शिमला/शैल। हिलोपा प्रमुख महेश्वर सिंह को लेकर पिछले कुछ अरसे से यह अटकलें चल रही है कि शीघ्र ही उनकी भाजपा में वापसी हो रही है। हिलोपा ने पार्टी के भाजपा में प्रस्तावित विलय के संद्धर्भ में कोई भी फैसला लेने के लिये अधिकृत कर दिया है। विलय का प्रस्ताव प्रदेश भाजपा में चर्चित होने के बाद हाईकमान के अन्तिम निणर्य के लिये भी भेज दिया गया है। शीघ्र ही इस दिशा में सकारात्मक फैसला आने की उम्मीद हैं। महेश्वर भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष, सांसद और मन्त्राी रह चुके हैं। उन्होने धूमल के साथ तीव्र मतभेद उभरने के चलते भाजपा से बाहर जाने का फैसला लिया था। धूमल शासन में वह धूमल विरोधियों का नेतृत्व कर रहे थे। धूमल विरोधियों ने कई बार उनके नेतृत्व में तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी को धूमल के विरोध में आरोेप पत्र भी सौंपे थे। महेश्वर के विरोध को उस समय शान्ता का पूरा-पूरा समर्थन हासिल था। लेकिन समर्थन के वाबजूद शान्ता ने धूमल विरोधियों को लीड करके अपने विरोध को सीधे सामने नही आने दिया। हांलाकि इन विरोधियों की शान्ता के दिल्ली आवास पर लगातर बैठकंे भी होती रही। जब सारे प्रयासों के वाबजूद धूमल के विरोधी उन्हें हटाने में सफल नही हो पाये तो महेश्वर सिंह और उनके साथियों ने भाजपा से बाहर निकलने का फैसला लिया।
इन धमूल विरोधियों ने बाहर निकलकर महेश्वर सिंह के नेतृत्व में हिमाचल लोकहित पार्टी गठित का गठन किया और प्रदेश विधानसभा का चुनाव भी लड़ा। भले ही हिलोपा को चुनावों में महेश्वर की अपनी सीट पर ही विजय मिल पायी लेकिन हिलोपा के कारण भाजपा भी सत्ता से बाहर हो गयी। आज भी यह स्थिति बरकरार है कि यदि हिलोपा स्वतन्त्रा रूप से विधानसभा चुनावों में उतरती है तो भाजपा की सत्ता की राह फिर कठिन हो जाने की संभावना है। भविष्य की इन्ही संभावनाओं का आकलन करते हुए भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने कांग्रेस विरोधी वोटों का बटंवारा रोकने के लिये अपने पुराने बागीयों की घर वापसी करवाने का फैसला लिया है। इसी रणनीति के तहत हिलोपा के विलय का प्रस्ताव प्रदेश भाजपा की बैठक में रखा गया। जिसे यथास्थिति हाईकमान को भेज दिया गया। सूत्रों के मुताबिक प्रदेश भाजपा की बैठक में तो विलय के प्रस्ताव पर तो कोई चर्चा ही नही हुई। हांलाकि हिलोपा में सोलन और कांगडा से ताल्लुक रखने वाले कुछ नेताओं ने शुरू में विलय का विरोध भी किया था।
इस समय पिछले कुछ अरसे से भाजपा में केन्द्रिय स्वास्थ्य मन्त्री जे.पी. नड्डा को प्रदेश का अगला मुख्यमन्त्री प्रोजैक्ट करने के संकेत उभरने लगे हैं। जब से यह संकेत उभरे हंै तभी से नड्डा ने प्रदेश में अपने दौरे भी बढ़ा दिये हंै। केन्द्र सरकार द्वारा प्रदेश में जो भी विकासात्मक सहयोग दिया जा रहा है उसका श्रेय भी नड्डा को दिया जाने लगा है। पिछले दिनों नितिन गडकरी द्वारा प्रदेश को दिये राष्ट्रीय उच्च मार्गो को लेकर भी नड्डा को श्रेय दिया जा रहा है। इस सं(र्भ में गडकरी द्वारा नड्डा को लिखे पत्र को भी इसी परिप्रेक्ष में देखा जा रहा है। भाजपा के बागीयों की घर वापसी का बड़ा पैरोकार नड्डा को ही माना जा रहा है। महेश्वर की वापसी के प्रयासों को भी नड्डा के साथ ही जोड़ा जा रहा है। इसमें यह भी उल्लेखनीय है कि महेश्वर और उनके साथियों ने शान्ता के ईशारेे पर धूमल के खिलाफ एक आरोप पत्रा नितिन गडकरी को सौंपा था। तब उन आरापों की पड़ताल का जिम्मा भी गडकरी ने नड्डा को ही सौंपा था। सूत्रों की माने तो नड्डा इस समय राजन सुशान्त की वापसी के लिये भूमिका तैयार कर रहे हैं।
