शिमला/शैल। केन्द्र में मोदी सरकार को सत्ता में तीन वर्ष हो गये हैं यह तीन वर्ष का समय आकलन के लिये एक पर्याप्त आधार माना जा सकता है। इन तीन वर्षों में राजनीतिक पटल पर यह स्पष्ट हो गया है कि सरकार को इस मोर्चे पर महत्वपूर्ण सफलता मिली है क्योंकि दिल्ली, बिहार और पंजाब को छोड़कर अन्य सभी राज्यों में उसकी सरकारें बनी है जहां- जहां चुनाव हुए। इस राजनीतिक सफलता से यह माना जा रहा है कि निकट भविष्य में होने वाले विधानसभाओं के चुनावों में भी उसे सफलता मिलेगी। लेकिन क्या इस सफलता के सहारे वह 2019 के लोकसभा चुनावों में भी 2014 जैसी ही सफलता हासिल कर पायेगी यह कहना अभी जल्दबाजी होगी। क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले भ्रष्टाचार और कालेधन को लेकर पहले स्वामी रामदेव और फिर अन्ना हजारे के आन्दोलनों ने जो वातावरण खड़ा कर दिया था और उसके परिणामस्वरूप जो जन अपेक्षाएं सरकार को लेकर बन गयी थी वह अभी पूरी नहीं हो पायी हैं। बल्कि यह कहना ज्यादा संगत होगा कि उन अपेक्षाओं के संद्धर्भ अभी ठोस कुछ भी नहीं हुआ है। कालेधन के जो आंकडे़ उछाले गये थे तथा हर व्यक्ति के खाते जोे पैसा आने के स्वप्न दिखाये गये थे वह अभी ज़मीनी हकीकत से कोसों दूर है। अलबत्ता जो मंहगाई बेरोजगारी और भ्रष्टाचार इस सरकार के बनने से हपले जिस पायदान पर खड़ा था आज भी वहीं खड़ा है। इस दिशा में भाषणों में तो बड़ी उपलब्धियां परोसी जा रही हैं लेकिन वह हकीकत से बहुत दूर हैं।
इस दौरान सरकार ने जो कदम उठाये हैं उनमें जनधन योजना का नाम सबसे पहले आता है। इस योजना के माध्यम से आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की पहुंच बैंक खातों तक तो बन गयी है। जीरो बैलेनस से यह खाते खुल गये हैं लेकिन क्या इन खातो में लगातार ट्रांजैक्शन हो रही है? क्या इन गरीब लोगों की नियमित रूप से इन खातों में कुछ जमा करवाने की हैसियत बन पायी है? या यह खाते केवल सरकार से मिलने वाली सबसिडि का लेखाजोखा होकर ही रह गये हैं। इनमें से कितने खाते एनपीए हो गये हैं यदि बैंको की गणित से इन खातों को देखा जाये तो एक खाता खोलने के लिये कम से कम बीस रूपये का खर्च आया है और खाता जीरो बैलेन्स पर बरकरार है फिर नोटबंदी के दौरान इन्ही खातों का दुरूपयोग भी हुआ है इस तरह जनधन योजना को कोई उपलब्धि करार देना ज्यादा सही नहीं होगा। इस योजना के बाद सामाजिक सुरक्षा दायरे का विस्तार किया जाना दूसरी उपलब्धि कही जा रही है। इसके तहत प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना अटल पैन्शन योजना और प्रधानमंत्री जीवन ज्योती योजना की गिनती हो रही है। लेकिन ऐसी ही योजनाएं पहले यूपीए सरकार के कार्यकाल में चल रही थी अब इनका दायरा कुछ बढ़ा दिया गया है लेकिन इन योजनाओं के माध्यम से क्या लाभान्वित व्यक्ति की आय के स्त्रोत में कोई नियमित बढ़ौत्तरी सुनिश्चित हो पायी है क्या उसके लिये कोई रोजगार का स्थायी अवसर सृजित हो पाया है? दुर्भाग्य से ऐसा नही हो पाया है बल्कि वह सरकार पर ज्यादा