Thursday, 15 January 2026
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सीआईसी और शिक्षा के नियामक आयोग का अध्यक्ष तलाशने के लिए नही बन पायी स्क्रीनिंग कमेटी

शिमला/शैल। प्रदेश में मुख्य सूचना आयुक्त और शिक्षा के नियामक आयोग के अध्यक्ष पद करीब पिछले पांच माह से खाली चल रहे हैं। इन पदांे को भरने के लिये आवेदन आमन्त्रित कर लिये गये थे। शिक्षा के नियामक आयोग में सदस्य का रिक्त पद भर भी लिया गया है और मुख्यमन्त्री के प्रधान निजि सचिव सुभाष आहलूवालिया की पत्नी आर.के.एम.बी. कालिज की प्रिसिंपल मीरा वालिया को सदस्य का पद मिला है। जिस बैठक में सदस्य का पद भरा गया था उस बैठक में अध्यक्ष का पद नही भरा जा सका। क्योंकि नियामक आयोग का अध्यक्ष पद भरने के लिये शिक्षा सचिव चयन समिति की बैठक बुलाते है। लेकिन यहां पर तत्कालीन शिक्षा सचिव पी सी धीमान स्वयं इस पद के लिये दावेदार थे और इस कारण यह बैठक नही बुलायी जा सकी। अब धीमान सेवानिवृत हो गये हैं अब यह बैठक बुलायी जा सकती है। 

पी सी धीमान की दावेदारी के कारण यह पद खाली रखा गया था। लेकिन इसी बीच सरकार ने शराब का कारोबार करने के लिये भी एक अलग निगम बनाने का फैसला ले लिया है। सरकार द्वारा शराब का सारा कारोबार अपने एकाधिकार में लेने के लिये जीआईसी को इस कारोबार से बाहर कर दिया गया है। जीआईसी को अपना आवेदन तक वापिस लेना पड़ा है। इस सबमंे आबकारी एंवम कराधान सचिव के नाते पीसी धीमान की मुख्य भूमिका रही है। धीमान की इसी भूमिका के लिये इस नयी निगम के अध्यक्ष पद के लिये भी वह प्रबल दावेदारों में आ गये हैं। लेकिन एचपीसीए के मामले में सरकार धीमान के खिलाफ मुकद्दमा चलाने की अनुमति तक दे चुकी है ऐसे में सेवानिवृति के बाद धीमान को किसी पद पर तैनाती देना सरकार के लिये विवाद खड़ा कर सकता है।
इसी तरह सीआईसी के लिये आये आवेदनों की छंटनी के लिये भी अभी तक स्क्रीनिंग कमेटी गठित नही हो पायी है। इस पद के दावेदारों में लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष के एस तोमर भी शामिल हो गये हैं। हालांकि संविधान के मुताबिक लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष के सदस्यों पर सरकार में कोई भी अन्य पद स्वीकारने पर प्रतिबन्ध है। इस संद्धर्भ में आरटीआई एक्टिविस्ट देवाशीष भट्टाचार्य राज्यपाल को शिकायत तक भेज चुके हैं। उधर विशेषज्ञों के मुताबिक सूचना आयोग अध्यक्ष के बिना काम ही नही कर सकता है। सूचना आयोग में अध्यक्ष का होना अनिवार्यता है। सूचना आयोग को लेकर सरकार एक तरह से सवैंधानिक संकट मे फंस चुकी है। ऐसे में सरकार इन रिक्त पदों को कब और कैसे भरती है इस पर सबकी निगाहें लगी हैं।

