Friday, 17 April 2026
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‘आप’ हत्या के कगार पर एक राजनीतिक विकल्प

 दिल्लीे विधानसभा के चुनावों में आम आदमी पार्टी ने 70 में से 67 सीटें जीतकर जो इतिहास रचा था आज वहीं एक उपचुनाव में जमानत भी न बचाकर फिर एक इतिहास रचा है। क्योंकि यह उपचुनाव भी उन्ही के विधायक द्वारा सीट खाली करने के कारण हुआ था। इससे पहले पार्टी ने पंजाब और गोवा विधानसभाओं के चुनाव हारे। इन राज्यों में भी पार्टी बड़े दावों के साथ चुनाव में उत्तरी थी। दिल्ली में पिछले चुनावों में कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पायी थी। उस गणित से आप की यह हार कोई बड़ा अर्थ नहीं रखती है। लेकिन यह गणित ‘आप’ पर लागू नही होता। क्योंकि आम आदमी पार्टी कांग्रेस और भाजपा के राजनीतिक विकल्प की उम्मीद बनकर सामने आयी थी। जनता नेे आप पर उस समय विश्वास जताया था जब
भाजपा केन्द्र में लगभग आप जैसा ही इतिहास रचकर सत्ता में आयी थी। भाजपा को मात्र तीन सीटें ही मिल पायी थी ‘आप’ की इतने कम समय में ऐसी हालत क्यों हो गयी यह पार्टी के लिये ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिये एक गंभीर चिन्ता का विषय है। क्योंकि यह केवल ‘आप’ के ही राजनीतिक भविष्य का प्रश्न नही हैं बल्कि देश के लिये राजनीतिक विकल्प की तलाश के प्रयासों की हत्था जैसी स्थिति बन गयी है। ऐसा क्यों हुआ और इसके लिये कौन जिम्मेदार है इस पर खुले मन से विश्लेषण की आवश्यकता है।
इसको समझने के लिये थोड़ा पीछे झंाकने की आवश्यकता है। जब 1947 में देश आजाद हुआ और 1952 के आम चुनावों से पहले केन्द्र में एक प्रतिनिधि सरकार बनी थी उसी दौरान 1948 और 1949 में ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और हिन्दुस्तान समाचार न्यूज ऐजैन्सी का गठन कर लिया था। यह गठन इसका संकेत करते हैं कि संघ ने उस समय भांप लिया था कि आने वाले भविष्य में युवाशक्ति और समाचार माध्यमों की भूमिका कितनी व्यापक होने जा रही है। 1952 में हुए पहले आम चुनावों से लेकर 1962 के चुनावों तक जनसंघ को बड़ी सफलता नही मिल पायी थी लेकिन 1967 में जब कुछ राज्यों में संयुक्त विधायक दल सरकारें बनी थी तब जन संघ को सत्ता में भागीदारी मिली थी। हमारे पड़ोसी राज्य पंजाब में अकाली दल और जन संघ ने मिलकर सरकार बनायी थी। उसके बाद जब 1975 में स्व. जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में समग्र क्रांति का नारा बुलन्द हुआ और देश में आपातकाल लागू कर दिया गया था। तब उस आन्दोलन के बाद जब 1977 में आपातकाल हटते ही आम चुनाव हुए और यह चुनाव जनता पार्टी के नाम पर लडे़ गये थे तक केन्द्र में जनता पार्टी को ऐसा ही प्रचण्ड बहुमत मिला था। जनता पार्टी के गठन के लिये वाम दलों को छोड़कर शेष सारे दलों ने कागें्रस के विरोध के लिये अपने आप को जनता पार्टी में विलय कर दिया था। लेकिन 1977 में प्रचण्ड बहुमत मिलने के बावजूद 1980 में जनता पार्टीे टूट गयी, केन्द्र में सरकार गिर नये चुनाव हुए और स्व. इन्दिरा गंाधी के नेतृत्व में कांग्रेस फिर सत्ता में आ गयी। 1980 में जनता पार्टी पूर्व जन संघ के सदस्यों के जनता पार्टी और आरएसएस के एक साथ सदस्य होने पर उठे दोहरी सदस्यता के प्रश्न पर टूटी। शिमला में मुख्यमंत्री शान्ता कुमार ने केन्द्रिय स्वास्थ्य मंत्री राजनारायण को गिरफतार करके इस टूटन को मूर्त रूप दिया।