लेकिन अभी पिछले दिनों संघ की ही एक पत्रिका यथावत में नड्डा को लेकर कवर स्टोरी छापी है। इसमें स्वास्थ्य मन्त्रालय में फैले भ्रष्टाचार को लेकर नड्डा पर तीखा हमला किया गया है। आरोप लगाया गया है कि नड्डा ने भ्रष्टाचारीयों को बचाने के लिये सारी सीमाएं लांघ दी है। यहां तक आरोप लगा है कि नड्डा मन्त्रालय से जुडी संसदीय समिति की सिफारिशों को भी नजर अन्दाज कर रहे है। माना जा रहा है कि नड्डा पर लगे यह आरोप आने वाले दिनांे में पार्टी पर भारी पड़ सकते हैं। ऐसे में नड्डा क्या बागीयों की घर वापसी करवा पाते हैं या नही इसको लेकर सवाल उठने लगे हैं।
शिमला/शैल। सीबीआई और ईडी की जांच झेल रहे वीरभद्र भाषाई शालीनता के दायरे लांघते जा रहे हैं। यह प्रतिक्रिया रही है भाजपा की वीरभद्र के उस कथन पर जिसमें उन्होने कहा था कि भाजपा के अन्दर सदन में बैठने लायक केवल एक दो व्यक्ति ही शेष बचे हैं और अन्य को तो नगर निगम के सफाई कर्मचारी के लिये आवेदन कर देना चाहिये। मुख्यमन्त्री ने अपने परिवहन मंत्री जी एस बाली को लेकर भी तंज कसे हैं क्यांेकि पिछले दिनो बाली और गडकरी की करीबी चर्चा में रही और अब बाली और केजरीवाल का एक साथ यात्रा करना भी चर्चा का विषय बन गया। इससे पूर्व यह भी सबके सामने है कि वीरभद्र अपने खिलाफ चल रही जांच का सूत्रधार धूमल, जेटली और अनुराग को लगातार करार देते आ रहे हैं। जितनी बार वीरभद्र इन लोगों को कोस चुके हैं उससे तो किसी के भी मन बुद्धि में यह आ सकता है कि फिर ऐसा कर ही दिया जाये।
यह सही है कि वीरभद्र इन दिनों अपनेे जीवन के सबसे कठिन दौर में चल रहे हैं। लेकिन यह समय क्यों आया? इसके लिये अपने और पराये कौन कितना जिम्मेदार हैं? इस सबका चिन्तन मनन तो स्वयं उन्हें और उनके परिजनो तथा शुभ चिन्तको को ही करना है। इसके लिये दूसरों को कोसने से तो कोई लाभ नही मिलेगा। आज दबी जुबान से कई यह कह रहे हैं कि आपने भी तो दूसरों के साथ इन्साफ कम ही किया है। कभी किसी की बद्दुआ भी वैसा ही असर कर जाती है जैसा की दुआ करती है। अपनेे किये का स्वयं ही आकलन करना होता है क्योंकि आत्मा का ही दूसरा नाम परमात्मा भी है जिसके सामने कोई गलत ब्यानी ठहर नही पाती है।
आज धूमल, अनुराग और एचपीसीए के खिलाफ बनाये गये सारे मामले एक-एक करके असफल होते जा रहे हैं। इन मामलों से जुड़ी फाईले और दूसरे दस्तावेज तो आपने स्वयं देखे नही हैं। इन मामलों की आपको उतनी ही जानकारी है जितनी आप के विश्वस्तों ने आपको दी है। लेकिन इन विश्वस्तो पर आश्रित रहकर आज परिणाम क्या है। जिस व्यक्ति को ऐसे पायदान पर पहुंच कर इस ऐज स्टेज पर यह सब झेलना पड़े उसे इस सब पर स्वयं ही सोचना पडे़गा। क्या आज जो मामले असफल होते जा रहे हैं वह मूलतः ही आधारहीन थे या फिर आपके विश्वस्तों की सांठ गांठ का परिणाम है उनका असफल होना? आने वाला समय इन सवालों के जवाब तो पूछेगा ही।
ऐसे में भाषा की शालीनता खोना केवल अपनी ही हताशा को प्रमाणित करता है। इससे कालान्तर में कोई लाभ नही मिलता। आज वीरभद्र की यह भाषा सचिवालय के गलियारों से निकर सड़क चैराहों में चर्चा का विषय बन गयी है क्योंकि कांग्रेस के कुछ शुभ चिन्तक उन्हें सातवीं बार प्रदेश का मुख्यमन्त्री देखना चाह रहे हैं।
