शिमला/शैल। चुनाव के नतीजे 18 दिसम्बर को आनेे है और 18 दिसम्बर तक का यह समय चुनाव लडने वाले हर उम्मीदवार के लिये एक कड़ी परीक्षा का समय है क्योंकि इस दौरान उसे अपने समर्थकों और मतदाताओं के बीच रहना और इस नाते उसे हर समय यह दावा बनायेे रखना है कि वह जीत रहा है। राजनीतिक दलोें को तो यह दावा सार्वजनिक रूप से मीडिया के माध्यम से प्रदेश की जनता के बीच रखना है। इसी राजनीतिक अनिवार्यता के चलतेे सत्तारूढ़ कांग्रेस और सत्ता पर कब्जे के लिये तैयार बैठी भाजपा ने सरकार बनानेे के दावों की रस्म अदायगी को अंजाम
देना शुरू कर दिया है। मतदान के बाद भाजपा अपनी आकलन बैठक कर चुकी है और कांग्रेस की यह बैठक 28 को होने जा रही है।
चुनाव टिकटों के आवंटन के बाद दोनों दलों में बगावत देखने को मिली है। टिकट केे कई प्रबल दावेदारों ने टिकट न मिलने पर बतौर निर्दलीय चुनाव लड़ा है ऐसेे विद्रोहीयों की संख्या दोनो दलों में लगभग बराबर रही है। ऐसे विद्रोहीयों और उनके समर्थकों को दोनों दल निष्कासित भी कर चुके हैं। लेकिन निष्कासन के बाद भी दोनो दलों को भीतरघात का सामना भी करना पड़ा है। भीतरघात एक ऐसा कृत्य है जिसे प्रमाणित कर पाना बहुत आसान नही होता है। भाजपा की हमीरपुर में हुई बैठक में करीब हर ब्लाॅक से भी भीतरघात की शिकायतें आने की चर्चा है। इन शिकायतों पर विचार-विर्मश के बाद इन्हे सांसद वीरेन्द्र कश्यप की अध्यक्षता वाली अनुशासन समिति को अगली कारवाई के लिये भेजनेे का फैसला लिया गया है। सूत्रों का यह भी दावा है कि इस बैठक में पार्टी ने जो आन्तरिक सर्वे करवाया है उसकेे मुताबिक पार्टी को 38 से 42 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है। इस सर्वे में बिलासपुर की चार में सेे तीन सीटें जीतने का दावा किया गया है। इसमें पार्टी झण्डूता में जीत को लेकर आश्वस्त नही है। झण्डूता में कांग्रेस और भाजपा में सीधा मुकाबला है क्योंकि यहां केवल दो ही उम्मीदवार मैदान में थे। इस नाते यहां पर पार्टी की विचारधारा और चुनावी रणनीति दोनो की स्वीकारयता की कसौटी परख दाव पर है। फिर यहां एक दशक से भाजपा का कब्जा भी चला आ रहा है। उम्मीदवार भी पहले उम्मीदवार से किसी कदर कम नही था। ऐसे में यदि पार्टी अपने ही आन्तरिक आंकलन में इस सीट को लेकर आश्वस्त नही है तो पार्टी के सारे आंकलनों पर स्वयं ही एक प्रश्नचिन्ह लग जाता है।
फिर हर ब्लाॅक से भीतरघात की शिकायतों का आना भी इसी ओर संकेत करता है कि पार्टी को अपने ही लोगों ने बडे पैमाने पर नुकसान पंहुचाया है। सूत्रों की माने तो कुछ बडे नेताओं ने दूसरे बडे नेताओं को हटवाने के लिये एक दूसरे के विरोधीयों की धन से भी मदद की है। माना जा रहा है कि इस तरह के भीतरघात से पार्टी को निश्चित रूप से नुकसान पहुंचा है क्योंकि जब बडे नेता ही इस तरह की गतिविधियों कोे अपना अपरोक्ष समर्थन देंगे तो उससे नुकसान तो अवश्य पंहुचेगा। चर्चा है कि जब तक पार्टी ने धूमल को नेता घोषित नही किया था तब तक इस तरह केे भीतरघात की संभावनाएं बहुत कम थी क्योंकि तब तक सामूहिक नेतृत्व के तहत ही यह चुनाव लडे जाने की बात चल रही थी। लेकिन जब केन्द्रीय स्वास्थ्य मन्त्राी जेपी नड्डा का जंजैहली में जय राम ठाकुर को लेकर यह ब्यान आ गया कि चुनाव के बाद उन्हे एक बडी जिम्मेदारी दी जायेगी, इस ब्यान के साथ ही नड्डा का एक साक्षात्कार छप गया जिसमें यह कहा गया कि ऐसा मुख्यमन्त्री दिया जायेगा जो आगे पन्द्रह वर्षों तक नेतृत्व दे पायेगा। इस साक्षात्कार के सामनेे आने के बाद स्वभाविक रूप से पार्टी के