Saturday, 25 April 2026
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अब आसान नही होगा आऊटसोर्स कर्मचारियों को निकालना

शिमला/शैल। प्रदेश के प्रशासनिक ट्रिब्यूलन नगर पंचायती राज विभाग में 2014 में आऊटसोर्स के माध्यम से रखे गये कर्मचारी ओबेस खान की याचिका पर फैसला देते हुए यह व्यवस्था थी कि ऐसे कर्मचारी को नौकरी से तब तक नही निकाला जा सकता जब तक कि जिस स्कीम के तहत उसे रखा गया हो वह स्कीम जारी रहे और उसके लिये धन उपलब्ध होता रहे। ओबेस खान को पंचायती राज विभाग में केन्द्र प्रायोजित स्कीम आरपीजीएसए के तहत 2014 में सलाहकार रखा गया था। लेकिन 2015 में उसे निकाल दिया गया। जबकि इसी योजना के तहत एक अधीक्षक ग्रेड-II श्रीमती विपाशा भोटा की सेवाओं को जारी रखा गया। ओबेस खान ने अपने निष्कासन को ट्रिब्यूनल में चुनौती दी और आरटीआई के माध्यम से श्रीमति विपाशा भोटा को दिये गये वेतन आदि की जानकारी हासिल की। आरटीआई में मिली सूचना में यह सामने आया कि उसे इसी योजना से 2014-15 और 2015-16 का वेतन दिया गया है और यह योजना अब तक जारी है तथा केन्द्र से इसके लिये धन मिलना जारी है।
इस जानकारी से जब यह स्पष्ट हो गया कि योजना भी जारी है धन भी मिल रहा है तथा अन्य कर्मचारी भी इसके तहत काम कर रहे हैं तब बिना किसी ठोस कारण के एक कर्मचारी को निकाल देना सीधे-अन्याय है। ट्रिब्यूनल ने इस जानकारी का कड़ा संज्ञान लेते हुए ओबेस खान को न केवल नौकरी में बहाल किया बल्कि जिस दिन से उसे निकाला गया तब से अब तक का वेतन देने के भी आदेश दिये हैं। ओबेस खान की याचिका में मुख्य सचिव, प्रधान सचिव पंचायती राज एवम् ग्रामीण विकास निदेशक पंचायती राज तथा भारत सरकार के पंचायती राज मन्त्रालय को प्रतिवादी बनाया गया था। यह याचिका 2015 में दायर हुई थी और इस पर 27.02.2018 को फैसला आया है। इस दौरान प्रदेश में आऊटसोर्स पर रखे गये करीब 30,000 कर्मचारी अपने नियमितकरण और उनके लिये एक पाॅलिसी लाये जाने के लिये संघर्ष करते रहे हैं। विधानसभा सदन तक भी यह मामला पहुंचा है। सरकार ने इसमें कुछ नये दिशा निर्देश भी 2017 में जारी किये हंै। आऊटसोर्स कर्मचारियों को नियमित करना वर्तमान नियमों/कानूनो के तहत संभव नही लेकिन अब इस फैसले के बाद उन्हें आसानी से नौकरी से निकालना संभव नही होगा।
इस समय राज्य सरकार से लेकर केन्द्र सरकार तक ने हजा़रों कर्मचारी आऊटसोर्स के माध्यम से रखे हुए हैं। आऊटसोर्स के तहत रखे गये कर्मचारी मूलतः सीधे सरकार द्वारा नही रखे जाते हैं। बल्कि किसी कंपनी या ठेकेदार को कोई सेवा या योजना निष्पादन के लिये ठेके पर दे दी जाती है जिसके लिये वह अपनी ईच्छा से कर्मचारियों की भर्ती करता है। सरकार की तरह इसके लिये वह किसी चयन प्रक्रिया की औपचारिकता नही निभाता है। इस कारण से ऐसे कर्मचारियों को कभी भी नौकरी से निकाल दिये जाने का भय बना रहता था जो इस फैसले से समाप्त हो जाता है। आने वाले समय में इस फैसले के कई दूरगामी परिणाम और प्रभाव सामने आयेंगे।