शिमला/शैल। सीबीआई के साथ ही मनीलाॅडंरिग का मामला झेल रहे मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह और उनकी पत्नी पूर्व सांसद प्रतिभा सिंह ने ईडी द्वारा उनके एल आई सी ऐजैन्ट आनन्द चौहान की गिरफ्तारी के बाद अपनी गिरफ्रतारी की आशंका जताते हूए दिल्ली उच्च न्यायालय से प्रोटैक्शन की गुहार लगाई थी। इसी बीच ईडी ने प्रतिभा सिंह को 28 जुलाई को जांच में शामिल होने के लिये बुलाया था लेकिन वह जांच में शामिल नही हुई। 29 जुलाई को यह मामला सुनवाई के लिये जस्टिस सांघी की अदालत में लगा था। उस दिन यह आदेश हुआ हैः
Though the reply is stated to have been filed, the same has not come on record. Another copy has been tendered in Court, which is taken on “record. It is informed that petitioner No.2 had been called for investigation on 28.07.2016 She,however, did not personally appear for her investigation and the same has now been fixed for 09.08.2016. Mr.Sibal submits that petitioner No.2 shall personally appear for interrogation before the concerned authorities and shall fully cooperate with them during the said investigation. Mr. Jain submits that the status report shall be filed with regard to the further investigation carried out by the respondent before the next date. List on 24.08.2016 इस आदेश में संभावित गिरफ्तारी की संभावना पर रोक को कोई जिक्र ही नही है। 29 जुलाई को प्रतिभा सिंह के वकील कपिल सिब्बल ने अदालत के सामने अपना पक्ष रखते हुए यह भरोसा व्यक्त किया है कि प्रतिभा सिंह 9 अगस्त को ईडी के पास जांच में शामिल होंगी और जांच में पूरा सहयोग भी देगी। प्रतिभा सिंह के जांच में शामिल होने के बाद ईडी इसमें अगली जांच करने के बाद अदालत में इस मामले की स्टेट्स रिपोर्ट रखेगी। स्मरणीय है कि 29 जुलाई को इस मामले में हुई सुनवाई के बाद समाचार पत्रों में यह छप गया था कि इस मामले में प्रतिभा सिंह को भारी राहत मिल गयी है और अदालत ने इनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है।
जबकि अदालत के आदेश में गिरफ्तारी का कोई जिक्र ही नही है। ऐसे में कानून के जानकारों का मानना है कि 9 अगस्त को प्रतिभा सिंह के जांच में शामिल होने के बाद इस मामले में गंभीर मोड़ आ सकता है। स्मरणीय है कि आनन्द चौहान ने जो एल आई सी पालिसीयां वीरभद्र परिवार के सदस्यों के नाम पर बनवाई थी उनमें चार 27.3.2010 और सात 28.5.10 तथा चार विक्रमायादित्य के नाम पर 31.12.2010 को बनी है जबकि अपराजिता कुमारी के नाम पर 17.10.2014 को दो एफ डी आर बनी है। संयोग है कि एल आई सी की पालिसीयां उसी दौरान बनी जब वीरभद्र केन्द्र में स्टील मंत्री थे। इसी 2009-10, 2010-11 की अवधि 6,03,70,782 रूपेय आनन्द चौहान, एम आर शर्मा और कनु प्रिया राठौर के खातों में कैश जमा हुआ जिसमें से 13-5-2014 को ग्रटर कैलाश दिल्ली में प्रतिभा सिंह के नाम पर 4,47,20,000 से मकान खरीदा गया। ईडी को आशंका है कि यह सारा पैसा मनीलाॅडंरिग है और इसी को लेकर यह पूछताछ संभावित है।