भीतरी समीकरणों में बदलाव सामने आने लगे। इसी केे साथ चुनाव अभियान की जो भ्रष्टाचार केन्द्रित रणनीति अपनाई गयी थी उस पर हर पत्रकार वार्ता में नेताओं को कडे सवालों का सामना करना पड़ा। पंडित सुखराम और उनकेे परिवार को भाजपा में शामिल करके कांग्रेस के टूटने की जो उम्मीद की थी वह भी सफल नही हो पायी। उल्टे सुखराम का अपना भ्रष्टाचार भाजपा के गले की फांस बन गया। हर रोज भाजपा को इस पर सफाई देने की नौबत आ गयी। इस परिदृश्य में जब पूरे हालात की पुनः समीक्षा की गयी तब धूमल को नेता घोषित करने के अतिरिक्त पार्टी केे पास कोई विकल्प नही रह गया था। लेकिन कुछ लोगों को धूमल का नेता घोषित होना पसन्द नही आया है। बल्कि कई जगह तो भीतरघात के तार सीधे इन लोगों से जुड़े हुए माने जा रहे हैं। चुनाव परिणामों के बाद इस संद्धर्भ में भाजपा के अन्दर काफी कुछ रोचक देखने को मिलेगा यह तय है।
इसी तर्ज पर कांग्रेस के अन्दर भी बडे पैमाने पर भीतरघात होने की चर्चा बाहर आ रही है। इस चुनाव में कांग्रेस के अधिकांश विद्रोही तो सीधे- सीधे वीरभद्र सिंह के साथ जुड़े हुए माने जा रहे हैं। पार्टी ने चुनाव आंकलन के लिये 28 को बैठक बुलाई है। इस बैठक में भीतरघात की कितनी शिकायतें प्रदेश भर से आती है और उन पर क्या कारवाई की जाती है इसका खुलासा तो आने वाले दिनों में ही सामने आयेगा। लेकिन इस दौरान पार्टी के कुछ हल्कों में वीरभद्र के ईडी मामले को लेकर भी चर्चाएं चल पड़ी हैं। क्योंकि 2012 में वीरभद्र ने चुनाव में जोे शपथ पत्र सौपा था उसे सीबीआई ने अपनी जांच में झूठा पाया है। सीबीआई इस तथ्य कोे दिल्ली उच्च न्यायालय के सामनेे रख चुकी है। उच्च न्यायालय ने इस शपथपत्र को चुनाव आयोग को अगली कारवाई के लिये भेजने की सिफारिश 31.3.17 को की थी। वीरभद्र ने उच्च न्यायालय के इस आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी जिसे सर्वोच्च न्यायालय खरिज कर चुका है। अब वीरभद्र के विरोधी इस कानूनी कमजोरी का चुनाव परिणामों के बाद लाभ उठाने की रणनीति बना रहे हैं। माना जा रहा है कि चुनाव परिणामों के बाद वीरभद्र के लिये स्थितियां सुखद रहनेे वाली नहीं है।
शिमला/शैल। नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने हिमाचल प्रदेश के सारे "Green forest and core areas'' में हर तरह के निमार्ण पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। यही नही राष्ट्रीय उच्च मार्गो के तीन मीटर के दायरे में भी यह रोक लगा दी है। प्रदेश में हुए अन्धा धुन्ध निमार्ण पर सरकार की प्रताड़ना करते हुए ट्रिब्यूनल ने कहा है कि "If such unplanned and indiscriminate development is permitted, there will be irreparatable loss and damage to the environment, ecology and natural resources on the one hand and inevitable disaster on the other'' ट्रिब्यूनल ने कहा है कि यदि कोई व्यक्ति बिना अनुमति के पहाड़ को काटने या वन क्षेत्र को नुकसान का दोषी पाया जाता है तो हर दोष के लिये उस पर पांच लाख का जुर्माना लगाया जायेगा। नये निर्माणों पर ट्रिब्यूनल ने कहा है कि
"Beyond the core, green /forest area and the areas falling under the authorities of the Shimla Planning Area, the construction may be permitted strictly in accordance with the provisions of the Town and Country Planning Act. Development Plan and the Municipal laws in force. Even in these areas, construction will not be permitted beyond two storeys plus attic floor."
