शिमला/शैल। प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने एफ. आर. डी. आई. के प्रस्तावित विधेयक पर उठी शंकाओं को निराधार करार देते इन्हें पूरी अफवाह कहा है कि इसी के साथ यह भी आश्वासन दिया है कि लोगों का बैंको में जमा धन सुरक्षित रहेगा। प्रधानमन्त्री के इस आश्वासन से पहले वित्तमन्त्री अरूण जेटली और उनके वित विभाग ने भी ऐसा ही आश्वासन दिया है और यह कहा है कि लोगों का एक लाख का जमा धन सुरक्षित रहेगा। स्मरणीय है कि एक लाख तक की सुरक्षा तो 1961 में संसद में एक बिल लाकर दे दी गयी थी लेकिन एक लाख से अधिक के जमा की सरुक्षा का क्या होगा और यह सुरक्षा कैसे सुनिश्चित रहेगी इस पर कुछ नही कहा गया है। जबकि संसद के माध्यम से 1961 में दी गयी एक लाख की सुरक्षा की सीमा को तो आज तक बढ़ाया नही गया। यह प्रस्तावित विधेयक संसद में लंबित है और सत्र शुरू हो गया है। माना जा रहा है कि इसी सत्र में पारित हो जायेगा क्योंकि प्रधानमन्त्री और वित्त मन्त्री ने अपने आश्वसनों में यह नही कहा है कि इस प्रस्तावित विधेयक को अभी लंबित रखा जायेगा या इसे वापिस ले लिया जायेगा। इस कारण से प्रधानमन्त्री और वित्तमन्त्री के आश्वासनों पर भरोसा करने की कोई ठोस वजह नही रह जाती है। बल्कि बैंकों के जिस बढ़ते एन.पी.ए. के कारण यह विधेयक लाया गया है अब उस एन.पी.ए. को भी प्रधानमन्त्री नेे यूपीए शासन का एक सबसे बडा घोटाला करार दिया है।
बैकों का एन.पी.ए. किसके कारण इसके लिये एक अलग आंकलन की आवश्यकता है क्योंकि जब चुनाव लगातार मंहगा होता जा रहा है बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि जब चुनाव केवल पैसे के दम पर ही लड़ा और जीता जायेगा तब स्वभाविक है कि इस पैसे का प्रबन्ध सिर्फ उद्योगपतियों के पैसे से ही हो पायेगा क्योंकि कोई भी राजनीतिक दल अपने राजनीतिक कार्यकर्ताओं के चन्दे से तो इतने पैसे का जुगाड़ नही कर सकता। कार्यकर्ताओं के चन्दे से चुनाव प्रचार के लिये हैलीकाॅप्टरों का प्रबन्ध नही हो सकता। हैलीकाॅप्टर केवल उद्योगपति ही उपलब्ध करवाता है और इस हैलीकाॅप्टर के बदले में उसे सरकारी बैंक से लाखों करोड़ का कर्ज तथा सरकार से यह आश्वासन है कि वह इस कर्ज की वसूली के लिये उसे राहत का पैकेज देगी न कि एन.पी.ए. होने की सूरत में उसके संसाधनों की नीलामी करके इस कर्ज को वसूला जाये। प्रधानमन्त्री ने यहां इस एनपी.ए. के लिये यू.पी.ए. सरकार को दोषी ठहराया है वहां यह नही बताया है कि इस एन.पी.ए. की वसूली कैसे की जायेगी। क्योंकि 2016 में बैंकरपटसी और इनसाल्बैनसी कोड लाया गया और फिर उसे एक अध्यादेश लाकर विलफुल डिफाॅलटर के प्रति और कड़ा गया था। अब इस प्रस्तावित एफ.आर.र्डी.आइ. विधेयक के माध्यम से उसकी धार को भी कुन्द कर दिया गया है। 2014 में जब मोदी सरकार ने सत्ता संभाली थी उस समय यह एन.पी.ए. करीब तीन लाख करोड़ कहा गया था जो अब बैंक यूनियनों के मुताबिक ग्यारह लाख करोड़ को पंहुच गया है। इसका सीधा सा अर्थ यही है कि मोदी सरकार ने भी इसे वसूलनेे के लिये कड़े कदम उठाने की बजाये इसे बढ़ने दिया।
आज यह बैंको का एन.पी.ए. ही सारे संकट की जड़ है इस समय स्थिति यह हो चुकी है। कि एक अबानी/अदानी जैसे बड़े उद्योग घराने के संकट से पूरे देश कीे व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है कई बड़ी कंपनीयां पब्लिक लि॰ से प्राईवेटे हो चकी हैं और यह एक बड़े संकट का संकेत है। वित्तमन्त्री ने 2016 के बजट भाषण में वित्तिय अनुशासन लाये जाने का संकेत दिया था और उसके बाद ही अतिरिक्त सचिव की अध्यक्षता में कमेटी गठित हुई जिसकी रिर्पोट पर यह एफआर.र्डी.आइ. विधेयक लाया गया है। लेकिन इसी रिपोर्ट के बाद नवम्बर में नोटबंदी लायी गयी तो क्या इस नोटबंदी के संकेत इस रिर्पोट में थे? यदि इसकी चर्चा छोड़ भी दी जाये तब भी यह सवाल तो अपनी जगह खड़ा रहेगा कि नोटबंदी भी इसी एन.