Thursday, 15 January 2026
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आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में वीरभद्र एवं अन्य के खिलाफ दर्ज एफ आई आर नहीं हुई रद्द


सी बी आई ने ट्रायल कोर्ट में दायर किया चालान
अदालत में शुरू हुई अगली कारवाई

शिमला/बलदेव शर्मा
आय से अधिक संपति मामले में वीरभद्र प्रतिभा सिंह एवम अन्य के खिलाफ सीबीआई द्वारा 23.9.2015 को दर्ज की गयी एफआईआर को रद्द किये जाने की गुहार को अन्ततः दिल्ली उच्च न्यायालय ने 31.3.2017 को अस्वीकार करते हुए इस मामले में अगली कानूनी प्रक्रिया को हरी झण्डी दे दी है। सीबीआई ने भी तुरन्त प्रभाव से इस प्रकरण में ट्रायल कोर्ट में चालान दायर कर दिया है और विशेष जज सीबीआई की अदालत में इसकी अगली कारवाई भी शुरू हो गयी है। विशेष जज की अदालत द्वारा चालान का संज्ञान लेने के साथ ही इसमें नामजद सभी नौ
अभियुक्तों को नियमित जमानत लेनी आवश्यक हो जायेगी। सीबीआई इनकी जमानत के आग्रह का कितना विरोध करती है और यदि जमानत नही मिल पाती है तो फिर इनका जेल जाना तय है। वैसे तो उच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद ही नामजद अभियुक्तों की गिरफ्तारी का रस्ता खुल गया है। यह सीबीआई की लाईन आफ एक्शन पर निर्भर करता है क्योंकि इससे पहले इनकी गिरफ्तारी पर उच्च न्यायालय ने जो रोक लगा रखी थी वहअब समाप्त हो गयी है। सीबीआई ने जब इस मामले में एफआईआर दर्ज करने के बाद वीरभद्र के आवास और अन्य स्थानों पर छापेमारी की थी उसके तुरन्त बाद ईडी ने भी इस संद्धर्भ में मनीलाॅंडरिंग के तहत मामला दर्ज करके अपनी कारवाई शुरू कर दी थी। ईडी ने अपनी कारवाई को बढ़ाते हुए 23 मार्च 2016 को इस मामलें में आठ करोड़ की चल अचल संपति अटैच कर ली थी। इस संपति में कुछ बैंक खाते, एलआईसी पाॅलिसियां आरै ग्रेटर कैशाल दिल्ली स्थित मकान शामिल है। इस अटैचमैन्ट आदेश में ईडी ने यह कह रखा है कि वक्कामुल्ला चन्द्रशेखर प्रंसग में अभी जांच चल ही रही है और इसे जल्द पूरा कर लिया जायेगा। इस अटैचमैन्ट आदेश के बाद एलआईसी ऐजैन्ट आनन्द चौहान को 9 जुलाई को गिरफ्तार कर लिया गया था और वह अब तक जेल में है। उसकी जमानत याचिका पर भी फैसला सुरक्षित चल रहा है। आनन्द चौहान की गिरफ्तारी के बाद उसके खिलाफ चालान भी ट्रायल कोर्ट में दायर होकर अब उसमें चार्ज तय की स्टेज आ गई है। इस चालान में भी वक्कामुल्ला प्रंसग को लेकर अनुपूरक चालान शीघ्र ही दायर किये जाने का दावा किया गया है। वक्कामुल्ला से जो लेन-देन दिखाया गया है उसका कुछ निवेश रामपुर के घर पर और कुछ मैहरोली के फार्म हाऊस की खरीद पर हुआ माना जा रहा है।

