Sunday, 30 November 2025
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आयुष्मान और हिमकेयर में हुये भ्रष्टाचार की सजा गरीब जनता को क्यों?

शिमला/शैल। क्या आयुष्मान भारत और हिमकेयर स्वास्थ्य योजनाओं में हुये भ्रष्टाचार की सजा प्रदेश की गरीब जनता को दिया जाना उचित है? क्योंकि इन सेवाओं में जनता को मिल रहा लाभ नही के बराबर हो गया है। स्मरणीय है कि केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के स्थान पर 2018 में आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना शुरू की थी। इस योजना में प्रत्येक कार्ड धारक परिवार को वर्ष में पांच लाख रूपये तक की निःशुल्क इलाज सुविधा प्रदान की गयी थी। इसी के तर्ज पर हिमाचल सरकार ने भी 2019 में हिमकेयर योजना शुरू की थी। इन योजनाओं का लाभ केवल सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि इसमें प्राइवेट अस्पतालों को भी सूचीबद्ध किया गया। प्रदेश में यह सुविधा 147 सरकारी और 115 प्राइवेट अस्पतालों में उपलब्ध करवाई गयी। लेकिन आज यह सुविधा इन प्राइवेट अस्पतालों में बंद कर दी गयी है और सरकारी अस्पतालों में भी इसका लाभ बहुत सीमित हो गया है। क्योंकि इन सुविधाओं के लिये दवाई और अन्य आवश्यक सामग्री की सप्लाई जो मेडिकल सप्लायर कर रहे थे उन्हें सप्लाई की गयी सामग्री के बिलों का भुगतान सरकार नहीं कर पायी है। आयुष्मान में 108 करोड़ के बिल भुगतान के लिये लंबित हैं और हिमकेयर में करीब 250 करोड़ के बिल लंबित हैं। स्वभाविक है कि जिन सप्लायरों के इस राशि के बिल भुगतान के लिये लंबित होंगे वह कैसे अगली सप्लाई दे पाएंगे और जब अस्पतालों में आवश्यक दवाई और दूसरा सामान नहीं होगा तो इसका सीधा असर मरीजों पर पड़ेगा। यह बिल इतनी मात्रा में लंबित क्यों चल रहे हैं। इसका कोई जवाब नहीं आ रहा है। क्या भारत सरकार आयुष्मान में प्रदेश को भुगतान नहीं कर रही है? क्योंकि केंद्र सरकार सूचीबद्ध अस्पतालों को सीधे भुगतान न करके राज्य की इस काम में लगी एजेन्सियों के माध्यम से करती है। हिमाचल में यह काम सरकार ने हिमाचल स्वास्थ्य बीमा योजना सोसायटी को दे रखा है। यह सोसाइटी सरकार की देखरेख में काम करती है। अन्य राज्यों में केंद्र और प्रदेश की भागीदारी 60ः40 के अनुपात में रहती है परन्तु हिमाचल में यह 90ः10 के अनुपात में है। क्योंकि केंद्र की हर योजना में यही अनुपात रहता है। केंद्र राज्यों को अपना हिस्सा तब भेजता है जब राज्य अपने हिस्से का पूरा भुगतान करके उसका यूटिलाइजेशन प्रमाण पत्र केंद्र को भेज देता है। लेकिन मार्च 2025 तक प्रदेश ने इन योजनाओं में अपने हिस्से के 464.88 करोड़ का भुगतान नहीं किया था। इसी के साथ इन योजनाओं में प्रदेश में बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार होने के भी आरोप हैं। इन आरोपों पर राज्य के विजिलैन्स ब्यूरो ने भी एक मामला दर्ज किया था लेकिन उस जांच का परिणाम आज तक सामने नहीं आ पाया है। विजिलैन्स ब्यूरो के बाद ई.डी. ने भी प्रदेश के कुछ प्राइवेट अस्पतालों बांके बिहारी, फॉर्टीज, श्री बालाजी, सूद नर्सिंग होम आदि पर कांगड़ा, ऊना, शिमला, मण्डी और कुल्लू में करीब 20 जगहों पर छापेमारी की थी। इसमें करीब 25-26 करोड़ का भ्रष्टाचार होने का अनुमान है। इस छापेमारी के बाद प्रदेश में 8937 गोल्डन कार्ड निष्क्रिय किये गये हैं। इस छापेमारी के बाद सरकार ने अगस्त 2025 में हिमकेयर प्राइवेट अस्पतालों में बंद कर दी है। इसमें आम आदमी निःशुल्क इलाज सुविधा से वंचित हो गया है। सप्लायरों ने भुगतान न होने पर सप्लाई बंद कर दी है उससे सरकारी अस्पताल भी प्रभावित हो गये हैं। लेकिन इसमें जो प्रश्न खड़े हैं उनमें सबसे बड़ा तो यह है कि क्या यह भ्रष्टाचार संबद्ध सरकारी तंत्र और जो सोसायटी इस काम को अंजाम दे रही थी उनकी जानकारी के बिना घट जाना संभव है? शायद नहीं। अभी तक यह जांच पूरी क्यों नहीं हो पा रही है?

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