर्व बैंक ने पांच सौ और हजार के जितने नोट प्रिंट किये थे वह सारे वापिस नही आये हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब पुराने नोटों की वैधता ही आठ नवम्बर से समाप्त हो गयी है तब रिजर्व बैंक इन्हे अपने पास लेकर क्या करेगा ।
नोटबंदी कालाधन समाप्त करने के लिये लायी गयी। कालाधन वह धन होता है जिस पर आयकर नही दिया जाता है। बल्कि यह कहना ज्यादा सही है कि आयकर छिपानेे का प्रयास ही कालेधन का जनक बन जाता है। अन्यथा हर खरीद -फरोख्त पर हम प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से 56 करों की अदायगी करते है। यह कर उन पर भी बराबर लागू रहते हैं जिनकी आय आयकर के दायरेे में नही आ पाती है। इस समय भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक तीन प्रतिशत लोग आयकर अदा कर रहें हैं। 92 प्रतिशत वह लोग है जिनकी आय ही दस हजार या इससे कम है। इनके पास आयकर से छिपाने के लिये है ही कुछ नहीं । इस तरह केवल पांच प्रतिशत लोग बच जाते हैं जो आयकर की चोरी करके कालाधन अर्जित कर रहें हैं। इन पांच प्रतिशत कालाधन धारकों के खिलाफ कारवाई के लियेे नोटबंदी लायी गई। यहां यह भी विचारणीय है कि करंसी के मुद्रण, नियमन और संचालन की जिम्मेदारी रिजर्व बैंक की है। रिजर्व बैंक एक स्वायतः संस्था है। उसका हर फैसला उसके निदेशक मण्डल में पूरी तरह गहन विचार के साथ लिया जाता है और तब उस फैंसले से सरकार को सूचित किया जाता है। करंसी के मुद्रण में यह सुनिश्चित किया जाता है कि उतनी ही करंसी प्रिंट की जायेगी जितना ही आपके पास गोल्ड का धातू है इसलिये विश्व भर में गोल्ड ही इसका मानक बन चुका है। इसका अर्थ है कि गोल्ड के सुरक्षित भण्डार के अनुपात में ही करंसी का मुद्रण होता है।
अब जब नोटबंदी की गयी तब यह आंकडे सामने आये की पांच सौ और हजार के नोट कुल करंसी के 86 प्रतिशत है। अब जब 86 प्रतिशत करंसी का चलन वैध नही रहा तब यह पुराना किसी के घर तिजोरी में बन्द रहे या रिजर्व बैंक के पास रहे उसकी कीमत तो एक कागज के टुकडे से अधिक नही है। फिर 86प्रतिशत करंसी का अनुपातित गोल्ड रिजर्व तो सुरक्षित पडा ही है। इसमें नुकसान तो केवल छपाई और कागज की कीमत का ही है। कालाधन और बेनामी संपत्ति की घोषणा की समय सीमा 30 सितम्बर को समाप्त हो गयी थी । अब नोटबंदी में आम आदमी को जो 92प्रतिशत के आंकडे में आता है उसको पुराने नोट बदलने के लिये काफी समय मिल गया है। अब इस समय इन कालाधन धारकों को पुराने नोट जमा करवानेे की सुविधा क्यों दी जा रही है। इस सुविधा से कालाधन धारकों को तो लाभ ही मिल रहा है इससे उनका नुकसान तो नहीं हो रहा है। क्या यह सुविधा देने से कालेधन के खिलाफ कारवाई के सारे दावों पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है। अब जब छापों में नये नोट फिर से इन कालाधन धारकों के पास मिल रहें हैं तो उससेे भी यही प्रमाणित होता है कि इन लोगों पर इस फैसले का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा है। इसमें यदि पुराने नोटों को बदलने के लिये एक तय सीमा के बाद छूट न दी जाती और बिजली, पानी टैलिफोन आदि सारी सेवाओं के बिलों के भुगतान में यह सुविधा देने की बजाये इन बिलों का भुगतान ही पाचस दिन किश्तों में लिया जाता तो उसके परिणाम कुछ और ही होते। अब पुराने नोटों को जमा करवाने के समय को बढ़ाने से नोटबंदी का पूरा फैसला सवालों के घेरे में खड़ा हो जाता है।
