Thursday, 15 January 2026
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विक्रमादित्य ने फिर की वीरभद्र की एकछत्र लीडरशिप की वकालत

शिमला/शैल। मुख्यमन्त्री वीरभद्र के पुत्र और प्रदेश युवा कांग्रेस के अध्यक्ष विक्रमादित्य ने वीरभद्र की गैर मौजुदगी में पिता के सरकारी आवास ओक ओवर में एक पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए प्रदेश विधानसभा के आगामी चुनाव वीरभद्र की ही एकछत्र लीडरशिप में करवाये जाने की वकालत की है। विक्रमादित्य ने नगर निगम शिमला के चुनाव हारने के बाद प्रैस वार्ता को संबोधित करते हुए यह स्वीकार किया कि निगम के चुनाव समन्वय की कमी के कारण हारे हैैं। लेकिन इस समन्वय में कमी सुक्खु के संगठन की ओर से रही या वीरभद्र की सरकार की ओर से। इसका खुलासा भी विक्रमादित्य ने नही किया। जबकि इससे पहले वीरभद्र और सुक्खु एक दूसरे पर निगम चुनावों की हार का ठिकरा फोड़ चुके हैं। विक्रमादित्य ने प्रदेश विधानसभा के चुनाव पंजाब माॅडल पर करवाये जाने की वकालत की है। स्मरणीय है कि पंजाब में कैप्टन अमरेन्द्र सिंह को चुनावों से काफी पहले प्रदेश का भावी मुख्यमन्त्री घोषित कर दिया गया था और इसका निश्चित रूप से कांग्रेस को लाभ मिला था। हिमाचल में जब से वीरभद्र सिंह के गिर्द केन्द्र की सीबीआई, ईडी और आयकर ने घेरा डाल रखा है तभी से कांग्रेस के अन्दर नेतृत्व परिवर्तन के स्वर भी मुखर होते रहे हैं। परन्तु हाईकमान ने इस सवाल पर अभी तब अपनी खामोशी नही तोड़ी है। जबकि वीरभद्र और उनके शुभचिन्तक तो उनको सातवीं बार मुख्यमन्त्री बनाने के दावे कर चुके है। विक्रमादित्य एक अरसे से प्रदेश कांग्रेस की बागडोर भी अप्रत्यक्षः सरकार के साथ ही वीरभद्र को सौंपने की वकालत करते आ रहे है। लेकिन विक्रमादित्य के ऐसे प्रयासों और ब्यानों पर संगठन की ओर से कभी कोई प्रतिक्रिया नही आयी है। वीरभद्र और विक्रमादित्य जिस ढंग से सुक्खु की अध्यक्षता पर परोक्ष/अपरोक्ष से हमला बोलते आ रहें हैं उससे यह पूरी तरह स्पष्ट हो चुका है कि पार्टी इस समय सुक्खु और वीरभद्र के खेमों में बुरी तरह बंटी हुई है और इसी बंटवारे के कारण नगर निगम में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा है।
लेकिन नगर निगम शिमला की हार वीरभद्र और उनके बेटे विक्रमादित्य के लिये व्यक्तिगत तौर पर एक बड़ा झटका है, क्योंकि निगम चुनाव के परिणाम आने के बाद विक्रमादित्य ने मीडिया में यह दावा किया था कि भाजपा के कई पार्षद उनके संपर्क में है, जबकि यह दावा इतना खोखला साबित हुआ कि भाजपा के पार्षद तो दूर बल्कि निर्दलीय पार्षदों को भी कांग्रेस संभाल नही सकी। निश्चित है कि विक्रमादित्य ने ऐसा दावा उनके सहयोगीयों/सलाहकारों के फीड वैक के दम पर किया होगा। यह दावा और फीड बैक कितना आधारहीन था इसका अनुमान विक्रमादित्य को अब तक हो गया होगा। विक्रमादित्य शिमला ग्रामीण से अपनी संभावित उम्मीदवारी बहुत पहले ही जता चुके हैं और वीरभद्र भी उनकी इस उम्मीदवारी को अपनी मोहर लगा चुके हैं। ऐसे मे शिमला ग्रामीण से ताल्लुक रखने वाले निगम के चारों वार्डो का हाथ से फिसल जाना एक गंभीर संकेत है। क्योंकि यहां जिन लोगों के सहारे वीरभद्र और विक्रमादित्य चले हुए थे संभवतः उनकी निष्ठाएं कहीं और जुड़ी हुई है, शायद इस सच्चाई को इनके अतिरिक्त बाकी सब जानते हैं। बल्कि इन दिनों तो शिमला ग्रामीण में कांग्रेस के कुछ नेताओं द्वारा खरीदी गयी भू-संपत्तियों की चर्चा के साथ ही इन नेताओं की राजनीतिक मंशा पर भी सवाल उठने शुरू हो गये है। क्योंकि बतौर युवा कांग्रेस अध्यक्ष विक्रमादित्य को मुख्यमन्त्री के सरकारी आवास की बजाये कांग्रेस दफ्तर में पत्रकार वार्ता को संबोधित करना चाहिये था लेकिन जिसने भी ओक ओवर में यह वार्ता का सुझाव दिया है उसकी नीयत का अनुमान लगाया जा सकता है।
