Saturday, 13 June 2026
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पूर्व रेरा चेयरमैन और वकील पर दर्ज हुई एफआईआर से प्रशासनिक हलकों में हलचल

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश के प्रशासनिक और कानूनी गलियारों में उस समय हलचल तेज हो गई जब राज्य के पूर्व मुख्य सचिव संजय गुप्ता की शिकायत पर पूर्व मुख्य सचिव एवं पूर्व रेरा चेयरमैन श्रीकांत बाल्दी तथा हाईकोर्ट के अधिवक्ता विनय शर्मा के खिलाफ अलग-अलग एफआईआर दर्ज कर ली गईं। दोनों मामलों में आरोपों का केंद्र मुख्य सचिव की कार्यशैली, भूमि खरीद और प्रशासनिक निर्णयों को लेकर लगाये गये गंभीर आरोप हैं, जिन्हें संजय गुप्ता ने झूठा, दुर्भावनापूर्ण और उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाला बताया है।
शिमला के ईस्ट पुलिस थाना में दर्ज मामलों ने अब केवल व्यक्तिगत विवाद का स्वरूप नहीं रखा है, बल्कि यह मामला प्रदेश की नौकरशाही, प्रशासनिक जवाबदेही और सार्वजनिक मंचों पर लगाये जाने वाले आरोपों की वैधता को लेकर भी चर्चा का विषय बन गया है। खास बात यह है कि जिन व्यक्तियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई है, उनमें एक प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव और दूसरा हाईकोर्ट का अधिवक्ता है। ऐसे में मामला सामान्य कानूनी विवाद से कहीं अधिक महत्व रखता है।
पूर्व मुख्य सचिव संजय गुप्ता ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया है कि पूर्व रेरा चेयरमैन श्रीकांत बाल्दी ने प्रेस बयान जारी कर उनके खिलाफ कई गंभीर आरोप लगाए। शिकायत के अनुसार इन आरोपों में पद के दुरुपयोग, अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर निर्णय लेने, विशेष परियोजनाओं को लाभ पहुंचाने तथा प्रशासनिक प्रक्रियाओं का उल्लंघन करने जैसे आरोप शामिल थे। पूर्व मुख्य सचिव का कहना है कि इन आरोपों का कोई तथ्यात्मक आधार नहीं है और इन्हें जानबूझकर सार्वजनिक किया गया ताकि उनकी छवि को नुकसान पहुंचाया जा सके।
शिकायत में यह भी कहा गया है कि प्रेस बयान को प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर व्यापक रूप से प्रसारित किया गया, जिससे आम जनता के बीच उनकी विश्वसनीयता और ईमानदारी पर सवाल खड़े करने का प्रयास हुआ। पूर्व मुख्य सचिव का दावा है कि उनके खिलाफ लगाये गये आरोप न केवल व्यक्तिगत स्तर पर मानहानिकारक हैं, बल्कि राज्य के सर्वाेच्च प्रशासनिक पद की संस्थागत गरिमा को भी प्रभावित करते हैं।
दूसरी ओर, अधिवक्ता विनय शर्मा के खिलाफ दर्ज एफआईआर में आरोप है कि उन्होंने भूमि खरीद, आय के स्रोत और पद के दुरुपयोग से जुड़े गंभीर आरोप लगाये। पूर्व मुख्य सचिव का कहना है कि भूमि खरीद से संबंधित सभी जानकारियां नियमानुसार सरकार को उपलब्ध करवाई गई थीं तथा वित्तीय लेन-देन और स्वीकृतियों का पूरा रिकॉर्ड मौजूद है। इसके बावजूद तथ्यों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया गया और ऐसे आरोप लगाये गये जिनका उद्देश्य उनकी सार्वजनिक छवि को नुकसान पहुंचाना था।
पूर्व मुख्य सचिव ने अपनी शिकायतों में यह भी उल्लेख किया है कि उन्हें सरकार की ओर से सतर्कता स्वीकृति (विजिलेंस क्लीयरेंस) और इंटीग्रिटी सर्टिफिकेट प्राप्त है। उनका कहना है कि उनके खिलाफ लगाये गये आरोप तथ्यों के विपरीत हैं और संबंधित व्यक्तियों ने उपलब्ध रिकॉर्ड की अनदेखी करते हुए जानबूझकर भ्रामक जानकारी सार्वजनिक की।
इन दोनों मामलों में पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की विभिन्न धाराओं के तहत मामले दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। पुलिस अब शिकायतों में लगाये गये आरोपों, संबंधित दस्तावेजों, प्रेस बयानों और अन्य साक्ष्यों की जांच करेगी। जांच के दौरान यह भी देखा जाएगा कि आरोपों के समर्थन में क्या तथ्य उपलब्ध हैं और क्या शिकायतकर्ताओं द्वारा लगाए गए आरोप कानूनी कसौटी पर खरे उतरते हैं।
राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में इन एफआईआर को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। एक पक्ष इसे मुख्य सचिव की प्रतिष्ठा और संस्थागत गरिमा की रक्षा के लिए उठाया गया कदम मान रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे प्रशासनिक विवाद के कानूनी मोर्चे पर पहुंचने के रूप में देख रहा है। हालांकि दोनों मामलों में अंतिम स्थिति जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट हो पाएगी।
इतना तय है कि प्रदेश की नौकरशाही से जुड़े इस हाई-प्रोफाइल विवाद ने प्रशासनिक व्यवस्था, पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर नई बहस छेड़ दी है। राज्य के दो वरिष्ठ सार्वजनिक व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज इन एफआईआर ने आने वाले दिनों में इस पूरे मामले को और अधिक संवेदनशील तथा चर्चित बना दिया है।

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