Friday, 05 June 2026
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क्या विधायकों की कथित खरीद फरोख्त का कोई साक्ष्य सार्वजनिक हो पायेगा

  • क्या बागियों के सवालों का कोई जवाब आ पायेगा
  • क्या नादौन में विलेज कामनलैण्ड खरीद बेच हो रही है?
  • कांग्रेस द्वारा विधानसभा चुनाव में जारी चार्जशीट पर कारवाई कब होगी

शिमला/शैल। प्रदेश सरकार की स्थिरता विधानसभा उपचुनाव के परिणामों पर निर्भर करेगी। यह विधानसभा में विभिन्न दलों के सदस्य आंकड़ों से स्पष्ट हो जाता है। इसलिये सत्तारूढ़ कांग्रेस छः उपचुनावों में से एक सीट जीतकर भी सुरक्षित हो जाती है। इस स्थिति को बनाये रखने के लिये ही शायद निर्दलीय विधायकों के मामले को लम्बा किया जा रहा है। यही तर्क और गणित मुख्य संसदीय सचिवों के मामले में अपनाया जा रहा है। उपचुनाव में एक सीट भी जीत जाने के लिये इस उप चुनाव का मुख्य मुद्दा छः विधायकों द्वारा राज्य सभा में क्रॉस वोटिंग करने के बाद भाजपा में शामिल होने को बनाया जा रहा है। इस दल बदल को इन विधायकों द्वारा पन्द्रह-पन्द्रह करोड़ में बिकने का आरोप लगाया जा रहा है। भाजपा पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि वह धनबल के सहारे कांग्रेस की सरकार को गिराना चाहती है। इस आरोप को प्रमाणित करने के लिये पुलिस में भी मामला दर्ज करवाया गया है। लेकिन अभी तक पन्द्रह-पन्द्रह करोड़ के लेनदेन का कोई भी ठोस साक्ष्य जनता के सामने नहीं रखा गया है। जबकि इस लेन-देन के आरोप को लेकर मुख्यमंत्री के खिलाफ भी सुधीर शर्मा और राजेंद्र राणा ने विधिवत शिकायतें दर्ज करवा रखी हैं। ऐसा माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री इस कथित लेनदेन को चुनाव का मुख्य मुद्दा बनाना चाहते हैं। यदि इस कथित लेनदेन का कोई भी साक्ष्य चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री सार्वजनिक कर पाये तो निश्चित रूप से यह आरोप बागियों के साथ चिपक जायेगा। यदि ऐसा न हो पाया तो सरकार और मुख्यमंत्री दोनों का ही नुकसान होना तय है। क्योंकि इस चुनाव में जनता उसे दंडित करना चाहेगी जो इस स्थिति के लिये सही में जिम्मेदार है। समरणीय है कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्षा लम्बे अरसे से यह शिकायत करती रही है कि वरिष्ठ कार्यकर्ता की अनदेखी हो रही है। यह शिकायत हाईकमान तक भी पहुंची और हाईकमान ने सरकार के सुचारू संचालन के लिये एक कमेटी का गठन भी कर दिया। लेकिन इस कमेटी के सदस्य कॉल सिंह ठाकुर और रामलाल ठाकुर के यह ब्यान भी रिकॉर्ड पर है कि इस कमेटी की कोई बैठक तक नहीं हुई है। इन लोगों से राय तक नहीं ली गयी है। कार्यकर्ताओं की अनदेखी का आरोप अंत तक चलता रहा। कांग्रेस अध्यक्षा को यहां तक कहना पड़ा कि कार्यकर्ता बाहर प्रचार के लिये निकलने को तैयार नहीं है। इसी वस्तुस्थिति में चुनाव लड़ने से इन्कार कर दिया। अभी वरिष्ठ मंत्री चंद्र कुमार का जो ब्यान वायरल होकर सामने आया है उसने वर्तमान संकट के लिये मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री दोनों को बराबर का जिम्मेदार ठहराया है। इसी परिदृश्य में जो प्रश्न सुधीर शर्मा और राजेंद्र राणा ने मुख्यमंत्री से सार्वजनिक रूप से पूछे हैं उनका कोई जवाब मुख्यमंत्री की ओर से नहीं आया है। जबकि आने वाले दिनों में और जोर से यह सवाल पूछे जाएंगे। मुख्यमंत्री ने दावा किया है कि खनन माफिया, भू माफिया और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। लेकिन इस दावे के बाद यह सवाल उछला है कि मुख्यमंत्री के अपने ही गांव के पास स्थित स्टोन क्रेशर को अदालत के आदेशों से वहां से हटाने की नौबत क्यों आयी। मुख्यमंत्री के ही चुनाव क्षेत्र में राजा नादौन की एक लाख कनाल से ज्यादा अदालत द्वारा विलेज कामन लैण्ड घोषित जमीन की खरीद फरोखत क्यों हो रही है। इसी जमीन से लैण्ड सीलिंग सीमा से भी अधिक की खरीद बेच कैसे हो गयी? कांग्रेस द्वारा विधानसभा चुनाव के दौरान जारी की गयी चार्जशीट पर अब तक कोई कारवाई क्यों नहीं हो पायी।

नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर सुधीर शर्मा और राजेंद्र राणा द्वारा उठाये सवालों पर खामोश क्यों है ?

शिमला/शैल। पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर लगातार हर मंच से यह दावा कर रहे हैं कि इन चुनावों के बाद सुक्खू सरकार गिर जायेगी और भाजपा की सरकार बन जायेगी। यह सब किस गणित से संभव होगा इसका खुलासा नहीं किया जा रहा है। क्योंकि वर्तमान में यदि भाजपा छः के छः उपचुनाव भी जीत जाये तो भी उनकी संख्या 31 ही होती है और इससे वह बहुमत में नहीं आते। इसलिए जयराम का सरकार गिरने का दावा एक पहेली बनकर रह जाता है। संभव है कि भाजपा किसी और योजना पर भी काम कर रही हो जयराम के इन दावों का इतना असर अवश्य हुआ है कि भाजपा के जिन विधायकों के खिलाफ विशेषाधिकार हनन के तहत निष्कासन तक की स्थिति पहुंच गई थी उस अध्याय पर फिलहाल विराम लग गया है। सुक्खू सरकार विधानसभा पटल पर बजट पारण के दौरान ही गिर जाती यदि भाजपा के पन्द्रह विधायकों को सस्पेंड न कर दिया जाता। सुक्खू सरकार को सदन में गिरने से बचने का श्रेय नेता प्रतिपक्ष जयराम को ही दिया जा रहा है। लेकिन जयराम इस विषय पर खामोश हैं
इस चुनाव के मुद्दे क्या होंगे? क्या उन मुद्दों पर जन बहस हो पायेगी? क्या कांग्रेस के बागियों द्वारा उठाये गये सवाल आधारहीन है? ऐसे बहुत से मुद्दों पर जन बहस का वातावरण क्यों नहीं बन पा रहा है? कांग्रेस की सरकार ने आते ही भाजपा पर वित्तीय कुप्रबंधन का आरोप लगाया था। इस आरोप को प्रमाणित करने के लिए सरकार श्वेत पत्र लेकर भी आयी। श्वेत पत्र का जवाब देने के लिए भाजपा अध्यक्ष डॉ. बिंदल आरटीआई के माध्यम से सुक्खू सरकार द्वारा लिये गये कर्ज की जानकारी लेकर आये। यह सामने आ गया कि इस सरकार ने चौदह माह में चौदह हजार करोड़ का कर्ज ले लिया है। यह कर्ज कहां खर्च हुआ इस पर चुनाव के दौरान खंलासे और जवाब सामने आने चाहिए थे। लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है। यहां तक की भाजपा में शामिल हुये कांग्रेस के बागियों द्वारा उठाये गये सवालों को भी भाजपा नेतृत्व आगे नहीं बढ़ा रहा है। क्या नेता प्रतिपक्ष बागियों द्वारा पूछे जा रहे सवालों से सहमत नहीं है?
सरकार द्वारा प्रतिमाह औसतन एक हजार करोड़ का कर्ज लेना एक बड़ा मुद्दा है क्योंकि इसका भार प्रदेश के हर आदमी पर पढ़ रहा है। आम आदमी को यह जानने का हक है कि यह पैसा खर्च कहां हो रहा है। राजेंद्र राणा ने शिमला को 24 घंटे पानी आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए विश्व बैंक द्वारा 460 करोड़ की स्वीकृत डीपीआर का ठेका 860 करोड़ में कैसे पहुंच गया? शिमला की जनता पर इतना कर्ज बोझ क्यों डाल दिया गया? सुधीर शर्मा ने बिजली की खरीद बेच का काम बिजली बोर्ड के बजाये निदेशक बिजली के माध्यम से एक प्राइवेट आदमी को क्यों दे दिया। इसका प्रदेश की वित्तीय स्थिति पर कितना प्रभाव पड़ेगा? सुधीर शर्मा ने यह भी खुलासा सामने रखा कि इस सरकार ने सत्ता संभालते ही विभागों के पास पड़े पैसे को सरकार में वापस मांग लिया। इस कारण से विभागों में देनदारियां खड़ी हो गयी। बागियों द्वारा उठाये गये यह सवाल न केवल गंभीर हैं बल्कि प्रदेश पर दूरगामी प्रभाव डालने वाले हैं। आज चुनाव के समय में इन सवालों को सार्वजनिक बहस का मुद्दा बनाना नेता प्रतिपक्ष और पूरी भाजपा का है। लेकिन इन सवालों को भाजपा नेतृत्व द्वारा आगे न बढ़ाया जाना कई तरह की नई आशंकाओं को जन्म दे रहा है। ऐसा लग रहा है कि इस चुनाव को विधायकों के बिकने, दोषीयो को जेल की सलाखों में डालने, बिकाऊओं को हराने और सरकार गिराने के जुमलों तक ही बंाधकर रखने की योजना पर काम हो रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि कांगड़ा और हमीरपुर के टिकट आवंटन कांग्रेस द्वारा की जा रही देरी भी एक बड़ी योजना का हिस्सा हैै।