However, if any construction particularly public utilities (buildings like hospitals, schools and offices of essential services but would definitely not include commercial, private builders and any such allied buildings) are proposed to be constructed beyond two storeyes plus attic floor then the plans for approval or obtaining NOC shall be submitted to the authorities concerned having jurisdiction over the area in question."
ट्रिब्यूनल ने अपने आदेशों की अनुपालना सुनिश्चित करने के लिये निदेशक टीसीपी की अध्यक्षता में एक कमेटीे का भी गठन किया है। इस कमेटी के अन्य सदस्यों में सचिव शहरी विकास विभाग, निदेशक वाड़िया इन्स्टीच्यूट आॅफ हिमालय जियालोजी राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन के अधिकारी और प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड के सदस्य सचिव शामिल हैं। यह कमेटी सरकार को This committee shall also advise the state of Himachal Pradesh for regulating traffic on all roads, declaring prohibited zones for vehicular traffic, preventing and controlling pollution and for management of municipal solid waste in Shimla. The recommendation of this committee should be carried out by the state government and all its departments as well as local authorities without default and delay. ट्रिब्यूनल ने यह आदेश योगेन्द्र मोहन सेन गुप्ता और शीला मल्होत्रा की याचिका पर सुनाये हंै। ट्रिब्यूनल ने प्रदेश के टीसीपी और प्रदूशण नियन्त्रण बोर्ड के 20 सदस्यों के खिलाफ कारवाई करने की भी अनुशंसा की है।
एनजीटी के इन आदेशों से प्रदेश के प्रशासनिक और राजनीतिक हल्कों में हड़कंप की स्थिति पैदा हो गयी है क्योंकि राजधानी शिमला में अवैध निर्माण के हजारों मामलें हैं बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि यह अवैध निर्माण अपरोक्ष में राजनीतिक संरक्षण के चलते हुए है। क्योंकि इन्हें नियमित करने के लिये सरकार नौ बार रिटैन्शन पाॅलिसियां ला चुकी है। प्रदेश उच्च न्यायालय भी इन निर्माण पर कई बार तल्ख टिप्पणीयां कर चुकी है। एनजीटी के इन आदेशों के बाद नगर निगम शिमला के भी कईे पार्षद इन्हे उच्च न्यायालय में चुनौती देने का फैसला लेने का विचार बना रहे हैं। इन आदेशों की अनुपालना करना सरकार के लिये भी एक बड़ी चुनौती बन सकता है।
इन आदेशों के बाद नये निमार्णों के लिये बहुत सारी कठिनाईयां पैदा होने की आशंका हो गयी है। क्योंकि ऐसे क्षेत्रों में निमार्ण नही हो सकेगा जिनकी ढलान 35% से अधिक होगी। इन आदेशों के बाद स्मार्ट सिटी की सारी परियोजना का प्रारूप भी अब नये सिरे से बनाने की आवश्यकता आ खड़ी होगी। क्योंकि स्मार्ट सिटी के नाम पर बहुत सारेे ऐसे कार्य प्रायोजित है जिनकी अनुमति इन आदेशों के तहत मिल पाना संभव नही होगा।
