शिमला/शैल। मुख्यन्त्री वीरभद्र सिंह के बेटे और प्रदेश युवा कांग्रेस के अध्यक्ष विक्रमादित्य सिंह शिमला ग्रामीण विधान क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे हैं। इस चुनाव के लिये उन्होने जो शपथ पत्र दायर किया है उसमें अपनी चल- अचल संपति 84 करोड़ दिखा रखी है। यह 84 करोड़ संपत्ति दिखाने पर भाजपा ने वीरभद्र सिंह और विक्रमादित्य से सवाल पूछा है कि इतनी संपत्ति पांच वर्षों में उन्होने कैसे अर्जित कर ली। फिर इसी शपथ पत्र में विक्रमादित्य ने वक्कामुल्ला चन्द्रशेखर से 84 लाख का कर्ज लिया भी दिखाया है। इस कर्ज पर भी भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता डा. पात्रा ने सवाल पूछा है कि जब विक्रमादित्य के पिता मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह और उनकी माता पूर्व सांसद प्रतिभा सिंह के पास करोड़ो रूपया कैश- इन- हैंड था तो उन्हे यह कर्ज लेने की आवश्यकता क्यों पड़ गयी। डा. पात्रा ने विक्रमादित्य और वक्कामुल्ला की कंपनीयों केे व्यापारिक रिश्तों पर गंभीर सवाल उठाये हैं।
विक्रमादित्य की संपति पर यह सवाल इसलिये उठाये गये कि जब वीरभद्र सिंह ने 17.10.12 को विधानसभा चुनाव लडते हुए जो शपथ पत्र दायर किया था उसें विक्रमादित्य को अपनेे पर आश्रित दिखाया था। उस समय विक्रमादित्य के नाम करीब 1.5 करोड़ की संपति दिखायी गयी है। 2012 तक विक्रमादित्य कोई आयकर रिर्टन भी दायर नही करते थे। उसके बाद विक्रमादित्य ने अपनी कंपनी के नाम महरौली में जो फार्म हाऊस गड्डे परिवार से 1.20 करोड में खरीदा था उसके लिये उन्हें 90 लाख वीरभद्र सिंह ने दिये थे। 30 लाख उन्होने अपने साधनों से दिये थे। लेकिन सीबीआई और ईडी की जांच में यह खुलासा हुआ है कि यह तीस लाख भी दो कंपनीयों से 15- 15 लाख के चैकों के माध्यम से आया है। इन कंपनीयों की वैद्धता पर भी ईडी ने सवाल उठाये हैं और इसी कारण से फार्म हाऊस की अटैचमैन्ट केे आदेश हुए है।
यही नही ईडी के अटैचमैन्ट आदेश में हुए खुलासे के मुताबिक 19 नवम्बर 2011 से 25 नवम्बर के बीच वक्कामुल्ला की तीन कंपनीयों से विक्रमादित्य के स्टेट बैंक आॅफ इण्डिया के खाते में 25.11.11 को दो करोड़ रूपये आते हैं और फिर 10.01.12. को विक्रमादित्य की कंपनीे मैप्पल डैस्टीनेशन से 50 लाख वक्कामुल्ला को दे दिये जाते है। 11.1.12 को इसी कंपनी से वक्कामुल्ला की कंपनी तारिणी सुगर को 1.50 करोड़ दे दिये जाते हैं। वीरभद्र से विक्रमादित्य को 90 लाख 2.8.11 को मिलते है और विक्रमादित्य 4.8.11 को 45-45 लाख सुनीता गड्डे और पिचेश्वर गड्डे के खातों में जमा करवाते हैं। लेकिन इसके बाद नवम्बर 2011 में पहले वक्कामुल्ला दो करोड़ विक्रमादित्य को देते हैं फिर 10 जनवरी को 2012 को विक्रमादित्य की कंपनी दो करोड़ वक्कामुल्ला और उसकी कंपनी को देते हैं। संभवतः इसी लेन देन के आधार पर विक्रमादित्य और वक्कामुल्ला के रिश्तों पर सवाल उठाये जा रहे हैं। इसी कारण से विक्रमादित्य की संपति के 84 करोड़ हो जाने पर सवाल उठ रहे है।
