ग्रामीण भारत के विकास में पंचायतों की भूमिका सबसे अहम मानी जाती है। इसी को ध्यान में रखते हुए पंद्रहवें वित्त आयोग ने पंचायतों के लिए बड़े पैमाने पर धनराशि देने की सिफारिश की है। आयोग ने वर्ष 2020-21 के लिए 60,750 करोड़ रुपये और 2021 से 2026 की अवधि के लिए 2,36,805 करोड़ रुपये देने का प्रस्ताव रखा। यह एक बहुत बड़ी राशि है, जिसका उद्देश्य गांवों में बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करना और स्थानीय स्तर पर विकास को बढ़ावा देना है।
आयोग ने यह भी तय किया कि राज्यों के बीच यह पैसा कैसे बांटा जाएगा। इसके लिए जनसंख्या को 90 प्रतिशत और क्षेत्रफल को 10 प्रतिशत महत्व दिया गया है। यानी जिस राज्य की आबादी ज्यादा है, उसे ज्यादा पैसा मिलेगा। यह तरीका काफी हद तक संतुलित माना जा सकता है, क्योंकि इससे जरूरत के हिसाब से संसाधनों का बंटवारा होता है।
राज्यों के अंदर पंचायतों के बीच पैसा बांटने के लिए भी नियम बनाए गए हैं। ग्राम पंचायतों को सबसे ज्यादा हिस्सा दिया गया है, क्योंकि वे सीधे लोगों से जुड़ी होती हैं। उन्हें 70 से 85 प्रतिशत तक राशि मिल सकती है। ब्लॉक पंचायतों को 10 से 25 प्रतिशत और जिला पंचायतों को 5 से 15 प्रतिशत तक हिस्सा दिया जाता है। जिन राज्यों में केवल दो स्तर की पंचायत व्यवस्था है, वहां ग्राम और जिला पंचायतों के बीच ही यह पैसा बांटा जाता है।
हालांकि, यहां एक बड़ी समस्या यह है कि यह पूरा सिस्टम राज्य वित्त आयोग (एसएफसी) की सिफारिशों पर निर्भर करता है। कई राज्यों में एसएफसी समय पर बनता ही नहीं या उसकी सिफारिशें लागू नहीं की जातीं। ऐसे में पैसे का सही और न्यायसंगत बंटवारा नहीं हो पाता। यही कारण है कि कई बार अच्छा प्लान होने के बावजूद उसका फायदा लोगों तक नहीं पहुंच पाता।
केंद्र सरकार ने यह सुनिश्चित करने के लिए कुछ सख्त नियम भी बनाए हैं कि पैसा सही तरीके से खर्च हो। पंचायतों को अपनी योजनाएं ई-ग्रामस्वराज पोर्टल पर अपलोड करनी होती हैं। उन्हें डिजिटल माध्यम से लेन-देन करना होता है और समय पर अपने खातों का ऑडिट भी कराना होता है। पंचायती राज मंत्रालय ने इसके लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म भी शुरू किए हैं, जिससे निगरानी आसान हो गई है।
इन नियमों का मकसद पारदर्शिता बढ़ाना और भ्रष्टाचार को रोकना है। अगर कोई पंचायत इन नियमों का पालन नहीं करती, तो उसे पूरा पैसा नहीं मिलता। यह एक अच्छी पहल है, लेकिन जमीन पर इसका असर हर जगह एक जैसा नहीं है। कई पंचायतों में तकनीकी जानकारी की कमी होती है, जिससे वे इन प्रक्रियाओं को ठीक से नहीं अपना पातीं।
एक और महत्वपूर्ण नियम यह है कि केंद्र से पैसा मिलने के बाद राज्य सरकारों को 10 कार्य दिवसों के भीतर इसे पंचायतों तक पहुंचाना होता है। अगर इसमें देरी होती है, तो राज्य को ब्याज के साथ पैसा देना पड़ता है। यह नियम समय पर विकास कार्य शुरू करने के लिए जरूरी है, लेकिन कई बार राज्यों में देरी देखने को मिलती है, जिससे योजनाएं प्रभावित होती हैं।
आंकड़ों के अनुसार, देश की अधिकांश पंचायतों ने अब डिजिटल प्लेटफॉर्म को अपनाना शुरू कर दिया है। बड़ी संख्या में योजनाएं ई-ग्रामस्वराज पर अपलोड की जा रही हैं और भुगतान भी डिजिटल तरीके से हो रहा है। यह एक सकारात्मक बदलाव है, जो भविष्य में बेहतर प्रशासन का संकेत देता है।
हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में भी इस योजना के तहत बड़ी राशि आवंटित और जारी की गई है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह पैसा सही तरीके से खर्च हो रहा है और क्या इसका फायदा आम लोगों तक पहुंच रहा है। केवल पैसा देना ही काफी नहीं है, बल्कि उसका सही उपयोग होना ज्यादा जरूरी है।
अंत में कहा जा सकता है कि 15वें वित्त आयोग की सिफारिशें पंचायतों को मजबूत बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम हैं। इससे गांवों में विकास की नई संभावनाएं पैदा हो सकती हैं। लेकिन इसकी सफलता पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्य सरकारें और पंचायतें इसे कितनी गंभीरता से लागू करती हैं। अगर पारदर्शिता, जवाबदेही और समयबद्धता सुनिश्चित की गई, तो यह योजना ग्रामीण भारत के लिए बहुत फायदेमंद साबित हो सकती है। लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ, तो यह भी सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाएगी।