शिमला/शैल। मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष सुक्खविन्दर सिंह सुक्खु पर हर संभव मंच से लगातार निशाना साधते आ रहें हैं। जो स्थिति सरकार बनने के समय विभिन्न निगमो/बार्डो में हुई ताजपोशीयों को लेकर हुई थी ठीक वैसा ही अब हो रही है। संगठन द्वारा की जा रही हर नियुक्ति पर वीरभद्र की तीखी प्रतिक्रियाएं आती हैं। मुख्यमन्त्री
और संगठन के मुखिया के बीच इस तरह की सार्वजनिक निशाने बाजी से सरकार व संगठन की कार्यप्रणाली पर नकारात्मक प्रभाव पडना स्वभाविक है। निष्पक्ष विश्लेषकों की नजर में इस समय सरकार और संगठन में एक बराबर अराजकता का वतातवरण बना हुआ है। सरकार में जो करीब एक दर्जन लोग सीधे लाभार्थी हैं उनको छोड़कर प्राय हर आदमी सरकार से हताश है संगठन तो आम आदमी के लिये मायने ही नहीं रखता है।
इस परिदृश्य में इन दिनों यह सवाल आम चर्चा में है कि वीरभद्र ऐसा कर क्यों रहे हैं। कुछ लोगों का मानना है कि वींरभद्र को जो राय उनके गिर्द बैठे अधिकारियों से मिल रही है वह उसके अनुसार कार्य कर रहे हैं । कुछ लोगों का मानना है कि वीरभद्र पर उनके नाम से बनाये गये एनजीओ के दवाब के कारण ऐसा हो रहा है। चुनाव इसी वर्ष के अन्त तक होने हैं यदि स्थितियां सामान्य रही तो। अन्यथा कुछ भी हो सकता है। ऐसे जो लोग एनजीओ के नाम पर वीरभद्र से जुड़े है उनकी भी इच्छा चुनाव लड़ने की होना स्वभाविक है। लेकिन एनजीओ के सक्रिय कार्यकर्ता होने से ही कांग्रेस के टिकट के लिये उनका दावा पुख्ता नही हो जाता। यदि यह लोग इस बार किसी भी कारण से चुनाव नहीं लड़ पाते हैं तो उनकी राजनीतिक महत्वकांक्षा का अन्त हो जायेगा। बल्कि सूत्रों की माने तो एनजीओ से जुडे़ एक दर्जन नेता तो हर हालत में यह चुनाव लडना चाहते हैं । उनकी यह इच्छा तभी पूरी होती है यदि कांग्रेस उन्हें टिकट दे और यह तभी संभव है यदि पार्टी अध्यक्ष वीरभद्र स्वयं हो जायें या उनका कोई विश्वस्त इस पद पर कब्जा कर पाये। यदि ऐसा नही हो पाता है तो यह एनजीओ ही वीरभद्र के लिये एक बडी समस्या बन जायेगा। क्योंकि एनजीओ के साथ जुडे लोगों को वीरभद्र से ज्यादा विक्रमादित्य का सहारा है। विक्रमादित्य भी चुनाव टिकटों के आंवटन को लेकर समय-समय पर जीतने की संभावना’’ की जो शर्त लगा देते हैं उसके पीछे यही धारणा मानी जा रही है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि यहखेल कब तक चलता रहेगा।
इस समय संगठन चुनावों की प्रक्रिया से गुजर रहा है। संगठन को यह अपने चुनाव चुनाव आयोग के फरमान के कारण करवाने पड़ रहे हैं। यदि राष्ट्रीय स्तर पर यह चुनाव तय समय सीमा के भीतर पूरे नहीं होते हैं तो पार्टी की मान्यता पर संकट आ जायेगा। ऐसे में इस समय वीरभद्र के लिये राजनीतिक विवशता बन गयी है कि या तो वह चुनावों के माध्यम से संगठन पर कब्जा करें या फिर चुनाव टालकर सुक्खु को हटवाने में