शिमला/शैल। मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह एवम उनके परिवार के खिलाफ चल रहे मनीलाॅडिंग मामले में ईडी ने तीसरी बार संपति अैटच किये जाने के आदेश किये हैं। पहला अटैचमैन्ट आर्डर 23 मार्च 2016 को जारी हुआ था। इसके तहत प्रतिभा सिंह के नाम पर दिल्ली के ग्रेटर कैलाश में खरीदा गया मकान अटैच हुआ था। इस अैटचमैन्ट के बाद ही एलआईसी ऐजैन्ट आनन्द चौहान को ईडी ने जून 2016 को गिरफ्तार किया था जो अब तक हिरासत में ही चल रहा है। इसके बाद ईडी ने वीरभद्र, प्रतिभा सिंह और अन्य को सम्मन किया था। वीरभद्र और प्रतिभा सिंह ने सम्मन किये जाने को दिल्ली उच्च
न्यायालय में चुनौती दी। लेकिन इसी बीच ईडी ने 31.3.2017 को दूसरा अटैचमैन्ट आर्डर जारी करके दिल्ली के डेरा मंडी महरौली स्थित फार्म हाऊस को अैटच कर दिया। यह फार्म हाऊस विक्रमादित्य और अपराजिता की कंपनी मैप्पल डैस्टीनेशन और ड्रीम बिल्ड के नाम पर खरीदा गया है।
इस अटैचमैन्ट के बाद ईडी के सम्मन आदेश को चुनौती देने वाल मामलें मेें दिल्ली उच्च न्यायालय का फैसला आया। सम्मन आदेश को ूwithout jurisdiction and authority कह कर चुनौती दी गयी थी। दिल्ली उच्च न्यायालय ने वीरभद्र की याचिका को अस्वीकार करते हुए तीन जुलाई 2017 को अपने फैसले में यह कहा कि It is clear from the above discussion that the Prvention of Money- Laundering Act, 2002 is a complete Code which overrides the general criminal law to the exrent of inconsistency. This law establishes its own enforcement machinery and other authorities with adjudicatory powers and jurisdiction. There is no requirement in law that an officer empowered by PMLA may not take up investigation of a PMLA offence or may not arrest any person as permitted by its provision without obtaining authorization from the court. Such inhibitions cannot be read into the law by the court. उच्च न्यायालय के इस फैसलेे के बाद अब 12.10.17 को ईडी की ओर से एक अटैचमैन्ट आर्डर जारी किये जाने की खबर सामने आयी है। इस अैटचमैन्ट आर्डर में प्रतिभा सिह, विक्रमादित्य और अपराजिता की 5.6 करोड़ की और संपति इसी फार्म हाऊस से जुड़ी हुई होने को अटैच किये जाने का दावा किया गया है। वीरभद्र ने इस तीसरे कथित अटैचमैन्ट आर्डर को आधारहीन करार देते हुए आरोप लगाया है कि किसी और की संपति अटैच की गयी है। जिसे शरारतपूर्ण तरीके से वीरभद्र के परिजनों के नाम पर दिखा दिया गया। वीरभद्र ने इसे परिवार को बदनाम करने का प्रयास बताया है।
स्मरणीय है कि इस मनीलाॅडिंग मामले में गिरफ्तार चल रहे आनन्द चौहान के खिलाफ ईडी ट्रायल कोर्ट में चालान दायर कर चुकी है। आनन्द चौहान वीरभद्र के साथ यह अभियुक्त है। वह मुख्य आरोपी नहीं है। आनन्द चौहान के खिलाफ यह आरोप है कि उनके माध्यम से ली गयी एलआईसी पालिसियां ग्रेटर कैलाश का मकान खरीदने में निवेश हुई है। दिल्ली के डेरा मण्डी मैहरौली में खरीदे गये फार्म हाऊस में वक्कामुल्ला से लिया गया कर्ज निवेशित हुआ है। इसी आधार पर ईडी ने जो अटैचमैन्ट