शिमला/शैल। प्रदेश सरकार ने इस मानसून सत्र के अन्तिम दिन नगर एंव ग्राम नियोजन अधिनियम 1977 में संशोधन पारित किया है। संशोधित अधिनियम में अवैध भवन निर्माणों को नियमित करने के लिये कुछ फीस का प्रावधान करके नियमितिकरण का रास्ता खोल दिया गया। ग्रामीण क्षेत्रों को छोड़कर पूरे प्रदेश में भवन निर्माणों को नियोजित करने के लिये यह अधिनियम लागू है। नगर निगम और नगरपालिका क्षेत्रों में तो इस अधिनियम से पहले से ही भवन निर्माणों को नियोजित करने की व्यवस्था लागू है। लेकिन इस सबके बावजूद भवन निर्माण
नियमों का उल्लंघन होता आया है और इस उल्लंघन को नियमित करने के लिये सरकार रिटैंशन पाॅलिसियां लाकर ऐसे निर्माणों को नियमित करती रही। लोग नियमों का उल्लंघन करते रहे और सरकार उन्हें नियमित करती रही।
इस बार भी सरकार ने अध्यादेश जारी करके नियमितिकरण की योजना अधिसूचित की थी। इस योजना पर सभी क्षेत्रों से तीव्र आपत्तियां मुखरित हुईं। यहां तक की नगर निगम शिमला के हाऊस ने ध्वनिमत से इस योजना पर अपना विरोध दर्ज करवाया। लेकिन इन सारे विरोधों/आपत्तियों को सिरे से खारिज करते हुये विधानसभा में सरकार ने इसे पारित करवा लिया। राज्यपाल की स्वीकृति के लिये भी भेज दिया गया है और स्वीकृति के बाद यह लागू भी हो जायेगा।
लेकिन इसी बीच प्रदेश उच्च न्यायालय की जस्टिस राजीव शर्मा और जस्टिस सुरेश्वर ठाकुर की खण्ड पीठ ने एक फैसले में इस प्रस्तावित नियमितिकरण को एकदम असंवैधानिक करार दे दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा है कि-It is expected from the State to maintain rule of law. The action of the State Government to regularize the unauthorized construction/encroachments is suggestive of non-governance. प्रदेश में इससे पहले सात बार रिटैन्शन पाॅलिसियां सरकार ला चुकी है। अन्तिम बार 2009 में रिटैंशन पाॅलिसी आयी थी। उस समय प्रदेश में 8198 मामले अवैध निर्माणों के थे जिनमे से 2108 निर्माण इस पालिसी के तहत नियमित हो गये थे और 6090 मामले बचे थे। लेकिन इस बार यह संशोधन लाते समय अवैधनिर्माणों की संख्या 13000 कही गयी है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि इस रिटैंशन पाॅलिसी के बाद सात हजार नये अवैध निर्माण खड़े हुए हैं। शिमला में दस-दस मंजिलें भवन खड़े हुए हैं। पांच और इससे अधिक मंजिलों वाले भवनों की सूची नगर निगम शिमला से कई बार विधानसभा पटल तक आ चुकी है। हर बार रिटैंशन पाॅलिसी आने के बाद अवैध निर्माण रूकने के स्थान पर बढ़े ही हैं।
अवैध निर्माणों के नियमितिकरण पर चिन्ता जताते हुये अदालत ने कहा है कि Thousands of unauthorized constructions have not been raised overnight. The Government machinery was mute spectator by letting the people to raise unauthorized constructions and also encroach upon the government land. Permitting the unauthorized construction under the very nose of the authorities and later on regularizing them amounts to failure of constitutional mechanism/machinery. The State functionary/machinery has adopted ostrich like attitude. The honest persons are at the receiving end and the persons who have raised unauthorized construction are being encouraged to break the law. This attitude also violates the human rights of the honest citizens, who have raised their construction in accordance with law. There are thousands of buildings being regularized, which are not even structurally safe.