सफल हो जायें। यदि किन्ही कारणों से यह सब संभव नही हो सका तो वीरभद्र का एनजीओ ही प्रदेश में पार्टी के विघटन का कारण बन जायेगा। पार्टी के सारे वरिष्ठ नेता वीरभद्र की इस नीयत और नीति पर नजर रखे हुए हैं। लेकिन यह भी सब जानते हैं कि चुनावों को वक्त पर पार्टी पर कब्जा करने के लिये वीरभद्र किसी भी हद तक जा सकते हैं जैसा कि उन्होने 2012 के चुनावों से पहले किया था। सुक्ख पर साधे जा रहे निशानों को इसी परिप्रेक्ष में देखा जा रहा है। वैसे इस समय सुक्खु वीरभद्र पर भरी पड़ते जा रहे हैं । माना जा रहा है कि हाईकमान भी वीरभद्र की नीयत और नीति से परिचित हो चुकी है। संभवतः इसी कारण से अंबिका सोनी अब हिमाचल का प्रभार छोड़ने का प्रयास कर रही है।
सीमा वर्मा का मामला चर्चा में
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश राज्य सहकारी बैंक पिछले कुछ समय से ‘‘शेडयूल्ड बैंक’’ की श्रेणी में आ गया है और अब वाणिज्यिक ऋण देने का भी अधिकारी हो गया है। बैंक ने 05-05-2017 से हिम ऋण निवारण योजना शुरू कर रखी है। इस योजना के तहत कृषि तथा गैर कृषि क्षेत्र के व्यक्तिगत ऋण, स्वयं सहायता समूह, सयुंक्त देयता समूह, फर्म, पार्टरनशिप फर्मे जिनके खाते 31-3-2011 या इससे पहले ही एनपीए हो गये हो योजना के दायरे में आते हैं। ऐसे कर्जदारों को ओटीएस के तहत बहुत सारी सुविधाएं दी गयी हैं। यह योजना 31.3.2011 को या उससे पहले ही एनपीए हो चुके कर्जदारों पर ही लागू होगी। बैंक 31.3.2011 के बाद ही शेडयूल्ड बैंक की श्रेणी में आया है। जिसका अर्थ है कि तब तक गैर सहकारी क्षेत्र के लिये कमर्शियल लोन बैंक नहीं दे सकता था। यह राज्य बिजली बोर्ड के माध्यम से आईडर फाईनेश्यल सर्विसज चण्डीगढ़ को दिये ऋण के प्रकरण में स्पष्ट हो चुका है। ऐसे में कुछ हल्कों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या 31.3.2011 से पहले तक के ऋण धारकों को इस योजना का लाभ दिया जा सकता है। बैंक सूत्रों के मुताबिक कुछ होटलों और हाईडल परियोजनाओं को दिये ऋण एनपीए हो चुके हैं। संभवतः इस योजना को लाने में ऐसे लोगों का भी दवाब रहा है।
इसी कड़ी में न्यू शिमला के सैक्टर दो में एक श्रीमति सीमा वर्मा को दिया लोन भी बैंक के गलियारों में काफी चर्चित हो रहा है। सीमा वर्मा ने न्यू शिमला में मकान बनाने के लिये बैंक की माल रोड शाखा से वर्ष 2000 में कोई दस लाख का ऋण लिया था। सीमा वर्मा ने जो मकान बनाया है वह उसकी अपनी जमीन में न होकर हिमुडा की जमीन पर है। यह 20.6.2015 को एसओ शिमला द्वारा दिये फैसले में स्पष्ट हो चुका है। इस संद्धर्भ में सीमा चैहान के खिलाफ 2013 से ही शिकायतें चल रही थी। विजिलैन्स तक शिकायत गयी थी। राजस्व अधिकारियों द्वारा की गयी डिमारकेशन के समय विजिलैन्स के एक इन्सपैक्टर और एक सब इन्सपैक्टर भी शामिल रहे हैं। हिमुडा के जेई और पटवारी भी