शिमला/शैल। मतदान के बाद सामने आये आंकड़ो के अनुसार 37,21,665 मतदाताओं ने इन चुनावों में वोट डाले हैं। इनमें भी महिला मतदाताओं की संख्या 19,10,535 और पुरूषों की संख्या 18,11,126 रही है। इसमें पुरूषों का प्रतिशत 71.55 और महिलाओं का 77.76 रहा है। 6% महिलाओं का आंकड़ा अधिक रहा है। विधानसभा क्षेत्रों की गणना में 39 क्षेत्रों में महिलाओं की संख्या अधिक रही है। इसी के साथ यह भी गौरतलब है कि सिरमौर, सोलन, शिमला, कुल्लु, लाहौल स्पिति और किन्नौर के एक भी विधानसभा क्षेत्रा में महिलाओं की संख्या पुरूषों से अधिक नही रही हैं। जबकि कागंड़ा, ऊना, हमीरपुर के हर क्षेत्र में महिलाओं की संख्या अधिक रही है। मण्डी में भी दस में से आठ हल्कों में महिलाओं की संख्या अधिक रही है। इन आंकड़ो से यह तो स्पष्ट हो जाता है कि चुनाव परिणाम महिलाओं से ही प्रभावित रहेंगे। लेकिन यह दिलचस्प रहा है कि आधे हिमाचल में महिलायें पुरूषों से अधिक तो आधे में कम रही हैं।
इससे यह सवाल उठना स्वभाविक है कि महिलाओं के मतदान में इस तरह का आचरण क्यों रहा है। बल्कि इस आंकड़े से यह भी उभरता है कि पूरे प्रदेश में महिलाओं का आंकड़ा 6% अधिक रहा है पुरूषों से। इससे यह भी लगता है कि आधे हिमाचल में चुनाव परिणाम महिलाओं के अधिक आने से तो आधे में कम आने से प्रभावित होेंगे। इस परिदृश्य में यह समझना आवश्यक हो जाता है कि महिलाओं पर किन चीजों का चुनाव के संद्धर्भ में प्रभाव रहा होगा। इसमें सबसे पहले मंहगाई की गिनती आती है क्योंकि अभी थोड़े से ही अन्तराल में रसोई गैस सिलेण्डर की कीमत में 80 रूपये की बढौत्तरी देखने को मिली है और इस पर सबसे अधिक चिन्ता महिलाओं ने व्यक्त की है। यदि बढ़ती कीमतों के प्रति महिलाओें में आक्रोश रहा होगा तो इसका नुकसान भाजपा को होगा क्योंकि इसके लिये राज्य सरकार की बजाये केन्द्र सरकार ज्यादा जिम्मेदार है। लेकिन इसी के साथ जब कोटखाई का गुड़िया प्रकरण सामने आया तब प्रदेश में महिला सुरक्षा एक बड़े मुद्देे के रूप में उभर कर सामने आया। शिमला में हर रोज गुड़िया को न्याय मांगने वालों के धरने -प्रदर्शन देखने को मिले हैं। लेकिन जब यह प्रकरण सीबीआई को सौंप दिया गया और सीबीआई भी इसमें कुछ ठोस नही कर पायी तब गुड़िया आन्दोलन की आंच भी धीमी पड़ती चली गयी। चुनाव आने तक यह मुद्दा तो बड़ा मुद्दा बनकर नही रह पाया हालाॅंकि भाजपा ने इसे अपने अभियान का एक अंग अन्त तक बनाये रखा। लेकिन मतदान में पूरे शिमला, सोलन, सिरमौर में महिलाओं की भागीदारी का कम रहना एक अलग ही स्थिति खड़ी कर देता है। इसी के साथ सिरमौर, सोलन, शिमला, कुल्लु के 18 विधानसभा क्षेत्रों में पुरूष मतदाताओं की संख्या महिलाओं के अनुपात में इतनी अधिक है कि वहां पर निश्चित रूप से पुरूष ही चुनाव परिणाम को प्रभावित करेंगे। प्रदेश के 52 चुनाव क्षेत्र इन आंकड़ोे के अनुसार ऐसे हैं जहां हार-जीत का फैसला यह महिला और पुरूषों का अन्तर तय करेगा। चुनावी मुद्दांे के नाम पर भाजपा ने भ्रष्टाचार को जिम्मेदारी से केन्द्रित करने का प्रयास किया वह अन्त तक आते-आतेे उसी पर भारी पड़ गया। क्योंकि इस भ्रष्टाचार पर प्रचार के अनुरूप केन्द्रिय जांच ऐजैन्सीयां कारवाई नहीं कर पायी हैं। फिर भ्रष्टाचार के जिस तरह के आरोप कांग्रेस नेतृत्व के खिलाफ रहे हैं ठीक वैसे ही आरोप भाजपा नेतृत्व के खिलाफ भी रहे हैं। वीरभद्र सिंह नेे चुनाव के अन्तिम चरण में भाजपा पर पलटवार करते हुए यह जवाब दिया कि भाजपा नेता प्रेम कुमार धूमल, अनुराग ठाकुर, वीरेन्द्र कश्यप और डा. राजीव बिन्दल भी आपराधिक मामलों में ज़मानत पर हैं। वीरभद्र के इस आक्षेप का भाजपा नेता केवल यही जवाब दे पाये थे कि उनकेे खिलाफ बनाये गये मामले राजनीति से पे्ररित हैं लेकिन यह जवाब देतेे हुए भाजपा नेता भूल गये कि यही आरोप वीरभद्र लगातेे आ रहे हैं कि उनके खिलाफ बनाये गयेे मामले राजनीति से प्रेरित हैं।