आश्रित हो गया है। सामाजिक सुरक्षा के बाद अनुसूचित जाति, अनुसुचित जन जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के गौण उद्यमीयों के लिये मुद्रा बैंक के जरिये संस्थागत समर्थन का प्रबन्धन किया गया है। इसके लिये 1,37,449,27 करोड़ की धन राशी स्वीकृत की गयी है। इस योजना को भारतीय औद्यौगिक वित्त निगम लागू करेगा और निगम को इसके लिये 200 करोड़ जारी भी कर दिये गये हैं। इससे पूर्व भी यूपीए सरकार के समय में भी इन जातियों और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिये वित्त निगम कार्य कर रहे थे। बल्कि अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग तक गठित थे जिन्हे अब बन्द किया जा रहा है। इसलिये कुल मिलाकर आर्थिक संद्धर्भ में समाज के गरीब वर्गों के लिये यूपीए और एनडीए की येाजनाओं में कोई भी गुणात्मकता अन्तर अभी सामने नजर नही आ रहा है।
बल्कि काॅरपोरेट जगत के लिये यह सरकार ज्यादा उदार नजर आ रही है। जो बैंक अपने एनपीए के बोझ तले दबकर बन्द होने के कगार पर पंहुच गये थे उन्हें सरकार ने नये सिरे से जीवन दे दिया है। बड़े उद्योगपतियों के लिये आर्थिक पैकेज पहले की तर्ज पर ही आज भी जारी हैं बल्कि बढे़ है। आज एक तरह से अन्तर्राष्ट्रीय स्पर्धा में जाने की बात की जा रही है उसी के लिये येाजनाएं बन रही हैं। जबकि देश की जमीनी हकीकत यह है कि जहां सरकारें जीडीपी और प्रति व्यक्ति आय बढ़ने के दावे कर रही हैं उसके अनुपात में बीपीएल और सार्वजनिक ऋण के आंकडे ज्यादा बढ़ रहे हैं। अभी यह तथ्य सार्वजनिक चर्चा में नही आ पा रहे हैं लेकिन बहुत जल्द आम आदमी इस हकीकत से वाकिफ होने जा रहा है क्योंकि उसी रसोई का खर्च और स्कूल जाते बच्चे की फीस में कोई कमी आने की बजाये उसमें बढ़ौत्तरी ही देखने को मिल रही है। यदि सरकार समय रहते इस ओर ध्यान नहीं देगी तो कब स्थितिंयां उसके हाथ से निकल जायें इसका अन्दाजा भी नही लग पायेगा।
आम आदमी पार्टी के निलंबित मन्त्री कपिल मिश्रा ने पार्टी आरोप लगाया है कि पार्टी को 2013-14 और 2014-15 में जो चन्दा मिला उसकी आयकर, चुनाव आयोग और पार्टी की बेवसाईट पर अलग-अलग जानकारी दी है। मिश्रा के मुताबिक पार्टी को चुनाव आयोग को 9.42 करोड़ बताया। आयकर ने जब नोटिस दिया तब वहां 30 करोड़ दिखा दिया। 2014-15 में 65.52 करोड़ मिला लेकिन साईट पर 27.48 करोड़ तथा चुनाव आयोग को 32.46 करोड़ दिखाया। मिश्रा ने 35-35 करोड़ के दो चैक बिना किसी तारीख के भी पार्टी के नाम आये होने का आरोप लगाया है मिश्रा का यह भी आरोप है कि पार्टी चन्दे के नाम पर कालेधन को सफेद करने का काम कर रही है और यह सब अरविंद केजीरवाल की जानकारी में हो रहा है। मिश्रा ने इन आरोपों पर सीबीआई में शिकायत दर्ज करवाकर केजरीवाल के खिलाफ कारवाई करने की मांग करने का भी दावा किया है। मिश्रा को जब बर्खास्त किया गया था उसके बाद उन्होने स्वास्थ्य मन्त्री सत्येन्द्र जैन द्वारा केजरीवाल को दो करोड़ देने का भी आरोप लगाया है । नील नाम के एक व्यक्ति ने मिश्रा को यह जानकारियां जुटाने में सहयोग देने का दावा किया है।