शिमला/शैल। प्रदेश भाजपा ने इन चुनावों के लिये अभी तक यह घोषित नही किया है कि यदि उसे चुनावों में बहुमत हासिल होता है तो उसका मुख्यमन्त्री कौन होगा। भाजपा ने जो सूची अपने उम्मीदवारों की जारी की है उसमें 21 नये चेहरों को शामिल किया गया है। चार वर्तमान विधायकों बी. के. चौहान, अनिल धीमान, रिखी राम कौण्डल और गोबिन्द शर्मा को टिकट नही दिया गया है। कांग्रेस से आये अनिल शर्मा को टिकट दे दिया गया है। अनिल के साथ ही उनके पिता पर्व संचार मंत्री पंडित सुखराम और बेटेे आश्रय शर्मा को भी भाजपा में शामिल कर लिया गया है। पंडित
सुखराम को दूरसंचार घोटालेे में सजा हो चुकी है और
उन्हेे सर्वोच्च न्यायालय से बढ़ती आयु और बिमारी के आधार पर ज़मानत मिली हुई है यह सभी जानते हैं। भाजपा ने पूर्व सांसद सुरश चन्देल और पार्टी के पूर्व अध्यक्ष खीमी राम को टिकट नही दिया है। 21 नये चेहरों को चुनावों मैदान में उतारा गया है पूर्व सांसद राजन सुशान्त को पार्टी में शामिल नही किया गया है। ऐसे में सुरेश चन्देल, राजन सुशान्त और पंडित सुखराम को लेकर भाजपा के तीन अलग- अलग स्टैण्ड भी सामने आ गये हैं। क्योंकि जिस अनिल शर्मा के खिलाफ भाजपा अपने ही आरोप पत्र में आरोप लगा चुकी है उसे टिकट देने के बाद सुरेश चन्देल को इन्कार करना और सुशान्त को पार्टी में शामिल तक नही करना भाजपा के नीतिगत आन्तरिक विरोधाभासों का एक प्रमाण बन जाता है जो भाजपा के अन्य दलों से भिन्न होने के दावों को एकदम नकार देता है। इस परिदृश्य में पार्टी के कुछ हल्कों में रोष और विद्रोह का उभरना स्वभाविक है। यह विद्रोह उभर चुका है इसे भाजपा कितना शांत कर पाती है इसका पता तो नामांकन वापिस लेने के अन्तिम दिन के बाद ही लग पायेगा। बहरहाल इस पर सबकी निगाहें लगी हैं।
पार्टी ने यह चुनाव सामूहिक नेतृत्व में लड़नेे का दावा किया है। मुख्यमन्त्री के लियेे जो दो नाम पवन राणा और अजय जम्वाल एक अरसेे तक सोशल मीडिया की सुर्खियों में छाये रहे हैं उन्हे पार्टी ने चुनाव में उतारा ही नही है इसका अर्थ है कि चुने गये विधायकों में से हीे किसी को मुख्यमन्त्री पद से नवाज़ा जायेगा। लेकिन टिकट वितरण के दौरान जिस तरह का ध्रुवीकरण उभरा है उसमें केन्द्रिय स्वास्थ्य मन्त्री जगत प्रकाश नड्डा को लेकर भी यह संकेत उभरे हैं कि वह प्रदेश के अगलेे मुख्यमन्त्री हो सकते हैं। लेकिन अभी नड्डा का जो एक साक्षात्कार छपा है उसमें नड्डा ने यह कहा है कि मुख्यमन्त्री उस व्यक्ति को बनाया जायेगा जो कि अगले पन्द्रह वर्षों तक इस जिम्मेदारी को निभायेगा। नड्डा इस गणित में स्वयं पूरी तरह फिट बैठतेे हंै इसमें कोई दो राय नही है। लेकिन इस साक्षात्कार के साथ ही नड्डा का जय राम ठाकुर के चुनाव क्षेत्र से भी एक ब्यान आया है। जय राम के पक्ष में बोलते हुए