Thursday, 15 January 2026
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जारी रहेगी अपराजिता और विक्रमादित्य की नकदी की अटैचमैन्ट

ई डी अधिनियम में 2013 में हुए संशोधन से

173 Cr.PC के तहत रिपोर्ट की अनिवार्यता नहीं

शिमला/शैल। सीबीआई और ईडी की जांच झेल रहे मुख्यमन्त्राी वीरभद्र सिंह के खिलाफ सी बी आई और ई डी मे अलग-अलग एफ आई आर दर्ज है। इनमें वीरभद्र सिंह प्रतिभा सिंह आनन्द चैहान और चुन्नीलाल तथा अन्य नामित हैं । लेकिन दोनो एफ आई आर में वीरभद्र की बेटी अपराजिता सिंह और बेटा विक्रमादित्य सिंह नामित है।  परन्तु ई डी ने 23-03-16 को मनीलाॅडरिंग एक्ट की धारा 5 (1) के तहत कारवाई करते हुए अपराजिता के 15,85,639 रूपये और विक्रमादित्य के 62,86,639 रूपये  अटैच कर लिये । अटैचमैन्ट की  इस कारवाई से आहत होकर इन दोनो ने ई डी की कारवाई को दिल्ली उच्च न्यायालय  में चुनौती देते हुए इस कारवाई को निरस्त करने और ई डी अधिनियम की धारा  5 को अंसवैधानिक करार देने की गुहार लगाई है। इनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने अटैचमैन्ट के आदेश को यथावत जारी रखते हुए अटैचमैन्ट से जुडी अगली कारवाई पर रोक लगा दी है। यह पूरा प्रकरण इस समय प्रदेश के राजनीतिक और प्रशासनिक हल्कों में एक ऐसा मुद्दा बना हुआ है  जिससे पूरा प्रदेश  प्रभावित हो रहा है इस परिदृश्य में हर आदमी की नजर इस मुद्दे पर बनी हुई है और इसे समझने के लिये प्रयासरत है। क्योंकि यदि इस मामले में अपराजिता और विक्रमादित्य को वांच्छित राहत मिल जाती है। तो इसका असर सी बी आई और ई डी  में वीरभद्र तथा अन्य के खिलाफ चल रहे मामलों पर सकारात्मक पड़ेगा यदि राहत न मिली तो नकारात्मक पडेगा यह तय है।  

मनीलाॅडरिंग  अधिनियम 2002 में आया था उस समय उसकी धारा 5 के तहत अटैचमैन्ट की कारवाई के लिये जो आवश्यक प्रावधान रखे गये थे उनके मुताबिक सी आर पी सी की धारा 173 के तहत मैजिस्ट्रेट के पास रिपोर्ट फाईल होना आवश्यक था। अपराजिता सिंह तथा विक्रमादित्य के खिलाफ ई डी की ऐसी कोई रिपोर्ट  173 सी आर पी सी के तहत मैजिस्ट्रेट के पास नहीं है। लेकिन इस अधिनियम की धारा 5 में चार जनवरी 2013 को अधिसूचित संशोधन के तहत 173 के तहत रिपोर्ट की अनिवार्यता नही रह गयी है In Section 5 of the  principal Act, for Sub-section (1) the following sub-section shall be substituted, namely :- 

(1) "Where the Director or any other officer not below the rank of Deputy Director authorised by the Director for the purposes of this section has reason to believe (the  reason for such belief to be recorded in writing), on the basis of material in his possession, that- 

(a)Any person is in possession of any proceeds of crime; and 

(b)Such proceeds of crime are likely to be concealed, transferred or dealt with in any manner which may result in frustrating any proceeding relating to confiscation of such proceeds of crime under this Chapter, 

he may, by order in writing provisionally attach such property for a period not exceeding one   hundred and eighty days from the date of   the order, in such manner as may be prescribed: 

