शिमला/शैल। भाजपा विधायक दल ने नेता प्रतिपक्ष जय राम ठाकुर के नेतृत्व में राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल से भेंट कर एक ज्ञापन सौंपकर विधानसभा अध्यक्ष को उनके पद से हटाने की मांग की है। भाजपा का आरोप है कि अध्यक्ष का आचरण सदन के अन्दर पक्षपात पूर्ण रहता है। आरोप है कि भाजपा विधायक दल ने नियम 67 के तहत प्रदेश की बिगड़ती आर्थिक स्थिति पर चर्चा करने के लिये स्थगन प्रस्ताव दिया था जिस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। भाजपा ने राज्यपाल के संज्ञान में यह भी लाया है कि लोकसभा चुनाव के दौरान एक कार्यक्रम में विधानसभा अध्यक्ष ने भाषण देते हुये कहा कि मैंने छः विधायकों के सिर कलम कर दिये हैं और तीन मेरे आरे के नीचे तड़प रहे हैं। यह शब्द अलोकतान्त्रिक और असंसदीय है। इससे विधायकों की भावनाएं आहत हुई हैं और अध्यक्ष पद की गरिमा को भी ठेस पहुंची है। सदन के अन्दर विधायक इन्द्रदत लखनपाल द्वारा यह मुद्दा उठाने पर विधानसभा अध्यक्ष ने खेद प्रकट करना तो दूर अपने शब्द भी वापस नहीं लिये। मीडिया के सामने कहा कि नेता प्रतिपक्ष मेरे से बहुत जूनियर है वह मुझे क्या सिखायेंगे। इसी के साथ राज्यपाल के संज्ञान में यह भी लाया गया कि भाजपा विधायक दल ने नियम 274 के तहत विधानसभा सचिव को विधानसभा अध्यक्ष के पद से हटाने का संकल्प प्रस्तुत किया। लेकिन विधानसभा अध्यक्ष सत्र शुरू होने पर अपने आसन पर आकर बैठ गये। जबकि नैतिकता के आधार पर उन्हें संकल्प पेश होने और उस पर चर्चा तथा मतदान होने तक आसन पर नहीं आना चाहिये था।
यह आरोप अपने में गंभीर है स्वभाविक है कि यदि यह आरोप आगे बढ़ते हैं तो स्थितियां और भी कठिन हो जायेंगी। इसलिए अन्ततः दोनों पक्षों में यह मुद्दा यहीं रुक जायेगा। लेकिन यह अपने में ही महत्वपूर्ण है कि एक समय अध्यक्ष भाजपा विधायकों के खिलाफ अवमानना की कारवाई करने के लिये तैयार थे। बल्कि यहां तक बात आ गयी थी कि यदि मुख्य संसदीय सचिवों के प्रकरण में कुछ आगे बढ़ता है तो उसका जवाब भाजपा विधायकों के खिलाफ कारवाई के रूप में सामने आयेगा। इस लिये अब यह मामला भाजपा-कांग्रेस का आपसी मामला होकर रह गया है और आम आदमी इसमें से गायब हो गया है। भाजपा नियम 67 के तहत प्रदेश की बिगड़ी वित्तीय स्थिति पर चर्चा करने की मांग लेकर आयी थी जो इस घटनाक्रम में पर्दे के पीछे चली गयी। मुख्यमंत्री ने सदन में प्रदेश की बिगड़ती स्थिति पर अपना लिखित वक्तव्य रखा। लेकिन इस ब्यान के बाद एक दम यू टर्न लेते हुये यह कहा कि प्रदेश की स्थिति एकदम ठीक है। वेतन भत्तों के विलम्बन का फैसला तो व्यवस्था सुधारने की दिशा में एक सख्त कदम है। सरकार का इस तरह से चौबीस घंटे में अपना स्टैंड बदलना कई सवाल खड़े करता है। प्रदेश की जनता को यह जानने का हक हासिल है कि प्रदेश की वास्तविक स्थिति क्या है। क्यों प्रदेश सरकार को हर माह एक हजार करोड़ से अधिक का कर्ज लेना पड़ रहा है। इस स्थिति में तो इस सरकार के अपने कार्यकाल का ही कर्ज साठ हजार करोड़ का आंकड़ा पार कर जायेगा।