नड्डा ने जंजैहली की जनता को स्पष्ट कहा है कि चुनाव जीतने के बाद उन्हेे एक बड़ी जिम्मेदारी सौंपी जायेगी। जयराम धूमल मन्त्रीमण्डल में मन्त्री तो पहले रह ही चुकेे हैं। ऐसे में अब बड़ी जिम्मेदारी सौपने के संकेत से साफ सन्देश जाता है कि जय राम को अगला मुख्यमन्त्री बनाया जाने का फैसला भाजपा हाईकमान लगभग ले चुकी है। जय राम नड्डा के साक्षात्कार में छपे मानक पर भी पूरे उतरते हैं। फिर नड्डा स्वयं इस समय हाईकमान का एक हिस्सा हैं। चुनाव प्रचार में नड्डा को पार्टी पूरे संसाधनों से लैसे करने जा रही है। एक चैपर हर समय उनकेे लिये उपलब्ध रहेगा। इससे यह और स्पष्ट हो जायेगा कि भाजपा को बहुमत मिलनेे की सूरत में नड्डा और जयराम में से ही कोई अगला मुख्यमन्त्री होगा।
नड्डा का ब्यान और उनका सामने आया साक्षात्कार पार्टी के अन्य लोगों पर कितना और क्या असर डालता है यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। लेकिन यह तय है कि उनका यह ब्यान एक चर्चा का मुद्दा जरूर बन जायेगा। वैसे भाजपा के लिये जो स्थितियां नगर निगम शिमला के चुनावों से पूर्व थी वह निगम चुनावों के परिणाम आने के बाद निश्चित रूप से बदली हैं। फिर अभी पंजाब के लोकसभा उपचुनाव में भाजपा करीब दो लाख मतो से हारी है। हार के इतने बडे़ अन्तर से स्पष्ट हो जाता है कि अब मोदी के दावों पर जनता में विश्वास की कमी पनपती जा रही है। फिर भाजपा अब सुखराम के पार्टी में शामिल होने से वीरभद्र के भ्रष्टाचार पर खुलकर हमला नही कर पायेगी। क्योंकि सुखराम ने जो अपनी सफाई में यह कहा है कि उनके यहां मिला पैसा कांग्रेस पार्टी का था और वीरभद्र ने सीताराम केसरी के माध्यम से उनके घर रखवाया यह अब गले नही उतरता है। क्योंकि सुखराम को तीनों मामलों में सजा हो चुकी है और इस सजा को दिल्ली उच्च न्यायालय कनर्फम कर चुका है। फिर सुखराम जो आज कह रहे हैं वह उन्होनेे इन मामलों की सुनवाई के दौरान किसी भी अदालत के सामने नही कहा है। यही नही जब विकास कांग्रेस भंग होनेे के बाद वह कांगे्रस में शामिल हुए थे तो जिस कांग्रेस नेे उनके खिलाफ इतना बड़ा षडयंत्र रचा उसमें वह किस नैतिकता केे आधार पर शामिल हुए थे। आज इतने अरसे बाद उन्हे यह क्यों याद आया। सुखराम के इस तर्क से तो जो आरोप वह वीरभद्र पर ब्लैक मेलिंग का लगा रहे हैं वह स्वयं उसी में घिर जाते हैं। क्योंकि इतना समय चुप रह कर क्या वह सत्ता का लाभ नही ले रहे थे।
शिमला/शैल। मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह के सचिवालय में कार्यरत ओ एस डी त्रिलोक जनारथा और राकेश ढिंड़ोरा ने अपने-अपने पदों से त्यागपत्र दे दिया है। क्योंकि त्रिलोक जनारथा मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह और राकेश ढिंड़ोरा मुख्यमन्त्री के बेटे विक्रमादित्य सिंह के अधिकारिक चुनाव ऐजैन्ट बन गये हैं। चुनाव ऐजैन्ट बनने केे लियेे रिटर्निंग अफसर के पास चुनाव प्रत्याशी द्वारा एक फार्म भरकर अपने चुनाव ऐजैन्ट की जानकारी देनी होती है और इस फार्म पर ऐजैन्ट को भी हस्ताक्षर करने होतेे हैं। इसलिये जब इन अधिकारियों ने चुनाव ऐजैन्ट होना स्वीकार लिया तो फिर यह सरकार में बतौर ओ एस डी काम नही कर सकते थे। कानून की इस बाध्यता के चलते विपक्ष के शोर मचाने-शिकायत करने से पहले ही पद त्याग दिये।