आर्डर 23.3.2016 को जारी किया था उसमें स्पष्ट कहा है कि वक्कामुल्ला से लिये गये कर्ज को लेकर अभी जांच पूरी नही हुई है। इस जांच के पूरा होने के बाद इस मामले में अनुपूरक चालान दायर किया जायेगा। लेकिन यह चालान अब तक दायर नही हुआ है। अब माना जा रहा है कि 31.3.2017 को जारी अटैचमैन्ट आर्डर के साथ ही इस मामले में ईडी की जांच पूरी हो गयी है। आनन्द चौहान के खिलाफ दायर हुए चालान में अगली कारवाई तब तक आगे नही बढ़ सकती है जब तक की उसमें यह अनुपूरक चालान दायर नही हो जाता है। ट्रायल कोर्ट ने ईडी को पिछली बार निर्देश दिये थे कि इस मामले में 31.10.2017 तक अनुपूरक चालान दायर किया जाये।
अब ईडी को 31 अक्तूबर तक यह चालान दायर करना है। अभी जो अैटचमैन्ट आर्डर प्रचारित हुआ है उसमें वक्कामुल्ला के माध्यम से हुए निवेश का जिक्र आया है। वक्कामुल्ला से वीरभद्र परिवार ने कर्ज लिया है इसे परिवार स्वीकार कर चुका है ईडी के मुताबिक इस कर्ज का निवेश फार्म हाऊस खरीदने में हुआ है और इस नाते यह Crime Proceed बन जाता है तथा इसी आधार पर इसकी अटैचमैन्ट हुई है। लेकिन जब 23.3.2016 को पहला अटैचमैन्ट आर्डर जारी हुआ था उसके बाद ही आनन्द चौहान की गिरफ्तार हुई थी। परन्तु 31.03.2017 को हुये अटैचमैंट आर्डर के बाद कोई गिरफ्तार नहीं हुई है। इसीलिये अब जो अैटचमैन्ट आर्डर 12 अक्तूबर को जारी हुआ प्रचारित हुआ है जिसे वीरभद्र ने आधारहीन करार दिया है। तो इससे ई डी की नीयत और नीति को लेकर सवाल उठने स्वभाविक है। इस आर्डर के प्रचार से यह सन्देह बन रहा है कि इसमें कहीं ईडी वक्कामुल्ला के खिलाफ आनन्द चौहान जैसी कारवाई की भूमिका तो नहीं बना रहा है। क्योंकि उत्तराखण्ड में भी चुनाव से पूर्व हरीश रावत को ऐजैन्सीयों ने ऐसे ही घेरा था।
शिमला/शैल। वीरभद्र सरकार ‘‘विकास से विजय’’ रैली आयोजित करके पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी के समक्ष प्रदेश में हुए विकास की जोे तस्वीर सामने रखी है उससे आश्वस्त और आशान्वित हो करे राहुल ने दावा किया है कि वीरभद्र सातवीं बार प्रदेश के मुख्यमन्त्री बनेेंगे। इस रैली में सरकार नेे इस कार्यकाल में हुए विकास के आंकड़ेे प्रदेश की जनता केे सामने रखे हैं और यह रखनेे के लिये इस रैली के आयोजन पर हुआ सारा खर्चं सरकार ने उठाया है। प्रदेश में विधानसभा चुनावों की घोषणा कभी भी संभावित है ऐसे में इस समय सरकारी खर्च पर अपने विकास की उपलब्धियां जनता के सामने रखना राजनीतिक दृष्टि से कितना सही फैसला सिद्ध होगा यह तो आने वाला समय ही
बतायेगा। क्योंकि 2012 में धूमल भी इसे विकास के नाम पर सत्ता में वापसी के दावे कर रहे थे और उस समय उनके पास विकास के नाम पर मिलेे सौ से अधिक अवार्डों का तमगा भी था लेकिन फिर भी जनता ने उन्हे मौका नही दिया। क्योंकि काग्रेंस ने उनके साथ ‘‘हिमाचल आॅन सेल’’ का ऐसा आरोप चिपका दिया जिसे भले ही सत्ता में आकर कांग्रेस प्रमाणित नही कर पायी है। लेकिन उस समय यह आरोप विकास पर भारी पड़ गया था यह सबकेे सामनेे है। आज कांग्रेस और वीरभद्र सरकार ठीक उसी स्थिति में खड़ी है।