स्मरणीय है कि वीरभद्र 28.5.2009 से 26.6.2012 तक केन्द्र में मन्त्री थे। इसी दौरान 30.11.2010 को अशोका होटल स्थित एक इस्पात उद्योग समूह के मुख्यालय में आयकर विभाग ने छापामारी की थी। इस छापामारी में इस कंपनी द्वारा एसटीसी के कुछ अधिकारियों को 17.9.2009 से 4.6.2010 के बीच छः बार मोटी रकम दिये जाने का आरोप था। फिर इस छापामारी में कंपनी की जो एक्सल शीटस सामने आयी उसमें कुछ सांकेतिक नामों के सामने मोटी रकमें दर्ज की गयी समाने आयी जिनमें एक नाम VBS था जिसे वीरभद्र सिंह समझा गया। इस नाम के आगे 2.77 करोड़ की राशी दिखायी गयी थी परन्तु जांच में यह पूरी तरह स्थापित नही हो सका।
लेकिन इसी बीच मार्च 2012 में वीरभद्र सिंह ने वर्ष 2009-10, 2010-11 और 2011- 12 के लिये संशोधित आयकर रिटर्नज दायर कर दिये और इनमें पहले दायर की गयी आय से कई गुणा अधिक बढ़ी हुई आय दिखा दी गयी। इस पर 11-01-2013 को एडवोकेट प्रशान्त भूषण और कामन काज एनजीओ ने सीपीसी और सी बी आई में शिकायत डालकर यह आग्रह किया कि इस्पात उद्योग समूह पर मारे गये छापे में समाने आयी एक्सल शीट्स में VBS के आगे जो 2.77 करोड़ की रकम दिखायी गयी है उसे वीरभद्र सिंह के साथ जोड़कर देखते हुए जांच की जाये। इस पर फिर जांच शुरू हुई। इस जांच 2.77 करोड़ का तो इस्पात उ़़द्योग और वीरभद्र सिंह के बीच किसी भी तरह से कोई संबध स्थापित नहीं हो सका लेकिन जो आयकर रिटर्नज संशोधित करके, कई गुणा बढ़ी हुई आय दिखायी गयी थी उस पर आय से अधिक संपति होने का शक पैदा हो गया। यह सन्देह पैदा होने पर इस मामले में रेगुलर केस दर्ज करके जांच करने की सिफारिश की गयी। इस सिफारिश पर 23.9.2015 को एफआईआर दर्ज हुई जो आज चालान के रूप में ट्रायल कोर्ट में जा पहुंची है।
इस पर अदालत में अगली कारवाई भी शुरू हो गई है। सी बी आई ने जिन रिटर्नज के हिसाब से मामला दर्ज किया है वह यह है।

 

Sr.                        Ass.                        Original                 Revised
No.                        Year                       ITRs                    ITRs (Rs. )

a.                       2006-07                12,05,000                       NIL
b.                      2007-08                 16,00,000                      NIL
c.                      2009-10                  7,35,000                 2,21,35,000
d.                     2010-11                 15,00,000                 2,80,92,000
e                      2011-12                 25,00,000                 1,55,00,000
f.                     2012-13                 85,00,000                       NIL
g.                    2013-14                 92,00,000                       NIL

 


