Thursday, 15 January 2026
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फिर से बोले वीरभद्र

शिमला/शैल। एच पी सी ए और अब बी सी सी आई के भी अध्यक्ष हमीरपुर के भाजपा सांसद तथा भाजपा युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनुराग ठाकुर के तथा अन्य के खिलाफ वीरभद्र की विजिलैंस द्वारा सरकारी काम में बाधा डालने के लिए बनाये गये मामले में दर्ज एफ आई आर और सी जे एम कोर्ट धर्मशाला मे चल रही कारवाई को प्रदेश उच्च न्यायालय ने निरस्त कर दिया है। उच्च न्यायालय के फैंसले ने वीरभद्र की विजिलैंस की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल उठाये हैं । बल्कि फैसले से यह संदेश जाता है कि संभवतः यह मामला जानबूझ कर बनाया गया था। इसी तरह का संदेश ए एन शर्मा मामले में आये फैसले से भी गया है। इन मामलों में ऐसी बुनियादी कमीयां थी कि कानून की थोडी सी जानकारी रखने वाला हर आदमी यह मानकर चल रहा था कि यह मामले सफल नही हो सकते हुआ भी ऐसा ही है।
लेकिन इन मामलों के सफल /असफल होने पर किसी ने विजिलैन्स या दूसरे प्रशासनिक तन्त्रा से तो कुछ पूछना नही है। इनमे पहला और अन्तिम सवाल भी वीरभद्र सिंह से ही पूछा जाना है क्योंकि भ्रष्टाचार के खिलाफ इस कार्यकाल में लडी गयी लडाई का सबसे बडा प्रमाण यही एच पी सी ए के मामले रहे है। इन मामलों के परिणाम भी वीरभद्र सिंह के सामने ही आ गये हैं ऐसे में इन पर वीरभद्र सिंह से ही प्रतिक्रिया ली जानी थी। मीडिया ने अपना धर्म निभाते हुए सवाल पूछ लिया इस सवाल पर वीरभद्र सिंह ने कहा कि उनकी सरकार इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर करेगी।
अब वीरभद्र के इस दावे को लेकर चर्चाएं चलना तो स्वाभाविक है। यह चर्चा चल रही है कि क्या वीरभद्र सिंह ने स्वयं इस मामले में आये फैंसले को पढ़ा होगा? क्योंकि जो भी इस फैसले को पढे़गा वह मानेगा कि इसमें अपील करने का अर्थ होगा और फजीहत करवाना । इस मामले में चाहिये तो यह था कि इससे प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष में जुडे हर अधिकारी की कड़ी जवाब तलबी करते हुए उनके खिलाफ कारवाई की जानी चाहिये थी। लेकिन ऐसा लगता है कि वीरभद्र के शुभ चिन्तकों ने पूरा मन बना लिया है कि सरकार को अपने ही बोझ से इतना दबा दो कि आने वाले समय में उसके खिलाफ कुछ करने की विरोधीयों को आवयश्कता ही न रहे।