अदालत से सरकार तक भ्रष्टाचार के खिलाफ सबकी गंभीरता सवालों में

प्रदेश के माननीयों के खिलाफ खडे़ हैं 84 आपराधिक मामले
शिमला/शैल। संसद से लेकर राज्यों की विधान सभाओं तक करीब राज्यों में आपराधिक छवि के लोग माननीय बनकर बैठे हैं जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार से लेकर गंभीर अपराधों के मामले दर्ज हैं। संसद और विधान सभाओं को ऐसे लोगों से मुक्त करवाने के लिये कोई बार दावे और वायदे किये गये हैं। सर्वोच्च न्यायालय तक ने इस पर चिन्ता व्यक्त की है। ऐसे मामलों को प्राथमिकता के आधार पर दैनिक सुनवाई करके एक वर्ष के भीतर निपटाने के निर्देश सर्वोच्च न्यायालय अधीनस्थ अदालतों को दे चुका है। यहां तक निर्देश रहे हैं कि यदि कोई अदालत एक वर्ष के भीतर मामले को नही निपटा पाती है तो उसे संवद्ध उच्च न्यायालय को उसके कारण बताकर सुनावई के लिये समय की बढ़ौत्तरी की अनुमति लेनी होगी।
2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान नरेन्द्र मोदी ने भी संसद को अपराधियों से मुक्त करवाने का वायदा किया था। सरकार बनने के बाद इसे लोकसभा के सदन में दोहराया भी था। लेकिन इस दिशा में कोई कदम नही उठाये क्योंकि भाजपा ने ही सबसे ज्यादा टिकट आपराधिक छवि के लोगों को दिये थे। सर्वोच्च न्यायालय ने आपराधिक मामले झेल रहे माननीयों के मामलों को एक वर्ष के भीतर निपटाने और आवश्यक होने पर इसके लिये विशेष अदालतें गठित करने के निर्देश 2017 में दिये थे। इन निर्देशों के अनुसार ऐसी विषेश अदालतों का गठन मार्च 2018 के शुरू होने तक हो जाना था। दिल्ली आदि कई राज्यों में प्रथम मार्च 2018 से ऐसी विशेष अदालतों ने अपना काम भी शुरू कर दिया है।
लेकिन हिमाचल में अभी तक अदालतों के गठन के लिये न तो उच्च न्यायालय ने कोई सक्रियता दिखाई हैऔर न ही सरकार ने। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की अनुपालना में सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को माननीयों के खिलाफ खड़े मामलों की जानकारी उपलबध करवाई है। इस जानकारी के मुताबिक प्रदेश के माननीयों के खिलाफ कुल 84 मामले खड़े हैं। इस जानकारी में इन मामलों को 2014 से पहले के और 2014 से बाद के दो भागों में बांटा गया है। इसके अनुसार 2014 से पहले के 20 मामलें लंबित हैं और 2014 से बाद के 64 मामलें खड़े हैं। गृह विभाग ने कई मामलों को राजनीति से भी प्रेरित करार दिया है। प्रदेश का गृह विभाग 84 मामलों को निपटाने के लिये विशेष अदालत गठित किये जाने का पक्षधर नही है। लेकिन गृह विभाग द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को भेजी गयी जानकारी के मुताबिक 20 मामले ऐसे हैं जो 2014 से पहले के चले आ रहे हैं। यदि यह मामले अपने में गंभीर नही होते या सिर्फ राजनीति से ही प्रेरित होते तो यह अब तक खत्म हो गये होते। लेकिन ऐसा हुआ नही है। जिसका अर्थ है कि यह मामले गंभीर प्रकृति के हैं। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि यह मामले दर्ज होने के बाद से अब तक कम से कम दो चुनाव तो प्रदेश में हो ही गये हैं। पहला 2014 का लोकसभा और 2017 का विधानसभा। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि 20 मामले झेल रहे माननीय आज भी सदन में मौजूद हैं। क्योंकि यह जानकारी हारे हुए लोगों के बारे में तो सर्वोच्च न्यायालय को नही भेजी जानी थी। इससे यह भी अनुमान लगाया जा सकता है कि यदि आज सभी लंबित 84 मामलों में यदि वास्तव में ही एक वर्ष के भीतर फैसला हो जाता है और इनमें से कुछ एक को सजा़ भी हो जाती है तो प्रदेश की राजनीति का सारा संद्धर्भ ही बदल जायेगा। यदि सभी 84 मामलों का निपटारा सही में ही एक वर्ष के भीतर हो जाता है प्रदेश की राजनीति का तो पूरा ढांचा ही बदल जायेगा। क्योंकि इन माननीयों में वीरभद्र, धूमल,अनुराग ठाकुर, विरेन्द्र कश्यप, राजीव बिन्दल, किश्न कपूर, रमेश धवाला, आशा कुमारी, विनय कुमार जैसे कई महत्वपूर्ण नाम शामिल हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश माननीयों के मामलों का निपटारा एक वर्ष के भीतर हर हालत में करने का है। विशेष अदालत का गठन तो आवश्यकता पर निर्भर करता है। इसमें तो पहली मार्च तक इनके मामलों के निपटारे के लिये अदालत चिन्हित हो जानी चाहिये थी लेकिन सर्वोच्च न्यायालय को सूचना भेजकर क्या इसमें और समय निकालने का रास्ता नही निकाला गया है। क्या इससे अदालत और सरकार दोनों की ही गंभीरता पर सवाल नही उठ जाते हैं

