Thursday, 16 April 2026
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चुनाव सुधारों को टालना घातक होगा

 शिमला/बलदेव शर्मा  अभी कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। इन राज्यों में इस समय उत्तराखण्ड में कांग्रेस, पंजाब में अकाली -भाजपा और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी सत्ता में है। इन चुनावों में यह सभी दल फिर से चुनाव मैदान में कहीं सीधे तो कहीं गठबन्धन की शक्ल मे इनके अतिरिक्त बसपा और ‘‘आप’’ भी चुनाव में है। बसपा यूपी में पहले भी सरकार चला चुकी है और आप दिल्ली में सरकार चला रही है। भाजपा के पास इस समय केन्द्र सरकार है तो कांग्रेस के पास इससे पहले रह चुकी है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि इन सभी दलों को सरकार चलाने का अनुभव है और सभी को सरकारों की वित्तिय स्थिति तथा जनता की समस्याओं और अपेक्षाओं का भी ज्ञान है। इसी के साथ यह भी एक सच है कि सभी राज्य सरकारें कर्ज के बोझ तले भी है और यह कर्ज हर वर्ष घटने की बजाये बढ़ता ही जा रहा है सभी को राज्यों के संसाधनों का भी पता है। लेकिन आज यदि इन सभी दलों के वर्तमान और पूर्व के चुनाव घोषणा पत्रों का एक निष्पक्ष आकलन किया जाये तो जो तस्वीर उभरती है वह एकदम चिन्ताजनक और निराशाजनक दिखती है। क्योंकि किसी के भी घोषणापत्र में संसाधनों का जिक्र नही है। किसी ने भी संबंधित राज्य की आर्थिक और वित्तिय स्थिति का कोई उल्लेख नही किया है। सभी ने जनता को अधिक से अधिक मुफत लाभ देने का वायदा किया है बल्कि इन घोषणापत्रों को देखकर तो यह सवाल भी उठता है कि जो वायदे इस बार किये जा रहें है क्या जनता की यह आवश्यकताएं अभी पैदा हुई है? जब यह दल सरकार चला रहे थे क्या तब जनता को इस सबकी आवश्यकता नही थी? कुल मिलाकर सभी दलों के घोषणपत्रों को प्रलोभनों का पिटारा और मतदाताओं को खरीदने का प्रयास करार दिया जा सकता हैं। कहीं भी यह नही बताया गया है कि इन वायदों को पूरा करने के लिये साधन कहां से आयेंगे? यह वायदा नहीं किया गया है कि जनता पर परोक्ष/अपरोक्ष में कोई नया टैक्स नही लगाया जायेगा और न ही सरकार पर कर्ज का बोझ डाला जायेगा। यदि ईमानदारी से आंकलन किया जाये तो सभी के घोषणापत्र आचार संहिता का उल्लघंन करार दिये जा सकते है।
लेकिन हमारा चुनाव आयोग इस बुनियादी पक्ष की ओर एकदम आंख बन्द करके बैठा हुआ है। हर बार चुनाव खर्च की सीमा बढ़ा दी जाती है और इसमें भी राजनीतिक दलों पर तो कोई सीमा है ही नही। राजनीतिक दलों की आय के स्त्रोत कितने वैध हैं और कितने अवैध इसका खुलासा सामने आ चुका है। राजनीतिक दलों की 69 प्रतिशत आय अज्ञात स्त्रोतों से है जिसे सीधे-सीधे अवैध करार दिया जा सकता है। यदि किसी व्यक्ति के पास इतनी आय अज्ञात स्त्रोतांे से हो तो उसके खिलाफ आपराधिक मामला बन जाता है और सज़ा मिलती है। लेकिन राजनीतिक दलों को लेकर न्यायपालिका और चुनाव आयोग दोनों ही एकदम पंगु होकर बैठे हुए है। क्योंकि यह घोषणापत्र जनता का ऐजैन्डा न होकर इन दलों की सत्ता में वापसी सुनिश्चित करने का ऐजैन्डा होकर रह गये है। गरीबों को कुछ चीजे सस्ते में या मुफत उपलब्ध करवा कर एक निश्चित वोट बैंक को अपने पक्ष में करने का प्रयास करना स्वस्थ लोकतन्त्र का मानक नही माना जा सकता। चुनावों की यह वर्तमान व्यवस्था धीरे - धीरे अपराधियों, धनबलियों और बाहुबलियों को शासन के शीर्ष पर बैठाने का साधन