डिमारकेशन में शामिल रहे हैं इन सबके ब्यान रिकार्ड पर लगे हैं। एस ओ के फैसले की जानकरी हिमुडा और विजिलैन्स तथा सरकार के राजस्व विभाग को रही है। लेकिन सरकारी तन्त्र के किसी भी कोने से सीमा वर्मा के खिलाफ कोई कारवाई अभी तक अमल में नही लायी गयी है। जबकि न्यू शिमला रैजिडैन्शयल अलाॅटी संगठन ने वाकायदा सरकार को दिये प्रतिवेदन में इस प्लाॅट को रैजिडैन्शयल सोसायटी को रिस्टेार करने की मांग कर रखी है। इस सोसायटी के मुताबिक न्यू शिमला काॅलीनी की जमीन की मालिक हिमुडा नही है। हिमुडा केवल ट्रस्टी है। न्यू शिमला के इस पक्ष पर शैल आने वाले दिनों में खुलासा करेगा।
सीमा वर्मा के इस मकान में वर्ष 2009 से राज्य सहकारी बैंक की ब्रांच भी कार्यरत है। जब इसकी डिमारकेशन की गयी थी उसकी जानकारी इस ब्रांच को रही है और ब्रांच के माध्यम से बैंक के शीर्ष प्रबन्धन को भी रही है। बैंक सूत्रों के मुताबिक सीमा वर्मा को वर्ष 2000 में दिया गया दस लाख का ऋण पहले दिन से ही एनपीए हो गया था। बल्कि इसी कारण से यहां पर बैंक की ब्राच खोलने का प्रबन्ध किया गया है। बैंक इस ब्रांच का करीब 7800 रूपये मासिक किराया दे रहा है। लेकिन इसके बावजूद यह ऋण मूल के तीन गुणा से भी अधिक हो गया है। सूत्रों की माने तो बैंक प्रबन्धन ‘‘हिम ऋण निवारण’’योजना के तहत सीमा वर्मा को बड़ी राहत देने का प्रयास कर रहा है। सीमा वर्मा का मकान उसकी अपनी जमीन पर नही है। इसकी जानकारी बैंक हिमुडा और सरकार सबको है लेकिन किसी भी स्तर पर इस मामले पर कोई कारवाई नहीं हो रही है। चर्चा है कि बैंक के शीर्ष प्रबन्धन का पूरा सहयोग सीमा वर्मा को मिल रहा जिसके चलते कहीं से भी कोई कारवाई नहीं हो रही है। सूत्रों की माने तो इसकी जानकारी प्रदेश उच्च न्यायालय को भी भेज दी गयी है। क्योंकि 2012 में उच्च न्यायालय ने न्यू शिमला काॅलोनी को लेकर आये मामलों में दिये फैसले में हिमुडा की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न चिन्ह लगाये हैं। सीमा वर्मा जैसे और भी कई मामले चर्चा में आ रहे हैं। माना जा रहा है कि इस ऋण निवारण योजना से बैंक को करोड़ो का नुकासान पंहुचेगा।


शिमला/शैल। नगर निगम शिमला के वर्तमान हाऊस का कार्यकाल 4 जून को समाप्त हो रहा है। लेकिन 5 जून को नये हाऊस का गठन नहीं हो पायेगा क्योंकि इसके लिये चुनाव ही नही हो पाया है। 5 जून को निगम पर सरकार को प्रशासक बैठाना होगा जो किअगले चुनावों तक रहेगा। लेकिन यह अगले चुनाव कब होंगे इसको लेकर संशय बना हुआ है। हांलाकि इस सद्धर्भ में एक राजु ठाकुर ने प्रदेश उच्च न्यायालय में एक याचिका भी दायर कर रखी है। राजनीतिक दल यह चुनाव समय पर न हो पाने के लिये राज्य निर्वाचन आयोग को जिम्मेदार ठहरा रहे हंै। बल्कि जो याचिका दायर हुई उसमें राज्य चुनाव आयुक्त को पद से हटा दिये जाने का भी आग्रह किया गया है। याचिका भाजपा के कार्यकर्ता की ओर से दायर की गयी है। जिसमें चुनाव आयुक्त के खिलाफ कारवाई की मांग की गयी है। राज्य चुनाव आयोग एक स्वतन्त्र संस्था है और एक्ट के मुताबिक उसके खिलाफ ऐसी कारवाई का कोई प्रावधान ही नहीं है फिर भी ऐसी कारवाई की मांग किये जाने से याचिका के राजनीति से प्रेरित होने की गंध आना स्वभाविक है।