फारखा की ताजपोशी से कितने मजबूत हुए वीरभद्र चर्चा में है यह सवाल

शिमला/शैल। मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह ने पांच वरिष्ठ आई ए एस अधिकारियों को नजर अन्दाज करके वीसी फारखा की मुख्य सचिव के पद पर ताजपोशी की है। इस ताजपोशी से वीरभद्र सिंह और उनकी सरकार कितनी मजबूत हुई है यह सवाल सचिवालय के गलियारों से लेकर सड़क तक हर कहीं चर्चा का विषय बना हुआ देखा जा सकता है। क्यांेकि इस ताजपोशी के बाद यंहा तैनात वरिष्ठ अधिकारी प्रोटैस्ट लीव पर चले गये हंै और नेता प्रतिपक्ष पूर्व मुख्यमन्त्री प्रेम कुमार धूमल ने भी इस ताजपोशी को ऐसे उच्च पदों की गरिमा को कमजोर करना करार दिया है। जो अधिकारी प्रोटैस्ट लीव पर गये हंै वह आगे क्या करते हंै और कब तक छुट्टी पर रहते इसका पता तो आने वाले समय में ही लगेगा लेकिन इन लोगों का सक्रिय सहयोग सरकार को नही मिलेगा इतना तो तय है। इस ताजपोशी का सीधा प्रभाव मुख्यमन्त्री कार्यालय पर पड़ा है क्यांेकि फारखा पहले मुख्यमन्त्राी के प्रधान सचिव थे और कई महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाले हुए थे। अब फारखा के स्थान पर सेवानिवृत पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव टीजी नेगी को लगाया गया है। उनकी नियुक्ति बतौर सलाहकार है जिसमें वह प्रधान सविच की जिम्मेदारी संभालेगे। मुख्य मन्त्री के आदेशों के लिये जाने वाली हर फाईल उनके माध्यम से ही जायेगी सीधे नही यह व्यवस्था फारखा के समय में ही कर दी गयी थी और अभी तब बरकार है। लेकिन सेवा निवृत होने के कारण टी जी नेगी किसी भी विभाग की प्रशासनिक जिम्मेदारी सीधे नही उठा सकते। इसलिये हर काम के लिये दूसरे अधिकारियों के सहयोग की आवश्यकता रहेगी। संयोगवश मुख्यमन्त्राी के सचिवालय में प्रधान निजि सचिव सुभाष आहलूवालिया प्रधान सचिव टी जी नेगी, टी सी जनारथा, राकेश शर्मा ढिड़ोरा सभी सेवा निवृत अधिकारी है। ओ एस डी अमितपाल की नियुक्ति तो वैसे ही राजनीतिक है। ऐसे में मुख्य सविच वी सी फारखा पर प्रशासनिक और राजनीतिक दोनांे ही तरह की जिम्मेदारी बढ़ जायेगी। आगे विधान सभा के चुनाव होने हैं जिनकी यह संभावना बराबर बनी हुई है कि यह चुनाव इस वर्ष भी करवाये जा सकते हैं। मुख्यमन्त्री जिस तरह से प्रदेश भर का दौरा कर रहे है उसे एक तरह से