ममता गोयल प्रकरण से नगर निगम शिमला की कार्य प्रणाली सवालों में

 

शिमला/शैल। नगर निगम शिमला ने 1997 में रोज़गार कार्यालय के माध्यम से कंप्यूटर सहायक का पद भरा था। रोज़गार कार्यालय ने इसके लिये नगर निगम को बीस नामों की सूची भेजी थी। जिसमें से ममता गोयल का चयन इस पद के लिये हो गया बाद में CWP(T) No. 4704 of 2008 के माध्यम से एक सीमा विष्ट ने इस नियुक्ति को इस आधार पर उच्च न्यायालय में चुनौतीे दे दी कि अकेले रोज़गार कार्यालय के माध्यम से ही नाम मंगवाकर यह चयन नही किया जा सकता। इस याचिका पर 31-8-2010 को फैसला आया। इस फैसले में इस चयन को अवैध करार देते हुए नियुक्ति को रद्द कर दिया गया। उच्च न्यायालय की एकल पीठ के फैसले को ममता गोयल ने डबल बैंच में चुनौती दे दी। यह एलपीए न0 177 of 2010 उच्च न्यायालय में कार्यवाहक मुख्यन्यायधीश जस्टिस संजय करोल और जस्टिस संदीप शर्मा की पीठ में सुनवाई के लिये आयी और इस पर 8-11-2017 को फैसला आ गया। इस फैसले में एकल पीठ के फैसले को पलटते हुए डबल बैंच ने ममता गोयल के चयन को सही करार दे दिया। 

इस तरह ममता गोयल को उच्च न्यायालय से राहत तो मिल गयी। लेकिन इसी मामलें में सीमा विष्ट ने 23-9-2010 को नगर निगम में एक आरटीआई डालकर ममता गोयल के चयन से जुड़े सारे दस्तावेज़ मांग लिये। सीमा विष्ट की इस आरटीआई के तहत जो दस्तावेजी सूचना आयी है उसमें निगम ने ममता गोयल के तीन सर्टीफिकेट संलग्न किये हैं। इनमें एक एम ए इतिहास (Fourth Semester) का रज़ल्ट कार्ड है। इसमें ममता रानी पुत्री जसवन्त राय नेगी के नाम से यह प्रमाणपत्र जारी हुआ है। एम.ए. 1989 में की गयी है। इसके बाद 1992 में कृष्णा कंप्यूटरज़ से सर्टीफिकेट कोर्स किया गया। इसमें भी नाम ममता रानी पुत्री जसवन्त राय दर्ज है। 1995 में हिमाचल कंप्यूटर सैन्टर से डिप्लोमा कोर्स किया गया। इसमें नाम ममता गोयल पुत्री बिहारी लाल गोयल दर्ज है। इस तरह आरटीआई में आये तीनों प्रमाण पत्रों में से दो में नाम ममता रानी पुत्री जसवन्त राय दर्ज है एक में ममता गोयल पुत्री बिहारी लाल गोयल दर्ज है।
नगर निगम ने यह सारा रिकार्ड सीमा विष्ट की आरटीआई में ममता गोयल के संद्धर्भ में उसे उपलब्ध करवाया है। इस रिकार्ड से यह सवाल उठना स्वभाविक है कि ममता रानी पुत्री जसवन्त राय और ममता गोयल पुत्री बिहारी लाल गोयल एक ही व्यक्ति नही हो सकता। लेकिन निगम में नौकरी एक ही ममता कर रही है। 2008 से 2017 तक यह मामला प्रदेश उच्च न्यायालय में रहा है। वहां पर याचिका का संद्धर्भ मात्र इतना था कि अकेले रोज़गार कार्यालय से ही नाम मंगवाकर चयन क्रिया पूरी की जा सकती है या नही। उसको लेकर फैसला आ गया है। लेकिन आरटीआई में नगर निगम ने जा दस्तावेज उपलब्ध करवाये हैं उनसे स्पष्ट प्रमाणित होता है कि ममता पुत्री जसवन्त राय और ममता पुत्री बिहारी लाल गोयल दो अलग-अगल प्राणी हैं। यहां पर यह भी सवाल खड़ा होता है कि यह रिकार्ड तो शुरू से ही निगम के पास उपलब्ध था। फिर 2008 से यह मामला उच्च न्यायालय में भी पंहुच गया था। फाईनल फैसला अब नवम्बर 2017 में आया है। जिसका सीधा सा अर्थ है कि यह फाईल समय-समय पर निगम प्रशासन के संज्ञान में रही है। फिर भी रिकार्ड में छिपे इतने बडे़ विरोधाभास पर किसी की नज़र क्यों नही गयी और इसे उच्च न्यायालय के संज्ञान में क्यों नही लाया गया। इस प्रकरण से नगर निगम की कार्यप्रणालीे पर कई गंभीर सवाले खड़े हो जाते हैं।
































































