आम आदमी पार्टी ने आरोपों को निराधार बताते हुए पार्टीे नेता संजय सिंह ने मिश्रा की तर्ज पर ही भाजपा के नाम पर भी 70 करोड़ का एक चैक आया हुआ मीडिया को दिखाया है। मिश्रा ने 2013-14 और 2014-15 मंे चन्दे के नाम पर घपला होने का आरोप लगाया है। मिश्रा को अभी मई के प्रथम सप्ताह में मन्त्री पद से बर्खास्त किया गया है। अथार्त जब यह घपले बाजी हुई उस समय मिश्रा पार्टी के कमर्ठ कार्यकर्ता और मन्त्री थे। जिसका अर्थ है कि मिश्रा उस समय पार्टी हित में इस पर खामोश रहे यदि मिश्रा को अब नील के माध्यम से यह जानकारियां मिली हैं तो यह स्पष्ट हो चुका है कि नील के भाजपा नेताओं और कुछ अन्य केजरीवाल विरोधियों से नजद़ीकी रिश्ते हैं। नील के कुछ भाजपा नेताओं के साथ सामने आये फोटोग्राफ से यह प्रमाणित होे जाता है। इसका अर्थ यह है कि इस सबके पीछे कहीं न कहीं भाजपा का हाथ है। बहुत संभव है कि मिश्रा की शिकायत पर सीबीआई मामला दर्ज करके केजरीवाल के खिलाफ कारवाई करे। आयकर ने पहले ही चन्दे के मामले को लेकर ‘आप’ के दावे को अस्वीकार कर दिया है। चुनाव आयोग भी चन्दे की पूरी और सही जानकारी न देने को लेकर पार्टी की मान्यता रद्द करने तक की कारवाई कर सकता है। क्योंकि जबसे आप ने विधानसभा पटल पर ईवीएम को हैक करके दिखा दिया है तब से चूनाव आयोग का रूख भी पार्टी के प्रति और कड़ा हो गया है। यदि कल को सभी राजनीतिक दलों और चुनाव आयोग के सामने आप वोटिंग मशीन को हैक करके दिखा देता है तो उससे पूरा राजनीतिक परिदृश्य ही बदल जायेगा यह तय है।
ऐसे में जो महत्वपूर्ण सवाल खड़े होते हैं उन पर एक बड़ी चर्चा की आवश्यकता हो जाती है। इस समय केन्द्र में भाजपा की सरकार है और भाजपा ने देश को कांग्रेस मुक्त करने का संकल्प ले रखा है पिछले लोक सभा चुनावों में कांग्रेस को जो हार मिली है उससे अब तक बाहर नही निकल पायी है। उसके बाद हर विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को हार ही मिली है लेकिन इसके बावजूद भी कांग्रेस अभी तक सबसे बडे़ राजनीतिक दल के रूप में गिनी जाती है। कांग्रेस भाजपा के बाद कोई भी राष्ट्रीय स्तर का राजनीतिक दल नहीं है। आम आदमी पार्टी भले ही गोवा में बुरी तरह हारी है। लेकिन पंजाब में जितनी भी सफलता मिली है उससे अभी भी उसके राष्ट्रीय विकल्प बनने की संभवना खत्म नहीं हुई है। क्योंकि मोदी सरकार के सारे दावों और योजनाओं के बावजूद मंहगाई, बेरोजगारी और भष्ट्राचार के बडे मुद्दों पर आम आदमी को कोई राहत नही मिल पायी है अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य अभी भी उसकी पहुंच से दूर है। फिर भाजपा को जो प्रचण्ड बहुमत मिला है और उसके पीछे संघ की जो विचारधारा कार्यरत है। उसके चलते कब यही बहुमत पार्टी की सबसे बड़ी समस्या बन जाये कोई आश्चर्य नही होगा। क्योंकि जिन कार्यक्रमों पर पार्टी काम कर रही है उससे बुनियादी सवाल हल होना संभव नही है। डिजिटल होने पर प्रधानमन्त्री जितना बल दे रहे हैं उस पर अभी हुए साईवर अटैक ने एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।