होकर रह गयी है। आज राजनीतिक दल पेशेवर चुनाव प्रबन्धकों और प्रचारको के रोजगार का एक बड़ा स्त्रोत बन कर रह गये है। राजनीतिक दल कारपोरेट संस्कृृति का पर्याय बनकर रह गये हैं। कोई भी दल राजनीति में बढते अपराधीकरण को लेकर अपने घोषणापत्रों में एक शब्द तक नही कह पाया है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि आज राजनीतिक दलों का एक मात्र सरोकार सत्ता में बने रहने के अतिरिक्त और कुछ नही रह गया है। ऐसे में यह सोचना पडे़गा कि यदि ही चुनावी व्यवस्था चलता रही तो निकट भविष्य में स्थितियां कहां से कहां पहुंच जायेगी।
इस परिदृश्य में यह आवश्यक हो जाता है। कि समय रहते ही चुनावी व्यवस्था और इससे वांच्छित सुधारों को लेकर एक सर्वाजनिक बहस शुरू की जायेे। राजनीतिक दलों और जनता के बीच एक सशक्त संवाद कैसे स्थापित हो सकता है। इसके लिये कौन सा मंच कारगर हो सकता है? इस पर विचार किये जाने की आवश्यकता है। चुनाव को धनबल और बाहुबल से कैसे मुक्त रखा जाये? क्योंकि इस वक्त जिस तरह का चुनाव प्रचार किया जा रहा है उसमें तो जनता को सोचने विचारने का समय ही नहीं मिल पाता है। आज की व्यवस्था में राजनीतिक दल और राजनेता को सुनने की व्यवस्था तो है। परन्तु उसे सुनाने और उससे पूछने की कोई तय व्यवस्था नही है। आज माॅडल आचार संहिता तो है परन्तु उसकी अवहेलना पर दण्डनीय अपराध दर्ज हो पाने का प्रावधान नही है इस पर केवल चुनाव परिणाम के बाद चुनाव याचिका दायर करने का ही प्रावधान है। इसलिये आज आवश्वकता है कि जनता और रानीतिक दल तथा राजनेता के बीच अधिकाधिक संवाद की व्यवस्था सुनिश्चित की जाये। क्योंकि सैद्धान्तिक रूप से तो चुनाव प्रचार का अर्थ ही मतदाताओं के साथ सार्थक संवाद की स्थापना है और यह संवाद लगभग बिना किसी बड़े खर्च से स्थापित किया जा सकता है। इसके लियेे सरकार, चुनाव आयोग और न्यायपालिका तीनों को अपने- अपने स्तर पर प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता है। यदि समय रहते यह न हो पाया तो बहुत संभव है कि जनता स्वयं को ऐसा कुछ करने पर आ जाये जो अराजकता की सीमा तक जा पहुंचें।

दूसरी राजधानी की आवश्कता

शिमला/बलदेव शर्मा

मुख्यमन्त्री सिंह वीरभद्र सिंह ने धर्मशाला को दो माह के लिये प्रदेश की शीतकालीन राजधानी बनाने का ब्यान दिया है। मुख्यमंत्री का यह ब्यान हकीकत में बदल पाता है या नहीं यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। क्योंकि 2017 चुनावी वर्ष है और चुनावों के नाम पर राजनेता हर कुछ ब्यान देते हैं जिनका हकीकत से कोई वास्ता नही होता है। वीरभद्र सिंह ने भी यह ब्यान मन्त्रीमण्डल की बैठक के बाद दिया है और यह स्पष्ट नहीं किया है कि क्या इस पर मन्त्री परिषद में कोई विचार हुआ है या नही। क्योंकि यदि

ऐसा होना है तो इस पर मन्त्री परिषद में फैसला लिया जाना आवश्यक है। वीरभद्र अपने इस ब्यान पर कितने गंभीर हैं यह तो वही जानते हैं। लेकिन उनके इस ब्यान पर एक सार्वजनिक बहस की आवयकता है।
