Sunday, 30 November 2025
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व्यवस्था परिवर्तन के जुमले ने पहुंचाया सरकार को गिरने की कगार पर

शिमला/शैल। राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली हार के बाद प्रदेश की राजनीतिक स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है। कांग्रेस के संकट को संभालने के लिये हाईकमान द्वारा भेजे गये पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट के बाद यह संकट और गहरा गया है। क्योंकि इस रिपोर्ट पर उठी चर्चाओं के अनुसार इस संकट के लिये प्रदेश कांग्रेस अध्यक्षा प्रतिभा सिंह और उनके मंत्री बेटे विक्रमादित्य सिंह को जिम्मेदार ठहराते हुये प्रतिभा सिंह को अध्यक्ष पद से हटाने का सुझाव दिया गया है। इसी के साथ मुख्यमंत्री द्वारा भी अपनी गलतियां स्वीकार करने की बात करते हुये लोकसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री पर विचार करने की बात की गई है। यदि सही में पर्यवेक्षकों की ऐसी ही रिपोर्ट है तो यह अन्तःविरोधी है और संकट को गहराने वाली है। क्योंकि एक के अपराध की सजा अभी और दूसरे के अपराध पर बाद में विचार किया जायेगा। क्या इस स्थिति को कांग्रेस जन स्वीकार कर पायेंगे? यदि पर्यवेक्षकों के इस सुझाव को मानते हुये इस पर अमल भी कर लिया जाये तो क्या कांग्रेस प्रदेश में लोकसभा की कोई सीट जीत पायेगी? शायद नहीं। जब सरकार बन जाती है तो मुख्यमंत्री प्रमुख हो जाता है और संगठन दूसरे स्थान पर चला जाता है। स्मरणीय है कि जब सुक्खविंदर सिंह सुक्खू प्रदेश अध्यक्ष थे और स्व. वीरभद्र सिंह मुख्यमंत्री थे और दोनों में भेद चल रहे थे। तब कांग्रेस चुनाव हार गयी थी और उस हार के लिये बतौर अध्यक्ष सुक्खू ने मुख्यमंत्री वीरभद्र को जिम्मेदार ठहराया था। सुक्खू का उस समय का ब्यान वायरल हो चुका है। सुक्खू का यह तर्क तब भी सही था और आज भी सही है। कार्यकर्ता सरकार के कार्यों को लेकर जनता में जाता है। सरकार की उपलब्धियों पर चुनाव लड़े जाते हैं उसके ब्यानों पर नहीं। आज हिमाचल की सबसे बड़ी समस्या युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी है। हिमाचल बेरोजगारी में देश का छटा राज्य हो गया है। युवाओं को रोजगार देने की गारंटी दी गई थी। लेकिन विधानसभा के इस बजट सत्र में यह प्रश्न पूछे गये थे कि सरकार ने एक वर्ष में कितना रोजगार उपलब्ध करवाया है। ऐसे हर सवाल के जवाब में सूचना एकत्रित की जा रही का ही जवाब दिया गया है। ऐसे जवाब में कैसे उम्मीद की जा सकती है कि लोग पार्टी को समर्थन देंगे। इस परिदृश्य में यह सवाल अहम हो जाता है कि यदि कार्यकर्ता जनता के सवालों को लेकर अपने नेताओं से सवाल नहीं पूछेंगे तो किससे पूछेंगे? प्रदेश नेतृत्व द्वारा जवाब न दिये जाने पर हाईकमान तक बात पहुंचाई जायेगी। यदि हाईकमान भी बात नहीं सुनेगा तो फिर बगावत के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं रह जाता है। क्योंकि जनता सुप्रीम होती है। पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट से यही झलकता है कि इस समय सरकार और पार्टी को बचाने की बजाये मुख्यमंत्री को बचाने के प्रयास किये जा रहे हैं। भले ही कांग्रेस के हाथ से हिमाचल में सरकार और संगठन दोनों ही निकल जायें। क्योंकि बागी विधायक और पार्टी अध्यक्ष पिछले एक वर्ष से हाईकमान को वस्तुस्थिति से अवगत करवाते आ रहे हैं और उनकी बात नहीं सुनी गयी। सारे प्रदेश को व्यवस्था परिवर्तन की जुमले के गिर्द घुमाया गया और आज मित्रों के बोझ से ही सरकार गिरने पर पहुंच गई है। जबकि यह व्यवस्था परिवर्तन आज तक परिभाषित नहीं हो सका है।