सरकारी खर्च पर चुनाव प्रचार की संज्ञा दी जाने लग पड़ी है। आने वाले दिनांे में इन दौरों पर सवाल भी उठ सकते हंै। चुनावी वर्ष को देखते हुए सरकारों को बहुत सारे फैसले राजनीतिक उद्देश्यो को ध्यान में रखकर लेने पड़ते है। यदि पिछले तीन चुनावों पर नजर दौडाई जाये तो हर चुनाव से पहले के दो वर्षाे में सरकारें सामान्य से दो गुणा कर्ज उठाती रही है। इस बार तो वित्तिय स्थिति और भी गंभीर है ऐसे में इन दौरो में की जा रही घोषनाओं को अमली जामा पहनाने के लिये अधिक कर्ज उठाना सरकार की स्वाभाविक आवयश्कता होगी। लेकिन यह कर्ज उठाने के लिये वित्त विभाग के साथ अन्य विभागों का भी सहयोग लेना पड़ेगा। इस सहयोग के लिये प्रशासनिक रूतवे से अधिक आपसी सौहार्द ज्यादा आवयश्क रहता है। क्योेंकि यदि चुनावी वर्ष में हर अधिकारी नियम कानून के मुताबिक ही काम करने की बात करने लग जाये तो सरकार के लिये कठिनाई पैदा हो जाती है। चुनावी वर्ष के कारण ही सरकार पर विपक्ष के हमले तेज हो जाते है। माना जा रहा है कि विपक्ष आने वाले दिनों में आरोप पत्रा दागेगा। क्योंकि अब तक के तीन वर्ष के कार्यकाल में वीरभद्र सरकार धूमल की पूर्व सरकार के खिलाफ एक भी मामला प्रमाणित करने में सफल नही हो पायी है। धूमल शासन के खिलाफ हिमाचल आॅन सेल का जो राग अलाप कर वीरभद्र सरकार सत्ता में आयी थी उस दिशा में एक भी मामले पर कोई कारवाई सामने नही आयी है बल्कि जिन अधिकारियों ने बेनामी सौदों को पकड़ने में महत्वपूर्ण कारवाई करके हजारों बीघे जमीन चिन्हित करने का दावा किया है उन्हंे ईनाम के तौर पर वहां से हटा दिया गया है और इन मामलों में हर बार यही जवाब आता रहा कि जिलाधीशों को शीघ्र कारवाई के निर्देश जारी कर दिये गये हैं। विजिलैन्स में कई गंभीर मामलों की शिकायतें कई वर्षो से लंबित पड़ी हुई हंै। जिन पर निहित कारणों से कोई कारवाई नही की जा रही है। आने वाले दिनों में सरकार को घेरने के लिये कई गंभीर मामले सामने आ सकते हैं ऐेसे में वीरभद्र सिंह ने जो टीम अब खड़ी की है उसमें कितना आपसी सहायोग रह पाता है और फारखा कैसे सबको अपने साथ लेकर चल पाते हैं इस पर अभी से सबकी नजरे लग गयी हैं। क्योंकि अभी तक वीरभद्र सिंह जितने भी मामलों पर जो जो दावे करते रहे हंै वह सब केवल ब्यानोें तक ही रहे हंै और हकीकत नही बन पाये हंै।