क्या वर्मा विधानसभा सदस्यता छोड़ेंगे या भारद्वाज अपनी याचिका वापिस लेंगे

शिमला/जे पी भारद्वाज
 चौपाल के निर्दलीय विधायक बलवीर वर्मा ने अब भाजपा का दामन  थाम लिया है। वर्मा की ही तर्ज पर अन्य  निर्दलीय विधायकों के भी भाजपा में शामिल होने की अटकलों का बाजार गर्म है। बल्कि कई कांग्रेस विधायकों के भी भाजपा में जाने की चर्चाएं है। इन सारी चर्चाओं का आधार भाजपा को उत्तराखण्ड और उत्तर प्रदेश में मिली भारी जीत को माना जा रहा है। क्योकि राजनीति में व्यक्तिगत स्वार्थ ही सारी चीजों पर भारी पड़ता है फिर इस पाला बदल की अटकलों का तत्कालीक कारण धर्मशाला को प्रदेश की दूसरी राजधानी बनाये जाने की अधिसूचना को माना जा रहा है। यह फैसला हो चुका है और इस पर जब भी देर सवरे अमल होगा तो निश्चित रूप से शिमला संसदीय क्षेत्रा के लोग इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। ऐसे  में इस क्षेत्र के राजनेताओं के लिये सरकार और कांग्रेस पार्टी से विद्रोह करने का यह एक बड़ा कारण बन जाता है। इस पाला बदल के कथित प्रयासों का भाजपा को कितना लाभ मिलेगा और पाला बदलने वालों का राजनीतिक भविष्य कितना सुरक्षित रहेगा इस पर अभी कुछ भी कहना ज्यादा सही नही होगा।
 निर्दलीय विधायक को चुनाव जीतने के बाद छः महीने तक यह हक हासिल रहता है कि वह इस अवधि में किसी भी दल में शामिल हो सकता है। इस अवधि में उस पर दल बदल कानून लागू नहीं होता। लेकिन छःमास के बाद ऐसा करने पर दलबदल कानून  के प्रावधान लागू हो जाते हैं। इसमें यदि वह स्वयं विधायक पद से त्यागपत्रा न दे तो स्पीकर उसके खिलाफ करवाई करके उसे अयोग्य घोषित कर सकता है। दलबदल कानून के इसी प्रावधान के तहत भाजपा ने अपने मुख्य सचेतक सुरेश भारद्वाज के माध्यम से निर्दलीय विधायकों के कांग्रेस का सहयोगी सदस्य बनने पर इनके खिलाफ करवाई करने की याचिका स्पीकर के पास दायर कर रखी है जोकि अभी तक लंबित चली आ रही है। ऐसे में विधायक वर्मा को या तो सदन से स्वयं त्याग पत्र देना पड़ता है या स्पीकर को कारवाई करनी पड़ती है। यदि वर्मा भाजपा की प्राथमिकता का फार्म न भरकर केवल सहयोगी सदस्य ही रहते हैं जैसे वह कांग्रेस के साथ थे तो उस स्थिति में भाजपा के लिये एक नैतिक संकट और विधानसभा अध्यक्ष में लिये वैधानिक संकट की स्थिति खड़ी हो जायेगी।
 इस परिप्रेक्ष में एक बड़ा सवाल यह भी खड़ा होता है कि इस समय भाजपा ऐसी राजनीतिक गतिविधियों को क्यों प्रोत्साहन दे रही है। क्योंकि यदि सारे निर्दलीय विधायक भी कांग्रेस से नाता तोड़ने की घोषणा कर देते हैं तो भी वीरभद्र सरकार पर संकट नही आता है क्योंकि उसके पास अपना बहुमत रहता है। कांग्रेस में यदि दो तिहाई विधायक पार्टी से टूटकर अपना अलग दल बना लेते हैं तभी उन पर दलबदल कानून लागू नही होगा अन्यथा दो चार के छोड़ने से भाजपा को कोई बड़ा लाभ नही मिलता और छोड़ने वालों पर कारवाई हो जायेगी। ऐसे में क्या भाजपा कोई बड़ा खेल खेलने का प्रयास कर रही है। क्या कांग्रेस के अन्दर इस समय वीरभद्र के खिलाफ कोई बड़ा विद्रोह प्रायोजित होने जा रहा है। क्योंकि कांग्रेस के अन्दर जिस तरह से कुछ नेताओं ने अभी से अगले मुख्यमन्त्री की दावेदारी पेश करनी शुरू कर दी है उससे  भी इस तरह के ही संकेत उभर रहे हैं। कांग्रेस के विद्रोही एक लम्बे अरसे से नेतृत्व परिवर्तन के लिये अपरोक्ष में प्रयास करते रहे हैं। बल्कि इस दिशा में पिछले दिनों चण्डीगढ़ और फिर दिल्ली में भी बैठकें हो चुकी हैं। यह बैठकें निगरान ऐजैन्सीयों की भी निगाहों में रही हैं। जब यह बैठकें हुई थी उस दौरान पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने की संभावनाएं मानी जा रही थी और इन संभावनों के मुद्देनजर प्रदेश के कुछ बड़े कांग्रेस नेताओं की आप के नेतृत्व के साथ विस्तृत बातचीत भी हो गयी थी। यदि पंजाब में वास्तव में ही आम आदमी पार्टी आ जाती तो अब तक प्रदेश में  काफी कुछ घट गया होता। इस परिदृश्य में आज यदि भाजपा एक निर्दलीय विधायक को अपने साथ ला रही है तो निश्चित तौर पर आने वाले समय में वह किसी बड़ी योजना को अजांम देने जा रही है।  