इस समय शिमला प्रदेश की राजधानी है और अंग्रेजी हकूमत ने जब शिमला बसाया था उस समय उनके दिमाग में इसे राजधानी नगर नही बल्कि एक पर्यटक स्थल बनाने का नक्शा था। एक पर्यटक स्थल के हिसाब से ही यहां के लिये बिजली पानी जैसी बुनियादी आवश्यकताओं का ढ़ाचा तैयार किया गया था। लेकिन जब से शिमला को एक नियमित रूप से राजधानी नगर बनाया गया है। तब से लेकर आज तक शिमला का जितना प्रसार हुआ उसके मुताबिक आज यहां की आवश्यक सेवाओं का सारा प्रबन्धन बुरी तरह से चरमरा गया है। इस बार की बर्फबारी ने इसका तल्ख अहसास भी करवा दिया है। इस वर्ष बर्फबारी में आवश्यक सेवाओं के तहस-नहस हो जाने के कारण हर प्रभावित व्यक्ति ने प्रशासन और शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व को कोसा है। बहुत संभव है कि इस स्थिति की व्यवहारिक गंभीरता को स्वीकारते हुए ही वीरभद्र ने यह ब्यान दिया हो। क्योंकि राजधानी नगर में जो भी होगा उसमें हर वर्ष नये निमार्ण होगें ही और उनके लिये आवश्यक सेवाओं का प्रबन्धन भी अनिवार्यता रहेगी ही। परन्तु आज शिमला नये निमार्णों और प्रबन्धनों का बोझ उठा पाने के लिये सक्षम नही रह गया है। आज शिमला के आधे से ज्यादा हिस्से में हर घर तक एेंबुलैन्स और फॉयर टैण्डर नहीं पहुंच पाता है। पार्किंग की समस्या इतनी विकराल हो चुकी है कि नयी गाड़ी खरीदने से पहले पार्किंग की उपलब्धता का प्रमाणपत्र देना होगा। इसके बिना नयी गाड़ी के पंजीकरण पर रोक है। शिमला में एक लम्बे अरसे से अवैध निर्माण होते आ रहे हैं जिनके लिये नौ बार रिरटैन्शन पॉलिसियां लायी गयी हैं। अब तो अवैध निमार्णों का प्रदेश उच्च न्यायालय तक ने कड़ा संज्ञान लिया है और अवैधता के लिये जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कारवाई करने तक निर्देश दे रखे हैं।
इस परिदृश्य में आज यदि निष्पक्षता से आकलन किया जाये तो व्यवहारिक रूप से शिमला को आगे लम्बे अरसे तक राजधानी बनाये रखना संभव नही होगा। इस समय शिमला स्मार्ट सिटी बनाने की कवायद की जा रही है। भारत सरकार भी इसके लिये खुला आर्थिक सहयोग दे रही है। स्मार्ट सिटी की अवधारणा पुराने शहरों पर लागू नही होती है। इस अवधारणा के तहत नया ही शहर बसाया जाना होता है। क्योंकि स्मार्ट सिटी के लिये हर घर तक सीवरेज ऐन्बुलैन्स और फायर टैण्डर का पहुंचना आवश्यक है। इसी के साथ हर घर की अपनी पार्किंग होनी चाहिये। इन बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता के बाद शिक्षा, स्वास्थ्य और शॉपिंग कम्पलैक्स आदि आते हैं। आज शिमला के हर घर को यह सुविधाएं उपलब्ध होना व्यवहारिक रूप से ही संभव नही है चाहे इसके लिये जितना भी निवेश क्यों न कर लिया जाये।
ऐसे में जब आज स्मार्ट सिटी बनाई जानी है तो उसके लिये यह बहुत आवश्यक और व्यवाहारिक होगा कि प्रदेश के किसी केन्द्रिय स्थल पर स्मार्ट सिटी की अवधारणा पर एक राजधानी नगर ही बसाने का प्रयास किया जाये। क्योंकि शिमला में बर्फ के मौसम में करीब तीन महीने और बरसात में दो महीने के लिये सामान्य जनजीवन में बाधा आती ही है। इससे पूरा शासन और प्रशासन प्रभावित होता है। आज शिमला में आवश्यक सेवाओं को मैन्टेन करने के लिये ही प्रतिवर्ष सैकड़ों करोड़ खर्च हो रहे हैं जो कि पूरी तरह से अनुत्पादिक खर्चा है। इसलिये आज सारे
दूसरी राजधानी की आवश्कता
राजनीतिक और उनके नेतृत्व को दलगत हितों से ऊपर उठकर इस पर विचार करना चाहिये। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने चाहे जिस भी मंशा से सर्दीयों के दो माह के लिये धर्मशाला शीतकालीन राजधानी बनाने की बात की हो लेकिन उसमें अपरोक्ष में यह स्वीकार्यता तो है ही कि शीतकाल के लिये राजधानी के रूप में शिमला सक्षम नहीं रह गया है। धर्मशाला में जब विधानसभा भवन बनाया गया था तब उसके पीछे शुद्ध रूप से राजनीतिक स्वार्थ रहे हैं अन्यथा जिस भवन का वर्ष में इस्तेमाल ही एक सप्ताह भर होना है उसके लिये इतना बड़ा निवेश किया जाना कतई जायज नही ठहराया जा सकता वह भी तब जब सरकार को हर वर्ष एक हजार करोड़ से अधिक का कर्ज लेना पड़ रहा हो। इसलिये मेरा सुझाव है कि अब जब स्वंय वीरभद्र सिंह ने यह बात छेड़ दी है तो उसे आगे बढ़ाने के लिये सबको आगे आना चाहिये। अन्यथा आने वाली पीढीयां वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व को बराबर कोसती रहेंगी।

