Thursday, 15 January 2026
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बिना अध्यक्षों के कब तक चलेंगे सूचना एंवम शैक्षणिक नियामक आयोग

प्रदेश की वरिष्ठ नौकरशाही की कार्य प्रणाली सवालों में 

शिमला/शैल। अभी 30 नवम्बर को सेवानिवृत होकर पहली दिसम्बर को मुख्यमन्त्री के प्रधान निजि सचिव की पत्नी मीरा वालिया ने निजि शैक्षणिक संस्थानों के लिये बने रैगुलेटरी कमीशन में बतौर सदस्य पदभार ग्रहण कर लिया है। सदस्य के रूप में मीरा वालिया का चयन करीब पांच छः माह पहले हो गया था। लेकिन उन्होने ने सेवानिवृति के बाद ही नया पदभार संभालने को अधिमान दिया ताकि उन्हे इस आयोग में पूरे तीन वर्ष का कार्याकाल मिल जाये। मीरा वालिया के पदभार संभालने के साथ ही इस नियामक आयोग के सदस्यों की संख्या दो हो गयी है। लेकिन अभी तक इस आयोग के अध्यक्ष का पद खाली चल रहा है और करीब एक वर्ष से यह पद खाली है। इस पद को भरने के लिये अलग से आवेदन मांगने की आवश्कता होगी और इसके लिये इसे अलग से विज्ञापित करना होगा।
इस रैगुलेटरी कमीशन की तरह मुख्य सूचना आयुक्त का पद भी करीब एक वर्ष से खाली चल रहा है। इस पद को भरने के लिये आवेदन भी आमन्त्रित कर लिये गये थे। लेकिन इसके चयन के लिये चयन कमेटी का गठन नही किया गया और यह पद खाली चल रहा है। मुख्य सूचना आयुक्त का कार्यकाल पांच वर्ष है और यह पद उच्च न्यायालय के न्यायधीश के समकक्ष है और यहां से सेवानिवृति के बाद उसी तर्ज पर उसे लाभ मिलते हैं इसलिये इस पद के लिये कई बड़ो की नजर रहना स्वभाविक है। इस पद के चयन के लिये जो कमेटी गठित होती है उसमे मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और मुख्यमन्त्री द्वारा मनोनीत एक वरिष्ठ मन्त्री/चयन बहुमत से होता है। तो स्वाभाविक है कि जिसे मुख्यमंत्री चाहेंगे वही इस पद को हासिल करेगा।
एक वर्ष से यह पद खाली चल रहा है। इसके लिये आवदेन आमन्त्रित कर लिये जाने के बाद भी चयन नही किया गया है। स्वाभाविक है कि इस पद पर किसी की नजर है जिसके लिये इस पद को अभी तक खाली रखा गया है। सचिवालय के गलियारों की चर्चाओं को यदि अधिमान दिया जाये तो इस पद पर मुख्य सचिव वीसी फारखा आयेंगे क्योंकि मुख्य सचिव के लिये जिस तरह से अपने वरिष्ठों को पछाड़ कर वह इस पद पर काबिज होने में सफल हुए हैं उससे यही संकेत उभरते हैं। फारखा के लिये इस पद को एक बार फिर विज्ञापित करना होगा क्योंकि उन्होने पहले इसके लिये आवदेन नही कर रखा है। माना जा रहा है कि इस प्रक्रिया को पूरा होने में 2017 के मई जुन तक का समय लगा दिया जायेगा। क्योंकि इसा दौरान लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष का पद खाली होगा।
ऐसे में लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष का पद मुख्य सूचना आयुक्त और रैगुलेटरी कमीशन के अध्यक्ष का पद सब एक साथ भरे जायेंगे और तीन विश्वस्तों को यहां बिठा दिया जायेगा। इसी के साथ नया मुख्य सचिव भी एक अन्य विश्वस्त बन जायेगा। इस सब में जो नाम चर्चा में चल रहे हैं उनमें सीआईसी के लिये फारखा लोक सेवा आयोग के लिये नरेन्द्र चौहान रैगुलेटरी कमीशन के लिये वी एन एस नेगी और मुख्य सचिव के लिये तरूण श्रीधर शामिल हैं। लेकिन कानूनी हल्कों में इन दिनों एक चर्चा यह चल रही है कि क्या कोई कमीशन अध्यक्ष के बिना हो सकता है। कानून के जानकारों के मुताबिक मुख्य सूचना आयुक्त बिना सूचना आयोग नही हो सकता। रैगुलेटरी कमीशन को तो पहले ही चुनौती दी जा चुकी है। प्राईवेट शैक्षणिक संस्थानों ने चुनौती दी है मामला सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है। इधर इतने समय तक इस पद के खाली रखे जाने से इस आयोग की आवश्यकता पर स्वतः ही प्रश्न चिन्ह लग जाता है। फिर यही कहीं भाजपा ने प्रशासनिक अकर्मणयता के नाम पर इन खाली पदों पर दिये अपने आरोप पत्र में सवाल उठा दिया तो स्थिति एकदम बदल भी सकती है। क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय में प्रदेश सरकार उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ अपील में गयी हुई है और सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले पर स्टे लगा रखा है। अब यह मामला कभी भी सुनवाईे के लिये आ सकता है। अब तक प्रदेश में जितने भी प्राईवेट विश्वविद्यालय खोलने के लिये हर विश्वविद्यालय के नाम से एक अलग से एक्ट लाया जाता है। अब तक प्रदेश मे जितने भी प्राईवेट विश्वविद्यालय खुले हैं उनके किसी के भी एक्ट में यह प्रावधान नही किया गया है कि यह विश्वविद्यालय नियामक आयोग द्वारा कंट्रोल किया जायेगा। अब जब इस आयोग के अध्यक्ष का पद ही करीब एक वर्ष से खाली चल रहा है तो सरकार इसकी अनिवार्यता का औचित्य कैसे प्रमाणित कर पायेगी। अब यह सवाल चर्चा का विषय बनता जा रहा है।
इसी तरह अभी वीरभद्र सरकार ने पुलिस में सेवा निवृति से एक दिन पूर्व 1988 के बैच के आईपीएस अधिकारी वीएनएस नेगी को डीजीपी पदोन्नत करने से पूरे आईपीएस और आई ए एस हल्कों में यह पदोन्नति चर्चा का विषय बन गयी है। पुलिस में तो सबसे वरिष्ठ अधिकारी सोमेश गोयल ने तो वाकायदा अपना रोष व्यक्त करते हुए भारत सरकार के गृहमन्त्रालय को पत्र तक भेज दिया है। उनका आरोप है कि इन पदोन्नतियों में सर्विस नियमों की पूरी तरह अवहेलना की गयी है। सोमेश गोयल की वरियता को भी नजर अन्दाज करके उन्हे डीजीपी स्टेट नही बनाया गया था। उनके कनिष्ठ संजय कुमार को डी जी पी तैनात करते समय गोयल को भी डी जी पी प्रोमोट तो कर दिया गया परन्तु उन्हे अपैक्स स्केल नही दिया गया। अब नेगी को पदोन्नत करके उन्हे सेवा निवृति से पूर्व यह लाभ दे दिया गया है। इस समय पुलिस में डी जी पी स्तर के चार अधिकारी हो गये हैं।
दूसरी ओर आई पी एस 1988 बैच के अधिकारी को डी जी पी प्रोमोट करने से आई ए एस में भी इसी गणित पर पदोन्नतियों की मांग उठने की संभावना खडी हो गयी है। आई ए एस में अभी 1987 बैच के अधिकारियों को भी अतिरिक्त मुख्य सचिव नही बनाया गया है। 1987 बैच के ए जे वी प्रसाद भी सेवा निवृति के मुकाम पर पहुंच गये हैं इस नाते आई ए एस में भी पुलिस की तर्ज पर पदोन्नति की मांग उठना स्वाभाविक है।