क्या कांग्रेस में और तोड़ फोड़ हो रही है?

  • क्या मुख्य संसदीय सचिवों को लेकर कोई कड़ा फैसला आने की संभावना बन रही है?
  • क्या भाजपा विधायक दल सामूहिक त्यागपत्र देगा?
  • क्या सरकार गिरने के जयराम के दावों में कोई दम है

शिमला/शैल। कांग्रेस अभी तक लोकसभा के लिये मण्डी और शिमला से ही अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर पायी है। शेष दो लोकसभा क्षेत्रों हमीरपुर तथा कांगड़ा और विधानसभा के छः उपचुनावों के लिये अभी प्रत्याशियों की तलाश चल रही है। कांग्रेस प्रदेश में सत्ता में है। चालीस विधायक उसके अपने थे और तीनों निर्दलीयों का समर्थन भी उसे हासिल था। लेकिन राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के छः और तीनों निर्दलीयों ने भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में वोट डालकर न केवल कांग्रेस के प्रत्याशी को हरा दिया बल्कि सरकार को भी अस्थिरता के मुकाम पर खड़ा कर दिया है। नेता प्रतिपक्ष पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर लगातार यह दावा कर रहे हैं कि यह सरकार शीघ्र ही गिर जायेगी। जयराम के मुताबिक चुनाव परिणाम के बाद प्रदेश में भाजपा की सरकार होगी। इसी के साथ जयराम यह दावा भी कर रहे हैं कि कांग्रेस के कुछ और विधायक भी उनके संपर्क में है जो पार्टी छोड़ सकते है। शायद इन्हीं संभावित खतरों के कारण कांग्रेस अपने चुनाव प्रत्याशी तय करने में समय लगा रही है। जयराम के दावे तभी सही हो सकते हैं यदि कांग्रेस से कुछ और विधायक पार्टी छोड़ भाजपा में शामिल हो जाये या किसी तरह प्रदेश में मध्यावधि चुनावों की स्थिति आ जाये। अभी जो कांग्रेस में तोड़ फोड़ हुई है वह भाजपा प्रायोजित रही है यह स्पष्ट हो चुका है । कांग्रेस के अंदर कार्यकर्ताओं से लेकर विधायकों तक में जो रोष सरकार के प्रति लगातार बढ़ता जा रहा था उस पर भाजपा पहले दिन से ही नजर रख रही थी और उसे राज्यसभा चुनाव के समय भुना लिया गया। कांग्रेस के अंदर फैला रोष पूरी तरह मुखर होकर सामने आ चुका था जिसे न तो मुख्यमंत्री और न ही कांग्रेस हाईकमान समय रहते देख पाये। भाजपा ने बतौर विपक्ष इसका लाभ उठाया और सरकार को इस कगार तक पहुंचा दिया। अब जब इस खेल में भाजपा पूरी तरह नंगी हो चुकी है तो क्या वह असफलता का तमगा सहन कर पायेगी? विश्लेषकों के लिये यह एक महत्वपूर्ण सवाल बन चुका है। क्योंकि भाजपा के पास साधन है। इस समय तीन निर्दलीय विधायकों के त्यागपत्र स्वीकारने का मामला विधानसभा अध्यक्ष और उच्च न्यायालय में लंबित चल रहा है। चौबीस अप्रैल को उच्च न्यायालय में सुनवाई है। अध्यक्ष और कांग्रेस चाहेंगे कि उनके त्यागपत्रों पर फैसला चुनावों की अधिसूचना जारी होने के बाद आये। निर्दलीय विधायक भाजपा में शामिल हो चुके हैं इसलिए दल बदल कानून के दायरे में भी आ गयें है। लेकिन इनके मामले में फैसला लटकने की स्थिति में यदि अपने त्यागपत्र वापिस ले ले और भाजपा की सदस्यता भी त्याग दे तो क्या नियम कानून उन्हें ऐसा करने से रोक पायेंगे शायद नहीं। जब यह निर्दलीय विधायक रहकर अपना