Friday, 05 June 2026
Blue Red Green
Home देश

ShareThis for Joomla!

पूर्व छः सीपीएस की विधायकी पर संशय बरकरार

  • हिमाचल सरकार ने दो बार एक्ट पारित करके संविधान संशोधन की काट निकालने का प्रयास किया
  • असम के साथ हिमाचल की एसएलपी टैग होने और फैसला आ जाने की जानकारी के बाद हुई यह नियुक्तियां
शिमला/शैल। क्या पूर्व मुख्य संसदीय सचिवों की विधायकी बच पायेगी? यह सवाल सर्वाेच्च न्यायालय द्वारा हिमाचल उच्च न्यायालय के फैसले के पैराग्राफ 50 के तहत अगली कारवाई पर लगाई गयी रोक के बाद चर्चा का विषय बना हुआ है। सर्वाेच्च न्यायालय में अगली सुनवाई 20 जनवरी को होगी और तब तक विधायकी सलामत रहेगी। लेकिन क्या होता है यह देखना रोचक होगा। संविधान में 2003 में 91वां संशोधन होने के बाद मंत्रिमण्डलों में मंत्रियों की सीमा तय कर दी गयी थी। जिसके तहत हिमाचल में यह संख्या बारह से अधिक नहीं हो सकती। लेकिन हिमाचल सरकार ने इस संविधान संशोधन के बाद मुख्य संसदीय सचिव और संसदीय सचिव बनने का अधिनियम पारित करके पांच मुख्य संसदीय सचिव और तीन संसदीय सचिव नियुक्त कर लिये। इन नियुक्तियों को सिटीजन प्रोटेक्शन फॉर्म के संयोजक देशबंधु सूद ने उच्च न्यायालय में चुनौती दे दी। जिस पर 18 अगस्त 2005 को फैसला आया। जिसमें नियुक्तियों को असंवैधानिक ठहराते हुये रद्द कर दिया। हिमाचल सरकार ने इस फैसले के खिलाफ सर्वाेच्च न्यायालय में एसएलपी दायर कर दी। परन्तु इसका फैसला आने से पहले ही 2006 में मुख्य संसदीय सचिव और संसदीय सचिव नियुक्त करने का फिर से एक्ट पारित कर लिया। इस एक्ट के तहत भी मुख्य संसदीय सचिव और संसदीय सचिव नियुक्त हुये। फिर इस एक्ट को भी प्रदेश उच्च न्यायालय में चुनौती मिल गयी। इसी बीच उच्च न्यायालय के पहले फैसले के खिलाफ दायर की गयी एसएलपी असम के मामले के साथ टैग हो गयी। इस पर जुलाई 2017 में फैसला आया और सर्वाेच्च न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि राज्य विधायिका ऐसा एक्ट पारित करने के लिये सक्षम ही नहीं है। उधर इस आश्य का जो एक्ट दूसरी बार पारित किया गया था और उसको उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा चुकी थी उसकी सुनवाई आ गयी। इस पर सरकार ने शपथ पत्र देकर कहा है कि यदि ऐसी नियुक्तियां करने की कोई स्थिति आये तो उच्च न्यायालय से पूर्व अनुमति लेकर ऐसा किया जायेगा। यह सब जयराम सरकार के शुरुआती दिनों में ही हो गया इसलिए इस सरकार में ऐसी नियुक्तियां नहीं हो पायी। अब यह स्पष्ट हो जाता है कि हिमाचल सरकार ने संविधान के 91वें संशोधन की काट के लिए दो बार मुख्य संसदीय सचिव और संसदीय सचिव नियुक्त करने के लिए एक्ट पारित किये। दूसरी बार पारित किए गये एक्ट को जब उच्च न्यायालय में चुनौती मिल गई तो शपथ पत्र देकर अदालत से पूर्व अनुमति लेने की बात कर दी। इस तरह जब सुक्खू सरकार ने यह नियुक्तियां की तो उसे यह जानकारी थी कि असम के साथ ही हिमाचल की एसएलपी टैग हो गयी थी और उस पर फैसला आ गया था कि राज्य विधायिका ऐसा एक्ट बनाने के लिए सक्षम ही नहीं है। यह भी इस सरकार की जानकारी में था कि जिस एक्ट के तहत वह यह नियुक्तियां करने जा रही है उसे उच्च न्यायालय में चुनौती मिल चुकी है। यह भी संज्ञान में था कि सरकार ने उच्च न्यायालय से पूर्व अनुमति लेने की बात कह रखी है। ऐसे में अब यदि सर्वाेच्च न्यायालय के संज्ञान में यह आ गया की 91वें संविधान संशोधन को अंगूठा दिखाने के लिये राज्य सरकार बार-बार प्रयास कर रही है। तब स्थिति का कड़ा संज्ञान लेकर इनकी विधायकी पर भी आंच आ सकती है। अब हिमाचल का मामला दूसरे राज्यों के साथ टैग हो गया तो संभव है कि यह मामले संविधान पीठ के पास जायें ताकि इस तरह की स्थिति फिर किसी राज्य में न आये। कई राज्यों ने संविधान संशोधन के बाद ऐसे एक्ट बना रखे हैं। आठ उच्च न्यायालय तो इन्हें निरस्त कर चुके हैं। इसलिये सर्वाेच्च न्यायालय पर सबकी निगाहें लगी हुई हैं।