The regularization of unauthorized constructions/encroachments on public land will render a number of enactments, like Indian Forest Act 1927, Himachal Pradesh Land Revenue Act, 1953 and Town and Country Planning Act, 1977 nugatory and otiose. The letter and spirit of these enactments cannot be obliterated all together by showing undue indulgence and favouritism to dishonest persons. The over-indulgence by the State to dishonest persons may ultimately lead to anarchy and would also destroy the democratic polity. इस परिदृष्य में अब जनता की निगाहें राजभवन पर टिकी हैं कि जनता और अदालत की चिन्ता व नाराजगी का सम्मान करते हुये माहमहिम इस संशोधन को स्वीकृति प्रदान करते हैं या वापिस लौटाते हैं। क्योंकि खेल विधेयक आजतक राजभवन में लंबित है।
शिमला/शैल। प्रदेश के राज्य सहकारी बैंक में इन दिनों अन्जाम दी जा रही कंप्यूटर खरीद पर गम्भीर सवाल उठ खड़े हुये हैं। राज्य सहकारी कृषि एंव ग्रामीण विकास बैंक तथा जिला शिमला भाजपा के पूर्व अध्यक्ष शेर सिंह चैहान नेे प्रैस को जारी एक ब्यान में इस कंप्यूटर खरीद को एक बड़ा घोटाला करार दिया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि बैंक में 1998-99 में कंप्यूटराइजेशन शुरू हुई थी और उसके बाद से बैंक का सारा काम कंप्यूटर के माध्यम से हो रहा है। जब कभी कोई कंप्यूटर खराब होता था उसे रिपेयर करवा लिया जाता था। कभी कभार ही किसी कंप्यूटर को रिपलेस करवाने की नौबत आती थी।
लेकिन अब प्रबन्धन ने सारे कंप्यूटर एक मुश्त नये खरीदने का फैंसला लिया है। नया कंप्यूटर 53,550 रूपये में खरीदा जा रहा है लेकिन इसी कंपनी को पूराना कंप्यूटर जो कि ठीक चालू हालत में है महज़ 1200 रूपये में दिया जाता है। जबकि इसी पुराने कंप्यूटर को यह कंपनी 7000 से 9000 के बीच बेच रही है इसी तरह के पुराने पिं्रटरज़ जो कि 13120, 24805 और 28665 रूपये मंे खरीदे गये थे अब 300 और 200 रूपये मे इसी कंपनी को दिये जा रहे हैं। पुराना स्कैनर 50 रूपये में दिया जा रहा है। सवाल उठाया जा रहा है कि जब कंपनी पुराने कंप्यूटरों को बैंक से महज़ 1200 रूपये में लेकर सात से नौ हजार के बेच रही है तो इस काम को बैंक ने अलग से स्वतन्त्रा में क्यों नही किया। पुराने कंप्यूटरों में ही कई लाख का गोल माल होने का आरोप है। नये कंप्यूटरों की खरीद करोड़ों की है। इसकी निविदाओं को लेकर भी कई सवाल खडे़ हो रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि जब पुरानेे कंप्यूटर ठीक काम कर रहे थे तो फिर उन्हे एक मुश्त ही बदलने का फैंसला क्यों लिया गया। आरोप यह भी है कि बैंक की खरीद शाखा में तैनात कर्मचारी लम्बे अरसे से उसी जगह पर तैनात है। प्रबन्धन उन्हे बदलने का साहस ही नहीं कर पाता है। बैंक में हर वर्ष कई करोड़ों की खरीद को यही लोग अंजाम देते आ रहे हैं। खरीद के लिये अपनाई जा रही प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में हैं। खरीद शाखा के स्टाफ को छोड़कर बाकी सभी शाखाओं का स्टाफ बदलता रहता है। बैंक में भी आम चर्चा है कि इन लोगों को यहां से बदलना आसान नहीं है। यदि इस शाखा के स्टाफ को बदलकर इसके माध्यम से की गई खरीद की गहन जांच की जाये तो कई चैंकाने वाले खुलासे सामने आ सकते हैं। कुछ लोगों के बारे में तो यहां तक चर्चा है कि उन्होने इतनी संपत्ति इकट्ठी कर ली है जो उनकी आय के स्त्रोत से कहीं अधिक है।