जीडीपी का 33.96% हुआ सरकार का कर्जभार

 

शिमला/बलदेव शर्मा
सरकार वित्तिय अनुशासन में रहे इसके लिये वित्तिय उत्तरदायित्व और बजट प्रबन्धन अधिनियम 2005 के तहत सरकार को जबाव देह बनाया गया है। इस अधिनियम के लागू होने के बाद सरकार जीडीपी के 3% से अधिक ऋण नही ले सकती हैं। केन्द्र सरकार के वित्त विभाग ने मार्च 2016 में अगला वित्तिय वर्ष शुरू होने से पहले एक पत्र भी राज्य सरकार का लिखा था। इस पत्र में स्पष्ट कहा गया था वर्ष 2016-17 में राज्य सरकार 3540 करोड़ से अधिक का ऋण नही ले सकती है। अब दस मार्च को सदन में रखे गये बजट दस्तावेजों में एफआर वीएम नियम 4 और 5 के तहत आयी जानकारी के मुताबिक 2016-17 के संशोधित अनुमानों में चालू वित्तिय वर्ष का कुल कर्ज भार जीडीपी का 33.96% कहा गया है। चालू वित्त वर्ष का जीडीपी 1,24,570 करोड़ रहने का अनुमान है। इसका अर्थ है कि यह  कर्जभार 42303 करोड़ हो गया है। अभी 31 मार्च को वित्तिय वर्ष बन्द  होने से पहले इसी महीने में 2400 करोड़ का कर्ज और लिया गया है। लेकिन बजट की व्याख्यात्मक विवरणिका में  31 मार्च 2016 को यह कर्जभार 38567.82 करोड़ दिखाया गया है। निश्चित है कि जब 31 मार्च 2017 के बाद इस वित्तिय वर्ष का वास्तविक अकालन सामने आयेगा तो कर्ज का यह आंकड़ा 45 हजार करोड़ से ऊपर होगा। इस बढ़ते कर्जभार पर नेता प्रतिपक्ष प्रेम कुमार धूमल ने चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा है कि भविष्य में आने वाली सरकार के लिये कर्ज लेना कठिन हो जायेगा।
इस बढ़ते कर्जभार के साथ यदि यह आकलन और विश्लेषण किया जाये की इस इतने बडे़ कर्ज का निवेश कहां किया गया है तो ऐसा कुछ भी नजर नही आता है। जिससे  की सरकार की आय में नियमित बढ़ौत्तरी होगी। आज तक प्रदेश सरकार हिमाचल को विद्युत राज्य प्रचारित और प्रसारित करती आ रही है। यह दावा किया जाता रहा है कि अकेले विद्युत से ही प्रदेश आत्मनिर्भर हो जायेगा। इसके लिये कई बार विद्युत नीति में संशोधन भी किये गये हैं। निवेशकों के लिये कई सुविधायें प्रदान की गयी हैं। लेकिन इन सारे प्रयासों के बावजूद वीरभद्र के इस कार्यकाल में विद्युत में कोई निवेश नही हो पाया