पूर्व मुख्य संसदीय सचिवों की विधायकी जाना तय है

  • राज्य विधायिका ऐसा अधिनियम पारित ही नहीं कर सकती।
  • सीपीएस मामले पर आया उच्च न्यायालय का फैसला सरकार की सेहत पर भारी पड़ेगा।
  • सुप्रीम कोर्ट में स्टे मिलने की संभावनाएं बहुत कम हैं
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्तियों को अवैध और असंवैधानिक करार देते हुये तुरन्त प्रभाव से निरस्त कर दिया है। इसी के साथ 2006 में पारित इस आश्य के अधिनियम को भी निरस्त कर दिया है। उच्च न्यायालय ने कहा है कि In view of the above discussion, impugned H.P. Parliamentary Secretaries (Appointment, Salaries, Allowances, Powers, Privileges & Amenities) Act, 2006 is quashed as being beyond the legislative competence of theState Legislature.
Consequently, all subsequent actions, including the appointment of respondents No.5 to 10 in CWP No.2507 of 2023, who are also respondents No.4 to 9 in CWPIL No.19 of 2023, are held and declared to be illegal,unconstitutional, void ab-initio and accordingly are set aside.
Since the impugned Act is void ab initio therefore respondents No.5 to 10 in CWP No.2507 of 2023 (respondents No.4 to 9 in CWPIL No.19 of 2023) are usurpers of public office right from their inception and thus, their continuance in the office, based on their illegal and unconstitutional appointment, is completely impermissible in law. Accordingly, from now onwards, they shall cease to be holder of the office(s) of Chief Parliamentary Secretaries with all the consequences.
Accordingly, protection granted to such appointment to the office of Chief Parliamentary Secretary/ or Parliamentary Secretary as per Section 3 with Clause (d) of Himachal Pradesh Legislative Assembly Members (Removal of Disqualifications) Act, 1971 is also declared illegal and unconstitutional and thus, claim of such protection under above referred Section 3(d) is inconsequential. Natural consequences and legal implications whereof shall follow forthwith in accordance with law.
उच्च न्यायालय ने सर्वाेच्च न्यायालय द्वारा ऐसी ही नियुक्तियां असम सरकार द्वारा किये जाने पर आयी याचिका के फैसले के आधार पर दिया है। स्मरणीय है कि केन्द्र सरकार ने राज्यों द्वारा मंत्रीमंडलों के गठन में मंत्रियों की संख्या निर्धारित करते हुये 1-1-2004 को संविधान में 91वां संशोधन करके यह संख्या 15% निर्धारित की थी। जहां विधानसभा की सदस्य संख्या एक सौ से कम थी वहां पर मंत्रियों की संख्या बारह तय की थी। हिमाचल में इस संविधान संशोधन के बाद मंत्रियों की कुल संख्या बारह ही हो सकती है। लेकिन कई राज्यों में इस संविधान संशोधन को नजरअन्दाज करके मुख्य संसदीय सचिव और संसदीय सचिव बनाने के अपने-अपने अधिनियम पारित कर लिये। ऐसे