पिछले दिनों बैंक मे हुई भर्तीयों को लेकर भी शेर सिंह चैहान ने गंभीर आरोप लगाये हैं। इन आरोपों का प्रबन्धन की ओर से कोई सार्वजनिक जवाब नहीं आया है। बल्कि चैहान के खिलाफ ही किसी बहुत पुराने मुद्दे को कुरेद कर कुछ निकालने के लिये विजिलैंस को सक्रिय किया गया है। दूसरी ओर माना जा रहा है कि बैंक में खरीद के नाम पर, भर्तीयों के नाम पर और रिपेयर के नाम पर जो करोड़ो के गोल-माल होने की आशंका बैंक में आम चर्चित है उसको लेकर विधिवत शिकायत कभी भी होने की संभावना है। चर्चा है कि शीर्ष प्रबन्धन में बैैठे कुछ बड़े लोगों ने कुछ होटलों और विद्युत परियोजना के लिये दिये गये ट्टणों की वसूली में बैंक को भारी नुकसान पंहुचाया है। इन लोगों ने जो संपत्तियां अर्जित कर रखी है उनको लेकर भी बड़े खुलासे सामने आने की संभावना है।
शिमला/शैल। चार साल के मासूम युग के अपहरण और फिर हत्या के कांड को सुलझाने में सीबीआई को युग के कारोबारी पिता के अपने नौकर के नार्को से ही इन अपराधियों तक पहुचने में सफलता मिली है। इन्ही की शिनाख्त पर युग का कंकाल पानी के उस टैंक से बरामद हुआ है जिसे पीलिया प्रकरण में नगर निगम कई बार साफ करने का दावा कर चुकी है। टैंक की सफाई में यह कंकाल क्यों सामने नहीं आया? इसको लेेकर निगम की सफाई के दावों पर भी सवालिया निशान लग रहा है। और इसी बिन्दु पर सीबीआई ने नगर निगम के खिलाफ भी मामला दर्ज करने की सिफारिश की है। सीबीआई की सिफारिश के बाद शहर की जनता के भी कई वर्गों ने नगर निगम के शीर्ष प्रबन्धन के खिलाफ एफआईआर दर्ज किये जाने की मांग की है। इस कांड ने शहर की जनता को इस कदर हिला दिया है कि जनता अपना रोश प्रकट करने के लिये कैण्डल मार्च तक कर रही है।
लेकिन इस कांड का जो खुलासा अब तक सामने आया है इसके मुताबिक 14-6-2014 को शाम को युग का अपहरण होता है। 16 जून को इसकी एफआईआर दर्ज होती है। 22 जून को ही इस मासूम को टैंक में डूबो कर मार दिया जाता है। लेकिन इस अपहरण को लेकर फिरौती की पहली मांग ही 27 जून को आती है। उसके बाद फिरौती मांगने का सिलसिला चला रहता है। जब युग को 22 जून को ही पानी के टैंक में डूबो दिया गया था तो फिर उसको मारने के बाद फिरौती की मांग क्यों आती है? क्योंकि अगर फिरौती देना मान लिया जाता तो यह लोग युग को कहां से लाकर देते? पुलिस से यह मामला 14-8-2014 को सीआईडी को ट्रांसफर कर दिया जाता है। इस दौरान केवल ठियोग का एक व्यक्ति फोन काॅल करके युग की सूचना देने के लिये 20 लाख की मांग करता है पुलिस इस काॅल को टैªक करके इस व्यक्ति को पकड़ लेती है, गहन पूछताछ करती है। लेकिन कुछ भी महत्वपूर्ण सुराग नहीं मिलता है और अदालत से इसे जमानत मिल जाती है। लेकिन जब तक यह मामला पुलिस के पास रहा इन तीनों अभियुक्तों की तरफ किसी का कोई शक तक नहीं गया। जनवरी 2015 में न्यू शिमला में मोबाइल और लेपटाॅप चोरी का एक मामला घटता है। जिसकी 22 जनवरी 2015 को एफआईआर होती है। इस चोरी की जांच में पुलिस इन अभियुक्तों तक पहुंचती है। 26 मार्च को इन्हें गिरफ्तार किया जाता है। 30 मार्च को इन्हे जमानत मिल जाती है। क्योंकि चोरी का सारा सामान इनसे बरामद हो जाता है। इस चोरी की घटना तक भी युग अपहरण हत्या के संद्धर्भ में यह कहीं शक के दायरे में नहीं आते हैं।