है। बल्कि विद्युत क्षेत्र से सरकार की आय लगातर घटती जा रही है। वर्ष 2015-16 में विद्युत से कर और गैर कर राजस्व के रूप में सरकार को 1474.74 करोड़ वार्षिक योजना के तहत कृषि और परिवहन के बाद यह निवेश का तीसरा बड़ा क्षेत्र है। वर्ष 2017- 18  में  भी योजना के तहत इसके लिये 680 करोड़ रखे गये है। विद्युत से सरकार की लगातर घटती आये के साथ ही विद्युत परिषद का अपना ट्टण भार भी लगातार बढ़ता जा रहा है। इसका सीधा संकेत है कि आने वाले समय में यह क्षेत्र सरकार के वित्तिय संकट का सबसे बड़ा कारण बन जायेगा।
सरकार का राजस्व घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है। राजस्व आय के अनुपात में वर्ष 2016-17 जंहा यह घाटा 3.51% रहने की उम्मीद है वंही वर्ष 2021-22 तक यह चार गुणा से भी बढकर 14.07% तक पहुंच जाने का अनुमान बजट दस्तावेजों में रखा गया है। सरकार की राजस्व आय जहां 26676.70 करोड़ से बढ़कर 2021- 22 में 37038.27 करोड़ होने का अनुमान है। वहीं पर राजस्व व्यय 27613.27 करोड़ से बढ़कर 42252.58 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है इस सारे परिदृष्य में कैपिटल आऊटले जो सीधे विकास कार्यो से संबधित है वह भी लगातार घटता जा रहा है।  वर्ष 2016- 17 में यह केवल 3823.68 करोड़ है वर्ष 2017-18 की वार्षिक योजना 5700 करोड़ की है। लेकिन इस वर्ष के लिये कैपिटल आऊटले केवल 3475.36 करोड़ ही रखा गया है। इसका सीधा प्रभाव विकास कार्यों पर पड़ेगा। सरकार के कुल खर्च का आधा भाग केवल कर्मचारियों की पैन्शन और वेतन पर खर्च होगा। वर्ष 2021-22 के कुल 42252.58 करोड़ के खर्च में 21251.17 करोड़ अकेले इसी मद पर खर्च होगा। सरकार अपना राजस्व बढ़ाने के स्त्रोतों पर विचार करने की बजाये हर क्षेत्र में आऊट सोर्सिंग के विकल्प पर जाती जा रही है जो कालान्तर में घातक सिद्ध होगा क्योंकि आज ही आऊट सोर्स कर्मीयों के लिये नीति लाने का दबाव सरकार पर आ गया है और इस आश्य की घोषणा भी कर दी गयी है। इसी के साथ बेरोजगारी भत्ता और धर्मशाला को दूसरी राजधानी बनाने के फैसलों को अमली जामा पहनाने की बात आती है तो बहुत जल्द सरकार की वित्तिय स्थिति खराब हो जायेगी।