अधिनियमों को देश के आठ उच्च न्यायालय रद्द कर चुके हैं। सर्वाेच्च न्यायालय के फैसले के बाद राज्यों के ऐसे अधिनियमों को colourable legislation कहा गया है। संसद इस आश्य के संविधान संशोधन को पारित कर चुकी है और सर्वाेच्च न्यायालय इसके पक्ष में फैसला दे चुका है ऐसी स्थिति में राज्यों के इस आश्य के अधिनियमों को अदालतों का संरक्षण नहीं मिल पाया है। इस परिदृश्य में प्रदेश उच्च न्यायालय ने सरकार के अधिनियम और उसके तहत की गयी नियुक्तियों को illegal, unconstitutional और void ab-initio करार दिया है। साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया है कि Natural consequences and legal implications whereof shall follow forthwith in accordance with law. उच्च न्यायालय ने 1971 के उस अधिनियम को भी अवैध और असंवैधानिक करार दे दिया है जिसके तहत अयोग्य घोषित होने के खिलाफ संरक्षण प्राप्त था। संरक्षण के अवैध और असंवैधानिक घोषित होने से जो भी लाभ इन लोगों को एक विधायक के अतिरिक्त मिले हैं उनकी भी वसूली होने की संभावना बन जाती है। प्रशासन ने उच्च न्यायालय के निर्देशों की अनुपालना करते हुये इन्हें पदों से मुक्त करते हुए अन्य सुविधाएं भी वापस ले ली हैं।
सरकार ने उच्च न्यायालय के फैसले को सर्वाेच्च न्यायालय में चुनौती दे दी है। सरकार की चुनौती के साथ ही याचिकाकर्ता भाजपा विधायकों की ओर से भी कैबिएट दायर कर दी गयी है। इस वस्तु स्थिति में सर्वाेच्च न्यायालय द्वारा उच्च न्यायालय के फैसले पर स्टेे मिलने की संभावना नहीं है। क्योंकि यह लोग पद छोड़ चुके हैं। पद छोड़ने से मामले की तत्कालिकता नहीं रह जाती। ऐसे में यदि सरकार की अपील सामान्य प्रक्रिया के तहत ही सुनवाई के लिये आती है तो इस कालखण्ड में राज्यपाल संविधान की धारा 191 और 192 के प्रावधानों की अनुपालना करते हुये इन लोगों को सदन की सदस्यता से बाहर कर सकते हैं।
शैल के पाठक जानते हैं की शैल ने पिछले वर्ष नौ जनवरी 22 मई और 23 नवम्बर को इस विषय पर विस्तार से लिखा था। स्व.वीरभद्र के कार्यकाल में भी प्रदेश उच्च न्यायालय ऐसी नियुक्तियों को सिटीजन प्रोटेक्शन फॉर्म की याचिका पर रद्द कर चुका है। सरकार उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ सर्वाेच्च न्यायालय में गयी थी। शीर्ष अदालत में हिमाचल की एसएलपी असम के मामले के साथ टैग हुई थी। इस पर जुलाई 2017 में फैसला आया था। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कहा था कि राज्य विधायिका ऐसा कोई अधिनियम पारित करने की पात्र ही नहीं है। शैल ने शीर्ष अदालत का यह फैसला पाठकों के समक्ष रख दिया था। अब असम के आधार पर ही प्रदेश उच्च न्यायालय का विस्तृत फैसला आया है। उच्च न्यायालय के इस फैसले का प्रदेश की वर्तमान राजनीति पर गहरा और दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। इस फैसले के बाद सरकार के खिलाफ उभरते रोष के स्वर ज्यादा मुखर होने की संभावना है।

क्या नये गठन में एक व्यक्ति एक पद पर अमल हो पायेगा?

