शिमला/शैल। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुखविन्दर सिंह सुक्खु के पास बेहिसाब बेनामी संपत्ति होने के आरोप लगायें है धूमल सहित कुछ अन्य भाजपा नेताओं ने। भाजपा नेताओं ने यह भी दावा किया है कि यह आरोप उनके आने वाले आरोप पत्र में प्रमुखता से दर्ज रहेंगे। यह आरोप लगते ही मुख्य मन्त्री वीरभद्र सिंह ने भी इनकी पड़ताल करवाने का एलान कर दिया। जैसे ही यह आरोप उछले सुक्खु ने भी तुरन्त प्रभाव से पलटवार करते हुए
धूमल को चुनौती दे दी कि या तो इन आरोपों को प्रमाणित करे या राजनीति से सन्यास ले लें। इसी के साथ सुक्खु ने यह भी दावा किया कि उनके पास जो भी चल अचल संपत्ति है उसका उन्होने 2012 के चुनाव शपथ पत्र में पूरा खुलासा किया हुआ है और यदि इस चुनाव पत्र से हटकर कोई संपत्ति प्रमाणित हो जाती है तो वह राजनीति से सन्यास ले लेंगे। सुक्खु की चुनौती के बाद भाजपा नेताओं की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी है और न ही वीरभद्र सिंह का पड़ताल का दावा आगे बढा है।
स्मरणीय है कि मुख्य मन्त्री वीरभद्र सिंह इस समय संपत्ति प्रकरण में ही केन्द्र की ऐजैन्सीयों सीबीआई और ईडी की जांच झेल रहें है। नेता प्रतिपक्ष और पूर्व मुख्यमन्त्री प्रेम कुमार धूमल भी संपत्ति प्रकरण मे विजिलैन्स की आंच झेल रहे हैं इन दोनो नेताओं के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के आरोप है और अब इस पंक्ति में कांग्रेस अध्यक्ष का नाम भी जुड़ गया है किसके खिलाफ लगे आरोप कितने प्रमाणित हो पाते है यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। लेकिन सुक्खु ने 2012 का विधानसभा चुनाव लड़ते समय अपने शपथपत्र में अपनी संपत्ति का जो ब्योरा दिया है उसके मुताबिक पत्नी और दो बच्चों सहित इस परिवार के पास चल और अचल कुल संपति करीब तीन करो़ड के आस पास हैं इस संपति में अपने पुश्तैनी गांव सहित शिमला और बद्दी की संपति भी शामिल है यह शपथ पत्र पाठकों के सामने रखा जा रहा है बहरहाल इस शपथ पत्र से हटकर और किसी संपति का खुलासा सामने नहीं आया है और इससे अधिक संपति के खुलासे तो कई ऐसे विधायकों ने कर रखे है जो पहली बार ही चुनकर आये हैं बल्कि अधिकांश विधायकों ने तो अपनी पत्नीयों के नाम अपने से अधिक दिखा रखी है।
ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि इस वक्त सुक्खु के खिलाफ यह आरोप क्यां लगे? क्या इनके पीछे कांग्रेस की अपनी राजनीति हावि है? क्या भाजपा सुक्खु और वीरभद्र के रिश्तों की तलबी को और हवा देना चाहती है? इन सवालों की निष्पक्ष पड़ताल से यह स्पष्ट हो जाता हैं कि सुक्खु के अध्यक्ष पद संभालते ही सरकार में एक व्यक्ति एक पद का मुद्दा उछला था। अभी पिछले दिनों संगठन में सचिवों की नियुक्ति को लेकर जो विवाद उछला था। उसमें त्यागपत्र तक की नौबत आ गयी थी। वीरभद्र संगठन के फैसलों से कभी भी ज्यादा सहमत नही रहे है। संगठन के लिये बनाये गये जिलों को लेकर वीरभद्र की नाराजगी जगजाहिर है कुल मिलाकर वीरभद्र और सुक्खु में किसी न किसी मुद्दे पर मदभेत बाहर आते ही रहे है। हालांकि हर बार इन मदभेदों के बाद दोनो नेताओं में बैठकें भी होती रही है। बल्कि जब वीरभद्र के विश्वस्तों ने वीरभद्र ब्रिगेड बनाया था उस समय सुक्खु ने कुछ लोगों के खिलाफ अनुशासनात्मक कारवाई का चाबुक भी चला दिया था। सुक्खु ने ऐसी