स्मरणीय है कि त्रिलोक जनारथा पूर्व में वीरभद्र सिंह के प्रधान निजि सचिव भी रह चुके हैं। रोहडू से ताल्लुक रखने वाले जनारथा वीरभद्र के विश्वस्तों में गिने जाते हैं। इसलिये वीरभद्र ने इन्हें सेवानिवृति के बाद भी अपने साथ रखा हुआ है। राकेश ढिंड़ोरा एच ए एस इसी वर्ष सेवा निवृत हुए थे। वह मुख्यमन्त्री सचिवालय में वीरभद्र के चुनाव क्षेत्रा शिमला ग्रामीण के सारे कार्य देख रहे थे और इस नातेे पूरे चुनाव क्षेत्र की उन्हे जानकारी हो गयी थी। फिर ढिंड़ोरा नालागढ़ के एक प्रतिष्ठत स्वतन्त्रता सैनानी और राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखतेे हैं। बल्कि इस बार वह नालागढ़ से कांग्रेस टिकट पर चुनाव लड़ना चाह रहे थे और इसके लिये उन्होने पार्टी से आवेदन भी कर रखा था। लेकिन अब जब वीरभद्र और विक्रमादित्य दोनों ने ही चुनाव लड़ने का फैसला लिया तब शिमला ग्रामीण में चुनाव ऐजैन्ट की जिम्मेदारी संभालने के लिये उनसे उपयुक्त और कोई नही था। विक्रमादित्य के लिये यह जिम्मेदारी निभाने के लिये ढिंडोरा ने स्वयं चुनाव लड़ने का फैसला छोड़ दिया।
स्मरणीय है कि मुख्यमन्त्री के सचिवालय पर विपक्ष हर समय यह आरोप लगाता रहा है कि यह कार्यालय सेवानिवृत अधिकारियों की शरण स्थली बना हुआ है। संयोगवश मुख्यमन्त्री के प्रधान निजि सचिव सुभाष आहलूवालिया , प्रधान सचिव टीजी नेगी, ओ एस डी राकेश शर्मा सभी सेवानिवृत अधिकारी हैं। इनके अतिरिक्त अमित पाल सिंह, भी मुख्यमन्त्री के ओ एस डी हैं लेकिन इनमें से किसी ने भी अपने पदों से त्यागपत्र नही दिया है। इस चुनाव में मुख्यमन्त्री का सचिवालय विपक्ष के विशेष निशाने पर रहने वाला है। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि मुख्यमन्त्री कार्यालय की कार्यप्रणाली के कारण भी बहुत लोगों में रोश पैदा हुआ है। भाजपा के ‘‘हिमाचल मांगे हिसाब’’ में मुख्य सचिव से लेकर प्रधान निजि सचिव और सुरक्षा अधिकारी तक विशेष निशाने पर रहे है। ऐसे में वीरभद्र के यह विश्वस्त किस तरह की रणनीति अपनाकर विपक्ष को चुनाव में मात देते हैं इस पर सबकी निगाहें लगी हैं। क्योकि मुख्यमन्त्री के प्रधान निजि सचिव का कार्य देख रहेे सुभाष आहलूवालिया की नियुक्ति अभी भी सरकार के मीडिया सलाहकार के रूप में चल रही है। लेकिन आहलूवालिया सरकार के मीडिया सलाहकार का काम देखने की बजाये मुख्यमन्त्री के निजि सचिव का कार्य कर रहे है।