नोटबंदी के बाद अंबूजा सीमेन्ट ने मजदूरों को निकालने के लिये गेट पर चिपकाये नोटिस

78 मजदूर निकाले गये और अन्य की तैयारी

शिमला/शैल। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नोटबंदी घोषणा के बाद प्रदेश के सबसे बडे़ सीमेंट कारखाने अंबूजा में कार्यरत मजदूरों को काम से निकालने का काम शुरू हो गया है। स्मरणीय है कि अंबूजा सीमेन्ट में मजदूरी का सारा काम ठेकेदारों के माध्यम से अन्जाम दिया जाता रहा है। अब इन्ही ठेकेदारों के नाम से मजदूरों सेपरेशन स्कीम के तहत काम से हटाने के नोटिस कंपनी के गेट पर चिपका दिये गये हैं। अब तक 78 लोगों को काम से हटा दिया गया है और अन्य के भविष्य पर तलवार लटक गयी है। काम से हटाने के लिये जो नोटिस  जारी किये गये हैं उनमें कहा गया है कि अब उनके पास काम नही रहा है और भविष्य में भी काम होने की संभावना नही है। ऐसे में बिना काम के मजदूरों को वेतन दे पाना संभव नहीं है। लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया जा रहा है कि अचानक काम में कमी कैसे आ गयी है? या फिर इसके पिछे कोई और खेल खेला जा रहा है। 