कारवाई का साहस इस लिये दिखाया था क्योंकि उनके अध्यक्ष बनने में वीरभद्र की भूमिका नहीं के बराबर रही हैं ऐसे में कल जब विधानसभा चुनावों को टिकटों के बंटवारे का प्रश्न आयेगा उस समय अध्यक्ष की भूमिका ज्यादा प्रभावी रहेगी। जबकि दूसरी ओर से वीरभद्र, विक्रमादित्य के माध्यम से टिकटों के मामले में कांग्रेस हाईकमान को भी अप्रत्यक्षतः आंखे दिखा चुके है। इस परिदृश्य में आज वीरभद्र की पहली राजनीतिक प्राथमिकता संगठन पर कब्जा करना हो जाती है। इस दिशा में हर्ष महाजन, गंगुराम मुसाफिर, सुधीर शर्मा जैसे नेताओं के नाम प्रेषित होते रहे हैं लेकिन इस बार चिन्तपुरनी के विधायक और पूर्व अध्यक्ष कुलदीप कुमार का नाम लगभग स्वीकृति के मुकाम तक पहुंच गया था। लेकिन उच्चस्थ सूत्रों के मुताबिक कुलदीप कुमार की फाईल प्रदेश प्रभारी अंबिका सोनी के यहां से ऐसे गायब हुई जिसका कोई अता-पता ही नहीं चल पाया है। चर्चा है कि वीरभद्र सिंह ने इस फाईल के गुम होने को अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक हार माना हैं इसके लिये वीरभद्र सिंह, सुक्खबिंदर सिंह सुक्खु और मुकेश अग्निहोत्री को अपरोक्ष में जिम्मेदार मान रहे हैं। चर्चा तो यहां तक है कि सुक्खु के खिलाफ आयी संपति की शिकायत और उस पर पड़ताल करवाने की घोषणा तथा अग्निहोत्री के महकमों के भीतर हुआ बड़ा परिवर्तन इस फाईल के गुम होने
का परिणाम है।



शिमला/शैल। भाजपा ने अगले विधानसभा चुनावों के लिये 50 प्लस का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य के साथ ही भाजपा ने समय पूर्व चुनावों की संभावना भी जताई है। भाजपा अध्यक्ष सतपाल सत्ती ने एक पकार वार्ता में दावे रखते हुए खुलासा किया कि इसके लिये एक अभियान समिति गठित कर दी गयी है। इसी के साथ पार्टी वीरभद्र सरकार के खिलाफ एक आरोप पत्र लायेगी जिसके लिये पूर्व अध्यक्ष विधायक सुरेश भारद्वाज की अध्यक्षता में एक आरोप पत्र कमेटी का भी गठन किया गया है। यह आरोप पत्र 25 दिसम्बर को वीरभद्र सरकार के 4 साल पूरा होने पर राज्यपाल को सौंपा जायेगा। भाजपा के सत्ता में आने पर इस आरोप पत्र पर कारवाई करने का भी भरोसा दिलाया है। वैसे भाजपा ने अब तक अपने आरोप पत्रों पर सत्ता में आने पर कभी कोई कारवाई नहीं की है। लेकिन इस बार वीरभद्र ने धूमल और एच पी सी ए के खिलाफ मामले बनाने की शुरूआत कर दी है इसलिये भाजपा ने अब इस परम्परा को निभाने का दावा किया है। भाजपा अपने मिशन 50 प्लस के लिये किस कदर गम्भीर है इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अभी पार्टी ने प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी के दो कार्यक्रमों का आयोजन मण्डी और नाहन मे रखा है। प्रधान मन्त्री के बाद पार्टी अध्यक्ष अमित शाह भी तीन दिनों के प्रदेश दौरे पर आने वाले हैं। पार्टी ने अगले साल के लिये भी कार्यक्रमों की सूची तैयार कर ली है।