इस परिदृश्य में भाजपा के लिये आज राजनीतिक दृष्टि से आप ही एक बड़ी चुनौती है बल्कि एक तरह से अब के सारे स्थापित राजनीतिक दलों के लिये भी आप ही एक बड़ी चुनौती होगी। फिर यह तो स्वभाविक है कि कोई भी अपना सशक्त हिस्सेदार नहीं चाहेगा और इसके लिये आप को रोकने में सभी अपरोक्ष में इक्कठे हो जायेंगे आज कपिल मिश्रा ने जो आरोप लगाये हैं उनकी जानकारी केन्द्र सरकार और उसकी संवद्ध ऐजैन्सीयो के पास तो पहले से ही रही है। लेकिन वह इसके आधार पर अब तक कोई कारवाई नहीं कर पाये हैं । स्पष्ट है कि कारवाई के लिये सक्षम आधार नहीं है लेकिन इतने पर ही कोई भी जांच ऐजैन्सी जांच तो शुरू कर सकती है। इसमें पार्टी विधायकों को बडे़ स्तर पर दल-बदल भी आयोजित किया जा सकता है। क्योंकि जिस तरह से इसके पीछे भाजपा के कुछ नेताओं का हाथ होने की संभावना दिख रही है उससे कुछ संभव हो सकता है। दिल्ली से राज्य सभा के चुनावों से पहले सरकार को अस्थिर करने की योजना हो सकती है। इसके लिये आम आदमी पार्टी को सारी संभावनाओं के लिये तैयार रहना होगा। इसी के साथ हर राज्य में संगठन की ईकाईयां खड़ी करनी होगी ताकि सभी राज्यों से ऐसी साजिशों को नाकाम करने के लिये एक बराबर आवाज उठे। आज संगठन के सशक्त न होने के कारण ही इस तरह के हथकण्डों को अंजाम दिया जा रहा है। जबकि जहां-जहां कांग्रेस और भाजपा सत्ता में रह चुकी है वहां पर तो संगठन को इनके भ्रष्टाचार पर खुलकर हमला बोलना चाहिये। क्योंकि यदि इस तरह की साजिशों से आप को खत्म करने का खेल सफल हो जाता है तो यह एक राष्ट्रीय नुकसान होगा। इस समय एक कारगर राजनीतिक विकल्प की आवश्यकता है।
हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल ने प्रदेश विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के प्रौफेसर डा0 शशीकांत शर्मा को अपना अवैतनिक सलाहकार नियुक्त किया है। डा0 शशीकांत एक अनुभवी पत्रकार हैं। उसी अनुभव के परिणाम स्वरूप वह दैनिक ट्रिब्यून से विश्वविद्यालय पहुंचे और अब विश्वविद्यालय के अध्यापन के साथ ही महामहिम राज्यपाल के सलाहकार भी हो गये हैं और राज्यपाल आचार्य डा0 देवव्रत स्वयं भी एक विद्वान चिन्तक है और उन्होनेे बहुत सारे सामाजिक कार्य भी अपनी जीवन शैली का हिस्सा बना रखे है। ऐसे में राजभवन के दायित्वों के निर्वहन के साथ ही सामाजिक कार्यों को भी बराबर चलाये रखने के लिये उन्हें कुछ सहयोगीयों और सलाहकारों की आवश्यकता रहेगी ही। संभवतः इसी मनोधारणा को अंजाम देने के लिये ही उन्होने पहले कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय के प्रौफैसर डा0 राजेन्द्र सिंह को बतौर ओएसडी राजभवन में तैनाती दी और अब उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए डा0 शशीकांत को अपना सलाहकार बनाकर लाये हैं। यह शायद इसलिये आवश्यक हुआ होगा क्योंकि डा0 राजेन्द्र सिंह अपना पूरा समय राजभवन को नहीं दे पा रहें है।
