शिमला/शैल। वामपंथियों ने वीरभद्र सिंह सरकार पर साल से ज्यादा समय से शोंगटोंग पाॅवर प्रोजेक्ट से निकाले मजदूरों की बहाली को लेकर हाईकोर्ट व लेबर कोर्ट आदेशों की पालना न करने पर हिमाचल पावर काॅरपोरेशन के कार्यालय में वार्ता के लिए गए वामपंथी नेताओं व कार्यकर्ताओं को गिरफतार कर बसों व थानों में सादी वर्दी में पुलिस वालों से पिटवाने का बेहद संगीन इल्जाम लगाया हैं।
माकपा के प्रदेश सचिवालय सदस्य टिकेंद्र पंवर ने कहा कि ये खतरनाक प्रवृति है। सिविल सोसायटी को इसका संज्ञान लेना चाहिए। उन्होंने सरकार से जानना चाहा कि वो इस तरह की हरकतें कर क्या साबित करना चाहती हैं। टिकेंद्र पंवर बीते रोज हिमाचल पाॅवर कारपोरेशन में गए वामपंथी नेताओं राकेश सिंघा व बाकी कार्यकर्ताओं को अरेस्ट करने व सादी वर्दी में पुलिस के जवानों से इन्हें पिटवाने को लेकर वीरभद्र सिंह सरकार को आगाह कर रहे थे। टिकेंद्र पंवर ने कहा कि माकपा व सीटू इस जंग को गलियों तक ले जाएगी।
उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट व लेबर कोर्ट के आदेशों की अनुपालना नहीं की जा रही है व ये सब सरकार के इशारे के बिना संभव नहीं हैं। इस प्रोजेक्ट में कांग्रेस पार्टी, सरकार व नौकरशाहों का गठजोड़ मजदूरों के हकों पर डाका डाल कर अपनी झोलियां भर रहा है। सरकार की ये मिलीभगत खतरनाक है। टिकेंद्र पंवर ने कहा कि प्रदेश की विभिन्न जेलों में महीनों से बंद 57 मजदूरों की रिहाई का इंतजार कर रहे हैं। आखिर उन्हें जेलों में क्यों रखा गया हैं, उन्होंने अपराध कौन सा किया हैं। कत्ल और रेप के आरापियों को जमानत मिल जाती हैं लेकिन ये महीनों से प्रदेश की अलग-अलग जेलों में पड़े हैं। उनके परिवारों का क्या हो रहा है क्या ये सरकार को मालूम है?
इस मौके पर माकपा सचिवालय के एक अन्य वरिष्ठ सदस्य कुलदीप सिंह तंवर ने कहा कि इस प्रोजेक्ट की 1006 करोड़ की डीपीआर बनी थी जबकि पटेल कंपनी इसकी बोली 1000 करोड़ रुपए लगाकर ठेका हासिल किया था। ऐसे में मजदूरों की मजदूरी पर कट लगाया जा रहा है।
मेयर व माकपा नेता संजय चैहान ने कहा कि बीते रोज पुलिस के दबाव में माकपा व सीटू नेताओं को उठा ले गए। सरकार आंदोलन को कुचलना चाहती हैं। वो इसमें कामयाब नहीं होगी।
उधर सीटू ने इस मसले पर आज डीसी आॅफिस के बाहर प्रदर्शन किया। सीटू नेताओं ने कहा कि श्रम कानूनों को लागू करवाना सरकार का दायित्व है। वहां पर कार्यरत मजदूरों को न तो न्यूनतम वेतन दिया जाता है, न ई. पी. एफ. काटा जाता है और न ही कोई छुट्टी दी जाती है। ई. पी. एफ. आयुक्त व लेबर कमीशनर ने हाई कोर्ट को दिए हलफनामे में कहा है कि कम्पनी में श्रम कानून लागू नहीं हो रहा है। यहां तक कि प्रदेश सरकार की शह पर पटेल कम्पनी और एच. पी. सी. एल. 18 मई 2016 को लेबर कोर्ट व 20 सितम्बर 2016 के हाईकोर्ट के आदेश को भी नहीं मान रहे है। ऐसे में गिरफतार तो इनकी होनी चाहिए।
एच. पी. सी. एल. के समयानुसार जब मजदूर व नेतृत्वकारी साथी बातचीत करने गए तो 5 घंटे तो उनको वहां पर बैठाकर रखा गया व उनसे कोई बातचीत नहीं की गई। मजबूर होकर मजदूरों को प्रदर्शन करना पड़ा।