1980 के 1988 में जब स्व. वी पी सिंह ने बोफोर्स तोप सौदे पर सवाल उठाकर कांग्रेस से बाहर निकलकर जन मोर्चे का गठन किया और भ्रष्टाचार के खिलाफ जन आन्दोलन छेड़ा तब फिर उस आन्दोलन में सारे गैर कांग्रेसी दल इकट्ठे हो गये। 1989 का चुनाव जनतादल के नाम पर लड़ा गया भाजपा इस गठबन्धन में शामिल हुई। 1990 के विधानसभा चुनाव जनतादल और भाजपा ने मिलकर लड़े। वी पी सिंह ने ओबीसी को आरक्षण की घोषणा की और भाजपा एवम संघ परिवार ने इसका विरोध किया। मण्डल बनाम कमण्डल आन्दोलन आया। आरक्षण के विरोध में आत्मदाह हुए परिणामस्वरूप वीपी सिंह सरकार गिर गयी। इसकेे बाद अब फिर अन्ना आन्दोलन आया इसमें भी संघ परिवार की परोक्ष/अपरोक्ष में पूरी भूमिका रही लेकिन जैसे ही आन्दोलन सफलता तक पहुंचा और अगले राजनीतिक स्वरूप की चर्चा उठी तोे आन्दोलन बिखर गया। अन्ना किनारे हो गये असफल होकर। लेकिन केन्द्र की सत्ता भाजपा को मिल गयी और दिल्ली केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को। यह सारी पृष्ठभूमि यह स्पष्ट करती है कि जब भी कांग्रेस के खिलाफ आन्दोलन हुए उसमें संघ परिवार की भूमिका अपरोक्ष में सर्वेसर्वा की रही। लेकिन आन्दोलनों की सफलता के बाद जो भी राजनीतिक प्रतिफल सामने आये उन्हें संघ परिवार ने ज्यादा देर तक चलने नही दिया।
ऐसे में आज कांग्रेस और भाजपा का राजनीतिक विकल्प बनने का जो भी प्रयास करेगा उसे यह समझना होगा कि उसके विरोध में अब यह दोनों दल एक साथ खड़े हो जायेंगे। कांग्रेस को भ्रष्टाचार का पर्याय प्रचारित- प्रसारित करने में एक लम्बा समय लगा है और भ्रष्टचार के कारण ही आज कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई है। कांग्रेस मुक्त भारत का नारा इसी भ्रष्टाचार पर टिका है। ऐसे में भाजपा/संघ का मुकाबला करने के लिये उन्ही के बराबर की ठोस विचारधारा का विकल्प तैयार करना होगा। आज आम आदमी पार्टी के पास ठोस विचारधारा की कमी है। उसके सगंठन में हर कहीं संघ भाजपा से जुड़े लोग मिल जायेंगे जो अन्ना आन्दोलन में शामिल रहने के कारण ‘आप’ पर अपना पहला अधिकार मानते हैं। आप नेतृत्व को इस बारे सजग रहने की आवश्यकता है। इसी के साथ यह हकीकत भी माननी होगी कि हर राज्य में दिल्ली का माॅडल लागू नही होगा क्योंकि दिल्ली केन्द्रिय राजधानी है यहां पर देश के हर कोने का व्यक्ति सक्रिय राजनीति कर सकता है। किसी भी प्रदेश का मूल निवासी यहां का विधायक/सांसद/ मन्त्री और पार्टी प्रमुख हो सकता है। लेकिन अन्य राज्यों में नही। अभी तक पार्टी अन्य राज्यों में अपनी सशक्त इकाईयां ही खड़ी नहीं कर पायी है। संयोगवश ‘आप’ का केन्द्रिय नेतृत्व अधिकांश में एनजीओ संस्कृति से जुड़ा रहा है। लेकिन राजनीतिक संगठन एनजीओ की तर्ज पर नहीं चलाया जा सकता। राज्य इकाईयों के लिये राज्यों से ही लोग तलाशने होंगे। फिर संगठन का सेाशल मीडिया के माध्यम से प्रचार प्रसार नही किया जा सकता जबकि आप के कई नेता केवल सोशल मीडिया में ही दो दो लाईनो के ब्यान से प्रदेश के नेता होने का भ्रम पाले हुए है। ऐसे में आज ‘आप’ को इस संकट के दौर में इन व्यवहारिक पक्षों को सामने रखना बहुत आवश्यक है। बहुत संभव है कि ‘आप’ को दिल्ली नगर निगम के चुनावों में हार देखनी पड़े और उसके बाद चुनाव आयोग कुछ विधायकों पर भी अपना चाबुक चला दे। इस लिये सरकार से ज्यादा इस समय संगठन को बिखरने से बचाना ज्यादा आवश्यक है क्योंकि आप का बिखरना/टूटना एक राष्ट्रीय नुकसान होगा।

ईवीएम पर उठते सवाल