स्मरणीय है कि आहलूवालिया 2011 में सेवानिवृत हुए थे और 2012 में कांग्रेस की सरकार आते ही मीडिया सलाहकार के रूप में पुनः नियुक्ति मिल गयी थी। इस तरह मुख्यमन्त्री के विश्वस्त होने के नाते बतौर मीडिया सलाहकार उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठने स्वभाविक है । इसी आधार पर चुनाव आयोग के आदेश से लोक संपर्क विभाग के निदेशक आर एस नेगी को हटना पड़ा है। अब भाजपा ने आहलूवालिया की शिकायत चुनाव आयोग को भेज दी है। माना जा रहा कि आहलूवालिया को भी उनके पद से त्यागपत्र देना ही पडे़गा।
खुलासा
शिमला/शैल। पूर्व केन्द्रिय संचार मन्त्री पंडित सुखराम वीरभद्र मन्त्रीमण्डल में मन्त्री उनके बेटे अनिल शर्मा और प्रदेश कांग्रेस के सचिव उनके पौत्र आश्रय शर्मा ने कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया है। कांग्रेस छोड़ भाजपा में जाने का जो तर्क अनिल शर्मा ने दिया है उसके मुताबिक पिछले दिनों जब मण्डी में राहुल गांधी रैली के लिये आये थे उस समय सुखराम की उपेक्षा की गयी उन्हे रैली के लिये आमन्त्रित नहीं किया गया और यहां तक कहा गया कि यदि वह आये तो दूसरे लोग रैली छोड़ कर चले जायेंगे। इस उपेक्षा से आहत होकर परिवार पार्टी छोड़ रहा है। अनिल का यह आरोप कितना सही है यह तो वही जानते हैं और उनके अतिरिक्त इसकी जानकारी पार्टी अध्यक्ष सुक्खु तथा मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह को होगी। लेकिन प्रदेश और मण्डी की जनता के सामने अनिल के बेटे आश्रय शर्मा का वह पत्रकार सम्मेलन अवश्य है जो उन्होने इस रैली से कुछ ही दिन पहले आयोजित किया था। इस सम्मेलन में यह दावा किया गया था कि पार्टी हाईकमान ने
उन्हे सिराज से चुनाव लड़ने का सिगनल दे दिया है और वह भाजपा के जयराम ठाकुर के विरूद्ध चुनाव लड़ेंगे और उनके दादा सुखराम इस चुनाव की कमान संभालेंगें। यदि आश्रय का पत्रकार सम्मेलन में किया गया यह दावा सही था तो फिर अब पार्टी छोड़ने का तर्क सही नही हो सकता क्योंकि इस दावे का पार्टी की ओर से कोई खण्डन नहीं किया गया था। यदि यह दावा गलत था तो इससे बड़ी अनुशासनहीनता और पार्टी को अपने खिलाफ कारवाई के लिये उकसाने के अतिरिक्त और कुछ नही हो सकता। इसलिये यही माना जायेगा कि पार्टी छोड़ने के लिये बहाने तलाश किये जा रहे थे। जबकि अनिल शर्मा भाजपा में जाने की चर्चा मीडिया में करीब छः माह से चल रही थी।
आज सुखराम का पूरा परिवार भाजपा में शामिल हो गया है। स्मरणीय है कि जब पंडित सुखराम को दूर संचार घोटाले में गिरफ्तार किया गया था उस दौरान प्रदेश विधानसभा के सदन के अन्दर जे पी नड्डा और किशन कपूर आदि भाजपा विधायकों ने इस स्कैम का नाट्यरूपान्तरण तक स्टेज कर दिया था गले में नोटों के हार डालकर सदन के अन्दर आ गये थे। सुखराम के दूर संचार घोटाले को भाजपा ने राष्ट्रीय स्तर पर भ्रष्टाचार का एक बडा मुद्दा बनाया था। सुखराम के खिलाफ सीबीआई ने तीन मामले दर्ज किये थे। हरियाणा की एक कंपनी एचटीएल को 30 करोड़ का ठेका देने के एवज में तीन लाख की रिश्वत लेने का आरोप लगा था। इस मामले में सुखराम के साथ इस कंपनी के चेयरमैन देवेन्द्र चौधरी भी सह अभियुक्त बने थे। चौधरी की मामले की जांच के दौरान ही मौत हो चुकी है। इस मामले में अदालत से सुखराम को पांच साल की सजा और चार लाख के जुर्माने की सजा हो चुकी है। दूसरा मामला हैदराबाद के रामा राव की कंपनी ।