Friday, 16 January 2026
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न्याय मंच के आंदोलन को कंट्रोल करने से नही,पुलिस जांच पर उभरे संदेहों का निराकरण करने से होगी स्थिति सामान्य

शिमला/शैल। गुडिया गैंगरेप व मर्डर, फारेस्ट गार्ड होशियार सिंह के कातिलों को पकड़ने की मांग व लापता मेदराम की तलाश को लेकर आम आदमी की आवाज सता के गलियारों तक गुंजाने के लिए उतरी भीड़ को काबू करने के लिए वीरभद्र सिंह सरकार ने डीसी, एसपी व पुलिस बलों के अलावा फायर विभाग को मैदान में उतार दिया हैं।
शिमला में गुडिया गैंगरेप व मर्डर कांड के बाद पहली बार वीरभद्र सिंह सरकार ने आंदोलनकारियों को कंट्रोल करने के लिए पुलिस को मैदान में उतारा हैं। इससे पहले आंदोलनकारी धारा 144 तोड़ कर मालरोड़ से सचिवालय जाते थे। चूंकि ये राजनीतिक प्रदर्शन नहीं था, तो शायद मंच ने टकराव का रास्ता नहीं अपनाया नहीं तो आज पुलिस व आंदोलनकारियों के बीच भिड़ंत हो ही जाती।
मामूली घरों के इन तीनों पीडितों की ओर से न्याय की आवाज प्रदेश सरकार ने कितनी सुनी इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि गुडिया गैंगरेप कांड की जांच में पुलिस की ओर से किए गए कारनामों के बाद सीबीआई जांच शुरू हो गई हैं।
जबकि करसोग में फारेस्ट गार्ड होशियार सिंह के कत्ल में प्रदेश पुलिस किस तरह की जांच कर रही हैं, ये हाईकोर्ट की टिप्पणियों से जाहिर हो चुका है। मेदराम एक अरसे से लापता है, लेकिन उसे तलाशने में पुलिस नाकाम हैं।
यहां ये महत्वपूर्ण है कि गुडिया गरीब घर से थी। वो बीपीएल परिवार से थी। फारेस्ट गार्ड हाशियार सिंह को उसकी दादी ने पाला था। उसके मां बाप मर चुके थे। मुश्किल से वो फारेस्ट गार्ड लगा था व अभी नौकरी में साल भी नहीं हुआ था कि उसका कत्ल हो गया। उसकी डायरी में बहुत कुछ लिखा हुआ हैं। अब उसकी बूढ़ी दादी ही बची है। यही स्थिति मेदराम की भी है, वो भी एक अरसे से लापता है।
सरकार व एजेंसियों की नाकामियां कभी उजागर नहीं होती अगर समाज आगे आकर आवाज नहीं उठाता। इन तीनों परिवारों में ऐसा कोई भी नहीं था जिनकी फरियाद सरकार व एजेंसियों के कानों तक पहुंचती। गुडिया गैंगरेप कांड व होशियार सिंह मामले में पुलिस ने जो कारनामे किए, उसके खिलाफ पूरे प्रदेश में आक्रोश सड़कों पर उतर आया है। उस आक्रोश में भाजपा, कांग्रेस, वामपंथी सब साथ थे। अब सरकार ने पुलिस व प्रशासन को सड़कों पर उतार दिया है।
गुडिया न्याय मंच के बैनर तले इन परिवारों के परिजन न्याय की आस में इसलिए सड़कों पर है ताकि एजेंसियां कोई और गुल न खिला दें। लेकिन वीरभद्र सरकार उस आवाज को भी कंट्रोल करने पर तुल गई है।
गुडिया न्याय मंच के बैनर तले जब भारी भीड़ सीटीओ से मालरोड होते सचिवालय के लिए जाने के लिए एकत्रित हुई तो महिला डीसी रोहन ठाकुर, एसपी सौम्या सांबशिवन पूरी विनम्रता के साथ भीड़ के आगे आ गए और गुडिया न्याय मंच के प्रतिनिधियों कुलदीप तनवर, राकेश सिंघा, संजय चैहान समेत बाकियों से आग्रह किया कि वो धारा 144 न तोड़े व वाया लोअर बाजार जाएं। चूंकि डीसी व एसपी मौके पर थे तो बाकी अफसर भी साथ ही आ गए।
लेकिन इससे पहले सीटीओ पर बैरीकेटस लगा पुलिस ने भारी बंदोबस्त कर रखे थे। महिला पुलिस, पुरूष पुलिस के अलावा अग्निशमन विभाग की गाड़ी भी तैनात कर दी गई। ये साफ संदेश था। ताकि अगर मंच के बैनर तले एकत्रित लोगों ने बैरिकेटस तोड़ आगे बढ़ने की कोशिश की तो बल इस्तेमाल करने का पूरा इंतजाम था।
बहरहाल, ये सारे इंतजाम देखते हुए, पीडितों की लड़ाई कहीं और दिशा न पकड़ लें, मंच ने टकराव न करने का फैसला लिया। नाज के पास भीड़ सचिवालय के बजाय माल रोड़ की ओर से मुड़ जाए पुलिस ने वहां भी बेरीकेटस लगा दिए। इससे भीड़ में गुस्सा जरूर आया व नाज पर जमकर नारेबाजी की गई लेकिन भीड़ आगे सचिवालय की ओर बढ़ गई। भीड़ के नाज पर रुक जाने पर मंच के एक पदाधिकारी ने बाद में कहा भी कि समझौता हो गया है, इसलिए यहां क्यों रोका होगा। लेकिन बाद में पता चला कि ये ठहराव केवल गुस्सा जाहिर करने के लिए था। शुक्र है कि मंच के पदाधिकारियों ने टकराव का रास्ता नहीं अपनाया अन्यथा वीरभद्र सिंह सरकार की फजीहत और हो जाती।
लेकिन सरकार के लिये स्थिति अभी सुखद नही है क्योंकि फारेस्ट गार्ड होशियार ंिसंह के मामलें में अब उच्च न्यायालय ने भी संज्ञान लेते हुए सरकार से दो टूक पूछा है कि यह मामला भी सीबीआई को क्यों न सौंप दिया जायें यह नौबत इसलिये आई है क्योंकि पुलिस जांच की रिपोर्ट आम आदमी के गले नही उतर पायी हैं हर संवेदनशील मामले में पुलिस की नीयत और नीति गंभीर सन्देहों में घिरती जा रही है इससे सरकार और खासतौर पर स्वयं मुख्यमन्त्री और उनके सचिवालय की विश्वनीयता सवालों में आ खड़ी हुई है। अब विधानसभा चुनावों को सामने रखते सरकार को अपनी विश्वनीयता बहाल करने के लिये या तो इन मामलों के गुनाहागारों को पकड़ कर या फिर संवद्ध पुिलस अधिकारियों के खिलाफ कारवाई करने के अतिरिक्त और कोई कारगर विकल्प नही बचा है क्योंकि गुड़िया मामलें में पुिलस की कार्यप्रणाली पर पोस्टमार्टम रिपोर्ट से लेकर मुख्यमन्त्री के फेसबुक पेज पर कथित अपराधियों के फोटो आने फिर हटा लिये जाने से जो सन्देह उभरे है वह अभी तक अपनी जगह बने हुए है। यदि सीबीआई भी इन सन्देहों पर से पर्दा न हटा पायी तो जनाक्रोश को एक बार सड़कों पर आने से कोई नही रोक पायेगा और वह स्थिति सरकार के लिये बहुत घातक सिद्ध होगी यह तय है।