शिमला/शैल।
प्रदेश में ड्रग्स अपराध हर साल बढ़ते जा रहे है लेकिन इनमें पकडे गये अपराधियों में से केवल 35% को ही सजा मिल पा रही है और शेष 65% अदालत में जाकर छुट जा रहे है। यह खुलासा मुख्य सचिव वीसी फारखा ओर डीजीपी संजय कुमार द्वारा बुलायी गयी सांझी पत्रकार वार्ता में रखे गये आंकड़ो से सामने आया है। इन आंकड़ो के मुताबिक 2016 में 929 मामले दर्ज किये गये हैं जबकि 2015 में यह संख्या 622 और 2014 में 644 थी। ड्रग्स माफिया ने प्रदेश के काॅलिज़ों से लेकर स्कूलों तक पांव पसार लिये है। कुल्लु, चम्बा, कांगडा, ऊना और शिमला में यह अपराध लगातार बढ़ता जा रहा है। शिमला के तो हर थाने में ड्रग्स के मामले दर्ज है। कई विदेशी ड्रग्स के साथ पकड़े गये हैं। 2016 में 377 किलो चरस, 27 किलो अफीम और 90 किलो गांजा बरामद किया गया है। कुल्लु पुलिस ने अभी पिछले दिनों एक नाईजीरिया के नागरिक से डेढ़ किलो हेरोईन और अमेरिका के नागरिक से 126 किलो गांजा, 10 किलो हशीश तेल बरामद किया है।
प्रदेश में इन अपराधोें में
विदेशीयों का पकड़ा जाना यह प्रमाणित करता है कि यह विदेशी अपनेे स्थानीय संपर्को के माध्यम से ही इन अपराधों को अंजाम दे रहें है क्योंकि किसी विदेशी के लिये अपने स्थानीय संपर्क के बिना इस तरह के अपराध को अंजाम दे पाना संभव ही नही है। प्रदेश की पुलिस एक लम्बे अरसे से भांग और अफीम के पौधों को उजाड़ने की मुहिम चलाती आ रही है लेकिन इसका कोई बड़ा असर देखने को नहीं मिल रहा है। बल्कि हर साल यह मुहिम एक रस्म अदायगी बनकर रह रही है। चरस, गांजा और अफीम के अतिरिक्त अब नशे के कैपस्यूल और कई तरह की गोलीयां भी दवा विक्रेताओं के पास मिल रही है। मीठे जहर का यह कारोबार लगातर फैलता जा रहा है। इस अपराध के बढ़ते आंकड़ो से इस धारणा को बल मिल रहा है कि जिस अपराध और अपराधी को परोक्ष/अपरोक्ष में सत्ता का संरक्षण प्राप्त होता है वही नही पकड़ा जाता है। इस अपराध में पकडे जाने वाले 65% अपराधीयों को अदालत में सजा न मिल पाना भी इसी धारणा को पुख्ता करता है क्योंकि अपराधी को अदालत में सजा़ दिलाना और उसके लिये पुख्ता साक्ष्य जुटाना पुलिस की जिम्मेदारी है। जब मामले में कुछ कमियां रहेगी तभी अदालत में अपराधी को इसका लाभ मिलेगा और वह छूट जायेगा।
लेकिन अब तक पुलिस इस अपराध से परोक्ष/अपरोक्ष में जुड़े बड़े आकाओं तक नही पहुंच पा रही है। पुलिस को इस तरह का सुराग अब तक नही मिल पाया है। जबकि 2011 में एक पुलिस कर्मी कमल देव ठाकुर ने अपने स्थानान्तरण को लेकर प्रदेश उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की थी उसमें यह लिखा गया था । As per the record of the police it is revealed that the petitioner had detected about 54 (fifty four cases) of unmasking illegal smuggling of drugs, Liquor, and mafias who were actively involed in this illegal business with the blessing of big bosses at higher echelons.