यह सरकार वित्तीय कुप्रबंधन का आरोप पूर्व की जय राम सरकार पर लगाती आयी है। वित्तीय स्थिति पर लाये श्वेत पत्र में भी यह आरोप दर्ज है। आज जब सरकार तय समय पर अपने कर्मचारीयों और पैन्शनरों का भुगतान नहीं कर पायी है तब विपक्ष के पास एक अवसर था कि इस संबंध में सारी सच्चाई प्रदेश की जनता के सामने लाने के लिये सरकार को बाध्य करते। इस सदन में रोजगार और आउटसोर्स कर्मियों के लेकर आये सवालों के जवाब में सूचना एकत्रित की जा रही है का ही जवाब आया है। जब किसी भी कारण से मुख्यमंत्री को अपने वेतन भत्तों को निलंबित रखने का फैसला सदन की जानकारी में लाना पड़े तो उसके किसी भी वायदे पर कितना भरोसा किया जा सकता है यह एक सामान्य समझ का प्रश्न है। कांग्रेस की सरकार लोगों को गारंटीयां देकर सत्ता में आयी थी। प्रदेश कांग्रेस के नेता कार्यकर्ताओं को सरकार में स्थान न मिलने पर किस हद तक मुखर हो गये थे पूरा प्रदेश जानता है। लेकिन इस समय आम आदमी के सवाल पर सारा नेतृत्व खामोश हो गया है। ऐसा माना जा रहा है कि विपक्ष हिमाचल की स्थिति को हरियाणा के चुनावों में मुद्दा बनायेगी। लेकिन हिमाचल के संदर्भ में भाजपा की भूमिका पर सवाल उठने शुरू हो गये हैं कि भाजपा प्रदेश की वित्तीय स्थिति पर एक विपक्ष से ज्यादा कुछ नहीं कर रही है। इस समय वित्तीय स्थिति पर आम आदमी के सामने सारी स्थिति आनी चाहिए क्योंकि इसमें सबसे ज्यादा नुकसान आम आदमी का होने जा रहा है। आने वाले समय में आम आदमी किसी भी दल के किसी भी वायदे पर विश्वास नहीं कर पायेगा?
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश की एक राज्यसभा सीट के लिए इस वर्ष फरवरी में हुये चुनाव में कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद कांग्रेस का प्रत्याशी हार गया था। क्योंकि कांग्रेस के छः और तानों निर्दलीय विधायकों ने भाजपा के पक्ष में वोट किया। राज्यसभा चुनाव के लिए कोई भी राजनीतिक दल अपने विधायकों को सचेतक जारी करके किसी उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करने के लिये बाध्य नहीं कर सकता। यह नियम है। इसी नियम का सहारा लेकर छः कांग्रेसियों ने अपनी नाराजगी रिकॉर्ड पर लाने के लिए क्रॉस वोटिंग कर दी। लेकिन कांग्रेस नेतृत्व में इस बजट पर मतदान के समय गैर हाजिरी रहना करार देकर इन लोगों को सदन और विधायकी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। यह सभी लोग भाजपा में शामिल हो गये और भाजपा ने इन्हें उपचुनाव के लिये अपना उम्मीदवार भी नामित कर दिया। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान करीब एक माह यह लोग अपने चुनाव क्षेत्रों और प्रदेश से भी बाहर रहे। इस बाहर रहने पर जो खर्च हुआ उसे कांग्रेस ने भाजपा के ऑपरेशन कमल की संज्ञा दे दी। एक एक विधायक को पन्द्रह-पन्द्रह करोड़ दिए जाने का आरोप लगा और यही आरोप उप चुनावों की मुख्य मुद्दा बना। बल्कि कांग्रेस के दो विधायकों संजय अवस्थी और भूवनेश्वर गॉड ने बाकायदा बालूगंज थाना में शिकायत देकर आपराधिक मामला दर्ज करवा दिया। यह मामला विधायक आशीष शर्मा और पूर्व विधायक चैतन्य शर्मा के पिता सेवानिवृत्त मुख्य सचिव राकेश शर्मा के खिलाफ दर्ज किया गया।