नगर निगम के महापौर और उपमहापौर के चुनाव में विधायकों को मतदान का अधिकार देने का क्या औचित्य ?

कई बार क्षणिक लाभ के लिये हम ऐसे निर्णय ले लेते हैं जिनके परिणाम दूरगामी होते हैं और इसके कारण या तो बाद में निर्णय बदलना पड़ता है या ऐसे निर्णय के दुष्प्रभाव का सारी व्यवस्था पर असर पड़ता है। हाल ही में हिमाचल प्रदेश सरकार ने एक ऐसा निर्णय लिया है जिसमें लगता है कि शायद उस के दूरगामी प्रभावों पर विचार नहीं किया गया है।
इस निर्णय के अनुसार नगर निगमों के महापौर और उपमहापौर के चुनाव में स्थानीय विधायकों को भाग लेने और मतदान करने का अधिकार दिया गया है, शायद यह निर्णय कानून की कसौटी पर सही नहीं उतरेगा।
इस निर्णय के परिणामस्वरूप यदि महापौर और उपमहापौर के चुनाव में विधायकों को मतदान का अधिकार होगा तो फिर क्या जब नगर परिषदों, नगर पंचायतों, जिला परिषदों, पंचायत समितियों के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव होगा तो उस में भी विधायकों को मतदान का अधिकार होगा ? क्या विधान सभा का चुनाव जीत कर विधायक को विधान सभा के अतिरिक्त स्थानीय निकायों ओर पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव में मतदान का
अधिकार मिल जायेगा ?
इसी के आधार पर सांसदों को यह अधिकार होगा कि उनके चुनाव क्षेत्र में आने वाले सभी नगर निगमों, नगर परिषदों, नगर पंचायतों, जिला परिषदों, पंचायत समितियों के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव में सांसद भी अपने मत का प्रयोग कर सकेंगे । फिर मामला केवल पंचायती राज संस्थाओं और नगर निकायों के मुखिया चुनने तक ही सीमित नहीं होगा फिर सांसद को अपने राज्य में मुख्यमन्त्री के चुनाव में मतदान करने का अधिकार मांगने से कैसे रोका जा सकेगा और यह प्रश्न केवल एक राज्य तक सीमित नहीं होगा, राष्ट्रीय स्तर पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा।
इसीलिये मैंने कहा कि क्षणिक लाभ के लिये दूरगामी परिणामों वाले निर्णय लेने में पूरा विचार विमर्ष होना चाहिए। एक दो नगर निगमों के महापौर और उपमहापौर के चुनाव के लालच के साथ साथ प्रदेशव्यापी और राष्ट्रव्यापी परिणामों को भी ध्यान में रखना चाहिए।
ऐसे निर्णय तर्कसंगत नहीं होते, संविधान निर्माताओं ने इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुये नेता अर्थात प्रधानमन्त्री (सरकार का मुखिया) का चुनाव करने का अधिकार केन्द्र में केवल लोक सभा के सांसदों को दिया है, राज्य सभा के सांसदों को यह अधिकार नहीं है। इसी प्रकार प्रदेश
सरकार का मुखिया, मुख्यमन्त्री विधान सभा के विधायक चुनते हैं विधान परिषद सदस्यों को यह अधिकार नहीं है ।
इसलिये नये आदेशानुसार चुने गये महापौर और उपमहापौर का चयन क्या कानून की कसौटी पर न्यायालय में टिक पायेगा ? यह महत्वपूर्ण प्रश्न रहेगा।

प्रेम कुमार धूमल,
पूर्व मुख्यमन्त्री, हिमाचल प्रदेश,
समीरपुर, जिला हमीरपुर (हि0प्र0)

नशे के कैंसर से देश को बचाने का दायित्व किस का ?