पार्टी अपने मिशन 50 प्लस को पाने के लिये कोई कसर नही छोड़ेगी इसमें कोई संदेह नही है। बल्कि पार्टी ने जिस अन्दाज में हिलोपा पार्टी का विलय करवाया है और इस विलय के बाद महेश्वर सिंह, खुशीराम बालनाहटा, राकेश पठानिया, महंतराम चौधरी आदि नेताओं को प्रदेश कार्यसमिति का सदस्य बनाकर अपनी गंभीरता का परिचय दे दिया है। लेकिन इस सबके बावजूद पार्टी के लक्ष्य की सफलता को लेकर कुछ क्षेत्रों मे अभी भी संदेह व्यक्त किया जा रहा है। इस संदेह का आधार पार्टी के भीतर पनपती खेमेबाजी है। पार्टी के वरिष्ठ नेता शान्ता कुमार केन्द्र से लेकर राज्य ईकाई तक से पूरी तरह संतुष्ट ओर सहमत नही है यह सर्वविदित है। अभी ऊना की बैठक में भी उनका शामिल न होना इसी सं(र्भ में देखा जा रहा है। पंजाब के वरिष्ठ भाजपा नेता कालिया ने जिस तरह से शान्ता कुमार के खिलाफ गंभीर सवाल उछाले हैं उनसे भी ऐसे ही संकेत उभरते हैं। क्योंकि यह सवाल आने वाले दिनों में विपक्ष के हाथों में एक बड़ा हथियार सिद्ध होंगे। शान्ता और जे पी उद्योग के रिश्ते भी कब बड़ा सवाल बन कर खड़े हो जायें यह आशंका भी बराबर बनी रहेगी। इस परिदृश्य में पार्टी और स्वयं शान्ता अपने लिये क्या भूमिका तय करते हैं इस पर सबकी निगाहें रहेंगी।
शान्ता के अतिरिक्त केन्द्रिय स्वास्थ्य मन्त्री जे पी नड्डा ने केन्द्र सरकार और संगठन में जो मुकाम हासिल कर लिया है उसके बाद नड्डा को भी प्रदेश नेतृत्व की पंक्ति मे एक बड़ी संभावना के रूप मे देखा जा रहा है। बल्कि राकेश पठानिया और खुशीराम बालनाहटा जैसे नेताओं को पार्टी में वापिस लाने में उनकी बड़ी भूमिका मानी जा रही है। लेकिन नड्डा इस समय प्रदेश से राज्य सभा सांसद है। प्रदेश में पार्टी नेतृत्व के लिये बिलासपुर मे नड्डा के लिये कौन सी सीट सुरक्षित रहेगी इसको लेकर भी तस्वीर स्पष्ट नहीं है। क्योंकि जब से नड्डा को नेतृत्व की पंक्ति मे गिना जाने लगा तभी से बिलासपुर में उनके विरोधी सक्रिय हो गये। विरोधियों की इस सक्रियता का ही परिणाम था कि संगठन के चुनावों में नड्डा के समर्थकों को पूरी सफलता नही मिल पायी। बिलासपुर में सुरेश चन्देल और नड्डा आज प्रतिद्वंदी बन कर खड़े हैं यह भी सर्वविदित है। फिर नड्डा के खिलाफ केन्द्र मे चल रहा एम्ज़ का प्रकरण भी थमने का नाम नहीं ले रहा है। पार्टी के भीतर अब उस पर चर्चा होने लगी है। ऐसे में नड्डा की प्रदेश में सक्रियता किस कदर कितनी रहती है क्योंकि उनके पास उत्तराखण्ड की भी जिम्मेदारी है। इस परिपेक्ष्य में नड्डा राज्यसभा के माध्यम से केन्द्र में सुरक्षित राजनीति की रणनीति अपनाते हैं। या प्रदेश में आने का जोखिम उठाते हें इसका खुलासा भी आने वाले दिनों में सामने आ जायेगा।
शान्ता- नड्डा के बाद पार्टी का सबसे बड़ा खेमा धूमल का है। दो बार मुख्यमन्त्री का कार्यकाल न केवल पूरा ही किया बल्कि अपने विरोधियों पर भी भारी पड़े। दोनों बार वीरभद्र के खिलाफ ऐसी व्यूह रचना की वह उससे बाहर ही नहीं निकल पाये। धूमल को पहले ही कार्यकाल में यह पूरी तरह समझ आ गया था कि विपक्ष और विरोध की सबसे बड़ी धुरी वीरभद्र ही है और यदि उन्हें ही अपने में उलझा दिया जाये तो शासन का रास्ता साफ हो जाता है। इसी समझ का परिणाम है कि वीरभद्र इस बार भी धूमल को हर रोज कोसने की बजाये उसका कोई बड़ा नुकसान नहीं कर पाये। आज धूमल के सांसद बेटे अनुराग ने वी सी सी आई के शीर्ष पर पहुचने का जो मुकाम हासिल कर लिया है यदि उससे सर्वोच्च न्यायालय और लोढ़ा कमेटी के कारण वहां से हटना भी पड़ता है तो प्रदेश की राजनीति में स्थापित होने के लिये पर्याप्त आधार बना पड़ा है। इसलिये आज धूमल अनुराग को हिमाचल में पार्टी नज़रअन्दाज कर पाने की स्थिति में नही है। इस परिदृश्य में पार्टी को 50 प्लस का टारगेट हासिल करने के लिये कोई बड़ी कठिनाई अभी नज़र नहीं आ रही है।