दूसरी राजधानी की आवश्कता

शिमला/बलदेव शर्मा मुख्यमन्त्री सिंह वीरभद्र सिंह ने धर्मशाला को दो माह के लिये प्रदेश की शीतकालीन राजधानी बनाने का ब्यान दिया है। मुख्यमंत्री का यह ब्यान हकीकत में बदल पाता है या नहीं यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। क्योंकि 2017 चुनावी वर्ष है और चुनावों के नाम पर राजनेता हर कुछ ब्यान देते हैं जिनका हकीकत से कोई वास्ता नही होता है। वीरभद्र सिंह ने भी यह ब्यान मन्त्रीमण्डल की बैठक के बाद दिया है और यह स्पष्ट नहीं किया है कि क्या इस पर मन्त्री परिषद में कोई विचार हुआ है या नही। क्योंकि यदि ऐसा होना है तो इस पर मन्त्री परिषद में फैसला लिया जाना आवश्यक है। वीरभद्र अपने इस ब्यान पर कितने गंभीर हैं यह तो वही जानते हैं। लेकिन उनके इस ब्यान पर एक सार्वजनिक बहस की आवयकता है।
इस समय शिमला प्रदेश की राजधानी है और अंग्रेजी हकूमत ने जब शिमला बसाया था उस समय उनके दिमाग में इसे राजधानी नगर नही बल्कि एक पर्यटक स्थल बनाने का नक्शा था। एक पर्यटक स्थल के हिसाब से ही यहां के लिये बिजली पानी जैसी बुनियादी आवश्यकताओं का ढ़ाचा तैयार किया गया था। लेकिन जब से शिमला को एक नियमित रूप से राजधानी नगर बनाया गया है। तब से लेकर आज तक शिमला का जितना प्रसार हुआ उसके मुताबिक आज यहां की आवश्यक सेवाओं का सारा प्रबन्धन बुरी तरह से चरमरा गया है। इस बार की बर्फबारी ने इसका तल्ख अहसास भी करवा दिया है। इस वर्ष बर्फबारी में आवश्यक सेवाओं के तहस-नहस हो जाने के कारण हर प्रभावित व्यक्ति ने प्रशासन और शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व को कोसा है। बहुत संभव है कि इस स्थिति की व्यवहारिक गंभीरता को स्वीकारते हुए ही वीरभद्र ने यह ब्यान दिया हो। क्योंकि राजधानी नगर में जो भी होगा उसमें हर वर्ष नये निमार्ण होगें ही और उनके लिये आवश्यक सेवाओं का प्रबन्धन भी अनिवार्यता रहेगी ही। परन्तु आज शिमला नये निमार्णों और प्रबन्धनों का बोझ उठा पाने के लिये सक्षम नही रह गया है। आज शिमला के आधे से ज्यादा हिस्से में हर घर तक एेंबुलैन्स और फॉयर टैण्डर नहीं पहुंच पाता है। पार्किंग की समस्या इतनी विकराल हो चुकी है कि नयी गाड़ी खरीदने से पहले पार्किंग की उपलब्धता का प्रमाणपत्र देना होगा। इसके बिना नयी गाड़ी के पंजीकरण पर रोक है। शिमला में एक लम्बे अरसे से अवैध निर्माण होते आ रहे हैं जिनके लिये नौ बार रिरटैन्शन पॉलिसियां लायी गयी हैं। अब तो अवैध निमार्णों का प्रदेश उच्च न्यायालय तक ने कड़ा संज्ञान लिया है और अवैधता के लिये जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कारवाई करने तक निर्देश दे रखे हैं।