किसी भी चुनाव का मूल आधार वोटर लिस्ट होती है। यह वेाटर लिस्ट तैयार करने के लिये चुनाव आयेाग ने जिलाधीश शिमला को बतौर ईआरओ 11.4.2017 को निर्देश दिये। इन निर्देशों पर जिलाधीश शिमला ने 5.5.2017 को नई वोटर लिस्टें नोटिफाई कर दी। यह लिस्टें आने पर प्रतिक्रियांए आयी और इनमें गडबडी होने के आरोप लगे। इन लिस्टों के लिये 1.1.2017को आधार तिथि बनाया गया था। इन लिस्टों के मुताबिक वोटर की संख्या 88167 कही गयी थी। प्रतिक्रियाएं आने के कारण राज्य चुनाव आयोग ने राष्ट्रीय चुनाव आयोग के शिमला कार्यालय से निगम क्षेत्र के वोटरों की सूची मांगी। यह सूची भी 5.5.2017 को ही मिल गयी और इसमें मतदाताओं की संख्या 85546 आयी इसका आधार भी 1.1.2017 ही था। प्रतिक्रियाएं आने के साथ ही जिलाधीश शिमला के पास 2200 आवोदन फैसले के लिये लंबित पडे थे। इस परिदृश्य में करीब 5000 मतदाताओं का अन्तर सूचियों में सामने आ गया। ऐसे में एक निगम क्षेत्र में 5000 हजार मतदाताओं को नज़र अन्दाज करना पूरे चुनाव की विश्वसनीयता पर ही गंभीर सवाल खड़े कर देता। इस परिदृश्य में राज्य चुनाव आयोग ने इन मतदाता सूचियों को ठीक करने के निर्देश जारी कर दिये जिनके मुताबिक 23 जून तक यह प्रक्रिया पूरी हो जायेगी।
जिलाधीश शिमला ने राष्ट्रीय चुनाव आयोग के साथ अपनी सूचियों में आये अन्तर के कारण निगम क्षेत्र में अब कुछ पंचायत क्षेत्रों के जुड़ जाने को कारण बताया है। स्मरणीय है कि निगम के पिछले चुनाव 2012 में हुये थे और उस समय 25 वार्ड थे जिनमें 80 हजार कुछ वोटर थे। इस बार निगम का क्षेत्रा बढ़ाकर इसके वार्डों की संख्या 34 कर दी गयी है। वार्डों की संख्या बढ़ाये जाने पर किसी भी राजनीतिक दल ने कोई एतराज़ नही उठाया है। 2012 में किसी भी वार्ड में वोटरों की संख्या दो हजार से कम नहीं थी। लेकिन इस बार छः वार्डों भट्ट-कुफर, कंगनाधार, मजाठ, मल्याणा, पटयोग और अप्पर ढ़ली में यह संख्या दो हजार से कम है। अप्पर ढ़ली में तो यह संख्या केवल 814 है। जबकि कुछ वार्डों में यह संख्या 2012 से भी कम है। बालूगंज में 2012 में 4189 वोटर थे और इस बार 2345 हैं। टुटू में पिछली बार 3558 वोटर थे इस बार 2264 है। मल्याणा में पिछली बार 3557 थे जबकि इस बार 1811 हैं। इस तरह वोटर लिस्टों में यह भिन्नता अब भी ठीक हो पाती है या नहीं इसको लेकर संशय बरकरार है। 2012 में 25 वार्ड़ों में जब 80,000 से अधिक वोटर थे तो इस बार कुछ पंचायत क्षेत्रों के मिलने और वार्ड़ों की संख्या 34 हो जाने से वोटरों का बढ़ना तो स्वभाविक है लेकिन एक ही तिथि 1.1.2017 को दो संस्थाओं की गिनती में इतना अन्तर कैसे हो सकता है इस सवाल का जवाब अब नयी संशोधित लिस्टों के आने से ही स्पष्ट हो पायेगा।