विकास एक ऐसा विषय है जिसेे सवालों के घेरे में खड़ा करना बहुत आसान होता है। जैसेे आज केन्द्र की मोदी सरकार को जुमलों की सरकार करार दिया जाने लग पड़ा है क्योंकि इस सरकार के सारे आर्थिक फैसलें मोदी-जेटली के दावों के बावजूद जनता की नज़र में नुकसान देह साबित हुए हैं और इसी आधार पर राहुल और कांग्रेस मोदी पर हमलावर हो रही है। ठीक इसी तरह आज जब इस विकास के इन आंकड़ो को प्रदेश के बढ़ते कर्ज के आईने में देखा जायेगा तो तस्वीर कुछ अलग ही दिखेगी। यह ठीक है कि आज उद्योग मन्त्री मुकेश अग्निहोत्री के विधानसभा क्षेत्र में विभिन्न विकास कार्यो पर 1656.86 करोड़ का निवेश हुआ है और मुख्यमन्त्री के अपने क्षेत्र शिमला ग्रामीण में हुई 20% घोषणाओं पर करीब 1200 करोड़ का निवेश हुआ है। यह सारा निवेश अमली जामा भी पहन चुका है। विकास के नाम पर यह क्षेत्र आज प्रदेश के माडल हैं लेकिन क्या ऐसा ही निवेश प्रदेश के शेष 66 विधानसभा क्षेत्रों में भी हुआ है यह सवाल आने वाले दिनों में उठेगा। फिर जो संस्थान खोले गये हैं क्या उनमें सुचारू रूप से कार्य करवाने की सुनिश्चितता बन पायी है। क्योंकि जब एक संस्थान से कुछ कर्मचारियों को दूसरे संस्थान में बदल कर नये का काम चलाया जाता है तब दोनों में ही कुछ व्यवहारिक कमीयां रह जाती हैं और परिणाम स्वरूप दोनों जगह नाराज़गी उभर आती है। यदि नये खोले संस्थानों में नयी भर्तीयां करके कर्मचारी नियुक्त किये जाएं तब ऐसी नियुक्तियां करने में न तो पूूरा समय उपलब्ध हो पाता है और न ही पूरी प्रक्रिया हो पाती है और ऐसे चयनों पर पक्षपात के आरोप लगनेे स्वभाविक हो जाते हैं। इसलिये आज विकास के दावों पर सरकारों का बनना संदिग्ध हो जाता है। फिर सरकार तो होती ही विकास के लिये है और उस पर लगने वाला पक्षपात का एक भी आरोप सारे दावों की हवा निकाल देता है।
कांग्रेस जहां ‘‘विकास से विजय’’ को सहारा बना रही है वहीं पर भाजपा कांग्रेस से ‘‘हिसाब मांगेेेे हिमाचल’’ के तहत लगातार हमलावर होती जा रही है। भाजपा के इन हमलों का जवाब जब तक कांग्रेस उसी तर्ज में देने को तैयार नही होगी तब तक उसके विकास के दावों का असर हो पाना संभव नही लगता है। भाजपा लम्बे अरसे से कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं पर व्यक्तिगत स्तर पर हमलावर होने की रणनीति पर काम करती आ रही है। वीरभद्र सिंह के अतिरिक्त भाजपा कांग्रेस अध्यक्ष सुक्खु पर भी निशाना साध चुकी है। सुक्खु ने अपने ऊपर लगे आरोपों पर मानहानि का मामला दायर करने का दावा किया था जो आज तक पूरा नही हुआ है। सूत्रों की माने तो अब इस कड़ी में और भी बहुत कुछ जुड़ने वाला है। भाजपा के निशाने पर वन मन्त्री ठाकुर सिंह भरमौरी, उद्योग मन्त्री मुकेश अग्निहोत्री और शहरी विकास मन्त्री सुधीर शर्मा विशेष रूप से रहने वाले हैं। कांग्रेस मण्डी रैली में आक्रामक होने की बजाये रक्षात्मक रही है ऐसे में अब इस पर निगाहें लगी है कि क्या कांग्रेस इसी रक्षात्मक तर्ज पर आगे बढे़गी या आक्रामक होने का साहस दिखायेगी ।