इस समय नगर निगम की हार को जिला शिमला के बड़े परिदृश्य में समझा जाना आवश्यक है। शिमला जिला का मुख्यालय होने के साथ ही प्रदेश की राजधानी भी है। इस राजधानी के समानान्तर ही धर्मशाला में दूसरी राजधानी बनाये जाने की अधिसूचना तक जारी हो चुकी है। आज शिमला में प्रदेश के अन्य भागों से लोगों को यहां अपने कामों के लिये आना पड़ता है। कल को शिमला के लोगों को धर्मशाला जाने की नौबत आ जायेगी। वीरभद्र के इस फैसले का यहां के लोगों में इतना विरोध पनपा है कि संगठन बनाकर इसके खिलाफ आन्दोलन छेड़ने की योजना तैयार हो गयी थी। योजना के तहत राजधानी की इस अधिसूचना को प्रदेश उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा चुकी है। नगर निगम के चुनावों में सरकार के इस राजधानी के फैसले को लेकर भीतर ही भीतर बड़ा रोष था जो कि परिणामों में सामने आया है। जिन राजनेताओं और अधिकारियों की सलाह पर यह फैसला लिया गया था वह लोग इस चुनाव प्रचार में कहीं नजर तक नही आये। ऐसे और भी कई फैसले हैं जिनके कारण प्रदेश के अलग- अलग हिस्सों में रोष है। ऐसे फैसलों की पृष्ठभूमि मे विक्रमादित्य की 45 विधानसभा क्षेत्रों के लिये प्रस्तावित विकास यात्रा का क्या राजनीतिक प्रभाव रहेगा इसका अनुमान लगाया जा सकता है।

ठियोग रोहडू सड़क चड्डा एण्ड चड्डा को काम पूरा करने के लिये दिया छः माह का और समय तथा 45 करोड़ रूपया

                                   बाईसरकुलेशन मन्त्रीमण्डल ने किया यह फैसला
                           अन्तर्राष्ट्रीय विकास ऐसोसियेशन आईबीआरडी ने और ऋण देने से किया इन्कार
                            नौ वर्षोे में 80 कि.मी. सडक की रिपेयर नही कर पायी सरकार
शिमला/शैल। 80 किमी लम्बी ठियोग-रोहडू सड़क की रिपेयर का काम प्रदेश सरकार नौ वर्षो में भी पूरा नही कर पायी है जून 2008 में धूमल शासन के दौरान अन्र्तराष्ट्रीय विकास ऐसोसियशन आईबीआरडी से 228.26 करोड़ रूपये का ऋण लेकर यह काम शुरू हुआ था और जून 2011 में पूरा होने का लक्ष्य रखा गया था। इसके लिये अमेरिका के लूईस बर्गर ग्रुप को कन्सलटैन्ट नियुक्त किया गया था लेकिन जब तय समय सीमा के भीतर काम पूरा नही हुआ तो धूमल सरकार ने इसका कार्यकाल 14.4.2012 तक बढ़ा दिया। परन्तु जब मार्च 2012 में काम का आकलन किया गया तो पाया कि केवल 13.49% काम ही पूरा हुआ है कंपनी ने काम पूरा न होने के जो कारण बातये उनमें तीन मामलों में अदालत से स्टे जमीन अधिग्रहण के बाद कुछ लोगों को मुआवजे का भुगतान न हो पाना और 875 पेड़ो का न काटा जाना प्रमुख थें। इसी सड़क को लेकर जुब्बल के एक देवेन्द्र चैहान ने 2010 में उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की थी। इस याचिका की सुनवाई के दौरान 20.5.2011 को भू- अधिग्रहण अधिकारी को जमीन के मुआवजों के मामलें में एक माह के