मतदाता सूचियों पर सबसे पहली प्रतिक्रिया सी पी एम की ओर से आयी थी और उसने इनमें संशोधन की मांग करते हुए चुनाव दो माह के लिये आगे कर देने का आग्रह किया था। अब संशोधित लिस्टे आने के बाद यह दल संतुष्ट हो पायेंगे या फिर किसी बहाने से चुनाव आगे टल जायेंगे इसका खुलासा तो जून अन्त में ही हो पायेगा।
शिमला/शैल। प्रदेश में इस वर्ष के अन्त तक होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर भाजपा ने अभी से तैयारीयां शुरू कर दी हैं इसका संकेत और संदेश पिछले दिनों शिमला में प्रधानमन्त्री मोदी तथा पालमपुर में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमितशाह की यात्राओं से खुलकर सामने आ गया है। भाजपा ने 68 में से 60 सीटंे जीतने का लक्ष्य भी घोषित कर रखा है। भाजपा का प्रदेश का शीर्ष नेतृत्व एक लम्बे अरसे से वीरभद्र सरकार के गिरने और समय से पहले ही चुनाव होने के दावे भी करता रहा है। कांग्रेस के कई मन्त्री और विधायक भी भाजपा के संपर्क में हैं और कभी भी पार्टी में शामिल हो सकते हैं ये दावा भी कई बार दोहराया गया है। लेकिन अभी तक व्यवहार में एक भी दावा प्रमाणित नही हो पाया है और अब इस सबका कोई बड़ा महत्व भी नहीं रह गया है। बल्कि अभी मुख्यमन्त्री हमीरपुर दौरे के दौरान भाजपा के प्रदेश सचिव ठाकुर और कुछ अन्य लोगों का भाजपा छोड़ कांग्रेस में शामिल होना सामने आया है। इस समय राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के पक्ष में जो वातावरण बना है उसको देखते हुए भाजपा के किसी भी स्तर के नेता/कार्यकत्र्ता का पार्टी छोड़कर कांग्रेस में शामिल होना अपने में एक बड़ी बात है।
वैसे तो राजनेता अपने व्यक्तिगत स्वार्थ को सामने रखकर ही दल बदल जैसी घटना को अंजाम देते हैं। लेकिन जो कुछ नेता प्रति पक्ष प्रेम कुमार धूमल के अपने गृह जिला हमीरपुर में घटा है उससे कुछ और ही सन्देश जाता है। क्योंकि पालमपुर में अमितशाह की यात्रा चुनावी तैयारीयां के ही संद्धर्भ में थी। फिर इस यात्रा में राजीव बिन्दल ने जिस तरीके से शिमला के चार पत्रकारों को अमितशाह से मिलवाया वह आने वाले समय में मीडिया को पार्टी हित में कैसे साधना है उस दिशा का प्रयास था। यह एक अलग बात है कि इन पत्रकारों के सहारे को वांच्छित लाभ मिल भी पायेगा या नही। अमितशाह की यात्रा के बाद वीरभद्र सिंह ने जिस ढंग से शाह पर निशाना साधा है और हमीरपुर में पार्टी के प्रदेश सचिव को कांग्रेस में शामिल करवाया है उससे बिन्दल के मीडिया प्रबन्धन पर ही सवाल उठने लग पड़े है।