शिमला/बलदेव शर्मा भ्रष्टाचार और कालेधन पर कारवाई करना आसान नहीं है यह नोटबंदी के बाद पैदा हुए हालात से साफ सामने आ गया है। नोटबंदी कालेधन के खिलाफ एक कड़ा और सही कदम है यह संसद के अन्दर सारा विपक्ष भी सिद्धांत रूप से स्वीकार कर चुका है। नोटबंदी पर जिस ढंग से अमल किया गया है उसके कारण
आम आदमी को व्यवहारिक कठिनाईयों का सामना करना पड़ा है। कई लोगों की मौत हो चुकी है। निचले स्तर के रोजगार पर असर पड़ा है। किसान परेशान है लेकिन बडे़ आदमी पर, कालाधन रखने वालों पर इसका कोई नकारात्मक असर नहीं पडा है। भ्रष्ट मानसिकता बैंक कर्मचारियों/अधिकारियोें और कारोबारियों के गठजोड़ से खुलकर सामने आ गयी है। क्योंकि जिस मात्रा में छापेमारी के दौरान नये नोट थोक में पकडे़ जा रहे है उससे आम आदमी का विश्वास इस फैसले पर से उठता जा रहा है। इस फैसले के अच्छे परिणाम भविष्य में सामने आयेंगे यह तर्क न तो स्वीकार्य हो सकता है और न ही ग्राह्य। क्योंकि इसके कारण जो नुकसान हो रहा है उसकी भरपायी भविष्य मे संभव नही हो सकती। कैशलैस होने का जो पाठ पढ़ाया जा रहा है उसकी विश्वसनीयता पर भ्रष्ट बैंक कर्मचारियों ने स्वयं प्रश्न चिन्ह लगा दिया है इसलिये कैशलैस लेनदेन इस समस्या का कतई हल नही है। क्योंकि साईबर अपराधी इतने आगे निकल चुके हैं कि एक फोन काॅल पर ही लाखों लूट लिये जाते हंै। नये नोट के साथ ही जाली नोट का बाजार में आना और उसका एटीएम तक पहंुच जाना कैशलैस व्यवस्था के लिये ऐसी चुनौतियां है जिनका हल अभी नही निकल सकता है। सिद्धांत रूप में नोटबंदी का फैसला जितना सही है इस पर हुए अमल ने इसे उतना ही गलत प्रमाणित कर दिया गया है।
नोटबंदी पर उभरे गतिरोध से संसद सत्र स्वाह हो गया है। इसमे भी हद तो यह हो गयी कि लोकसभा में प्रचण्ड बहुमत लेकर सरकार बनाने के बावजूद प्रधानमंत्री यह कह रहे हंै कि उन्हें संसद में बोलने नही दिया जा रहा है। इसलिये उन्होने जनता से सीधे संवाद का रास्ता चुना है। लेकिन जनता से सीधे संवाद मे प्रधानमंत्री जो बोल रहे है वह व्यवहार में सामने नही आ रहा है। प्रधानमंत्री ने दावा किया था कि पचास दिन में सारी कठिनाईयां समाप्त हो जायेंगी। लेकिन अब पचास दिन के बाद धीरे-धीरे समाप्त होने की बात कही जा रही है। प्रधानमंत्री ने कहा था कि इस फैसले से कालाधन रखने वाले परेशान हो गये हैं परन्तु अभी तक कालाधन रखने वाले किसी की भी मौत नही हुई है मौत केवल लाईन में लगने वालों की हुई है। आम आदमी को शादी व्याह के लिये 2.50 लाख कैश ड्रा की सीमा लगा दी गयी फिर उसमें भी कई और शर्तें लगा दी गयी। जबकि जिन बडे़ लोगों ने शादी समारोहों पर सैंकडों करोड़ खर्च कर दिये उन्होने कितना भुगतान डिजिटल किया है इस पर उठे सवालों का कहीं से कोई जवाब नही आ रहा है।
दूसरी ओर विपक्ष में राहुल गांधी नोटबंदी को सबसे बड़ा घोटाला करार देते हुए यह कह रहे हंै कि उन्हे संसद में बोलने नही दिया जा रहा है। राहुल गांधी ने यह भी दावा किया है कि उनके पास प्रधान मन्त्री मोदी के खिलाफ पुख्ता सबूत हैं जिन्हें वह संसद मे रखना चाहते हंै। लेकिन यदि संसद नही चल रही है तो राहुल मोदी की तर्ज पर जनता से सीधा संवाद स्थापित करके वहां इस घोटाले का पर्दाफाश क्यों नही करते? क्या देश संसद से बड़ा नही है? संसद और सरकार दोनों ही देश की जनता के प्रति जवाबदेह हैं। लेकिन राहुल का जनता के मंच को न चुनना कहीं न कहीं यह इंगित करता है कि वह इस पर राजनीति पहले करना चाहते है और राजनीति की गंध आते ही राहुल गांधी का पक्ष कमजोर हो जाता है। जबकि इसमे केजरीवाल राहुल से ज्यादा स्पष्ट हैं क्योंकि नोटबंटी को घोटाला करार देकर इस पर एक पत्र जनता के नाम जारी करके उसमें इस फैसले के बाद 63 उद्योगपतियों के 6000 करोड़ बट्टे खातों में डालने का तथ्य उजागर कर दिया। केजरीवाल के इस आरोप का खण्डन नही आ पाया है।
