Friday, 05 June 2026
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वित्तीय से ज्यादा बड़ा होता जा रहा है विश्वसनीयता का संकट

  • अपने खर्चों पर लगाम लगाए बिना सारे आर्थिक उपाय अर्थहीन हो जाएंगे।
  • कर्ज लेकर राहत बांटना भविष्य को गिरवी रखना है।
  • व्यवस्था परिवर्तन का सूत्र घातक होगा।
शिमला/शैल। सुक्खु सरकार ने प्राइवेट अस्पतालों से हिमकेयर योजना बन्द कर दी है। परिवहन निगम में न्यूनतम किराया बारह रुपये करने का फैसला लिया जा रहा है। रियायती येलो कार्ड, स्मार्ट कार्ड ,सम्मान कार्ड के रेट 50 रुपये से 100 रुपये कर दिए हैं। प्राइवेट स्कूलों की स्कूल बसों के किराए में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर दी है। सेवानिवृत कर्मियों को मूल वेतन के 50 प्रतिशत पर पुर्ननियुक्ति देने का फैसला लिया है। पिछली सरकार द्वारा दी जा रही 125 यूनिट मुफ्त बिजली पर कुछ राइडर लगा दिए हैं। महिलाओं को मिलने वाले 1500 पर भी कई शर्ते लगा दी है। इन्ही फैसलों के साथ नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर के मुताबिक हर मंत्री को दो-दो व्यक्ति नियुक्त करने का अधिकार दिया जा रहा है जो मन्त्री की छवि सुधारने के लिए काम करेंगे। सरकार ने वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए यह फैसले लिए हैं । इनके अतिरिक्त राजस्व में भी कई सेवाओं के दाम बढ़ा दिए हैं। सत्ता संभालते ही पेट्रोल डीजल पर वैट बढ़ाया था। पिछली सरकार द्वारा खोले गए करीब एक हजार संस्थान बंद कर दिए थे। सस्ते राशन के दामों में बढ़ोतरी के साथ उसकी मात्रा में कटौती भी कर दी गई है कुल मिलाकर सरकार जहां संभव है सेवाओं और चीजों के दामों में बढ़ोतरी कर रही है। सरकार के इन फैसलों का जनता पर क्या प्रभाव पड़ेगा? विपक्ष की इस पर क्या प्रतिक्रिया होगी इस सब की परवाह किए बिना वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। इन्हीं प्रयासों के तहत हर माह करीब 1500 करोड़ का कर्ज लेने की स्थिति पहुंचने वाली है क्योंकि अब तक 25000 करोड़ से अधिक का कर्ज ले चुकी है । यहां तक आशंका जताई जा रही है कि शायद कुछ माह बाद नियमित वेतन और पेंशन का भुगतान कर पाने में कठिनाई आ जाए क्योंकि इस समय भी कई कर्मचारी वर्गों को नियमित न मिल पाने के मामले चर्चा में है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि सरकार वित्तीय संकट से गुजर रही है।
सरकार को सत्ता में आए अठारह माह हो गए हैं और यह फैसला अब लिए जा रहे हैं। इसलिए यह सवाल उठना स्वभाविक है कि आखिर यह समझने में इतना समय क्यों लग गया? जबकि मंत्री परिषद का कोई भी सदस्य ऐसा नहीं है जो पहली बार ही विधायक बना हो। सबका लम्बा अनुभव है कई मुख्यमंत्रीयों का कार्यकाल देखा है। हर वर्ष सदन में बजट आता है । हर बजट में आर्थिक सर्वेक्षण आता है। हर वर्ष कैग रिपोर्ट सदन में रखी जाती है । यह वह दस्तावेज होते हैं जिनमें सरकार की सारी योजनाओं उसकी आय-व्यय और कर्ज का सारा रिकॉर्ड दर्ज रहता है। इसी रिकॉर्ड के आधार पर राजनीतिक पार्टियों चुनाव के लिए अपना अपना घोषणा पत्र तैयार करती है और जनता में रखती है। कांग्रेस ने भी इसी आधार पर अपना घोषणा पत्र तैयार करके जनता को दस गारंटियां दी होंगी ऐसा माना जायेगा। फिर सुक्खू सरकार ने सत्ता संभालते ही चेतावनी दी थी कि प्रदेश के हालात श्रीलंका