पी.ए. के कारण लायी गयी। क्योंकि नोटबंदी के माध्यम से सरकार को भरोसा था कि उसे 86% नयी कंरसी छापने की सुविधा मिल जायेगी। यदि पुराने नोट 99% की जगह 40 या 50% तक ही वापिस आते तो नोटबंदी का प्रयोग सफल हो जाता। क्योंकि जो आधी नयी कंरसी उपलब्ध रहती उसे यह एन.पी.ए. आसानी से राईटआॅफ हो जाता जिससे पूरा उद्योग जगत बिना शर्त सरकार के साथ खड़ा हो जाता बल्कि कुछ दूसरे वर्गों को भी राहत मिल जाती लेकिन नोटबंदी का प्रयोग अफसल रहने के कारण ही आज इन एन.पी.ए. धारको को बचाने के लिये ही एफ.आर.डी.आई. में ‘‘बेलइन’’का प्रावाधान किया गया है।
क्योंकि नोटबंदी का प्रयोग सबसे पहले 1946 में आरबीआई ने अपनाया था और उस समय 1000 और 10,000 के नोट जारी किये गये थे। उसके बाद 1954 में 1000,5000,10,000 के नये नोट जारी किये। फिर 1978 में जनता पार्टी की मोरार जी भाई की सरकार में आरबीआई ने इन नोटों को चलन से बाहर कर दिया। लेकिन हर बार यह फैंसले आरबीआई के स्तर पर घोषित हुए। उस समय बैंकों और उद्योगपतियों को राहत देने के लिये ‘‘बेलइन’’जैसे प्रावधान नही लाये गये थे। आज यदि सरकार इस प्रस्तावित विधेयक को वापिस नही लेती है और उद्योगपतियों को प्रति सख्त नही होती है तो इसके परिणाम बहुत अच्छे नही रहने वाले है यह तय है।
शिमला/शैल। कांग्रेस के निलंबित नेता मणीशंकर अय्यर के ब्यान के बाद गुजरात के चुनाव प्रचार अभियान की तर्ज बदल गयी है क्योंकि इस ब्यान पर जिस तरह की प्रतिक्रिया प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी और अन्य भाजपा नेताओं की आयी है। उससेे यह सोचने पर विवश होना पड़ रहा है कि क्या अब अभद्र भाषा चुनावी राजनीति का एक सबसे बड़ा हथियार बनती जा रही है। अभद्र भाषा का प्रयोग राजनीति में किस कदर आता जा रहा है यदि इसका एक निष्पक्ष आंकलन किया जाये तो स्पष्ट हो जाता है। कि ऐसी भाषा के प्रयोग के बाद वह सारे मुद्दे /प्रश्न चुनाव प्रचार अभियान के बाद गौण हो जाते हैं जो सीधे आम आदमी के साथ जुडे हुए होते हैं। जबकि चुनाव इतना महत्वपूर्ण कार्यक्रम है जिससे संबधित देश /प्रदेश का भविष्य तय होता है। आने वाले समय में सत्ता का सही हकदार कौन है? किसके हाथ में प्रदेश का भविष्य सुरक्षित रहेगा यह सब इस चुनाव की प्रक्रिया से तय होता है। इसके लिये आम आदमी से जुड़े मुद्दों पर जहां सार्वजनिक बहस होनी चाहिये वहीं पर इससे बचने के लिये एक ब्यान में एक बहुअर्थी अभद्रशब्द का प्रयोग पूरे परिदृश्य को बदल कर रख देता है। मतदाता को यह समझने ही नही दिया जाता है कि ऐसे शब्दों के प्रयोग से कैसे बड़ी चालाकी से उसका ध्यान गंभीर मुद्दों की ओर से भटका दिया जाता हैै।
मणीशंकर अय्यर ने प्रधानमन्त्री द्वारा स्वर्गीय जवाहर लाल नेहरू के संद्धर्भ में दी गयी प्रतिक्रिया को लेकर यह कहा कि ऐसी प्रतिक्रिया कोई नीच किस्म का व्यक्ति ही दे सकता है। नीच किस्म का व्यक्ति होना और नीच होने के अर्थो में दिन रात का अन्तर है लेकिन इस अन्तर को नजरअन्दाज़ करके इसका सारा संद्धर्भ ही बदल दिया गया। स्व. जवाहर लाल नेहरू और महात्मा गांधी को लेकर जिस तरह के पोस्टर सोशल मीडिया में आते रहे हैं और आ रहे हैं वह सब क्या नीचता के दायरे में नही आते हैं? क्या उस पर सरकार की ओर से कोई निन्दा और कारवाई नही कि जानी चाहिये? पूरे नेहरू -गांधी परिवार को लेकर जो कुछ अनर्गल प्रचार चल रहा है क्या उसकी प्रंशसा की जानी चाहिये या उसके खिलाफ कड़ी कारवाई होनी चाहिये? लेकिन केन्द्र सरकार इस संद्धर्भ में एकदम मोन रही है। बल्कि यहां तक सामने आ गया है कि ऐसे अनर्गल प्रचार के लिये सरकार की साईटस का प्रयोग किया जा रहा है। इस परिदृश्य में यह भी स्मरणीय है कि 2014 के लोकसभा चुनाव और उसके