इस परिदृश्य में अन्त में जो स्थिति उभरती है उसमे यह स्पष्ट हो जाता है कि नोटबंदी कालेधन के खिलाफ जितना सख्त कदम है उसे उसी अनुपात में असफल बनाया जा रहा है। इसमें यह सवाल उभरता है कि जिन लोगों पर इस फैसले पर अमल करवाने की जिम्मेदारी थी क्या उनका इस बारे में आकलन ही सही नही था या फिर वह स्वयं इसके खिलाफ थे। आज इस फैसले पर हुए अमल से देश के हर कोने में रोष है क्योंकि हर जगह लोगों को नोट लेने में लाईनों में लगकर खाली हाथ लौटना पड़ा है। इसलिये रोष को शांत करने के लिये हर बैंक की हर शाखा तक पहुंच कर कारवाई सुनिश्चित करनी होगी क्योंकि नोटों के वितरण की जिम्मेदारी इन्ही पर थी और इस व्यवस्था के संचालन की जिम्मेदारी सरकार पर है। इसलिये अन्तिम जवाब सरकार से ही आना है।
लोकसभा सचिवालय के संसदीय अध्ययन तथा प्रशिक्षण ब्यूरो द्वारा संसदीय प्रक्रिया और कार्य विधि पर पत्रकारों के लिये आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम के अवसर पर विशेषाधिकारियों के मुद्दे पर अपने चिन्तन और चिन्ताओं को सांझा करते हुए भाजपा संसाद मीनाक्षी लेखी ने जो सवाल राष्ट्रीय बहस के लिये उछाले हैं उस पर व्यापक चर्चा होना अनिवार्य है। आज संसद से लेकर सड़क तक हर व्यक्ति अपने विशेषाधिकारियों को लेकर न केवल सजग है बल्कि उनके जरा से भी हनन पर अक्रोशित हो उठता है। इस परिदृश्य में मीनाक्षी लेखी ने जो स्वयं संसद की विशेषाधिकार समिति की अध्यक्ष भी हैं सांसद निधि को लेकर जो सवाल उछाला है उससे पूरी प्रशासनिक व्यवस्था सवालों के कटघरे में खड़ी हो जाती है। आज हमारे सांसदों और विधायकों को अपने-अपने क्षेत्र के विकास के लिये सरकार के बजट से हटकर एक विकास निधि मिलती है।
इस विकास निधि को यह संासद और विधायक अपने क्षेत्र में किसी भी विकास कार्य पर स्वेच्छा से खर्च कर सकते हैं लेकिन इस विकास निधि को जिला प्रशासन के माध्यम से ही खर्च किया जाता है जिस भी कार्य पर इसे खर्च किया जाना होता है उसका पूरा प्रारूप जिला प्रशासन द्वारा ही तैयार किया जाता है और उसके संचालन की पूरी जिम्मेदारी प्रशासन के हाथ में रहती है। इसमें सांसद/ विधायक की भूमिका मात्र इतनी ही रहती है कि वह स्वयं या अपने क्षेत्र विशेष के लोगों के आग्रह पर ऐसे विकास कार्य को चिन्हित करके अपनी विकास निधि से धन की उपलब्धता सुनिश्चित करता हैं । लेकिन उस चिन्हित कार्य के लिये वह धन कितना पर्याप्त है? उसमें और कितना धन वांच्छित होगा या आवंटित धन में से कितना शेष बच जायेगा। इस सबकी जानकारी प्रशासन सबंधित सांसद /विधायक को समय पर उपलब्ध नहीं करवाता है। आज कई सांसद ऐसे है जिनकी सांसद निधि पूरी खर्च हो नही पाती है। फिर यदि सांसद/ विधायक राज्य सरकार के सत्तापक्ष से भिन्न दल के हों तो स्थिति और भी विकट हो जाती है। मीनाक्षी लेखी प्रशासन की ऐसी वस्तुस्थिति की स्वयं भुक्त भोगी है।
ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब एक सांसद/विधायक को उसके क्षेत्र के विकास के लिये बजट से इत्तर विकास निधि का प्रावधान किया गया है। तो वहां के लोगों की अपने सांसद/विधायक से अगल से कुछ अपेक्षाएं रहेगी ही। इन्ही अपेक्षाओं को पूरा करने के लिये इस धन का आवंटन किया जाता है। विकास निधि पाना और उसका खर्च करना सांसद का विशेषाधिकार है। हर वर्ष हर सांसद को पांच करोड को विकास निधि मिलती है और इसे एक वर्ष के भीतर खर्च किया जाना होता है लेकिन यह तभी संभव हो सकता हैै जब जिला प्रशासन इसमें पूरा सहयोग करे। इसके लिये यह व्यवस्था रहनी चाहिये की इस निधि का अवांटन भी एक तय समय सीमा को भीतर हो जाना चाहिये। सांसद /विधायक को भीे ऐसे कार्यो का चयन एक तय समय सीमा में कर लेना चाहिये। चयनित कार्य का प्रारूप तैयार करने के लिये भी समय सीमा तय होनी चाहिये और चयनित रूप देने से पहले सांसद/विधायक द्वारा भी उसका अनुमोदन होना चाहिये। इस तरह जब कार्य शुरू हो जाये तो उसकी प्रगति की रिपोर्ट भी समय समय पर सांसद /विधायक को दी जानी चाहिये। जब तक सांसद/विधायक विकास निधि के खर्च के लिये यह अनिवार्यताएं प्रशासन के लिये नही रखी जायेंगी तब तक प्रशासन का सहयोग सुनिश्चित करना कठिन हो जायेगा। जब यह सच अनिवार्य और समयबद्ध कर दिया जायेगा तभी प्रशासन के स्तर पर की जाने वाली हर कोताही को विशेषाधिकार के हनन के दायरे में लाया जा सकेगा आज सांसद के लिये आर्दश ग्राम येाजना भी शुरू की गयी है लेकिन इस योजना का कार्यन्वयन भी इसी प्रशासन के माध्यम से किया जाना है क्योंकि सांसद के पास इसके लिये अलग से तो कोई व्यवस्था है नही। जन सुविधा के नाम पर किये जाने वाले यह सारे प्रयास प्रशासन की प्रतिबद्धता के बिना पूरे करना कठिन है इसके लिये प्रावधानों को नजर अन्दाज करके आयी हुई विकास निधि को लैप्स होनेे देना तो निश्चित तौर पर संबधित प्रशासन विशेषाधिकार के हनन का दोषी माना जायेगा। क्योंकि विकास पाना जनता का विशेषाधिकार और विकास निधि के माध्यम से करवाना सांसद/ विधायक का विशेषाधिकार है। इस संद्धर्भ में श्रीमति मीनाक्षी लेखी की चिन्ता और चिन्तन को हमारा पूरा समर्थन है।
शिमला। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नोटंबदी का फैसला क्या एक ऐतिहासिक भूल बनकर ही तो नहीं रह जायेगा अब यह सवाल उभरने लग पड़ा है। क्योंकि नोटबंदी से कालेधन पर अंकुश लगाने और कालेधन के सहारे चल रही समानान्तर अर्थव्यवस्था को समाप्त करने का दावा और वायदा देश से किया गया था। लेकिन जैसे-जैसे इस फैसले के बाद भी कालाधन घोषित करने की समय सीमाएं बढ़ाई जा रही हैं और उन्हें 50% टैक्स देकर अपना शेष धन वैध बनाने का अवसर दिया जा रहा है उससे इस फैसले की नीयत और नीति दोनों पर ही सन्देह होने जा रहा है। क्योंकि नोटबंदी से पहले यह स्थिति जग जाहिर हो चुकी थी कि हमारे की बैंक घाटे में चल रहे हैं। देश के 55 लोगों के पास 85 हजार करोड़ कर्ज होने का आंकड़ा भी सामने आ चुका था। बैंको का एनपीए बढ़ता जा रहा था। संभवतः इसी वस्तुस्थिति को सामने रखकर रिर्जव बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने बड़े लोगों को दिये जा रहे बढे़ कर्जो पर चिन्ता जताते हुए उनका विरोध किया था। गरीब को दस रूपये की सबसिडि देकर बडे़ घरानों को लाखों करोड़ के पैकेज देना खुली बहस का मुद्दा बन चुका था। आम आदमी इस स्थिति पर मुखर होने लग पड़ा था क्योंकि इसी के कारण मंहगाई लगातार बढ़ती जा रही थी। लोकसभा चुनावों से पहले इस कालेधन को लेकर बड़े-बडे़ दावे और वायदे किये गये थे। 