लेकिन इस समय वीरभद्र ने अपने खिलाफ चल रही सी बी आई और ई डी की जांच को जिस ढंग से केन्द्र की राजनीतिक ज्यादती प्रचारित करना शुरू किया है उनका कोई प्रतिवाद भाजपा की ओर से नही आ रहा है। सत्ती ने दिल्ली में चल रहे मामलों के लिये वीरभद्र के मन्त्रीयों द्वारा वकीलों की फीस के नाम पर की जा रही उगाही का आरोप तो लगा दिया है लेकिन इस आरोप को प्रमाणित करने के तथ्य जनता के सामने नही रखे है। सत्ती के आरोप के बाद कांग्रेस के मन्त्रीयों को वीरभद्र के पक्ष में एकजुट होने की बाध्यता बन जायेगी। भाजपा अभी वीरभद्र का पूरा मामला ही तर्किक स्पष्टता के साथ जनता के सामने नही ला पा रही है। यदि यही स्थिति कुछ दिन ओर बनी रही तो भाजपा का गणित गड़बडाने की भी पूरी पूरी संभावना बनी हुई है। क्योंकि भाजपा के आरोप पत्र को जनता अब रस्म अदायगी से अधिक कुछ भी मानने को तैयार नही होगी यह तय है।
शिमला/शैल। पर्यावरण संरक्षण को लेकर पूरे विश्व में गंभीर चिन्तन और चर्चा चल रही है। जिसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि पर्यावरण अधिनियम 1986 की अवहेलना को Scheduled offence अधिसूचित करने के साथ ही इसे मनीलॉडरिंग एक्ट के दायरे मे ला दिया गया है। राष्ट्रीय ग्रीन ट्रब्यूलन का गठन भी पर्यावरण पर उठी चिन्ताओ का ही परिणाम है। दिल्ली में डीजल वाहनो पर लगा प्रतिबन्ध और हिमाचल में मनाली से रोहतांग के लिये अब सीएनजी और इलैक्ट्रिक वाहनो का प्रयोग और प्रयास इसी चिन्ता का परिणाम है। राज्यों के प्रदूषण नियन्त्रण बोर्डो के जिम्मे पर्यावरण संरक्षण का ही सबसे बड़ा काम है। इसी के परिणामस्वरूप थर्मल सीमेन्ट प्लांट हिमाचल के लिये ब्लैक उद्योगों को सूची में है। खनन प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण है और इसी लिये प्रदेश उच्च न्यायालय अवैध खनन की शिकायतों पर पूरी कड़ाई से कारवाई कर रहा है।
लेकिन क्या राज्य का प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड, उद्योग विभाग और केन्द्र का प्रवर्तन निदेशालय इस दिशा में अपनी जिम्मेदारी निभा पा रहे हैं या इन पर प्रदेश के खनन माफिया का पूरा दबाव चल रहा है। यह सवाल पिछले कुछ अरसे से चर्चा का विषय बना हुआ है। शैल को मिली जानकारी के मुताबिक प्रदेश के सबसे बडे आद्यौगिक क्षेत्रा नालागढ़ उपमण्डल के 26 स्टोन क्रशरों के खिलाफ पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 की धारा 15,16 और 19 के तहत प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड ने जनवरी 2016 में अतिरिक्त सीजेएम नालागढ की अदालत में मामले दायर किये थे। पर्यावरण अधिनियम के तहत मामले दर्ज होने के कारण इसकी जानकारी शिमला स्थित ईडी कार्यालय तक भी पंहुच गयी । पर्यावरण अवहेलना Scheduled offence होने के नाते ईडी कार्यालय ने भी इसमें अपने स्तर पर इसकी जांच शुरू कर दी।