 पिछले दिनों मनीपुर, गोवा, उत्तराखण्ड, पंजाब और उत्तर प्रदेश की विधानसभाओं के चुनाव संपन्न हुए है। इन राज्यों में पंजाब को छोड़कर अन्य सभी राज्यों में भाजपा की सरकारें बनी है। उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी को मिली करारी हार पर मायावती ने इसके लिये वोटिंग मशीनों की विश्वनीयता पर सवाल उठाते हुए इनमें मैनुपुलेशन होने का आरोप लगाया है। मायावती की पार्टी ने इस आश्य की सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका भी दायर कर दी है। मायावती के बाद आम आदमी पार्टी ने भी इसी तरह का आरोप लगाया है और चुनाव आयोग के पास अपना
प्रतिवेदन दायर किया है। इसी बीच मध्यप्रदेश के भिण्ड में एक विधानसभा चुनाव के लिये ईवीएम मशीन का एक अधिकारिक परीक्षण किया गया और इसमें यह सन्देह और पुख्ता हो गया कि मशीन में मैनुपुलेशन की जा सकती है। भिण्ड का मुद्दा राज्यसभा में उठा है। लेकिन इस पर नियम 267 के तहत चर्चा की अनुमति नहीं दी गयी। राज्यसभा में यह मुद्दा मध्यप्रदेश से ताल्लुक रखने वाले कांग्रेस सांसद दिग्विजय सिंह ने उठाया था। ईवीएम मशीन पर मैनुपुलेशन की संभावना के सवाल उठना लोकतन्त्र के लिये बहुत घातक हो सकता है। यह मामला इस समय सर्वोच्च न्यायालय के पास लंबित है। इसलिये इस पर अदालत के फैसलें का इन्तजार करना आवश्यक है।

ईवीएम मशीन पहली बार 1982 में प्रयोग के तौर पर चुनाव आयोग ने इस्तेमाल की थी उस समय इसकी वैधानिकता पर सवाल उठे और इसके लिए जनप्रतिनिधि अधिनियम 1951 में संशोधन कर धारा 61 A जोड़ी गयी इसी के साथ एक चुनाव सुधार कमेटी का आयोग ने गठन किया। इस विशेषज्ञ कमेटी ने अप्रैल 1990 में अपनी सिफारिशें आयोग को दी। इसके बाद वर्ष 2000 से इसका प्रयोग राज्यों की विधानसभाओं के चुनावों और लोकसभा के 2004, 2009, और 2014 के आम चुनावों में हुआ है। लेकिन हर बार इस पर स्वाल भी उठते रहे हैं। 2001 में मद्रास उच्च न्यायालय, 2002 में केरल उच्च न्यायालय और 2004 में मुंबई, दिल्ली और कर्नाटक उच्च न्यायालय में इस संद्धर्भ में याचिकाएं आयी है। इसके बाद जुलाई 2011 में सर्वोच्च न्यायालय में राजेन्द्र सत्यनारायण गिल्डा की जनहित याचिका आयी और शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग को इसेs Modify करने के निर्देश दिये। इसके बाद जनवरी 2012 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने डा. सुब्रहमन्यमस्वामी की 2009 की याचिका पर फैसला सुनाते हुए कहा कि "EVM  & are temper proof" डा.स्वामी इस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में चले गये। इस पर चुनाव आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय में कहा कि VVPAT सिस्टम को लेकर ट्रायल चल रहा है और इसकी स्टे्टस रिर्पोट जनवरी 2013 में अदालत मे पेश की जायेगी। इस पर अक्तूबर 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला देते हुए कहा कि Election Commission of India will use VVPAT alongwith EVMS in a phased manner and the full completion should be achieved by 2019 इस परिदृष्य मे यह स्पष्ट हो जाता है कि ईवीएम मशीन की विश्वसनीयता पर पहले ही दिन से सवाल उठते आ रहे हैं। अदालतों ने भी हर बार इसमें सुधार की संभावनाओं को मानते हुए इसमें VVPAT सिस्टम लागू करने के निर्देश दिये है।