ईडी मामले में नहीं मिल पायी वीरभद्र को अन्तरिम राहत और आनन्द चौहान को जमानत

शिमला/शैल। मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह को मनीलाॅडरिंग मामले में अब तक अदालत से कोई राहत नही मिल पायी है और इसी मामलें में गिरफ्तार उनके एलआईसी ऐजैन्ट आनन्द चौहान को जमानत नही मिल पायी है। इस मामले में ईडी का जो रूख अब तक सामने आया है उससे लगता है कि अभी निकट भविष्य में किसी को भी राहत मिलना कठिन है। स्मरणीय है कि वीरभद्र सिंह, प्रतिभा सिंह, आनन्द चौहान और चुन्नी लाल के खिलाफ 23.9.15 को सीबीआई ने आय से अधिक संपति का मामला दर्ज किया था। इसी मामले के तथ्यों के आधार पर ईडी ने 27.10.15 को मनीलाॅडरिंग का मामला दर्ज कर लिया था। सीबीआई ने मामला दर्ज करने के साथ ही वीरभद्र के आवास और कुछ अन्य स्थानों पर छापेमारी की। इस छापामारी से आहत होकर वीरभद्र ने हिमाचल उच्च न्यायालय में सीबीआई द्वारा दर्ज मामले को रद्द किये जाने की गुहार लगायी। इस याचिका पर सीबीआई को नोटिस जारी करते हुए उच्च न्यायालय ने वीरभद्र से पूछताछ करने गिरफ्तार करने और मामले का चालान अदालत में ले जाने से पूर्व अदालत से पूर्व अनुमति लेने की शर्त लगा दी। जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस मामले को दिल्ली उच्च न्यायालय में ट्रांसफर कर दिये जाने के बाद भी गिरफ्रतारी के लिये अनुमति लेने की शर्त अब भी जारी है। इस शर्त को हटाने के लिये सीबीआई की याचिका दिल्ली उच्चन्यायालय में लंबित है। वीरभद्र की तर्ज पर ही आनन्द चौहान और चुन्नी लाल ने भी हिमाचल उच्च न्यायालय से ऐसी ही राहत मांगी थी जो उन्हें नही मिली क्योंकि यह मामला दिल्ली उच्च न्यायालय में ट्रांसफर हो चुका है। आनन्द चौहान और चुन्नी लाल की गिरफ्तारी पर अदालत से कोई रोक न होने से ही इनकी गिरफ्तारी हुई है।
दूसरी ओर जब ईडी ने मामला दर्ज करने के बाद छापामारी की तब वीरभद्र सिंह ने इसे दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती देते हुए ईडी की कारवाई का आधार बने दस्तावेजों की कापी मांगी तथा दर्ज मामले को रद्द करने की गुहार लगायी। यह याचिका भी अभी तक न्यायालय में लंबित चल रही है ईडी द्वारा किसी की भी गिरफ्तारी पर कोई रोक नहीं है। इसी आधार पर ईडी ने आनन्द चौहान को गिरफ्तार कर लिया है। आनन्द चौहान की गिरफ्तारी से संकट में आये वीरभद्र ने दिल्ली उच्च न्यायालय से अपनी गिरफ्तारी की संभावित आंशका पर न्यायालय से सुरक्षा की गुहार लगायी है जो नही मिलने पायी है। ईडी से अभी तक इस मामले के किसी भी अभियुक्त को कोई राहत नहीं मिल पायी है। जानकारो का मानना है कि इसमें अब राहत मिलने की सारी संभावनाएं नही के बराबर रह गयी है क्योंकि ईडी में 27.10.15 को दर्ज हुए मामले में वीरभद्र को 16.11.15 को ऐजैन्सी में पेश होने के सम्मन जारी किये गये थे। जिस पर वीरभद्र ने ईडी को 10.1.16 को पत्र भेजकर सूचित किया कि 15 फरवरी तक व्यस्त है इसलिये नही आ सकते। इसके बाद 11.1.16 को वीरभद्र का वकील पेश हुआ जिसने