Advance Radio Masts को 1.66 करोड़ का सप्लाई आर्डर देने का है। इसमें सुखराम के साथ कंपनी के मालिक रामा राव और दूर संचार विभाग की निदेशक रूनू घोष भी सह अभियुक्त हैं। इस मामले में भी सजा हो चुकी है। तीसरा मामला घर में हुई छापमारी के दौरान मिली 4.25 करोड़ की नकदी को लेकर आय से अधिक संपत्ति का बना। सीबीआई ने 1993 में यह मामले दर्ज किये थे और 1998 में इनमे चार्जशीट फाईल हुई थी। नवम्बर 2011 में ट्रायल कोर्ट से फैसला आया था। जब यह फैसला आया था उस समय नितिन गडकरी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। 19.11.2011 को इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए गडकरी ने कहा था "The way in which the court has taken the time to punish the guilty is important. The judicial system needs changes otherwise people will loose faith " इसी मामले में सुखराम ने अदालत से यह कहा था कि "As such it is not a case where govt. has lost any money. The CBI allegation was that he took bribe but no financial loss has been caused to the govt. exchequer." कर चुका है। दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ सुखराम सर्वोच्च न्यायालय गये थे और यह गुहार लगायी थी कि बढ़ती उम्र के चलते उन्हें जेल न भेजा जाये। इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें पहले निचली अदालत में आत्मसमर्पण के लिये कहा था। इस पर सुखराम ऐंबुलैन्स में अदालत पहुंचे थे और कोमा में चले जाने तक की स्थिति अदालत में रखी थी। इस समय बढ़ती उम्र और बीमारी के कारण जमानत पर है। यह मामले अब अन्तिम फैसले के कगार पर पहुंचे हुए हैं और माना जा रहा है कि इन मामलों का भी परिवार पर दवाब चल रहा है।
सुखराम के अतिरिक्त अनिल शर्मा के खिलाफ भी भाजपा ने अपने आरोप पत्र में मण्डी के राजमहल प्रकरण में गंभीर आरोप लगाया हुआ है। यह आरोप पत्र भाजपा अध्यक्ष सतपाल सत्ती और नेता प्रतिपक्ष प्रेम कुमार धूमल के हस्ताक्षरों से राज्यपाल को सौंपा गया है। जिसमें यह आरोप है कि ‘‘जिला मण्डी कीे राजमहल जमीन बेनामी सौदे में विधायक/मन्त्री के बैंक खाते से लाखों रूपये श्री संजय कुमार के बैंक खातें में ट्रांसफर हुए। यूं बेनामी सौदा श्री खूब राम के नाम हुआ जिसका सूत्रधार संजय था।’’ आज इन विधानसभा चुनावों के लिये भाजपा जो ‘‘हिमाचल मांगे हिसाब’’ में भ्रष्टाचार के मामलों पर सरकार से हिसाब मांग रही है। क्या उसे आज प्रदेश की जनता के सामने सुखराम और अनिल शर्मा को लेकर अपना आचरण स्पष्ट करना होगा। क्योंकि इससे यह संदेश जा रहा है कि यदि आप भाजपा के सदस्य हैं तो आपका सारा भ्रष्टाचार जन सेवा है। यदि भाजपा से बाहर हैं और उसके विरोध हैं तो यही भ्रष्टाचार का आपका सबसे बड़ा अपराध होगा।