बाद जिस स्तर तक कई भाजपा नेताओं की भाषा मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ गयी थी तब प्रधानमन्त्री को ऐसे नेताओ को यह हिदायत देनी पड़ी थी कि ऐसी ब्यानबाजी न करेें। प्रधानमन्त्री की इस हिदायत का भले ही इन नेताओं पर कोई असर न हुआ हो लेकिन प्रधानमन्त्री ने निंदा की औपचारिकता तो निभाई थी। आज कांग्रेस ने अय्यर को पार्टी से निलंबित कर दिया है लेकिन प्रधानमन्त्री ने अय्यर पर यहां तक आरोप लगाया है कि अय्यर ने उनके लिये पाकिस्तान में सुपारी दी है। प्रधानमन्त्री का यह आरोप बहुत गंभीर है। यदि यह आरोप वास्तव में ही सच है तो इस पर केन्द्र सरकार को कारवाई करनी चाहिये और देश के सामने इसका खुलासा रखना चाहिये। यदि यह आरोप महज़ एक राजनीतिक ब्यान मात्र ही है तो इससे प्रधानमन्त्राी की छवि आम आदमी के सामने क्या रह जायेगी और उसका परिणाम क्या होगा इसका अनुमान लगाया जा सकता है। क्योंकि कांग्रेस ने जहां अय्यर को पार्टी से निलंबित कर दिया है वहीं पर भाजपा से भी यह मांग की जाने लगी है कि वह अपने भी उन नेताओं के खिलाफ कड़ी कारवाई करे जो अभद्र भाषा को प्रयोग करते रहे हैं और आज भी कर रहे हैं।
अय्यर के ब्यान पर कांग्रेस की कारवाई के बाद प्रधानमन्त्री ने इस ब्यान को एक बड़ा मुद्दा बनाकर गुजरात के प्रचार अभियान में उछाल दिया है। लेकिन क्या इस उछालने से वहां के मुद्दे गौण हो जायेंगे? गुजरात में भाजपा पिछले बाईस वर्षों से सत्ता में है और आज इस प्रदेश का कर्जभार दो लाख करोड़ से अधिक का हो चुका है। यह दो लाख करोड़ कहां निवेशित हुआ है और इससे प्रदेश के खजाने को कितनी नियमित आय हो रही है आम आदमी को इस कर्ज से क्या लाभ हुआ है? यह सवाल इस चुनाव में उठने शुरू हो गये थे। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गंाधी ने भाजपा सरकार से इन बाईस वर्षों का हिसाब मांगते हुए प्रतिदिन प्रधानमन्त्री से प्रश्न पूछने शुरू किये हैं जिनका कोई जवाब नही आया है। चुनाव के दौरान पूछे जाने वाले सवालों का जवाब नहीं आता है। हिमाचल मे भी भाजपा ने वीरभद्र से हिसाब मांगा था जो नही मिला। लेकिन चुनाव में पूछे गये सवालों का परिणाम गंभीर होता है। बशर्ते कि हिसाब मांगने वाले का अपना दामन साफ हो। ऐसे में यह स्वभाविक हो जाता है कि जब तीखे सवालों का कोई जवाब नही रहता है तब उन सवालों का रूख मोड़ने के लिये ऐसे बहुअर्थी अभद्र शब्दों का सहारा लेकर स्थितियों को पलटने का प्रयास किया जाता है। गुजरात में अय्यर का ब्यान प्रायोजित था या नही यह तो आने वाला समय ही बतायेगा लेकिन इस ब्यान ने एक सुनियोजित भूमिका अदा की है। इसमें कोई दो राय नही है। परन्तु अन्त में फिर यह सवाल अपनी जगह खड़ा रहता है कि यह अभद्रता का हथियार कब तक चलेगा।
शिमला/शैल। मोदी के वित्तमंत्री अरूण जेटली ने फरवरी 2016 के अपने बजट भाषण में कहा था कि सरकार बैकिंग संस्थानों में बेहत्तर अनुशासन लाने की दिशा में कुछ बडे़ और स्थायी कदम उठाने जा रही है। वित्तमन्त्री की इस घोषणा के बाद आर्थिक मामलों के अतिरिक्त सचिव अजय त्यागी की अध्यक्षता में मार्च 2016 में इस आश्य की एक कमेटी का गठन किया गया। इस कमेटी ने सितम्बर 2016 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी उसकेे बाद इस रिपोर्ट पर जनता की प्रतिक्रियाएं आमन्त्रित की गयी और 14 अक्तूबर को ही प्रतिक्रियाओं और सुझावों का सिलसिला बन्द कर दिया गया। 20 दिन से भी कम का समय जनता को इस रिपोर्ट को समझने के लिये दिया गया। इसी कारण सेे आज आम आदमीे को इस रिपोर्ट और फिर इस रिपोर्ट के आधार पर लाये गये एफआरडी आई बिल के बारे में कोई जानकारी ही नही है। इस रिपोर्ट के बाद वित्त मन्त्रालय में इस आश्य का विधेयक तैयार किया गया जिसे मोदी मन्त्रीमण्डल की स्वीकृति के बाद संसद के पिछले मानसून सत्र के अन्तिम दिन से एक दिन पहले सदन में पेश किया। सदन में पेश होने के बाद इसेे संसद की वित्त मन्त्रालय की स्लैक्ट कमेटीे को भेजने की बजायेे संसद की संयुक्त कमेटी को भेजा गया है। संयुक्त कमेटी ने इस बिल पर रिजर्ब बैंक का पक्ष जानने के लियेे उर्जित पटेल को भी तलब किया है। संयुक्त कमेटी की रिपोर्ट के बाद यह बिल संसद में पारित होने के लिये आ जायेगा और फिर कानून बन जायेगा।