  • जब सरकार मित्रों की है तो संगठन में मित्र कैसे बाहर रहेंगे?
  • क्या नयी टीम स्पष्टीकरणों को स्पष्ट कर पायेगी?
  • क्या नयी टीम व्यवस्था परिवर्तन को परिभाषित कर पायेगी?

शिमला/शैल। कांग्रेस हाईकमान ने हिमाचल प्रदेश की राज्य से लेकर ब्लॉक स्तर तक सभी ईकाईयों को भंगकर दिया है। राजनीतिक हल्कों में इसे एक बड़ा फैसला माना जा रहा है। हिमाचल में कांग्रेस की सरकार को सत्ता में आये दो वर्ष होने जा रहे हैं। प्रतिभा वीरभद्र सिंह ने प्रदेश विधानसभा के चुनावों से पहले संगठन की अध्यक्षता संभाली थी। बल्कि जब मण्डी से लोकसभा का उप चुनाव लड़ा था तब कुलदीप राठौर अध्यक्ष थे। प्रतिभा सिंह की अध्यक्षता में पार्टी विधानसभा चुनाव जीत कर सत्ता में आ गयी। परन्तु पार्टी की सरकार बनने के बाद लोकसभा की चारों सीटें हार गयी। राज्य सभा चुनाव के दौरान चुनाव हारने के साथ ही पार्टी के छः विधायक भी संगठन को छोड़कर भाजपा में शामिल हो गये। इन विधायकों के पार्टी छोड़ने के कारण हुये विधानसभा उपचुनावों में कांग्रेस ने फिर से चालीस का आंकड़ा तो हासिल कर लिया लेकिन इसी चुनाव में लोकसभा की चारों सीटें हार जाने का सच हाईकमान को शायद अब तक स्पष्ट नहीं हो सका है। ऐसे में विश्लेषकों के लिये यह एक महत्वपूर्ण सवाल हो जाता है कि आखिर हाईकमान को यह कदम क्यों उठाना पड़ा। प्रतिभा सिंह निष्क्रिय पदाधिकारी को बाहर करने की बात अकसर करती रही है। अब हाईकमान ने प्रतिभा सिंह की बात मानकर संगठन को नये सिरे से गठन करने की सिफारिश मानकर क्या संदेश दिया है यह समझना आवश्यक हो जाता है।
यह एक स्थापित सच है कि पार्टी को सत्ता में लाने के लिये संगठन की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। लेकिन सरकार बनने के बाद संगठन को साथ लेकर चलना सरकार की जिम्मेदारी हो जाती है। कांग्रेस ने विधानसभा का चुनाव सामूहिक नेतृत्व के नाम पर लड़ा था। विधानसभा चुनाव में सुक्खू मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं थे। सुक्खू मुख्यमंत्री केंद्रीय नेतृत्व की पसंद के कारण बने हैं। इसलिये मुख्यमंत्री बनने के बाद सबको साथ लेकर चलना मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी थी। परन्तु मुख्यमंत्री बनने के बाद मंत्रीमण्डल की शपथ के पहले मुख्य संसदीय सचिवों को शपथ दिलाना शायद पहला फैसला था जिस पर संगठन में कोई विचार विमर्श नहीं हुआ था। जिस तरह की कानूनी स्थिति सर्वाेच्च न्यायालय के फैसले के कारण बन चुकी थी उसके परिदृश्य में यह नियुक्तियां कोई बड़ी राजनीतिक समझ का प्रदर्शन नहीं थी। बल्कि आज भी न्यायालय के फैसले की प्रतीक्षा बनी हुई है। विपक्ष का फिजूलखर्ची पर यह पहला हमला होता है। वितीय संकट में चल रहे प्रदेश में ऐसी नियुक्तियों की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि प्रदेश के हालात श्रीलंका जैसे होने की चेतावनी इन नियुक्तियों से पहले ही दे दी गयी थी। फिर इन नियुक्तियों के बाद कैबिनेट रैंक में सलाहकारों और ओएसडी आदि की तैनाती ने स्थितियों को और गंभीर बना दिया। जब मंत्रिमण्डल का गठन हुआ तो उसमें कुछ पद खाली छोड़ दिये गये। खाली छोड़े गये पदों में से जब दो भरे गये तो उन्हें विभागों का आबंटन करने में ही आवश्यकता से अधिक देरी कर दी गयी। इस तरह राजनीतिक परिस्थितियां ऐसी बनती चली गयी कि संगठन सरकार में तालमेल का अभाव स्वतः ही सार्वजनिक होने लग पड़ा। राज्यसभा चुनाव तक पहुंचते- पहुंचते स्थितियां प्रबंधन से बाहर हो गयी।