इस परिदृश्य में आज यदि निष्पक्षता से आकलन किया जाये तो व्यवहारिक रूप से शिमला को आगे लम्बे अरसे तक राजधानी बनाये रखना संभव नही होगा। इस समय शिमला स्मार्ट सिटी बनाने की कवायद की जा रही है। भारत सरकार भी इसके लिये खुला आर्थिक सहयोग दे रही है। स्मार्ट सिटी की अवधारणा पुराने शहरों पर लागू नही होती है। इस अवधारणा के तहत नया ही शहर बसाया जाना होता है। क्योंकि स्मार्ट सिटी के लिये हर घर तक सीवरेज ऐन्बुलैन्स और फायर टैण्डर का पहुंचना आवश्यक है। इसी के साथ हर घर की अपनी पार्किंग होनी चाहिये। इन बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता के बाद शिक्षा, स्वास्थ्य और शॉपिंग कम्पलैक्स आदि आते हैं। आज शिमला के हर घर को यह सुविधाएं उपलब्ध होना व्यवहारिक रूप से ही संभव नही है चाहे इसके लिये जितना भी निवेश क्यों न कर लिया जाये।
ऐसे में जब आज स्मार्ट सिटी बनाई जानी है तो उसके लिये यह बहुत आवश्यक और व्यवाहारिक होगा कि प्रदेश के किसी केन्द्रिय स्थल पर स्मार्ट सिटी की अवधारणा पर एक राजधानी नगर ही बसाने का प्रयास किया जाये। क्योंकि शिमला में बर्फ के मौसम में करीब तीन महीने और बरसात में दो महीने के लिये सामान्य जनजीवन में बाधा आती ही है। इससे पूरा शासन और प्रशासन प्रभावित होता है। आज शिमला में आवश्यक सेवाओं को मैन्टेन करने के लिये ही प्रतिवर्ष सैकड़ों करोड़ खर्च हो रहे हैं जो कि पूरी तरह से अनुत्पादिक खर्चा है। इसलिये आज सारे
दूसरी राजधानी की आवश्कता
राजनीतिक और उनके नेतृत्व को दलगत हितों से ऊपर उठकर इस पर विचार करना चाहिये। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने चाहे जिस भी मंशा से सर्दीयों के दो माह के लिये धर्मशाला शीतकालीन राजधानी बनाने की बात की हो लेकिन उसमें अपरोक्ष में यह स्वीकार्यता तो है ही कि शीतकाल के लिये राजधानी के रूप में शिमला सक्षम नहीं रह गया है। धर्मशाला में जब विधानसभा भवन बनाया गया था तब उसके पीछे शुद्ध रूप से राजनीतिक स्वार्थ रहे हैं अन्यथा जिस भवन का वर्ष में इस्तेमाल ही एक सप्ताह भर होना है उसके लिये इतना बड़ा निवेश किया जाना कतई जायज नही ठहराया जा सकता वह भी तब जब सरकार को हर वर्ष एक हजार करोड़ से अधिक का कर्ज लेना पड़ रहा हो। इसलिये मेरा सुझाव है कि अब जब स्वंय वीरभद्र सिंह ने यह बात छेड़ दी है तो उसे आगे बढ़ाने के लिये सबको आगे आना चाहिये। अन्यथा आने वाली पीढीयां वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व को बराबर कोसती रहेंगी।

क्या न्यायपालिका के भी सरोकार बदल रहे हैं

देश के पांच राज्यों में विधान सभाओं के चुनाव होने जा रहे है। इन चुनावों के परिदृश्य में यह सवाल फिर उभरा है कि जिन लोगों के खिलाफ आपराधिक मामले हैं क्या उन्हें चुनाव लड़ने की अनुमति होनी चाहिए या नही? चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय इस सवाल पर विचार कर रहे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए की समय रहते हीे इसका कोई जवाब जनता के सामने आ जायेगा। आज विधान सभाओं से लेकर देश की संसद तक आपराधिक मामले झेल रहे लोग जन प्रतिनिधि बनकर बैठे हुए हैं। क्योंकि यह लोग न्यायपालिका की बजायेे जनता की अदालत पर ज्यादा भरोसा करते हैं और जनता इन्हे विजयी बनाकर अपने प्रतिनिधि के रूप में आगे भेज देती है। इस जनता की अदालत में इनके आपराधिक मामलों पर कितनीे बहस होती है कैसे और कौन इनका पक्ष रखता है इसका कोई लेखा जोखा नहीं रहता है। केवल हार या जीत सामने आती है। इसी के कारण चुनावों में धन बल और बाहुबल के प्रभाव के आरोप लगते आ रहे हैं। यह चलन कब समाप्त होगा? कब व्यवस्थापिका को इन अपराधियों से निजात मिलेगी? 
