Thursday, 15 January 2026
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भाजपा सार्वजनिक नहीं कर पायी कथित भर्ती घोटाले की ऑडियो

शिमला/शैल। प्रदेश में एक बार फिर बड़े पैमाने पर भर्ती घोटाला हो रहा है। इस घोटाले के पुख्ता सबूत सिफारसी पत्र और आडियो भाजपा के पास मौजूद है तथा इस सबको आरोप पत्र तैयार कर रही कमेटी को सौंपा जायेगा। यह भाजपा प्रवक्ताओं विक्रम ठाकुर, महेन्द्र धर्माणी और हिमांशु मिश्रा ने एक सांझे ब्यान में लगाया है प्रवक्ताओं ने दावा किया है कि प्रदेश में सरकारी और अर्द्ध सरकारी नौकरियों की भर्ती में बड़े स्तर पर घोटाला हो रहा है और यह रौंगटे खडे़ कर देने वाला है।
भाजपा ने आरोप लगाया है कि शिक्षा, परिवहन निगम, वन विभाग, बैंक व अन्य विभागों में हो रही भर्तीयों में अनियमितताओं की सूचनाएं तो मिल ही रही थी। परन्तु अब पर्यटन विभाग में भी युटिलिटी वर्कर्ज के नाम पर लोग रखे जा रहे है और इसके लिये तय प्रक्रिया को पूरी तरह नजरअंदाज किया जा रहा है। सिफारिशी पत्रों में नौकरियों के साथ-साथ टूरिज्म के होटलों के नाम भी अकिंत है।
भाजपा के इस आरोप पर पलटवार करते हुए कांग्रेस मन्त्रीयों सुधीर शर्मा और कर्ण सिंह ने एक वक्तव्य में भाजपा को चुनौती दी है कि वह उनके पास मौजूद आडियो तथा सिफारिशी पत्रां को तुरन्त प्रभाव से सार्वजनिक करें। मन्त्रीयों ने भाजपा के आरोप को सिरे से खारिज करते हुए धूमल के पहले कार्यकाल 1998 से 2003 के बीच हमीरपुर अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड में हुए भर्ती स्कैम का स्मरण दिलाया जिस पर अब सर्वोच्च न्यायालय भी अब अपनी मोहर लगा चुका है। कांग्रेस मन्त्रीयों ने दावा किया है कि वीरभद्र सरकार के इस कार्यकाल में 60,000 नौकरियां प्रदान की जा चुकी है और इनमें पूरी पारर्शिता बरती गयी है।
भाजपा और कांग्रेस के इन दावों में कितना सच है और भाजपा अपने आरोपों को प्रमाणित करने के लिये क्या कदम उठायेगी इसका खुलासा तो आने वाले दिनों में ही होगा। लेकिन 1993 से 1998 के बीच चिटों पर हुई हजारों भर्तीयों को लेकर धूमल शासन में जो जांच करवाई गयी थी। उस पर निणार्यक और प्रभावी कारवाई भाजपा शासन में क्यों नही हो पायी थी इसका कोई जबाव प्रदेश की जनता के सामने अब तक नही आ पाया है। इस ‘‘चिटों पर भर्ती ’’ स्कैम को जिस तरह से भाजपा और कांग्रेस ने दबाया है उससे ऐसे मामलों में दोनों दलों की विश्वसनीयता प्रशनित है। आज भी यह आरोप ब्यानां से आगे नही बढे़गे यह माना जा रहा है। क्योंकि इस हमाम में दोनों दल बराबर के नंगे हैं।
सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि प्रदेश उच्च न्यायालय ने 2013 में सरकार की कान्टै्रक्ट पर लगे कर्मचारियों के नियमितीकरण की पालिसी को असंवैधानिक और गैर कानूनी करार देते हुए रद्द कर दिया है। लेकिन इसके बावजूद भी सरकार कान्ट्रैक्ट पर भर्तीयां भी कर रही हैं और उनका नियमितिकरण भी हो रहा है। यह सब प्रदेश उच्च न्यायालय के फैसले की सीधी अवमानना है। प्रदेश के यह दोनों बड़े राजनीतिक दल इस पर मौन साधे हुए है और इसी से इनकी नीयत और नीति का खुलासा हो जाता है।