भीतर शपथपत्र दायर करने तथा कंजरवेटर फाॅरेस्ट भारत सरकार चण्डीगढ़ को पेडो के संद्धर्भ में आवश्यक अनुमतियां देने के निर्देश दिये। उच्च न्यायालय के इन निर्देशों पर भू-अधिग्रहण अधिकारी ने 15,46,22,031 रूपये का मुआवजा जाम करवा दिया। जिसमें से 13, 36,66, 867 रूपये का संबधित लोगों को तुरन्त भुगतान भी हो गया पेड़ों के संद्धर्भ में भी तीन दिन के भीतर सारी कारवाई हो गयी। उच्च न्यायालय ने सत्र न्यायधीश को भी सड़क के संबंध में आयी सारी याचिकाओं का एक माह के भीतर निपटारा करने के निर्देश दिये और यह निपटारा भी हो गया। इस तरह सड़क से जुडे सारे मामलों का उच्च न्यायालय के निर्देशों पर एक माह में निपटारा हो गया। लेकिन जब 2.7.2012 को यह मामला पुनः उच्च न्यायालय में लगा तब जो टिप्पणी अदालत ने की है वह चैंकाने वाली है। अदालत ने कहा है कि That there is hardly   tangible progress in work,  apparently, neither the  contractor nor the          Government is serious in the matter, what action the Govt. has taken in the     matter is not quite clear   despite the unsatisfactory progress in the execution of work. The contractor has been raising one or the other evasive objection to justify  their in-action,   instead of taking proper action for completing the work as per contract. It is high time that the Govt. view tha matter with       required seriousness.सरकार और उसके तन्त्र पर की गयी इस टिप्पणी के बाद 2013 में सरकार ने चीन की कंपनी से करार रद्द करके एक चड्डा एण्ड कंपनी को शेष बचा हुआ काम 350 करोड़ में दे दिया। अब यह कंपनी भी तय समय के भीतर जब काम पूरा नही कर पायी तो अन्र्तराष्ट्रीय विकास ऐसोसियेशन आईबीआरडी ने इस काम से अपने हाथ पीछे खींच लिये है। इस संगठन ने सरकार और कंपनी के काम पर गंभीर टिप्पणीयां की है। लेकिन सरकार ने ठेकेदार कंपनी के विरूद्ध ठेके की शर्तो के मुताबिक कोई कारवाई करने की बजाये कंपनी को छः माह का और समय काम पूरा करने के लिये दे दिया है। शेष बचे हुए काम के लिये करीब 45 करोड़ रूपया प्रदेश सरकार अपने पास से कंपनी को देगी। इस आशय का प्रस्ताव मन्त्रीमण्डल से बाई सरकुलेशन 30 जून को पारित करवाया गया है क्योंकि उसी दिन लोक निर्माण विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव नरेन्द्र चैहान ने सरकार से त्यागपत्र देकर मुख्य सूचना आयुक्त का पदभार ग्रहण किया है।
अभी भी यह काम छः माह मे पूरा हो पायेगा इसको लेकर सन्देह व्यक्त किया जा रहा है। जब 20.5.2011 को उच्च न्यायालय के निर्देशों पर एक माह के भीतर सारे मामलों का निपटारा हो गया था तो उसके बाद तय समय के भीतर काम क्यों पूरा नही हुआ? वीरभद्र सरकार आने के बाद 2013 में नयी कंपनी चड्डा एण्ड चड्डा को 350 करोड़ में काम दिया गया लेकिन 30 जून 2017 तक फिर काम पूरा नही हुआ और कंपनी को छः माह का और समय तथा करीब 45 करोड़ प्रदेश सरकार को अपने साधनों से देने का फैसला लेना पड़ा है। इस तरह 228 करोड़ से शुरू हुआ काम 400 करोड़ से भी अधिक में पूरा होगा लेकिन इस बढे़ हुए खर्च के लिये कौन जिम्मेदार है इसके लिये किसी की जवाबदेही क्यों तय नही की गयी है? कंपनी को और समय तथा पैसा देने की बजाये कंपनी के खिलाफ कारवाई क्यों नही की