क्या रैगुलेटरी कमीशन का अध्यक्ष पद जुलाई तक खाली रहेगा

शिमला/शैल। प्रदेश के शिक्षण संस्थानों पर नियामक की भूमिका निभाने वाले रैगुलटरी कमीशन का अध्यक्ष पद अप्रैल के पहले सप्ताह से खाली चला आ रहा है सरकार ने इस पद को विज्ञापित करने में भी काफी देर लगा दी है लेकिन विज्ञापित करते समय इसमें सदस्य का एक पद और सृजित कर दिया गया। आवेदको ने अध्यक्ष और सदस्यों के रिक्त स्थानों के लिये एक साथ आवेदन किया। परन्तु सरकार ने सदस्य का पद भरने के लिये एक तीन सदस्यों की कमेटी गठित करके इस पद को भर लिया। परन्तु अध्यक्ष का पद भरने के लिये कमेेटीे का गठन नही किया जा सका है।
कमीशन के नियमों के मुताबिक शिक्षा सचिव ही यह पद भरने के लिये पदेन सदस्य सचिव है। इस समय अतिरिक्त मुख्य पी सी धीमान के पास शिक्षा विभाग की जिम्मेदारीे है लेकिन पी सी धीमान भी इस कमीशन के अध्यक्ष पद के लिये स्वयं एक आवेदक है। ऐसे में जब तक पी सी धीमान के पास सचिव शिक्षा की जिम्मेदारी है तब तक वह स्वयं आवदेक होने के नाते इस पद को भरने की प्रक्रिया शुरू नही कर सकते। अब यह सवाल उठता जा रहा है कि जब कमीशन का अध्यक्ष पद ही खाली चल रहा है तब वहां बैठे सदस्य क्या काम कर पा रहे हांेगे और उनके काम का औचित्य क्या रह जायेगा। पी सी धीमान जुलाई में सेवा निवृत हो रहें है। इस लिये यदि सरकार इस पद को भरने की गंभीरता के प्रति ईमानदार तो उसे पी सी धीमान से शिक्षा की जिम्मेदारी लेकर किसी और को देनी होगी ताकि नया आदमी अध्यक्ष पद को भरने की प्रक्रिया को तो शुरू कर पाये। इस अध्यक्ष पद के आवेदकों में पी सी धीमान के साथ ही एक प्रमुख नाम आई पी एस अधिकारी वी एन एस नेगी का भी है। नेगी की सेवा निवृति इसी वर्ष नवम्बर में है। नेगी भी मुख्य मन्त्राी के विश्वास पात्रों में गिने जाते है ओर पी सी धीमान भी उसी विश्वस्तता की पंक्ति में खडे है लेकिन पीसी धीमान के खिलाफ एच पी सी ए के एक मामले में अभियोजन की स्वीकृति सरकार ने दे रखी है। इस परिदृष्य में अब यह सरकार के लिये एक परीक्षा की घडी मानी जा रही है कि वह धीमान और नेगी में से किसे चुनती है।
इस तरह सरकार के लिये मुख्य सूचना आयुक्त का पद भरना भी एक समस्या माना जा रहा हैं। क्योकि इस पद के विज्ञापित होने से पहले ही चार लोग इसके लिये आवदेन भेज चुके है जिनमें केन्द्र सरकार में उच्च शिक्षा सचिव रहें अशोक ठाकुर और सेवा निवृत हो रहे मुख्यसचिव पी मित्रा प्रमुख है। अब यह पद विज्ञापित हो चुका है और इसके आवेदन की अन्तिम तारीख 23 जून है ऐेसे मे 23 जून तक कितने और आवेदक आ जाते है तथा पुराने आवेदकों को नये सिरे से आवदेन की आवश्यकता पड़ती है या नही अभी यह स्पष्ट होना बाकि है। अशोक ठाकुर और पी मित्रा दोनों मुख्य मंत्री केे विश्वस्त माने जाते है। लेकिन इसी बीच यह भी चर्चा सामने आ गयी है कि प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष के एस तोमर भी मुख्य सूचना आयुक्त के प्रबल दावेदारों में है। के एस तोमर को मुख्य मन्त्राी का बहुत ही विश्वसनीय माना जाता है। लेकिन तोमर के लिये संविधान में रोक है। संविधान के मुताबिक केन्द्र या राज्य सरकारों के लोक सेवा आयोगों के सदस्य/अध्यक्ष राज्य सरकार या केन्द्र सरकार में कोई पद स्वीकार नही कर सकते हैं। यह लोग किसी भी लोक सेवा आयोग में तो स्थान पा सकते हैं लेकिन सरकार में नही। लेकिन उच्चस्थ सूत्रों के मुताबिक मुख्यमन्त्री तोमर को ही सी आई सी बनाना चाहते है और इसके लिये वह संविधान की भी अनदेखी करने को तैयार है माना जा रहा है कि तोमर की संभावित उम्मीदवारी के कारण ही इस पद के आवेदनों के लिये 23 जून की तारीख पी मित्रा की सेवा निवृति के बाद की रखी गयी है इस समय मुख्य सविच रैगुलैटरी कमीशन का अध्यक्ष पद और मुख्य सूचना आयुक्त के पद भरना मुख्य मन्त्री के लिये काफी समस्या बन गये है।