आरोपों-प्रत्यारोपों के द्वन्द नेे कांग्रेस और भाजपा को एक ही धरातल पर लाकर खड़ा कर दिया है। इसी कारण से भ्रष्टाचार को लेकर आम आदमी की नज़र में कांग्रेस और भाजपा एक ही सिक्केे के दो पहलु बन कर रह जाते हैं। संभवतः इसीलिये इस चुनाव में मतदाता अन्त तक खामोश रहा है। अब मतदान के बाद भाजपा और कांग्रेस के अपने-अपने शुभ चिन्तकों कै चुनाव परिणाम सर्वे सोशल मीडिया पर हर रोज देखने को मिल रहे हैं। इन सर्वेक्षणों में जो लोग भाजपा की सरकार बनने का दावा कर रहे हैं उनकेे मुताबिक कांग्रेस को ऊना, देहरा सबडिविजन और हमीरपुर में एक भी सीट नही मिल रही है। लेकिन इसके बावजूद भी यह लोग भाजपा को 42 सीटें ही दे रहे हैं और भाजपा नेतृत्व के 50 प्लस के दावे को स्वयं ही नकार रहे हैं। इसी तर्ज पर कांग्रेस के समर्थकों की ओर से भी सर्वे आये हैं इनमें कांग्रेस को 36 से 38 तक सीटें दी जा रही हैं। लोग कांग्रेस की सरकार बननेे को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हैं। लेकिन जिस ढंग से महिला मतदान का पैटर्न आधे हिमाचल में अधिकता को लेकर एक जैसा है तोे दूसरे आधेे हिस्से में कमी को लेकर एक जैसा है उससेे अन्त में यही निष्कर्ष निकलता है कि शायद एक भी दल को अपने में सरकार बनानेे लायक बहुमत नहीं मिल पायेगा। इस परिणाम में चार से छः निर्दलीयों और माकपा के जीतने की संभावना है और सरकार बनानेे में इन्ही की भूमिका अहम रहेगी। क्योंकि कुछ स्थानों पर वीरभद्र ने खुलकर अपने विरोधियों को आर्शीवाद दिया है वहीं पर कुछ क्षेत्रों में शान्ता कुमार का सक्रिय न रहना त्रिशंकु के स्पष्ट संकेत माने जा रहे हैं। कुछ क्षेत्रों में वीरभद्र का विद्रोहीयों की पीठ थपथपाना और कुछ में शान्ता का सक्रिय न रहना त्रिशंकु के स्पष्ट संकेत माने जा रहे हैं।
महिला मतदान के महत्वपूर्ण आंकड़े
कई चुनाव क्षेत्रों में पुरूष और महिला मतदाताओं में इतना अन्तर है कि उसके आंकलन का सारा गणित अपने में ही कई सवाल खड़े कर देता है। महत्वपूर्ण अन्तर वाले क्षेत्र यह हैंः इनमें वोट डालने वाले पुरूषों और महिलाओं की संख्या इस प्रकार हैः-
चुनाव क्षेत्र पुरूष मतदाता महिला मतदाता
1. भटियात 24739 27152
2. नूरपुर 30757 32514
3 .फतेहपुर 26420 31104
4. ज्वाली 29892 35783
5. देहरा 24125 29280
6. जसवां परागपुर 23212 27794
7. ज्वालामुखी 23451 29379
8. जयसिंहपुर 20986 27930
9. सुलह 30235 37873
10. नगरोटा 29433 33873
11. कांगडा 26931 30732
12. शाहपुर 27863 31548
13. धर्मशाला 26923 28588
14. पालमपुर 23213 26440
15. बैजनाथ 23319 28572
16. जोगिन्द्रनगर 27893 36907
17. धर्मपुर 20842 26109
18. मण्डी 24525 27643
19. बल्ह 26774 29718
20. सरकाघाट 24679 30945
21. भोरंज 21350 27875
22. सुजारनपुर 21728 27946
23. हमीरपुर 21458 26029
24. बड़सर 24091 31537
25. नादौन 27167 34325
26. चिन्तपुरनी 27170 29393
27. गगरेट 28119 30733
28. हरोली 30045 33493
29. ऊना में 29635 32086
30. कुटलैहड़ 27255 31230
31. झण्डूता 24758 27924
32. घुमारवीं 26587 32257
33. बिलासपुर 27367 29934