चुनावी वक्त पर तीसरे दलों की दस्तक के मायने

शिमला/शैल। प्रदेश विधान सभा के चुनाव इस वर्ष के अन्त में नवम्बर दिसम्बर में होने तय है। हिमाचल में अरसे से सत्ता कांग्रेस और भाजपा के बीच ही केन्द्रित रही है। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि प्रदेश की जनता को इन दोनों में से किसी एक को चुनना उसकी विवशता रही है। क्योंकि इनका कोई राजनीतिक विकल्प टिक ही नही पाया। क्योंकि कोई भी जनता में अपनी विश्वसनीयता स्थापित ही कर पाया। तीसरे दल जनता को न तो यह समझा पाये कि कांग्रेस और भाजपा की सरकारों ने प्रदेश का कहां और क्या अहित किया और न ही इस पर

आश्वस्त कर पाये की उनके पास विकल्प में क्या योजना है। आज प्रदेश एक प्रकार से कर्ज के चक्रव्हू में इस कदर उलझ चुका है कि कर्ज लेकर घी पीने की कहावत चरितार्थ हो रही है। प्रदेश की इस स्थिति के लिये कांग्रेस और भाजपा की सरकारें कितना-कितना जिम्मेदार रही हैं इस पर तीसरे दलों की ओर से प्रदेश की जनता के सामने कभी कोई तस्वीर रखी ही नही है। जब कोई विकल्प बनने का दावा करने वाला इस मूल प्रश्न पर ही मौन रहेगा तो उसकी विश्वसनीयता का आकंलन अपने आप ही हो जाता है। 

आज हिमाचल में फिर कुछ दलों ने चुनावी दस्तक देने की घोषणाएं की है। इनमें ‘‘राष्ट्रीय आजाद मंच’’ ‘‘राम’’ ने प्रदेश में सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर रखी है। इस मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष चण्डीगढ़ स्थित एक एडवोकेट सत्यव्रत हैं लेकिन हिमाचल की जिम्मेदारी 88 वर्षीय लै. जनरल पीएन हूण को सौंपी गयी है। जनरल हूण सेना के एक सम्मनित अधिकारी रहे हैं  और अभी कुछ समय पहले तक वह केन्द्र सरकार के सलाहकार भी रहे हैं । सलाहकार का पद छोड़ने के बाद वह राजनीति में सक्रिय हो रहे हैं और भूतपूर्व सैनिकों के सहारे आगे बढ़ना चाह रहे हैं। हिमाचल का सेना में बड़ा योगदान और प्रदेश में भूतपूर्व सैनिकों की संख्या भी काफी है। जनरल हूण ने पिछले दिनों जब शिमला में एक पत्राकार वार्ता को संबोधित किया था तब उनका ज्यादा फोकस भूतपूर्व सैनिकों पर ही था। सूत्रों की माने तो  मन्त्री  कर्नल धनी राम शांडिल और पूर्व  मन्त्री  विजय सिंह मनकोटिया जनरल हूण के संर्पक में हैं । 88वर्षीय जनरल प्रदेश के भूतपूर्व और वर्तमान सैनिकों के सहारे कंहा तक आगे बढ़ते हैं यह आने वाला समय ही बतायेगा।
इसी तरह एक लोक गठबन्धन पार्टी ने भी प्रदेश की 68 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है। इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष पांडे भारत सरकार के सचिव पद से निवृत होकर राजनीति में आये हैं और बहुत सारे गंभीर मुद्दों पर लोगों का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास कर हरे है। जस्टिस सी एस कर्णनन का खुलकर समर्थन किया है लोक गठबन्धन पार्टीं ने। हामिद अंसारी ने उपराष्ट्रपति पद से कार्यकाल पूरा होने के बाद जिस तरह की चिन्ता मुस्लिम समुदाय को लेकर व्यक्त की है लोक गठबन्धन पार्टी ने उसका खुलकर समर्थन किया है। किसानों की आत्महत्याओं से लेकर बैंको के लाखों करोड़ो के एनपीए पर पार्टी ने पूर्व और वर्तमान सरकारों की नीतियों पर खुलकर प्रहार किया है। यह पार्टी जिस तरह अपने लिये एक बौद्धिक आधार तैयार कर रही है उसमें कितनी सफलता मिलती है यह तो आने वाले दिनों में ही पता चलेगा। लेकिन इसका हिमाचल को लेकर क्या एजैण्डा है यह अभी तक सामने नही आया है।
आम आदमी पार्टी हिमाचल में विधानसभा चुनाव नही लड़ रही है क्योंकि वह अपने प्रदेश नेतृत्व को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नही हो पायी।
क्योंकि  यहां ‘आप’ सोशल मीडिया से बाहर जमीन पर कहीं नजर ही नही आ रही थी इसलिये इन्हें चुनाव न लड़ने का फैसला लेना पड़ा है। लेकिन इस बार मायावती की बसपा प्रदेश में चुनाव लड़ने जा रही है। यह संकेत पिछले दिनों सेवानिवृत हुए डी जी पी पृथ्वीराज की अचानक सामने आयी राजनीतिक सक्रियता से उभरे हैं । पृथ्वीराज ने जिस तरह से सेवानिवृत होने के बाद कृष्णा नगर में एक पार्टी का आयोजन किया और उसके बाद अम्बेदकर की प्रतिमा के आगे संकल्प लिया है उससे यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि वह राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने जा रहे हैं  और बहुत संभव है कि बसपा उन्हें यहां की जिम्मदारी सौंपे। वामपंथी शिमला नगर निगम के महापौर और उपमहापौर पदों पर पिछली बार काबिज रह चुके हैं। इस नाते अब प्रदेश विधानसभा की सारी सीटों पर चुनाव लड़ना उनकी राजनीतिक आवश्यकता माना जा रहा है।
इस परिदृश्य में यदि यह सारे दल तीन प्रतिशत वोट भी ले जाते हैं तो निश्चित तौर पर प्रदेश की राजनीति का खेल उल्टा कर रख देंगे। क्योंकि भाजपा के पूरे प्रयासों के बावजूद पार्टी को नगर निगम में अपने दम पर बहुमत नही मिल पाया है। फिर भाजपा में नेतृत्व के प्रश्न पर अस्पष्टता बनी हुई है। इस लिये इन तीसरे दलों की भूमिका को कम करके आंकना सही नही होगा।