VVPAT सिस्टम में मशीन पर बटन दबाने के साथ ही उसकी कागज पर प्रिन्ट रिपोर्ट भी आ जायेगी और उससे वोट डालने वाले व्यक्ति को पता चल जायेगा कि जिसके लिये उसने बटन दबाया था उसी के पक्ष मे उसका वोट पड़ा है। इस सिस्टम से विश्वसनीयता पर उठने वाले सवालों को विराम मिल जायेगा। लेकिन चुनाव आयोग को इसके लिये 3174 करोड़ रूपये की आवश्यकता है चुनाव आयोग ने शीर्ष अदालत से यह कहा है कि जब सरकार यह पैसा दे देगी तो उसके बाद तीस माह के अन्दर ही इस सिस्टम को सभी जगह लागू कर पायेगा। इस समय आयोग के पास 53500 मशीने इस VVPAT सिस्टम से लैस है। अभी तक 255 विधानसभा क्षेत्रों और नौ संसदीय क्षेत्रों मेें इन मशीनों का उपयोग किया जा चुका है। आज पंजाब के चुनावों को लेकर आम आदमी पार्टी ने सवाल उठाये है। पंजाब में 117 और उत्तराखण्ड में 70 विधानसभा सीटें है। ऐसे में चुनाव आयोग इन राज्यों में बड़ी सहजता से इन VVPAT सिस्टम मशीनों का उपयोग कर सकता था क्योंकि वह 255 विधानसभा क्षेत्रों में पहले ही इनका उपयोग कर चुका है। ऐसे में आने वाले समय में जब गुजरात और हिमाचल विधानसभा के चूनाव आयेंगे तब इन राज्यों में इन मशीनों का उपयोग करके विश्वसनीयता पर उठने वाले सवालों को विराम मिल सकेगा। क्योंकि इस समय भापजा ने देश को कांग्रेस मुक्त करने का जो राजनीतिक अभियान छेड़ रखा है उसमें इस तरह के आरोप लगना स्वाभाविक है। इसमें केन्द्र सरकार को भी अपनी विश्वनीयता बनाये रखने के लिये चुनाव आयोग को इतना धन देना ही होगा। यदि अभी इतने धन का प्रावधान नही किया जाता है तो 2019 के चुनावों में भी इस सिस्टम का लागू हो पाना संदिग्ध हो जायेगा और सरकार की नीयत पर सवाल उठेंगे जो देशहित में नही होंगे।

चुनाव आयोग से अपेक्षाएं

बलदेव शर्मा 

चुनाव आयोग ने कांग्रेस को अपने संगठनात्मक चुनाव पूरा करने के लिये छः माह का समय दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग से पूछा है कि पूर्व विधायकों/सांसदो को मिल रही पैन्शन को बन्द किये जाने की गुहार को लेकर जो याचिका आयी है उस पर आयोग की क्या राय है। दागी छवि के जन प्रतिनिधियों को चुनाव से अयोग्य घोषित कर दिया जाये यह आग्रह एक याचिका के जवाब में सर्वोच्च न्यायालय से आयोग ने किया है। यह सारे प्रश्न महत्वपूर्ण हैं और सभी राजनीतिक स्वच्छता के लिये आवश्यक हैं। इस समय हमारे चुनाव पंचायत से लेकर संसद तक इतने महंगे हो गये हैं कि आम आदमी चुनाव लड़ने की सोच ही नहीं सकता। चुनाव आयोग ने ही विधानसभा से लेकर संसद तक चुनाव खर्च की सीमा इतनी बढ़ा दी है कि कोई भी सामान्य व्यक्ति चुनाव के लिये इतना सफेद धन खर्च नहीं कर सकता। इन चुनावों में एक-एक प्रत्याशी करोड़ो खर्च कर रहा है लेकिन आयोग के पास जो ब्योरा इस खर्च का दायर किया जाता है वह एकदम साफ झूठ होता है। सारा खर्च संबधित राजनीतिक दल के नाम डाल दिया जाता है और पार्टी के लिये खर्च की कोई सीमा है नहीं। पार्टीयों के लिये दिये जा रहे चन्दे की जो सीमा बीस हजार से घटाकर दो हजार करने की बात की गयी थी उसे फिर संशोधित करके पहले से भी ज्यादा सरल कर दिया गया है। अब किसी भी पंजीकृत कंपनी से पार्टी कितना भी चन्दा ले सकती है। उस पर कंपनी से कोई स्त्रोत नही पूछा जायेगा। कंपनी में राजनेता का ही काला धन निवेश होकर चन्दे के रूप में वापिस आ रहा है इसको चैक करने का कोई प्रावधान नही है। कुल मिलाकर धन के मामले में पार्टीयां फिर निरंकुश हो गयी हैं और व्यक्ति के पास चुनाव लड़ने के लिये पार्टी के मंच का सहारा लेना ही एक विकल्प रह गया है।