शिमला/शैल। सरकार द्वारा 1 जुलाई 2017 का आऊटसोर्स कर्मचारियों को लेकर जारी की गयी नीति के अनुसार अब कोई भी विभाग सरकार की पूर्व अनुमति के बिना कोई भी सेवा आऊटसोर्स नही कर पायेगा। आऊट सोर्स कर्मचारियों के हितों को सुरक्षित करने के लिये वित विभाग द्वारा जारी 2009 के वित्तिय नियमों के तहत मिलने वाले लाभ इन्हे भी सुनिचित किये गये हैं। इसके मुताबिक इन्हें ईएसआई कन्ट्रीव्यूशन और ई.पी.एफ कन्ट्रीव्यूशन के लाभ मिलेंगे। आऊट सोर्स के तहत लगी महिला कर्मीयों को मातृत्व अवकाश की सुविधा भी प्राप्त होगी और यह खर्च संबधित विभाग उठायेगा। यदि आऊटसोर्से पर तैनात कर्मचारी को विभागीय कार्य के लिये तैनाती स्थान से बाहर प्रदेश में किसी स्थान पर भेजा जाता है तो इसके लियेे उसे 130 रू0 प्रतिदिन के हिसाब से यात्रा भत्ता भी मिलेगा। प्रदेश से बाहर जाने पर यह भत्ता 200रू0 प्रतिदिन के हिसाब से मिलेगा। सर्विस प्रोवाईडर इन्हे वेतन का भुगतान बैंक के माध्यम से करेंगे और हर माह की 7 तारीख को इन्हें यह भुगतान सुनिश्चित करेंगे। संबधित विभाग समय-समय पर यह सुनिश्चित करेंगे कि सर्विस प्रोवाईडर द्वारा कर्मचारी को यह लाभ दिये जा रहे हैं या नही।
स्मरणीय है कि इस समय प्रदेश में करीब 35,000 कर्मचारी आऊट सोर्स के माध्यम से विभिन्न विभागों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। यह कर्मचारी इन्हें सरकार में नियमित रूप से समायोजित किये जाने की मांग भी कर रहे हैं। क्योंकि जब इन्हें आऊट सोर्से के माध्यम से रखा गया था तब इन्हें यह पूरी जानकारी ही नही रही है कि यह लोग सरकार के कर्मचारी न होकर एक सर्विस प्रोवाईडर ठेकेदार के कर्मचारी हैं। सरकार यह तो सुनिश्चित कर सकती है कि ठेकेदार इनका शोेेषण न करे और इनको समय पर वेतन का भुगतान हो। लेकिन इन्हें सरकार का नियमित कर्मचारी नही बनाया जा सकता और न ही उसकी तर्ज पर अन्य वेतन वृद्धि आदि के लाभ दिये जा सकते हैं। इन कर्मचारियों को अनुबन्ध पर रखे गये कर्मचारियों की तर्ज भी नियमित होने का लाभ नही मिल सकता। लेकिन इसी के साथ यह भी अनिश्चित है कि सर्विस प्रोवाईडर कब तक इन्हें काम पर रख सकता है और इन्हें काम से हटाने के लिये क्या शर्ते होंगी। यह भी अनिश्चित है कि संबधित विभाग भी कब तक इनकी सेवाएं आऊटसोर्स के माध्यम से लेता रहेगा।
सरकार ने इन कर्मचारियों केे दवाब में इनके लिये यह पाॅलिसी तो घोषित कर दी हैे लेकिन इसमें यह स्पष्ट नही किया गया है किस तरह की सेवाएं आऊट सोर्स के तहत आयेंगी। आऊटसोर्स प्रोवाईडर पर भी कोई नियम कानून लागू होंगे और वह भी सरकार केेे किसी विभाग में पंजीकृत होगा इसका भी इस नीति में कोई जिक्र नही है क्योंकि सरकार में कर्मचारी भर्ती करने के लिये रोजगार कार्यालयों से लेकर विभिन्न चयन बोर्ड गठित हैं और इनके लिये विज्ञापनों के माध्यम से सार्वजनिक सूचना देकर आवेदन आमन्त्रिात करने की एक तय प्रक्रिया है। यहां तक कि सरकार में होने वाले निर्माण कार्यों के लिये भी टैण्डर आमन्त्रिात करने की प्रक्रिया तय है। यह सारे प्रावधान उपलब्ध होने के वाबजूद सरकार में आऊटसोर्स के माध्यम से ऐसे कर्मचारी भर्ती करने की आवश्यकता क्यों पड़ी इस पर कोई भी कुछ कहने केे लिये तैयार नही है।