राजभवन की यह नियुक्तियां अपने में एक प्रशंसनीय कदम है। फिर डा0 शशीकांत प्रदेश की राजनीति से भली प्रकार से परिचित हैं। डा0 आचार्य देवव्रत प्रदेश के राज्यपाल केन्द्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद आये हैं और प्रदेश में पदभार संभालने के बाद यहां पर सत्तारूढ़ कांग्रेस तथा मुख्य विपक्षी दल भाजपा में कैसे राजनीतिक रिश्ते हैं यह पूरी तरह खुलकर सामने आ चुका है। इतना ही नहीं मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह और नेता प्रतिपक्ष पूर्व मुख्यमन्त्री प्रेम कुमार धूमल के बीच रिश्तों का मुकाम यहां तक पहुुंच गया कि वीरभद्र अपने खिलाफ चल रहे मामलों को सीधे धूमल, जेटली और अनुराग का षडयंत्र करार दे चुके हैं बल्कि स्पोर्टस बिल को लेकर वीरभद्र राजभवन की भूमिका पर भी अपनी नाराजगी जग जाहिर कर चुके हैं। राजनीतिक रिश्तों के इस परिदृश्य में यह डा0 शशीकांत ही थे जिन्होने वीरभद्र-धूमल और विक्रमादित्य को एक टेबल पर बिठाया। भले ही डा0 शशीकांत की इस भूमिका को लेकर सभी हल्कों में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं उस समय रही है। आज भी डा0 शशीकांत उसी भूमिका को महामहिम राज्यपाल, मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह और नेता प्रतिपक्ष प्रेम कुमार धूमल के बीच निभा पाते है या नहीं। क्योंकि इस नये पद पर उनका चयन इन तीनों की सहमति के बिना संभव नही हो सकता। इसलिये डा0 शशीकांत इस नयी भूमिका में कैसे उतरते हैं और यहां से कुलपति तथा राज्यसभा तक का सफर तय कर पाते हैं या नहीं यह सब आने वाले समय मे स्पष्ट हो जायेगा।
लेकिन इस नियुक्ति से जो अन्य सवाल उभरे हैं वह बहुत महत्वपूर्ण है। डा0 शशीकांत की नियुक्ति की फाईल सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग से अनुमोदित होकर राजभवन पहुंची है। सामान्य प्रशासन स्वयं मुख्यमन्त्री देख रहे हैं। ऐसे में पहला सवाल यह आता है कि क्या सरकार बिना वेतन के नियुक्ति पत्र दे सकती है? क्योंकि सांकेतिक रूप से एक रूपया वेतन तो हो सकता है या फिर एक पद के साथ दूसरे पद का अतिरिक्त दायित्व कानून की नजर में भी सवाल उठायेगा क्योंकि राज्यपाल, मुख्यमन्त्री या किसी भी मन्त्री का अवैतनिक सलाहकार होने के लिये दर्जनों लोग सामने आ सकते हैं फिर अवैतनिक दायित्व निभाते हुए प्रशासनिक गोपनीयता का निर्वहन कैसे और कितना अपेक्षित व संभव हो सकता है यह दूसरा बड़ा सवाल होगा।
इसी के साथ तीसरा सवाल यह है कि संविधान में राज्यपाल के लिये "To aid and advise" पूरा मन्त्रीमण्डल है। जब राज्य में राष्ट्रपति शासन की सूरत में मन्त्रीमण्डल नही रहता है तब वरिष्ठतम प्रशासनिक अधिकारियों को राज्यपाल का सलाहकार नियुक्त किया जाता है। क्योंकि सलाहकार और ओएसडी के पदनामो में भी भारी प्रशासनिक अन्तर रहता है। ऐसे में क्या राजभवन और राज्यपाल को मन्त्रीमण्डल और पूरे प्रशासनिक तन्त्र की सलाह पर भरोसा नहीं रहा है जिसके कारण राज्यपाल को अलग से मन्त्रीमण्डल के समानन्तर सलाहकार की आवश्यकता आ खड़ी हुई है। राज्यपाल का सलाहकार होने का बड़ा व्यापक अर्थ है क्योंकि संविधान के अनुसार राज्यपाल ही सरकार को ‘‘मेरी सरकार’’ कह कर संबोधित कर सकता है दूसरा कोई नही। ऐसे में राज्यपाल का सलाहकार पूरे मन्त्रीमण्डल और प्रशासनिक तन्त्र का समानन्तर बन जाता है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शिमला में भाजपा द्वारा आयोजित परिवर्तन रैली को संबोधित करते हुए प्रदेश के मुख्यमन्त्री का नाम लिये बगैर कहा कि जिन्होने इतने समय तक प्रदेश का शासन चलाया है आज उनका अधिकांश समय वकीलों से सलाह लेने में ही गुजर रहा है। मोदी के सहयोगी मन्त्री नड्डा ने भी नाम लिये बगैर ही वीरभद्र पर निशाना साधा। वीरभद्र अपने खिलाफ चल रही जांच के लिये वित्त मन्त्री अरूण जेटली का नाम लेकर उन पर षडयंत्र का आरोप लगा चुके हैं। उनका आरोप है कि केन्द्र सरकार जांच एजैन्सीयों का अपने विरोधियों के खिलाफ दुरूपयोग कर रही है। केन्द्र में जब कांग्रेस नीत यूपीए सरकार थी तब सीबीआई को देश के सुप्रीम कोर्ट ने पिंजरे का तोता कहा था। आज भाजपा नीत एनडीए सरकार है और जांच ऐजैन्सीयां वही हैं। आज भी दुरूपयोग का आरोप लग रहा है। अन्तर केवल इतना भर है कि आरोप लगाने वाले बदल गये हैं। हर सरकार यह दोहराती है कि भ्रष्टाचार कतई बर्दाश्त नही किया जायेगा। मोदी सरकार भी यह परम्परा निभा रही है।
मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह के खिलाफ वर्ष 2013 से वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण की याचिका के परिणाम स्वरूप जांच चल रही है जो अभी तक पूरी नही हुई है। इस जांच को पूरा होने में कितना समय लगेगा यह कहना संभव नही है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि जब तक यह जांच पूरी नही होे जाती हैं इसका पूरा-पूरा राजनीतिक लाभ उठाया जायेगा। लेकिन क्या प्रधानमन्त्री के स्तर पर भी ऐसा किया जाना चाहिए? क्योंकि इस मामले में जांच ऐजैन्सीयां केन्द्र सरकार की हैं उनके ऊपर सरकार का प्रशासनिक नियन्त्रण है। ऐसे में किसी भी मामले में जांच को प्रभावित किये बिना क्या उसकी जांच एक तय समय सीमा के भीतर नही हो जानी चाहिए? क्या एक जांच को सालों तक चलाये रखा जाना चाहिये? जब ऐसा होता है तब उसके साथ राजनीति जुड़ जाती है। सत्ता संभालते ही प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने यह ऐलान किया था कि ‘‘न खाऊंगा और न ही खाने दूंगा’’ लेकिन पिछले दिनों अरूणांचल के पूर्व मुख्यमन्त्री स्व.काली खो पुल्ल का जो पत्र मरणोपरान्त सार्वजनिक हुआ है क्या उसमें लिखे गये तथ्यों पर जांच नही होनी चाहिए थी और इसका जिम्मा मोदी सरकार पर नहीं आता है। इस पत्र के बाद मोदी के अपने सहयोगी केन्द्रिय स्वास्थ्य मन्त्री जे.पी. नड्डा को लेकर रामबहादुर राय के यथावत में कई गंभीर आरोप लग चुके है। एम्ज़ की जमीन के मामलें में हजारों करोड़ के घपले के आरोप लग चुके हैं। रामबहादुर राय संघ में भी एक बड़ा नाम है। परन्तु नड्डा पर लगे आरोपों को लेकर न तो मोदी की सरकार की ओर से कोई प्रतिक्रिया आयी है और न ही स्वयं नड्डा ने इसका कोई खण्डन किया है या ‘‘यथावत’’ को मानहानि का नोटिस ही दिया है।