जैसे हो सकते हैं। पिछली सरकार पर वित्तीय कुप्रबन्धन का आरोप लगाकर श्वेत पत्र तक लाया गया था। सरकार के वित्तीय नियंत्रण के लिए बाकायदा एफआरबीएम एक्ट पारित है। राजनीतिक नेतृत्व के लिए मंत्री परिषद के साथ ही अफसरशाही की भी एक बड़ी टीम सहयोग और कार्य संचालन के लिये उपलब्ध रहती है। जब भी सरकारें बदलती हैं तो नेतृत्व अपने अनुसार इस टीम में बदलाव करता है। लेकिन मुख्यमंत्री ने व्यवस्था परिवर्तन के सूत्र के नाम पर इस टीम में लोकसभा चुनाव तक कोई बदलाव नहीं किया। जो अफसरशाही पिछली सरकार को चला रही थी वही इस सरकार में यथास्थिति बनी रही। बल्कि जिन लोगों के खिलाफ कांग्रेस ने कभी सदन में आरोप लगाये थे वही लोग सरकार में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभा रहे हैं।
इसलिए यह कैसे संभव हो सकता है कि जिस प्रशासनिक तंत्र पर श्वेत पत्र में कुप्रबन्धन के आरोप लगे हो वही आज सर्वे सर्वा हो। व्यवस्था परिवर्तन के सूत्र ने एक तरह से सरकार को स्वतः ही विश्वसनीयता के संकट पर लाकर खड़ा कर दिया है। क्योंकि जब सरकार आम आदमी को मिली हुई सुविधाओं पर किसी भी तर्क से कैंची चला रही है तो उसी अनुपात में सबसे पहले अपने खर्चों पर कटौती करनी होगी। आज यह सवाल उठ रहा है कि सरकार को कैबिनेट रैंक में इतने सलाहकारों और दूसरे लोगों की क्या आवश्यकता पड़ गई है। क्या सरकार बता पाएगी कि किस सलाहकार ने क्या नीतिगत मूल्यवान सलाह दी है जिससे सरकार को अमुक लाभ हुआ है। आने वाले समय में आरटीआई में यह सवाल पूछे गये तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। क्योंकि राहतों में कटौती और भारी भरकम कर्ज आपस में स्वतः विरोधी हैं। आज के हालात में वित्तीय से ज्यादा विश्वसनीयता का संकट खड़ा हो गया है। ऐसे हालत में छवि सुधारने के प्रयास बेमानी हो जाएंगे यह तय है।

स्व. वीरभद्र सिंह की प्रस्तावित मूर्ति स्थापना पर मनकोटिया के विरोध के मायने

शिमला/शैल। स्व. वीरभद्र सिंह छः बार प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं। प्रदेश में उनके समर्थकों/प्रशंसकों की लम्बी लाइन है जिसे छोटा करना आज के राजनीतिक नेतृत्व के वश की बात नहीं है। प्रदेश की राजनीति में जो मुकाम स्व. वीरभद्र सिंह को हासिल है वह किसी अन्य नेता को नहीं है। इसी मुकाम के कारण आज स्व. वीरभद्र सिंह के प्रशंसक चाहते हैं कि डॉ. परमार की तरह उनकी भी मूर्ति स्थापित की जाये। लेकिन इस समय का राजनीतिक वातावरण जिस मोड़ पर पहुंच चुका है उसमें यह प्रस्तावित मूर्ति स्थापना अनिश्चितता में जाती नजर आ रही है।
इस पर पांच बार विधायक रहे पूर्व मंत्री विजय सिंह मनकोटिया ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, प्रदेश के राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल, पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर और प्रदेश के भाजपा अध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल को पत्र लिखकर कुछ आपतियां उठाई हैं। इन आपत्तियों का आधार सितम्बर 2015 में स्व. वीरभद्र सिंह के आवास पर केंद्रीय एजेंसीयों ईडी और आयकर द्वारा की गयी छापेमारी के बाद उनके खिलाफ बनाये गये आपराधिक मामलों को बनाया गया है। इस छापेमारी पर उस समय प्रदेश भाजपा द्वारा की गई नारेबाजी और लोकसभा चुनाव के दौरान जिस तरह का चुनावी मुद्दा बनाया गया था उसका स्मरण भाजपा नेताओं को करवाया गया है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि जो आपराधिक मामले उस समय स्व.वीरभद्र सिंह के खिलाफ बनाये गये थे वह आज तक उनकी मृत्यु के बाद भी लंबित चल रहे हैं। ऐसे में स्वभाविक रूप से मूर्ति स्थापना का मुद्दा एक अलग राजनीतिक आकार ले लेता है। अपराधिक मामलों के लंबित होने की स्थिति में सरकार द्वारा यह मूर्ति स्थापित किया जाना कई अलग प्रश्न खड़े कर देगा।