गयी? क्योंकि इस नयी कंपनी को तो काम करने के लिये कोई रूकावट ही नही थी। रूकावटें तो चीन की कंपनी के सामने थी जो उच्च न्यायालय के निर्देशों से जुलाई 2011 में ही समाप्त हो गयी थी, फिर यह चड्डा एण्ड चड्डा समय के भीतर काम क्यों नही कर पायी? इस काम के लिये नियुक्त कन्सलटैन्ट लुईस बर्गर से जवाब तलब क्यों नहीं किया गया? क्योंकि आखिर इस ऋण की भरपायी तो यहीं से होनी है। क्या यह कर्ज लेकर घी पीने का काम हो रहा है? ऐसे बहुत सारे सवाल जिनका जवाब सरकार को आने वाले समय में सरकार को देना होगा।

क्या अधिकारियों के आपसी हितों के टकराव का परिणाम है 14 करोड़ का सब्सिडी प्रकरण

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश का बागवानी विभाग इन दिनों अचानक चर्चाओं का केन्द्र बन गया है, क्योंकि राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत 2010-11 में स्थापित की गयी एंटीहेल गन खरीद को लेकर विजिलैन्स विभाग ने अब एक एफआईआर दर्ज की है। मिशन निदेशक और हेलगन स्पलाई करने वाली कंपनी ग्लोबल एवियेशन हैदराबाद के नाम यह मामला दर्ज हुआ है। जब से यह हेलगन स्थापित हुई है तभी से संबंधित क्षेत्र के बागवान इसके परिणामों से सन्तुष्ट नहीं रहे है। इस खरीद की जांच किये जाने की मांग तभी से उठती आयी है। कांग्रेस के आरोप पत्र में भी इस मामले को उठाया है लेकिन इस मामले में एफआईआर अब नगर निगम चुनावों के बाद हुई है। स्मरणीय है कि भारत सरकार ने वर्ष 2008- 09 में प्रदेश सरकार को इसके लिये 80 लाख रूपये दिये थे। इसके बाद वर्ष 2009 -10 में 2.80 लाख रूपया प्रदेश को दिया और इस तरह तीन करोड़ में से 2.89 करोड़ में ग्लोबल एवियेशन से हेलगन की खरीद हो गयी। इस पूरे प्रकरण की प्रक्रिया सचिवालय और सरकार के स्तर पर ही अंजाम में लायी गयी है। इसलिये विजिलैन्स की जांच इस सं(र्भ में तत्कालीन बागवानी मन्त्री और सचिव तक अवश्य आयेगी। इस हेलगन के आप्रेशन के लिये संभवतः रक्षा मन्त्रालय से भी अनुमति ली जानी थी जो कि शायद नही ली गयी है।
हेलगन प्रकरण अभी शान्त भी नही हुआ था कि ठियोग के बलघार में बने कोल्डस्टोर के लिये दी गयी 14 करोड़ की सब्सिडी पर सवाल उठ गये। मुख्यमन्त्री ने भी इस प्रकरण में जांच करवाये जाने की बात की है। मजे की बात यह है बागवानी विभाग के परियोजना निदेशक डा. प्रदीप संाख्यान जिन्होने यह सब्सिडी जारी की है उन्होने भी इसमें उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। बलघार में यह कोल्डस्टोर भारत सरकार की 50ः उपदान योजना के तहत 2015-16 में स्थापति हुआ है। 28 करोड़ के निवेश का यह कोल्डस्टोर एक हिम एग्रो फ्रैश ने स्थापित किया है। केन्द्र सरकार में यह प्रौजैक्ट 20.7.2015 को स्वीकृत हुआ और फिर इसके निर्माण का कार्य शुरू हुआ। इसका निर्माण शुरू होनेे के बाद विभाग की पहली संयुक्त निरीक्षण कमेटी ने 11.7.2016 को इसका निरीक्षण किया। इस कमेटी का गठन विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव तरूण श्रीधर द्वारा किया गया था। परियोजना निदेशक, वरिष्ठ मार्किटिंग अधिकारी, फ्रूट टैक्नौलोजिस्ट, विषय विशेषज्ञ, बैंकर और कोल्डस्टोर स्थापित करने वाली कंपनी के प्रतिनिधि इस निरीक्षण कमेटी के सदस्य थे। इस कमेटी की रिपोर्ट के बाद कंपनी को तब तक हुए काम और निवेश के आधार पर 3.8.2016 को 20 लाख की सब्सिीडी रिलिज कर दी जबकि 25.93 लाख दी जानी थी। 5.93 लाख इसलिये नहीं दी गयी कि विभाग के पास पैसा ही नही था। इस निरीक्षण कमेटी ने मौके पर हुए काम के बारे में पूरा सन्तोेष व्यक्त किया है।