पूर्व कर्मचारी नेता गोयल ने फारखा पर लगाये गंभीर आरोप


राष्ट्रपति,प्रधान मन्त्री से लेेकर मुख्यमन्त्री तक को भेजी शिकायत

शिमला/शैल। प्रदेश के पर्यटन विकास निगम में हुए भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलन्द करने वाले निगम के पूर्व कर्मचारी नेता ओम प्रकाश गोयल ने एक बार फिर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यन्त्री और शान्ता कुमार आप के राष्ट्रीय प्रवक्ता संजय सिंह तथा प्रदेश संयोजक राजन सुशांत के नाम भेजे पत्रा के माध्यम से नए सिरे से मोर्चा खोल दिया है। इस बार गोयल ने मुख्यमन्त्री के प्रधान सचिव एंवम अतिरिक्त मुख्य सचिव वी सी फारखा को फिर से निशाने पर लिया है। गोयल ने फारखा की ईमानदारी और निष्ठा पर गंभीर आरोप लगाते हुए मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह से आग्रह किया है कि यदि फारखा का मुख्य सचिव पदोन्नत किया जाता है तो वह इस मामले को प्रदेश उच्च न्यायालय में ले जायेंगे और इसकी पूरी जिम्मेदारी सरकार की होगी। गोयल ने इसी सं(र्भ मे भेजी अपनी पुरानी शिकायतोें का भी मुख्यमन्त्री को स्मरण दिलाया है जिन पर अभी तक वांच्छित कारवाई नही हुई है। गोयल की इस शिकायत के तथ्यों से जहां फारखा के विरोधीयों को उनके खिलाफ एक कारगर हथियार मिल जायेगा वहीं पर वीरभद्र सिंह की भ्रष्टाचार के खिलाफ सारी प्रतिबद्धता भी कसौटी पर लग जायेगी। क्योंकि फारखा वीरभद्र सिंह के विश्वस्त है और इसी नाते वरियता क्रम को नजर अंदाज करके उन्हें मुख्य सचिव बनाने की मंशा रखे हुए है। जबकि वरियता में उपमा चैधरी जैसे अधिकारी भी है जिनके खिलाफ कुछ भी नही है और Outstanding ACR's लिये हुए है। 