प्रदेश के लेवर विभाग का इस बारे में कहना है कि वह इस संबध में कुछ नहीं कर सकता है। क्योंकि सीमेंट उद्योग केन्द्र सरकार की कन्ट्रोल्ड सूची में आता है। इस कारण सीमेन्ट उद्योग में कार्यरत लेवर के बारे में भी केन्द्र का लेवर विभाग ही इसका सज्ञांन ले सकता है। इसके लिये पीड़ित मजदूरों को केन्द्र के डिप्टी चीफ लेवर कमीशनर चण्डीगढ़ के पास ही अपनी याचिकाएं दायर करनी होगीं। प्रदेश के लेवर विभाग को मजदूरों को निकाले जाने के बारे में कोई जानकारी ही नही है। उधर अबुंजा में मजदूरों के अन्दर बहुत रोष व्याप्त हो चुका है और मजदूर अपने भविष्य के लिये किसी भी हद तक जाने को तैयार हो गये हैं। प्रबन्धन ने इस स्थिति से निपटने के लिये पुलिस बल भी तैनात करवा दिया है। 

फोरलेन सर्वे में धांधली, ग्रामीणों ने सरकार को भेजी शिकायत

बंगाणा/शैल। ऊना जिले के बंगाणा उपमण्डल में बंगाणा से शांतला राष्ट्रीय उच्च मार्ग घोषित हुआ है। इस उच्च मार्ग के लिये इन दिनों सर्वे का काम चला हुआ है। जिस ढंग से यह सर्वे किया जा रहा है उससे कुछ गांवो में भारी रोष पनप उठा है और यदि शासन-प्रशासन ने लोगों की जायज समस्या का निराकरण न किया तो यह रोष क्या शक्ल ले लेगा यह अन्दाजा लगाना कठिन है। समलाडा गांव के लोगों ने इस संबध में स्थानीय प्रशासन से लेकर मुख्यमंत्री तक को इस संबध में शिकायत भेजी हैं लोगों का आरोप है कि फोरलेन के लिये सड़क को चैड़ा करने का जो काम होना है उसके लिये जहां सरकारी भूमि उपलब्ध है पहले उसका उपयोग करने की बजाये जानबूझ कर लोगों की उपजाऊ जमीन को लिया जा रहा है। सड़क के लिये जहां पुली आदि का निमार्ण होना है उसके लिये सरकारी भूमि को न लेकर निजि भूमि को लिया जा रहा है। लोगों का आरोप है कि सर्वे में लगे कर्मचारी/अधिकारी जानबूझ कर कुछ लोगों को लाभ और कुछ को नुकसान पहुुंचाने का काम कर रहे हैं इससे लोगों में भी तनाव का माहौल बनता जा रहा है।





























बंगाणा अनुराग ठाकुर के संसदीय क्षेत्र हमीरपुर का एक अहम हिस्सा है। उन्ही के प्रयासों से यह राष्ट्रीय उच्च मार्ग

स्वीकृत हुआ है। इस समय यहां के विधायक भी भाजपा के वीरेन्द्र कंवर हैं। लोगों को शिकायत है कि वह भीे इस जायज समस्या को हल करने की बजाये इससेे जुडे़ कुछ लोगों का अपरोक्ष में सहयोग दे रहे हैं। इस फोरलेन में इसी गांव की सबसे ज्यादा उपजाऊ जमीन जा रही है जिसके लिये प्रभावितों में रोष होना स्वाभाविक है।