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में यह निर्देश दे रखे हैं कि जिन जन प्रतिनिधियों के खिलाफ आपराधिक मामले आदलतों में लंबित हैं उनमें एक वर्ष के भीतर फैसला करना होगा। इसके लिये अगर दैनिक आधार पर भी सुनवाई करनी पडे़ तो की जानी चाहिये। इसको सुनिश्चित करने के लिये अतिरिक्त अदालतें तक स्थापित करने की व्यवस्था दी गयी थी। केन्द्र सरकार ने उस समय राज्य सरकारों को इस आश्य का पत्रा भी भेजा था। सर्वोच्च न्यायालय ने अधीनस्थ अदालतों को सख्त हिदायत दी थी कि एक वर्ष से अधिक का समय लगने की स्थिति में संबधित उच्च न्यायालय से इसकी अनुमति लेनी होगी। लेकिन क्या सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले की अनुपालना हो पायी है? आज भी जन प्रतिनिधियों के खिलाफ वर्षो से ट्रायल में मामले लंबित हैं। क्योंकि फैसले के बाद न तो सर्वोच्च न्यायालय ने और ही सरकार ने इस बारे में जानकारी लेने का प्रयास किया है। एक अन्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्देश दिये थे कि जांच ऐजैन्सी के पास आने वाली हर शिकायत पर एक सप्ताह के भीतर मामला दर्ज हो जाना चाहिये। यदि जांच अधिकारी को शिकायत पर कुछ प्रारम्भिक जांच करने की आवश्यकता लगे तो ऐसी जांच भी एक सप्ताह में पूरी करके शिकायत पर कारवाई करनी होगी। यदि जांच अधिकारी की राय में शिकायत पर मामला दर्ज करने का आधार न बनता हो तो इसकी वजह लिखित में रिकार्ड करनी होगी और शिकायतकर्ता को भी लिखित में इसकी जानकारी देनी होगी। सर्वोच्च न्यायालय ने ललिता कुमारी बनाम स्टेेट आॅफ उत्तर प्रदेश में स्पष्ट कहा है कि किसी भी शिकायत को बिना कारवाई के नहीं समाप्त किया जायेगा। 
सर्वोच्च न्यायालय के इन फैसलों से उम्मीद जगी थी कि अब व्यवस्थापिका में देर सवेर आपराधिक छवि के लोगों के घुसने पर रोक लग ही जायेगी। यह भी आस बंधी थी कि पुलिस तन्त्र उसके पास आने वाली शिकायतों को आसानी से रद्दी की टोकरी में डालकर ही नहीं निपटा देगा। लगा था कि ‘‘हर आदमी कानून के आगे बराबर है ’’ के वाक्य पर अमल होगा। लेकिन अभी सर्वोच्च न्यायालय ने प्रधानमन्त्री मोदी के खिलाफ आयी प्रशान्त भूषण की शिकायत के मामले को जिस तरह से निपटाया है उससे आम आदमी की उम्मीद को गहरा आघात लगा है। मोदी जब गुजरात के मुख्यमन्त्री थे उस समय उन्हें कुछ उद्योग घरानों से करीब 40 करोड़ मिलने का आरोप लगा है। इस आरोप की पुष्टि में उन्हें जो कुछ दस्तावेज मिले हैं उन पर आयकर विभाग का भी हवाला है। राहुल गांधी ने भी इन आरोपों को जनता के सामने रखा है। इन आरोपों से आज की राजनीति और आर्थिक परिस्थितियों से एक नयी बहस उठी है। क्योंकि इस समय देश में भ्रष्टाचार और कालाधन केन्द्रित मुद्दे बन चुके हंै। नोटंबदी से इस पर और भी ध्यान केन्द्रित हुआ है। राजनीतिक दल और नेता एक दूसरे के भ्रष्टाचार पर हमला बोलने लगे हैं और यह एक अच्छा संकेत है। इस वस्तु