आज हमारे सामने सबसे बड़ी गम्भीर समस्या नशे की समस्या है । नशे का यह कैंसर जिस तीव्रता से समाज में फैल रहा है उसे देखकर, सुनकर आदमी सीहर उठता है और लगता है जिस गति से नशा समाज को विनाश की गर्त में ले जा रहा है उससे तो समाज का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायेगा। प्रतिदिन नषे से होने वाली युवाओं की मौतों की खबरें और नशे की बड़ी बड़ी खेपें पकड़े जाने के समाचार डराते हैं। मानव समाज के अस्तित्व को खतरे में डालने वाला स्वयं मानव समाज ही है । आदमी पैसे के लालच में अन्धा होता जा रहा है । एक समय था जब तम्बाकू, सिगरेट, बीड़ी और अधिक से अधिक शराब को नशा माना जाता था ।

आज अफीम, चरस, गांजा, कोकीन, चिट्टा और न जाने कौन कौन से नये नामों के साथ नशा समाज में तवाही मचा रहा है। इस धंधे में जो अन्धाधुंध कमाई हो रही है उसके लालच में लोग इस दलदल में फंसते हैं और जो फंस गये वे फिर निकल नहीं पाते । अधिक से अधिक धन कमाने के लालच में लोग फंसते हैं और वैसे ही बेईमानी का धन कमाने में पुलिस प्रशासन और अन्य एजैंसियां, जिन को इस पर नियन्त्रण करना है, वो भी रिश्वत के चक्कर में आंखें मूंद लेते हैं ।
इसका भयंकर परिणाम यह हो रहा है कि छोटे बच्चे, विद्यार्थी और युवा नशेड़ी बन जाते हैं । परिवार नियोजन के कारण बहुत सारे परिवारों में एक ही बच्चा, लड़का या लड़की होती है और वह मासूम जब नषे की लत का शिकार हो जाते हैं तो मॉं-बाप की जिन्दगी वैसे ही नरक बन जाती है । यदि युवा पीढ़ी नशेड़ होगी तो न सेना के लिये वीर सैनिक मिलेंगे न पुलिस प्रशासन में स्वस्थ जागरूक कर्मचारी, अधिकारी मिल पायेंगे न ही कृषि का क्षेत्र, न उद्योग का क्षेत्र और न ही सेवाओं का क्षेत्र बचेगा। नशे का यह जहर सारे समाज को खोखला करके समाप्त कर देगा ।
ऐसे में प्रश्न उठता है कि करें क्या ? इस संकट को दूर करने के लिये कोई बाहर से आकर समाधान नहीं निकालेगा हमें स्वयं प्रत्येक नागरिक को अपना अपने परिवार के प्रति, समाज के प्रति और राष्ट्र के प्रति दायित्व निभाना है । कुछ समय से मैं देख रहा हॅूं कि परिवार की परिभाषा पति, पत्नि और बच्चों तक ही सीमित हो गई है । समाज के अन्य लोगों का सुख दुख हमारा अपना नहीं होता । इसी प्रकार से हमारा सुख दुख समाज के लोगों का नहीं होता । इसी कारण से मनुष्य कष्ट या समस्या के समय सामाजिक प्राणी होते हुये भी अपने आप को अकेला पाता है।
कुछ समय पहले तक किसी का भी बच्चा अगर सिगरेट, बीड़ी या शराब आदि का नशा करते किसी को मिलता था तो प्रत्येक व्यक्ति अपना सामाजिक दायित्व समझते हुये उसे रोकता था । उसके परिवारजनों को सूचना देता था तो एक प्रकार से कुरीतियों पर दुष्प्रभावों पर पारिवारिक नियन्त्रण के साथ साथ सामाजिक नियन्त्रण भी होता था । नशे की बात हो, महिलाओं से छेड़खानी की बात हो या कोई दुर्घटना हो जाए तो आंख बचाकर निकलने में ही भलाई समझी जाती है ।
