लोकतंत्र तब खतरे में आ जाता है जब इसके सबसे बड़े मंच संसद में राष्ट्रीय प्रश्नों पर बहस न हो पाये। विपक्ष के सवालों का जवाब लोकसभा में न आ पाये। बल्कि इन सवालों से बचने के लिए प्रधानमंत्री लोकसभा में ही न आये। संसद के बाहर अराजकता, भय और हिंसा का वातावरण निर्मित होने में सरकार की सक्रिय भूमिका पर प्रश्न खड़े होने शुरू हो जाये। इस समय दुर्भाग्य से यह सब घट रहा है। राष्ट्रीय प्रश्नों को जब शीर्ष न्यायपालिका भी लंबाने की नीति पर चल पड़े तो निश्चित रूप से यह मानना ही पड़ेगा कि लोकतंत्र सही में खतरे में है। इस समय वोट चोरी से लेकर एपस्टिन फाइल तक जितने भी राष्ट्रीय प्रश्न उठे हैं एक पर भी संसद के अन्दर बहस नहीं हुई है। जब-जब यह सवाल उठे हैं तब-तब प्रधानमंत्री लोकसभा में आये ही नहीं। विपक्ष को लोकसभा में बोलनेे ही नहीं दिया गया। बल्कि कुछ महिला सांसदों से प्रधानमंत्री को खतरा हो सकता है यह जानकारी स्वयं लोकसभा अध्यक्ष प्रधानमंत्री को देते हैं और प्रधानमंत्री लोकसभा में आने की बजाये राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर हुई चर्चा पर अपना धन्यवाद प्रस्ताव रखते हैं। लेकिन उन महिला सांसदों को चिन्हित करके उन पर कोई कारवाई नहीं की जाती है। संसद के बाहर एक भक्त इन सांसदों और राहुल गांधी को घर में घुसकर गोली मारने की बात करता है। पुलिस जब इस व्यक्ति के खिलाफ कारवाई करती है तब इसका आपराधिक रिकॉर्ड सामने आता है। इसी तरह एक सनातन सम्मेलन में जहां पर धार्मिक उन्माद और वैमनस्य बढ़ाने के आयोजकों द्वारा भाषण दिये जाते हैं तब आरटीआई की एक सूचना के माध्यम से यह जानकारी आती है कि इस सनातन सम्मेलन को संस्कृति मंत्रालय द्वारा तरेसठ लाख का अनुदान दिया गया है। इस सम्मेलन में हिन्दू राष्ट्र के लिये धार्मिक वैमन्सय का वातावरण निर्मित किया जाता है। ऐसे और भी कई प्रसंग है जहां हिन्दू राष्ट्र के लिये धार्मिक और जातीय भेदभाव को उकसाया गया है। ऐसे संकेत और संदेश उभर रहे हैं जहां हिन्दू राष्ट्र के लिये धार्मिक और जातिय हिंसा को बढ़ावा देने के उपक्रम किये जा रहे हैं। राष्ट्रीय प्रश्नों को हिंसा और अराजकता से दबाने के खुले प्रयास हो रहे हैं। सरकार कब तक राष्ट्रीय प्रश्नों से बचती रहेगी यह अब एक आम चर्चा का विषय बनता जा रहा है। क्योंकि जिस अनुपात में इन प्रश्नों से ध्यान भटकाने का प्रयास कर रही है उस अनुपात में यह सवाल और बड़े होते जा रहे हैं। सरकार की इस नीति और नीयत के कारण ही आज स्थितियां लोकसभा अध्यक्ष और चुनाव आयोग के अध्यक्ष के खिलाफ लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव तक आ गये हैं। आज जिस तरह से अमेरिका के साथ हुये व्यापार समझौते में देश के किसान पर संकट आया है उससे किसान के पास सड़क पर उतरने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं होगा। कृषि कानूनों के विरोध में देश किसान आन्दोलन को देख चुका है और सरकार भोग चुकी है। अब अमरिकी व्यापार समझौते के साथ ही पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवाणे की किताब का मुद्दा भी सरकार से जवाब मांग रहा है। जिस तरह से यह किताब चर्चा में आई है उसके परिणामस्वरुप इसका कथ्य हर आदमी तक पहुंच गया है। सरकार राष्ट्रीय प्रश्नों से बचने के लिये जितने प्रयास कर रही है उसके कारण उसकी हिन्दू राष्ट्र की मंशा जन चर्चा में आती जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस ढंग से पूरी भाजपा का प्रायः बन गये थे आज शायद पूरी भाजपा उनके अपने ही भार से दबने के कगार पर पहुंचती जा रही है। यही स्थिति भाजपा के लिये नुकसानदेह होगी। क्योंकि राष्ट्रीय प्रश्नों के साथ महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और काले धन के मुद्दे जुड़ जाएंगे। व्यवहारिक रूप से इन मुद्दों का आकार आज 2014 से कई गुना बढ़ गया है। इस बढ़ते आकार के साये में राष्ट्रीय प्रश्नों पर बहस की मांग को हिंसा और अराजकता से दबाना असंभव हो जाएगा।