वैसे मेजर विजय सिंह मनकोटिया के रिश्ते स्व. वीरभद्र सिंह के साथ कभी एक जैसे नहीं रहे हैं। वह कभी स्व. वीरभद्र सिंह के नजदीक तो कभी दूर वाली स्थिति में रहे हैं। संयोगवश मुख्यमंत्री सूक्खू के राजनीतिक रिश्ते भी स्व. वीरभद्र सिंह के साथ बहुत सौहार्दपूर्ण नही रहे हैं। विपक्षी दल भाजपा ने स्व. वीरभद्र सिंह के खिलाफ बने अपराधिक मामलों का खूब राजनीतिक लाभ उठाया है। लेकिन कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में स्व. वीरभद्र सिंह के प्रति जनता की सहानुभूति का अवश्य लाभ मिला है। विधानसभा से पहले मण्डी के लोकसभा उपचुनाव में भी कांग्रेस को इस सहानुभूति का लाभ मिला है। इसी सहानुभूति के कारण श्रीमती प्रतिभा सिंह भाजपा की जय राम सरकार के समय में यह उपचुनाव जीत गई थी। विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस कार्यालय में वीरभद्र सिंह के विश्वस्तों की चुनाव संचालन में प्रमुख भूमिका रही है।
लेकिन कांग्रेस की सरकार बनने के बाद इस दिशा में स्थितियां इस कदर बदल गयी है की प्रतिभा सिंह को लोकसभा चुनाव लड़ने से पीछे हटना पड़ा। विक्रमादित्य सिहं को मंत्री पद से त्यागपत्र देने की नौबत आ गयी। विक्रमादित्य सिंह ने भले ही अपना त्यागपत्र वापस लेकर मण्डी से लोकसभा उम्मीदवार बनना स्वीकार किया लेकिन उनकी हार ने उनसे ज्यादा स्व. वीरभद्र सिंह की राजनीतिक विरासत पर सवाल खड़े कर दिये। शिमला ग्रामीण में भी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को बढ़त न मिलने से यह सवाल और ज्यादा गंभीर हो जाते हैं। इस तरह के राजनीतिक परिदृश्य में पूर्व मंत्री विजय सिंह मनकोटिया के इस पत्र के राजनीतिक मायने बहुत बड़े हो जाते हैं। क्योंकि इसी दौरान में प्रदेश में ईडी और आयकर एजैन्सियों ने दस्तक दी है।
यह है मनकोटिया का पत्र

इन उपचुनावों में भाजपा की नीयत और नीति पर उठाये सवाल

भाजपा नेतृत्व आक्रामकता से पीछे हटा नजर आ रहा
कांग्रेस से ज्यादा भाजपा नेतृत्व के लिए कसौटी होते जा रहे यह उपचुनाव
शिमला/शैल। क्या इन उपचुनाव में भाजपा सफलता हासिल कर पायेगी? यह सवाल इसलिये उठ रहा है क्योंकि लोकसभा में जहां भाजपा ने प्रदेश की चारों लोकसभा सीटों पर 2014 और 2019 की तरह इस बार भी कब्जा कर लिया है वहीं पर भाजपा छः विधानसभा उपचुनावों में से चार हार गई है। जबकि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व लगातार यह फैला रहा था कि इन चुनावों के बाद प्रदेश की सरकार गिर जायेगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं और यह हार भाजपा के आपसी तालमेल में अभाव और सरकार के साथ रिश्तों की घनिष्ठता पर उठते सवालों के नाम लगी। अब इन तीन उपचुनावों में भाजपा को यह प्रमाणित करना है कि उसमें कोई गुटबाजी नहीं है और जनता में उसकी सवीकार्यता बराबर बनी हुई है। इसलिए उसने 68 में से 61 विधानसभा क्षेत्र में जीत हासिल की थी। इस परीक्षा में यह उपचुनाव प्रदेश भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को अपने को प्रमाणित करने का अवसर होगा। अन्यथा यही कहा जायेगा कि लोकसभा की जीत तो मोदी के नाम पर हो गयी। लेकिन प्रदेश स्तर पर स्थानीय नेतृत्व अपनी प्रासंगिकता खोता जा रहा है।