कुछ आंशिक जानकारीयां ईडी को दी। यह आंशिक जानकारियां पर्याप्त और संतोषजनक न होने पर ईडी ने वीरभद्र को 5.1.16,12.1.16, 21.1.16, 28.1.16, 11.3.16, 17.3.16 और 21.3.16 को पेश होने के सम्मन भेजे लेकिन वह एक बार भी ऐजैन्सी के सामने पेश नही हुए। वीरभद्र के पेश होने पर ईडी ने 23.8.16 को करीब आठ करोड़ की चल-अचल संपति की अटैचमैन्ट के आदेश जारी कर दिये। बल्कि इसी बीच 9.2.16 को बागवानी निदेशक डी पी भंगालिया का ब्यान ईडी ने दर्ज किया जिसमे श्रीखण्ड बागीचे से 2008-09 में 5500, 2009-10 में 2700 तथा 2010-11 में 9300 वाक्स सेब उत्पादन की संभावना बतायी गयी है। 8.2.16 को ए.पी.एम.सी. सोलन के सचिव भानू शर्मा ने ईडी को परवाणु सेब मण्डी के कार्यशील होने तथा सेब के ढुलान में प्रयुक्त होने वाले फार्मो आर तथा क्यू की जानकारी दी तथा आनन्द चौहान द्वारा ऐसा कोई भी दस्तावेज जांच में न मिलने की भी जानकारी दी। 8.2.16 को निदेशक परिवहन के कार्यालय से इस सेब के ढुलान में प्रयुक्त हुए कथित वाहन नम्बरों की जानकारी ली गयी जिसमे यह वाहन मौजूदा ही नहीं होने की जानकारी सामने आयी।
इस तरह जो घटनाक्रम पूरे मामले में घटा है उससेे यह तथ्य उभरता है कि ईडी ने वीरभद्र को अपना पक्ष रखने के बहुत अवसर दिये लेकिन वह एक बार भी ऐजैन्सी के सामने पेश नही हुए। वीरभद्र के इस असहयोग के बाद ईडी के पास संपति अटैचमैन्ट का आदेश जारी करने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नही रह जाता था। अब एलआईसी पाॅलिसीयों और कुछ एफडीआर में निवेश हुए धन का वैध स्त्रोत बताने की जिम्मेदारी केवल वीरभद्र परिवार की ही रह जाती है क्योंकि इन पाॅलिसीयों को कैश करवाकर ग्रेटर कैलाश में लिया गया मकान प्रतिभा सिंह के नाम पर है पालिसीयों में हुए निवेश के रिकार्ड पर लाभार्थी यही परिवार है। इसी तरह वक्कामुल्ला चन्द्रशेखर से करीब 6.5 करोड़ का ट्टण लेना तो प्रतिभा सिंह ने अपने चुनावी शपथ पत्र में दिखाया हैं लेकिन सीबीआई और ईडी की जांच में यह सामने आया है कि वक्कामुल्ला के पास इतना धन है ही नही। ईडी वक्कामुल्ला से लिये गये करीब 6.5 करोड के ट्टण को भी मनीलाॅडरिंग मान रही है। सूत्रों के मुताबिक वक्कामुल्ला को लेकर ईडी की जांच पूरी हो गयी है और अब उसको सारे संबंधित लोगों से पूछताछ का दौर शुरू होगा। यदि वक्कामुल्ला के पास वैध स्त्रोत नहीं पाया गया तो यह पैसा भी मनीलाॅडरिग का हिस्सा बनेगा और इसमें कुछ और संपतियां अटैच होने की स्थिति आ जायेगी। यह भी माना रहा है कि ईडी ने इसी मामले में जो देश के विभिन्न शहरो में छापामरी की है उसकी कड़ीयांे में भी कई और लोग जुड़ने स्वाभाविक हैं। चर्चा है कि इसमें कुछ मन्त्रियों, चेयरमैनो, पत्रकारो तथा अधिकारियों के नाम भी चिन्हित हो चुके हैं जो इस मनीलाॅडरिंग ट्रेल का हिस्सा माने जा रहे हैं। इस परिदृश्य में ईडी प्रकरण में निकट भविष्य में कोई राहत मिल पाने की संभावना नहीं है। माना जा रहा है कि वीरभद्र के सलाहकार इस मामलें में उन्हे सही राय नही दे पाये हैं।