 

भोरंज उपचुनाव के लिये बजट सत्र की अवधि कम की जायेगी

शिमला/शैल। भोरंज उप -चुनाव में सात अप्रैल को वोट डाले जायेंगे और सात अप्रैल को ही तय समय के मुताबिक बजट सत्र समाप्त होगा। प्रदेश विधानसभा के चुनाव इसी वर्ष होने हैं। भोरंज उपचुनाव के बाद ही नगर निगम शिमला के चुनाव होने हैं। शिमला नगर निगम के चुनावों को प्रदेश का सांकेतिक माना जाता रहा है क्योंकि प्रायःनिगम के चुनाव विधानसभा के चुनावी वर्ष में ही आते रहे हैं लेकिन इस बार चुनावी वर्ष में ही यह उपचुनाव आ गया है। अभी संपन्न हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में चार राज्यों में भाजपा की सरकारें बन गयी हैं लेकिन हिमाचल के साथ लगते बड़े राज्य पंजाब में कांग्रेस को भी यूपी जैसी ही सफलता मिली है। ऐसे में जहां भाजपा यूपी और उत्तराखण्ड को अपनी बड़ी चुनावी सफलता के रूप में इस उपचुनाव में प्रचारित-प्रसारित करके भुनाने का प्रयास करेगी वहीं पर कांग्रेस पंजाब की सफलता से इसकी काट करेगी। यह उपचुनाव कांग्रेस और भाजपा के प्रदेश में राजनीतिक भविष्य का एक बड़ा संकेतक  बन जायेगा यह तय है। कांग्रेस और वीरभद्र के लिये यह उपचुनाव ज्यादा राजनीतिक अर्थ रखता है।
 कांग्रेस ने इस चुनाव के राजनीतिक अर्थों को समझते हुए ही इसमें पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेन्द्र सिंह को चुनाव प्रचार के लिये आमन्त्रित किया है। स्मरणीय है कि वर्ष 2003 के चुनावों के दौरान भी अमरेन्द्र सिंह ने इसी हमीरपुर से धूमल पर हमला बोलते हुये आय से अधिक संपति के आरोप लगाये थे । यह आरोप आज भी कांग्रेस के उप महाधिवक्ता विनय शर्मा की शिकायत के रूप में वीरभद्र की विजिलैन्स के पास जांच के लिये लंबित चल रह हैं। वीरभद्र की विजिलैन्स इन आरोपों पर पंजाब सरकार के सहयोग के लिये बादल शासन के समय से ही पत्र लिखती आ रही है। अब पंजाब में कांग्रेस की सरकार भी आ गयी है और उसके मुखिया अमरेन्द्र सिंह वीरभद्र सिंह के निकट रिश्तेदार भी बन गये हैं। विजिलैन्स ने अमरेन्द्र की सरकार आने के बाद भी धूमल के संद्धर्भ में पत्र लिखा है। ऐसे में बहुत संभव है कि अमरेन्द्र इस बार भी हमीरपुर आकर धूमल के खिलाफ कोई बड़ा हमला बोल जाये। इस समय प्रदेश  कांग्रेस के अन्दर इसके सहयोगी सदस्य बलवरी वर्मा के भाजपा में जा मिलने से राजनीतिक वातावरण में हलचल शुरू  हो गयी है। विद्रोह की अटकलें चर्चा में हैं। ऐसे में इस बन रहे राजनीतिक माहौल को शांत और नियन्त्रण में रखने के लिये कांग्रेस और वीरभद्र के पास इस उपचुनाव में जीत हासिल करने के अलावा और कोई विकल्प नही है। यदि ऐसा नही हो पाया तो कांग्रेस को विखरने में देर नही लगेगी।