ऐसे में जब तक चुनाव को खर्च मुक्त नही किया जायेगा तब तक देश की व्यवस्था में सुधार का हर प्रयास बेमानी हो जायेगा। राजनीतिक दलों में आन्तरिक लोकतन्त्र हो उसके लिये संगठन में चुनाव होना आवश्यक है। लेकिन आज देश में कितने ही राजनीतिक दल हैं जो केवल एक परिवार के ही होकर रह गये हैं और फिर सत्तासीन भी रह चुके हैं यह सब पैसे के कारण हुआ है। भाजपा जैसे दल में चयन के स्थान पर मनोनयन का चलन है और यह भी अपरोक्ष परिवारवाद की ही संज्ञा में आता है क्योंकि यह संघ परिवार के निर्देशों पर होता है। इसी धन और परिवारवाद के कारण ही आज देश का कोई भी दल बाहुबलियों से मुक्त नही है। हर दल चुनाव में इन्हें ज्यादा -से-ज्यादा टिकट देने की होड़ में रहता है यह हर दिये जा रहे टिकटों के बढ़ते आकंड़ो से प्रमाणित हो रहा है। पूर्व विधायकों/सांसदो को पैंन्शन देने के मामले में वित्त मन्त्री अरूण जेटली ने स्पष्ट कर दिया है कि यह तय करना संसद का अधिकार क्षेत्र है न्यायालय का नहीं। इसलिये चुनाव सुधारों की दिशा में उठाये जा रहे इन कदमों से भी कोई बड़ा लाभ होने की उम्मीद नहीं की जा सकती। क्योंकि आज के राजनीतिक दल एकदम कारपोरेट घरानों जैसे हो गये हैं। आज चुनाव प्रचार एक व्यवसाय बन गया है। चुनाव प्रचार के दौरान पार्टी के चुनाव घोषणा पत्र क्या हैं और उसमें किये गये वायदे कैसे पूरे होंगे, कितने समय में होंगे तथा उनके लिये धन की व्यवस्था कहां से होगी इसकी कोई चर्चा प्रचार के दौरान सामने आ ही नही पाती है। देश या प्रदेश की आर्थिक स्थिति क्या है इसकी कोई चर्चा उठ ही नही पाती है। जबकि किसी भी चुनाव प्रचार का मूल यही रहना चाहिये। आज देश अपरोक्ष में एक राजनीतिक निरंकुशता की ओर बढ़ता नज़र आ रहा है। क्योंकि इस समय राजनीति को धर्म और संस्कृति के सहारे बढ़ाया जा रहा है जो कि कालान्तर में घातक सिद्ध होगा।
इस स्थिति से बचने के लिये चुनाव सुधारों का ही माध्यम शेष बचा है। इसमें चुनाव प्रचार को खर्च से मुक्त करने का रास्ता खोजना पडे़गा। यदि ईमानदारी से इस दिशा में प्रयास किया जाये तो ऐसा किया जा सकता है। इसी के साथ आदर्श आचार संहिता की उल्लंघना को क्रिमिनल अपराध की संज्ञा दी जानी चाहिये। आज आचार संहिता की उल्लंघना पर केवल चुनाव याचिका दायर करने का ही विकल्प है और ऐसी याचिकाएं वर्षों तक लंबित रहती हैं। आचार संहिता की उल्लंघना का मामला दर्ज होते ही उस चुनाव क्षेत्र का चुनाव स्थगित कर देना चाहिये। चुनाव खर्च की सीमा पार्टीयों के लिये भी तय होनी चाहिये। पार्टीयों को अपनी नीतियों और कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार के लिये चुनावों की घोषणा के बाद कोई समय नहीं दिया जाना चाहिये क्योंकि पार्टीयों के पास चुनावों के बाद अगले चुनावों तक का जो समय रहता है उसी के बीच यह प्रचार-प्रसार होना चाहिये। चुनावों की घोषणा के बाद हर मतदाता के पास उम्मीदवार का पूरा प्रोफाईल और उसका चुनाव घोषणा पत्र हर मतदाता तक पहुचा दिया जाना चाहिये। चुनाव घोषणा पत्रा में राज्य की आर्थिक स्थिति और उस स्थिति में घोषणा पत्र में घोषित दावों को कैसे पूरा किया जायेगा इसका पूरा उल्लेख रहना अनिवार्य होना चाहिये। जब मतदाता के पास सारे उम्मीदवारों का यह विवरण पहुंच जायेगा तो वह उसकी समीक्षा करके सही उम्मीदवार का चयन कर पायेगा। इसी के साथ जनप्रतिनिधियों के जो अपराधिक मामले वर्षों से अदालतों में लंबित चल रहे हैं उनका निपटारा ट्रायल कोर्ट से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक प्राथमिकता के आधार पर एक तय समय सीमा के भीतर किये जाने का प्रावधान किया जाना चाहिये। आज चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय के बीच कुछ मामलों में जो एक संवाद की स्थिति उभरी है उसमें इन पक्षों पर भी विचार किये जाने की आवश्यकता है।