शिमला/शैल। पूर्व केन्द्रिय संचार मन्त्री पंडित सुखराम वीरभद्र मन्त्रीमण्डल में मन्त्री उनके बेटे अनिल शर्मा और प्रदेश कांग्रेस के सचिव उनके पौत्र आश्रय शर्मा ने कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया है। कांग्रेस छोड़ भाजपा में जाने का जो तर्क अनिल शर्मा ने दिया है उसके मुताबिक पिछले दिनों जब मण्डी में राहुल गांधी रैली के लिये आये थे उस समय सुखराम की उपेक्षा की गयी उन्हे रैली के लिये आमन्त्रित नहीं किया गया और यहां तक कहा गया कि यदि वह आये तो दूसरे लोग रैली छोड़ कर चले जायेंगे। इस उपेक्षा से आहत होकर परिवार पार्टी छोड़ रहा है। अनिल का यह आरोप कितना सही है यह तो वही जानते हैं और उनके अतिरिक्त इसकी जानकारी पार्टी अध्यक्ष सुक्खु तथा मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह को होगी। लेकिन प्रदेश और मण्डी की जनता के सामने अनिल के बेटे आश्रय शर्मा का वह पत्रकार सम्मेलन अवश्य है जो उन्होने इस रैली से कुछ ही दिन पहले आयोजित किया था। इस सम्मेलन में यह दावा किया गया था कि पार्टी हाईकमान ने उन्हे सिराज से चुनाव लड़ने का सिगनल दे दिया है और वह भाजपा के जयराम ठाकुर के विरूद्ध चुनाव लड़ेंगे और उनके दादा सुखराम इस चुनाव की कमान संभालेंगें। यदि आश्रय का पत्रकार सम्मेलन में किया गया यह दावा सही था तो फिर अब पार्टी छोड़ने का तर्क सही नही हो सकता क्योंकि इस दावे का पार्टी की ओर से कोई खण्डन नहीं किया गया था। यदि यह दावा गलत था तो इससे बड़ी अनुशासनहीनता और पार्टी को अपने खिलाफ कारवाई के लिये उकसाने के अतिरिक्त और कुछ नही हो सकता। इसलिये यही माना जायेगा कि पार्टी छोड़ने के लिये बहाने तलाश किये जा रहे थे। जबकि अनिल शर्मा भाजपा में जाने की चर्चा मीडिया में करीब छः माह से चल रही थी।
आज सुखराम का पूरा परिवार भाजपा में शामिल हो गया है। स्मरणीय है कि जब पंडित सुखराम को दूर संचार घोटाले में गिरफ्तार किया गया था उस दौरान प्रदेश विधानसभा के सदन के अन्दर जे पी नड्डा और किशन कपूर आदि भाजपा विधायकों ने इस स्कैम का नाट्यरूपान्तरण तक स्टेज कर दिया था गले में नोटों के हार डालकर सदन के अन्दर आ गये थे। सुखराम के दूर संचार घोटाले को भाजपा ने राष्ट्रीय स्तर पर भ्रष्टाचार का एक बडा मुद्दा बनाया था। सुखराम के खिलाफ सीबीआई ने तीन मामले दर्ज किये थे। हरियाणा की एक कंपनी एचटीएल को 30 करोड़ का ठेका देने के एवज में तीन लाख की रिश्वत लेने का आरोप लगा था। इस मामले में सुखराम के साथ इस कंपनी के चेयरमैन देवेन्द्र चौधरी भी सह अभियुक्त बने थे। चौधरी की मामले की जांच के दौरान ही मौत हो चुकी है। इस मामले में अदालत से सुखराम को पांच साल की सजा और चार लाख के जुर्माने की सजा हो चुकी है। दूसरा मामला हैदराबाद के रामा राव की कंपनी ।