इस परिदृश्य में यह स्वाभाविक था कि यदि इन दावों वायदों को अमली जामा देना है तो उसके लिये कर प्रणाली को सरल करना होगा और इस दिशा में जीएसटी को लाया गया। लेकिन अकेले जीएसटी से ही पूरी स्थिति में सुधार नही हो सकता था इसके लिये कुछ और भी चाहिये था जो कि नोटबंदी के ऐलान के रूप में सामने आया। आम आदमी इस फैसले से इसलिये खुश हुआ कि उसके पास 500 और 1000 के इतने नोट नहीं है जो अवैध करार दिये जाने के दायरे में आयेंगे क्योंकि उसने कोई टैक्स चोरी नही की है। इसलिये यही आम आदमी पुराने नोट बदलवाने के लिये बैकों के आगे लाईने लगाकर खड़ा हुआ। जबकि कोई भी कर चोर इन लाईनों में नही देखा गया क्योंकि जब सरकार ने सरकार को दिये जाने वाले सारे बिलों के भुगतान में पुराने नोटों की सुविधा दे दी तो इसका लाभ बहुत स्थानों पर कालेधन वालों ने उठाया। पैट्रोल पम्पों पर यह सुविधा दी गयी और वहां भी चार दिन में ही इतनी सेल दिखा दी गयी जो शायद दो वर्षो में भी न हुई हो। ऐसे पैट्रोल पम्प मालिकों को ईडी के नोटिस आना इसका प्रमाण है। सरकारी परिवहन सेवाओं को भी इसके लिये इस्तेमाल किया गया। कुल मिलाकर आम आदमी को राहत देने के लिये जो भी कदम उठाये गये उनका दुरूपयोग हुआ है। संभवतःइसी दुरूपयोग का परिणाम है कि कालाधन रखने वालों को इसकी घोषणा का फिर मौका दिया जा रहा है।
कंरसी की व्यवस्था की जिम्मेदारी रिजर्व बैंक की है। रिजर्व बैंक उतने ही नोट छापता है जितना उसके पास रिजर्व में सोना उपलब्ध रहता है। सोना ही अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में हमारी मुद्रा का आधार होता है। स्मरणीय है कि इसी आधार को बनाये रखने के लिये स्वर्गीय चन्द्र शेखर के शासनकाल में सोना गिरवी रखना पडा था। इस उल्लेख से यह स्पष्ट हो जाता है कि कंरसी का मूल आधार सोना रहता है। ऐसे में रिजर्व बैंक ने जितने भी नोट छापकर बाजार में भेजे हैं उनका अनुपातः सुरक्षित भण्डार सोने के रूप में उसके पास मौजूद है। ऐसे में यदि उसके छापे हुए 500 और 1000 के नोटों का चलन बन्द कर दिया गया तो उतना स्वर्ण भण्डार तो उसके पास है ही। आरबीआई के पास यह आंकड़ा भी हर समय उपलब्ध रहता है कि कितने नोट विभिन्न बैंको के पास हैं और कितने बैंको से निकलकर खुले बाजार में पहुंच चुके हैं। इस परिदृश्य में जब यह नोटबंद किये गये और उन्हे नये नोटों के साथ बदलने की सुविधा दी गयी तो इसके लिये एक अनुपात में पूर्व व्यवस्था की जा सकती थी जो नही की गयी। हर आदमी काला धन रखने का दोषी नहीं है इसलिये उसे नोट बदलने के लिये जायज़ समय मिलना चाहिये था जो मिला भी। तय समय सीमा के बाद नोट बदलने का काम पूरी तरह बन्द हो जाना चाहिये था। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि कुल कितने पुराने नोट वापिस आये और कितने नही आये। जो नोट वापिस नहीं आते उससे सरकार का, आरबीआई का तो कोई नुकसान नही होता। नुकसान तो केवल नोट रखने वाले का होता। जब पुराना नोट चाहे वह किसी के पास चलना ही नही है तो उसकी गिनती किस अर्थव्यवस्था में कि जा सकती है। कालेधन से जो संपति खड़ी की गयी है वह तो बनी ही रहेगी उसकी जांच पड़ताल कभी भी की जा सकती है। लेकिन जेब में रखा हुआ पुराना नोट तो चलन बन्द होने के बाद महज कागज का टुकडा मात्र है। आरबीआई इन पुराने नोटों को रिसाईकिल करवा कर केवल करंसी पेपर ही ले सकता है इससे अधिक कुछ नही। ऐसे में अब कालेधन वालों को टैक्स छूट देकर और समय देना सरकार की नीयत और नीति दोनों के लिये घातक होगा।