कमल देव को सरकार अपराधिक अन्वेषण में साहसिक भूिमका निभाने के लिये 15 अप्रैल को हिमाचल दिवस के अवसर पर सम्मानित भी कर चुकी है। उसने हमीरपुर में इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया है जिससे कई बड़े लोग उससे अप्रसन्न हो गये थे उसने हमीरपुर के राजनेता पर गंभीर आरोप लगाये है। लेकिन शीर्ष पुलिस प्रशासन ने इस पुलिस कर्मी के माध्यम से उस राजनेता तक पहुंचने का प्रयास करने की बजाये उसे ही प्रताड़ित किया। इसी तरह जुलाई 2014 में ऊना के हरोली थाना क्षेत्रा के तहत एक दवा विक्रेता पर तीन दिन तक पंजाब पुलिस ने छापामारी करके बड़ी मात्रा में मादक पदार्थ पकड़े। हरोली थाना की भूमिका इस मामले में काफी विवादित रही है जिसके कारण पूरा थाना ट्रांसफर किया गया था। इस क्षेत्र के एक युवक की मादक पदार्थो के सेवन के कारण मौत हो गयी थी। स्थानीय लोगों ने इस पर दो दिन भारी प्रदर्शन किया था। लेकिन पुलिस यहां भी स्थानीय संपर्को तक नही पहुंच पायी। शिमला के ठियोग थाना में दर्ज एक एनडीपीएस मामले में एक नेता के साथ जुडे लोगों पर शिकायतकर्ता ने आरोप लगाये हैं। ऐसे बहुत सारे प्रकरण है जिनके माध्यम में एक पुलिस बड़े लोगों तक पहुंच सकती थी लेकिन ऐसा हो नही पा रहा है।
इस परिदृश्य में मुख्यसचिव और डीजीपी ने इस अपराध को लेकर जो चिन्ता ओर गंभीरता दिखाई है उसके तहत सरकार ने भांग व अफीम की खेती को उखाड़ने के लिए एनजीओ, पंचायती राज संस्थाओं और नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूूूूरो को शामिल कर बड़ा अभियान चलाने जा रही हैं। नारको सेल में अलग अलग रेंज में तीन डीएसपी तैनात कर दिए हैं इसके अलावा आईजी व डीआईजी के साथ भी डीएसपी तैनात किए जा रहे हैैं। अगर जरूरत पड़ी तो अलग से सेल खोलने का भी इरादा हैं। चुनावी साल में चीफ सेक्रेटरी फारका ने सरकार का इरादा साफ कर दिया हैं। चूंकि इस साल चुनाव होने हैं व विपक्षी पार्टी ड्रग्स के संवेदनशील मसले पर सरकार को न घेर दे इसलिए सरकार ने पहले ही अपने टाॅप बाबू आगे कर दिए हैं। लेकिन इन टाॅप बाबूओं का ज्यादा फोकस भांग व अफीम की खेती तबाह करने में है जबकि प्रदेश में बाकी ड्रग्स पांव फैला चुकी हैं।
शिमला/शैल। मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह और पूर्व मुख्यमन्त्री एंवम् नेता प्रतिपक्ष प्रेम कुमार धूमल के परिवारों में एक लम्बे अन्तराल के बाद फिर से वाक्युद्ध शुरू हो गया है। इस वाक्युद्ध में अन्तिम जीत किसको मिलती है यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। लेकिन इतना तय है कि अब यह युद्ध निर्णायक मोड़ पर पहुंचने वाला है। वीरभद्र ने इस शासनकाल के पहले ही दिन से धूमल परिवार और धूमल शासन के खिलाफ अपनी सारी ऐजैन्सीयां तैनात कर दी थी। एचपीसीए वीरभद्र की विजिलैन्स का एक मात्रा मुद्दा बन गया था। आधी रात को एचपीसीए की संपत्तियों के खिलाफ जांच अभियान छेडा गया। शिकायतकर्ता को धर्मशाला में ही सरकार ने उप महाधिवक्ता के पद से नवाजा। लेकिन आज तक वीरभद्र और उनकी विजिलैन्स को एक भी मामले में सफलता नही मिल पायी है। बल्कि ए.एन.शर्मा के मामले में सर्वोच्च न्यायालय तक हार का मुहं देखना पडा। अब योग गुरू बाबा रामदेव के मामले में तोे पूरा मन्त्रिमण्डल फजीहत के कगार तक पहुंच गया है।