ईडी की जांच में यह पाया गया कि स्टोन क्रशर 1.11.2011 तक पांच हैक्टेयर से ज्यादा क्षेत्रा मे अपनी गतिविधियों को अंजाम दे रहे थे। जोकि पर्यावरण अधिनियम 1986 की धारा 15 और EIA अधिसूचना 2006 के प्रावधानों का सीधा उल्लघंन है। जांच रिपोर्ट में इस संद्धर्भ में सर्वोच्च न्यायलय द्वारा 56 P NO. 19628/2009 दिनांक 27.2.12 को दिये गये फैसले का भी उल्लेख किया गया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक पर्यावरण नियमों का उल्लघंन इन क्रशरो ने न केवल पर्यावरण को ही नुकसान पंहुचाया है। बल्कि अवैध रूप से करोड़ो का कालाधन भी अर्जित किया है। सूत्रों के मुताबिक ईडी के शिमला कार्यालय ने इस पर विस्तृत जांच के बाद ईडी के चण्डीगढ कार्यालय को अप्रैल 2016 में यह रिपोर्ट भेजकर इस मामले में विधिवत ईसीआई आर दर्ज करने की अनुशंसा की थी। जांच रिपोर्ट के मुताबिक यह स्टोन क्रशर कई वर्षो से इस तरह के अवैध खनन में संलिप्त रहे है। जो कि सारे संबधित विभागों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाता है। लेकिन इसमें सबसे बड़ी हैरत तो यह है कि ई डी के चण्डीगढ़ कार्यालय में आज तक इस जांच रिपोर्ट पर कोई कारवाई नही की है। स्मरणीय है कि पिछले दिनो नालागढ क्षेत्र में चल रही अवैध खनन् गतिविधियों पर वहां तैनात पुलिस अधिकारी ने कारवाई की थी तो उसे सरकार ने वहां से बदल दिया था। इस स्थानान्तरण का प्रदेश उच्च न्यायालय ने भी कडा संज्ञान लिया था। इस स्थानान्तरण को खनन माफिया के प्रभाव में उठाया गया कदम करार दिया गया था। इसी संद्धर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि ईडी के शिमला स्थित जिस अधिकारी ने इन स्टोन क्रशरों के खिलाफ ईडी में मामला दर्ज करने की सिफारिश की थी उसे भी ईडी से निकालकर वापिस प्रदेश सरकार में भिजवा दिया गया है। उसकी वापसी के लिये अब खनन माफिया की सक्रियता को लेकर भी कुछ हलको में चर्चाएं चल निकली है।
इस मामले में इतनी बडी जांच रिपोर्ट के बाद भी ईडी चण्डीगढ कार्यालय द्वारा अब तक कोई कारवाई न किया जाना चर्चा का विषय बन गया है। लेकिन इसी के साथ प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड ने आगे क्या कारवाई की इसको लेकर बोर्ड की ओर से बताया गया कि इस बारे में उद्योग निदेशालय को सूचना भेज दी गयी है। लेकिन जब स्टेट ज्योलोजिस्टस से इस बारे में बात की गयी तो उसने प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड की ओर से ऐसी कोई जानकारी प्राप्त होने से साफ इन्कार कर दिया। यही नही जब सोलन स्थित खनन अधिकारी से इस बारे में जानकारी ली गयी तो उसने भी ऐसी कोई सूचना बोर्ड की ओर से आने के बारे में इन्कार कर दिया। यही नहीं जब सोलन स्थित खनन अधिकारी से इस बारे में जानकारी ली गई तो उसने भी ऐसी कोई सूचना बोर्ड की ओर से आने के बारे में इन्कार कर दिया। इन क्रशरों के खिलाफ अतिरिक्त सीजेएम की अदालत में बोर्ड की तरफ से मामले भेजे गये हैं लेकिन मामले भेजने के बाद भी क्रशर चल रहे हैं। उद्योग विभाग को इसकी कोई जानकारी ही नही है। ईडी का चण्डीगढ़ कार्यालय भी खामोश है। ऐसे में क्या इसे खनन माफिया के प्रभाव के रूप में नही देखा जाना चाहिए।
शिमला/शैल। भाजपा की प्रदेश कार्य समिति में महेश्वर सिंह, खुशी राम बालनाहटा, राकेश पाठानिया, महन्तराम चौधरी और रूप सिंह ठाकुर को शामिल किया गया है। इनको ऊना की बैठक के लिये आमन्त्रित भी कर लिया गया है। ऊना में हो रही बैठक में शान्ता कुमार शायद शामिल न हो। कार्यसमिति में शामिल किये गये इन लोगों और शांता की संभावित गैर हाजिरी को लेकर पार्टी के भीतर नये समीकरणों की सुगबुगाहट शुरू हो गयी है। पार्टी के अन्दर शान्ता और