शिमला/शैल। वीरभद्र सरकार ने कुल्लु के अन्र्तराष्ट्रीय दशहरा उत्सव के केन्द्रिय देव श्री रघुनाथ के मन्दिर का अधिग्रहण करने के लिये अधिसूचना जारी कर दी है। सरकार के इस कदम का कुल्लु के देव समाज और महेश्वर सिंह ने कड़ा विरोध किया है। महेश्वर सिहं ने सरकार की अधिसूचना को प्रदेश उच्च न्यायालय में एक याचिका के माध्यम से चुनौती भी दे दी है। उच्च न्यायालय का फैसला क्या आता है तब तक सरकार के फैसले पर ज्यादा कुछ
कहना सही नही होगा। लेकिन इस अधिग्रहण को जायज ठहराने के लिये मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह ने यह कहा है कि ऐसा करने के लिये क्षेत्र की जनता की मांग थी। सरकार ने जनता की मांग पर अधिग्रहण का फैसला लिया है। लेकिन कुल्लु की जनता ने यहां के राज परविार से जुडे़ कई मुद्दों पर पहले भी सरकार के पास मांगे रखी हंै जिन पर सरकार ने कभी अमल नही किया।
स्मरणीय है कि इसी रघुनाथ मन्दिर को लेकर 1941 में जिला जज श्री एस एम हक होशियारपुर की अदालत में दो प्रार्थनाएं नम्बर 12 और 13 आयी थी जिन पर 25.2.1942 को धर्मशाला कैंप में फैसला सुनाया गया था। यह प्रार्थनाएं 1920 के एक्ट नम्बर 14 की धारा 3 के तहत आयी थी। जिला जज एस एम हक ने अपनेे फैसले में इस मन्दिर को प्राईवेट संपति करार दिया था। इस फैसले के बाद एक समय श्रीमति विप्लव ठाकुर, कौल सिंह, सिंघी राम, स्व. राज किशन गौड और ईश्वर दास ने भी नवल ठाकुर के आग्रह पर इस मन्दिर के अधिग्रहण की मांग उठाई थी जिसे सरकार ने नही माना था।
इसी तरह देहात सुधार संगठन भुन्तर ने रूपी वैली को लेकर मांग उठायी थी। नवल ठाकुर 1991 में रूपी वैली के मामले को प्रदेश उच्च न्यायालय में ले गये थे। उच्च न्यायालय ने 13.5.91 को अपने फैसले में 31.12.92 से पहले रूपी वैली के सारे नौतोड़ मामलों की समीक्षा के निर्देश दिये थे। इन निर्देशों पर 4.11.96 को जिलाधीश कुल्लु ने इस स्थल के निरीक्षण के आदेश दिये थे। इस निरीक्षण की रिपोर्ट पर लम्बे समय तक जिलाधीश के कार्यालय में चिन्तन मनन चलता रहा। अन्त में 10.7.2006 को जिलाधीश कुल्लु के कार्यालय से मुख्यमन्त्री के अतिरिक्त सविच को रिपोर्ट भेजी गयी। जिलाधीश के पत्र के साथ निरीक्षण की पूरी रिपोर्ट भेजी गयी जिस पर कभी कोई कारवाई नहीं हुई। जिलाधीश का पत्र और 1942 के जिला जज के फैसले की कापी पाठकों के सामने रखी जा रही है।
अब सरकार ने इस मन्दिर के अधिग्रहण का फैसला उस समय लिया जब महेश्वर सिंह ने अपनी हिमाचल लोकहित पार्टी को भाजपा में विलय करने का फैसला लिया। महेश्वर हिलोपा के एक मात्र विधायक है और उनके भाजपा में विलय पर दलबदल कानून लागू नही होता है। वीरभद्र के इस कार्यकाल में महेश्वर सदन के अन्दर और बाहर बराबर मुख्यमन्त्री के साथ खड़े रहे हंै। लेकिन अब जब राजनीतिक विवशताओं के चलते उन्होने पुनः भाजपा में वापसी करने का फैसला ले लिया तब सरकार के मन्दिर अधिग्रहण के फैसले को राजनीतिक आईने में देखा जाना स्वाभाविक है।


शिमला/शैल। मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह अपने खिलाफ चल रही सीबीआई और ईडी जांच से किस कदर आहत है इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि वह इस सबके लिये धूमल, जेटली और अनुराग को लगातार कोसते आ रहे हैं। उधर धूमल ने फिर चुनौती दी है कि प्रदेश में मुख्यमन्त्री रहे तीनों नेताओं की संपति की जांच सीबीआई से करवा ली जाये। इस समय शान्ता कुमार, धूमल और वीरभद्र ही ऐसे नेता हैं जो प्रदेश के मुख्यमन्त्री रहे हैं इन तीनों के खिलाफ