इस परिदृश्य में गोयल के पत्र को नजर अन्दाज कर पाना आसान नही होगा क्योंकि हर आरोप की पुष्टि में प्रमाणिक दस्तावेज साथ लगाये हुए हैं। गोयल का आरोप है कि वर्ष 2001 से 2002 में जब फारखा पर्यटन निगम प्रबन्धन के प्रबन्ध निदेशक थे तब उन्होने होटल पीटर हाॅफ में अपने मेहमानों को मुफ्रत में ठहरा कर निगम को वित्तिय नुकसान पंहुचाया है। यह मेहमान जून 2002 में ठहरे थे और गोयल ने होटल पीटर हाॅफ के इस संबध में बिल साथ लगाये हैं। जिन पर एम डी के गेस्ट’ स्पष्ट रूप से लिखा हुआ है। गोयल ने जब इस आश्य की शिकायत निदेशक मण्डल से की थी तब फारखा ने अपने मेहमानों को मुफ्रत में ठहराने से सिरे से ही नकार दिया था। लेकिन गोयल ने 12 मार्च 2015 को लिखे पत्र मे इस आरोप को दस्तावेज लगाकर प्रमाणित कर दिया पर इस पर कारवाई कोई नही हुई।
गोयल का आरोप है कि फारखा के गल्त फैसले के कारण पर्यटन निगम कोे 72 लाख का जुर्माना भरना पड़ा है। फारखा ने मार्च 2002 में निगम के वित्त प्रबन्धक को निर्देश दिये की कर्मचारियों का सी पी एफ प्रोविडैन्ट फण्ड कमीशनर के यहां जमा न करवाया जाये। दो वर्ष तक सी पी एफ जमा न करवाने के मामले में गोयल ने प्रदेश उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका CWP 108/2002 दायर की थी जिसके परिणाम स्वरूप प्रोविडैन्ट फण्ड कमीशनर ने निगम को 72 लाख का दण्ड लगाया।
फारखा पर भारत सरकार में भी झूठेे दस्तावेज फाईल करने का भी आरोप है। यह आरोप निगम के खड़ा पत्थर प्रौजैक्ट को लेकर है। इस प्रौजैक्ट को लेकर 2002 में भारत सरकार के पर्यटन मन्त्रालय में यह दस्तावेज फाईल किये गये यह प्रौजैक्ट पूरी तरह तैयार करके 31-12-2001 को चालू भी कर दिया गया है इन दस्तावेजों में बाकायदा उपयोगिता प्रमाण पत्रा तक फाईल किया गया है। प्रमाण पत्रा और इसके चालू भी कर दिये जाने पर भारत सरकार ने इसकी अन्तिम किश्त 5,66,000 रूपये भी जारी कर दी। भारत सरकार ने राशी प्राप्त करने के लिये भेजे गये दस्तावेजों के मुताबिक खड़ा पत्थर का होटल गिरी गंगा प्रौजैक्ट 31-12-2001 को 39.30 लाख के कुल निवेश के साथ पूरा करके इस्तेमाल में भी ला दिया गया है। भारत सरकार के पैसे से बनी इस संपत्ति के प्रबन्धन का अनुबन्ध भी भारत सरकार के साथ हस्ताक्षरित कर दिया जाता है और किसी को भी इस पर कोई सन्देह नही होता है।
लेकिन जब 24-10-2005 का पर्यटन निगम के निदेशक मण्डल की वीरभद्र सिंह की अध्यक्षता में बैठक होती है तब इस होटल का निर्माण शीघ्र पूरा करने के निर्देशों के साथ इसे न लीज पर देने न बेचने का भी फैसला लिया जाता है। बैठक में इसे अप्रैल 2006 तक पूरा करके पर्यटकों के लिये उपलब्ध करवाने के निर्देश दिये जाते है जिस होटल को भारत सरकार को 39.30 लाख में पूरा हुआ दिखाया जाता है उसी को लेकर 20-02-2006 को प्रौजैक्ट अफसर द्वारा कमीशनर को लिखे पत्रा में कहा जाता है कि इस पर अब तक 84.77 लाख खर्च हो चुका है और शेष बचे काम को पूरा करने के लिये 28,91,703 रूपये की और आवश्यकता होगी । प्रोजैक्ट अफसर के इस पत्र के बाद 31-5-2006 को इसके लिये तीस लाख रूपये और जारी कर दिये जाते हैं। इस तरह यह होटल 25-06-06 को 1,35,84,076 रूपये के निवेश से पूरा करके उद्घाटित कर दिया जाता है। यहां यह सवाल उठता है कि 31-12-2001 को कैसे कह दिया गया कि 39.30 लाख में होटल पूरा करके चालू कर दिया गया है। आगे चलकर यह खर्च कैसे बढ़ गये? इस निमार्ण को लेकर अरसे से सरकार के पास शिकायतें चल रही हैं। फारखा आज अतिरिक्त सचिव पर्यटन हैं और मुख्यमन्त्री के अपने पास विभाग है आज मुख्यमन्त्री के विश्वास के कारण फारखा मुख्य सचिव बन सकते है लेकिन क्या इससे पहले मुख्यमंत्री और फारखा को प्रदेश की जनता के सामने गोयल द्वारा उठाये गये सवालों पर जबाव नही देना चाहिये? या फिर यह जबाव अदालत के माध्यम से ही सामने आयेंगे?