मुख्यमंत्री ने पदभार संभालते ही प्रदेश की हालत श्रीलंका जैसे होने की चेतावनी तो दे दी थी। लेकिन उससे निपटने के लिए कर्ज और कर लगाने का आसान रास्ता चुन लिया। यह रास्ता चुनने के कारण विधानसभा चुनावों में दी गारंटीयां पूरी करने में कठिनाई आना स्वभाविक था। इसके परिणाम स्वरूप हर गारंटी में पात्रता के राइटर लगाने पड़ गये। राइटर लगाने का अघोषित कारण केन्द्र द्वारा आर्थिक सहयोग न मिलना प्रचारित किया गया। परन्तु इस प्रचार पर सुक्खू के कुछ मंत्रियों ने ही प्रश्न चिन्ह खड़े कर दिये। भाजपा नेताओं ने केंद्रीय सहायता और सरकार द्वारा कर्ज लेने के आंकड़े जारी करने शुरू कर दिये। स्थितियां यहां तक उलझ गई कि प्रदेश की कठिन वितीय स्थिति का रिकॉर्ड विधानसभा के पटल पर रखते हुये मुख्यमंत्री को वेतन भत्ते निलंबित करने का फैसला पटल पर रखना पड़ गया। सरकार ने वित्तीय संसाधन बढ़ाने के लिये जिस तरह का करभार जनता पर बढ़ाना शुरू किया उन फैसलों पर सरकार जगहसाई का पात्र बन गयी। हर फैसले का स्पष्टीकरण जारी करने की बाध्यता बन गयी। अब जिस तरह से समोसा कांड और मुख्यमंत्री के फोटो प्रैस में जारी करने पर सरकार को पत्र लिखने पड़ गये हैं उससे यह सीधे सन्देश गया कि शायद शीर्ष नौकरशाही पर सरकार का नियंत्रण नहीं रह गया है। फैसलों के स्पष्टीकरणों से भाजपा के आरोप स्वतः ही प्रमाणित होते जा रहे हैं।
ऐसी वस्तुस्थिति में संगठन की इकाईयां भंग करके नये सिरे से गठन करने की कवायद का कितना व्यवहारिक लाभ होगा इस पर चर्चाएं चल पड़ी है। क्योंकि सरकार पर एक आरोप मित्रों की सरकार होने का बड़े अरसे से लगना शुरू हो गया है। ऐसे में स्वभाविक है कि यह मित्र लोग संगठन में भी बड़ा हिस्सा चाहेंगे। जबकि इस समय संगठन में ऐसे लोगों की आवश्यकता होगी जो अपनी ही सरकार से तीखे सवाल पूछने का साहस रखते हों। क्योंकि सरकार का सन्देश कार्यकर्ता के माध्यम से ही जनता तक जाता है और इस समय फैसलांे के स्पष्टीकरण के अतिरिक्त जनता में ले जाने वाला कुछ नहीं है। सरकार की परफॉरमैन्स अपनी गारंटीयों के तराजू में ही बहुत पिछड़ी हुई है। गारंटी 18 से 60 वर्ष की हर महिला को पन्द्रह सौ देने की थी जो अब पात्रता के मानकों में ऐसी उलझ गयी है की आने वाले समय में सरकार की सबसे बड़ी असफलता बन जायेगी। यही स्थिति रोजगार के क्षेत्र में है। ऐसे में यह देखना रोचक होगा कि इस परिदृश्य में संगठन का पुनर्गठन किन आधारों पर होगा। क्योंकि यह सरकार जिस तरह की वस्तुस्थिति में उलझ चुकी है उससे बाहर निकल पाना आसान नहीं होगा। नये पदाधिकारी सरकार के फैसलों पर कैसे अपना पक्ष रख पायेंगे? क्योंकि वित्तीय संकट के लिये पिछली सरकार को कोसते हुए उसके खिलाफ कौन सी कारवाई शुरू की गयी है। इसका कोई जवाब इस सरकार के पास नहीं है। ऐसे में यह पुनर्गठन प्रदेश नेतृत्व से ज्यादा हाईकमान की कसौटी बन जायेगा।