शिंदे के फरमान के बाद वीरभद्र विरोधीयों की रणनीति पर लगी निगाहें

शैल/शिमला। प्रदेश कांग्रेस का प्रभार संभालने के बाद अपनी पहली पत्रकार वार्ता में सुशील कुमार शिन्दे ने यह दावा किया है कि इस समय न तो सरकार के नेतृत्व में परिवर्तन होगा ओर न ही संगठन के। शिन्दे के प्रभार संभालने से कांग्रेस सरकार और संगठन में चल रहे मतभेद इस सीमा तक पहुंच गये थे कि कांग्रेस के छः विधायकों द्वारा मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह के खिलाफ एक पत्र कांग्रेस हाईकमान को भेज दिया था। कांग्रेस हाईकमान को पत्र भेजने के साथ ही प्रदेश अध्यक्ष को भी इसकी अध्किारिक सूचना दे दी गयी थी और इसकी पुष्टि मीडिया को स्वयं सुक्खु ने की थी। यही नही इस पत्र की चर्चा बाहर आने के बाद परिवहन मन्त्री जीएसबाली ने अपने जन्मदिन पर कांगड़ा में पहले की ही तरह उएक आयोजन रखा था । इस अवसर पर कांग्रेस के कई नेता और मंत्री तक पहुंये थे। सुक्खु दिल्ली से सीधे इसके लिये कांगड़ा पहुंचे थे इस आयोजन को मीडिया ने वीरभद्र विरोधीयों का शक्ति प्रदर्शन करार दे दिया था और मीडिया के ऐसे चित्रण पर किसी ने भी इसका खण्डन तक नही कियां बल्कि बाली के इस आयेाजन के बाद प्रदेश के राजनीतिक हल्को में तो यहां तक चर्चा फैल गयी कि बाली और उनके साथी विधायक कभी भी भाजपा का दामन थामने की घोषणा कर सकते है।
ल्ेकिन अब जब पत्रकार वार्ता में शिन्दे  से पार्टी के विधायकों द्वारा ऐसा पत्र लिखे जाने के बारे में पुछा गया तो उन्होने इससे स्पष्ट इन्कार कर दिया। यहां तक कह दिया कि स्वयं सुक्खु की ओर से भी उन्हे ऐसे पत्र की जानकारी नही दी गयी है। जब शिंदे ने यह इन्कार किया तो सुक्खु उनकी बगल में ही बैठे थे और वह इस पर आज एकदम खामोश बैठे रहे। जिस पार्टी अध्यक्ष ने स्वयं ऐसा पत्र लिखा जाना मीडिया में स्वीकारा हो आज उसी के सामने प्रभारी द्वारा उसे एक तरह से सिरे से खारिज कर देना अध्यक्ष की विश्वसनीयता पर सवाल खडे कर जाता है। कल मीडिया सुक्खु के किसी भी कथन पर आसानी से विश्वास नही कर पायेगा और सार्वजनिक जीवन में यह विश्वनीयता ही सबसे बड़ा हथियार होती है। सुक्खु ने विधायकों के इस कथित पत्र को यह कह कर सार्वजनिक नही किया था कि इससे विधायको के साथ विश्वासघात होगा। अब जिन विधायकों के लिये सुक्खु ने प्रभारीे के हाथों अपनी यह फजीहत झेली है वह विधायक और सुक्खु जनता में अपनी विश्वसनीयता बहाल करने के लिये क्या कदम उठायेंगे। क्योंकि जब वीरभद्र समर्थकों ने विधायकों का एक पत्र हाईकमान को देकर सुक्खु को हराने की मांग की थी तब 24 विधायकों ने सुक्खु के समर्थन में पत्र लिखकर अध्यक्ष में अपना विश्वास व्यक्त किया था।