शिकायतें भी हैं। शान्ता के खिलाफ पालमपुर के ही एक सेवानिवृत प्रिंसिपल आंेकार धवन की शिकायत सरकार के पास धूमल के समय से लंबित है। गंभीर शिकायत है लेकिन न धूमल और न वीरभद्र ही इस पर कारवाई करने को तैयार हैं। धूमल के खिलाफ विनय शर्मा की शिकायत 2012 से लंबित चली आ रही है। विनय शर्मा तो इस शिकायत पर 156(3) के तहत अदालत का दरवाजा भी खटखटा चुके हैं। 2013 से वीरभद्र सत्ता में है लेकिन आज तक उनकी विजिलैन्स इसमें कुछ नही कर पायी है। अनुराग ने भी बतौर सांसद 10,27,000 की संपति दो लाख में खरीदी हैं। भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के मुताबिक कोई भी पब्लिक सर्वेन्ट कम कीमत पर संपति नही खरीद सकता। वीरभद्र की विजिलैन्स के पास यह सारे मामले हैं लेकिन कारवाई नही है।
धूमल के खिलाफ ए एन शर्मा के नाम पर बनाये गये मामले में सरकार की फजीहत किस कदर हुई है यह भी सबके सामने है। एच पी सी ए के सारे मामलों में सरकार की स्थिति हास्यस्पद हो चुकी है। सोसायटी से कंपनी बनाये जाने का मामला आज तक आरसीएस और प्रदेश उच्च न्यायालय के बीच लटका पड़ा है। अरूण जेटली के खिलाफ मान हानि का मामला वापिस लेना पड़ा है। इन सारे प्रकरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि वीरभद्र ने अपने विरोधीयों को घेरने के लिये हर संभव प्रयास किया है लेकिन उनका सचिवालय और उनकी विजिलैन्स इन प्रयासों को सफल नही बना पाया है। वीरभद्र के प्रयास सार्वजनिक रूप से सामने भी आ गये और उनके परिणाम शून्य रहने से फजीहत होना स्वाभाविक है। इसी फजीहत का परिणाम है कि वीरभद्र का दर्द इस तरह यदा-कदा सामने आ जाता है।
वीरभद्र परिवार के खिलाफ चल रहे मामले अपने अन्तिम परिणाम तक पहुचने के कगार पर पहुंच चुके हैं भले ही एक दिन की राहत का कानूनी जुगाड़ बैठाते हुए कुछ और समय निकल जाये लेकिन इन मामलों में नुकसान होने की पूरी-पूरी संभावना है। इस परिदृश्य में वीरभद्र का धूमल, जेटली और अनुराग को कोसना तब तक बेमानी हो जाता है जब तक कि वह उनको अपने बराबर के धरातल पर लाकर खड़ा नही कर देते हंै। आज वीरभद्र का कोसना केवल खिसयानी बिल्ली खम्भा नोचे होकर रहा गया है। ऐसे में यह सवाल उठना भी स्वाभाविक है कि वीरभद्र अपने प्रयासों में सफल क्यों नही हो पा रहे हंै। क्योंकि यदि धूमल के खिलाफ भी आय से अधिक संपति का मामला ठोस आधारों पर खड़ा हो जाता है तो वह भी वीरभद्र की तर्ज पर आगे चलकर ईडी के दायरे में आ खड़ा होगा। लेकिन क्या वीरभद्र का सचिवालय और विजिलैन्स ऐसा कर पायंेेगे? आज इनकी मंशा पर भी राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में सवाल उठने शुरू हो गये हैं। क्यांेकि वीरभद्र की सरकार अब तक उन आरोपों पर कोई परिणाम प्रदेश की जनता के सामने नही ला पायी है जिनके सहारे वह सत्ता तक पहुंची थी। बल्कि आज वीरभद्र सरकार स्वयं उन आरोपों में घिरती जा रही है जो वह विपक्ष में बैठकर धूमल सरकार के खिलाफ लगाया करती थी। क्योंकि विजिलैन्स के पास ऐसी शिकायतें मौजूद हैं जिन पर यदि ईमानदारी से गंभीर जांच की जाये तो उसकी आंच कई बडे़ चेहरांे को बेनकाब कर सकती है। लेकिन विजिलैन्स ऐसा कर नही पा रही है। ऐसा माना जा रहा है कि प्रशासन के अहम पदों पर बैठे बड़े बाबू अपने भविष्य की चिन्ता को लेकर ज्यादा सजग हो गये हंै। क्योंकि उन्हें उसी तर्ज पर धमकीयां मिलनी शुरू हो गयी है। जैसी की 31.3.99 को स्वयं वीरभद्र ने तत्कालीन शीर्ष प्रशासन को दी थी।