 Provided that no such order of attachment shall be made unless, in relation to the scheduled offence, a report has been forwarded to a Magistrate under section 173 of the Code of Criminal Procedure, 1973, or a complaint  has been filed by a  person authorised to investigate the offence mentioned in that Schedule, before a Magistrate or court for taking cognizance of the scheduled offence,  as the case may be, or a similar report or complaint has been made or filed under the corresponding law of any other country: Provided further that, notwithstanding  anything contained in clause (b), any property of any person may be attached under this section if the Director or any other officer  not below the rank of Deputy Director authorised by him  for the purposes of this section has reason to believe (the reason for such belief to be recorded in writing ), on the basis of material in his possession, that if such property involved in money –laundering is  not attached immediately under this  Chapter the non- attachment of the property likely to frustrate any  proceeding under this Act"  अपराजिता  और विक्रमादित्य ने अधिनियम की धारा 5 के 2002 के मूल प्रावधानो के अनुसार ई डी की कारवाई को चुनौती दी है।  जिसका लाभ 2013 के संशोधन के मुताबिक मिलना संभव नही लगता ।  2002 में प्रोविजनल अटैचमैन्ट की अधिकतम सीमा 90 दिनो की थी जिसे 2013 में बढ़ाकर 180 दिन कर दिया गया है। प्रोविजनल अटैचमैन्ट के बाद 30 दिन के भीतर  ई डी की अपनी एजुकेटिंग अथारिटी के पास की  रिपोर्ट प्रेषित करनी होती है जो हो चुकी है। अटैचमैन्ट के बाद पूरी जब्ती की कारवाई 180 दिनो के बाद अमल में लायी जाती है लेकिन इस मामले में ग्रेटर कैलाश में मई 2014  में प्रतिभा सिंह द्वारा खरीदी गयी संपति की अटैचमैन्ट होने से इस पूरे प्रकरण की गंभीरता और बढ़ जाती है। इस परिदृश्य में अटैचैन्ट का निरस्त हो पाना कठिन माना जा रहा है। 

 

रिज स्थित चर्च की 17.50 करोड़ में होगी रिपेयर या..... ?