लेकिन इसी दौरान मोदी और शाह की यात्राओं के साथ ही एक मीडिया साईट पर भाजपा के 27 नेताओं की एक सूची का सामने आना भी पार्टी के लिये एक अच्छी खबर नही माना जा रहा है। इस सूची में छः तो भाजपा के वर्तमान विधायक ही हैं जिनके टिकट पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया गया है। जिस मीडिया साईट पर यह सूची आयी है उसके साथ भाजपा के ही दो बड़े नेताओं के बहुत करीबी रिश्ते भी चर्चा में है। चर्चा है कि एक नेता ने तो शिमला में अभी एक चार मंजिला निमार्णाधीन भवन करीब एक करोड़ में खरीदा है जिसके पूरा होने में इनता ही और पैसा लगेगा। प्रदेश की राजनीतिक समझ रखने वाले जानते हैं कि यहां चुनाव विकास के नाम पर न ही लडे़ जाते हैं। पिछला विधानसभा चुनाव और उसके बाद हुआ लोकसभा चुनाव तो इसके उदाहरण हैं। फिर इस समय मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह ने अपने खिलाफ चल रही सीबीआई और ईडी जांच को जिस तरह से भाजपा का षडयंत्र प्रचारित कर दिया है उसका कोई भी तर्कपूर्ण जबाव प्रदेश भाजपा का कोई भी नेता नही दे पा रहा है। भाजपा के कुछ बडे़ नेताओं के वीरभद्र के साथ रिश्ते तो जगजाहिर हैं। यह नेता इन्हीं रिश्तों के कारण वीरभद्र पर सिद्धान्त रूप में तो अटैक करते हैं लेकिन उसका खुलासा करने का साहस नहीं कर पाते हैं।
ऐसे में जिन नेताओं के नाम टिकट कटने वालों की संभावित सूची में समाने आये हैं वह अपने को बचाने के लिये किस तरह के प्रयास करते हंै? अपने संभावित विरोधियों के खिलाफ कैसे मोर्चा खोलते है? पार्टी में कैसे समीकरण बनते बिगड़ते है और उनका पार्टी के लक्ष्य पर कितना असर पड़ता है यह सब अपने में बहुत महत्वपूर्ण हो जायेगा। स्वभाविक है कि इससे पार्टी के लिये कठिनाईयां और बढ़ेगी। क्योंकि हिमाचल को दूसरे राज्यों के गणित के सहारे नही चलाया जा सकता है जो 27 नामों की सूची चर्चा में आयी है। वह इस प्रकार है। 1 आत्मा राम (जय सिंहपूर) 2. हीरा लाल(करसोग) 3.तेजवनत सिंह (किन्नौर) 4. प्रवीण कुमार (पालमपुर) 5. बालक राम नेगी (रोहडू) 6. प्रेम सिंह ड्रैक(रामपुर) 7.राकेश वर्मा (ठियोग) 8. मुलखराज (बैजनाथ ) 9. खीमी राम (बंजार) 10. बलदेव शर्मा (बड़सर) 11. सुरेश चन्देल (बिलासपुर) 12. रेणु चड्डा (डलहौजी) 13. किशन कपूर (धर्मशाला)14. बलदेव सिंह ठाकुर (फतेहपूर) 15. प्रेम सिंह (कुसुम्पटी)16. दुर्गादत्त (मण्डी) 17. रणवीर सिंह निक्का (नूरपुर) 18. कुमारी शीला (सोलन) 19. सरवीण चौधरी (शाहपुरद) 20. सुरेश भारद्वाज (शिमला) 21. जवाहर लाल(दंरग) 22. मेहन्द्र सिंह (धर्मपुर) 23. रमेश चन्द धवाला(ज्वालामुखी) 24. रिखी राम कौण्डल (झण्डूता) 25. गुलाब सिंह ठाकुर (जोगिन्द्र नगर) 26. नरेन्द्र बरागटा (जूब्बल कोटखाई) 27. राजिन्द्र गर्ग (घुमारवी) इनमें से कुछ लोगों के टिकट कटने की संभावना इनकी पिछले चुनावों में परफाॅरमैन्स और कुछ के स्थान पर नये चेहरे लाने की कवायत की जा रही है। जबकि इनमें सुरेश भारद्वाज और महेन्द्र सिंह ठाकुर जैसे नेताओं का कद इतना बड़ा हैं कि पार्टी को उनका सहयोग हर हालत में आवश्यक होगा। लेकिन फिर भी यह नाम सूची में आये हैं तो इससे स्पष्ट हो जाता है कि कहीं बड़ा खेल किसी बडे़ मकसद के लिये खेला जा रहा है।