जंगी थोपन पवारी परियोजना रिलांयस को मिलने का रास्ता साफ


ब्रकेल के 2713 करोड़ का हर्जाना बसूलने का क्या होगा
क्या अदानी को 280 करोड़ लौटाना सरकार की जिम्मेदारी है

शिमला/शैल।वीरभद्र के इस शासनकाल में सरकार के सारे बडे़ बडे़ दावों के वाबजूद प्रदेश के पाॅवर प्रौजेक्टस में बडे़ निवेश का दावा अमली शक्ल नही ले पाया है। हांलाकि सरकार ने निवेशकों के पक्ष में अपनी हाईड्रल नीति में भी कई बड़े बदलाव किये है इन बदलावों के अतिरिक्त सरकार ने 960 मैगावाट के जंगी थोपन पवारी हाईडल प्रौजेक्ट को सितम्बर 2015 में रिलायंस इन्फ्रास्ट्रचर को देने का फैसला लिया। इस फैसले के बाद इसी प्रौजेक्ट में अपफ्रन्ट प्रिमियम के नाम पर ब्रेकल -अदानी के जमा हुए 280 करोड़ को वापिस लौटाने का भी फैसला लिया। इस प्रौजेक्ट को लेकर रिलायंस 2009-10 से सर्वोच्च न्यायालय में गया हुआ था। क्योंकि उसे यह प्रौजेक्ट 2006-07 में वीरभद्र सरकार ने नही दिया था। उस समय यह प्रौजेक्ट नीदरलैण्ड की कंपनी बे्रकल को दिया गया था। लेकिन ब्रेकल यह प्रौजेक्ट शुरू नही कर पाया और किसी न किसी बहाने सरकार से समय में बढ़ौतरी हालिस करता रहा। ब्रेकल के इस आचरण को रिलायंस ने प्रदेश उच्च न्यायालय में चुनौती दी। इस चुनौती में अदालत के सामने ब्रेकल के सारे दावे एकदम गल्त साबित हुए। उच्च न्यायालय ने ब्रेकल को फ्राड करार देते हुए इस आवंटन को ही रद्द कर दिया। जब इस प्रोजैक्ट के लिये टैण्डर निविदायें आमन्त्रित की गयी थी तब रिलायंस दूसरे स्थान पर था। लेकिन आवंटन रद्द होने के बाद भी जब प्रोजैक्ट रिलायंस को नही दिया गया तब रिलायंस इस मामले को सर्वोच्च न्यायालय ले गया ।