धूमल दो विपरीत धु्रवों के रूप में जाने जाते रहे हैं यह सर्व विदित है। अब केन्द्र में जब प्रचण्ड बहुमत के साथ भाजपा सत्ता में आयी है तो भी शान्ता कुमार मोदी सरकार और संगठन को लेकर कितने प्रसन्न रहे है यह उनकी समय-समय पर आयी प्रतिक्रियाओं से जग जाहिर हो चुका है। बल्कि इन प्रतिक्रिओं से यही संदेश गया है कि केन्द्र सरकार में कोई बड़ी जिम्मेदारी न मिल पाने का मलाल उन पर हावि हो चुका है।
इस परिदृश्य में यदि प्रदेश भाजपा का आज आकलन किया जाये तो इसमें धूमल और केन्द्रिय स्वास्थ्य मन्त्रा जगत प्रकाश नड्डा पार्टी के दो नये धु्रव बन गये हैं और शांता लगभग हाशिये पर जा चुके हैं। स्मरणीय कि प्रदेश में दो बार शान्ता को मुख्यमन्त्री बनने का मौका मिला और दो ही बार धूमल को। शान्ता दोनां बार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाये और दोनों ही बार विधायक का चुनाव भी हार गये। इसके विपरीत धूमल ने दोनां बार कार्यकाल भी पूरा किया और लगातार चौथी बार विधायक हैं। जबकि धूमल के पहले कार्यकाल में पार्टी के विधायक और मन्त्रा ही विरोध और विद्रोह पर उत्तर सदन से गैर हाजिर होने के मुकाम पर जा पंहुचे थे। दूसरे कार्यकाल में तो नाराजगी का एक ऐसा ताना बाना खड़ा हुआ जो हिलोपा के गठन के रूप में सामने आया। संयोगवश दोनो बार इस विरोध और विद्रोह के लिये शान्ता कुमार के आर्शीवाद की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।
लेकिन इस बार केन्द्र में इतने प्रचण्ड बहुमत से सरकार बनने के बाद भी प्रदेश में भाजपा के तेवर उसके अनुरूप नही हैं। प्रदेश में मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह इस समय के लिये केन्द्र की जांच ऐजैन्सीयों सीबीआई और ईडी की जांच झेल रहे हैं। वीरभद्र इस जांच के लिये केन्द्र सरकार पर राजनीतिक द्विवेश के साथ काम करने का आरोप लगा रहे हैं। जिस ढंग से वीरभद्र जनता में अपना पक्ष रख रहे हैं उससे उनके प्रति सहानुभूति पैदा होने की संभावना तक बनती जा रही है। क्योंकि भाजपा की ओर से कोई भी व्यक्ति वीरभद्र प्रकरण को पूरी स्पष्टता के साथ जनता में रख ही नही पा रहा है। ऐसा लगता है कि उन्हें स्वयं भी इस मामले की पूरी बारीक समझ नहीं है। संभवतः इसी कारण से भाजपा का कोई भी नेता इस प्रकरण पर वीरभद्र को घेर नही पा रहा है। जबकि प्रदेश विधानसभा का अगला चुनाव इसी मुद्दे पर केन्द्रित रहने की संभावना बनती जा रही है। वीरभद्र इसी मुद्दे को भाजपा के खिलाफ पलटने की पूरी तैयारी मे हैं।
भाजपा ने अभी वीरभद्र सरकार के खिलाफ आरोप पत्रा लाने की घोषणा की है और इस आश्य की एक कमेटी भी गठित कर दी है। लेकिन जो आरोप पत्र इससे पहले जारी किया गया था उसको लेकर कोई गंभीरता नहीं दिखायी है। इससे यही संदेश जाता है कि पार्टी भ्रष्टाचार के प्रति नही बल्कि इसको राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने पर विश्वास रखती है। संभवतः इसी कारण से पार्टी के कई वरिष्ठ नेता वीरभद्र के प्रति ज्यादा आक्रामक नही हो पा रहे हैं। ऐसे मे पार्टी चुनावों के लिये किस तरह की रणनीति लेकर आती है उसका अन्दाजा इस बैठक के बाद लग जायेगा। लेकिन इस समय यदि पार्टी वीरभद्र के खिलाफ तीव्र आक्रामकता के तेवर नही अपनाती है तो वीरभद्र उल्टे केन्द्र के खिलाफ आक्रामकता अपनाने का प्रयास करेगें। क्योंकि अभी विक्रमादात्यि ने बंसल आत्महत्या मामले में आये अमित शाह के नाम को जिस तरह से उठाया है उससे यह स्पष्ट हो जाता है। फिर नड्डा भी संजीब चतुर्वेदी मामले में आगे और घिरते नजर आ रहे हैं। वीरभद्र ने धूमल और एचपीसीए के घेरने के लिये जो भी प्रयास किये हैं वह उल्टे पडे हैं ऐसे में वह अब धूमल मामलों को उछालने की स्थिति में नही है।