आऊट सोर्स प्रोवाईडर को कितना कमीशन मिलेगा इस पर भी पाॅलिसी में कुछ स्पष्ट नही किया गया है। आऊटसोर्स कर्मचारी को कितना वेतन मिलेगा यह भी स्पष्ट नही है पाॅलिसी में सिर्फ यह कहा गया है कि The Government Department will consider increase in the contracted amount payable to the service providers /contractors to enable them to enhance emoluments of staff engaged by them , whenever the State Government increases minimum wages. सरकार द्वारा यह पाॅलिसी लाये जाने के वाबजूद भी आऊट सोर्स कर्मचारियों के सरकार में समायोजित होने की कोईे संभावना नही है। इससे केवल सर्विस प्रोवाईडर को बैठेे बिठाये एक भारी कमीशन पाने का साधन तो दे दिया गया है लेकिन अन्ततः यह इन कर्मचारियों का शुद्ध शोषण ही रह जाता है यह इस पाॅलिसी से भी स्पष्ट हो जाता है क्योंकि कब तक सर्विस प्रोवाईडीे और संबधित विभाग कर्मचारी को अपनी सेवा में रखेंगे यह स्पष्ट नही है। संभवतः सेवा चयन और पदोन्नति नियमों में इस तरह की सेवाओं का कोई प्रावधान ही नही है।



शिमला/शैल। इस बार होने वाले प्रदेश विधानसभा चुनावों में आधा दर्जन से अधिक नये राजनीतिक दल दस्तक देने जा रहे है। यह दस्तक उस माहौल में दी जा रही है जब केन्द्र में प्रचण्ड बहुमत के साथ सत्तारूढ़ हुई भाजपा ने प्रदेश में 60 सीटें जीतने का लक्ष्य घोषित कर रखा है और कांग्रेस ने वीरभद्र सिंह को सातवीं बार मुख्यमन्त्री बनाने का दावा कर रखा है। हिमाचल की सत्ता आज तक कांगे्रस और भाजपा में ही केन्द्रित रही है। इस सत्ता को जब भी तीसरे दलों ने चुनौती देने का प्रयास किया और उसमें कुछ आंशिक सफलता भी लोक राज पार्टी, जनता दल और फिर हिमाचल विकास पार्टीे के नाम पर भले ही हासिल कर ली लेकिन आगे चलकर यह दल अपने-अपने अस्तित्व को भी बचा कर नही रख पाये यह यहां का एक कड़वा राजनीतिक सच है। ऐसा क्यों हुआ? इसके क्या कारण रहे और कौन लोग इसके लिये प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार रहे इसका एक लम्बा इतिहास है। लेकिन अन्तिम परिणाम यही रहा कि सत्ता कांग्रेस और भाजपा में ही केन्द्रित रही बल्कि इसी कारण से यहां तीसरे दलों को आने से पहले ही असफल मान लिया जाता है।
लेकिन इस बार जो दल सामने आ रहे हैं क्या उनका परिणाम भी पहले जैसा ही रहेगा? इस सवाल का आंकलन करने से पहले यह समझना और जानना आवश्यक है कि यह आने वाले तीसरे दल हैं कौन, और इनकी पृष्ठभूमि क्या है। अब तक जो दल अपना चुनाव आयोग में पंजीकरण करवाकर सामने आ चुके हैं उनमें राष्ट्रीय आज़ाद मंच (राम), नव भारत एकता दल, समाज अधिकार कल्याण पार्टी, राष्ट्रीय हिन्द सेना, जनविकास पार्टी, लोक गठनबन्धन पार्टी और नैशनल फ्रीडम पार्टीे प्रमुख है। राष्ट्रीय आज़ाद मंच का प्रदेश नेतृत्व सेवानिवृत जनरल पी एन हूण के हाथ है। जनरल हूण सेना का एक सम्मानित नाम रहा है। अभी थोड़े समय पहले तक वह गृहमन्त्री राजनाथ सिंह के मन्त्रालय के अधिकारिक सलाहकार रहे है। इसी तरह लोग गठबन्धन पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष विजय शंकर पांडे कुछ समय पहले तक भारत सरकार में सचिव रहे है। उनका प्रदेश नेतृत्व भी भूतपूर्व सैनिक कर्नल कुलदीप सिंह अटवाल के हाथ है। इनके साथ ही नैशनल फ्रीडम पार्टी मैदान मे है। यह पार्टी स्वामी विवेकानन्द फाऊंडेशन मिशन द्वारा बनायी गयी है। इसके प्रदेश अध्यक्ष भाजपा में मन्त्री रहेे महेन्द्र सोफ्त है।