वीरभद्र ने अवैध फोन टेपिंग प्रकरण में तो यंहा तक आरोप लगाया था कि उनका फोन टेप किया गया है। हर रोज फोन टेपिंग मामले में वीरभद्र दोषियों को सजा दिलाने के दावे करते रहे परन्तु यह सब दावे हवाई सिद्ध हुए। तत्कालीन डीजीपी मिन्हास को कब्र से खोद निकालने के दावे करते रहे लेकिन इन दावों का कोई परिणाम नही निकला। लेकिन इसी दौरान वीरभद्र के खिलाफ यूपीए शासन में ही शुरू हुए मामले को जब प्रशांत भूषण ने दिल्ली उच्च न्यायालय के माध्यम से सीबीआई और ईडी में मामले दर्ज होने के मुकाम पर पहुंचा दिया तो वीरभद्र ने इसे धूमल जेटली और अनुराग का षडयन्त्र करार दे दिया। इन लोगों के खिलाफ मानहानि के दावे तक दायर कर दिये। फिर जेटली के खिलाफ दायर करवाये मामले को खुद ही वापिस ले लिया। इस दौरान धूमल के छोटे बेटे अरूण धूमल ने वीरभद्र के पूरे मामले में अपने स्तर पर इसकी खोज करते हुए मीडिया में दस्तावेजी प्रमाण रखते हुए यह सुनिश्चत किया कि जांच ऐजैन्सीयां इसकी जांच में कोई ढील न अपनाये। आज वीरभद्र के मामले फैसले के कगार पर पहुंचे हुए हैं कभी भी फैसला आने की स्थिति बनी हुई है।
वीरभद्र इस स्थिति से पूरी तरह परिचित हैं। इसी कारण उन्होने एक बार फिर अपनी विजिलैन्स को धूमल के संपति मामले में तेजी लाने के निर्देश दिये हैं। विजिलैन्स ने भी इनकी अनुपालना करते हुए पंजाब सरकार से फिर धूमल संपतियो की सूची मांगी है। स्वाभाविक है कि पंजाब सरकार के संज्ञान में जो भी सपंतियों होंगी उनमें किसी भी तरह की नियमों/कानूनों की अवहेलना नहीं मिलेगी। हिमाचल में स्थित संपतियों को लेकर वीरभद्र का प्रशासन पहले ही विजिलैन्स को क्लीन चिट दे चुका है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि वीरभद्र की विजिलैन्स के पास आज की तारीख में धूमल के खिलाफ ऐसा कुछ भी नही है जिसके आधार पर कोई मामला दर्ज किया जा सके। राजनीतिक तौर धूमल ही वीरभद्र के लिये सबसे बड़ा संकट और चुनौती हैं इसी कारण वीरभद्र ने धूमल को लेकर ब्यान दिया है कि धूमल न तो मुख्यमन्त्री बनेंगे और न ही पार्टी के अध्यक्ष। वीरभद्र धूमल परिवार के खिलाफ जल्द से जल्द कोई भी मामला दर्ज करना चाहते हैं। उधर अरूण धूमल ने भी वीरभद्र की मंशा को भांपते हुए फिर से मोर्चा संभाल लिया है। हमीरपुर के बड़सर में एक युवा सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए अरूण धूमल ने वीरभद्र, प्रतिभा सिंह, विक्रमादित्य, आनन्द चैहान और वक्कामुल्ला को शीघ्र ही तिहाड़ जेले भिजवाने का संकल्प लिया है। अरूण धूमल के इस ब्यान से यह संकेत उभरता है कि अब वीरभद्र के मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय का फैसला कभी भी घोषित हो सकता है।
शिमला/शैल।
सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीआई के पूर्व निदेशक रंजीत सिन्हा के खिलाफ एसआईटी गठित करके जांच किये जाने के आदेश दिये हैं। सिन्हा के खिलाफ प्रशांत भूषण ने आरोप लगाया था कि उन्होने कोल ब्लाक्स आंवटन के लाभर्थीयों के खिलाफ जांच को प्रभावित किया है। आरोप है कि कोल ब्लाक्स के लाभार्थी सिन्हा के घर पर उनसे मिलते रहे हैं। इस प्रसंग में सिन्हा के घर की विजिलैन्स डायरी भी अदालत में पेश हो चुकी है। अब सीबीआई के निदेशक के तहत ही यह एसआईटी गठित हुई है। कोल ब्लाक्स के आवंटन में यूपीए सरकार पर लाखों करोड़ का घपला होने का आरोप है। जब यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचा था तब नवम्बर 2012 में सरकार ने यह आवंटन रद्द कर दिया था। सीबीआई ने इसमें हर मामले की जांच शुरू की थी। कुछ मामलों में लाभार्थी कंपनीयों के खिलाफ चालान अदालत तक भी पहंुच चुके हैं। लेकिन इन मामलों में कोई और बड़ी कारवाई सामने नही आयी है।
हिमाचल सरकार ने भी संयुक्त क्षेत्र में सितम्बर 2006 में एक थर्मल पावर प्लांट स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू की थी। इसके लिये इन्फ्रास्टक्चर विकास बोर्ड के माध्यम से निविदायें मांगी थी। इसमें छः पार्टीयों ने निविदायें भेजी लेकिन प्रस्तुति पांच ने ही दी और उनमें से दो को शार्ट लिस्ट किया गया। लेकिन अन्त में एम्टा के साथ ही ज्वाईंट वैंचर हस्ताक्षरित हुआ। क्योंकि एम्टा ने बंगाल और पंजाब में थर्मल प्लांट लगाने का दावा किया था। इसी आधार पर जनवरी 2007 में हिमाचल पावर कारपोरेशन और एम्टा के बीच एमओयू साईन हुआ। दोनों की 50ः50 की भागीदारी तय हुई और 48 महीनों में यह प्लांट लगाना तय हुआ। इसके तहत दो करोड़ की धरोहर राशी एम्टा को पावर कारपोरेशन में जमा करवानी थी।
एमओयूम साईन होने के बाद एम्टा ने जे एस डब्ल्यू स्टील के साथ सांझे में भारत सरकार से गौरांगढी में कोल ब्लाक हासिल कर लिया। यह कोल ब्लाक हासिल करने के लिये वीरभद्र ने एक ही दिन में विभिन्न मन्त्रालयों को पांच सिफारिशी पत्र भी लिखे थे जिनके कारण इन्हें यह कोल ब्लाक मिला था। एम्टा और जे एस डब्ल्यू स्टील में इसके लिये एक और सांझेदारी मई 2009 में साईन हुई। लेकिन जब नवम्बर 2012 में केन्द्र सरकार ने कोल ब्लाक्स का आवंटन रद्द कर दिया तो यह काम रूक गया। दिसम्बर 2012 में ही एम्टा के निदेशक मण्डल ने इसमें और निवेश न करने का फैसला ले लिया। 26 नवम्बर 2014 को एम्टा ने फिर फैसला लिया की जब तक विद्युत बोर्ड बिजली खरीदने का अनुबन्ध नही करता है तब तक इस पर आगे नही बढेंगे। मार्च 2015 में बोर्ड ने यह अनुबन्ध करने से इन्कार कर दिया।
लेकिन पावर कारपोरेशन ने 26 दिसम्बर 2012 को 40 लाख और 9-5-2013 को 20 लाख का निवेश भाग धन के रूप में कर दिया। इस पूरे प्रकरण में जो सवाल उभरते हंै उनके मुताबिक जब एम्टा के साथ जनवरी 2007 में एमओयू साईन हुआ और 48 माह में यह प्लांट लगना था तो फिर यह सुनिश्चित नही किया गया कि इसमें कितना काम धरातल पर हुआ है। जब नवम्बर 2012 में कोल ब्लाक्स का आवंटन ही रद्द हो गया और दिसम्बर 2012 में एम्टा ने स्वयं इसमें और निवेश न करने का फैसला ले लिया तो फिर उसके बाद पावर कारपोरेशन ने 26 दिसम्बर 2012 और 9-5-2013 को इसमें 60 लाख का निवेश क्यों कर दिया। 