इस पृष्ठभूमि में यह समझना आवश्यक हो जाता है कि यह प्रस्तावित विधेयक है क्या और इसे क्यों लाया जा रहा है? इससेे बैंकिंग संस्थानों और उनके उपभोक्ताओं पर क्या प्रभाव पड़ेगा। उपभोक्ता के बिना तो किसी भी बैंकिंग संस्थान की कल्पना ही नही की जा सकती है। उपभोक्ता अपना पैसा बैंक में बचत खाते के रूप में या फिक्सड डिपाॅजिट शक्ल में रखता है। बैंक इस पैसेे पर उसेे ब्याज देता है। बैंक इस पैसे को आगे निवेशित करता है और उस पर ब्याज कमाता है। आम आदमी भी जरूरत पड़ने पर बैंक से ऋण लेता है और ब्याज अदा करता है। बैंक ऋण देने की एवजे में ऋण लेनेे वाले से सामान्य 15% तक की धरोहर (चल-अचल संपति) जमानत के रूप में रखता है। यदि किसी कारण से ऋण की वसूली न हो पाये तोे ज़मानत के रूप में रखी गयी धरोहर को निलाम करकेे अपना ऋण वसूलने का अधिकार बैंक को रहता है। बैंकों के साथ साथ ही अब इन्शयोरैन्स कंपनीयां भी इसी तरह के व्यवसाय में आ चुकी हैं। बैंक उपभोक्ता के विश्वास पर चलता है। लेकिन बैंक के प्रबन्धन में उपभोक्ता का कोई दखल नही रहता। उपभोक्ता को यह जानकारी ही नही होती है कि बैंक का प्रबन्धन ठीक चल रहा है और वह लाभ कमा रहा है। यदि किन्ही कारणों से बैंक फेल हो जाये और बन्द होने केे कगार पर पहुंचे जाये तो उससेे जुड़े उपभोक्ताओं का क्या होगा? बैंक के पास उनकी जमा पूंजी का क्या होगा? क्योंकि जब बैंक खुद ही बीमार होगा तो वह उपभोक्ता का पैसा कैसे वापिस दे पायेगा। केन्द्र सरकार ने 1961 में इस स्थिति पर विचार किया था और तब संसद ने Deposit Insurance and Credit Gaurntee Corporataive Act. परित किया था। इस एक्ट के तहत उपभोक्ता के एक लाख के डिपाॅजिट को ब्याज सहित सुरक्षित कर दिया गया था। लेकिन यह सीमा आज भी एक लाख तक की ही है। एक लाख से अधिक का डिपाॅजिट बैंक के बीमार होने की सूरत में कानून सुरक्षित नही है।
इस समय 21 पब्लिक सैक्टर कार्यरत है और 82% बैंकिंग बिजनैस इनके पास है यह बैंक करीब 3000 करोड़ का इन्शयोरैन्स प्रिमियम अदा कर रहे हैं लेकिन इसके बावजूद उपभोक्ता की सुरक्षा केवल एक लाख तक की ही हैं इस समय हमार बैंको का एनपीए करीब दस लाख करोड़ को पहुंच रहा है। एनपीए तब होता जब ऋण लेने वाला ऋण की वापसी नही करता है। इस एनपीए का करीब 67% पैसा कुछ ही बड़े उद्योग घरानों के पास है। जैसे अब अनिल अंबानी ने 45000 करोड़ का घाटा दिखाकर अपना टैलीकाॅम बिजनैस बन्द कर दिया। अब 45000 करोड़ का पैसा स्वभाविक है कुछ बैंको का ही है। जेपी इन्फ्र्रा का मामला तो दिवालिया घोषित होने के लिये सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है इस बढ़ते एनपीए के कारण बहुत सारे बैंको की हालत बिगड़ चुकी है। बन्द होने के कगार पर पहुंच चुकी है। अभी पिछले ही दिनों स्टेट बैंक आॅॅफ इण्डिया में कुछ बैंको को मर्ज किया गया है। निजिक्षेत्र के कई बैंक डूबे चुके हैं। संभवतः इसी स्थिति को समझते हुए 1971 में बैंको का राष्ट्रीयकरण किया गया था। एनपीए के कारण 2007-08 से ही अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बैंकिंग क्षेत्र संकट में आया था। बैंकिंग क्षेत्र को रैगूलेट करने के लिये रिजर्ब बैंक स्टेट बैंक आॅफ इण्डिया एक्ट और 1961 में पास हुआ एक्ट तथा 2016 में लाया गया बैंकिंग कोड है। बैंको को बन्द होने से बचाने के लिये सरकार इनको बेल आऊट करती रही है। सरकार बजट से पैसा देकर बैंकों की सहायता करती रही है। लेकिन अब इस दिशा में Bail out की जगह Bail out का प्रावधान लाया जा रहा है।