इसलिये पहले तो सभी अपना पारिवारिक दायित्व निभायें केवल बच्चे पैदा करना ही अपना दायित्व न समझें बल्कि उन्हें अच्छे संस्कार देना, बच्चों को समय देना और समाज को सुसंस्कृत, सभ्य नागरिक देना भी सभी का दायित्व है। सामाजिक दायित्व को समझते हुये उसके खिलाफ खड़े होने का नैतिक साहस अपने अन्दर पैदा करें और सामाजिक दायित्व को निभायें, गल्त किसी के साथ भी हो रहा है तो उसके खिलाफ आवाज उठायें ।
परिवार और समाज के साथ सरकार पर भी बहुत बड़ा दायित्व आता है इन बुराईयों को कुचलने के लिये सरकार को सख्त कानून बनाने की आवष्यकता है । इसमें वर्तमान कानूनों में अगर किसी संषोधन की आवश्यकता हो तो केन्द्र और प्रदेश की सरकारें मिलकर सख्त कानून बनायें ।
पुलिस प्रशासन के लोग अकसर यह षिकायत करते हैं कि हम तो केस पकड़ते हैं लेकिन अदालत से लोग छूट जाते हैं क्योंकि पकड़ी गई नशे की खेप की मात्रा कम होती है । तो क्या अपराधी इतनी कम मात्रा में लाते हैं या पकड़ने वाले पकड़ी गई खेप की मात्रा कम दिखाते हैं । इसलिये सख्त कानून की आवश्यकता केवल धन के लालच में लगे समाज विरोधी ड्रग तस्करों के लिये नहीं अपितु इसे बनाने वालों, तस्करी करने वालों, नशा फैलाने वालों, प्रयोग करने वालों और पुलिस प्रशासन तथा राजनीतिक संरक्षण देने वालों समेत सब के लिये सख्त कानून की आवश्यकता है । इसके लिये सब को इन सभी समाज विरोधी गतिविधियों में संलिप्त सभी लोगों के विरूद्ध सख्त दृष्टिकोण अपनाना होगा और सामान्य कानूनों के तहत मिलने वाले संरक्षण से इन्हें बाहर रखना होगा ।
मुझे याद है 1995 में संसद की ’’पर्यटन और परिवहन’’ की स्थाई समिति के सदस्य के तौर पर सिंगापुर जाने का अवसर मिला । उन दिनों अमेरिका के दो नागरिक नशे की तस्करी के आरोप में सिंगापुर में पकड़े गये थे । अमेरिका के राष्ट्रपति ने उन्हें छुड़ाने के भरसक प्रयास किये लेकिन प्रधानमन्त्री श्री ली ने एक न सुनी और तीस लाख की आवादी वाले सिंगापुर ने दुनिया के सबसे ताकतवर देश के नशे के दो तस्करों को अपने देश के कानून के अनुसार फांसी पर लटका दिया ।
क्या 140 करोड़ की आबादी वाला नया भारत और यहां के विभिन्न दलों के शासक दलगत राजनीति से ऊपर उठकर नशे के इस कैंसर से देश को मुक्त करने की इच्छाशक्ति दिखायेंगे और विश्वशक्ति बनने वाला भारत ’’नशा मुक्त’’ भी होगा ? यही हमारी सबसे बड़ी परीक्षा है और पास कर ली तो सबसे बड़ी उपलब्धि भी होगी ।

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