26 नवम्बर 2014 को एम्टा ने किस आधार पर पावर परचेज एग्रीमैन्ट करने का आग्रह किया। सीबीआई की जांच में एम्टा के सारे दावे गल्त पाये गये हैं। एम्टा के साथ एमओयू साईन होने से पहले उसके बारे में विस्तृत जानकारी क्यांे नही जुटायी गयी। बिना पूरी जानकारी के कोल ब्लाक्स के लिये एम्टा की सिफारिश क्यांे की गयी? पावर कारपोरशन और इन्फ्र्रास्ट्रक्चर बोर्ड ने एम्टा से दो करोड़ का भागधन क्यों नही लिया? माना जा रहा है कि इस मामले में अब नये सिरे से जांच खूल सकती है। ईडी में यह मामला अभी तक लंबित है चर्चा है। कि इस संद्धर्भ में हिमाचल के भी कुछ लोगों ने सिन्हां से उसकेे घर पर मुलाकात की है।
शिमला/बलदेव शर्मा
हिमाचल प्रदेश में जल विद्युत की अपार क्षमता है और इस क्षमता का दोहन भी किया जा रहा हैै। इसी क्षमता के आधार पर प्रदेश को विद्युत राज्य प्रचारित और प्रसारित किया गया। यही प्रचार-प्रसार उद्योगपतियों के आकर्षण का केन्द्र बना। विद्युत उत्पादन में भी निजि क्षेत्र ने हिमाचल का रूख किया और आज प्रदेश में कुल उत्पादित
विद्युत- में से राज्य के बिजली बोर्ड के पास केवल 487 मैगावाट ही है और शेष सारीे संयुक्त क्षेत्र या निजि क्षेत्र के पास है। प्रदेश में विद्युत उत्पादन के क्षेत्र में 1990 में शान्ता के शासन काल में जेपी उद्योग समूह ने पैर रखा था। शांता सरकार ने जे पी को स्थापित करने के लिये बसपा- जिस पर बिजली बोर्ड काम कर रहा था, बोर्ड से लेकर जेपी को थमा दिया था। उस वक्त तक बोर्ड इस पर करीब 16 करोड़ खर्च कर चुका था। जे पी के साथ हुए अनुबन्ध में जेपी ने बोर्ड को यह पैसा ब्याज सहित वापिस करना था लेकिन जब जेपी ने यह पैसा नही लौटाया तो यह राहत दी गयी कि जब प्रौजैक्ट उत्पादन में आ जायेगा तब इस पैसे की वापसी होगी। 2003 से इसमें उत्पादन भी शुरू हो गया लेकिन जेपी से यह वसूली नही की गयी। इसके लिये तर्क दिया गया कि यदि यह वसूली की जायेगी तो इसका भार अन्ततः उपभोक्ता पर पडे़गा। इस तरह करीब 92 करोेड़ रूपया बट्टेे खाते में डाल दिया गया। कैग रिपोर्ट में इस पर गंभीर आपत्ति उठायी गयी है। लेकिन कोई भी सरकार जेपी से यह वसूली नहीं कर पायी है। इसी तरह जेपी ने कडछम बांगतू परियोजना में भी दो सौ मैगावाट की क्षमता अपनेे आप बढ़ा ली और सरकार को उस पर अपफ्रन्ट प्रिमियम नही मिला। कैग नेे इस पर भी सवाल उठायेे है लेकिन सरकार पर कोई असर नही हुआ है।
1990 में जब जेपी उद्योग नेे प्रदेश में विद्युत उत्पादन में पैर रखा था उस समय निजि क्षेत्र की परियोजनाओं से 12% विद्युत राॅयल्टी के रूप में फ्री लेने का फैसला शान्ता सरकार ने लिया था और इस फैसलेे की बहुत सराहना हुई थी बल्कि इसी के आधार पर यह दावे किये गये थे कि अब सरकारी खजाने मेें पैसे की कोई कमी नही रहेगी। लेकिन 12% फ्री राॅयल्टी के साथ यह भी फैसला हुआ कि शेेष बची 88% बिजली को भी बोर्ड ही खरीदेगा और उसके बाद निजि क्षेत्र की सारी परियोजनाओं के साथ विद्युत खरीद के समझौतेे साईन हुए। लेकिन यह पीपीए किस रेट पर साईन हुए है। इसको कभी सार्वजनिक नही किया गया है। इसी के साथ ट्रांसमिशन की जिम्मेदारी भी सरकार की है। ऐसेे मेें ट्रांसमिशन में हो रहे नुकसान की कीमत भी सरकार को चुकानी पड़ रही है। 