नये प्रस्तावित विधेयक के तहत सरकार Financial Resolition Deposit Insurance Act 2017 एक नयी Resolution Corporation गठित करने जा रही हैं इसकेे गठन से पुराने सारे प्रावधान निःरस्त हो जायेंगे। इसके गठन से आरबीआई की भूमिका काफी गौण हो जायेगी। यह नयी बननेे वाली कारपोरेशन ही किसी भी बैंक या अन्य वित्तिय संस्थान का आंकलन करेगी कि उसकी वित्तिय सेहत कैसी है क्या उसे बचाया जा सकता है या नहीं इसके तहत कई संस्थान बन्द भी हो सकते हैं या उन्हे किसी दूसरे में मिलया जा सकता है। इस संद्धर्भ में इस कारपोरेशन का निर्णय अन्तिम होगा और उसेे किसी भी अदालत में सिवाय ट्रिब्यूनल के चुनौती नही दी जा सकेगी। इस स्थिति में यदि बैंक को बन्द करने का फैसला लिया जाता है तो उसमें उपभोक्ता का एक लाख से ज्यादा का सारा पैसा डूब जायेगा क्योंकि उसकी कोई गांरटी नही है। यदि बैंक को बचानेे का फैसला लिया जाता है तो उसके लिये Bail in के तहत उसके डिपाॅजिटरों के पैसेे का एक निश्चित % काटकर बैंक की इक्विटी में डाल दिया जायेगा। यह कितने % तक रहेगा इसको लेकर विधेयक में कोई स्पष्ट उल्लेख नही है। अब तक अन्तर्राष्ट्रीय जगत में साईप्रस जैसा देश 2013 में 47.50% तक की कटौती कर चुका है। इस विधेयक में यह स्पष्ट किया गया है कि बैंक को बचाने के लियेे Bail out की जगह Bail in का प्रावधान लागू होगा।
ऐसे में यह सवाल उठता है कि जब बैंक अपने ऋणों की वसूलीे करने में असमर्थ रहता है और ऋण धारक की धरोहर को निलाम करने के कदम नही उठाता है तब तक उसे Bail in या Bail out का लाभ क्यों मिले? क्या ऐसे प्रबन्धन के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करकेे उसे सज़ा नही दी जानी चाहिये? ऐसेे एनपीए वालों के नाम सार्वजनिक करके उन्हे भविष्य के लिये ब्लैक लिस्ट नही कर दिया जाना चाहिये? यदि सरकार एनपीए धारकों और बैंक प्रबन्धनों के खिलाफ ऐसे कड़े कदम उठाये बिना ही Bail in जैसे प्रावधान लाती है तो यह आम आदमी के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात होगा।
शिमला/शैल। 16 नवबर को राष्ट्रीय प्रैस दिवस के रूप में जाना जाता है। इस दिन भारतीय प्रैस परिषद मीडिया से जुड़े किसी मुद्दे को मीडिया के सामने एक खुले चिन्तन और खुली चिन्ता के लिय संप्रेषित करती है। क्योंकि यह दिन और इस दिन चिन्तन के लिये आया विषय मीडिया के लिये अपने भीतर झांकने का विषय होता है। उम्मीद की जाती है कि इस अवसर पर मीडिया से जुड़ा हर कर्मी आत्मचिन्तन करके अपने लिये कुछ मानक तय करेगा। इस दिन निष्पक्षता से हर छोटा-बड़ा व्यक्ति जो अपने को मीडिया कर्मी मानता है इक्कठे बैठकर सामूहिक रूप से खुले मन
से चिन्तन-मन्थन करेगा। लेकिन क्या ऐसा हो पा रहा है क्या हमारे प्रैस क्लब इस विषय में पूरी ईनामदारी से अपनी भूमिका निभा रहे हैं? या फिर यह दिन भी एक सरकारी आयोजन बनकर ही रह गया है। इस अवसर पर इस बार प्रैस परिषद द्वारा सुझाया गया विषय था ‘‘मीडिया के सामने चुनौतीयां’’। इस दिन षिमला में भी इस संद्धर्भ में प्रदेश के जनलोक संपर्क विभाग द्वारा एक आयोजन किया गया। इस अवसर पर शिमला के तीन पत्रकारों ने इस दिन के विषय पर अपने-अपने विचार रखे। विचार रखने के बाद इस पर खुली चर्चा भी हुई। इसके लिये संद्धर्भित विषय किस वक्ता ने क्या कहा उसकी तफसील में जाने की बजाये मैं इस बिन्दु पर आऊंगा कि पूरे चिन्तन के बाद अन्त में सामने क्या आया और वह कितना महत्वपूर्ण और गंभीर था। सभी एक मत थे कि मीडिया इस समय विश्वसनीयता के संकट से गुजर रहा है और सोशल मीडिया ही उसके लियेे सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। यह सही है कि यह मीडिया के लिये इस समय का सबसे बड़ा संकट है लेकिन इस संकट से बाहर कैसे निकला जाये इसका कोई रास्ता इस चिन्तन में निकल नही पाया। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि ‘‘रास्ते ’’ का कोई प्रयास ही नही हुआ।
इस चिन्तन में रास्ता खोजने का प्रयास क्यों नही होे पाया इस पर बात करने से पहले यह कहना ज्यादा प्रसांगिक होगा कि इस अवसर पर शिमला में ही बैठे सारे मीडिया कर्मी उपस्थित नही रहे। शिमला में प्रदेश विश्वविद्यालय के अतिरिक्त इग्नू एपीजी गोयल विश्वविद्यालय में भी पत्रकारिता का विषय पढाया जा रहा है। यह अच्छा होता कि इन संस्थानों का भी पत्रकारिता विभागों के छात्र इस आयोजन में भाग लें क्योंकि भविष्य में उन्हें इन सवालों का सामना करना है। इसकेे लिये प्रदेश के लोक संपर्क विभाग के साथ मैं प्रैस क्लब के संचालकों से भी यह अपेक्षा करूंगा कि अगले वर्ष यह दोनों मिलकर इस दिन का आयोजन करें और सभी मीडिया कर्मीयों से भी उम्मीद करूंगा कि वह अपने-अपने अहम को छोड़कर इस आयोजन का हिस्सा बने और यह आयोजन पूरे दिन भर का कार्यक्रम रहे। भविष्य की इस कामना के साथ ही मैं इस विषय पर स्वयं क्या सोचता हूं उसे भी अपने सह धर्मीयों और पाठकों के साथ सांझा करना चाहूंगा।
मीडिया पहले विश्वयुद्ध के बाद से पत्रकारिता का पर्याय बन गया है। संप्रेषण का सबसे बड़ा माध्यम माना जाता है। मीडिया/संप्रेषण सूचना और संप्रेषण विचार का समाज और उसकी व्यवस्था में सूचना और विचार दोनों का अपना-अपना अलग महत्व है और दोनों की ही अपनी -अपनी भूमिका है। संभवतः इसी महत्व और भूमिका के कारण ही मीडिया को लोकन्त्र का चैथा खम्बा माना जाता है। समाज में चाहेे लोकतांत्रिक व्यवस्था हो या तानाशाही लेकिन दोनों ही व्यवस्थाओं कार्यपालिका और न्यायापालिका आवश्यक अंग है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्यवस्थापिका तीसरे सतम्भ के रूप में जुडती है। हमारे यहां लोकतान्त्रिक व्यवस्था के तहत यह यह तीनों अंग मौजूद है और तीनों का अपना-अपना दायित्व है इन तीनों पर नजर रखने के लिये जनता है। इसे जनता के अधिकार हासिल है कि वह पांच साल बाद व्यवस्था को बदल सकती है। जनता बदलाव तब करती है जब उसे लगता है कि उसके द्वारा चुनी हुई व्यवस्थापिका के तहत कार्यपालिका और न्यायपालिका अपने दायित्वों का ठीक से निर्वहन नही कर रही है। जब ऐसी स्थिति उभरती है तब मीडिया की भूमिका आती है। तब मीडिया से यह अपेक्षा की जाती है कि वह व्यवस्थापिका कार्यपालिका और न्यायपालिका पर एक ऐसे निगरान की भूमिका निभाये जो अपने में पूरी तरह निष्पक्ष भी हो। लेकिन जब व्यवस्थापिका सत्ता के लोभ में कार्यपालिका और न्यायपालिका को प्रभावित करना शुरू कर देती है तब सामाजिक व्यवस्था का सारा सन्तुलन बिगड़ जाता है। जब यह स्थिति पनपती है तब जनता भ्रमित होना शुरू हो जाती है। जिस जनता को इसी पूरी व्यवस्था का मालिक कहा जाता है जिसके सामने सारे तन्त्र की जवाबदेही मानी जाती है। वही जनता इसी व्यवस्था के सामने जब लाचारगी में आ जाती है तब जनता का इस स्थिति से बाहर निकालने की जिम्मेदारी केवल मीडिया के कंधों पर आ जाती है।
यह वह स्थिति होती जब जनता उसे मीडिया द्वारा प्रेषित सारी सूचनाओं और विचारों पर या तो तात्कालिक रूप से एकदम विश्वास कर लेती है और तब उस पर सकारात्मक फैसला लेती है या उस पर विश्वास न करके नकारात्मक फैसला लेती है। लेकिन यह एक महत्वपूर्ण स्थिति होती है और यहीं पर सत्ता पर काबिज या सत्ता पर कब्जा करने की चाहत वाला चाहे वह एक राजनीतिक दल हो या महज़ एक व्यक्ति वह मीडिया का सहारा लेता है। और यहीं से शुरू होता है मीडिया की विश्वसनीयता का प्रश्न। यदि मीडिया कर्मी ऐसी स्थिति का निष्पक्ष वौद्धिक आंकलन करके अपना