केन्द्र के 7 करोड़ का खुला दुरूपयोग और 49 लाख की उपयोगिता प्रमाण पत्र सवालों में

शिमला/शैल। प्रदेश के पर्यटन विभाग में सुनियोजित तरीके से बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार हो रहा है और इस पर प्रदेश उच्च न्यायालय के फैसलों का कोई असर नही हो रहा है यह आरोप लगाया है पर्यटन विकास निगम के पूर्व कर्मचारी नेता ओम प्रकाश गोयल ने। राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री, सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायधीश, राज्यपाल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश मुख्यमन्त्री केन्द्रिय वित्त मन्त्री, केन्द्र के केबिनेट सक्रेटरी सीएजी निदेशक सीबीआई और केन्द्रिय पर्यटन सविच के नाम भेजी 56 पन्नों की शिकायत में गोयल ने आरोप लगाया है कि प्रदेश के पर्यटन विेभाग में केन्द्र सरकार द्वारा भेजे इस करोड़ रूपये में घपला हुआ है। गोयल ने कहा कि जब उन्होने 2002 में इस आशय की एक याचिका उच्च न्यायालय में दायर की थी जिस पर 13.3.2003 को आये फैसले में सरकार को जो निर्देश दिये गये थे उनकी भी अनुपालना नही हुई है। इस संद्धर्भ में गोयल ने 2009 में उच्च न्यायालय में अवमानना याचिका भी दायर की थी। जिसके जवाब में तत्कालीन प्रधान सचिव पर्यटन अशोक ठाकुर ने अपने शपथ पत्र में स्वीकारा है कि विभाग ने भारत सरकार से आये 6,93,9000 रूपये बिना पूर्व अनुमति के दूसरे कार्यो पर खर्च कर लिये हैं। लेकिन इसके लिये उन्होने किसी की जिम्मेदारी तय नही की। बल्कि उच्च न्यायालय के फैसले को लागू करने के लिये जो निर्देश जारी किये थे उन पर आज तक कोई अमल नही हो पाया है बल्कि इस संद्धर्भ में पर्यटन निगम के तत्कालीन प्रबन्ध निदेशक ने भी 16.09.2007 को अदालत में गल्त शपथ पत्रा दायर किया है।