पांच राज्यों के जनादेश

बलदेव शर्मा

अभी हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद चार राज्यों में भाजपा और एक राज्य में कांग्रेस की सरकार बनी है। इस जनादेश को लेकर जो भी पूर्वानुमान लगाये जा रहे थे वह गलत सिद्ध नहीं हुए हैं। क्योंकि देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में जो बहुमत भाजपा को मिला है शायद इसकी उम्मीद भाजपा को भी नही रही होगी। यहां सपा और कांग्रेस के गठबन्धन को 50.5% वोट मिले हैं। कांग्रेस को 22.5%और सपा को 28% जबकि भाजपा को 41%। लेकिन भाजपा 41% वोट लेकर 325 सीटें जीत गयी और सपा कांग्रेस 50.50% वोट लेकर भी 50 के आंकडे़ को नहीं छू पायी। उत्तराखण्ड और गोवा में मुख्यमन्त्री तक हार गये। पंजाब और गोवा में आम आदमी पार्टी
की हार ने आप के राजनीतिक विकल्प होने की सारी सभांवनाओं को लम्बे समय तक के लिये अनिश्चिता के गर्व में डाल दिया है। इस परिप्रेक्ष में यह जनादेश देश के राजनीतिक भविष्य की दिशा दशा तय करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा यह तय है। इसलिये इस जनादेश का विश्लेषण करने के लिये राजनीतिक पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर विचार करना आवश्यक होगा।

जो जनादेश आज आया है इसके बीज अन्ना आन्दोलन में बोये गये थे जिनकी पहली फसल लोकसभा चुनाव परिणामों के रूप में सामने और दूसरी अब। अन्ना आन्दोलन का मुख्य बिन्दु था भ्रष्टाचार समाप्त करना और इसके लिये व्यवस्था परिवर्तन को इसका साधन बताया गया। लेकिन जब व्यवस्था परिवर्तन के लिये राजनीतिक मंच के गठन करने की बात उठी तो पूरा अन्ना आन्दोलन विखर गया। आन्दोलन के संचालको और आयोजकों में उभरे मतभदों से खिन्न होकर अन्ना ने ममता के सहारे अलग मंच का जो प्रयास किया वह शक्ल लेने  से पहले ही ध्वस्त हो गया। अन्ना की यह असफलता स्वभाविक थी या प्रायोजित यह प्रश्न आज तक अनुतरित है। लेकिन इस आन्दोलन का बड़ा फल मोदी और भाजपा को मिल गया तथा छोटा फल केजरीवाल को। मोदी और भाजपा के पास संघ परिवार की वैचारिक जमीन थी। केन्द्र में सरकार बनने के बाद इस जमीन की ऊवर्श  शक्ति को और बढ़ाने के लिये मोदी के मन्त्रीयों ने अपने भाषणों में अपनी सोच का खूलकर प्रचार जारी रखा। भले ही मोदी ने राजधर्म निभाते हुए अपने मन्त्रीयों को संयम बरतने की सलाह दी। लेकिन इस सलाह का संज्ञान लेने की बजाये यह लोग अपने कर्म में लगे रहे और इस कर्म का परिणाम उत्तर प्रदेश के जनादेश के रूप में सामने है। संघ परिवार की वैचारिक सोच स्पष्ट है वह भारत को हिन्दु राष्ट्र देखना और बनाना चाहते हैं। इसका माध्यम सता होता है और सता उसको मिल गयी है। हिन्दु राष्ट्र की अवाधारणा देश की वर्तमान परिस्थितियों में कितनी प्रसांगिक और वांच्छित हो सकती है उसके लिये संघ की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विचारधारा को समझना आवश्यक होगा। इस विचारधारा को  समझे बिना इस पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि यह स्वीकार्य है या नही। संघ और भाजपा अपने ऐजैन्डा को लेकर पूरी तरह स्पष्ट है और उसपर उनका काम जारी है क्योंकि उनको यह अवसर देश की जनता ने अपने प्रचण्ड जनादेश के माध्यम से दिया है।