पक्ष चुनता है तो उसकी विश्वसनीयता पर किसी भी तरह का संकट नही आता है। तब उस पर फेक न्यूज या पेड न्यूज के आक्षेप नही लगते हैं। लेकिन इसके लिये आवश्यक शर्त यह रहती है कि संबधित विषय पर उसका अध्ययन और जानकारी एकदम ठोस हो। जब ठोस अध्ययन और जानकारी के आधार पर व्यवस्था पर चोट करता है तब उसकी विश्वसनीयता अपने आप स्थापित हो जाती है। अध्ययन और जानकारी का अभाव ही उसे सवालों के घेरे में खडे़ करते है। आज जिस सोशल मीडिया को एक बड़ी चुनौतीे माना जा रहा है विश्वसनीयता का सबसे बड़ा संकट उसी पर है। क्योंकि यह सोशल मीडिया सूचना संवाहक तो बन गया है लेकिन अभी तक विचार का नही बन पाया है। फिर सोशल मीडिया पर आयी जानकारी के स्त्रोत का पता लगाने के लियेे तो कैलिफार्निया का सहयोग चाहिए यह इन चुनावों के दौरान प्रदेश भाजपा द्वारा साईबर एक्ट के तहत दायर एक शिकायत के जवाब में हमारे सामने आ चुका है। सोशल मीडिया पर आयी पोस्ट से भाजपा का जो नुकसान होना था वह तो हो गया और उस पर दर्ज शिकायत पर कारवाई होने तक तो शायद दूसरा चुनाव भी आ जाये। इस उदाहरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि जिस सोशल मीडिया की अपनी प्रमाणिकता पर गंभीर सवाल उठ चुकेे हैं वह मीडिया के लिये चुनौती या संकट नही हो सकता। सोशल मीडिया एक त्वरित प्रचार का माध्यम मात्र है और उसे प्रचार मंच से अधिक मान देने की आवश्यकता नही है। आज जब कोई विचार या सचूना पाठकों के सामनेे दस्तावेजी प्रमाणों के साथ रखी जाती है तब उसकी विश्वसनीयता पर कोई सवाल नही उठ पाते हैं। आज पत्रकार यदि अपनी सूचना पर आश्वस्त हैं तो उस पर कोई संकट नही है। क्योंकि आज पाठक भी पत्रकार पर हर समय उसी तरह नज़र रखे हुए है जिस तरह पत्रकार रखता है। आज यदि पत्रकार की करनी और कथनी में कोई अनतर नही होगा तो समाज हर समय उसके साथ खड़ा नज़र आयेगा। इसलिये जब पत्रकार स्वयं पर विश्वास कर पायेगा तब उसकी विश्वसनीयता को कोई संकट नही है।
जीएसटी परिषद् ने 177 वस्तुओं को 28% के दायरे से बाहर करके 18% के दायरे में ला दिया है। यह फैसला अभी 15 नवम्बर से ही लागू हो जायेगा और इससे इन वस्तुओं की कीमतों में कमी आयेगी यह माना जा रहा है। जीएसटी जब से लागू हुआ था तभी से व्यापारियों का एक बड़ा वर्ग इसका विरोध कर रहा था। व्यापारी इस कारण विरोध कर रहे थे कि इससे कर अदा करने में प्रक्रिया संबधी सरलता के जो दावे किये जा रहे थे वह वास्तव में सही नही उतरे। लेकिन व्यापारी के साथ ही आम आदमी भी उपभोक्ता के रूप में इससे परेशान हो उठा क्योंकि खरीददारी के बाद कुल
बिल पर जब जीएसटी के नाम पर कर वसूला जाने लगा तो उसे इस जीएसटी के कारण मंहगाई होने का अहसास हुआ। इससे पहले भी वह यही खरीददारी करता था परन्तु उस समय उसे जीएसटी के नाम से अलग अदायगी नही करनी पड़ती थी आज जब जीएसटी अलग से बिल में जुड़ता है तब वह इसका विरोध नही कर पाता है। जीएसटी को लेकर जब लोगों में नाराज़गी उभरी तब इस पर भाजपा के ही पूर्व वित्त मन्त्री रहे यशवंत सिन्हा सांसद शत्रुघ्न सिन्हा, पूर्व मन्त्री अरूणी शौरी जैसे बड़े नेताओं के विरोधी स्वर भी उभर कर सामने आ गये। राहुल गांधी ने जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स की संज्ञा दे दी। हिमाचल के चुनाव प्रचार अभियान में जब भाजपा के केन्द्रिय नेता प्रदेश में आयेे और पत्रकार वार्ताओं के माध्यम से मीडिया से रूबरू हुए तब उन्हे जीएसटी पर भी सवालों का समाना करना पड़ा। जीएसटी पर उठे सवालों के जवाब में भाजपा नेताओं का पहली बार यह स्टैण्ड सामने आया कि इसके लियेे मोदी सरकार नही बल्कि जीएसटी काऊंसिल जिम्मेदार है। भाजपा नेताओं ने इसके लिये कांग्रेस को भी बराबर का जिम्मेदार कहा और सवाल किया कि इसे वीरभद्र सरकार ने अपने विधानसभा में क्यों पारित किया?