जब मनकोटिया को पर्यटन विकास बोर्ड के उपाध्यक्ष पद से बर्खास्त किया गया था और मनकोटिया ने शिमला में एक पत्रकार वार्ता में खुलकर वीरभद्र के खिलाफ हमला बोला था तब बाली ही एक मात्र ऐसे मंत्री थे जो मनकोटिया के साथ खड़े दिखे थे। फिर वीरभद्र ने भी मनकोटिया - बाली के गठजोड़ पर खुलकर कटाक्ष किया था। बाली के केन्द्र में कुछ भाजपा मन्त्रीयों के साथ अच्छे रिश्ते और उनके साथ अवसर होती रही बैठके भी प्रशासनिक और राजनीतिक हल्को में किसी किसी से छुपी नही रही है। चौधरी वीरेन्द्र सिंह से तो कांग्रेस के समय से उनके रिश्ते बहुत निकटता के रहे है जो आज तक कायम है। संभवतः इन्ही रिश्तो के कारण बाली को लेकर यह फैल चुका है कि बाली देर सवेर चुनावों से पहले भाजपा में जायेंगे ही। बाली को लेकर बन रही इन धारणाओं को विराम लगाने का भी कोई प्रयास सामने नही आया है। हालांकि अब शिंदे बाली के घर भी जा आये है। शिंदे को प्रभारी के नाते प्रदेश कांग्रेस में एक जुटता बनाये रखना जहां पहली राजनीतिक आवश्यकता है वहीं पर यह प्रबन्ध करना भी उतना ही आवश्यक होगा कि सरकार और स्वयं मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह के खिलाफ लगने वाले आरोप कम से कम बाहर आयें। लेकिन इस दिशा में जब शिंदे ने मनकोटिया के खिलाफ अनुशासनात्मक कारवाई किये जाने का संकेत दे दिया है तब लगता है कि इस संद्धर्भ में शिंदे के सामने भी अभी तक सही तस्वीर नही आ पायी है।
वीरभद्र पिछले दिनो यह सार्वजनिक मंच से कह चुके हैं कि उनके ऊपर हो रहे भाजपा के हमलों संगठन की ओर से कोई भी उनके बचाव में नही आ रहा है। भाजपा ने कानून व्यवस्था और मुख्यमन्त्री पर लग रहे भ्रष्टाचार के आरोपों को ही चुनाव का केन्द्रिय मुद्दा बनाने की रणनीति बना रखी है। बल्कि विधानसभा के मानसून सत्र में भी इन्ही मुद्दों पर सरकार को घेरा जायेगा । ऐसे में अब यह देखना दिलचस्प होगा कि शिंदे के प्रभार संभालने के बाद कौन - कौन मुख्यमन्त्री के बाचव में आता है और भाजपा पर भी उसी तर्ज में हमला कर पाता है। क्योंकि यदि कांग्रेस मनकेाटिया के खिलाफ कारवाई करती है तो मनकोटिया के मिले और तेज हो जायेगे और वह सब पर भारी पड़ जायेगा।