           पर्यटन विभाग का कारनामा           


गोयल का आरोप है कि पर्यटन विकास के लिये विभिन्न योजनाओं के नाम पर केन्द्र सरकार से जो पैसा मिल रहा है उसमें बडे़ स्तर पर घपला हो रहा है इन योजनाओं के लिये झूठे प्रमाणपत्रा भारत सरकार को भेजे जा रहे हैं। केन्द्रिय पैसे का पूरी तरह से दुरूपयोग हो रहा है। अपने आरोप को प्रमाणित करने के लिये गोयल ने सुंरगी टूरिस्ट कम्पलैक्स से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेज आर टी आई के तहत प्राप्त करके अपनी शिकायत के साथ भेजे हैं। इन दस्तावेजों के मुताबिक 1995 में खदराला के लिये केन्द्र ने एक टूरिस्ट कम्पलैक्स स्वीकृत किया था। जिसे बाद में सुंगरी के लिये शिफ्रट कर दिया गया। इस प्रौजैक्ट के लिये 26.3.1996 को भारत सरकार से 46,11,600 रूपये की स्वीकृति प्राप्त हुई। इस टूरिस्ट कम्पलैक्स के लिये प्रदेश सरकार ने तीन लाख का योगदान दिया है। इसमें 38 बिस्तरों के लिये 19 कमरे और 12 बिस्तरों के लिये एक डारमैट्री तथा इनसे संबद्ध अन्य निमार्ण होना था। इसके लिये केन्द्र सरकार से 10.5.1996 को पहली, 7.8.1996 को दूसरी, 10.11.1998 को तीसरी और 24.8.2005 को अन्तिम किश्त भी जारी हो गयी। अन्तिम किश्त से पहले यू सी कम्पलीशन और कमीशनींग आदि के सारे प्रमाणपत्रा भी 31.12.2004 को भारत सरकार को भेज दिये गये। इसके बाद नियमों के अनुसार वांच्छित एग्रीमैन्ट भी भारत सरकार के साथ साईन हो गया और यह कम्पलैक्स एक रूपये प्रतिमाह की दर पर प्रदेश के पर्यटन विभाग को मिल गया। इस टूरिस्ट कम्पलैक्स से जुडी औपचारिकताएं पूरी हो गयी। इसके अनुसार प्रौजैक्ट पूरी तरह तैयार हो कर प्रदेश के टूरिज्म विभाग द्वारा प्रयोग में लाया जा रहा है।
लेकिन जब जुलाई 2006 में मुख्यमन्त्री यहां पहुंचे तो इस निमार्ण को अधूरा देखकर इसे पूरा करने के लिये लोक निर्माण विभाग को ट्रांसफर  करने के निर्देश दे दिये। मुख्यमन्त्री के इन निर्देशों पर अमल करते हुए 21.8.2006 एम टूरिज्म और लोकनिर्माण के अधिकारियों ने कम्पलैक्स स्थल का निरीक्षण किया। निरीक्षण की रिपोर्ट के बाद 16.7.2007 को कम्पलैक्स लोक निर्माण विभाग को ट्रांसफर हो गया। 16.7.207 को जो टूरिज्म और लोक निर्माण विभाग की संयुक्त रिपोर्ट के मुताबिक इसकी ग्राऊंड प्लोर पर पांच कमरे बने थे जो पूरी तरह से टूटे हुए थे और इस पर कोई छत नही थी पूरा निमार्ण पूरी तरह से क्षतिग्रस्त था।
2007 को लोक निर्माण विभाग को ट्रांसफर हो चुके इस कम्पलैक्स पर 2015 में जब अतिरिक्त मुख्य सचिव लोक निमार्ण यहां पहुंचे तो उन्होने इसे पूरा करने के निर्देश विभाग को जारी किये। इन आदेशों पर अमल करते हुए विभाग ने फिर इस स्थल का निरीक्षण करके रिपोर्ट तैयार की। इस रिपोर्ट के मुताबिक इस निमार्ण को तोड़कर नये सिरे से निमार्ण करना होगा। रिपोर्ट के मुताबिक कम्पलैक्स की साईट भी उचित नही है। नये निमार्ण पर 76 लाख खर्च होने का अनुमान है और विभाग ने इस खर्च की स्वीकृति भी 2016 में प्रदान कर दी है पर्यटन विभाग इस निमार्ण पर 46 लाख केन्द्र सरकार के और तीन लाख प्रदेश सरकार के खर्च कर चुका है। पर्यटन विभाग के दस्तावेजों के मुताबिक 31.12.2004 को 49 लाख की लागत से यह कम्पलैक्स पूरी तरह तैयार था और इस्तेमाल में था। लेकिन जुलाई 2006 में मुख्यमन्त्री इसे अधूरा पाते हैं। 2007 में जब लोक निमार्ण इसे अपने कब्जे में लेता है और टूरिज्म के साथ सयुंक्त निरीक्षण करता है तब यह कम्पलैक्स टूटा हुआ पाया जाता है यहां यह सवाल उठता है कि क्या 31.12.2004 को पर्यटन विभाग द्वारा केन्द्र सरकार को निर्माण से जुडे़ जो सर्टिफिकेट भेजे गये थे वह सब झूठ थे? या फिर उसके बाद एक वर्ष में ही यहां तोड़ फोड़ हो गयी? यदि ऐसा हुआ है तो पर्यटन विभाग क्या कर रहा था? जब 2007 में इस निर्माण के क्षतिग्रस्त होने की रिपोर्ट सरकार के पास आ गयी तो उस पर कोई कारवाई क्यों नहीं हुई? इस पर लगा 49 लाख रूपया पूरा बर्वाद हो गया है। दस्तावेजों के मुताबिक यह कम्पलैक्स कभी यूज में लाया ही नही गया है इसके निमार्ण में पूरी तरह घपला हुआ है और इसी कारण इसे भारत सरकार की अनुमति के बिना ही लेाक निमार्ण विभाग को ट्रांसफर कर दिया गया जबकि नियमानुसार ऐसा नही किया जा सकता है। रिकार्ड के मुताबिक यह आज भी भारत सरकार की संपति है।

