स्थिति में न्यायपालिका की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। क्योंकि देश की सबसे बड़ी जांच ऐजैन्सी सीबीआई को सर्वोच्च न्यायालय ही सरकार के पिंजरे का तोता करार दे चुका है। ऐसे में न्यायपालिका पर ही अन्तिम भरोसा है। यदि सर्वाच्च न्यायालय मोदी पर लगे इन आरोपों की जांच का मार्ग अपनी निगरानी में प्रशस्त कर देता तो इस भरोसे को और बल मिल जाता लेकिन इस जांच का रास्ता ही रोक दिये जाने से यह धारणा बनना और सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या बदले राजनीतिक परिदृश्य में न्यायपालिका के सरोकार भी बदल गये हैं?

क्या कालेधन का आंकड़ा जारी होगा

 शिमला/बलदेव शर्मा 

2014 के लोक सभा चुनावों की तैयारीयों के दौरान तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने उस समय एक स्ट्रैटेजिक एकशन कमेटी का गठन किया था। उस कमेटी का अध्यक्ष डा0 सुब्रमण्यम स्वामी को बनाया गया। उस कमेटी में डा0 स्वामी के अतिरिक्त रा, सैन्य खुफिया विभाग और आई वी आदि के सेवानिवृत अधिकारी शामिल थे। उस कमेटी ने यह पाया था कि देश में जाली नोट एक बड़ी समस्या बन चुके हैं और इस समस्या से निपटने के लिये नोटबंदी ही एक कारगर कदम हो सकता है। आज नोटबंदी का फैंसला उसी कमेटी की सिफारिशों का परिणाम है। नोटबंदी से पहले स्वैच्छा से आय घोषणा योजना लायी गयी। यह सारे कदम कालेधन और जाली करंसी के चलन को बन्द करने के लिये उठाये गये है। सिद्धान्त रूप से इस पर कोई दो राय नहीं हो सकती कि इन समस्याओं से निपटने के लिये इससे बेहतर और कोई कदम नहीं हो सकता था। राजनाथ सिंह द्वारा पार्टी के अन्दर ऐसी कमेटी का गठित किया जाना डा0 स्वामी ने एक साक्षात्कार में स्वीकार किया है। 

इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि पार्टी के भीतर जब इस तरह की चर्चा एक कमेटी के रूप मे रह चुकी है जिस पर अब अमल किया गया है। तो निश्चित है कि सरकार के पास इस फैंसले को सफल बनाने के प्रयास करने के लिये पर्याप्त समय था। लेकिन जिस ढंग से इस पर अमल किया गया है उससे यह भी स्पष्ट हो गया है कि इस दिशा मे तैयारियों में भारी कमी रही है। तैयारीयों की कमी ही विपक्ष का आरोप है और इसी कमी के कारण इसके घोषित वांच्छित परिणाम मिलने पर प्रश्न चिन्ह लग गया है। क्योंकि नयी करंसी अभी 8 नवम्बर के बाद बाजार में बैंकों में आयी है लेकिन इसी के साथ जाली करंसी फिर बाजार में आ गयी और पकड़ी गयी है। कालाधन पांच सौ और हजार के नोटों के रूप में लोगों ने जमा कर रखा था यह धारणा थी लेकिन आज नयी करंसी में भी करोड़ो लोगों के पास छापो में मिला है। कालेधन और जाली नोटों का आतंकी गतिविधियों मे प्रयोग होता था यह भी धारणा थी। नोटबंदी के बाद आंतकी घटनाओं में कुछ कमी अवश्य आयी है लेकिन यह कितने दिनों तक बनी रहेगी कहना कठिन है क्योंकि कालाधन और जाली नोट नयी करंसी में भी सामने आ गये है