इसलिये जब प्रधानमन्त्राी नरेन्द्र मोदी जैसा व्यक्ति वीरभद्र पर नाम लिये बगैर हमला करता है तो स्वाभाविक रूप से उसमें राजनीति की ही गंध आयेगी। प्रधानमन्त्री के स्तर से तो परिणाम आने चाहिए और खास तौर पर तब जब स्वयं केन्द्र की जांच ऐजैन्सीयों की कार्यशैली का मामला हो। क्योंकि इस मामलों में ईडी की जो कार्यशैली अब तक सामने आ रही है उससे ऐजैन्सी की निष्पक्षता पर ही सवाल उठने शुरू हो गये हैं। जांच ऐजैन्सी के स्तर पर संबद्ध मामले की जांच को एक निश्चित समय सीमा के भीतर जांच पूरी करके चालान अदालत तक पहुंचाना होता है। परन्तु इस मामले में जांच को जिस तरह से लम्बा किया जा रहा है उससे यह संकेत उभरने शुरू हो गये हैं कि इस मामले में जांच परिणाम से ज्यादा राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास हो रहा है। वैसे भी भ्रष्टाचार को लेकर प्रदेश में भाजपा का आचरण कुछ अलग ही रहा है। भाजपा ने बतौर विपक्ष 2003 से 2007 के कार्यकाल में जो आरोप पत्र कांग्रेस सरकार के खिलाफ सौंपे थे उन पर सत्ता में आने के बाद कोई कारवाई नही हुई है। उन आरोप पत्रों पर भी कवेल राजनीति ही हुई थी जो अब वीरभद्र के मामले में हो रही है।
केन्द्र सरकार ने वीआईपी कल्चर समाप्त करने की दिशा में सर्वोच्च न्यायालय के 2013 में दिये गये फैसले पर अमल करते हुए लालबत्ती के प्रयोग को बन्द करने का फैसला लिया है। मोदी से पहले यह फैसला पंजाब के मुख्यमन्त्री अमरेन्द्र सिंह ने लिया। उसके बाद यू पी में योगी सरकार ने लिया। हिमाचल में परिवहन मन्त्री जी एस बाली ने 15 अप्रैल को हिमाचल दिवस के अवसर पर लालबत्ती त्यागने की घोषणा की। स्वभाविक है कि जब दो मुख्यमन्त्री और एक मन्त्री यह फैसला सार्वजनिक कर चुके थे तो मोदी जैसे व्यक्तित्व को ऐसा फैसला लेना आवश्यक था। हां मोदी के फैसले का पूरे देश पर प्रभाव पडे़गा क्योंकि सबको इस पर अमल करना पडे़गा। इसके लिये मोदी की पीठ थपथपायी जा सकती है।
लेकिन क्या अकेले लालबत्ती का प्रयोग बन्द करने मात्र से ही वीआईपी कल्चर समाप्त हो जायेगा? यह एक बड़ा सवाल है और अब इसके सारे संभव पक्षों पर विस्तार से विचार करने और फैसले लेने का वक्त आ गया है। किसी वाहन पर लालबत्ती लगी होने का अर्थ होता था कि उसे सड़क पर लगे लम्बे जाम मे भी अलग से रास्ता दे दिया जाता था। अब उसे सामान्य रूप से ही जाना होगा। लेकिन वीआईपी गाड़ी से आगे पीछे जो पुलिस की सुरक्षा गाड़ी चला करती थी जिसके कारण उसे अलग से रास्ता दे दिया जाता था यदि वह सुरक्षा गाड़ी अब भी वैसे ही साथ रहती है तो लालबत्ती न होने का कोई ज्यादा लाभ नहीं होगा। गाड़़ी पर लालबत्ती के बाद यह लालबत्ती दफ्रतर के दरवाजे पर भी रहती है। जब तक दरवाजे पर लालबत्ती जल रही है आम आदमी दफतर के भीतर बैठे नेता/मंत्री/ अधिकारी से नहीं मिल सकता। दरअसल वीआईपी कल्चर आज दफतर की प्रशासनिक संस्कृति से