Friday, 16 January 2026
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बीस वर्षो में केवल 13 वर्गमीटर बढ़ा प्रदेश का वनक्षेत्र उच्च न्यायालय में आये हल्फनामें में हुआ खुलासा

वन संरक्षण अधिनियम 1980 की खुली अवहेलना
2183 सड़कों का हुआ निर्माण
मुख्यसचिव को 2 सप्ताह में शपथ पत्र दायर
करने के निर्देश
शिमला/शैल। प्रदेश उच्च न्यायालय कोटखाई के हलाला गांव के अनन्त राम नेगी के नाम से आये एक पत्र को जनहित याचिका करार देते हुए अदालत ने इस पर अतिरिक्त महाधिवक्ता को सरकार का पक्ष जानने और वन विभाग के प्रमुख को जबाबी शपथ पत्र दायर करने के निर्देश दिये। मुख्य न्यायधीश के नाम आये इस पत्र में आरोप लगाये गये थे कि कुछ लोगों ने अवैध पेड़ कटान करकेे वन भूमि पर अपने घरों के लिये सड़क निर्माण कर लिया है। हिमरी पंचायत में गांव थरमाला से बेरटु वाया गुथान बनायी गयी सड़क को लेकर विशेष आरोप था। अनन्त राम नेगी के पत्र के साथ ही अदालत के पास एक और पत्र आया और उसमें एक केशव राम डोगरा पर आरोप था कि उसनेे अपने बागीचे के लियेे पेड़ो का अवैध कटान करकेे सड़क बना ली है। इस पत्र में यहां तक आरोप था कि जिला शिमला में देवदार के 4000 पेड़ों का अवैध कटान करके 400 सड़कों का निर्माण किया गया है।
इन आरोपों की गंभीरता का संज्ञान लेते हुए अदालत ने प्रदेश के वन प्रमुख को शपथपत्र के साथ जवाब दायर करनेे के निर्देश दिये। वन प्रमुख ने अपने जवाब में इन आरोपों का खण्डन करते हुए अदालत को बताया कि वन संरक्षण अधिनियम 1980 के तहत वांच्छित अनुमति लेकर ही ऐसे निर्माण किये गये हैं। वन प्रमुख ने अपनेे शपथपत्र में यह भी खुलासा किया कि एक हैक्टेयर भूमि तक केे मामलों में वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत संबंधित डीएफओ सेे अनुमति ली गयी है । शपथपत्र में अदालत को यह भी बताया गया कि जनवरी 2016से 30.6.17 तक डीएफओ ठियोग ने 32 सड़को के निर्माण की अनुमति दी है और इसमें 16.1091 है वन क्षेत्र प्रभावित हुआ है। मुख्य न्यायधीश को आयेे पत्र में यह भी आरोप था कि प्रदेश का वन क्षेत्र कम होता जा रहा है। इस आरोप को नकारतेे हुए वन प्रमुख नेे अदालत को यह बताया कि 2015 के भारत सरकार के वन सर्वेक्षण के अनुसार प्रदेश के वनक्षेत्र में 13 वर्ग मीटर की बढ़ौत्तरी हुई है। While refuting the contention of the letter petitioner that forest cover in the State of Himachal Pradesh is decreasing, Principal Chief Conservator of Forests has stated in his affidavit that there is an increase of 13 sq metres of forest cover in the State of Himachal Pradesh as per Forest Survey of India report, 2015.  पत्र में हिमरी पंचायत के थरमाला-वेरटु वाया गुथान रोड़ को लेकर लगाये गये विशेष आरोप की जांच के निर्देश ठियोग और कोटखाई के रेंज अधिकारियों को दिये गये थे। इस जांच केे बाद अदालत को बताया गया कि संद्धर्भित 2 किलो मीटर सड़क का निर्माण पांच वर्ष पहले से ही हो चुका है और इस निर्माण को लेकर वन अधिनियम के तहत मामला भी दर्ज है। इसी के साथ अदालत को यह भी बताया गया कि थरमाला-वेरटु में 480 मीटर सड़क का निर्माण हुआ है। यह भी बताया गया कि केशव राम ने दस वर्ष पहले ही रास्ते को दो मीटर चैड़ा करकेे वाहन योग्य बना लिया था और इस पर 23.8.17 को मामला भी दर्ज कर लिया गया है। इस जांच में रेंज अधिकारी ने अनन्त राम नेगी का पक्ष जानने के लिये उनसे फोन पर संपर्क किया । इस संर्पक करने पर नेगी ने ऐसा कोई पत्र मुख्य न्यायधीश के नाम लिखने से इन्कार किया है।
भले ही अनन्त राम नेगी ने यह पत्र नही लिखा है लेकिन इस पत्र पर हुई कारवाई के माध्यम सेे जो जवाब अदालत में आया हैं उसमें इन आरोपों को सही पाया गया है। एक जगह पांच साल पहले सड़क बन गयी और दूसरी जगह दस साल पहले। लेकिन इन निर्माणों पर वन विभाग अब मामलें दर्ज कर रहा है। अदालत के सामने आयेे तथ्यों में यह भी आया है कि वनभूमि में अवैध तरीके से 2183 सड़कों का निर्माण हुआ है। As per own calculation of the Forest Department, approximately 2183 roads have been constructed in the State of Himachal Pradesh in violation of the Forest Conservation Act, which is a large number and can not be over looked. अदालत के पास वनभूमि पर हुए अतिक्रमणों और अवैध निर्माणों के मामले पहले से ही विचाराधीन चल रहे हैं। इसलिये इस याचिका को यहीं समाप्त करके अदालत ने सरकार से रिपोर्ट तलब की है कि वनभूमि पर बनी सड़कों कीे अनुमति के लियेे क्या कदम उठाये गये है इसकी विस्तृत जानकारी अदालत में रखी जाये।
इस जनहित याचिका में आरोप था कि वनक्षेत्र कम होता जा रहा है और इसके जवाब में वन प्रमुख ने 2015 की सर्वे रिपोर्टे के आधार पर दावा किया है कि 13 वर्ग मीटर वनक्षेत्र बढ़ा है। वनक्षेत्र की बढ़ौत्तरी के इस दावे पर यदि सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण में दर्ज आंकड़ों पर नज़र दौड़ाई जाये तो यह वस्तुस्थिति सामने आती है। 1996-97 की रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश का वनक्षेत्रा 36,986 वर्ग किलोमीटर था। उसके बाद 1997- 98 में यह बढ़कर 37,016 हो गया। इसके बाद 1998-99 में 37,033 हो गया और आज 2017 तक यह क्षेत्रा 37,033 ही चला आ रहा है। इसका अर्थ है कि पिछले बीस वर्षो में प्रदेश के वनक्षेत्र में कोई बढ़ौत्तरी नही हुई है। क्योंकि यह आंकड़े विधानसभा पटल पर रखे गये आर्थिक सर्वेक्षणों में दर्ज हैं। 13 वर्ग मीटर वनक्षेत्र बढ़ने का दावा वन प्रमुख उच्च न्यायालय को सौंपे शपथपत्र में कर रहें हैं। प्रदेश में प्रतिवर्ष वन महोत्सव के नाम पर पौधारोपण किया जाता है। पौधारोपण और वन संरक्षण पर हर साल करोड़ो रूपये खर्च किये जाते हैं। लेकिन इस खर्च के बाद जो परिणाम इस तरह से सामने है क्या उस पर सन्तोष व्यक्त किया जा सकता है? क्योंकि दोनो जगह रखे गये आंकड़े आपस में कोई मेल नही खाते हैं। बल्कि इन आंकड़ो को देखते हुए तो अदालत से ही गुहार लगानी पड़ेगी कि वह इस पर भी सरकार और विभाग से जवाब तलबे करे। क्योंकि इन कार्यक्रमों पर आम आदमी का पैसा खर्च हो रहा है।
सड़कों के हुए इस अवैध निर्माण का कड़ा संज्ञान लेते हुए उच्च न्यायालय ने मुख्य सचिव को निर्देश दिये हैं कि वह दो सप्ताह के भीतर शपथपत्र दायर करके यह बताएं कि कौन-कौन सी सड़क वन संरक्षण अधिनियम 1980 की अवहेलना करके बनी है और इनकी अनुमति लेने के लिये क्या कदम उठाये गये हैं।

Consequently, in view of discussion made herein above, present petition is disposed of with a direction to the Chief Secretary to the Government of Himachal Pradesh to file his personal affidavit, detailing therein number and names of roads constructed in the State of Himachal Pradesh, in violation of Forest Conservation Act. Chief Secretary may also indicate in his affidavit that what steps have been taken by the State for getting necessary permission from the Ministry of Environment and Forests, Government of India, for regularization of roads constructed in violation of Forest Conservation Act. Needful be done within a period of two weeks from today.

 

अवैधताओं पर आॅंखें बन्द रखने का परिणाम है एनजीटी का फैंसला

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश में टीपीसी एक्ट 1977 में शान्ता कुमार की सरकार के दौरान लागू हो गया था। मार्च 1979 में अन्तरिम डवैल्पमैन्ट प्लान भी अधिसूचित हो गयी थी। उसके बाद 1980 में सरकार बदल गयी और स्व. ठाकुर राम लाल मुख्यमन्त्री बन गये जो अप्रैल 1988 तक रहे। उसके बाद वीरभद्र ने सत्ता संभाली लेकिन फरवरी 1990 में फिर शान्ता के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी और यह सरकार दिसम्बर 1992 तक रही। 1993 में फिर वीरभद्र मुख्यमन्त्री बन गये। इसके बाद से लेकर अब तक धूमल और वीरभद्र में सत्ता केन्द्रित रही। लेकिन अब तक 1979 में जारी हुई अन्तरिम डवैल्पमैन्ट के स्थान पर कोई स्थायी प्लान नही लायी जा सकी है। बल्कि इस अन्तरिम प्लान में ही 18 बार संशोधन हो चुके और अवैध निर्माणों को नियमित करने के लिये 9 बार रिटैन्शन पाॅलिसियां लायी गयी हैं
प्रदेश के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में हर रोज़ कोई न कोई निर्माण कार्य चल ही रहा है। लेकिन इस निर्माण से शहरी क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं की आपूर्ति में अब लगातार कठिनाई आती जा रही है। प्रदेश के राजधानी नगर निगम शिमला में लोगों को 24 घन्टे नियमित रूप से पेयजल तक उपलब्ध नही हो पा रहा है। गारवेज हर शहर की प्रमुख समस्या बन चुकी है। आज विकास के नाम पर सड़क निर्माण से लेकर जलविद्युत परियोजनाओं और सीमेंट कारखानों के निमार्ण से हुए लाभ के साथ इससे पर्यावरण का सन्तुलन भी बुरी तरह बिगड़ गया है। आज पूरा प्रदेश प्राकृतिक आपदाओं के मुहाने पर आ खड़ा हुआ है। हर वर्ष लैण्ड स्लाईड फ्लैश फ्लडज़ बादल फटने और भूंकप आदि की घटनाओं में बढ़ौत्तरी हो रही है। इन घटनाओं से हर वर्ष सैंकड़ो करोड़ो के राजस्व का सरकारी और नीज़ि क्षेत्र में नुकसान हो रहा है। यह जान माल का नुकसान चिन्ता का कारण बनता जा रहा है। इस पर प्रदेश उच्च न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक चिन्ता व्यक्त कर चुके हैं। यह संकट कितना बड़ा और कितना भयावह हो सकता है इसको लेकर ही अब एनजीटी को इतना सख्त फैसला सुनाना पडा है।
एनजीटी के फैंसले से प्रदेश भर में हड़कंप की स्थिति पैदा हो गयी है। इस फैंसले से सबसे ज्यादा हड़कंप शिमला में मचा है। क्योंकि यहां पर ही सबसे जयादा अवैध निर्माण हुए हैं। इन्ही अवैध निर्माण को नियमित करने के लिये ही रिटैन्शन पाॅलिसियां लायी गयी हैं। लेकिन हर बार पाॅलिसी आने के बाद अवैध निर्माण रूके नही हैं बल्कि और बढ़े हैं क्योंकि यह धारणा बन गयी है कि वोट की राजनीति के चलते हर सत्तारूढ़ सरकार इन्हें नियमित करने के लिये पाॅलिसी लायेगी ही और ऐसा ही हुआ भी है। इसी के चलतेे आज नगर निगम शिमला में भाजपा और कांग्रेस एकजुट होकर एनजीटी के फैंसले का विरोध कर रहे हैं और इसे उच्च न्यायालय में चुनौती देने की बात कर रहें हैं। लेकिन इन लोगों की प्रतिक्रियाओं से यह भी स्पष्ट है कि इनमें से किसी ने भी इस पूरेे फैंसले को पढ़ा ही नही है और यदि पढ़ा है तो अपने राजनीतिक स्वार्थों के कारण इसे समझने का नैतिक साहस नही दिखा पा रहें हैं। कैग नेे भी शिमला के अवैध निर्माणों और उससे होने वाले नुकसान को लेकर परफारमैन्स आॅडिट किया है और उसके मुताबिक यह पाया है कि यदि हल्का सा भी भूकंप का झटका आता है तो उससे 83% भवनों को नुकसान पहुचेगा। एनजीटी ने इस आॅडिट रिपोर्ट का भी अपने फैसले में जिक्र किया है। यही नही एनजीटी ने इस समस्या के अध्ययन के लिये एक कमेटी का भी गठन किया था। इस कमेटी के पहले प्रधान सचिव आर.डी.धीमान अध्यक्ष थे। इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट एनजीटी को सौंपी थी लेकिन इस रिपोर्ट पर कमेटी के सारेे सदस्यों की एक राय नही थी। इस पर आर.डी.धीमान की जगह तरूण कपूर की अध्यक्षता में नयी कमेटीे बनी और कमेटी ने फिर नयेे सिरे सेे रिपोर्ट सौंपी और एनजीटी ने इस कमेटी की सिफारिशों को अपनेे फैंसलेे में पूरा अधिमान दिया है। एनजीटी का फैंसला सरकार के इन अधिकारियों की रिपोर्ट के बाद आया है। जब एनजीटी ने निर्माणों  पर अन्तरिम रोक लगायी थी उसके बाद राज्य सरकार केन्द्र सरकार के कई विभागों तथा प्राईवेट व्यक्तियों की याचिकाएं अदालत के पास आयी है। इन याचिकायाओं पर सबका पक्ष सुना गया है और तब जाकर एनजीटी नेे यह फैंसला दिया है।
अब जब इस फैंसले को चुनौती देने की बात हो रही है तब यह चुनौती देने के साथ ही सरकार को आम आदमी के सामने यह भी स्पष्ट करना होगा कि जब हम विकास के नाम पर अवैधताओं को राक ही नही सकते तो फिर उसे अपना टीसीपीएक्ट ही निरःस्त कर देना चाहिये।

कर्मचारी नेता विनोद का निलम्बन के बाद गुजारा भत्ता भी बन्द

शिमला/शैल। प्रदेश कर्मचारी परिसंघ के अध्यक्ष एवं बागवानी विभाग में अधीक्षक के पद पर कार्यरत विनोद कुमार को आर्थिक और मानसिक तौर पर प्रताडित करने का आरोप लगाते हुए कर्मचारी नेताओं ने कहा है कि पिछले तीन महीनों से अनुचित तरीके से परिसंघ अध्यक्ष की सेवाओं को निलंबित किए जाने और उन  के वेतन और गुजारा भत्ता रोके जाने वाली कार्रवाई  प्रदेश सरकार और उसके भ्रष्ट अधिकारियों की प्रशासनिक भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा है। परिसंघ नेताओं संजय मोगू, कैलाश चौहान, एस.एस. टैगोर ने जारी ब्यान में कहा है कि वर्तमान सरकार में भ्रष्टाचारियों का संरक्षण और भ्रष्टाचार के विरूद्ध आवाज उठाने वालों को इस तरह से प्रताड़ित किया जाना वर्तमान सरकार की राजनीतिक और प्रशासनिक असफलता का खुला सबूत है। जहां वित्तीय अनियमितताओं में संलिप्त भ्रष्ट कृत्य करने वाले नियमानुसार दण्डित होने चाहिए वहां इसके विरूद्ध आवाज उठाने वाले अनुचित और गैर-कानूनी तरीके से अपमानित और प्रताड़ित किए जा रहे हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि वर्तमान कांग्रेस सरकार ने परिसंघ अध्यक्ष को तबादलों और निलंबन जैसी कार्रवाईयों से प्रताड़ित किया वहीं सरकार ने अब उनके वेतन और गुजारा भत्ता भी बन्द कर दिया है ।
परिसंघ नेताओं ने विभाग के अधिकारियों पर मै. चेल्सी फूडस, प्लाॅट न.46, इन्डस्ट्रीयल एरिया, संसारपुर कांगड़ा से 5.00 लाख की घूस लेने का आरोप लगाते हुए कहा है कि विभाग के अधिकारियों ने इस कम्पनी को नवम्बर 2015 में पहले 1,94,00,000/- रूपये की अनुदान राशि की जगह 1,99,00,000/- की राशि जारी की, उसमें से 5.00 लाख रू. बडे़ अधिकारियों ने वापिस अपनी जेबों मे डाले। दूसरा घोटाला इन अधिकारियों के कार्यकाल में 41.00 लाख रू. का हुआ जिसमें बागवानी मन्त्राी और प्रधान सचिव (उद्यान) ने अधिकारियों को बचाया तथा यह 41.00 लाख रू. का पूरा घोटाला एक छोटे कर्मचारी के सिर पर डाल दिया । यह दोनों मामलें परिसंघ अध्यक्ष ने बतौर अपनी सरकारी सेवा में शाखा अधीक्षक के समय उजागर करवायें हैं। इसके अतिरिक्त परिसंघ अध्यक्ष की सेवाओं को निलम्बन करने के बाद उन पर विभाग द्वारा तय आरोपों में वर्ष 2016 में एक कम्पनी को अनुदान राशि जारी करने की एवज़ में 2.00 करोड़ रू. कम्पनी से डील का जिक्र किया है जबकि एक कम्पनी को 14.00 करोड़ की सबसिडी जारी करने के एवज़ में 2.00 करोड़ की डील का मामला तत्कालिन निदेशक उद्यान विभाग वर्तमान निदेशक जो उस समय एम.आई.डी.एच के परियोजना निदेशक एवं कार्यकारी निदेशक  और प्रधान सचिव इन तीनों के बीच लेन-देन के बंटवारे का विवाद है, जिसकी सी.बी.आई. जांच होनी चाहिए। चूंकि यह मामला पूर्व में प्रदेश मीडिया की सुर्खियों में रहा है और परिसंघ इन अधिकारियों की सूची सहित इन सभी मामलों को आने वाली सरकार के समक्ष रखेगा। परिसंघ के नेताओं ने कहा है कि भ्रष्टाचार के इन मामलों पर पर्दा डालने के लिए और लोगों का ध्यान इन मुद्दों से हटाने के लिए वर्तमान भ्रष्ट तन्त्र ने परिसंघ अध्यक्ष के वेतन और गुजारा भत्तों को भी रोक दिया है, जिसके विरोध में आचार-संहिता उठने के बाद प्रदेश के कर्मचारी नेता बागवानी निदेशक और प्रधान सचिव (उद्यान) का घेराव किया जायेगा।
वैसे कानून के मुताबिक निलम्बन की सूरत में गुजारा भत्ता संबधित कर्मचारी/अधिकारी को दिया जाना उसका अधिकार है। उद्यान विभाग द्वारा कर्मचारी नेता विनोद कुमार का गुजारा भत्ता भी बन्द कर दिया जाना यह प्रमाणित करता है कि इस कर्मचारी द्वारा लगाये जा रहेआरोपों में कहीं कोई गंभीरता अवश्य है क्योंकि गुजारा भत्ता बन्द करना कानूनन अपराध है।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बावजूद डिस्ट्रिक जज धर्मशाला अब तक नही कर पाये मकलोड़गंज बस अड्डा प्रकरण की जांच

शिमला/शैल। इस बस अड्डा प्रकरण की जांच सर्वोच्च न्यायालय ने 16.5.2016 को जज धर्मशाला को सौंपी थी। सर्वोच्च न्यायालय ने यह जांच चार माह में पूरी करके रिपोर्ट सौपने के निर्देश दिय थे। सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार के परिवहन विभाग को भी निर्देश दिये थे कि वह इस प्रकरण से जुड़ा सारा रिकार्ड जज को तुरन्त प्रभाव से सौंपे और इस जांच में पूरा सहयोग करे। इन निर्देशों का पालन करते हुए जज को सारा रिकार्ड तुरन्त सौंप दिया गया था। लेकिन सूत्रों के मुताबिक जिला जज धर्मशाला अब तक इस प्रकरण की जांच पूरीे करके सर्वोच्च न्यायालय को अपनी रिपोर्ट नही सौंप पाये है। ऐसे में यह चर्चा उठना स्वभाविक ही है कि जब न्यायिक अधिकारी ही सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की अनुपालना न कर पाये तो फिर अन्य प्रशासन से क्या उम्मीद की जा सकती है। यह चर्चा एनजीटी द्वारा अभी हाल ही में प्रदेश भर में हुए अवैध निमार्णो के कारण पर्यावरण को पहुंचे नुकसान के संद्धर्भ में दिये गये फैसले से उठी है।
स्मरणीय है कि धर्मशाला के मकलोड़गंज में 2004 से बीओटी के तहत बन रहे बस स्टैण्ड और चार मंजिला होटल तथा शापिंग काम्लैक्स के निर्माण पर फिर अनिश्चितता की तलवार लटक गयी है। स्मरणीय है कि यह निर्माण वनभूमि पर हो रहा है जिसके लिये वन एवम् पर्यावरण अधिनियम के तहत वांच्छित अनुमतियां न लिये जाने के लिये सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित सीईसी के समक्ष एक अतुल भारद्वाज ने शिकायत डाली थी। इस शिकायत की जांच करके सीईसी ने अपनी रिपोर्ट 18 सितम्बर 2008 को सर्वोच्च न्यायालय में रखी थी। इस रिपोर्ट में पूरे निर्माण पर कानूनी प्रावधानों की गंभीर उल्लंघना के आरोप लगाते हुए सारै संवद्ध प्रशासनिक तन्त्र इसमें मिली भगत पायी गयी थी। इसमें प्रदेश सरकार पर एक करोड़ रूपये का जुर्माना भी लगाया गया था। सरकार के साथ ही निर्माण कार्य कर रही कंपनी मै. प्रंशाति सूर्य को ब्लैक लिस्ट करने और जुर्माना लगाने की संस्तुति की गयी थी।
सीईसी की इस रिपोर्ट को मै. प्रशांति सूर्य ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जिस पर मई 2016 में शीर्ष अदालत ने फैसला दिया। इस फैसले में मै. प्रशांति सूर्य को पर्यावरण संरक्षण के एनजीटी अधिनियम की धारा 15 और 17 के तहत 15 लाख का जुर्माना लगाया गया। यह जुर्माना प्रदेश के प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड में जमा करवाना होगा। इसी के साथ प्रदेश सरकार और पर्यटन विभाग तथा बस अड्डा प्रबन्धन एवम् विकास अथाॅरिटी पर भी दस लाख का जुर्माना लगाया गया। हिमाचल सरकार पर पांच लाख और पर्यटन विभाग पर भी पांच लाख का अलग से जुर्माना लगा है। इसमें बन रहे होटल और रेस्तरां को भी दो सप्ताह के भीतर गिराये जाने के निर्देश दिये गये हैं। इसी के साथ प्रदेश के मुख्य सचिव को इस पूरे प्रकरण की जांच करके बस अड्डा प्राधिकरण के संबधित अधिकारियों की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय करते हुए उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कारवाई करने के निर्देश सर्वोच्च न्यायालय ने पारित किये हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले की बस अड्डा प्राधिकरण ने फिर अपील के माध्यम से चुनौति दी। इस अपील की सनुवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने इस संद्धर्भ में जो जांच प्रदेश के मुख्य सचिव को करने की जिम्मेदारी दी थी अब जांच जिला कांगड़ा के सत्र न्यायधीश को करने की जिम्मेदारी दी है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा है कि We accordingly modify our order dated 16.05.2016 and direct the District Judge to hold an inquiry into the conduct of all officers      responsible for the           construction of the    bus stand / hotel /accompanying complex and to submit a   report to this Court as to        the circumstances in which the alleged construction was erected and the role played by the officers associated with the same. The District Judge may appoint a       suitable presenting officer to assist him      in the matter. We further direct that        the Government of Himachal Pradesh and the petitioner authority shall render all such assistance as may be required by the District Judge in connection with the inquiry and produce all such record and furnish all such information as may be requisitioned by him. Needless to say that the District Judge shall be free to take      the assistance of or summon any official from the Government or outside for recording his / her statement if considered necessary for completion of the inquiry. The District Judge is also given liberty to seek                  any clarification or    direction considered        necessary in the matter. He shall make every endeavour to expedite the completion of the inquiry and as far as possible send his report  before this Court within a period of four months from the date a copy of this     order is received by him. 

सैशन जज धर्मशाला ने इस जांच के संद्धर्भ में अभी तक अपनी रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायालय को नहीं सौंपी है। माना जा रहा है कि इस प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय और सीईसी ने जिस विस्तार से इस मामले में हुई धांधलीयों को उजागर करते हुए सभी संवद्ध पक्षों को कड़ी फटकार और जुर्माना लगाया है उसे देखते हुए इसमें संलिप्त रहे सारे अधिकारियोें की व्यक्तिगत जिम्मेदारीयां तय होना निश्चित माना जा रहा है। क्योंकि इसमें हुई अनियमितताओं का संज्ञान तो शीर्ष अदालत पहले ही ले चुकी है। अब इसमें केवल यह तय होना ही शेष है कि किस अधिकारी के स्तर पर क्या कोताही हुई है।

प्रदेश सरकार 38 वर्षों में नही बना पायी स्थायी Development Plan

1979 में जारी हुई थी अन्तरिम प्लान
अन्तरिम प्लान में हो चुके हैं 18 संशोधन
 प्रदेश का 97.42% क्षेत्र है लैण्ड स्लाईड के
दायरे में
अवैध निमार्णों को नियमित करने के 5143
आवेदन हैं सरकार के पास लंबित
नौ बार आ चुकी हैं रिटैन्शन पालिसियां


शिमला/शैल। भारत सरकार की एक रिपोर्ट के मुताबिक हिमाचल प्रदेश का 97.42% भौगोलिक क्षेत्र लैण्डस्लाइड के जोन में है। प्रदेश के राजस्व विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में flash floods, Cloud burst  और land slides से 2016 के मानसून में 863.97 करोड़ का नुकसान हो चुका है। इनमें 40 लोगों की जान का और 2283 करोड़ का स्ट्रक्चरल नुकसान हो चुका है। 2017 में किन्नौर में भूस्खलन के 5, प्लैश फ्लड और बादल फटने के तीन, चटट्टाने गिरने के तीन हादसे हो चुके हैं। जिनमें 5 लोगों की मौत हुई है। 31 अगस्त 2017 तक मण्डी में लैण्ड स्लाईड के 48 मामले घट चुके हैं। शिमला में लैण्ड स्लाईड के 4 भवन गिरने के 2, बादल फटने के 2 और भूकंप का 1 मामला घटा है। कुल्लु में लैण्ड स्लाईड के 5 भूकम्प का 1 और प्लैश फ्लड के 34 हादसे हुए हैं। बिलासपुर में लैण्ड स्लाईड के 4 और फ्लैश फ्लड का 1 मामला घटा है। सोलन के बद्दी नालागढ़ और कण्डाघाट में 2016 और 2017 में लैण्ड स्लाईड के 31 हादसे हो चुके हैं। सरकार के अपने इन आंकड़ो से अनुमान लगाया जा सकता है कि आने वाले समय में यह आपदा कितनी भयानक हो सकती है। मण्डी के कोटरूपी हादसे में 50 लोगों की तो जान ही जा चुकी है। इस परिदृश्य में यह चिन्ता और चिन्तन का एक गंभीर मामला बनकर सामने हैं। लेकिन क्या शासन और प्रशासन इस बारे में ईमानदारी से गंभीर है? यह सवाल एनजीटी द्वारा 16 नवम्बर को दिये फैंसले के बाद हरेक जुबान पर है। बल्कि इस फैंसले का विरोध करने के लिये शिमला में करीब 100 भवन मालिकों ने एक बैठक करके एक जन कल्याण समिति का गठन तक कर लिया है और एक बड़ा आन्दोलन इस फैसले के खिलाफ खड़ा करने की घोषणा की है।
ऐसे में यह सवाल उठता है कि आखिर एनजीटी को ऐसा फैैसला सुनाने की नौबत क्यों आई? सरकार की ओर से इस संद्धर्भ में कहां और क्या-क्या चूक हुई है। स्मरणीय है कि हिमाचल प्रदेश में नगर एवम् ग्राम नियोजन अधिनियम 1977 में पारित हो गया था और इस एक्ट की अनुपालना सुनिश्चित करने के लिये टीसीपी विभाग की स्थापना कर दी गयी थी। निदेशक टीसीपी को इस एक्ट के तहत न्याययिक शक्तियां तक हासिल है। इस एक्ट का उद्देश्य पूरे प्रदेश के शहरी ग्रामीण क्षेत्रों का सुनियोजित विकास सुनिश्चित करना था। इसके लिये एक स्थायी योजना लाई जानी थी। लेकिन विभाग मार्च 1979 में केवल एक अन्तरिम प्लान ही जारी कर पाया। अब तक 18 संशोधन लाये जा चुके हैं  The Development Plan is a document, which can transform the future of a city by impacting its development positively in the years to come depending upon the infrastructural resources existing or which could be augmented. Unfortunately, this did not happen in case of Shimla. This city, famously known as the ‘queen of hills’ has been surviving on the crutches of Interim Development Plan since 1979. As many as 18 amendments in interim development plan of 1979 have been carried out which shows adhocism, anarchy and arbitrariness in functioning and decision  making. Therefore, all        successive governments have faulted in their duty of beholding of public trust for short-term gains.  जबकि एक्ट की धारा  16 (c) One more aspect which warrants attention is the provision of Section 16(c) of the HP Town and Country Planning Act, 1977. The provisions of this section impose restriction on the change use of land or on carrying out of any development except for agriculture purposes.  Sub-section  ‘c’ of Section 16 imposes a restriction on registration of any deed or document of transfer of any sub-division of land by way of sale or otherwise, unless the sub-division of land is duly approved by the Director, subject to the rules framed. 

 यदि इस प्रावधान की अनुपालना सुनिश्चित की गयी होती तोे जिस तरह के निर्माण संजौली मे खड़े हो गये हैं वह खड़े न हो पाते। यही नही टीसीपी के प्रावधानों की अनुपालना सुनिश्चित करने की बजाये सरकार अवैधताओं को नियमित करने के लिये रिटैन्शन पाॅलिसियां लाती चली गयी और अब तक नौ पाॅलिसियां आ चुकी हैं। बल्कि 2016 में एक अध्यादेश लाकर 1977 के अधिनियम की मूल भावना को ही कमजोर करने का प्रयास किया गया और इस अध्यादेश को तो राज्यपाल की स्वीकृति भी मिल गयी थी। जबकि 11 अगस्त 2000 को सरकार ने एक अधिसूचना जारी करके यह कहा है कि That all private as well as government construction are totally  banned within the core area of Shimla planned area permitting only construction on old lines with prior approval of the state Govt. लेकिन इस अधिसूचना के बाद 22 अगस्त 2002, 5 जून 2003, 28 नवम्बर 2011, 13 अगस्त 2015 और 28 जून 2016 को अलग-अलग अधिसूचनाएं जारी करके पूरे एक्ट को ही एक तरह से पंगू बना दिया है। सरकारी नीतियों की इसी अस्थिरता को अन्ततः 2014 में एनजीटी में चुनौती दी गयी । एनजीटी में याचिका आनेे पर जब अदालत ने इस पर सरकार और उसके संवद्ध अदारों से जवाब तलब किया तब यह सामने आया कि शिमला में 5143 लोगों ने अपने निमार्णो को नियमित किये जाने के लिये आवदेन कर रखा है। इनमें 3342 निमार्णों में तो स्वीकृत प्लान से कुछ हटकर निर्माण किये जाने को नियमित किये जाने के लिये आवेदन किया गया है। लेकिन 180 निमार्ण तो पूरी तरह अवैध हैं जिनमें पहले कोई प्लान स्वीकृति के लिये सौंपा ही नही गया है। बल्कि यह आंकड़ा भी लोगों के अपने आवदेनों पर आधारित है। लेकिन संवद्ध विभागों को अपने तौर पर अवैध निर्माणो की कोई जानकारी ही नही है क्योंकि इन विभागों ने ऐसी कोई स्टडी ही नही करवा रखी है। इस परिदृश्य में यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया है कि सरकारों ने अपने राजनीतिक स्वार्थों के चलते पर्यावरण और कालान्तर में आम आदमी को होने वाले नुकसान की ओर कभी कोई ध्यान नही दिया है। ऐसे में क्या सरकार एनजीटी के इस आदेश को उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने का साहस जुटा पायेगी?

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