इसके दौरान पुलिस गुप्ता के परिजनों से पूछताछ करती है। लेकिन कहीं कोई सुराग हाथ नहीं लगता है। अन्त में गुप्ता के नौकर का नार्को टैस्ट करवाया जाता है। उस नार्को में चन्द्र का नाम बार बार आता है यहां से चन्द्र शक के दायरे में आता है। चोरी कांड में उसके और उसके साथियों का पकड़ा जाना सामने आता है। चोरी की गिरफ्तारी के दौरान ली गयी जामा तलाशी में इनके मोबाईल बगैरा पुलिस ने अपने कब्जे में ले लेती है और सीआईडी अदालत के माध्यम से इनके मोबाईल पुलिस से हासिल करती है। चन्द्र का मोबाईल गहनता से खंगाला जाता है उससे महत्वपूर्ण सुराग हाथ लगते है और चन्द्र से कड़ी पूछताछ होती है और फिर पूरे प्रकरण की पर्तें खुलती चली जाती हैं और अन्त में ये तीनों आभियुक्त सीआईडी की गिरफ्त में आ जाते हैं।
लेकिन अभी भी इस मामले में ये बिन्दु स्पष्ट नहीं हो पाया है कि जब युग को 22 जून 2014 को ही पानी के टैंक में डुबो दिया था और इनकी ओर कोई शक तक नहीं था फिर उन्होने उसकी मौत के बाद फिरौती मांगने का सिलसिला क्यों शुरू किया? अभी तक सीआईडी के पास इनके अपने ब्यानों के अलावा और कोई ठोस सबूत नहीं है। कंकाल की फाॅरेंसिक जांच और डीएनए टैस्ट के परिणामों से ही इनके ब्यानों के माध्यम से सामने आये पूरे प्रकरण के खुलासे की प्रमाणिकता निर्भर करती है। क्योंकि सामान्यतः यह बात गले नही उतरती है कि कोई व्यक्ति अपहरित की हत्या कर देने के बाद भी फिरौती की मांग जारी रखेगा और इस मामले में तो पुलिस रिकार्ड के मुताबिक फिरौती की मांग ही हत्या के बाद आती है। यदि फिरौती की मांग न आती तो सम्भवतः इस कांड़ पर से पर्दा ही ना उठ पाता। तो ऐसे में जो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या इस अपहरण कांड़ के पीछे यही तीनों लोग थे या इनके पीछे भी कोई और था। सीआईडी को इस मामले को ठोस सजा तक पहुंचाने के लिए अभी ठोस प्रमाण जुटाने होंगे ऐसा माना जा रहा है। बहरहाल पूरे प्रदेश की नजरें इस कांड पर लगी हुई हैं क्योंकि इसमें राजनीति का दखल भी सामने आ गया है।
शिमला/शैल। विधानसभा का यह मानसून सत्र लोक जीवन के गिरते मानकों की एक ऐसी इवारत लिख गया है जो शायद कभी मिट न सके। लोक जीवन में लोक लाज एक बहुत बडा मानक होता है और सत्र में यह लोक लाज तार -तार होकर बिखर गयी। लेकिन इन मानको के वाहक लोक तन्त्र के सारे सतम्भ मूक होकर बैठे रहे। सत्र के पहले ही दिन जब सदन में मुख्य मन्त्री के उस वक्तव्य का मुद्दा आया जिसमें उन्होने कहा था कि भाजपा में एक दो को छोड़ कर कोई भी सदन में आने लायक नही है। यह वक्तव्य खूब छपा था लेकिन जब सदन में बात आयी तो छठी बार मुख्य मन्त्री बने वीरभद्र सिंह सिरे से ही मुकर गये और कहा कि उन्होनें ऐसा कोई वक्तव्य दिया ही नही है। उनके सज्ञांन में तो यह बात आयी ही अब है। यदि अखबारों ने छापा है तो झूठ छापा है। जो कुछ छपता है उसे सूचना तन्त्र मुख्यमन्त्री के सामने रखता है गुप्तचर विभाग भी मुख्यमन्त्री के संज्ञान में ऐसी चीजे लाता है। लेकिन मुख्यमन्त्री का इस सबसे सिरे से ही इन्कार कर देना राजनीतिक, चरित्र को तो उजागर करता ही है। साथ ही पूरे तन्त्र की कार्यशैली ओर विश्वनीयता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर जाता है। पहला दिन इसी हंगामे की भेंट चढ़ जाता है।
सत्र के दूसरे दिन अखबारों में खबर छपी की सीबीआई वीरभद्र के खिलाफ चार्ज शीट तैयार करके अदालत में दायर करने जा रही है। इस खबर पर भी सदन में चर्चा की बात आयी। वीरभद्र और कांग्रेस इस पर चर्चा के लिये तैयार नही थे। वीरभद्र ने उनके खिलाफ चल रही जांच को जेटली, अनुराग, अरूण और प्रेम कुमार धूमल का षड्यंत्र करार दिया। यहंा तक कह दिया कि उनके खिलाफ साजिश करने वालों का मुंह काला होगा। वीरभद्र यहीं नही रूके और यह भी कह दिया कि ऐसी खबरें छापने वाले अखबारों का भी मुंह काला होगा। मुद्दा संवेदनशील था और