 



 




11000 करोड़ के कर्ज से ही पूरा हो पायेगा 41440 करोड़ का खर्च

शिमला/शैल। मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर ने अपना पहला बजट भाषण सदन में पढ़ते हुए यह खुलासा सामने रखा कि वीरभद्र के इस शासनकाल में 18787 करोड़ का अतिरिक्त कर्ज लिया गया जो कि किसी भी पूर्व सरकार के शासनकालों से अधिकत्तम है। जयराम ने यह भी आरोप लगाया कि प्रदेश वित्तिय प्रबन्धन बुरी तरह कुप्रबन्धन में बदल चुका है। मुख्यमन्त्री ने सदन मे आंकड़े रखते हुए कहा कि 2007 में भाजपा सरकार ने जब सत्ता संभाली थी तब प्रदेश का कर्ज 19977 करोड़ था। जो कि 31 दिसम्बर 2012 को पद छोड़ते समय 27598 करोड़ था। परन्तु अब 18 दिसम्बर 2017 को यह कर्ज बढ़कर 46385 करोड़ हो गया है। वीरभद्र सरकार ने 2013 से 2017 के बीच 18787 करोड़ का अतिरिक्त ऋण लिया है। जयराम ने कर्ज की जो तस्वीर सदन में रखी है वह निश्चित तौर पर एक चिन्ता जनक स्थिति है और यह सोचने पर विवश करती है कि कर्ज लेकर विकास कब तक किया जाये और क्या सरकारें सही में विकास कर रही हैं या छोटे-छोटे वर्ग बनाकर तुष्टिकरण की नीति पर चल रही है। क्योंकि तुष्टिकरण और विकास में दिन और रात जैसा अन्तर होता है। 

जयराम को जिस तरह की वित्तिय विरासत मिली है उसको सामने रखकर यह स्वभाविक सवाल उठता है कि क्या जयराम इस स्थिति से अपने बजट से बाहर निकल पाये हैं या नही। इसके लिये बजट को समझना होगा। इस सरकार ने 41440 करोड़ के कुल खर्च का बजट पेश किया है। इसमें 11263 करोड़ वेतन, 5893 करोड़ पैशन, 4260 करोड़ ब्याज, 3184 करोड़ ऋणों की वापसी पर, 448 करोड़ अन्य ट्टणों पर और 2741 करोड़ रख -रखाव पर खर्च होंगे। इस तरह 41440 करोड़ में से 27789 करोड़ इन अनुत्पादक मुद्दों पर खर्च होंगे जोकि हर हालत में खर्च करने ही पडेंगे। इसलिये इन खर्चों को राजस्व व्यय कहा जाता है तथा यह नाॅन प्लान में आता है। नाॅन प्लान का खर्च सरकार को अपने ही साधनों से करना पड़ता है। इसके लिये केन्द्र से कोई सहायता नही मिलती है। इस खर्च का विकास कार्यो के साथ कोई संबध नही होता है। इन खर्चों के बाद सरकार के पास विकास कार्यों के लिये 41440 में से केवल 13651 करोड़ बचता है।
इसी परिदृश्य में यह सवाल उठता है कि 41440 करोड़ का खर्च करने के लिये सरकार के पास आय कितनी है। सरकार जहां राजस्व पर खर्च करती है वहीं राजस्व से आय भी होती है। राजस्व आय में टैक्स और नाॅन टैक्स से आय केन्द्रिय करों से आय, केन्द्रिय प्रायोजित स्कीमों के तहत अनुदान से आय शामिल होती है। सरकार की यह कुल राजस्व आय 30400.21 करोड़ है। इसके अतिरिक्त पूंजीगत प्राप्तियां आती हैं और इन पूंजीगत प्राप्तियोें में सकल ऋण और दिये गये ऋणो की वसूलीयां शामिल होती हैं इसमें सरकार 7730.20 करोड़ के ऋण लेगी और 34.55 करोड़ दिये गये ऋणों की वापसी के रूप में प्राप्त होंगे। इस तरह सरकार की कुल पूंजीगत प्राप्तियां 7764.75 करोड़ होगी। राजस्व प्राप्तियां और पूंजीगत प्राप्तियों को मिलाकर सरकार के पास 38164 करोड़ आयेंगे। इस तरह 41440 करोड़ के कुल प्रस्तावित खर्च से कुल प्राप्तियों को निकाल देने के बाद 3276 करोड़ का ऐसा खर्च रह जाता है जिसे पूरा करने के लिये कर्ज लेना पडेगा। गौरतलब है कि पूंजीगत प्राप्तियों में किये गये 7730 करोड़ के ऋण के प्रावधान से यह 3276 करोड़ का ऋण अतिरिक्त ऋण होगा। मूलतः सरकार का कुल खर्च 41440 करोड़ है और आय केवल 30400 करोड़ है। इस तरह करीब 11000 करोड़ सरकार को ऋण से जुटाने होंगे। जिस ऋण का पूंजीगत प्राप्तियों में जिक्र कर दिया जाता है वह तो राज्य की समेकित निधि का हिस्सा बन जाता है लेकिन ऋण पूंजीगत प्राप्तियों से बाहर लिया जाता है। उसे अतिरिक्त ऋण कहा जाता है। इस तरह किये गये खर्च का नियमितीकरण काफी समय बाद हो पाता है और कैग रिपोर्ट में इस खर्च को समेकित निधि से बाहर किया गया खर्च करार देकर इसे संविधान की धारा 205 की उल्लघंना माना जाता है पिछले कई वर्षों से सरकारें संविधान की इस धारा का उल्लंघन करके खर्च करती आ रही है। कैग रिपोर्ट मे हर वर्ष इसका विशेष उल्लेख रहता है।
सरकार 41440 करोड़ कहां खर्च करेगी इसका पूरा उल्लेख बजट दस्तावेज में है। इस दस्तावेज को देखने से पता चलता है कि 2018-19 में निर्माण कार्यों पर केवल 9.22% ही खर्च कर पायेगी।

हिमाचल से कौन जायेगा राज्यसभा में, अभी तक नही हुआ फैसला

शिमला/शैल। प्रदेश से राज्यसभा सांसद और केन्द्रिय स्वास्थ्य मन्त्री जगत प्रकाश नड्डा का कार्यकाल अप्रैल में समाप्त हो रहा है। इस तरह खाली हो रही इस सीट के लिये 23 मार्च को चुनाव होने जा रहा है। इस चुनाव की प्रक्रिया संबंधी कार्यक्रम भी अधिसूचित हो चुका है। प्रदेश में भाजपा की सरकार है इस नाते भाजपा का ही उम्मीदवार चुनकर जायेगा यह भी तय है। लेकिन इसके लिये भाजपा का उम्मीदवार कौन होगा? नड्डा ही फिर उम्मीदवार होंगे। इसको लेकर अभी तक संगठन की ओर से कोई अधिकारिक सूचना जारी नही हुई है। नड्डा प्रधानमन्त्री के विश्वस्तों में गिने जाते हैं। इस नाते उनका ही फिर से चुना जाना संभावित माना जा रहा है।
लेकिन पार्टी के भीतरी सूत्रों के मुताबिक इस फैसले को लेकर अभी कई पेंच फंसे हुए हैं। क्योंकि पार्टी ने एक समय जब यह निर्णय लिया था कि 75 वर्ष की आयु पूरा कर चुके नेताओ को चुनावी राजनीति और मन्त्री या मुख्यमन्त्री जैसे पदों की जिम्मेदारीयां नही दी जायेंगी, उसी के साथ यह भी फैसला लिया गया था कि राज्यसभा और लोकसभा के लिये एक व्यक्ति को दो से ज्यादा टर्म नही दिये जायेंगे। इस गणित में नड्डा और अनुराग ठाकुर दोनों ही आते है। नड्डा की यह दूसरी टर्म पूरी हो रही है। इसके अतिरिक्त अभी जब जयराम प्रदेश के मुख्यमन्त्री बने थे तो उस समय यह खुलकर सामने आ गया था कि चुने हुए विधायकों का बहुमत धूमल के साथ था। भले ही वह स्वयं हार गये थे लेकिन चुनावों में पार्टी ने उन्ही का चेहरा आगे किया था और पार्टी की इस जीत मे उनका बड़ा योगदान रहा है यह सब मानते हैं। दो लोगों ने तो उनके लिये अपनी सीटें खाली करने तक की पेशकश भी कर दी थी। मुख्यमन्त्री के चयन के समय में यह पूरी चर्चा में रहा है कि धूमल को रेस से हटाने के लिये उन्हे राज्यसभा में भेजने का आश्वासन दिया गया था। अब उस आश्वासन का कितना मान रखा जाता है इसे परखने का समय आ गया है।
इसी के साथ कांगड़ा क लोकसभा सांसद और पूर्व मुख्यमन्त्री शान्ता कुमार भी केन्द्र और प्रदेश की सरकारांेे को लेकर तल्ख टिप्पणी करने लग गये हैं। पंजाब नैशनल बैंक स्कैम के सामने आने पर यह शान्ता ने ही टिप्पणी की थी कि अब तो अपने भी लूटने वालों में शामिल हो गये हैं। इसके बाद शान्ता ने जयराम सरकार द्वारा दो माह में ही दो हज़ार करोड़ का कर्ज लेने पर भी करारी टिप्पणी की है। शान्ता कुमार ने यह चिन्ता व्यक्त की थी कि इस कर्जे से कैसे निजात पायी जायेगी। शान्ता कुमार की इन टिप्पणीयों का केन्द्रिय नेतृत्व पर कितना और क्या असर हुआ है इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अभी जब जयराम पालमपुर गये थे तो उन्होने शान्ता से अकेले में बन्द कमरे में लम्बी बैठक की है। हालांकि शान्ता कुमार अगला चुनाव नही लड़ने की घोषणा कर चुके हैं लेकिन भाजपा और प्रदेश की राजनीति की समझ रखने वाले जानते है कि अभी धूमल और शान्ता को नज़र अन्दाज करने का जोखिम पार्टी नही उठा सकती है। इस परिदृश्य में यह माना जा रहा है कि यदि अभी नड्डा के लिये दो टर्म वाला फैसला लागू नही किया जाता है तो उसी गणित में अनुराग के लिये भी यह फैसला लागू नही होगा। जबकि कुछ हल्कों में तो यह चर्चा चली हुई है कि धूमल विरोधी धूमल परिवार को प्रदेश की राजनीति से बाहर करने के लिये दो टर्म के फैसले के तहत अनुराग को टिकट से वंचित करने की रणनीति बनाने में लगे हुए हैं। माना जा रहा है कि यह सारे तथ्य हाईकमान के संज्ञान में हैं। इस परिदृश्य में राज्य सभा उम्मीदवार का फैसला लेने से पहले हाईकमान इन पक्षों पर भी गंभीरता से विचार करेगा क्योंकि उसे प्रदेश की चारों लोकसभा सीटों पर जीत 2019 में भी चाहिये।

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