 दूसरी ओर भाजपा के पास यूपी और उत्तराखण्ड की अभूतपूर्व जीत का जन वातावरण है। इस जन भावना को हिमाचल में भी जमीन पर उतारने के लिये भाजपा को जमीन पर काम करने की आवश्कता है यह सन्देश देने का प्रयास करना होगा कि कांग्रेस का आम कार्यकर्ता भाजपा की इस जीत के बाद हताश और निराश हो चुका है और कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामना चाहता है। विधायक बलवीर वर्मा और पूर्व प्रवक्ता दीपक शर्मा का भाजपा में शामिल होना इसी दिशा की रणनीति है लेकिन हिमाचल के संद्धर्भ में इस जीत के बाद यह भी चर्चा छिड़ गयी है कि भाजपा में अगला मुख्यमन्त्री कौन होगा? पूर्व मुख्यमन्त्री प्रेम कुमार धूमल के साथ ही केन्द्रिय स्वास्थ्य मन्त्री जगत प्रकाश नड्डा का नाम भी बराबर चर्चा में आ गया है। नड्डा के प्रदेश दौरों में भाजपा नेताओं का जो वर्ग उनके साथ ज्यादा खड़ा दिख रहा है वह कभी विरोधीयों के रूप में देखा जाता रहा है। इस तरह भाजपा के अन्दर अभी से ही धड़े बन्दी चचिर्त होने लग पड़ी है। कांग्रेस इस धड़ेबन्दी को यह कहकर हवा दे रही हैं कि धूमल अब अलग-थलग पड़ते जा रहे हंै। जबकि भाजपा में धूमल का जनाधार नड्डा से कहीं ज्यादा है। इसी के साथ भाजपा का एक वर्ग धूमल-नड्डा के अतिरिक्त यह भी प्रचारित करने लग पड़ा है कि अगला मुख्यमन्त्री कोई तीसरा ही होगा और इस कड़ी में संघ नेता अजय जम्बाल का नाम भी उछाल दिया गया है। भाजपा की यह उभरती और प्रचारित होती  गुटबंदी भाजपा के लिये नुकसान देह हो सकती है। इस प्रचारित होती गुटबंदी को भी विराम देने के लिये इस उपचुनाव में भाजपा को इसे प्रमाणित करना आवश्यक होगा।
इस समय इस उपचुनाव में दोनों पार्टियों के विद्रोही चुनाव मैदान बने हुए हैं। यह संकेत और स्थिति दोनों पार्टियों के लिये चेतावनी है ऐसे में इस उपचुनाव में कांग्रेस और भाजपा दोनों की प्रतिष्ठा दांव पर है। भाजपा  को इसमें जीत का अन्तर बढ़ाने की चुनौती है क्योंकि यह सीट दो दशकों से अधिक समय से  भाजपा के पास चली आ रही है। भाजपा का इस समय प्रदेश की राजनीतिक में कोई विकल्प नही है यह संदेश इस जीत का अन्तर बढ़ाने से ही जायेगा। दूसरी ओर वीरभद्र को सातंवी बार मुख्यमन्त्री बनाने के दावे को पूरा करने के लिये यह उपचुनाव जीतना आवश्यक है। ऐसे में अपने-अपने दावों को पूरा करने के लिये वीरभद्र और धूमल दोनों को इस चुनाव प्रचार में व्यक्तिगत तौर पर उतरना होगा। लेकिन बजट सत्र के चलते दोनों नेताओं को सत्र छोड़कर प्रचार में जाना संभव नहीं होगा। ऐसे में माना जा रहा है कि चुनाव प्रचार के लिये समय देने की गरज से सत्र का समय कम करने का फैसला ले सकते  हैं।