विधानसभा के लिये उपचुनावों की स्थिति क्यों पैदा हुई पूरा प्रदेश जानता है। सरकार और कांग्रेस लगातार यह कहती आ रही है कि भाजपा धनबल के सहारे सरकार गिराने का प्रयास कर रही है। दूसरी और भाजपा और उपचुनाव में गए सारे कांग्रेस के बागी और निर्दलीय मुख्यमंत्री के अपेक्षा पूर्ण व्यवहार को इसका कारण बताते आ रहे हैं। मुख्यमंत्री और कांग्रेस पूरी आक्रामकता के साथ विधायकों के बिकाऊ होने तथा हर बार अपने व्यक्तिगत कामों के लिये ही उनके पास आने का आरोप लगाते आ रहे हैं। जबकि इन नौ लोगों ने सरकार पर भ्रष्टाचार के संगीत आरोप लगाये हैं। मुख्यमंत्री की पक्षपात पूर्ण कार्यप्रणाली पर सवाल उठाये हैं। लेकिन भाजपा नेतृत्व इन नौ लोगों द्वारा उठाये गये आरोपों को इस आक्रामकता के साथ आगे नहीं बढ़ा पाया है। जबकि चुनाव में आक्रामकता ही सबसे बड़ा हथियार होती है।
यह सही है कि जयराम के शासनकाल भाजपा ने कांग्रेस सरकार के खिलाफ दायर किये अपने ही आरोप पत्रों पर कोई कारवाई नहीं की है। बल्कि जब भाजपा के जिला स्तरीय दफ्तरों के लिए जमीन खरीदी का मुद्दा आया था तब सुखविंदर सिंह सुक्खू ने बिलासपुर की खरीद पर कुछ गंभीर सवाल किये थे। सुखविंदर सिंह सुक्खू के इन सवालों का जवाब तब हमीरपुर में जिले के भाजपा विधायकों और अन्य पदाधिकारी ने एक पत्रकार वार्ता के माध्यम से सुक्खू की अपनी जमीन खरीद पर सवाल उठाये थे। इन सवालों और प्रति सवालों के बाद दोनों ओर से युद्ध विराम हो गया था। आज भी भाजपा और सुक्खू सरकार में शायद वही विराम चल रहा है। बल्कि जो सवाल उपचुनावों के पात्र बने नौ लोग उठा रहे हैं उन मुद्दों को भी भाजपा नेता गंभीरता से आगे नहीं बढ़ा रहे हैं। इस समय नेता प्रतिपक्ष पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर जिस तर्ज में सरकार के गिरने की बातें कर रहे हैं उसके अनुरूप उनके व्यावहारिक कदम नहीं हो रहे हैं। इस समय भाजपा पर यह आरोप है कि वह धन बल के सहारे सरकार गिराना चाहती है। कांग्रेस से बाहर गये लोग मुख्यमंत्री को ही इस सारी स्थिति के लिये जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। इन लोगों ने जो सवाल मुख्यमंत्री से सार्वजनिक रूप से पूछे हैं उनका कोई जवाब नहीं आया है। यह सवाल असहज कर देने वाले हैं लेकिन इनके साथ भाजपा नेतृत्व अपनी संबद्धता और समर्थन नहीं दिखा पा रहा है और इसी से उसकी नीयत और नीति पर सवाल उठ रहे हैं। इससे सरकार गिरने-गिराने के दावे राजनीतिक औपचारिकता से अधिक नहीं बढ़ पा रहे हैं। जबकि इस समय आयकर की छापेमारी के बाद प्रदेश का राजनीतिक वातावरण कुछ अलग ही संकेत दे रहा है। ऐसे में यह उपचुनाव कांग्रेस और मुख्यमंत्री से ज्यादा भाजपा के लिये राजनीतिक विश्वसनीयता की परीक्षा बनते जा रहे हैं। क्योंकि देहरा में मुख्यमंत्री की पत्नी के चुनावी शपथ पत्र पर भाजपा प्रत्याशी होशियार सिंह की शिकायत ने एक अलग ही स्थिति पैदा कर दी है। जिसके परिणाम इन चुनावों के परिणाम आने के बाद स्पष्ट होंगे।

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