इस पहली निरीक्षण के बाद विभाग के निदेशक डा. बवेजा स्वयं 10.3.2017 को इस कोल्डस्टोर को देखने गये। इसी बीच विभाग को केन्द्र से इसकी सब्सिडी के 11 करोड़ मिल जाते हैं और 23.3.2017 को विभाग इस पैसे को ड्रा कर लेता है। यह पैसा आने के बाद कंपनी को 5.93 लाख की पैमैन्ट कर दी जाती है जो पहले नही हो पायी थी। जब निदेशक डा. बवेजा इसके निरीक्षण के लिये गये तो उन्होनेे इसके निर्माण आदि पर कोई सवाल खडे नहीं किये। बल्कि 29.4.17 को अपनी रिपोर्ट में केवल यह कहा कि निरीक्षण टीम में कुछ और विशेषज्ञ शामिल कर लिये जायें। निदेशक के इस सुझाव पर एसएलईसी की फिर प्रधान सचिव की अध्यक्षता में बैठक हुई और इसमें पहली कमेटी में एचपीएमसी के रैफरिजेटर इंजिनियर डीजीएम और नौणी विश्वविद्यालय के प्रौफैसर को भी शामिल कर लिया विभाग के प्रधान सचिव जेसी शर्मा ने 22.5.17 को यह दूसरी संयुक्त निरीक्षण टीम का गठन कर दिया। इसी टीम ने 26.5.2017 को कोल्डस्टोर का निरीक्षण करके अपनी रिपोर्ट उसी दिन सौंप दी। यह रिपोर्ट मिलने के बाद 27.5.17 को ही सब्सिडी का सारा शेष पैसा कंपनी को रिलीज कर दिया गया। जब यह दूसरी निरीक्षण टीम गठित हुई निरीक्षण पर की गयी, उसने अपनी रिपोर्ट सौंपी और रिपोर्ट के दूसरे ही दिन सब्सिडी रिलिज कर दी गयी। इस पूरी प्रक्रिया में पांच दिन का समय लगा। 22.5.17 को यह प्रक्रिया शुरू होती है और 27.5.17 को पेमैन्ट के साथ पूरी हो जाती है। सब्सिडी रिलिज करने के लिये कंपनी ने सर्वोच्च न्यायालय के एक वकील कंवर जीत सिंह के माध्यम से विभाग को एक नोटिस भी जारी किया था।
इस पूरे प्रकरण में यह सवाल उठाया जा रहा है कि पूरी प्रक्रिया केवल पांच दिन में ही क्यों पूरी कर गयी? इस दौरान विभाग के निदेशक संभवतः विदेश दौरे पर थे और यह सारी प्रक्रिया प्रधान सचिव जेसी शर्मा के आदेशों से पूरी हुई है। इसमें यह महत्वपूर्ण है कि पहली जेआईटी केन्द्र की गाईडलाईनज़ पर विभाग के तत्कालीन अतिरिक्त मुख्य सचिव तरूण श्रीधर के आदेशों पर गठित हुई थी। इस जेआईटी में निदेशक बवेजा ने कुछ और विशेषज्ञ शामिल करने का सुझाव दिया? क्या उनकी नजर में पहली जेआईटी सक्षम नही थी? बवेजा के निर्देशों पर दूसरी जेआईटी गठित होती है और उसमें तीन नये लोग शामिल कर लिये जाते हैं। क्या बवेजा के निर्देशों पर दूसरी जेआईटी में तीन नये विशेषज्ञ शामिल किये जाने आवश्यक थे? यदि यह आवश्यक थे और उन्हे शामिल भी कर लिया गया तो क्या इस दूसरी जेआईटी की रिपोर्ट भी बवेजा के समाने नही रखी जानी चाहिये थी? क्या निरीक्षण टीम के सदस्यों की योग्यता पर दोनों बार डा. बवेजा को सन्देह था या फिर उनकी मंशा कुछ और थी? यदि मुख्यमन्त्री वास्तव में इसकी जांच करवाते हंै तभी इन सारे सवालों का खुलासा हो पायेगा। वैसे इस प्रकरण के इस तरह चर्चा में आने से भविष्य में कोई भी निवेश करने के लिये आगे नही आयेगा।

क्या बड़े बाबूओं के हितों के टकराव के कारण नहीं भरे जा रहे रेगुलैटरी कमीशन और ट्रिब्यूनल के खाली पद