यह जितने भी नये दल अभी पंजीकृत होकर सामने आये है। इनकी पृष्ठभूमि से यह पता चलता है कि यह लोग कभी भाजपा/संघ के निकटस्थ रहे है। इस निकटता के नाते यह लोग भाजपा/संघ की कार्यप्रणाली और सोच से भी अच्छी तरह परिचित रहे हैं। आज राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के अन्दर ही मोदी सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों को लेकर आलोचना होना शुरू हो गयी है। पूर्व मन्त्री यशवन्त सिन्हा ने जो मोर्चा अब खोल दिया है उसमें नये लोग जुड़ने शुरू हो गये हैं। आर्थिक फैसलो को लेकर जो हमला जेेटली पर हो रहा था उसमें अब यह जुड़ना शुरू हो गया है कि यह फैसले तो सीधे प्रधानमन्त्री कार्यालय द्वारा लिये जा रहे हैं और इनका सारा दोष जेटलीे पर डालना सही नही है।
इस परिदृष्य में आने वाले चुनावों में भाजपा को कांग्रेस के अतिरिक्त इन अपनो के हमलों का भी सामना करना पड़ेगा। दूसरी ओर प्रदेश में भाजपा नेतृत्व के प्रश्न पर पूरी तरह खामोश चल रही है। भाजपा में आज अनुशासन को उसके अपने ही लोगों से चुनौती मिलना शुरू हो गयी है। क्योंकि अब तक करीब एक दर्जन विधानसभा क्षेत्रों से सार्वजनिक रूप से टिकट के लिये अपनी-अपनी दोवदारी पेश कर दी है। कल को यदि इन लोगों को टिकट नही मिल पाता है तब क्या लोग पार्टी के लिये ईमानदारी से काम कर पायेंगे या नही यह सवाल बराबर बना हुआ है। बल्कि कुछ उच्चस्थ सूत्रों का यह दावा है कि भाजपा में जिन लोगों को टिकट नही मिल पायेगा वह कभी भी इन नये दलों का दामन थाम लेंगे। इसलिये यह माना जा रहा है कि यह तीसरे दल भाजपा और कांग्रेस दोनो के समीकरणों को बदल कर रख देंगे क्योंकि यही दल कांग्रेस के असन्तुष्टों के लिये भी स्वभाविक मंच सिद्ध होंगे और यही कांग्रेस/भाजपा के लिये खतरे की घन्टी होगा।
शिमला/शैल। उद्योग विभाग के संयुक्त निदेशक तिलक राज के रिश्वत प्रकरण में सीबीआई ने चण्डीगढ़ ट्रायल कोर्ट में चालान दायर कर दिया है। बल्कि यह चालान दायर होने के बाद ही तिलक राज को जमानत मिली और वह फिर से नौकरी पर आ गये हैं। लेकिन सीबीआई के इस चालान को आगे बढ़ाने के लिये इसमें सरकार की ओर से अभियोजन की अनुमति चाहिये जो कि अभी तक सरकार ने नहीं दी है। सेवा नियमों के मुताबिक किसी भी सरकारी कर्मचारी के विरूद्ध
अपराधिक मामला चलाने के लिये अभियोजन की अनुमति अपेक्षित रहती है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय कई मामलों में यह व्यवस्था दे चुका है कि जब सरकारी कर्मचारी उस पद से हट चुका हो जिस पद पर रहते उसके खिलाफ ऐसा मामला बना था तब ऐसे मामलों में सरकार की अनुमति की आवश्यकता नही रह जाती है। तिलक राज के खिलाफ जब यह मामला बना था तब वह बद्दी में संयुक्त निदेशक के पद पर कार्यरत थे लेकिन यह कांड घटने पर सीबीआई ने उन्हे गिरफ्तार कर लिया और जमानत मिलने के बाद विभाग ने उन्हे बद्दी से बदलकर