शिमला। शिमला के रिज स्थित की 17.50 करोड रूपये में रिपेयर किये जाने का अनुबन्ध 10 सिम्बर 2014 का हस्ताक्षरित हुआ है। आर टी आई के माध्यम से 27.2.16 को बाहर आये इस अनुबन्ध की शर्त संख्या 17 के अनुसार रिपेयर का काम दो वर्षो में पूर्ण होना है। सितम्बर 2014 में हुए अनुबध के दो वर्ष सितम्बर 2016 में पूरे हो जायेगें। इसके मुताबिक केवल पांच माह का समय शेष बचा है। अनुबन्ध के मुताबिक इसमें 15 करोड़ का तो सिविल वर्क ही होना है। लेकिन अभी तक मौके पर कोई काम शुरू ही नहीं हुआ है इसमें बहुत सारी अनुमतियां प्रदेश सरकार और नगर निगम शिमला से आनी है। इन अनुमतियों की स्थिति इस समय क्या है इस पर अधिकारिक तौर पर कोई कुछ भी कहने से बच रहा है। ऐसे में पांच माह मे 17.50 करोड़ का काम कैस पूरा होगा अपने में ही कई सवाल खडे कर जाता है। इस चर्च की वर्तमान स्थिति को देखते हुए कोई भी तकनीकी जानकार यह मानने को तैयार नही है कि इसकी रिपेयर पर 17.50 करोड़ रूपये खर्च हो सकते है क्योंकि यह पूरा भवन कहीं से भी लेश मात्र भी क्षतिग्रस्त नहीं है।
इस चर्च का जिर्णोद्वार भारत सरकार के माध्यम से एशियन विकास बैक से लिये गये कर्ज से
किया जा रहा है। यह चर्च शहर की हैरिटेज संपतियों में शामिल है। हैरिटेज के तहत सारा निर्माण कार्य प्रदेश का पर्यटन विभाग करवा रहा है और लिये यू एस क्लब में पर्यटन विभाग को अतिरिक्त कार्यालय की सुविधा दी गयी है। पर्यटन विभाग स्वयं मुख्य मंत्री के पास है और उनके प्रधान सचिव अतिरक्त मुख्य सचिव वी सी फारखा के पास विभाग सचिव की जिम्मेदारी है। पर्यटन विकास के लिये प्रदेश में अलग से एक बोर्ड गठित है जिसके उपाध्यक्ष पूर्व पर्यटन मन्त्री विजय सिंह मनकोटिया है । पर्यटन निगम के उपाध्यक्ष वीरभद्र के विवस्त हरीश जनारथा है। यह सभी लोग पर्यटन विकास बोर्ड के सदस्य भी है। हैरिटेज संरक्षण के लिये हैरिटेज कमेटी भी गठित है। इस रिपेयर के लिये हस्ताक्षरित अनुबन्ध के अनुसार यह सारा काम हैरिटेज मानदण्डो के अनूरूप होना है। इस सबका अर्थ यह हो जाता है कि 17.50 करोड़ की रिपेयर का प्रारूप निश्चित तौर पर इन सबके हाथों से गुजरा है और इसके लिये सबकी अनुमति रही होगी । अब पांच माह में यह काम कैसे पूरा किया जाता है या इसमें समय और बढाया जाता है। यह तो आगे ही पता चलेगा। लेकिन यह भी सवाल उठ रहा है कि 2014 में हस्ताक्षरित हुए अनुबन्ध पर अब तक कोई कारवाई क्यों नहीं हुई ? दूसरी ओर इस अनुबन्ध पर पर्यटन विभाग के साथ इण्डिया के कर्मचारियों/ पदाधिकारियों की ओर से हस्ताक्षरित किये गये है। स्मरणीय है कि चर्च आफ नार्थ इण्डिया का गठन छः चर्च सूमहों को एक संस्था के तहत लाने के लिये किया गया था। लेकिन सी एन आई के गठन के बाद इसके सदस्यों /पदाधिकारियों पर चर्च एंवम अन्य संपत्तियों के दुरूप्योग और उनको गल्त ढंग से बेचने आदि के आरोप जब सामने आने लगे तब कुछ लोगों ने सी एन आई के गठन को यह कहकर अदालत में चुनौती दे दी की यह संस्था षडयंत्र करके इन संपत्तियों को हडपने का प्रयास कर रही है। इसमें देश केे कई हिस्सों में सी एन आई के लोगों पर बने आपराधिक मामलों में सजा तक भी हो चुकी है। इसी सबको सामने रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने सी एन आई के गठन को ही अवैध करार देते हुए उसे ऐसी संपत्तियों से तुरन्त प्रभाव से बेदखल करके यह संपत्तियां उन मूल संस्थाओं को वापिस कर दी है जिनके पास यह 1948 में भारत सरकार के फैसले के बाद कर दी थी। क्योंकि अग्रेंजी शासन काल चर्च और अन्य संपत्तियो की देख रेख की जिम्मेदारी सरकार के पास थीं लेकिन 1948 में ही भारत सरकार ने हिन्दु धार्मिक संस्थाओें की संपत्तियों की तर्ज पर इनकी जिम्मेदारी भी स्थानीय संस्थाओं को सौंप दी थी। हिमाचल में भी ऐसी संपत्तियों को लेकर बडी विवादित स्थित है। ऐसे में सी एन आई को लेकर आये सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद भी पर्यटन विभाग का सी एन आई के साथ अनुबन्ध साईन करना कई सवाल खडे करता है।

सीआईआई हिमाचल प्रदेश में उद्योग को बढ़ावा देने के लिए कदम बढ़ाने का आवाह्न किया



गर्ल चाइल्ड की बेहतरी, श्रम सुधारों में परिवर्तन, बद्दी तक मेट्रो कनेक्टिविटी है सीआईआई का 2016-17 का एजेेंडा-संजय खुराना