शिमला/शैल। कांग्रेस और भाजपा के घोषणापत्रों में यह दावा किया गया है कि भ्रष्टाचार किसी भी स्तर पर कतई बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। कांग्रेस ऐसी शिकायतों का निवारण करने के लिये एक आयुक्त नियुक्त करेगी। भाजपा इसके लिये आयोग का गठन करेगी। कांग्रेस-भाजपा के चुनाव घोषणा पत्रों पर आम आदमी ने कितना चिन्तन - मनन किया होगा इसका अन्दाजा लगाना कठिन है। क्योंकि दोनों दलों ने जितने वायदे अपने घोषणा पत्रों में कर रखे हैं उन्हे पूरा करने के लिये धन कहां से आयेगा इसका जिक्र किसी ने भी नहीं किया है। भाजपा ने पानी पर प्रति क्यूबिक मीटर
दस पैसे का कर लगाकर 600 करोड़ का राजस्व जुटाने का
दावा किया है। लेकिन इस दस पैस के कर से मंहगाई पर कब कितना असर पड़ेगा इसका कोई जिक्र नहीं है। विकास के महत्वपूर्ण कार्यों के लिये पी पी पी मोड़ पर विदेशी फण्ड का प्रबन्ध किया जायेगा यह भी वायदा किया गया है। लेकिन इसके और परिणाम क्या होंगे इस पर कुछ नहीं कहा गया है। कांग्रेस कृषि, बागवानी, पशुपालन आदि सारी योजनाओं पर 90% सब्सिडी देगी और छोटे और सीमान्त किसानों को एक लाख ऋण ब्याज मुक्त देगी तथा प्रतिवर्ष 30000 छात्रों को लैपटाॅप देगी यह वायदा किया गया है। लेकिन इन वायदों को पूरा कैसे किया जायेगा इसका कोई जिक्र नहीं है। दोनों दलों के घोषणा पत्रों में जो वायदे किये गये हैं उन्हे पूरा करने के लिये या तो कर्ज का सहारा लिया जायेगा या फिर जनता पर करों का भार बढ़ाया जायेगा। क्योंकि वायदे पूरे करने के लिये धन चाहिये जो सरकार के पास है नहीं और केन्द्र इतना दे नहीं सकता क्योंकि उसकी भी कुछ वैधानिक सीमायें रहेंगी।
घोषणा पत्रों का यह जिक्र इस समय इसलिये आवश्यक है कि कल जो भी सरकार आयेगी वह अपने घोषणा पत्र से बंधी होगी। आम आदमी को अपेक्षा रहेगी कि सरकार के आते ही इन पर अमल शुरू हो जायेगा। इस अमल की आम आदनी को कितनी कीमत चुकानी पड़ेगी इसके लिये उसे पहले ही दिन से सजग रहना पडे़गा। इस सजगता में आम आदमी यदि सरकार के भ्रष्टाचार को लेकर किये गये वायदों पर ही सरकार को समय-समय पर सचेत करता रहेगा तो यही एक बड़ा काम होगा। दोनों दलों ने भ्रष्टाचार कतई बर्दाश्त न करने का वायदा किया है। भ्रष्टाचार के खिलाफ कारवाई करने के लिये सरकार के पास विजिलैन्स का पूरा तन्त्र उपलब्ध है। लेकिन वीरभद्र के इस शासन काल में विजिलैन्स ने भ्रष्टाचार के किसी बड़े मामले पर हाथ डाला हो और उसमें सफलता हासिल की हो ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया है। ऐसा नहीं है कि विजिलैन्स के पास कोई बड़ा मामला आया ही न हो बल्कि वास्तव में बड़े मामलों पर कारवाई करने से यह ऐजैन्सी बचती रही है। हिमाचल को विद्युत राज्य के रूप में प्रचारित प्रसारित किया जाता रहा है बल्कि इसी प्रचार के कारण यहां पर उद्योग आये हैं । लेकिन आज प्रदेश की विद्युत परयोजनाएं प्रदेश को लाभ देने के स्थान पर लगातार नुकसान दे रही हैं। विद्युत से हर वर्ष आय में कमी होती जा रही है यह कमी क्यों हो रही है इसकी ओर कोई ध्यान नही दिया जा रहा है।