नोटबंदी से पैदा होने वाली कठिनाईयां पचास दिन बाद समाप्त हो जायेंगी। इस वायदे के साथ प्रधानमन्त्री ने देश की जनता से पचास दिन का समय मांगा था। अब यह समय पूरा हो गया है लेकिन अभी भी बैंको से निकासी की सीमा चैबीस हजार ही है। यह सीमा कब बढ़ती है कितनी बढ़ती है आने वाले दिनों में ही पता चलेगा। मंहगाई में कितनी और कब कमी आती है अभी यह स्पष्ट नही हो पा रहा है क्योंकि नोटबंदी के बाद पैट्रोल और डीजल की कीमतें दो बार बढ़ गयी है। इसलिये कीमतों के कम होने की संभावना नही के बराबर है। लेकिन कालाधन धारकों के खिलाफ कारवाई का जो वायदा किया गया था उसके परिणाम कब सामने आते है अब जनता को इसका इन्तजार है। पांच सौ और एक हजार के नोटों के रूप में 15.3 लाख करोड़ की करंसी बाजार में होने के आंकडे़ सामने आये है। नोटबंदी की घोषणा के बाद 8 नवम्बर से इन नोटों का चलन बन्द हो गया। 8 नवम्बर के बाद बैकों से किसी को पुराना नोट जारी नहीं हुआ यह स्पष्ट है। इसके बाद पुराना नोट या तो बैक में आकर बदला गया या फिर खाते में जमा किया गया। 30 दिसमबर तक 15-16 लाख करोड़ के पुराने नोट बैंकों में वापिस आने का अनुमान है। इसका अधिकारिक आंकडा अभी तक जारी नही हुआ है। 27 दिसम्बर तक यह आंकडा 11.5 लाख करोड़ का रहा है। अब जब इतनी संख्या में यह पुराने नोट बैंक में वापिस आ गये हैं तो स्पष्ट है कि इसी में कालाधन और जाली नोट भी शामिल है जो आंकडे चर्चा मे है  उनके मुताबिक 1.5 से 2 लाख करोड़ के करीब जाली नोट है। यह आंकडे जो भी रहे हो इसमें महत्वपूर्ण यह है कि बैंको के पास जो भी पुराने नोट वापिस आये है वह सारा कैश लोगोें के घरों में मौजूद था। अब यह सारा पैसा वापिस आ गया है तो पहचान करना आसान होगा कि इसमें से कितना कालाधन है और किसका है। क्योंकि यह पैसा बैंक में तो था नहीं घरों में था। घरों में इतना कैश इसलिये था क्योंकि इस पर टैक्स नही दिया गया था और टैक्स न देने के कारण कालाधन था। किसके पास टैक्स की सीमा से ज्यादा पैसा था इसकी पहचान करके यदि उसे सजा नही दी जाती है तो फिर प्रधानमन्त्री पर से लोगों का विश्वास समाप्त हो जायेगा। क्योंकि जब कालेधन वाले कोे सजा ही नही मिलेगी तो फिर उसके खिलाफ कारवाई क्या हुई क्योंकि यदि सही मायनों में कालेधन को समाप्त करना है तो यह देश के सामने लाना होगा कि सोने और अचल संपत्ति के रूप मे किसके पास क्या है।
अब जो विधान सभा चुनाव होने जा रहे  है तो कालेधन पर की गयी कारवाई के असर की परीक्षा होगी। कौन सा राजनीतिक दल और कौन सा प्रत्याक्षी कितना खर्च करता है और यह खर्च कितना डिजिटल या चैक से होता है क्योंकि निकासी की सीमा चैबीस हजार रहने से एक माह में केवल 96000 ही बैंक से मिल सकता है चाहे वो पार्टी हो या प्रत्याक्षी और इतने से चुनाव नहीं लड़ा जा सकता है। यह चुनाव आयोग और सरकार के लिये भी कड़ी परीक्षा होगा।

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