शिमला। कंफेडरेशन आफ इंडियन इंडस्ट्री (सीआईआई) हिमाचल प्रदेश स्टेट काउंसिल ने प्रेस कांफ्रेंस के दौरान वर्ष 2016-17 के लिए सीआईआई के एजेंडे का अनावरण किया। सीआईआई हिमाचल प्रदेश स्टेट काउंसिल के चेयरमैन संजय खुराना ने वर्ष 2016-17 के लिए सीआईआई की थीम बिल्डिंग कंपटीटिव हिमाचल की घोषणा की। उन्होंने कहा कि सीआईआई हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री का धन्यवाद देता है कि उन्होंने सीआईआई द्वारा मुख्यमंत्री स्टार्टअप स्कीम के सुझाव को हिमाचल प्रदेश के युवाओं के लिए हिमाचल प्रदेश के बजट में घोषित किया। उन्होंने कहा कि सीआईआई हिमाचल प्रदेश सरकार के साथ काफी नजदीकी से कार्य कर रहा है। उन्होंने कहा कि सीआईआई हिमाचल प्रदेश में इंक्यूबेशन सेंटर की शुरुआत के लिए भी अनुशंसा करेगा।
उन्होघ्ने कहा कि सीआईआी हिमाचल प्रदेश सरकार के साथ काफी लंबे अरसे से कार्य कर रहा है और इस सीआईआई सरकार से श्रम सुधारों, इंडस्ट्री के लिए एग्जिट पालिसी, रिटेंशन पालिसी के साथ ही हिमाचल प्रदेश के लिए आईटी पालिसी और सोलर पालिसी के लिए अनुसंशा करेगी।
खुराना ने कहा कि इस वर्ष सीआईआई कई जिला प्रशासन, स्थानीय एनजीओ और अग्रणी शैक्षणिक संस्थानों के साथ कार्य करेगा जिससे कि आर्थिक रूप से पिछड़े और बैकवर्ड क्लास को सीएसआर गतिविधियों के तहत लाभ दिया जा सके। उन्होंने कहा कि सीआईआई का विशेष जोर राज्य की गर्ल चाइल्ड को बढ़ावा देना और उनकी स्थिति को सुधारना है। उन्होंने कहा कि इसके लिए सोलन और सिरमौर में पायलट प्रोजेक्ट लांच किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि सीआईआई राज्य सरकार को बद्दी इंडस्ट्रियल एरिया के लिए मेट्रो कनेक्टिविटी का सुझाव भी दिया है।
शहरी विकास मंत्रालय द्वारा सीआईआई को धर्मशाला स्मार्ट सिटी परियोजना पर सक्रिय रूप से काम करने का लक्ष्य दिया गया है। जिसके लिए सीआईआई अपने सभी संसाधनों और विशेषज्ञता के साथ जुटा है।
सीआईआई हिमाचल प्रदेश स्टेट काउंसिल के पूर्व अध्यक्ष राजेंद्र गुलेरिया ने कहा कि हमने यह सिफारिश भी की है किराज्य के सबसे बड़े औद्योगिक क्षेत्र बद्दी में मेट्रो कनेक्टिविटी इंट्रोड्यूस की जानी चाहिए। हमको उम्मीद है कि जल्द ही हमारे सुझावों पर प्रयास सफल होंगे। उन्होंने कहा कि जनसांख्यिकीय और अन्य प्राकृतिक निधि का उपयोग करने केलिए सभी को समावेशी विकास पर ध्यान केंद्रित रहना चाहिए।