महिलाओं की शिकायत पर अदालत के निर्देशों के बावजूद एफआईआर दर्ज नही हुई

शिमला/शैल। क्या हमारीे पुलिस अभी तक महिलाओं के प्रति असंवेदनशील है? क्या पुलिस पर अदालत के निर्देशों का भी कोई असर नही पड़ता है? क्या सरकार कोई समाधान आदि के सारे दावों की जमीनी हकीकत बिल्कुल निराशाजनक है? यह सवाल मनाली की दो बहनों की व्यथाकथा से उभर कर सामने आये है। शैल को मिले इनकी व्यथाकथा के ब्यौरे से पूरी व्यवस्था पर ंगभीर सवाल खड़े हो जाते है। मनाली थाना के एसएचओे और मनाली के एसडीएम को दो महिलाओं पुष्पलता और पूर्णिमा ने 19.1.2016 को एक लिखित शिकायत देकर दोषियों के विरूद्ध मामला दर्ज करके कारवाई करने की गुहार लगायी। इनकी शिकायत थी कि शिनाग गंाव की टीकम राम और जीया गांव के देशराज ने इनके पिता अली राम और इनके साथ करीब एक करोड़ की धोखाधड़ी की है। जिसमें इन लोगों ने इनके ही किसी रिश्तेदार के नाम से झूठी पावर आफ अटार्नी बनाकर बडुआ गांव स्थित इनका बागीचा 6 लाख 90 हजार रूपये में बेच दिया है। जबकि रिश्तेदार को जिस गांव का रहने वाला बताकर पावर आॅफ अटार्नी बनायी गयी है उस गांव में उनका रिश्तेदार कभी रहा ही नहीं है।
एक आदमी का इस तरह का षडयंत्र करके बागीचा बेच दिया जाये तो स्वभाविक है कि वह इसकी शिकयत लेकर सबसे पहले पुलिस और प्रशासन के पास ही जायेगा। यह महिलाएं भी अपने पिता के साथ हुई धोखाधड़ी की शिकायत लेकर एसएचओ मनाली और एसडीएम मनाली के पास गयी। 19.1.2016 को दी गयी इस शिकायत पर 18.5.2016 को इन महिलाओं को डीसीपी मनाली के कार्यालय में बुलाया गया। वहां पर इनके ब्यान दर्ज किये गये लेकिन दोषीयों के खिलाफ एफआईआर दर्ज नही हुई। मुख्यमंत्री को भी फैक्स करके शिकायत भेजी। कुछ मन्त्रीयों से भी फरियाद की। लेकिन कहीं से कोई कारवाई नहीं हुई। इसकेे बाद हारकर 9.9.2016 को सीआरपीसी की धारा 156 (3) के तहत मनाली में अदालत का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने 12.9.2016 को मामला दर्ज करने और जांच रिपोर्ट अदालत में पेश करने के निर्देश जारी किये। लेकिन इन निर्देशों के बाद भी पुलिस हरकत में नही आयी। करीब सात लाख में बागीचा षडयंत्र करके बेच दिया जाता है। ऐसा करने वालों के खिलाफ पुलिस अदालत केे निर्देशों के बाद भी मामला दर्ज नहीं करती है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि ऐसे संगीन अपराध को पुलिस क्यों दबा रही है। क्या पुलिस पर किसी का दवाब है?
ल्ेकिन सवालों से हटकर व्यवस्था पर जो सवाल खड़े होतेे है वह बहुत गंभीर है। 1978 में सर्वोच्च न्यायालय ने याचिका संख्या 101 of 1978 में 9.4.1978 को पुलिस को निर्देश जारी किये है कि महिलाओं को पुसिल स्टेशन में न बुलाया जाये। बुलाये की बाध्यता में स्पष्ट कहा गया है कि सूर्यास्त के बाद तो कदापि नहीं। पुलिस के पास आने वाली हर शिकायत पर एक एफआईआर दर्ज किया जाना अनिवार्य है। यदि शिकायत एफआईआर दर्ज करने लायक नहीं पायी जाती है तो उसके कारण सात दिन के भीतर रिकार्ड पर लाकर उसकी सूचना शिकायतकर्ता को देनी होगी। सत्यनारायण बनाम स्टेट आफॅ राजस्थान में 25.9.2001 को सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्देश जारी किये है। परन्तु इन निर्देशों की अनुपालना न किया जाना पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता को ही कठघरे में खड़ा कर देता है। इस मामले में सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत मामला दर्ज किये जाने के निर्देशों के बाद भी एफआईआर दर्ज न किया जाना और वह भी महिला शिकायतकर्ताओं के मामलों में यही दर्शाता है कि अभी भी हमारी पुलिस महिलाओं के बारे मे पूरी तरह असंवेदनशील है।