12% मुफ्त रायल्टी के फैसले के साथ 88% केे लियेे पीपीए साईन करना और ट्रासमिशन की जिम्मेदारी लेना ऐसे पक्ष है जिनकेे कारण बोर्ड लगातार घाटे में चल रहा है। आज स्थिति यह हो गयी है। बोर्ड को इन परियोजनाओं से पीपीए के कारण मंहगी दरों पर बिजली खरीदनी पड़ रही है और आगे सस्ती दरों पर बेचनी पड़ रही है क्योंकि अब दूसरे राज्यों ने भी पावर प्रौजैक्टस स्थापित कर लिये है बल्कि इस कारण हर वर्ष बोर्ड की बहुत सारी बिजली बिकने के बिना रह रही है। इसका असर बोर्ड की अपनी परियोजनाओं पर भी रहा है बोर्ड के सारे प्रौजैक्टस में हर वर्ष हजारो घन्टो का शटडाऊन कई वर्षो से लगातार चलता है बोर्ड के सूत्रों के मुताबिक इस शटडाऊन से प्रतिदन करोड़ो का नुकासान हो रहा है लेकिन बोर्ड प्रबन्धन और सरकार इस शटडाऊन को लेकर संबधित अधिकारियों के खिलाफ कोई भी कारवाई नही कर पा रही है। जबकि निजि क्षेत्र की किसी भी परियोजना में इतने बडे स्तर पर कभी शटडाऊन सामने नही आया है। माना जा रहा है कि इस शटडाऊन के पीछे निजि क्षेत्र का दवाब है क्योंकि यदि बोर्ड के अपने प्रौजैक्टस में उत्पादन सुचारू रहता है तो प्रबन्धन को उस उत्पादन की बिक्री पहले सुनिश्चत करनी होगी जिसका असर निजि क्षेत्र पर भी पडेगा। इस सुनियोजित शटडाऊन को लेकर विजिलैन्स के पास भी पिछले करीब तीन वर्षो से शिकायत लंबित है। इस शिकायत पर सचिव पावर की ओर से जो जवाब विजिलैन्स को गया है उससे सरकार ने यह स्वीकार किया है कि इसमें लापरवाही हो रही है लेकिन इस पर न तो सरकार ओर न ही विजिलैन्स कोई कड़ी कारवाई कर पा रही है क्योंकि इसकी गहन जांच मे कई चैकाने वाले खुलासे सामने आने का डर है।
लेकिन आज इस स्थिति के कारण सरकार को बिजली से होने वाली आमदनी में हर वर्ष लगातार कमी होती जा रही है जबकि हर वर्ष सरकार बजट से पहले या बाद में बिजली के रेट बढ़ाती रही है। जबकि हर वर्ष सरकार बजट और नाॅन टैक्स के रूप के मे जो आय होे रही है। वह एक बडे खतरे का संकेत है। इस आय के आंकडे यह है।
Non Tax Revenue
वर्ष आय कुल राजस्व
का प्रतिपक्ष
12-13 637.15 46.281%
13-14 696.29 37.08 %
14-15 1121.15 54.01 %
15-16 650.00 43.13 %
16-17 700.00 41.95 %
Tax Revenue
वर्ष आय कुल राजस्व
का प्रतिपक्ष
12-13 262.62 5.68%
13-14 191.36 3.74%
14-15 332.82 5.60%
15-16 308.45 4.86%
16-17 339.30 4.54%
राज्य सरकार को अपने साधनों से टैक्स और नाॅन टैक्स के रूप मे जो राजस्व प्राप्त होता है उसमें विद्युत बड़ा स्त्रोत है इस स्त्रोत मे वर्ष 12-13 में कुल नाॅन टैक्स राजस्व का 46.28%विद्युत से मिला था जो कि 16-17 में घटाकर 41.95% रह गया है। इसी तरह का कुल टैक्स राजस्व सरकार ने समय रहते बिजली नीति में परिवर्तन न किया तो आने वाले समय में एक बड़ा संकट खड़ा हो जायेगा