राजस्व और वन विभाग ने उड़ाई कानून की धज्जियां-सरकार रही मूक दर्शक

शिमला/शैल। प्रदेश में सरकारी भूमि पर हुए अवैध कब्जों कोे लेकर राज्य सरकार ने 1983 में ही Prevention of encroachment on Government Lands स्ंदके एक्ट पारित कर रखा है। इस एक्ट में 1984 में संशोधन करके धारा 30 को जोड़ा गया था। इस एक्ट के तहत सरकारी भूमि पर होने वाले अवैध कब्जों के लिए राजस्व और वन विभाग के अधिकारियों को सीधे जिम्मेदार ठहराया गया है। किसी भी अधिकारी के स्तर पर हुई कोताही के लिए उसे एक वर्ष से लेकर तीन वर्ष तक के कारावास के दण्ड़ का प्रावधान इस एक्ट में रखा गया है। स्मरणीय है कि अप्रैल 1983 को जब वीरभद्र सिंह ने प्रदेश के मुख्यमन्त्री का पदभार संभाला था तब उससे पहले प्रदेश के कथित वन माफिया के खिलाफ एक लम्बी लड़ाई लड़ी थी। जिसमें इस माफिया के खिलाफ उन्होनें उस समय प्रदेश के विधायकों और सांसदों के नाम एक खुला पत्र तक लिखा था। इस पृष्ठभूमि में 1983/84 के इस एक्ट की गम्भीरता का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है। लेकिन क्या व्यवहार में वीरभद्र का प्रशासन इस एक्ट को आज तक अमली जामा पहना पाया है शायद नहीं।
धूमल के पहले शासन काल 1998 से 2003 में तत्कालिन राजस्व मन्त्री डा. राजन सुशांत नाजायज़ कब्जों को नियमित करने के लिए एक निति लाए थे। इसके तहत सारे अवैध कब्जा धारकों से नियमितिकरण करने के लिये आवेदन मांगे गये थे। उस समय सरकार के पास ऐसे दो लाख से अधिक आवेदन आये थे। यह नीति 1983 के एक्ट की की सीधी अवहेलना थी इसलिये प्रदेश उच्च न्यायालय ने इसका अनुमोदन नहीं किया था। अब फिर अवैध कब्जों को लेकर उच्च न्यायालय के पास शिकायत आयी और उसका कड़ा संज्ञान लेते हुए ऐसे कब्जों को हटाने के निर्देश देेते हुए इस संद्धर्भ मंे स्टे्टस रिर्पोट सरकार से तलब की। उच्च न्यायालय की सख्ती से सरकारी भूमि पर अवैध रूप से बने सेब के बागीचों पर भी कुल्हाड़ी चली है। उच्च न्यायालय ने एक एर्क इंच भूमि को अवैध कब्जों से छुड़ाने के निर्देश दिये है। उच्च न्यायालय में आयी स्ट्ेटस रिर्पोट में भी अवैध कब्जों की संख्या हजारों में आयी है। उच्च न्यायालय की सख्ती से अवैध कब्जा धारकों में बेचैनी फैली हुई और वह इसके लिये सरकार पर दवाब बना रहे हैं। वोट की राजनीति के चलते वीरभद्र इस अवैधता पर अपने पुराने तेवरों को नहीं दोहरा पाये हंै। उल्टा इस मसले पर सदन में चर्चा करके अपरोक्ष में न्यायालय को प्रभावित करने का प्रयास किया गया।
इस परिदृश्य में महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि दो बार सरकार के सामने अवैध कब्जों की सूचियां आ चुकी हैं। अवैध कब्जा धारकों की संख्या लाखों में है। हर विधानसभा क्षेत्र में यह कब्जे हैं। अवैध कब्जे हटाने के लिये 1983/84 में अधिनियम आ गया था। इस एक्ट के बाद राजस्व विभाग दो बार स्टैण्डिंग आर्डर जारी कर चुका है। इन स्टैण्डिंग आर्डरों में कई कई एक्ट सूचित हंै। स्टैण्डिंग आर्डर का अर्थ है कि उसमें सूचीबद्ध किये गये अधिनियमों की अनुपालना सुनिश्चित करना उनका दायित्व है और इसकेेेे लिये उन्हें अलग निर्देश जारी नहीं किये जायेगंे । 1983 से लेकर अब तक वीरभद्र शान्ता कुमार और प्रेम कुमार धूमल तीनों प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चूके हंै। तीनों के ही शासनकालों में अवैध कब्जे हुए हैं। लेकिन आज उच्च न्यायालय की सख्ती और इस एक्ट के स्पष्ट प्रावधानों के बावजूद आज भी सरकार राजस्व और वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कारवाई ना करके सीधे संदेश दे रही है कि सारी अवैधता को उसका संरक्षण प्राप्त है।

Prevention of encroachment

on Government Lands

Responsibility of Revenue officials to detect encroachments
13.1 At the time of crop inspections or other wise the patwari shall detect all encroachments on government lands in his jurisdiction and prepare a case for encroachments against the encroach. He will be held responsible if any encroachment remains undetected during crops inspection or otherwise in his circle. The Field kanungo and the Revenue officers shall be responsible for detection of any encroachment on government lands found during checking of crop inspections in their tours. They shall also be duty–bound to detect encroachments on government lands in their respective jurisdictions.
Section 30 of Act 30 No 3 of 1984 .
13.2 Under Section 30 of the H.P Prevention of Specific Corrupt Practices Act. 1983, the revenue officials are required to detect all encroachment on Govt. land , otherwise they are liable for punishment Section 30 is reproduced below:-
"Whoever-
(i) being an officer of the Forest Department duty bound to prevent an encroachment over the reserved and demarcated protected forest ladn;or
(ii) being a revenue officer duty bound to prevent any encroachment over land belonging to the government; or
(iii) being an officer of the Municipal Corporation, Notified Area committee or Municipal Committee duty bound to prevent encroachment over the land belonging to these bodies.
Intentionally or knowingly permits connives, abets or suffers on account of his commission to detect or report an encroachment in areas, within his jurisdiction shall be punished with imprisonment of either description which shall be less then one year but can be extended to three years and shall also be liable to fine.
Provided that the court may for any special reason to be recorded in writing impose a sentence of imprisonment of less than one year”

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