कांग्रेस पर भारी पडे़गा वीरभद्र और सुक्खु का टकराव

शिमला/शैल। इन दिनों प्रदेश के राजनीतिक और प्रशासनिक हल्कों में वीरभद्र और कांग्रेस अध्यक्ष सुक्खु में चल रहा टकराव चर्चा का केन्द्र बना हुआ है। वीरभद्र ने पिछले कुछ दिनों में संगठन को लेकर जिस तरह की टिप्पणीयां की हैं उससे यह टकराव अपने आप चर्चा का विषय बन गया है क्योंकि वीरभद्र ने संगठन की कार्यप्रणाली पर ऐसे सवाल उठा दिये है जिनका ताल्लुक सीधे हाईकमान से हो जाता है। वीरभद्र ने संगठन में नियुक्त सचिवों की न केवल संख्या पर बल्कि उनकी एक प्रकार से राजनीतिक योग्यता पर ही सवाल खड़े कर दियेहैं। सचिवो की नियुक्ति हाईकमान के निर्देशों और उसकी स्वीकृति से होती है यह वीरभद्र भी जानते हैं। लेकिन इसके बाद भी उनका ऐसे सवाल उठाना एक प्रकार से हाईकमान को भी चुनौती देने जैसा हो जाता है। वीरभद्र जैसा वरिष्ठ नेता ऐसा क्यों कर रहा है वह अपरोक्ष में हाईकमान से ही टकराव की स्थितियां क्यों पैदा कर रहा है। इसको लेकर यदि वीरभद्र के इस कार्यकाल का निष्पक्ष आंकलन किया जाये तो जो तस्वीर उभरती है इससे सब कुछ पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है।
2012 के चुनावों में वीरभद्र ने कैसे पार्टी की कमान हासिल की थी इसे सब जानते हैं। उस समय यहां तक चर्चाएं उठी थी कि यदि वीरभद्र को नेतृत्व नहीं सौंपा गया तो वह शरद पवार का दामन थाम सकते हैं इसके लिये हर्ष महाजन की भूमिका को लेकर भी चर्चाएं उठी थी। इन चर्चाओं का परिणाम था कि चुनावों में नेतृत्व वीरभद्र को मिल गया। लेकिन जब चुनावों के बाद मुख्यमन्त्री के चयन का सवाल आया था उस समय पर्यवेक्षकों के सामने पूरा विधायक दल दो बराबर हिस्सों में बंटा मिला था। इसी कारण से सरकार के गठन के तुरन्त बाद वीरभद्र ने जब अपने समर्थकों की ताजपोशीयां शुरू की थी तो उस पर इस कदर एतराज उठे थे कि इन ताजपोशीयों पर विराम लगाना पड़ा था। बड़े अरसे बाद यह गतिरोध समाप्त हुआ था। लेकिन वीरभद्र ने जिस तरह से अपने सचिवालय में स्टाॅफ का चयन किया और सेवानिवृत अधिकारियों को अधिमान दिया उसका असर प्रशासन पर भी पड़ा। बल्कि मुख्यमन्त्री के अपने सचिवालय में ही दो धुव्र बन गये। क्योंकि सेवानिवृत अधिकारियों का प्रशासन पर जितना प्रत्यक्ष प्रभाव था उतनी उनकी अधिकारिक तौर पर जवाबदेही नही थी।
वीरभद्र के अपने ही सचिवालय में बने इन अलग-अलग ध्रुवों का परिणाम यह हुआ कि जिन मुद्दों को धूमल शासन के खिलाफ उछाल कर वीरभद्र सत्ता में आये थे उनमें से एक भी मुद्दे को आज तक प्रमाणित नही कर पाये हैं। धूमल के खिलाफ हिमाचल आॅन सेल का आरोप लगाकर कोई मामला चिहिन्त नही कर पाये हैं। मिन्हास को कबर से भी खेद कर लाने की धमकीयां देते थे वीरभद्र परन्तु परिणाम शून्य/अवैध फोन टेपिंग के खुद शिकार होने के वाबजूद इस मामले में कुछ नही कर पाये। एचपीसीए को लेकर जितने मामले उठाये उनका परिणाम यह रहा कि अपने ही सचिवालय के अधिकारी इसमें खाना 12 में अभियुक्त नामजद हैं। यह सारे वह मामले हैं जिन पर जनता को सरकार से कुछ प्रभावी कारवाई की उम्मीद थी। वीरभद्र के अपने ही दफ्तर से डीओ लैटर चोरी होने और उनके आधार पर ट्रांसफरें होने के मामलें में हुई जांच का अन्तिम परिणाम क्या रहा कोई नही जानता। युवा कांग्रेस के चुनावों में भी एक विज्ञापन जारी होने और उसकी पैमेन्ट के मामलें में दर्ज रिपोर्ट का क्या हुआ है कोई नही जानता। ऐसे कई प्रकरण हैं जिन्हें जनता नही भूली है। इन सवालों का जवाब केवल वीरभद्र को ही देना है। सरकार और वीरभद्र आज तक यह नही खोज पाये हैं कि ऐसी असफलता के क्या कारण रहे हैं।
यही नही आज स्वयं सीबीआई और ईडी में जिस कदर घिर गये हैं वहां पर अन्तिम परिणाम में नुकसान होना तय है। इन मामलों के लिये धूमल, अनुराग और जेटली को कोसने की बजाये अपने गिर्द ही नजर दौड़ाते और अपने सलाहकारों की सलाह का निष्पक्ष आंकलन करते तो शायद ऐसे हालात पैदा ही नही होते।आज सीबीआई और ईडी मामलों में आरोप लगने की स्टेज पहुंच रही है अदालत से भी ज्यादा वक्त मिलना संभव नही होगा।इनमे मामले दर्ज हुए को करीब एक वर्ष हो गया है और अब ट्रायल तक आने ही हैं। ऐसे में विपक्ष से ज्यादा कांग्रेस के भीतर से नेतृत्व परिवर्तन की आवाज उठेगी इस आवाज को संगठन के साथ टकराव लेकर दबाना कठिन होगा। इस परिदृश्य में वीरभद्र और संगठन आने वाले समय में क्या रास्ता अपनाते हैं यह देखने वाला होगा। क्या संगठन अपनी कीमत पर वीरभद्र की वकालत करने का रास्ता चुनता है या नही। क्योंकि वीरभद्र की वकालत से संगठन लम्बे समय के लिये सत्ता से बाहर हो जायेगा। दूसरी ओर क्या वीरभद्र संगठन के लिये पद त्यागते हैं या संगठन को पूरी तरह तहस नहस करने के लिये फिर वीरभद्र ब्रिगेड खड़ा करने की रणनीति अपनाते हैं।