शिमला/शैल। प्रदेश का शिक्षा के लिये गठित रेगुलेटरी कमीशन एक वर्ष से भी अधिक समय से खाली चला आ रहा है। प्रदेश में पिछले छः महीने से ही कोई लोकायुक्त भी नही है। पिछले दिनो प्रदेश प्रशासनिक ट्रिब्यूनल में प्रशासनिक सदस्य का खाली हुआ पद भी अभी तक भरा नहीं गया है। यह सारे संस्थान महत्वपूर्ण संस्थाएं हैं और इनका इस तरह खाली रहना न केवल इनकी अहमियत को ठेस पहुंचाता है बल्कि सरकार और उसके शीर्ष प्रशासन की नीयत और नीति पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। रेगुलेटरी कमीशन और प्रशासनिक ट्रिब्यूनल में सरकार के मौजूदा या सेवानिवृत हो चुके बडे़ बाबूओं में से ही किसी की तैनाती होनी है। इन पदों के लिये दर्जनों बाबुओं ने दावेदारी भी पेश कर रखी है। लोकायुक्त के पद पर किसी उच्च न्यायालय का वर्तमान या सेवानिवृत मुख्य न्यायधीश या फिर सर्वोच्च न्यायालय का भी ऐसा ही कोई न्यायधीश नियुक्त होना है। चर्चा है कि इस पद के लिये अन्यों के अतिरिक्त प्रदेश उच्च न्यायालय के सेवानिवृत मुख्य न्यायधीश मंसूर अहमद मीर और सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत मुख्य न्यायधीश टी एस ठाकुर भी दावेदार हैं। इन दोनों के ही मुख्यमन्त्राी के साथ अच्छे व्यक्तिगत संबंध है। संभवतः इन्ही संबंधो के कारण यह चयन कठिन हो गया है।
लेकिन रेगुलेटरी कमीशन और प्रशासनिक ट्रिब्यूनल में नियुक्तियां क्यों नही हो पा रही हैं इसको लेकर कई तरह की चर्चाएं उठनी शुरू हो गयी हैं। इस समय वीसी फारखा की बतौर मुख्यसचिव पदोन्नति और तैनाती को उनसे वरिष्ठ विनित चैधरी ने कैट में चुनौती दे रखी है। इसमें अभी प्रदेश सरकार और केन्द्र सरकार से जवाब दायर होने हैं। माना जा रहा है कि इस समय केन्द्र सरकार में सचिव कार्मिक का पदभार अजय मित्तल के पास आ गया है और मित्तल हिमाचल कार्डर से ही ताल्लुक रखते हैं इसलिये अब केन्द्र सरकार से जवाब आने में ज्यादा समय नही लगेगा। बल्कि फारखा के बाद तरूण श्रीधर दूसरे वरिष्ठ अधिकारी हैं और केन्द्र के सचिव पैनल में आ गये है। मुख्यमन्त्राी ने उनके दिल्ली जाने को भी हरी झण्डी दे दी है। परन्तु विनित चैधरी की याचिका में फारखा से ज्यादा तरूण श्रीधर की भूमिका पर सवाल खड़े किये गये हैं। संभवतः इन्ही सवालों के साथ उनके केन्द्र में सचिव पद के चयन पर भी सवाल उठाये गये हैं और इन सवालों पर राज्य सरकार से भी जवाब मांगा गया है। इस परिदृश्य में फारखा और श्रीधर दोनों ही अधिकारियों के रेगुलेटरी कमीशन या ट्रिब्यूनल में जाने की संभावना बहुत कम है क्योंकि अभी दोनों की नौकरी काफी शेष है। फिर फारखा को मुख्यमन्त्री भी छोड़ना नही चाहंेगे। लेकिन कल को विधानसभा चुनावों की घोषणा के साथ ही इलैक्शन कोड लागू होने पर यदि उनके मुख्य सचिव रहने पर चुनाव आयोग में आपत्ति उठा दी जाती है तो उस स्थिति में एकदम सारा परिदृश्य बदल जायेगा। लेकिन इस स्थिति को आने में अभी दो तीन माह का समय लग जायेगा।