 दूसरी ओर कांग्रेस के पास जो वैचारिक धरोहर थी उस पर भ्रष्टाचार की दीमक इतनी हावि हो गयी है कि भ्रष्टाचार कांग्रेस के संगठन से बड़ा होकर देश की जनता के सामने है। कांग्रेस शासन पर राज्यों से लेकर केन्द्र तक भ्रष्टाचार के जो आरोप लगे हैं उनका इतना प्रचार प्रयास हो चुका है कि कांग्रेस अब भ्रष्टाचार का पर्याय मानी जा रही है। कांग्रेस नेतृत्व इतना कमजोर और लाचार हो गया है कि भ्रष्टाचार के एक भी आरोपी के खिलाफ संगठन के स्तर पर कभी कोई कारवाई नहीं हो पायी है। सारे आरोपों और आरोपीयों को अदालत के सिर पर छोड़ दिया जाता है और अदालतों से ऐसे मामलों पर दशकों तक फैसले नही आते हैं। लेकिन जब एक सीमा के बाद यह आरोप जन चर्चा का रूप ले लेते हैं तो उसका परिणाम यह चुनाव नतीजे बनते हैं। कांग्रेस जब तक संगठन के स्तर पर अपने भीतर फैले भष्टाचार से लड़ने का फैसला नही लेगी तब तक उसका उभरना संभव नही होगा।
आम आदमी पार्टी की केजरीवाल सरकार अन्ना आन्दोलन का प्रतिफल है। लेकिन आज पंजाब और गोवा की हार संगठन और दिल्ली सरकार का प्रतिफल है। संगठन के स्तर पर आम आदमी पार्टी अभी तक राज्यों में अपनी ईकाईयां स्थापित नही कर पायी है। क्योंकि विचारधारा के नाम पर आप कुछ सामने नही ला पायी है। स्वराज की जो कार्यशैली परिभाषित की जा रही है वह एक स्वतन्त्र राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक चिन्तन का स्तर नही ले पा रही है। भ्रष्टचार के खिलाफ लड़ना और  भ्रष्टाचार के वैचारिक धरातल पर चोट करना दो अलग-अलग विषय हैं। आज भाजपा और संघ का विकल्प होने के लिये उसी के बराबर विचारधारा को बहस में लाना होगा और इस बहस के लिये एक स्वस्थ विचारधारा तैयार करनी होगी। क्योंकि यह देश वाम विचारधारा को आज तक स्वीकार नही कर पाया है। बल्कि यह कहना ज्यादा प्रसांगिक होगा कि यदि वामपंथी विचारधारा चर्चा के लिये उपलब्ध न होगी तो शायद दक्षिण पंथी विचारधारा आज सता के इस मुकाम तक न पहुंच पाती।

सवालों में घिरती न्यायपालिका

शिमला/शैल। अरूणाचल के पूर्व मुख्यमन्त्री स्व. कालीखो पुल ने अपनी मौत से पहले साठ पन्नों का विस्तृत और हस्ताक्षित नोट लिखा है। यह नोट लिखने के दूसरे ही दिन कालीखो पुल अपने आवास पर मृत पाये गये थे। उनकी मौत के बाद सामने आये इस नोट में उन्होने प्रदेश और देश की राजनीति मे फैले भ्रष्टाचार को पूरी बेबाकी से बेनकाब किया है। राजनीति में फैले भ्रष्टाचार के साथ न्यायपालिका कैसे परोक्ष/अपरोक्ष में सहयोगी और भागीदार बन गयी है इसका भी पूरा खुलासा इस नोट में है। पृल के इस नोट में लगाये गये गंभीर आरोपों पर कहीं से कोई जबाव नही आया है। राजनेंताओं पर आरोप लगना कोई नयी बात नहीं है। क्योंकि राजनीति में हर राजनीतिक दल की प्राय यही हकीकत है कि चुनावों में वह दागी छवि के लोगों को अपनी-अपनी पार्टी के टिकट पर चुनावों में उतारते ही हैं। इसी कारण आज संसद से लेकर राज्यों की विधानसभाओं तक गंभीर अपराधी छवि के लोग माननीय बनकर बैठे हैं। आपराधिक मामले झेल रहे जनप्रतिनिधियों के मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने अधीनस्थ अदालतों को ऐसे मामलों को एक वर्ष के भीतर निपटाने के निर्देश दे रखे हैं। लेकिन इन निर्देशों की कितनी अनुपालना हो पायी है इस बारे में कोई रिपोर्ट सामने नहीं आयी है क्योंकि इस पर अमल नही हुआ है। अधीनस्थ अदालतों में आज भी जनप्रतिनिधियों के मामले कई वर्षों से लंबित चले आ रहे हैं। हिमाचल में ऐसे लंबित चल रहे मामले सबके सामने हैं। इससे यह प्रामणित होता है कि भ्रष्टाचार के प्रति गंभीरता के आईने में न्यायपालिका और व्यवस्थापिका दोनों के ही चेहरे एक बराबर प्रश्नित हैं।