फिर होगी भ्रष्टाचार पर राजनीति की रस्म अदायगी


भाजपा ने सुरेश भारद्वाज की अध्यक्षता में गठित की आरोप पत्र कमेटी

शिमला/शैल। प्रदेश भाजपा ने वीरभद्र सरकार के खिलाफ आरोप पत्र तैयार करने के लिये पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष एवम् शिमला के विधायक सुरेश भारद्वाज की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया है। इस कमेटी के अन्य सदस्य है पूर्व मन्त्री एवम विधायक महेन्द्र सिंह, राजीव बिन्दल, जयराम ठाकुर रविन्द्र रवि, रणधीर शर्मा और विपिन परमार। यह कमेटी प्रदेश के सभी भागों और सरकार के सारे विभागों की कारगुजारी के बारे में सूचनाएं एकत्र करके आरोप पत्र तैयार करेगी। दिसम्बर में सरकार के चार साल पूरा होने पर यह आरोप पत्र सौंपा जायेगा। वीरभद्र के इस कार्यकाल में यह भाजपा का दूसरा आरोप पत्र होगा। पहला आरोप पत्र सरकार के तीस महीने पूरे करने पर सौंपा गया था और इसमें तीस ही आरोप थे। अब के आरोप पत्र में क्या कुछ रहता है इसका खुलासा तो आरोप पत्र के आने पर ही होगा।