ऐसे में यह सवाल सचिवालय के गलियारों की चर्चा बना हुआ है कि अभी निकट भविष्य में इन पदों को भरे जाने की संभावना नही है। परन्तु इसी के साथ यह भी चर्चित हो रहा है कि यदि कोड आॅफ कन्डक्ट लागू होने तक यह पद नही भरे जाते हैं तो फिर यह नियुक्तियां नई सरकार के गठन के बाद ही हो पायेंगी। मजे की बात यह है कि इन अहम पदों के खाली चले आने पर विपक्ष की ओर से भी कोई सवाल नही उठाये जा रहें हैं। रेगुलेटरी कमीशन में मुख्यमन्त्री के प्रधान निजि सचिव सुभाष आहलूवालिया की पत्नी मीरा वालिया ने प्रधानाचार्य के पद से सेवानिवृत होकर बतौर सदस्य ज्वाईन किया था लेकिन जैसे ही लोक सेवा आयोग में सदस्य का पद खाली हुआ तो मीरा वालिया ने रेगुलेटरी कमीशन से त्यागपत्रा देकर लोकसेवा आयोग में जिम्मेदारी संभाल ली। अब रेगुलैटरी कमीशन बिल्कुल खाली हो गया है। इन पदों को समय पर भरने के लिये और सारी स्थिति को मुख्यमन्त्राी के संज्ञान में लाने की जिम्मेदारी मुख्यमन्त्री के अपने ही कार्यालय की होती है, परन्तु मुख्यमन्त्री के कार्यालय पर तो सेवानिवृत अधिकारियों का कब्जा है। उन्होने चुनाव लड़कर जनता से वोट मांगने तो जाना नही है। फिर ऐसे पदों के इतने लम्बे समय तक खाली रहने से सरकार की जनता में छवि पर क्या असर पड़ता है इससे उनको कोई सरोकार कैसे हो सकता है। माना जा रहा है कि बडे़ बाबूओं के हितों में चल रहे टकराव के कारण अभी यह पद भरे जाने की कोई संभावना नही है।

भ्रष्टाचार के प्रकरण में वीरभद्र की विजिलैन्स की सक्रियता और भाजपा की अस्पष्टता क्या रंग दिखायेगी

शिमला/शैल।  नगर निगम शिमला के चुनावों के बाद जहां भाजपा ने सत्ता परिवर्तन के लिये रथ यात्राएं शुरू की हैं वहीं पर वीरभद्र की विजिलैन्स ने भी अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। भाजपा की रथ यात्रा में वीरभद्र सरकार के भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर जनता को जागृत किया जा रहा है। उधर विजिलैन्स ने भ्रष्टाचार के दो मामलों में एफआईआर दर्ज कर ली है। एक एफआईआर धूमल शासन में खरीदी गयी एंटी हेलगन मामले में है तो दूसरी आईपीएच की गिरी वाॅटर स्पलाई योजना को लेकर है। इन दोनों मामलों में विजिलैन्स को एफआईआर दर्ज करने की अनुमति अभी निगम चुनावों के दौरान ही दी गयी है। स्वभाविक है कि यह अनुमतियां दिये जाने से पहले यह मामले मुख्यमन्त्री और उनके सचिवालय के संज्ञान में लाये गये होंगे क्योंकि गृह और सतर्कता का कार्यभार भी मुख्यमन्त्री के अपने ही पास है। यह मामले कांग्रेस के आरोप पत्र में दर्ज रहे हैं और आरोप पत्र विजिलैन्स को जांच के लिये भी सत्ता संभालने के बाद हुई पहली मन्त्रीमण्डल की बैठक में भेजने का निर्णय ले लिया गया था। ऐसे में यह सवाल उठना भी स्वभाविक है कि यह मामले अभी क्यों दर्ज हुए और क्या इनके अन्तिम परिणाम अभी आ पायेंगे? ऐसी संभावना कम है क्योंकि अब तक जिन मामलों पर विजिलैन्स का ध्यान केन्द्रित रहा है उनमें ही कोई परिणाम सामने नही आये हैं। ऐसे में इन नये मामलों को चुनावी रणनीति के आईने में ही देखा जायेगा। कांग्रेस और वीरभद्र सरकार की इस रणनीति के क्या परिणाम होंगे इसको लेकर सवाल उठने शुरू हो गये हैं, क्योंकि निगम चुनावों में मिली हार का ठीकरा वीरभद्र और सुक्खु ने खुलकर एक दूसरे के सिर फोड़ा है। दूसरी ओर भाजपा अपनी रथ यात्रा में भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर जनता से सत्ता परिवर्तन का आग्रह कर रही है। भाजपा का सारा शीर्ष नेतृत्व शान्ता से लेेकर नड्डा तक वीरभद्र सरकार को भ्रष्टाचार का पर्याय प्रचारित कर रहा है। सरकार पर माफियाओं को संरक्षण देने के आरोप लगाये जा रहे हैं। वीरभद्र सीबीआई से जमानत पर चल रहे है और उनका अधिकांश समय अदालतों में केसों के प्रबन्धन में व्यतीत हो रहा है। यह आरोप लगाया जा रहा