आप की सुन्दरनगर रैली पर लगी विरोधीयों की निगाहें

कांग्रेस के राजेन्द्र राणा और हिलोपा प्रमुख महेश्वर सिंह आप के संर्पक में 

शिमला/शैल। दिल्ली विधानसभा चुनावों में चुनावी राजनीति का अभूतपूर्व इतिहास रचने के बाद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को राजनीतिक हल्कों में एक विकल्प के रूप में देखा जाने लगा है। इसमें कोई दो राय नही है। पंजाब में अगले वर्ष जनवरी में चुनाव होने है और वहां पर इस समय आम आदमी पार्टी को एक बड़ी उम्मीद के रूप में देखा जा रहा है। इसका असर हिमाचल के राजनीतिक और प्रशासनिक हल्कों में उठ रही चर्चाओं के रूप में देखा जा सकता हैं। क्योंकि संयोगवश इस समय हिमाचल में कांग्रेस और भाजपा दोनों का शीर्ष नेतृत्व बराबर के गंभीर आरोपों में घिरा हुआ है। इन आरोपोें का परिणाम इस नेतृत्व के लिये कालान्तर में घातक होगा यह भी तय है। इस राजनीतिक वस्तु स्थिति को ध्यान में रखते हुए दोनों दलों का एक बड़ा वर्ग अपने नेतृत्व से उदासीन भी होता जा रहा है और विकल्प की तलाश में भी है। लेकिन प्रदेश में विकल्प की उम्मीद में नेताओं ने कैसे जनता को पहले धोखा दिया हुआ है उसके परिणामस्वरूप यह वर्ग अभी कोई फैसला लेने से डर भी रहा है।
कांग्रेस-भाजपा का शीर्ष नेतृत्व इस स्थिति को जानता और समझता भी है तथा आम आदमी पार्टी को प्रदेश में कोई बड़ा आकार लेने से पहले ही खत्म भी कर देना चाहता है इस समय आम आदमी पार्टी के नाम पर जो चेहरे प्रदेश की जनता के सामने हैं वह अभी तक कुछ बड़ा नही कर पायेें है। बल्कि इन चेहरों में आपसी एकता भी नही के बराबर है। वैसे ही 2014 के लोकसभा चुनावों में प्रदेश की चारों सीटों पर चुनाव लडा गया था लेकिन उन चारों में से भी केवल दो ही पार्टी में रह गये हंै और उनमें भी सौहार्द की कमी जगजाहिर है। इसी का परिणाम था कि पिछले दिनों प्रदेश संयोजक राजन सुशांत को त्यागपत्रा देने की पेशकश करनी पडी थी और इसका पटाक्षेप प्रदेश के सह प्रभारीे हर्ष कालरा से यहां की जिम्मेदारी वापिस लेने के साथ हुआ था। पार्टी का केन्द्रिय नेतृत्व इस स्थिति से परिचित है और वह सुन्दर नगर में होने जा रही रैली की सफलता /असफलता का आकलन करने के बाद इस दिशा में फैसला लेगा यह माना जा रहा है।
लेकिन पार्टी के अन्दर इस समय जो लोग हैं वह कुछ बड़ा क्यों नही कर पाये हैं? पार्टी को पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों में सफलता क्यों नही मिली? धर्मशाला नगर निगम चुनावों में भी पार्टी कुछ नही कर पायी। यह कुछ ऐसे सवाल है जिनका ईमानदारी से विश्लेष्ण किया जाना आवश्यक है। हिमाचल में अब तक कांग्रेस और भाजपा का ही शासन रहा है दोनों ने ही एक दूसरे के खिलाफ बतौर विपक्ष गंभीर आरोप पत्रा राज्यपाल को सौंपे है लेकिन सत्ता में आने के बाद अपने ही सौंपे आरोप पत्रों पर पर किसी ने भी कोई कारवाई नही की है। आज तो वीरभद्र और धूमल दोनो परिवारों सहित व्यक्तिगत स्तर पर आरोपों से घिरे हुए हैं। इनके आरोपों को पूरी प्रमाणिकता के साथ जनता के सामने रखने की आवश्यकता है लेकिन आम आदमी पार्टी इस जिम्मेदारी को ईमानदारी से निभा नही पायी है क्योंकि सबके अपने अपने कारण रहे हैं। परन्तु जब तक प्रमाणिक आक्रमकता नही अपनाई जाती है तब तक आम आदमी पार्टी को प्रदेश में विकल्प के रूप में परोसना संभव नही हो पायेगा। अब यह चर्चा है कि पार्टी के ही कुछ लोगों के माध्यम से कांग्रेस के राजन्ेद्र राणा और अनिल कीमटा केन्द्रिय नेतृत्व के संर्पक में चल रहे हंै। कांग्रेस भाजपा की संस्कृति से ओतप्रोत यह लोग आम आदमी पार्टी की संस्कृति से कितना मेल खा पायेंगे इसको लेकर अभी से सवाल उठने लग पडे हैं। हिलोपा प्रमुख महेश्वर सिंह भी आप के संपर्क में माने जा रहे हैं। वैसे पिछले दिनों जब आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत हिमाचल दौरे पर थे उस समय महेश्वर सिंह की उनके साथ मुलाकात विशेष चर्चा में रही है। पिछले विधानसभा चुनावों में महेश्वर अपनी जीत के अतिरिक्त और किसी भी सीट पर अपने उम्मीदवारों की जमानत तक नही बचा सके थे। बल्कि उस समय हिलोपा को दुबई स्थित कारोबारी सुदेश अग्रवाल और उनकी समस्त भारत पार्टी से आर्थिक सहयोग भी काफी मिला था। अभी ये लोग पार्टी के दरवाजे पर खडे हैं और माना जा रहा है कि इन लोगों ने आप के केन्द्रीय नेतृत्व को काफी आश्वासन दे रखें हैं।लेकिन प्रदेश के राजनीतिक विश्लेष्कों का यह मानना है कि इन लोगों के आने के बाद वीरभद्र-धूमल ही नही बल्कि कांग्रेस और भाजपा के खिलाफ भी आप को आक्रामकता निभाना आसान नही रह जायेगा। क्योंकि पूर्व के संबंध ऐसा करने नही देंगे।

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