इस परिदृश्य में भाजपा के भीतर किस तरह के नये समीकरण उभरते है और उनके केन्द्र में कौन रहता है नड्डा या धूमल या फिर कोई तीसरा चेहरा उभरता है। इसके संकेत कार्यसमिति की इस बैठक में उभर कर सामने आ जायेंगे ऐसा माना जा रहा है। लेकिन राजनीतिक विश्लेष्कां की नजर में इस समय वीरभद्र और कांग्रेस को घेरने में धूमल से ज्यादा सशक्त चेहरा भाजपा के पास नही है।
शिमला/शैल। मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह पिछले कुछ अरसे से प्रदेश के कांग्रेस संगठन के प्रति लगातार आक्रामक हाते जा रहे हैं। संगठन में नियुक्त सचिवों को लेकर यहां तक कह गये कि कई लोग तो पंचायत के सदस्य बनने के लायक नहीं है। अपने ही चुनाव क्षेत्रा शिमला बनाये गये सचिवों को लेकर जिस तरह की प्रतिक्रिया उन्होने दी है उससे आहत होकर इन लोगों ने अपने पदों से त्याग पत्रा दे दिया है। वीरभद्र की आक्रामकता से पहले उनके बेटे युवा कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष विक्रमादित्य ने भी एक पत्रकार वार्ता में यह कहा था कि चुनाव में टिकट केवल जीत की संभावना रखने वालों को ही दिया जाना चाहिये। इसमें नेताओं का कोटा नहीं होना चाहिये। व्यवहारिक दृष्टि से विक्रमादित्य का यह सुझाव सही है। लेकिन इसके लिये संगठन को लेकर सरकार तक एक ही स्तर का मानदण्ड होना चाहिये। 
जब वीरभद्र ने इस बार सत्ता संभालने के बाद विभिन्न निगमों/बांर्डों में नेताओं को नियुक्तियां देना आरम्भ किया था उस समय हाईकमान ने ‘एक व्यक्ति एक पद’ पर अमल करने का निर्देश दिया था। लेकिन वीरभद्र ने इस सि(ान्त को मानने से इन्कार कर दिया था। आज विभिन्न सरकारी अदारों में हुई राजनीतिक नियुक्तियों से करीब पचास विधानसभा क्षेत्रों में समान्तर सत्ता केन्द्र स्थापित हो चुके हैं। इन नियुक्तियों के लिये क्षेत्रा के विधायक या वहां से अधिकारिक उम्मीवार बने व्यक्ति से कोई राय नहीं ली गई है। कल को यह लोग भी चुनाव टिकट के दावेदारों में शामिल होंगे। राजनीतिक पंडितो के मुताबिक युवा कांग्रेस के अध्यक्ष विक्रमादित्य का सुझाव इसी संद्धर्भ में आया है। वीरभद्र ने बड़े स्पष्ट शब्दों में कहा है कि संगठन में भी पदाधिकारी मनोनयन से नहीं बल्कि चयन से ही बनाये जायेगें।
वीरभद्र की आक्रामकता को लेकर प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का दौर शुरू हो चुका है। सभी इस आक्रामकता को समझने का प्रयास कर रहे हैं। अधिकांश इस अक्रामकता को वीरभद्र के खिलाफ केन्द्रिय ऐजैन्सीयों सी बी आई और ई डी में चल रही जांच के आईने में देख रहे हैं। इस जांच को रोकने और इसको लेकर दर्ज हो चुकी एफ आई आर को रद्द करवाने के लिये वीरभद्र हर संभव प्रयास कर चुके हैं। लकिन उनको इसमें कोई बड़ी सफलता नहीं मिली है। जांच को लेकर यह स्पष्ट हो चुका है कि अब यह मामले अपने अन्तिम परिणाम तक पहुंचने वाले हैं। इन मामलों में चालान ट्रायल कोर्ट में दायर होगें ही और इसी के साथ पद त्यागने की मांग पूरी मुखरता के साथ सामने आ जायेगी। हाई कमान भी इस स्थिति के आगे बेबस हो जायेगा। वीरभद्र पर पद त्यागने का दबाव बढ़ जायेगा। उस स्थिति में वीरभद्र के सामने केवल दो ही विकल्प रह जायेंगे, या तो वीरभद्र को पद त्यागना पड़ेगा या फिर खुली बगावत करके अदालत के अन्तिम फैंसले तक पद पर बने रहने का साहस दिखाना होगा। क्योंकि अदालत में अन्तिम फैंसला आने में काफी समय लगेगा।