है कि जिस मुख्यमन्त्री का ज्यादा वक्त अदालतों में गुजर रहा है उसके पास प्रदेश के विकास के बारे में सोचने का समय ही कहां बचा है। आम आदमी को थोड़े समय के लिये प्रभावित करने में इस प्रचार से लाभ मिल सकता है लेकिन जब इसी तस्वीर का दूसरा चेहरा जनता के सामने आयेगा तो स्थिति एकदम दूसरी हो जायेगी। क्योंकि यह सही है कि वीरभद्र केन्द्र की जांच ऐजैन्सीयों द्वारा बनाये गये मामलों में उलझे हुए हैं और इन मामलों के अन्तिम परिणाम नुकसानदेह भी हो सकते है। परन्तु बड़ा सवाल तो यह है कि अन्तिम परिणाम आयेगा कब? सीबीआई मामलें में वीरभद्र सहित सारे नामज़द अभियुक्तों को जमानत मिल चुकी है। इस मामले में राजनीतिक लाभ मिलना संभव नही है। सीबीआई मामले को अदालत से अन्जाम तक पहुंचाने में समय लगेगा। सीबीआई के साथ ईडी में चल रहे मनीलाॅंड्रिंग प्रकरण में ऐजैन्सी ने 23 मार्च 2016 को पहला अटैचमैन्ट आर्डर जारी किया और करीब आठ करोड़ की चल/अचल संपत्ति अटैच की। इसके बाद जुुलाई में वीरभद्र सिंह के एलआईसी ऐजैन्ट आनन्द चैहान की गिरफ्तारी हुई जो अब तक चल रही है। इस गिरफ्तारी के बाद अब ईडी ने एक और अटैचमैन्ट आदेश जारी किया है लेकिन इस पर कोई गिरफ्तारी नही हुई है। बल्कि अब जो तिलकराज प्रकरण हुआ है वह भी ईडी में जा पहुंचा है। तिलक राज और अशोक राणा गिरफ्तार चल रहे हैं। परन्तु उससे आगे कुछ नही हुआ है और यह न होना ही सारे प्रकरण को राजनीतिक द्वेष का रंग दे रहा है। ईडी पर अदालत की ओर से कोई रोक नहीं है। तिलकराज प्रकरण में सूत्रों के मुताबिक जो पैसा लिया जा रहा था वह वास्तव में ही मुख्यमन्त्री के ओएसडी रघुवंशी तक जाना था। उच्चस्थ सूत्रों के मुताबिक दिल्ली में एक बडे को 1.85 करोड़ की अदायगी की जानी थी। इसमें 1.50 करोड़ का प्रबन्ध शिमला में बैठे प्रबन्धकों ने कर लिया था। शेष 35 लाख तिलकराज ने जुटाना था और उसी के जुगाड़ में तिलकराज सीबीआई के  ट्रैप  का शिकार हो गया। चर्चा है कि इस ट्रैप के पिछले दिन ही चण्डीगढ़ के एक हितैषी ने जिससे सुभाष आहलूवालिया के प्रकरण में ईडी कभी कुछ पुछताछ भी कर चुकी है उसने बद्दी जाकर तिलकराज सहित ड्रग और पाल्यूशन के बड़ो को भी सचेत किया था कि किसी के भी खिलाफ कभी भी बड़ी कारवाई हो सकती है और दूसरे ही दिन यह घट गया। इसी तरह यह भी चर्चा है कि जब ईडी ने मई में वीरभद्र को रात करीब दस बजे तक पूछताछ के लिये रोका था उस दिन भी भाजपा के एक बडे़ नेता के ईशारे पर बड़ी कारवाई को रोक दिया गया था। चर्चा है कि इस बडे़ नेता ने अरूण जेटली के समाने यह रखा है कि यदि वीरभद्र के खिलाफ बड़ी कारवाई को अन्जाम दिया जाता है तो भाजपा को इससे प्रदेश के चुनावों में 25 सीटों का नुकसान हो सकता है। भाजपा के इस बड़े नेता की यह आशंका नगर निगम के चुनावांे में सही भी सिद्ध हुई है। क्योंकि इतने बडे चूनावी प्रचार के वाबजूद भाजपा को परिणामों में स्पष्ट बहुमत नही मिल पाया। वीरभद्र और सुक्खु के टकराव के परिणामस्वरूप कांग्रेस चुनाव में कहीं नजर ही नही आ रही थी। इतनी सफलता भी वीरभद्र के व्यक्तिगत प्रयासों से ही मिली है। ऐसे में आने वाले दिनों में वीरभद्र की विजिलैन्स की सक्रियता और वीरभद्र मामले में भाजपा की अस्पष्टता क्या रंग दिखाती है। इस पर सबकी निगाहें रहेंगी।

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