स्व. कालीखो पुल के बाद जस्टिस करनन का किस्सा सामने है। जस्टिस करनन और सर्वोच्च न्यायालय में आमने-सामने की स्थिति आ गयी है। जस्टिस करनन को मानहानि के मामले में किस तरह से पेश आना चाहिये? उनकी और सर्वोच्च न्यायालय की वैधानिक सीमायें क्या हैं इस बारे में आम आदमी को कुछ लेना देना नही है इस संबंध में जो भी कानून है उसकी अनुपालना की जानी चाहिये उसमें किसी का भी अनाधिकारिक दखल नही हो सकता। लेकिन जो आरोप जस्टिस करनन ने कुछ न्यायधीशों पर लगाये हैं आम आदमी की चिन्ता का विषय यह है। क्योंकि न्यायपालिका के शीर्ष न्यायधीशों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने से आम आदमी का न्यायपालिका पर विश्वास बनाये रखना कठिन हो जायेगा। जस्टिस करनन के आरोपों की ही तरह स्व. कालीखो पुल द्वारा लगाये गये आरोप हंै। इन दोनों के आरोपों को यदि इक्कठा रखकर देखा जाये तो स्थिति बेहद चिन्ताजनक हो जाती है। कालीखो पुल के आरोपों को वहां के राज्यपाल ने भी गंभीर माना था क्योंकि उनके पास स्थानीय एसडीएम की रिपोर्ट आ चुकी थी। केन्द्र के धन का दुरूपयोग किया गया है। केन्द्र के धन के दुरूपयोग के आरोपों पर मोदी सरकार का भी चुप्प बैठ जाना अपने में ही कई और सवाल खडे कर देता है।
स्व. कालीखो पुल और जस्टिस करनन ने जिन लोगों के खिलाफ आरोप लगाये हैं उनकी ओर से भी इस पर कोई प्रतिक्रिया नही आयी है। किसी ने भी यह कहने का साहस नही किया है कि यह आरोप गल्त हैं। जस्टिस करनन का यह कहना कि वह दलित हैं इसलिय उनके साथ यह ज्यादती की जा रही है यह तर्क किसी भी तरह स्वीकार्य नही हो सकता। क्योंकि वह दलित होने के बाद ही उच्च न्यायालय के न्यायधीश के पद तक पहुचे हैं। इसीलिये दलित होने का तर्क जायज नहीं ठहराया जा सकता। इसी के साथ जिस तरह वरिष्ठ अधिवक्ता जेठमलानी ने उनकी निन्दा की है उसे भी स्वीकारा नही जा सकता। किसका कानूनी अधिकार क्षेत्र कितना और क्या है? किसे क्या प्रक्रिया अपनानी चाहिये थी क्या नहीं? यह सारे प्रश्न आरोपों की गंभीरता के आगे बौने पड़ जाते हैं। आम आदमी इन आरोपों की एक निष्पक्ष जांच चाहता है। जिससे आरोपों की सत्यता प्रमाणित हो सके। ऐसे आरोपों की जांच के लिये वही प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिये जो आम आदमी के लिये अपनायी जाती है। अर्थात जांच ऐजैन्सी में विधिवत मामला दर्ज करके जांच शुरू की जाये। स्व. कालीखो पुल ने जो आरोप लगाये हैं उनसे जुडे़ सारे प्रमाण वहां राज्य में मौजूद हैं। स्व. पुल के नोट को डांईंग डक्लारेशन मानकर जांच की जानी चाहिये। जस्टिस करनन ने जिनके खिलाफ आरोप लगाये हैं उनसे आरोपों के बारे में पूरी गंभीरता से पूछा जाना चाहिये और जस्टिस करनन तथा आरोपीयों से आमने-सामने सवाल-जबाव होने चाहिये। यदि न्यायपालिका पर विश्वास बनाये रखना है तो यह अति आवश्यक है कि आम आदमी के सामने सच्चाई आये। यदि ऐसा न हुआ तो अराजकता का एक ऐसा दौर शुरू होगा जिसकी कल्पना करना भी कठिन होगा।

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