मुख्यमन्त्री इससे बुरी तरह आहत भी है। अपने राजनीतिक जीवन के सबसे कठिन दौर से गुजर रहे है। जैसे-जैसे वीरभद्र के खिलाफ सीबीआई और ईडी की जांच आगे बढ़ रही है उसका असर सरकार पर पड़ रहा है पूरा प्रशासन चरमरा गया है। निश्चित रूप से यह पूरा मुद्दा एक ऐसे मुकाम पर पहुंच चुका है जहां इसे आसानी से नजर अन्दाज करना संभव नही है केन्द्रिय वित्त मन्त्री और नेता प्रतिपक्ष पूर्व मुख्यमन्त्री तथा उनके सांसद पुत्र पर इसमें षड्यंत्र रचने का आरोप लग रहा है। ऐसे में इस मुद्दे पर सदन के पटल से ज्यादा उपयुक्त मंच चर्चा के लिये और क्या हो सकता है। प्रदेश की जनता को सच्चाई जानने का पूरा हक है। इसके लिये सदन में भाजपा का इस पर चर्चा की मांग उठाना और सत्ता पक्ष के इससे इन्कार करने पर रोष और आक्रोश का उभरना स्वाभाविक था। इसी आक्रोश में रवि ने माईक पर हाथ दे मारा और इसी हंगामे में कार्यवाही समाप्त हो गयी।
तीसरे दिन सदन के शुरू होते ही पिछले दिन की घटना को लेकर रवि के खिलाफ सत्ता पक्ष की ओर से कारवाई की मंाग उठी और स्पीकर ने रवि के निलंबन का आदेश पढ़ दिया। इस पर फिर हंगामा हुआ। दोनो ओर से पूरे प्रहार किये गये। थोडी देर के लिये सदन की कार्यवाही रोक कर इस मसले का हल निकालने का आग्रह आया। आग्रह स्वीकार हुआ कार्यवाही रोकी गयी। इसके बाद जब सदन की कार्यवाही पुनः शुरू हुई तो रवि के माफी मांगने से मामले का पटाक्षेप हो गया। राजनीतिक तौर पर भाजपा के हाथ से मुद्दा फिसल गया। यदि निलंबन जारी रहता तो भाजपा के पास पूरी स्थिति को जनता की अदालत में ले जाने का पूरा पूरा मौका था जो माफी मागने से निश्चित् रूप से कमजोर हुआ है। इसी के साथ जिस बिन्दु पर यह हंगामा आगे बढ़ा और जेटली -धूमल पर षडयन्त्र रचने का आरोप लगा वह यथा स्थिति खड़ा रह गया।
चैथे दिन भी हंगामा रहा है सदन में आये सारे विधेयक बिना किसी बड़ी चर्चा के पारित हो गये। जिन मुद्दो पर जनता ने रोष व्यक्त किया हुआ था और शिमला नगर निगम जैसी चयनित संस्था ने रोष और सुझाव व्यक्त किये थे वह सब सदन में चर्चा का विषय ही नहीं बना। अपने लाभों सहित सब कुछ ध्वनि मत से पारित हो गया। इस पूरे परिदृश्य को यदि पूरी निष्पक्षता से आंका जाये तो राजनीतिक चरित्र का इससे बड़ा हल्कापन और कुछ नहीं हो सकता हैै। मीडिया को कोसने से सच्चाई पर ज्यादा देर तक पर्दा नही डाला जा सकता है लेकिन इसी के साथ मीडिया के लिये भी अपनी भूमिका पर आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता आ खडी होती है।
उच्च न्यायालय के फैंसले के बाद काॅलेज काडर के 80 लेक्चररों का नियमितिकरण लिया वापिस
शिमला/शैल। प्रदेश उच्च न्यायालय ने 11 अप्रैल 2013 को दिये फैसले में कांट्रेक्ट के आधार पर की गयी नियुक्तियों को चोर दरवाजे से की गयी बैक डोर एंट्री करार देते हुए ऐसी नियुक्तियों के नियमितिकरण को अवैध करार दिया है। प्रदेश उच्च न्यायालय ने अपने 69 पन्नों के आदेश में साफ कहा है कि सरकार द्वारा कांट्रेक्ट नियुक्तियों के 9-9-2008 और फिर 8-6-2009 को जारी की नियमितिकरण की पाॅलिसी संविधान की धारा 14 और 16 के प्रावधानों की अनुपालना नही करती है। कर्मचारियों की नियुक्तियों और प्रोमोंशन के लिये संविधान की धारा 309 के तहत नियम बने है। धारा 309 के तहत बने नियमो को सरकार की 9-9-2008 और 8-6-2009 को जारी पॅालिसी को ओवर रूल नही कर सकती है।