शिमला/शैल। प्रदेश के सूचना आयोग और शिक्षा के रैगुलेटरी आयोग को अभी तक अध्यक्ष नहीं मिल पाये हैं। दोनों संस्थाओं के यह पद एक वर्ष से अधिक समय से खाली चले आ रहे हैं। जबकि राज्य लोक सेवा आयोग में खाली हुए अध्यक्ष और सदस्य के पदों को तुरन्त भर दिया गया है। बल्कि सदस्य का पद तो उसी दिन भर दिया गया जिस दिन वह खाली हुआ। इस पद पर मुख्यमन्त्री के प्रधान निजि सचिव सुभाष आहलूवालिया की पत्नी मीरा वालिया की ताजपोशी हुई है। मीरा वालिया पहले शिक्षा के रैगुलेटरी कमीशन में सदस्य थी वहां से त्यागपत्र देकर वह लोक सेवा आयोग में आयी है और अब रैगुलेटरी कमीशन में न कोई अध्यक्ष है और न ही सदस्य। यही स्थिति सूचना आयोग की भी होने जा रही है क्योंकि वहां भी कार्यरत एकमात्र सदस्य इसी माह में सेवानिवृत होने जा रहे हैं। इसी तरह प्रदेश के प्रशासनिक ट्रिब्यूनल में भी हरीन्द्र हीरा की सेवानिवृति के बाद से सदस्य का पद खाली चला आ रहा है। सूचना आयोग और रैगुलेटरी आयोग में अध्यक्ष पद एक वर्ष से भी अधिक समय से खाली चले आ रहे हैं और अध्यक्ष का पद ही खाली हो तो अनुमान लगाया जा सकता है कि इन पदो और संस्थाओं की हमारे राजनेताओं की दृष्टि में क्या अहमियत है। जबकि शिक्षा के क्षेत्र में तो अपनी चिन्ता व्यक्त करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने एक एसआईटी तक का गठन करके उसे काम पर लगा दिया है और यह एसआईटी भी हिमाचल के ही एक मामलंे के सुप्रीम कोर्ट में पहुंचने के बाद गठित की गयी है।
इस परिदृश्य में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि यह महत्वपूर्ण पद क्यों खाली चल आ रहे हैं और इनको भरने के लिये किसकी क्या भूमिका रहती है। इन पदों को भरने की जिम्मेदारी मुख्यमन्त्री की होती है और इसमें उनके कार्यालय तथा मुख्य सचिव की विशेष भूमिका रहती है। क्योंकि यह इन लोगों की जिम्मेदारी होती है कि वह ऐसी चीजों को तुरन्त मुख्यमन्त्री के संज्ञान मे लाये तथा संवद्ध प्रशासन से इनकों भरने की प्रक्रिया शुरू करवायें। इन पदों पर प्रायः सेवानिवृत बड़े अधिकारियों की ही तैनातीयां की जाती है। कई बार जिन अधिकारियों का कार्याकाल थोड़ा ही बचा होता है उन्हें सेवानिवृति देकर इन पदों पर बिठा दिया जाता है। ऐसे में यही सवाल उठता है कि जब सुभाष आहलूवालिया की पत्नी को काॅलिज के प्रिंसिपल के पद से सेवानिवृत होने से पूर्व ही रैगुलेटरी कमीशन में सदस्य लगा दिया गया था और फिर वहां से एक दिन भी खोये बिना लोक सेवा आयोग में लगा दिया गया तो फिर ऐसी ही तत्परता और सजगता इन पदों को भरने में क्यों नहीं दिखायी गयी?