लेकिन भाजपा के इस प्रस्तावित आरोप पत्र के परिदृश्य में जो सवाल उभरते हैं कि वह आरोप पत्र से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हंै क्योंकि सत्तारूढ़ सरकारों के खिलाफ आरोप पत्र जारी करना एक तरह से राजनीतिक संस्कृति बनता जा रहा है। ऐसे में यह स्वाल उठना स्वभाविक है कि आरोप पत्र से होगा क्या? क्या आरोप पत्र जारी करने से यह प्रमाणित होता है कि आरोप पत्र जारी करने वाला ईमानदारी से भ्रष्टाचार के खिलाफ है? क्या इससे यह प्रमाणित होता है कि आरोप पत्र जारी करने वाला सत्ता में आकर इन आरोपों की जांच करके भ्रष्टाचारियों को सजा दिलवायेगा? यदि पूरी व्यवहारिक ईमानदारी से इन सवालों की पड़ताल की जाये तो इनका जवाब नकारात्मक ही मिलता है। वीरभद्र के इसी कार्यकाल में भाजपा का यह दूसरा आरोप पत्र होने जा रहा है लेकिन भाजपा के पहले आरोप पत्र का क्या हुआ? उसकी जांच कहां तक पंहुची है? यदि सरकार ने उसकी जांच नहीं करवाई है तो भाजपा ने उन आरोपों को लेकर कहां किस अदालत में कथित दोषियों के खिलाफ कोई मामला दायर करके अदालत के माध्यम से जांच करवाने का आग्रह किया? भाजपा ने ऐसा कुछ नहीं किया है बल्कि आरोप पत्र जारी करने के बाद स्वयं भी उन्हीं आरोपों पर प्रदेश की जनता के बीच कोई बहस तक उठाने का साहस नहीं दिखाया है। 2003 में जब कांग्रेस वीरभद्र के नेतृत्व में सत्ता में आयी थी उस समय भी भाजपा ने बतौर विपक्ष सरकार के पूरे कार्यकाल में ऐसे तीन आरोप पत्र सौंपे थे। भाजपा-धूमल के नेतृत्व में फिर सत्ता में आयी। दिसम्बर 2012 तक भाजपा की सरकार रही। उस दौरान तीन में से केवल दो आरोप पत्र विजिलैंस को जांच के लिये भेजे। विजिलैंस ने इन आरोप पत्रों की पड़ताल करके जांच के लिये कुछ मुद्दे चिन्हित किये। इन मुद्दों पर अगली कारवाई की स्वीकृति लेने के लिए इन्हे सरकार को भेजा। लेकिन धूमल सरकार की ओर से इस संद्धर्भ में विजिलैंस को कोई निर्देश नहीं गये। विजिलैंस ने अपने स्तर पर इन मुद्दों को आगे नहीं बढ़ाया। जबकि विजिलैंस को जांच करने के लिये सरकार से अनुमति लेने की आवश्यकता ही नहीं थी। इस तरह उन गंभीर आरोपों पर आगे आज तक कोई कारवाई नहीं हुई है।
भाजपा भी उन आरोपों को भूल गयी है और कांग्रेस के जिन मन्त्रीयों और दूसरे लोगों के खिलाफ यह गंभीर आरोप लगाये थे उन्होने भी आरोप लगाने वालों के खिलाफ कोई कारवाई नहीं की है। इस संद्धर्भ में कांग्रेस का भी चाल, चरित्र और चेहरा भाजपा से कतई भिन्न नहीं है। कांग्रेस ने भी बतौर विपक्ष हर बार भाजपा सरकारों के खिलाफ ऐसे ही आरोप पत्र दागे हैं। सत्ता ने आने पर अपने ही आरोप पत्रों पर जांच करवाने का साहस नहीं दिखाया है। बल्कि 31 अक्तूबर 1997 को वीरभद्र सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जन सहयोग का आह्वान करते हुए एक रिवार्ड स्कीम अधिसूचित थी। इस स्कीम के तहत भ्रष्टाचार की शिकायतों पर एक माह के भीतर प्रारम्भिक जांच करवाने का प्रावधान किया गया है। लेकिन इस योजना के तहत आयी शिकायतों पर वर्षों तक कोई कारवाई नहीं हुई है। वीरभद्र अपनी ही अधिसूचित स्कीम पर अमल नहीं कर पाये हैं। इस तरह आज तक भ्रष्टाचार के खिलाफ जितने भी बड़े-बड़े दावे किये जाते हैं व्यवहार में उन पर कभी कोई अमल नहीं हुआ है।
सबसे रोचक पक्ष तो यह रहा है कि भ्रष्टाचार के किसी भी मामले का हमारे उच्च न्यायालय ने भी कभी कोई स्वतः संज्ञान नही लिया है। जबकि यह आरोप पत्र हर बार समाचार पत्रों में चर्चित रहे हैं। बल्कि उच्च न्यायालय के पास अवय शुक्ला की वह रिपोर्ट जिसमें जल विद्युत परियोजनाओं के नाम पर 65 किलोमीटर रावी नदी के ही लोप हो जाने का कड़वा सच्च दर्ज है आज तक लंबित है। जबकि अवय शुक्ला को रिटायर हुए भी अरसा हो गया है। इसी तरह जे.पी. उद्योग के थर्मल प्लांट के संद्धर्भ में उच्च न्यायालय ने ही एक एसआईटी पुलिस अधिकारी केसी सडयाल के तहत गठित की थी। एसआईटी की रिपोर्ट उच्च न्यायालय मे पहुंची हुई है। सडयाल रिटायर भी हो चुके हैं लेकिन इस रिपोर्ट पर आज तक कोई कारवाई सामने न आई है। ऐसे मे भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी भी राजनीतिक दल या नेता के किसी भी दावे पर जनता आज विश्वास करने को तैयार नही है और यह आरोप पत्र जारी करना रस्म अदायगी से अधिक कुछ नही रह गया है।