समर्थन किसी को भी देने में स्वतंत्र रहते हैं और उस से सरकार को लाभ नहीं मिलता। इसी के साथ मुख्य संसदीय सचिवों का मामला भी उच्च न्यायालय में 22, 23, और 24 को तीन दिन सुनने का ऐलान कर चुका है। स्मरणीय है कि जब संसदीय सचिवों को लेकर वीरभद्र के कार्यकाल में मामला उच्च न्यायालय में आया था तब हाई कोर्ट ने इन नियुक्तियों को असवैंधानिक करार देकर रद्द कर दिया था और ऐसे नियुक्त हुये संसदीय सचिवों को अपने पदों से हटना पड़ा था। उच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद सरकार ने इस मामले की सर्वाेच्च न्यायालय में अपील दायर करने के साथ ही इस आशय का एक नया कानून बना लिया था। उसी कानून के तहत सुक्खु सरकार ने यह नियुक्तियां की है। लेकिन इस कानून की वैधता को उसी समय चुनौती मिल गयी थी जो प्रदेश के उच्च न्यायालय में अभी तक लंबित है। इसी के साथ सर्वाेच्च न्यायालय ने हिमाचल की एस एल पी को असम के साथ संलग्न करते हुये यह फैसला दिया है कि राज्य की विधायिका इस आशय का कानून बनाने के लिये सक्षम ही नहीं है। ऐसे में इस समय मुख्य संसदीय सचिवों का जो मामला प्रदेश उच्च न्यायालय में विचाराधीन चल रहा है उसमें भी राज्य के कानून को चुनौती दी गयी है। यदि उच्च न्यायालय प्रदेश के इस कानून को वैध मान लेता है तो इन मुख्य संसदीय सचिवों को कोई हानि नहीं होगी क्योंकि राज्य के कानून के तहत इनकी नियुक्तियां हुई है। यदि सर्वाेच्च न्यायालय की तर्ज पर प्रदेश उच्च न्यायालय इस कानून को असंवैधानिक करार दे देता है तो तब इनका नुकसान होना तय है। क्योंकि सुक्खु सरकार के द्वारा यह नियुक्तियां किये जाने से पहले ही सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ चुका था। जिसका अर्थ हो जाता है कि राज्य सरकार ने सर्वाेच्च न्यायालय के फैसले को अहमीयत न देते हुये यह नियुक्तियां की है। फिर जयराम के समय तो सरकार का यह शपथ पत्र रहा है कि ऐसी नियुक्तियां करने से पहले उच्च न्यायालय से पूर्व अनुमति ली जायेगी जो की ली नहीं गयी है। ऐसे में यदि उच्च न्यायालय सुप्रीम कोर्ट के फैसले का संज्ञान लेकर राज्य के कानून को असवैंधानिक करार देता है तो उसी स्थिति में इनकी विधायकी जाने की भी प्रबल संभावना बन जायेगी क्योंकि सर्वाेच्च न्यायालय का फैसला आ जाने के बाद यह नियुक्तियां हुई है। इस तरह यदि छः मुख्य संसदीय सचिवों की विधायकी भी चली जाती है तो सरकार को लेकर कोई स्वस्थ संकेत नहीं जाता है। इससे अस्थिरता की स्थिति और बढ़ जायेगी। तब और लोगों के भी कांग्रेस छोड़ने की संभावनाएं बढ़ जायेगी विश्लेष्कों का मानना है कि जयराम के सरकार गिराने के दावों का आधार उच्च न्यायालय में होने वाली यह संभावित संभावना ही है। हो सकता है कि तब भाजपा विधायक दल सामूहिक रूप से त्यागपत्र देकर इस संभावना को बढ़ावा दे। क्योंकि यदि राज्य सरकार को गिराना भाजपा के एजैन्डे पर है तो इसे इन लोकसभा चुनाव से पहले ही अंजाम दिया जाना है चुनावों के बाद इसका कोई औचित्य नहीं रह जाता है।

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