इस संद्धर्भ में सचिवालय के गलियारों से लेकर सड़क तक फैली चर्चाओं के मुताबिक इस समय सरकार चलाने में सबसे बड़ी भूमिका टीजी नेगी और सुभाष आहलूवालिया अदा कर रहे हैं । यह दोनों ही सेवानिवृत हैं बल्कि विपक्ष तो इन्हीं लोगों को इंगित करके मुख्यमन्त्री पर रिटायर्ड और टायरड अधिकारियों पर आश्रित होने का आरोप तक लग चुका है। इनके बाद मुख्य सचिव वीसी फारखा का नाम चर्चा में आता है। इन अधिकारियों के साथ ही मन्त्रीयों सुधीर शर्मा तथा मुकेश अग्निहोत्री का नाम आता है। इन्ही के साथ हर्ष महाजन और अमितपाल शर्मा चर्चा में आते हैं अब इन सबके साथ राज्यपाल के सलाहकार डा. शशी कान्त का नाम भी जुड़ गया है। इस चर्चा में यह माना जा रहा था कि जो अधिकारी इस समय सरकार चला रहे हैं कल सरकार बदलने पर उनका क्या होगा क्योंकि वीसी फारखा की बतौर मुख्य सचिव ताजपोशी को विनित चौधरी ने कनिष्ठता के आधार पर कैट में चुनौती दे रखी है। ऐसे में माना जा रहा है कि सरकार बदलने की सूरत में फारखा का मुख्य सचिव बने रहना कठिन होगा। फारखा भी इस हकीकत से वाकिफ हैं और इसीलिये यह बड़े पद खाली जा रहे थे। इनमें लोक सेवा आयेाग के अध्यक्ष पद पर फारखा का जाना तय माना जा रहा था क्योंकि यही एक पद ऐसा है जहां पर ‘‘पुण्य भी फल भी’’की कहावत चरितार्थ होती है। फिर के. एस. तोमर लोक सेवा आयोग के बाद मुख्य सूचना आयुक्त होना चाहते हैं। वीरभद्र पर उनके कुछ ऐसे एहसान है जिनके चलते वह उन्हे इनकार नहीं कर सकते हैं। धूमल के लिये भी तोमर को न कहना कठिन है बल्कि चर्चा तो यहां तक है कि वह बैठक में भी डा. शशीकांत और टीजी नेगी द्वारा तोमर का नाम आश्वस्त हो जाने पर ही आये थे। लेकिन आखिरी वक्त पर लोक सेवा आयोग के लिये मेजर जनरल का नाम आ जाने से सारा गणित बिगड़ गया। इस नियुक्ति को चर्चाओं के मुताबिक कार्यवाहक मुख्य सचिव ने फारखा के छुटटी से आने तक रोकने का पूरा प्रयास किया लेकिन इसमें वह शायद अकेले पड़ गये। लेकिन फिर उन्होने मुख्य सूचना आयुक्त के लिये पोस्ट को पुनः विज्ञाप्ति करने का ऐसा सूत्र सामने रखा जिसे कोई काट नही पाया। बल्कि पुलिस अधिकारियों के स्थानान्तर की जो फाईल आर्डर के लिये तैयार पड़ी थी उसे भी फारखा के आने तक रोक दिया गया। ऐसे में अब सीआईसी प्रशासनिक ट्रिब्यूनल और रैगुलेटरी कमीशन में कौन जाता है इस पर रहस्य ज्यादा बढ़ गया है। लेकिन इस प्रकरण में शीर्ष प्रशासन में बनने वाले नये समीकरणों का संकेत भी साफ उभरता देखा जा सकता है।