स्मरणीय है कि 9-9-2008 और 8-6-2009 को जारी कांट्रेक्ट पालिसी के आधार पर सरकार के हर विभाग में आज तक नियुक्तियां होती आ रही है। सरकार हर वर्ष ऐसी नियुक्तियों का नियमितिकरण भी घोषित करती रही है। काॅलेज काडर के प्रवक्ताओं ने नियमितिकरण के संद्धर्भ में 2009़ में CWP 2336 याचिका दायर की थी। इसके बाद CWP 5047 जब 2010 और CWP 8709 of 2011 उच्च न्यायालय में आयी। उच्च न्यायालय ने इन सारी याचिकाओं को इकट्ठा करके अप्रैल 2013 में इनका एक साथ निपटारा करते हुए कांट्रेक्ट आधार पर की गयी नियुक्तियों के नियमितिकरण को सविंधान के प्रावधानों के विपरीत करार देते हुए अवैध करार दिया है।
प्रदेश उच्च न्यायालय का फैसला अप्रैल 2013 मे आ गया था। लेकिन इस फैसले के बाद भी काॅलेज काडर के कांट्रेक्ट पर रखे गये प्राध्यापकों के नियमितिकरण के आदेश जून 2014 में जारी कर दिये। इन आदेशों का जब चुनौती दी गयी तब अब 18 अगस्त को इस नियमितिकरण के आदेश को वापिस लेते हुए इन प्राध्यापकों कोे पुनः कांट्रेक्ट पर नियुक्त करार दिया है। शिक्षा विभाग स्वयं मुख्यमन्त्री के पास है। ऐसेे में सवाल उठता है कि क्या उच्च न्यायालय का यह फैसला मुख्यमन्त्री के संज्ञान में लाया गया था? क्या मुख्यमन्त्री ने स्वयं इस फैंसले को नजर अन्दाज करने का फैसला लिया? या फिर मुख्यमन्त्री को बताये बिना ही उच्च न्यायालय के फैसले को अगूंठा दिखा दिया गया? अब इस फैसले पर अमल करते हुए काॅलेज काडर के 80 प्रवक्ताओं पर गाज गिरा दी गयी है। लेकिन जिन अधिकारियों ने यह कारनामा कर दिखाया है क्या उनके खिलाफ भी कोई कारवाई हो पायेगी? कांट्रेक्ट पर नियुक्तियों का चलन आज भी जारी है जबकि प्रदेश उच्च न्यायालय के फैसले के मुताबिक ऐसी नियुक्तियों का नियमितिकरण नही किया जा सकता है।
14. After hearing learned counsel for the parties and perusing the contents of the record, the private respondents before us in CWP No. 2336 of 2009 have not been able to prove that their appointments were made after observing the provisions of Articles of 14 and 16 of the Constitution. The regularization policy, dated 9.9.2008 (Annexure P-3), appears to have not been issued in consonance to the settled position of law by Supreme Court in Umadevi’s case (supra). The policy dated 9.9.2008 and subsequent communication dated 8.6.2009 also appear to have been made by way of executive instructions, as such, the circulars dated 9.9.2008 and the communication letter dated 8.6.2009 cannot over-ride the rules framed under Article 309 of the Constitution. These circulars cannot be treated to be substitute of the rules for State Government for regularization and the circulars, mentioned above, as such, being in the teeth of the settled position of law by Hon’ble Supreme Court in Umadevi’s case (supra), these are not legally sustainable for regularizing the private respondents. The respondent / State is expected to make appointments and regularize the services of private respondents in consonance to the Recruitment & Promotion Rules framed under Article 309 of the Constitution.
In view of the above observations, CWP No.2336 of 2009 is disposed of.
15. In view of the analysis, made herein-above, no mandamus or direction of any kind can be issued for regularization of the petitioner in CWP No.5047 of 2010 as well as writ petitioner in CWP No.8709 of 2011, as such, these writ petitions are dismissed.