शिमला मुख्यालय में तैनात कर दिया है। शिमला में उन्हे जो काम दिया गया है उसका उनके बद्दी में रहते किये गये काम से कोई संबंध नही है। काम की इस भिन्नता के चलते विभाग के अधिकारियों का एक बड़ा वर्ग अभियोजन की अनुमति दे दिये जाने के पक्ष में था लेकिन कुछ लोग अनुमति के नाम पर इस मामले को लम्बा लटकाने के पक्ष में हैं और इस नीयत से इस मामले को विधि विभाग की राय के लिये भेज दिया गया है। जबकि नियमों के अनुसार इसमें अन्तिम फैसला तो उद्योग मन्त्री के स्तर पर ही होता है।
उच्चस्थ सूत्रों के मुताबिक विधि विभाग को मामला भेजने के लिये जो आधार बनाया गया है कि जब तिलक राज पर छापा मारा गया था उस समय सीबीआई ने उसके खिलाफ कोई एफआईआर दर्ज नही कर रखी थी। इसी के साथ यह भी कहा गया है कि पैसे की रिकवरी भी तिलक राज से न होकर अशोक राणा से हुई है जो कि सरकारी कर्मचारी नही है। लेकिन इस मामले में जो एफआईआर सीबीआई ने दर्ज कर रखी है उसके मुताबिक 29 मई को यह मामला विधिवत रूप से दर्ज हो गया था और तिलक राज से रिकवरी 30 मई को हुई थी। रिकवरी के बाद ही अगली कारवाई शुरू हुई थी। ऐसे में विभाग का यह तर्क है कि छापेमारी से पहले एफआईआर दर्ज नही थी कोई ज्यादा पुख्ता नही लगता। एफआईआर में दर्ज विवरण के मुताबिक इसमें बद्दी के ही एक फार्मा उद्योग के सीए चन्द्र शेखर इसके शिकायत कर्ता हैं। शिकायत के मुताबिक चन्द्र शेखर ने फार्मा उद्योग की 50 लाख सब्सिडी के लिये 28 मार्च को बद्दी में संयुक्त निदेशक तिलक राज के कार्यालय में दस्तावेज सौंपे थे। दस्तावेज सौंपने के बाद चन्द्र शेखर को एक अशोक राणा से संपर्क करने के लिये कहा जाता है, इसके बाद 22 मई को उसे इस संद्धर्भ में विभाग का नोटिस मिलता है और फिर वह अशोक राणा से मिलता है तथा इस दौरान हुई बातचीत रिकार्ड कर लेता है। चन्द्रशेखर की बातचीत अशोक राणा से 19 मई और 22 मई को होती है। इसमें उससे रिश्वत मांगी जाती है। चन्द्रशेखर यह रिश्वत मांगे जाने की शिकायत सीबीआई से 27 मई को करता है और प्रमाण के तौर पर यह रिकार्डिंग पेश करता है। सीबीआई अपने तौर पर 28 और 29 मई को स्वयं इस बातचीत और रिकार्डिंग की व्यवस्था करती है। जब 29 मई को इस तरह सीबीआई की वैरीफिकेशन पूरी हो जाती है तब उसी दिन 29 को यह एफआईआर दर्ज होती है। इसके बाद 30 को यह रिश्वत कांड घट जाता है, और सीबीआई तिलक राज को गिरफ्तार कर लेती है।
एफआईआर में दर्ज इस विवरण से विभाग द्वारा अब अभियोजन की अनुमति के लिये लिया गया स्टैण्ड मेल नही खाता है। तिलक राज की गिरफ्तारी के बाद उसके कांग्रेस सरकार और पूर्व की भाजपा सरकार में शीर्ष तक उसके घनिष्ठ संबंधों की चर्चा जगजाहिर हो चुकी है। क्योंकि एफआईआर के मुताबिक ही यह रिश्वत का पैसा मुख्यमन्त्री के दिल्ली स्थित ओएसडी रघुवंशी को जाना था। अब रघुवंशी भी इस मामले में सीबीआई के एक गवाह हैं। ऐसे में अब यह मामला एक ऐसे मोड़ पर है जहां सबकी नजरें इस ओर लगी है कि क्या उद्योग मन्त्री मुकेश अग्निहोत्री इसमें अभियोजन की अनुमति देते है या नही? क्या सीबीआई इसमें अनुमति के बिना ही इस मामले को अंजाम तक पंहुचा पायेगी या नही।