क्या चुनावी हार की आशंका से लाया गया था ये प्रस्ताव उठने लगा है ये स्वाल

शैल/शिमला। प्रदेश सरकार पूर्व मुख्यमन्त्रीयों को कुछ सुविधाएं देने का प्रस्ताव लायी थीं मन्त्री परिषद की बैठक में सामान्य विभाग की ओर से उलाये गये प्रस्ताव के अनुसार पूर्व मुख्य मन्त्रीयों से अब एक नियमित डाक्अर और काफिले में डाक्टर मुक्त एंबुलैन्स डाक्टर सहित एक एस यू वी गाडी पंसद के दो सुरक्षा अधिकारी एवम लैण्ड लाईन और मोबाईल के लिये वर्ष 50 हजार तथा प्रशासनिक खर्च के लिये एक लाख रूपये प्रतिवर्ष देने जा रही थी। इस आश्य का प्रस्ताव मन्त्री परिषद में लाया गया लेकिन जब इसके राजनीतिक प्रभाव की ओर कुछ मन्त्रियों ने ध्यान आर्किषत किया तो इसे वापिस ले लिया गया। मन्त्रियों का तर्क था कि अब तीन माह बाद प्रदेश विधान सभा के चुनाव होने वाले है। ऐसे में इस फैसले को लेकर पार्टी की चुनावी संभावनाओं के बारे में लोगों में नकारात्मक संदेश जायेगा इसलिये ऐसा फैसला नही लिया जाना चाहिये।
सरकार और पार्टी सत्ता में न केवल वापसी बल्कि वीरभद्र को सातंवी बार मुख्यमन्त्री बनाने के दावे करती आ रही है। पार्टी के नये प्रभारी शिंदे ने वीरभद्र और सुक्खु के बीच चल रहे टकराव को विराम देने के लिये अनुशासन का चाबुक चलाकर सबको एकजुट रहने की नसीहत देते हुए यहां तक ऐलान कर दिया कि न तो सुक्खु हटेंगे और न ही वीरभद्र। बल्कि कुछ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं द्वारा सुक्खु को हटाने के लिये लगाये गये नारों का कड़ा संज्ञान लेते हुए वीरभद्र के बेटे और युवा कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष विक्रमादित्य सिंह से भी मंच से यह ऐलान करवाया कि भविष्य में प्रदेश अध्यक्ष की राय से ही हर फैसला लेंगे और उन्हे पूरा सहयोग देंगे। यह माना जा रहा है कि यदि आने वाले विधानसभा चुनावों में ईमानदारी से पार्टी एक जुटता के साथ काम करेगी तो वह भाजपा को कड़ी चुनौती पेश कर सकती है।
लेकिन इस समय कार्यकाल के अन्तिम दिनों में पूर्व मुख्यमन्त्रीयों को यह सुविधाएं देने का प्रयास किया गया उससे अनचाह ही यह संदेश चला गया कि वीरभद्र और उनके सचिवालय ने अभी से स्वीकार कर लिया है कि चुनावों में उनकी हार होने जा रही है। मन्त्री परिषद में यह प्रस्ताव सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से लाया गया और सामान्य प्रशासन विभाग स्वयं मुख्यमन्त्री के पास है। फिर मनत्री परिषद के सचिव की जिम्मेदारी मुख्य सचिव के पास होती है। ऐसे में सामन्य प्रशासन विभाग द्वारा तैयार किया गया यह प्रस्ताव मन्त्री परिषद के ऐजेंण्डा में डालने से पूर्व इसे मुख्य सचिव और मुख्यमन्त्री द्वारा अवश्य देखा गया होगा क्योंकि हर मन्त्री अपने विभाग से संबधित ऐजेण्डे को स्वयं मन्त्री परिषद में रखता है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि यह प्रस्ताव तैयार करने से पहले इससे जुडे़ अधिकारी राजनीतिक आकंलन करने में या तो एकदम असफल रहे है। या फिर उन्होने जानबूझकर अपने राजनीतिक विरोधीयों को एक मुद्दा और थमा दिया। बल्कि इससे यह आशंका और बन गयी है कि लोग चुनाव आते- आते एकाध ऐसा और कारनामा कर सकते है।

आऊट सोर्स के हजारों कर्मचारियों का भविष्य अनिश्चितता में करोड़ों के घपले की भी आशंका

शैल/शिमला। वीरभद्र सरकार विभिन्न सरकारी विभागों /निकायों में आऊट सोर्स के माध्यम से कार्यरत कर्मचारियों को लेकर एक पाॅलिसी लाने की घोषणा एक लम्बे समय से करती आ रही है। बल्कि संवद्ध प्रशासन पर यह पाॅलिसी