रिलायंस के सर्वोच्च न्यायालय में होने के बीच ही प्रदेश के सियासी समीकरण बदल गये। स्मरणीय है कि ब्रेकल जब इस प्रौजेक्ट की अपफ्रन्ट प्रिमियम अदा नही कर पाया था तब अदानी से 280 करोड़ कर्ज लेकर ब्रकेल ने 2008 में यह अपफ्रन्ट प्रिमियम अदा किया था। लेकिन अदानी ब्रेकल कन्सरोटियम का विधिवत अधिकृत सदस्य नही था। इसलिए ब्रेकल को कर्ज देने वाले के अतिरिक्त अदानी की इस प्रोजैक्ट में और कोई हैसियत नही बन पायी। ब्रेकल को 280 करोड़ का कर्ज अदानी ने सरकार की जिम्मेदारी पर नही दिया था। कर्ज बे्रकल और अदानी का निजी मामला था। ब्रेकल के तय समय तक इस प्रोजैक्ट को पूरा न कर पाने के कारण जो नुकसान प्रदेश को हुआ है उसका आकलन 2713 करोड़ आंका गया है। यह 2713 करोड़ ब्रेकल से बसूल किया जाना था। इसके लिये पहले कदम के तौर पर उसके द्वारा जमा करवाया 280 करोड़ का अपफ्रन्ट प्रिमियम जब्त किया जाना था। इसके लिये ब्रेकल को नोटिस तक जारी हो रहा था। लेकिन सियासी समीकरणों के बदलनेे के कारण न केवल 2713 करोड़ के हर्जाने का नोटिस देना ड्राप किया गया बल्कि ब्रेकल के नाम अदानी का 280 करोड़ का कर्ज लौटाने का भी प्रबन्ध कर दिया गया।
रिलायंस और अदानी दोनो प्रधान मंत्राी नरेन्द्र मोदी के चेहते उद्योगपति हैं। दोनो ने लोकसभा चुनावों में मोदी का किस हद तक साथ दिया है इसे पूरा देश जानता है। इस पृष्ठभूमि में रिलायंस और अदानी के हित आपस में जुड़ गये। यहां रिलायंस प्रोजैक्ट हासिल करने के लिये प्रदेश उच्च न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गया। ब्रेकल को अदालत ने फ्राड करार दे रखा है। ब्रेकल और अदानी वैध हिस्सेदार है नही। अदानी का इस तरह 280 करोड़ डूब रहा था। ऐसे में संयोवंश वीरभद्र-मोदी की सीबीआई और ईडी की जांच के शिकंजे में उलझ गये। स्थिति गंभीर बन गयी इसको भांपते हुए वीरभद्र के प्रबन्धकों ने अदानी अंबानी के सहारे मोदी तक पहुंचने का जुगाड़ भिडाया। इस जुगाड़ के प्रबन्धन में लगे वीरभद्र के एक अतिविश्वस्त अधिकारी की भूमिका तो बड़ी चर्चा तक का विषय बन गयी थी। इसी पृष्ठ भूमि में अन्ततः रिलायंस नेे सवोच्च न्यायालय से अपनी याचिका वापिस ली है। सरकार रिलायंस को यह प्रोजैक्ट देने की आॅफर भेज चुकी है जिसे उसने सिन्द्धात रूप में स्वीकार भी कर लिया है। रिलायंस को प्रौजेक्ट के लिये तो अपफ्रन्ट प्रिमियम देना ही है। अब इसी प्रिमियम को अदानी को वापिस दिया जाना है बदले में वीरभद्र को सीबीआई और ईडी से राहत दिलाने की शर्त है।
लेकिन अब ईडी अटैचमैन्ट आर्डर जारी करने के बाद एल आई सी ऐजैन्ट आनन्द चौहान को गिरफ्तार कर चुका है। सीबीआई ने गिरफ्तारी की रोक हठाने की याचिका दे रखी है। ईडी ने आनन्द चौहान पर जांच में सहयोग न करने का आरोप लगाया हुआ है। ऐसे में वीरभद्र का मामला इस समय ऐसा पेचीदा बन गया है जहां पर प्रत्यक्षतः राहत पहुंचा पाना बहुत आसान नही होगा। दूसरी ओर ब्रेकल को अदालत द्वारा एकदम आधार हीन पाये जाने के बाद उससे 2713 करोड़ के नुकसान के नोटिस को ड्राप करके 280 करोड़ वापिस लौटाने का जोखिम इस समय वीरभद्र का प्रशासनिक तन्त्रा ले पायेगा इसको लेकर भी सन्देह है।