इस परिदृश्य में यह स्मरणीय है कि प्रदेश में विद्युत में जे.पी. उद्योग समूह एक बड़ा विद्युत उत्पादक है लेकिन जितना बड़ा यह उत्पादक है राजस्व को लेकर इसके खिलाफ उतनी ही बड़ी शिकायतें भी हैं। स्मरणीय है कि भाजपा ने अपने ही एक आरोप पत्र में जे.पी. के सीमेंट प्लांट में 12 करोड़ का घोटाला होने का आरोप लगाया है। जे.पी. के दूसरे प्लांट को लेकर प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेशों पर एक एसआई टी गठित हुई थी लेकिन उसका परिणाम क्या हुआ है इसका आज तक कोई पता नही है। जे.पी. को 1990 में जो बसपा परियोजना दी गयी थी उसका 92 करोड़ वसूलने की बजाये बट्टे खाते में डाल दिया गया है। सीएजी इस पर एतराज उठा चुका है। लेकिन सरकार में कोई कारवाई नही हुई है। जे.पी. ने दूसरी परियोजना को 900 मैगावाट से अपने ही स्तर पर 1200 मैगावाट कर लिया और इस 300 मैगावाट का कोई अपफ्र्रन्ट प्रिमियम आज तक नही वसूला गया है । इसी तरह जो विद्युत परियोजनाएं विद्युत बोर्ड की अपनी हैं उनमें एक लम्बे अरसे से रिपेयर के नाम पर हर वर्ष हजारों घन्टों का शट डाऊन दिखाया जा रहा है। स्वभाविक है जो परियोजना इतना लम्बा समय बन्द रहेंगी उसमें उत्पादन नही होगा और प्रदेश को राजस्व की हानि होगी। निजि क्षेत्रा की परियोजनाओं में रिपेयर के नाम पर कभी भी 8-10 घन्टे से ज्यादा का शटडाऊन नही देखा गया है। इस शटडाऊन को लेकर पूरे दस्तावेजों के साथ विजिलैन्स में लम्बे समय से शिकायत लंबित पड़ी है। विद्युत बोर्ड के अपने ही सूत्रों के मुताबिक प्रतिदिन कई करोड़ो का घपला हो रहा है। सरकार ने भी मान लिया है कि इसमंे कहीं कोई लापरवाही हो रही है परन्तु कोई कारवाई नही हो रही है। इसलिये आज दोनों दलों के दावों के संदर्भ में यह मामला सामने रखा जा रहा है।
शिमला/शैल। मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह आयकर, सीबीआई ईडी मे चल रहे मामलों में कानूनी लड़ाई का पहला चरण हार गये हैं। आयकर प्राधिकरण चण्डीगढ़ में हुए फैसलों की अपील प्रदेश उच्च न्यायालय शिमला में की गयी थी। यहां आये दोनों मामलों में उन्हे राहत नही मिली है। सीबीआई में चल रहे आय से अधिक संपत्ति मामले में 31 मार्च 2017 को आये फैसलों में अदालत ने उनके खिलाफ दायर एफ आई आर को रद्द करने से इन्कार कर दिया है। दिल्ली उच्च न्यायालय के इस फैसले के खिलाफ वीरभद्र कि ओर से सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की गयी थी। अब सर्वोच्च न्यायालय ने यह अपील खरीज कर दी है। सीबीआई ने इस प्रकरण में ट्रायल कोर्ट में चालान दायर कर दिया है। इस पर अगली कारवाई भी शुरू हो चुकी है। 31 मार्च 2017 को आये फैसले में वीरभद्र के 2012 के विधानसभा चुनाव में दायर किये गये संपत्ति शपथ पत्र को लेकर गंभीर टिप्पणी की गयी है। सीबीआई ने इस शपथ पत्र को झूूठा करार दिया है। उच्च न्यायालय ने शपथ पत्र के मामले को चुनाव आयोग को भजने और उस पर नियमां के तहत कारवाई करनेे की संस्तुति की है। चुनाव आयोग के पास दायर शपथ पत्र के झूठा पाये जाने पर जन प्रतिनिधित्व कानून के तहत कारवाई की जाती है। झूठे शपत पत्र पर व्यक्ति की सदन की सदस्यता समाप्त होने के साथ ही छः माह के कारावास का भीे प्रावधान है। दिल्ली उच्च न्यायालय की टिप्पणी यह है It has come to light that the first ITR for the AY 2011-12 was filed by Shri. Vir Bhadra Singh on 11-07-2011 showing his agricultural income as Rs. 25 Lakhs. The revised ITR for this year showing an income of Rs.1.55 Crores was filed by him on 02-03-2012. Thereafter