सदन में प्रभावी चर्चा से बचने के लिये करतें है वीरभद्र अभद्र टिप्पणीयां-धूमल

शिमला/शैल। विपक्ष के नेता प्रेम कुमार धूमल ने कहा कि विधानसभा में चर्चा से बचने के लिए मुख्यमंत्री अभद्र टिप्पणियां करते हैं। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह द्वारा सांसद अनुराग ठाकुर पर की गई टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि आज तक का इतिहास देखें, हर सत्र से पहले अभद्र टिप्पणियां की जाती है, जिसके कारण भ्रष्टाचार जैसे विकास के ठप्प होने के बारे में और सरकार के हर फ्रंट पर असफलता के बारे में चर्चा नहीं हो। प्रयास किया जाता है कि भावनाओं को भड़काया जाए, माहौल खराब किया जाए, ताकि चर्चा न हो। और शोरगुल में सत्र की औपचारिकता हो जाए। वह शिमला में पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि जितनी जिसकी सोच होती है, उतना आदमी बोलता है। लोढा कमेटी व कोर्ट जो भी निर्णय करते हैं क्या इनको बता कर करते हैं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री ऐसी टिप्पणी किस आधार पर कर रहे हैं। याद रहे मुख्यमंत्री ने कहा था कि अनुराग ठाकुर की बीसीसीआई से छुट्टी होने वाली है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में भ्रष्टाचार का मुद्दा सबसे बड़ा है। साथ ही सरकार की असफलताएं, माफियाराज हैं।
एक सवाल के जवाब में धूमल ने कहा कि भाजपा भौरंज उपचुनाव के लिए तैयार है तथा पार्टी की इसमें जीत होगी। इसके अलावा भाजपा नगर निगम शिमला के चुनावों में भी जीत दर्ज करेगी। उन्होंने कहा कि भाजपा की चार्जशीट में वह सभी अधिकारी व राजनीतिज्ञ शामिल होंगे जो भ्रष्टाचार में संलिप्त हैं। चार्जशीट 24 या 25 दिसम्बर को सरकार के चार साल पूरे होने के अवसर पर राज्यपाल को सौंपी जाएगी तथा राष्ट्रपति को राज्यपाल के माध्यम से भेजी जाएगी। उन्होंने कहा कि हाल ही के कुछ वर्षों में दुर्भाग्यवश राजनीति में ब्यानबाजी का स्तर नहीं रहा। लोकतंत्र में आलोचना होती है, लेकिन यह तथ्यात्मक होनी चाहिए।
धूमल ने कहा कि वर्तमान सरकार के समय में अधिकारियों पर दबाव है। इस कारण कुछ अधिकारी बिमार पडे़ हुए हैं। लेकिन कुछ अधिकारियों ने साहस दिखा तथा आत्मस मान व भ्रष्टाचार से समझौता नहीं किया। उन्हें थोड़े समय के लिए अपमान व अनदेखी का सामना करना पड़ा, लेकिन लोगों की नजर में उनका कद बढ़ा है। ऐसे अधिकारियों को भाजपा सत्ता में आने पर सम्मानित करेगी, ताकि हमारी सरकार भी यदि कोई गलत काम करे तो वह उसका भी विरोध कर सके।
धूमल ने कहा कि भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने वाले संस्थानों को महत्व व बल दिया जाएगा। इसी कड़ी में विजीलेंस का पुनर्गठन करेंगे तथा उसे स्वायत्ता देने का प्रयास किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि पुराने नोट बदलने का भी एक नया सकैंडल सामने आएगा। केवाईसी के माध्यम से जो नोट बदले हैं, पता चल रहा है कि इसका कार्ड होल्डर को पता नहीं है। इस मामले में कहां-कहां धांधलियां हुई है, वह सभी सरकार के ध्यान में होगी। एक सवाल के जवाब में धूमल ने कहा कि नोटबंदी को लेकर हिमाचल में स्थिति सामान्य है। उन्होंने कहा कि प्रदेश के कांग्रेसी नेताओं ने पहले इसका स्वागत करते हुए इसे भ्रष्टाचार को समाप्त करने वाला कदम कहा तथ अब वह इसका विरोध कर रहे हैं।
एक अन्य सवाल के जवाब में प्रेम कुमार धूमल ने कहा कि शौचमुक्त राज्य घोषित करने से पहले सच्चाई का पता लगा लेना चाहिए था। उन्होंने कहा कि यह सरकार झूठी घोषणा के लिए जानी जाती है। क्षणिक वाहवाही के लिए प्रदेश की जनता को गुमराह कर रहे थे। केंद्र व विश्व को भी गुमराह किया। इस सारी प्रक्रिया में प्रदेश को बदनाम किया है। हर तरफ लोग कह रहे हैं कि यह झूठा दावा है। सरकार की साख दाव पर लग गई है।
बीबीएमबी मामले पर धूमल ने कहा कि प्रदेश सरकार के अधिकारी अपना पक्ष प्रभावी तरीके से नहीं रख पाए। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार ने इस मामले में नालायकी दिखाई है, जो इनकी असफलता का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि यूपीए व हिमाचल सरकार ने इस मामले को लटकाया।

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