सर्वेक्षण में फंसी आप

शिमला। हिमाचल की आम आदमी पार्टी ईकाई भंग होने के बाद अभी तक नयी ईकाई गठित नहीं हो पायी है भंग ईकाई पर भी प्रदेश में आशानुरूप काम न कर पाने का आरोप था। इसी आरोप के साथ प्रदेश ईकाई के शीर्ष नेताओं में भी मतभेद इतने गहरे हो गये थे कि प्रदेश संयोजक अपने साथ ईकाई के किसी दूसरे अधिकारी को मंच तक शेयर नही करने देते थे। मतभेद मन भेद बनकर जब मैं मैं तू तू तक आ गये तब एक दूसरे की परोक्ष -अपरोक्ष शिकायतों का दौर चला और इसकी कीमत पार्टी को ईकाई भंग करके चुकानी पड़ी।
ईकाई भंग होने के बाद हाईकमान ने पर्यवेक्षकों की एक टीम प्रदेश में भेजी। इस टीम ने शिमला सहित सभी जिला मुख्यालयों पर सर्वेक्षण किया। यह सर्वेक्षेण सबसे पहले भंग ईकाई के सदस्यों के साथ बैठके करके शुरू हुआ। फिर इन्ही बैठकों में सर्वेक्षण के लिये एक प्रश्नोत्तरी बनायी गयी। इस प्रश्नोत्तरी के सवालों में मुख्य प्रश्न थे कि क्या आप केजरीवाल को जानते है? आमआदमी पार्टी की सरकार के बारे में आपकी क्या राय है? क्या आप प्रदेश में बदलाव चाहते है? क्या आप को प्रदेश में चुनाव लड़ना चाहिये?
आज केजरीवाल राष्ट्रीय चेहरा बन गये हैं। स्वाभाविक है कि आम आदमी इस नाम से परिचित है पार्टी की सरकार दिल्ली में है और बाहर उसके बारे में ज्यादा जानकारी संभव ही नहीं है। क्योंकि उसकी उपलब्धियों के विज्ञापन प्रदेश की अखवारों में तो छपते नही है। प्रदेश में बदलाव हर आदमी चाहता है आप को चुनाव लड़ने से कोई मना भी क्यों करेगा। लेकिन किसी ने यह नही पूछा कि बदलाव क्यों चाहते हैं प्रदेश की दो तीन मुख्य समस्यांए क्या है और उसके लिये कांग्रेस और भाजपा की जिम्मेदारी कितनी कितनी है। प्रदेश में आम आदमी को राजनीतिक विकल्प बनने के लिये क्या करना होगा। पूर्व ईकाई के काम के बारे में क्या राय है। सर्वेक्षण में इन सवालों को नहीं उठाया गया।
इस समय प्रदेश राजनीतिक तौर पर एक गंभीर स्थिति से गुजर रहा है। मुख्यमन्त्राी और उनकी पत्नी पूर्व सांसद को दिल्ली उच्च न्यायालय में अग्रिम जमानत की गुहार लगानी पड़ी है। मुख्य विपक्षी दल भाजपा अगली सता का प्रबल दावेदार बनकर बैठा हुआ है। ऐसे में अभी आम आदमी पार्टी सर्वेक्षण के स्तर पर पंहुची हुई है। हां यह अवश्य है कि उसके कुछ लोग सोशल मीडिया में बहुत सक्रिय हंै लेकिन सोशल मीडिया अभी तक जन मीडिया नहीं बन पाया और ना ही पूरा विश्वसनीय बन पाया है। ऐसे सर्वेक्षण के बाद पार्टी क्या स्वरूप लेकर आती है इस पर सबकी निगाहें लगी है।