निकल कर एक संस्कार बन चुका है और इसका प्रयोग सामान्य नियमों/कानूनों को अगूंठा दिखाने के रूप में किया जाता है। वीआईपी का अर्थ हर समय, हर स्थान पर प्रमुखता मिलना रह गया है। यह प्रमुखता पद से जोड़ दी गयी है और लालबत्ती आदि इसके कुछ प्रत्यक्ष प्रतीक बन चुके हैं जिनका प्रयोग मात्र ही आपकी विशिष्ठता की पहचान बन जाता है और इसी कारण वीआईपी एक रक्षा संस्कार और मानसिकता बन गयी है जिसके कारण वीआईपी और आम आदमी में एक लम्बी दूरी बन गयी है। वीआईपी कल्चर के कारण ही मन्त्री अधिकारी और उनके अधीनस्थ कर्मचारी के आवास में भी दिन रात का अन्तर देखने को मिलता है जबकि आवास परिवार की आवश्यकता के अनुरूप होना चाहिए। इसी तरह वेतन भी आवश्यकता पर आधारित रहना चाहिए। पद की वरियता के कारण इन आवश्यकताओं में दिन रात का अन्तर नहीं रहना चाहिए।
आज जब लालबत्ती का प्रयोग करने की बात हो रही है तो इसी के साथ यह भी आवश्यक है कि इन वीआईपी लोगों को जो सुरक्षा व्यवस्था प्रदान की गयी है उसकी भी समीक्षा की जानी चाहिए। जब हमारे मन्त्री/अधिकारी अपने को जन सेवक कहते हैं तो उन्हे उसी जनता से खतरा क्यों है। जन सेवक तो जनता के हित के लिये काम करता है तो उसे खतरा तो तभी हो सकता है जब वो आम आदमी के हित में काम नहीं कर रहा है और उसे डर रहता है कि इसका पता आम आदमी को चल जायेगा। जब कानून की नजर में सब बराबर है तो फिर उस पर अमल भी उसी तरह का दिखना चाहिए। आज राज्यों की विधान सभाओं से लेकर संसद तक ऐसे माननीय आ चुके हैं जिन पर गंभीर अपराधिक मामले चल रहें है। कई-कई वर्षो से पहले यह मामले चल रहे है। जेलों में बैठ कर चुनाव लडे़ और जीते जा रहे हैं क्योंकि अदालतों से उनके मामलों के फैसले नही आ रहे है। जन प्रतिनिधियों के खिलाफ चल रहे आपराधिक मामलों का निपटारा एक वर्ष के भीतर करने के निर्देश सर्वोच्च न्यायालय कब का दे चुका है। आज बाबरी मस्जिद के मामले में भी सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले को दो वर्षांे के भीतर निपटाने के निर्देश दिये हैं बल्कि सुनवाई करने वाले जज को मामले के बीच तबादला न किया जाये यह भी निर्देश दिया है। क्या ऐसी ही समयबद्धता सभी के मामलों में नही होनी चाहिये? आपराधिक मामलें झेल रहे जिन माननीयों के फैसले सालों तक नही आ रहे है क्या वह सब वीआईपी होने के कारण नही हो रहा है?
आज सर्वोच्च न्यायालय ने आडवानी, जोशी, उमा भारती आदि के खिलाफ बाबरी मामले में आपराधिक साजिश रचने के लिये मामला चलाने के निर्देश दिये हैं लेकिन इस पर उमा भारती और विनय कटियार जैसे नेताओं की प्रतिक्रिया क्या आयी है, क्या इस तरह की प्रतिक्रिया के बाद भी इन लोगों को अपने पदों पर बने रहना चाहिए? क्या यह प्रतिक्रियाएं इनके वीआईपी होने के कारण ही नहीं आ रही है? इसलिये वीआईपी कल्चर को समाप्त करने के लिये लालबत्ती से आगे भी कदम उठाने होंगे। इस संद्धर्भ में केवल मोदी से ही ऐसे कदमों की अपेक्षा है क्योंकि मोदी ही महाजनो मेन गतः स पन्था की कहावत को चरितार्थ कर सकते हैं।