लाने के लिये दवाब भी बनाया गया और जब इसे अधिकारियों ने उकदम नियमों के विरूद्ध करार दिया तो कुछ अधिकारियों को इसका खमियता भी भुगतना पड़ा है इस समय सरकार में करीब 35000 कर्मचारी आऊट सोर्स के माध्यम से अपनी सेवाएं दे रहें है। यह कर्मचारी एक ही कंपनी के माध्यम से रखे गये है। यह आरोप कर्मचारी नेता विनोद ठाकुर ने लगाया है। आरोप है कि इस कंपनी को सरकार 20% कमीशन दे रही है। 80% कर्मचारी को जाना है लेकिन यह 80% भी पहले इस कंपनी के खाते मे जाता है और फिर कंपनी अपने खाते से इनका भुगतान करती है इस तरह यह भी स्पष्ट नही है किे यह 80% भी कर्मचारी को वास्तव में ही मिल रहा है या नही। 
आऊट सोर्स के नाम पर प्रदेश के श्रम विभाग के पास कितनी कपनीयां पंजीकृत है और विभाग का उनपर किस तरह का कितना नियन्त्रण है इसको लेकर विभाग में कुछ भी स्पष्ट नही है। जिस कंपनी के माध्यम से हजारों कर्मचारी सरकार में अपनी सेवाएं दे रहे है। उस कंपनी का दफ्तर के नाम पर न्यू शिमला में एक छोटा सा बोर्ड टंगा है लेकिन दफ्तर में कितने कर्मचारी है इसको लेरक भी बहुत कुछ स्पष्ट नही हे क्योंकि कंपनी में फोन करने पर कोई जानकरी नही मिल पाती है इससे यह आशंका और पुख्ता हो जाती है। कि इस कंपनी के नाम पर केवल एक तरह से लेवर सप्लाई का काम किया जा रहा है। क्योंकि आज तक इस कंपनी की ओर से ने तो किसी विज्ञापन के माध्यम से या न ही किसी रोजगार कार्यालय के माध्यम से यह सामने आ पाया है कि अमुक कार्यालय या कार्य के लिये उसे अमुक योग्यता के इतने व्यक्ति चाहिये। क्योंकि यदि कंपनी ऐसी प्रक्रिया अपनाती है तो वह रोजगार कार्यालय के समकक्ष हो जाती है और सरकार के मौजूदा नियम इसकी अनुमति नही देते है इससे हटकर यदि कंपनी ऐसी नियुक्तियों के लिये आमन्त्रण देती है तो उसे अपने ही कार्यालय में या उससे संवद्ध संस्थान में नियुक्ति देनी होगी लेकिन इस कंपनी का अपना कोई ऐसा संस्थान है नही जहां पर यह किसी को नौकरी दे सके।

क्या सरकारी विभागक आऊट सोर्स के माध्यम से किसी को दफ्तर में लिपिक या सहायक आदि की नौकरी दे सकते है ऐसा कोई प्रावधान भी नियमों में नही है ऐसे में आऊट सोर्स के माध्यम से केवल अस्थायी लेवर ही सप्लाई की जा सकती है और सरकारी दफ्तर में ऐसी लेवर रखने का भी प्रावधान नहीं है। इसी कारण से 20% कमीशन के बाद का 80% भी कंपनी के खाते में ही जमा करवाना पड़ता। क्योंकि यदि सरकार के दफ्तर की ओर से कर्मचारी को सीधे 80% का भुगतान कर दिया जाये तो यह लोग सीधे सरकारी कर्मचारी हो जाते हैं इसी के साथ एक सवाल यह खड़ा होता है कि क्या यह कंपनी अपने रिकार्ड में इसके माध्यम से रखे गये कर्मचारियों को अपना रेगुलर कर्मचारी दिखाती है या नही। आज सरकारी कार्यालयों में इस कपंनी के माध्यम से रखे गये हजारों कर्मचारी इस उम्मीद में चल रहे है कि वह कभी नियमित हो जायेंगे। सरकार द्वारा इन कर्मचारियों को लेकर पाॅलिसी लाये जाने के वायदों से भी इन्हें यह उम्मीद बंधी थी जो कि एकदम आधारहीन थी।
आरोप है कि अभी सरकार ने आऊट सोर्स कर्मचारियों के लिये विभागों को दस करोड़ रूपये जारी किये है। इसमें से दो करोड़ तो कंपनी को सीधे कमीशन के रूप में मिल जायेंगें शेष आठ करोड़ भी कंपनी के खाते में ही जमा होंगे और इसमें से वास्तव में ही संवद्ध कर्मचारियों को कितने मिलेंगे इसकी कोई जानकारी पैसे देने वाले विभाग को नही होगी। ऐसे में हजारों कर्मचारियों का भविष्य जहां अनिश्चितता में हे वहीं पर इसमें करोड़ों का घपला होने की भी पूरी - पूरी संभावना बनी हुई है।

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