More Articles...

  1. प्रधानमंत्री ने प्रदेश सरकार की परफॉरमैन्स को फिर बनाया चुनावी मुद्दा
  2. ऐसे फैसले चुनावों के दौरान ही क्यों आ रहे
  3. जब वित्तीय स्थिति ठीक है तो रेल विस्तार में अपना हिस्सा क्यों नहीं दे पा रही सरकार?
  4. क्या हिमाचल राजनीतिक विस्फोटक की और बढ़ रहा है?
  5. हिमाचल कांग्रेस के नेता गारंटियों के झूठ के कारण हरियाणा चुनाव प्रचार से रहे गायब
  6. यदि 35 मेगावाट का प्रोजेक्ट 144 करोड़ में तो 32 मेगावाट का 220 करोड़ में क्यों लगा-विक्रम
  7. मस्जिद के अवैध निर्माण और वक्फ संपत्तियों के कथित ब्योरे पर उभरे विवाद का अन्त क्या होगा?
  8. प्रधानमंत्री द्वारा हिमाचल को चुनावी मुद्दा बनाना एक बड़ा संकेत है।
  9. संजौली मस्जिद विवाद का राजनीतिक प्रतिफल घातक होगा
  10. क्या भाजपा अपने मुद्दों के प्रति गंभीर है?
  11. एचआरटीसी की खरीद से नादौन में लैंड सीलिंग पर उठे सवाल
  12. कौन पहले जांच पूरी करेगा शिमला पुलिस या ईडी
  13. वित्तीय से ज्यादा बड़ा होता जा रहा है विश्वसनीयता का संकट
  14. स्व. वीरभद्र सिंह की प्रस्तावित मूर्ति स्थापना पर मनकोटिया के विरोध के मायने
  15. इन उपचुनावों में भाजपा की नीयत और नीति पर उठाये सवाल
  16. आने वाले दिनों में केंद्र की अन्य एजैन्सीयों के दखल की संभावना
  17. यदि इनके त्यागपत्र पहले ही स्वीकार कर लिये जाते तो इस खर्च से बचा जा सकता था ?
  18. यह उप चुनाव सुक्खू और अनुराग की प्रतिष्ठा का टैस्ट होंगे
  19. 3-10 June 2024 Shail
  20. लोकसभा में मिली हार के परिणाम गंभीर होंगे

Subcategories

  • लीगल
  • सोशल मूवमेंट
  • आपदा
  • पोलिटिकल

    The Joomla! content management system lets you create webpages of various types using extensions. There are 5 basic types of extensions: components, modules, templates, languages, and plugins. Your website includes the extensions you need to create a basic website in English, but thousands of additional extensions of all types are available. The Joomla! Extensions Directory is the largest directory of Joomla! extensions.

  • शिक्षा

    We search the whole countryside for the best fruit growers.

    You can let each supplier have a page that he or she can edit. To see this in action you will need to create a users who is in the suppliers group.  
    Create one page in the growers category for that user and make that supplier the author of the page.  That user will be able to edit his or her page.

    This illustrates the use of the Edit Own permission.

  • पर्यावरण

Facebook



  Search