वीरभद्र पहली बार 1983 में मुख्यमन्त्री भी हाईकमान को आंखे दिखाकर ही बने थे। 1993 में भी जब पंडित सुखराम हाई कमान की पसन्द बन गये थे तब भी वीरभद्र ने खुली बगावत के संकेत देकर मुख्यमन्त्री का पद संभाला था। 2012 में भी जब सी डी प्रकरण में आरोप तय होने पर केन्द्र में मन्त्री पद छोड़ना पड़ा था तब भी बगावती संकेतों से ही पार्टी अध्यक्ष पद और फिर मुख्यमन्त्री की कुर्सी हासिल की थी। इस बार भी हाईकमान के एक व्यक्ति एक पद के सिद्धान्त खुली चुनौति दी है। जब सी बी आई और ई डी के मामले दर्ज किये तब कानूनी दावपेचों का सहारा लेकर मामलों को लम्बा खींचने के प्रयास किये वहीं पर संगठन में भी समानांतर संगठन खड़ा करने के खुले संकेत देते हुये वीरभद्र ब्रिगेड खड़ा कर दिया। ब्रिगेड के खढ़ा करने के साथ ही प्रदेश में जनता और अपने समर्थकों की नब्ज टटोलने के लिये प्रदेश का तूफानी दौरा शुरू कर दिया। इस दौरे के साथ ही सरकार की उपलब्धियों के विज्ञापन जारी होने शुरू हो गये ताकि विपक्ष और विरोधियों को यह संदेश चला जाये कि कभी भी मध्यावधि चुनाव हो सकते हैं। अब जैसे-जैसे वीरभद्र के खिलाफ चल रहे मामले क्लोज़ होने के कगार पर पहुंच रहे हैं वैसे ही पार्टी अध्यक्ष के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। सुक्खु के खिलाफ जो आरोप अभी लगे हैं और उनका एक ज्ञापन राजभवन तक भी पंहुचा दिया गया है उसे भी इस रणनीति के साथ जोड़कर देख जा रहा है। इससे यह संकेत उभरतें है कि वीरभद्र की पहली चाल होगी कि पद त्यागना ही पड़ता है तो विद्या स्टोक्स को अपनी जगह बैठाया जाये इसलिये प्रदेश दौरे में उसे अपने साथ रखा जा रहा है। दूसरी चाल पार्टी का अध्यक्ष पद संभालने की होगी ताकि अगले चुनावों में अपनी मर्जी से टिकट बांट सकें। क्योंकि टिकटों में विक्रमादित्य के समर्थकों को ज्यादा से ज्यादा हिस्सा तभी दिया जा सकेगा।
वीरभद्र के राजनीतिक स्वभाव और रणनीति को समझने वाले पूरी तरह जानते हैं कि यदि वह अपनी रणनीति को अमलीजामा न पहना सके तो वह पार्टी से बगावत करने में भी गुरेज नहीं करेंगे। क्योंकि विक्रमादित्य को राजनीति में स्थापित करने के लिये उनके पास और कोई विकल्प नहीं बचा है। लेकिन आज जिस एज और स्टेज पर वीरभद्र खडे़ हैं वहां पर यह सब करने के लिये एक टीम चाहिये जो उनके पास नहीं है। इस कार्यकाल में उनके पास भुनाने के लिये कोई उपलब्धि नहीं है। इस बार यह पहले दिन से ही धूमल और अनुराग को कोसते चले आ रहे हैं। इन्हे घेरने के लिये जो भी कदम उठाये उनके परिणाम शून्य रहे। इस बार जिस टीम के सहारे उन्होंने प्रशासन चलाया है वह उन्हे वांछित परिणाम नहीं दे पायी है क्योंकि अपने भविष्य को सामने रखते हुये उनकी निष्ठायें दूसरी जगह भी बराबर बनी रही हैं। बल्कि जो कुछ जांच ऐजैन्सीयों की पड़ताल के बाद वीरभद्र के खिलाफ खड़ा हो गया है यदि वह सब जनता के सामने सही तरीके से आ गया तो इस परिवार को राजनीति से भी बाहर होने की नौबत आ सकती है। बहरहाल जो मोर्चा वीरभद्र ने संगठन के खिलाफ खोला है वह क्या रंग लाता है इस पर सबकी निगाहें लगी हैं।