Advance Radio Masts को 1.66 करोड़ का सप्लाई आर्डर देने का है। इसमें सुखराम के साथ कंपनी के मालिक रामा राव और दूर संचार विभाग की निदेशक रूनू घोष भी सह अभियुक्त हैं। इस मामले में भी सजा हो चुकी है। तीसरा मामला घर में हुई छापमारी के दौरान मिली 4.25 करोड़ की नकदी को लेकर आय से अधिक संपत्ति का बना। सीबीआई ने 1993 में यह मामले दर्ज किये थे और 1998 में इनमे चार्जशीट फाईल हुई थी। नवम्बर 2011 में ट्रायल कोर्ट से फैसला आया था। जब यह फैसला आया था उस समय नितिन गडकरी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। 19.11.2011 को इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए गडकरी ने कहा था "The way in which the court has taken the time to punish the guilty is important. The judicial system needs changes otherwise people will loose faith " इसी मामले में सुखराम ने अदालत से यह कहा था कि "As such it is not a case where govt. has lost any money. The CBI allegation was that he took bribe but no financial loss has been caused to the govt. exchequer." कर चुका है। दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ सुखराम सर्वोच्च न्यायालय गये थे और यह गुहार लगायी थी कि बढ़ती उम्र के चलते उन्हें जेल न भेजा जाये। इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें पहले निचली अदालत में आत्मसमर्पण के लिये कहा था। इस पर सुखराम ऐंबुलैन्स में अदालत पहुंचे थे और कोमा में चले जाने तक की स्थिति अदालत में रखी थी। इस समय बढ़ती उम्र और बीमारी के कारण जमानत पर है। यह मामले अब अन्तिम फैसले के कगार पर पहुंचे हुए हैं और माना जा रहा है कि इन मामलों का भी परिवार पर दवाब चल रहा है।
सुखराम के अतिरिक्त अनिल शर्मा के खिलाफ भी भाजपा ने अपने आरोप पत्र में मण्डी के राजमहल प्रकरण में गंभीर आरोप लगाया हुआ है। यह आरोप पत्र भाजपा अध्यक्ष सतपाल सत्ती और नेता प्रतिपक्ष प्रेम कुमार धूमल के हस्ताक्षरों से राज्यपाल को सौंपा गया है। जिसमें यह आरोप है कि ‘‘जिला मण्डी कीे राजमहल जमीन बेनामी सौदे में विधायक/मन्त्री के बैंक खाते से लाखों रूपये श्री संजय कुमार के बैंक खातें में ट्रांसफर हुए। यूं बेनामी सौदा श्री खूब राम के नाम हुआ जिसका सूत्रधार संजय था।’’ आज इन विधानसभा चुनावों के लिये भाजपा जो ‘‘हिमाचल मांगे हिसाब’’ में भ्रष्टाचार के मामलों पर सरकार से हिसाब मांग रही है। क्या उसे आज प्रदेश की जनता के सामने सुखराम और अनिल शर्मा को लेकर अपना आचरण स्पष्ट करना होगा। क्योंकि इससे यह संदेश जा रहा है कि यदि आप भाजपा के सदस्य हैं तो आपका सारा भ्रष्टाचार जन सेवा है। यदि भाजपा से बाहर हैं और उसके विरोध हैं तो यही भ्रष्टाचार का आपका सबसे बड़ा अपराध होगा।