जे.पी. और अंबूजा के लिये हुआ जबरन भूमि अधिग्रहण सवालों में

शिमला। सर्वोच्च न्यायालयों ने द वर्किंग फ्रैन्डज कोआपरेटिव हाऊस बिलडिंग सोसायटी लिमिटेड बनाम स्टेट आॅफ पंजाब व अन्य और रतन सिंह बनाम यूनियन आॅफ इण्डिया मामलों में राइट टू फेयर कंपनसेशन एण्ड टंªासपेरेंसी इन लैण्ड एक्यूजेशन रिहेविलिटेशन एंड रिसटमैन्ट एक्ट 2013 की धारा 24(2) में व्यवस्था देते हुए कहा है कि Thus compensation can be regarded as "paid if the compensation has Literally been paid to the person interested, or after being offered to such person, it has been deposited in the Court. The deposit of the Award in a Government Treasury would not amount to compensation being paid to the person interested. सर्वोच्च न्यायालय ने 2014 और 2015 में उसके पास आये मामलांे में भूमि अधिग्रहण की धारा 24 (2) की विस्तृत व्याख्या करते हुए स्पष्ट कहा है कि भूमि अधिग्रहण में मुआवजा संबधित व्यक्ति को वास्तव में ही मिला हुआ होना चाहिये। यदि किन्ही कारणों से ऐसा नहीं होे पाया है तो ऐसा मुआवजा अदालत के पास जमा हुआ होना चाहिये। सरकारी ट्रेजरी में जमा करवाये हुए मुआवजे को पेड़ करार नहीं दिया जा सकता। यदिे ऐसा मुआवजा पंाच वर्षो तक सबंधित व्यक्ति को नही मिला है तो ऐसा अधिग्रहण स्वतः ही निरस्त हुआ माना जायेगा।
प्रदेश में सरकार ने अंबूजा और जे पी सीमेन्ट उद्योगों के लिये जमीनों को अधिग्रहण किया था। इस अधिग्रहण में बहुत सारे किसानों ने अपनी जमीनों के अधिग्रहण का विरोध किया था। लेकिन इन उद्योग घरानो, प्रशासन और राजनेताओं के गठजोड़ के आगे किसानों के विरोध को नजरअंदाज कर दिया गया। यहां तक कि जिन किसानों ने आज तक अपनी जमीनो का कब्जा नही छोड़ा हैं उनको मुआवजा प्रशासन की मिली भगत से इन कंपनीयांे ने सरकारी ट्रेजरी में जमा करवा दिया । इसी मिली भगत के चलते कब्जे के बिना ही राजस्व दस्तावेजों में जमा करवा दिया। इसी मिली भगत के चलते मांगल विकास परिषद् के नेता एडवोकेट नन्द लाल चैहान के मुताबिक अंबूजा के लिये करीब बारह वर्ष पहले और जे पी के लिये आठ वर्ष पहले सरकार ने जबरन भूमि अधिग्रहण किया था। लेकिन इसमें करीब चार सौ बीघा जमीन पर आज भी मालिक किसानों का ही कब्जा हैं जबकि राजस्व में इनदराज बदल दिये गये है।
इन किसानों ने आज तक कंपनीयों से मुआवजा नहीं लिया हैं प्रशासन ने मुआवजे का पैसा सरकार की ट्रेजरी में जमा करवा रखा है। अब सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद यह जबरन हुआ भूमि अधिग्रहण स्वतः ही खत्म हो जाता है। इस फैंसले से इन जमीनो पर किसानांे का हक बहाल हो जाता है। राजस्व अधिकारियों को राजस्व इन्दराज किसानो के नाम करने होगें। मांगल विकास परिषद् ने राज्यपाल और मुख्यमंत्राी को पत्रा भेजकर सर्वोच्च न्यायालय के फैंसले पर तुरन्त प्रभाव से अमल किये जाने की मांग की हैं उधर संबंधित प्रशासन से जब इस बारे में जानकारी मांगी तो उसका कहना था कि जे पी और अंबूजा को लेकर कोई फैंसला ही नही आया है। जब सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के संद्धर्भ में पूछा तब एसडीएम कार्यालय अर्की ने ऐसे फैसले की जानकारी होने से ही इन्कार किया। जबकि इस संद्धर्भ में सारी कारवाई ही एसडीएम कार्यालय से शुरू होनी है। जे पी और अंबूजा सीमेन्ट के लिये हुए अधिग्रहण को लेकर स्थानीय लोग कई बार आन्दोलन कर चुके हैं अब सबकी नजरें इस पर लगी हुई है। कि सरकार सर्वोच्च न्यायालय के फंैसले पर अमल करने के लिये कितनी जल्दी कितने प्रभावी कदम उठाती है। क्योंकि लोगों को अभी भी सन्देह है कि इन कंपनीयों के दवाब के आगे सरकार इस फैसले पर अमल करने में टाल मटोल करेगी।

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