ठियोग रोहडू सड़क के गिर्द केन्द्रीत होती शिमला की राजनिति

शिमला/शैल। ठियोग कोटखाई-हाटकोटी रोहडू रोड़ की हालत को लेकर पूर्व मन्त्री नरेन्द्र बरागटा के आरोपों


को सिरे से नकारते हुए मुख्य संसदीय सचिव रोहित ठाकुर ने दावा किया है कि इस सड़क का 80% कार्य पूरा हो चुका है और शेष बचे कार्य को भी जून 2017 तक पूरा कर लिया जायेगा। रोहित ठाकुर ने यह भी दावा किया कि क्षेत्र के विकास के लिये वह अब तक नावार्ड के माध्यम से सौ करोड़ की योजनाएं स्वीकार करवा चुके हैं और उन पर काम भी कई स्थानों पर पूरा हो चुका है व अन्य पर काम चल रहा है। यह दावे ठाकुर ने एक पत्रकार वार्ता करते हुए पूर्व मन्त्री बरागटा को चुनौती दी कि वह इस सेब सीजन के दौरान एक सप्ताह तक इस सड़क के बन्द रहने के अपने आरोपों को प्रमाणित करें। ठाकुर ने आंकडे रखते हुए बरागटा को याद दिलाया कि भाजपा सरकार के कार्यकाल में उनके बागवानी मन्त्री रहते हुए कैसे सेब के हजारों बैग नष्ट करने पडे़ थे। उन्होने स्मरण दिलाया कि भाजपा शासन के दौरान इस सड़क का केवल 18% काम ही पूरा हो पाया था। बरागटा जब भाजपा शासन में मन्त्री थे उसी दौरान 2010 में जुब्बल के एक देवेन्द्र चैहान ने प्रदेश उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर कर इस सड़क की स्थिति की ओर सरकार का ध्यान आकर्शित किया था।