जीएसटी नोटबन्दी के बाद दूसरा बड़ा आर्थिक फैंसला मोदी सरकार का रहा है। नोटबंदी को लागू हुए पूरा एक वर्ष हो गया है। विपक्ष ने 8 नवम्बर 2016 को काले दिवस के रूप में स्मरण किया है। पूर्व प्रधानमन्त्री डा. मनमोहन सिंह ने नोटबंदी को आर्थिक आतंक करार दिया है। नोटबंदी को लेकर मनमोहन सिंह ने जो चिन्ताएं देश के सामने रखी थी वह सब सही साबित हुई है। नोटबंदी के बाद आर्थिक विकास दर में 2% की कमी आयी है इसे रिजर्व बैंक ने भी स्वीकार कर लिया है। भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनावों में पहले ही मोदी को नेता घोषित कर दिया था। लोकसभा का चुनाव उनके नेतृत्व में लड़ा गया था। 2014 के लोकसभा चुनाव से पूर्व स्वामी राम देव और अन्ना आन्दोलनों के माध्यम से देश के भीतर भ्रष्टाचार और कालेधन को लेकर जो तस्वीर सामने रखी गयी थी वह एकदम भयानक और गंभीर थी। देश का आम आदमी उस स्थिति से छुटकारा पाना चाहता था। चुनावांे में उसे भरोसा दिलाया गया था कि मोदी की सरकार बनने से अच्छे दिन आयेंगे। इस भरोसे पर विश्वास करके ही जनता ने मोदी के नेतृत्व में भाजपा को प्रचण्ड बहुमत दिलाकर सत्तासीन किया। लेकिन सरकार बनने के आज चैथे साल भी वह अच्छे दिनों का वायदा पूरा नही हो पाया है। आम आदमी के लिये अच्छे दिनों का पहला मानक मंहगाई होती है। मंहगाई के मुहाने पर मोदी सरकार बुरी तरह असफल रही है आज आम कहा जा रहा है कि कांग्रेस के शासनकाल में मंहगाई की स्थिति यह नही थी। आज रसोई गैस की कीमत यूपीए शासन के मुकाबलेे में दोगुनी हो गयी है। पेट्रोल डीजल और सारे खाद्य पदार्थों की कीमतों में भारी वृद्धि आम आदमी के सामने है। बेरोजगारी कम होने की बजाये नोटबंदी और जीएसटी जैसे फैंसले से और बढ़ी है।
कालेधन और भ्रष्टाचार के जो आंकड़े 2014 के लोकसभा चुनावों से पूर्व देश के सामने थे वह आज भी वैसे ही खड़े है। मोदी और उनके सहयोगी जो यह दावा करते आ रहे थे कि उनके शासनकाल में भ्रष्टाचार का कोई बड़ा काण्ड सामने नही आया है। उनका यह दावा आज अमितशाह और अजित डोभल के बेटों पर लगे आरोपों से एकदम बेमानी हो जाता है। जिन बानामा पेपर्ज में नाम आने के बाद पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री नवाज़ शरीफ वहां के सुप्रीम कोर्ट का फैंसला आने के बाद पद से भी हटाये जा चुके हैं। वहीं पर भारत सरकार उन पेपर्ज में जिन लोगों के नाम आये हैं उनकेे खिलाफ कोई मामला तक दर्ज नहीं कर पायी है। अब पैराडाईज़ पेपरज़ में तोे मोदी के मन्त्राी और एक राज्य सभा सांसद तक का नाम आ गया है। लेकिन इसपर भी कोई कारवाई नही होगी यह माना जा रहा है। क्योंकि जिस लोकपाल के गठन को लेकर अन्ना का इतना बड़ा आन्दोलन यह देश देख चुका है आज मोदी सरकार इतनेे बड़े बहुमत के बाद भी उस मुद्दे पर पूरी तरह चुप्प बैठी हुई है। इसी से सरकार की भ्रष्टाचार के खिलाफ ईनामदारी और नीयत का पता चल जाता है। यही कारण है कि काॅमन वैल्थ गेम्ज़ और 2 जी जैसे मामलों पर चार वर्षों में कोई एफआईआर तक दर्ज नही हो पायी है।
आज जब जीएसटी पर सरकार ने नये सिरे से विचार करके 177 आईटमो को 28% से बाहर करने का फैंसला लिया है भले ही यह फैंसला गुजरात चुनावों के कारण लिया गया है। फिर भी यह स्वागत योग्य है इसी तर्ज में अब सरकार को चाहिये कि नोटबंदी के बाद कैश लैस और डिजिटल होने के फैसलों को ठण्डे बस्ते में डालकर काॅरपोरेट सैक्टर पर नकेल डालनेे का प्रयास करें। इस सैक्टर के पास जो कर्ज एनपीए के रूप में फंसा हुआ है उसे वसूलने में गंभीरता दिखायेे अन्यथा हालात आने वाले दिनों में सरकार के कन्ट्रोल से बाहर हो जायेगा यह तय है।