अब इस मामले की जांच चल रही है। इस जांच में विधायक आशीष शर्मा को पुलिस दो बार पूछताछ के लिये बुला चुकी है। राकेश शर्मा और पूर्व विधायक रवि ठाकुर और तथा चैतन्य शर्मा से घंटों पुलिस पूछताछ कर चुकी है। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री और अब केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर के प्रचार सलाहकार तरुण भंडारी से भी बालूगंज में पूछताछ हो चुकी है। माना जा रहा है कि भाजपा के पक्ष में मतदान करने वाले सभी लोगों को देर सवेर पूछताछ के लिये बुलाया ही जायेगा। पुलिस अब तक की जांच में यह पता लगा चुकी है कि चण्डीगढ़ में इनके ठहराव के दौरान का सारा बिल एक फार्मा कंपनी ने अदा किया है और उसके तार खट्टर के प्रचार सलाहकार तक पहुंच रहे हैं। जिस हेलीकॉप्टर कंपनी ने इन विधायकों को हवाई यात्राएं कारवाई उसके मुख्यालय गुरुग्राम भी हिमाचल पुलिस दस्तक दे आयी है। हेलीकॉप्टर कंपनी के यहां जाने पर काफी विवाद भी उठ चुका है। जिसमें दोनों प्रदेशों के शीर्ष पुलिस प्रबंधन को भी बीच में आना पड़ा है। हिमाचल पुलिस की जांच का मुख्य बिन्दु यह पता लगाना है कि क्या हिमाचल सरकार को गिराने के लिए धनबल का प्रयोग हुआ। यदि हुआ तो यह खर्च किसने किया? जब उपचुनावों के प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री और अन्य कांग्रेसी नेताओं ने इन लोगों के खिलाफ पन्द्रह-पन्द्रह करोड़ में बिकने का आरोप लगाया था तब कुछ लोगों ने मुख्यमंत्री के खिलाफ मानहानि के मामले भी दायर किये हैं। इन मामलों में प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है। ऐसे में यदि हिमाचल पुलिस इस सारे खेल में धन बल का प्रयोग होना प्रमाणित नहीं कर पाती है तो मानहानि के मामलों में स्थिति नाजुक होना तय है।
हिमाचल पुलिस यदि धनबल का प्रयोग होना प्रमाणित कर देती है तो निश्चित रूप से उसकी आंच भाजपा हाईकमान तक भी पहुंचेगी। क्योंकि आरोप पन्द्रह-पन्द्रह करोड़ देने का है। उस समय भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा थे। उन्हीं की संस्तुति से यह लोग भाजपा में शामिल हुए और उपचुनाव में उम्मीदवार भी बने। धन बल के सहारे किसी भी लोकतांत्रिक सरकार को गिराने का प्रयास करना न केवल निन्दनीय है बल्कि यह गंभीर अपराध भी है। इसके प्रमाणित हो जाने का असर भाजपा के भविष्य पर भी पड़ेगा यह तय है। यदि यह आरोप प्रमाणित नहीं हो पाते हैं तो इसका सीधा प्रभाव मुख्यमंत्री के खिलाफ दायर हुए मानहानि के मामलों पर पढ़ना तय है। इसी बीच हिमाचल में ईडी और आयकर जैसी एजैन्सीयां दखल दे चुकी है। नादौन में तीन बार ईडी आ चुकी है। सूत्रों के मुताबिक ईडी के हाथ लगे मामले बहुत ही गंभीर हैं। ऐसे में राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में यह आम चर्चा का विषय बना हुआ है कि हिमाचल पुलिस अपनी जांच को पहले अंतिम रूप दे पाती है या ईडी अपनी धरपकड़ की प्रक्रिया पर अमल कर पाती है। या दोनों ही ओर से हथियार डाल दिये जाते हैं। वैसे इस प्रकरण पर प्रदेश के हर आदमी की नजर लगी हुई है।
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