स्मरणीय है कि 80 किलोमीटर लम्बी इस सड़क की रिपेयर का काम जून 2008 में शुरू हुआ था और इसके पूरा होने का लक्ष्य जून 2011 रखा गया था। इस काम केे लिये अन्र्तराष्ट्रीय विकास ऐसोसियेशन आई वीआरडी सेे ़ऋण लिया गया है। इसके लिये अन्र्तराष्ट्रीय टैण्डर के माध्यम से चीन कीे कंपनी लौंजियान कोे 228.26 करोेड़ का ठेको दिया गया था और इसमें अमेरिका कीे लूईस बर्गर ग्रुप की सेवाएं बतौर कंसलटैन्ट ली गयी थी। जब यह कंपनी तय समय सीमा के भीतर अपना काम पूरा नही कर पाई तो धूमल सरकार ने इसका कार्यकाल बढ़ाकर 14.4.2012 कर दिया था।
लेेकिन मार्च 2012 में जब इसके कार्य का आकलन किया गया तब यह कंपनी केवल 13.49 प्रतिशत काम ही पूरा कर पायी थी। कंपनी ने समय पर काम पूरा न कर पाने के लियेे समय समय पर जो कारण गिनायेे है। उनमें दोे तीने मामलों में अदालत सेे स्टे जमीन अधिग्रहण के बाद कुछ लोगों को मुआवजे अदायगी न होे पाना औैर सड़क के किनारेे 875 पेडोें के न काटे जाने जैैसे कारण प्रमुख रहें है। लेकिन इसीे सड़क के मामले मेेेे वर्ष 2010 में जुब्बल केे देेवेेन्द्र चौहान ने एक जनहित याचिका भी प्रदेश उच्च न्यायालय में दायर की थीे। इस याचिका की सुनावाई के दौैरान उच्च न्यायालय ने 20.5.2011 को भू अधिग्रहण अधिकारी कोेेे जमीन के मुआवजों केेे मामलों पर एक माह केे भीतर शपथ पत्र दायर करनेे तथा कंजरवेेटर फारेस्ट भारत सरकार चण्डीगढ़ को पेेेडो के संद्धर्भे में आवश्यक स्वीकृतियां देनेे के निर्देंश दिये थे। उच्च न्यायालय के इन निर्देशोेें पर भू अधिग्रहण अधिकारी नेे 15,46,22031 रूपयेेे का मुआवजा तुरन्त जमा करवाया। जिसमें से 13,36,66,867 रूपये का लोगों को भुगतान भी तुरन्त हो गया। पेडों केे संद्धर्भ में भी तीन दिन के भीतर सारी कारवाई पूरीे हो गयीे। उच्च न्यायालय ने सत्र न्यायधीश को भी निर्देश दिये कि इस सड़क के संवंध में आयी सारी याचिकाओं का निपटारा एक माह के भीतर कर दिया जाये और ऐेसा हो भी गया। उच्च न्यायालय के निर्देशो पर एक माह के भीतर सारे लंबित मामलेे हल हो गए थेे।
उच्च न्यायालय के 20.5.2011 के निर्देशों के बाद 2.7.2012 को जो टिप्पणी इसी मामले पर उच्च न्यायालय ने की है चौकाने वाली है उच्च न्यायालय ने 2.7.2012 को कहा है कि that there is hardly tangible progress in work,  apparently, neither the  contractor nor the Government is serious in the matter, what action the Govt. has taken in the mattter is not quite clear despite the unsatisfactory  progress in the execution of work. The contractor has been raising one or the other evasive objection to   justified their in-action, instead or taking proper action for completing the work as per contract. It is high time that the Govt. view the matter with required seriousness
उच्च न्यायालय के इन निर्देशों के बाद 2013 में चीन की इस कंपनी से ठेका रद्द करके अब एक चड्डा एण्ड चड्डा कंपनी को शेष बचा हुआ काम 350 करोड़ में दिया गया। अभी इस सड़क की रिपेयर की लागत 132 करोड़ बढ़ चुकी है और इसके पूरा होने तक और बढ़ने की संभावना बनी हुई है। इस बढ़ी हुई लागत के लिये कौन जिम्मेदार है इसकी जबावदेही तय करने के लिये न तो सरकार ने और न ही उच्च न्यायालय ने कोई ध्यान दिया हैै।
सड़क के काम मे देरी क्यों हो रही है इसको लेकर विधानसभा में भाजपा शासन में भी प्रश्न उठते रहे है और आज कांगे्रस शासन मे भी उठ रहें है। इस सड़क के कारण दुर्घटनाएं हो चुकी है और उनमें जानमाल का कितना नुकसान हो चुका है इसके आंकडेे़ भी उच्च न्यायालय में याचिकाकर्ता अपने शपथ पत्र के माध्यम से रख चुके है। यह सड़क कभी स्टेट रोड़ हुआ करती थी जिसे भाजपा शासन में बदल कर जिला रोड़ कर दिया गया था। स्टेट रोड़ से जिला रोड़ करके इसका स्तर और अहमियत क्यांे घटाई गयी इस पर कभी किसी भाजपा नेता ने कोई सवाल नहीं उठाया है। जबकि इस सेब बहुल क्षेत्र के लिये यह सड़क मुख्य लाईफ लाईन थी और आज भी है। यह सवाल आज इसलिये प्रसांगिक और महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि भाजपा ने इस सड़क को लेकर रोहडू से लेकर शिमला तक पद यात्रा का आयोजन किया था और इस आयोजन के बाद राज्यपाल को ज्ञापन सौंपा तथा नरेन्द्र बरागटा ने उच्च न्यायालय मे एक याचिका भी दायर कर दी।
नेरन्द्र बरागटा की इस याचिका को प्रदेश उच्च न्यायालय ने जनहित मानने से इन्कार करते हुए उन्हें इससे बाहर कर दिया है। अदालत ने बरागटा की याचिका को राजनीति से प्रेरित करार दिया है। अदालत ने साफ कहा कि Applying  the above tests to the facts of the present case and while keeping in view paragraph. 1 of the writ petition that the petitioner was an  ex-Minister, the writ petition cannot be retained as public interest litigation on behalf of the petitioner.
भाजपा शासन में इस सडक के काम देरी क्यों हुई? इसके लिये सरकार की ओर से काम कर रही कंपनी को कैसा और कितना सहयोग मिला है इसका खुलासा इसी याचिका में 22.2.2011 को उच्च न्यायालय में आये चीफ इन्जिनियर के शपथ पत्र से हो जाता है। इस परिदृश्य में आज बरागटा द्वारा इस सड़क को लेकर राजनीति करना निश्चित तौर पर भाजपा में घटे सब कुछ को जन चर्चा का विषय बना देगा यह तय है।

 
 

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