while contesting HP Assembly elections. He filed an affidavit on 17-10-2012 showing his income as Rs. 18.66 Lakhs only. Thus Shri. Vir Bhadra Singh appears to have grossly suppressed his income in the said affidavit. This matter is proposed to be brought to the notice of the Election Commission of India for taking necessary action as deemed fit. अब 2017 का चुनाव चल रहा है इसके लिये भी शपथ पत्र दायर हुआ है। अब यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि जब 2012 के चुनाव में लिया गया आय का आधार अन्तः विरोधी है तो फिर उसके बाद आय के सारे आधारों पर प्रश्न चिन्ह लगना स्वभाविक है।
ईडी ने मनीलांडरिंग के तहत दो अटैचमैन्ट आदेश जारी करके परिवार की करोड़ो की चल-अचल संपत्ति अटैच कर रखी है। मनीलाॅंरिंग प्रकरण में वीरभद्र के साथ सह अभियुक्त बने उनके एलआईसी ऐजैन्ट आनन्द चैहान जून 2016 से हिरासत में चल रहे हैं। ईडी ने जो दूसरा अटैचमैन्ट आदेश जारी किया है उसमें दो एनैक्सरचर संलग्न किये हैं। इनमें यह दिखाया गया है कि वक्कामुल्ला चन्द्रशेखर -वीरभद्र विक्रमादित्य-मैप्पल डैस्टीनेशन और ड्रीम बिल्ट में किस तरह से सारा लेनदेन हुआ है। इसमें कुछ Shell कंपनीयों के साथ हुई 27 टाजैक्शन दिखायी गई है। इन सबमें Supply of certain material दिखायी गयी है लेकिन इस मैट्रियल की तफसील नही दी गयी है। इस सारी कड़ी में हुई जांच में वक्कामुल्ला का आर्थिक बेस सवालों के घेरे में है। ईडी के मुताबिक सारी कंपनीयों के डायरैक्टर फर्जी हैं।
यह व्यवहारिक स्थिति सीबीआई और ईडी की जांच में सामने आये दस्तावेजों से उभरी है। ईडी और सीबीआई में दर्ज हुए मामलों को रद्द करने से दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट इन्कार कर चुके। यह मामले रद्द किये जाने की याचिकाओं की सुनवाई के दौरान स्वभाविक रूप में यह दस्तावेज अदालत के सामने आये ही होंगें। इन दस्तावेजों की गंभीरता और प्रमाणिकता को आंकने के बाद ही हर नेता ने प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी तक ने वीरभद्र के इस कथित भ्रष्टाचार पर निशाना साधा है। जेपी नड्डा तक ने भी यह आरोप लगाया है कि वीरभद्र के कारण हिमाचल शर्मसार हुआ है। लेकिन भाजपा नेताओं के इन आरोपो से ही सवाल भी उभरता है कि जब वीरभद्र सिंह के खिलाफ इतने साक्ष्य ईडी के सामने थे तो उसने कारवाई क्यों नही की? 2012 का चुनाव शपथ पत्रा एकदम पुख्ता और प्रमाणिक दस्तावेज है यदि इस पर कारवाई फैसला आनेे के तुरन्त बाद हो जाती तो निश्चित रूप से प्रदेश का राजनीतिक परिदृश्य ही बदल गया होता। ऐसे में सवाल उठता है कि भाजपा ने इस मुद्दे को क्यो नही उठाया? क्या शीर्ष स्तरों पर कुछ और पक रहा था?क्या इस सारे मामले को एक बार फिर लोक सभा चुनावों की तर्ज पर विधानसभा चुनावों में भी भुनाने की रणनीति बनाई जा रही थी। क्योकि ईडी को चुनावों के बाद अगली कारवाई जल्द पूरा करने की कानूनी बाध्यता होगी। फिर 2012 के चुनाव शपथ पत्र पर नौ नवम्बर के मतदान के बाद कारवाई करने की नौबत आ सकती है क्योंकि उच्च न्यायालय तो पहले ही इस मामले को चुनाव आयोग को भेजने के निर्देश 31 मार्च के फैसले मेें दे चुका है। इस परिदृश्य में चुनाव आयोग और भाजपा क्या करती है इस पर सबकी निगाहें रहेगी।