धर्मशाला के अपने ही बुने चक्रव्यूह में उलझे वीरभद्र और उनके सलाहकार

शिमला/शैल। धर्मशाला प्रदेश की दूसरी राजधानी बनेगी या धर्मशाला को केवल दूसरी राजधानी होने का दर्जा दिया जायेगा यह विधानसभा में उठी बहस में भी साफ नही हो पाया है। क्योंकि मन्त्रीमण्डल ने इस आशय का जो फैसला लिया है उसके प्रतिसदन के पटल तक नहीं पंहुच पायी है। मन्त्रीमण्डल के समक्ष रखे गये प्रस्ताव की Statement of objection मेें क्या कहा है यह भी अभी तक सामने नही आ पाया है। किसी शहर को राजधानी घोषित करने की एक तयप्रक्रिया है और उसके कुछ तय मानक हैं। राजधानी बनाया जाने वाला शहर उन मानकों को कितना पूरा करता है इस विस्तृत विचार करना आवश्यक होता है क्योंकि राजधानी बनाने और एक तहसील का कार्यालय खोलने में अन्तर होता है। अभी तक देश के किसी भी राज्य में एक साथ दो राजधानीयों की व्यवस्था नही है। जम्मू-कश्मीर में भी छः माह के लिये जम्मु और श्रीनगर में पूरी राजधानी रहती है। यह नही होता कि एक ही वक्त में जम्मू और श्रीनगर के लिये एक ही आदेश की दो प्रतियां बनाकर एक जम्मू के नाम से और दूसरी श्रीनगर शहर जो राजधानी के मानक तो पूरे करता हो परन्तु वह Seat of Governance के लिये उपयुक्त स्थान न हो। ऐसे में राजधानी और Seat of Governance दो अलग-अलग स्थान हो सकते हैं। इस परिप्रेक्ष में यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि धर्मशाला को दूसरी राजधानी बनाने की आवश्यकता क्यों खड़ी हुुई है। क्या शिमला से प्रदेश का प्रशासन चलाना कठिन हो रहा है। इन सारे बिन्दुओं पर चर्चा के लिये एक ही मंच है। विधानसभा पटल और उसी में यह चर्चा नही हो पायी है। राजधानी केवल राजधानी होती है वह पहली और दूसरी नही होती है।
लेकिन धर्मशाला-शिमला को लेकर इस  संद्धर्भ  में चर्चा होने से पहले ही इसे राजनीति का रंग दे दिया गया है। धर्मशाला को दूसरी राजधानी घोषित करने के ऐलान के साथ ही पूरे मुद्दे को यह मोड दे दिया गया कि यहां से अधिकारिक तौर पर काम कब से शुरू होगा। कब इसकी अधिसूचना जारी होगी। कब सारे कार्यालय यहां स्थानान्तरित होंगें। इसके विस्तार के लिये धर्मशाला में कंहा जमीन का अधिग्रहण किया जायेगा। जैसे ही इन बिन्दुओं पर जनता में चर्चा उठी उसी अनुपात में शिमला, सोलन और सिरमौर के क्षेत्रों में इसको लेकर विरोध के स्वर मुखर हो गये। चैपाल में वाकायदा इसके खिलाफ प्रस्ताव पारित किया गया। चैपाल से मुखर हो विरोध के स्वर जब अन्य स्थानों पर फैले तो शिमला के कालीबाड़ी हाल में भी इस तरह का विरोध प्रस्ताव पारित करने की रणनीति बनी। लेकिन आयोजन को शक्ल लेने से पहले ही जिला प्रशासन के अपरोक्ष दखल से रद्द कर दिया। लेकिन जैसे ही इस उठते विरोध की भनक वीरभद्र सिंह को मिली उन्होने तुरन्त सदन में यह कह दिया कि अभी शिमला से कोई कार्यालय और कर्मचारी धर्मशाला के लिये स्थानान्तरित नहीं होंगे। लेकिन धर्मशाला को लेकर किया गया मन्त्रीमण्डल का फैसला अभी तक बरकार है। शिमला, सोलन, सिरमौर से इस फैसले को वापिस लेने की मांग उठ गयी है। यदि यह फैसला वापिस न लिया गया तो इस क्षेत्र में इसके परिणाम कांग्रेस और स्वयं वीरभद्र के लिये भारी पड़ सकते हैं क्योंकि जनरोष बढ़ता जा रहा है।
दूसरी ओर धर्मशाला को दूसरी राजधानी घोषित करके प्रदेश के सबसे बडे़ जिले को साधने का जो प्रयास किया गया था उस पर भी वीरभद्र के सदन में दिये जबाव के बाद प्रश्न चिन्ह लगने शुरू हो गये हैं। वीरभद्र के जबाव के बाद यह संदेश गया है कि धर्मशाला को दूसरी राजधानी घोषित करने की ब्यानबाजी और फैसला महज चुनावी घोषणा है। ऐसे में कांगड़ा के जो नेता धर्मशाला को राजधानी घोषित करवा कर इसे अपनी एक बड़ी राजनीतिक उपलब्धी करार देकर चुनावी सुरक्षा सुनिश्चित करने में लगे थे उनके प्रयासों पर भी पानी फिरता नजर आ रहा है। लगता है कि वीरभद्र और उनके सलाहकार धर्मशाला को लेकर रचे चक्रव्यूह को स्वयं ही भेदने में असफल हो गये हैं।

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