शिमला/जे पी भारद्वाज
अभी हुए चुनावों में भाजपा चार राज्यों में सरकार बनाने में सफल हो गयी है। उतर प्रदेश और उतराखण्ड में अप्रत्याशित जीत हासिल हुइ है। इस जीत का कद इतना बड़ा था कि इसमे गोवा और मणीपुर की हार इन राज्यों में कांग्रेस का सबसे बडी पार्टी बनकर आना भी उसे बहुमत न मिलना करार दिया गया। यह जीत इतनी बड़ी है कि इसमें अभी किसी तर्क के सुने जाने के लिये कोई स्थान ही नहीं बचा है। स्वभाविक है कि इस जीत का असर अभी काफी समय तक रहेगा और खासकर उन राज्यों में जहां इसी वर्ष चुनाव होने हैं। उत्तराखण्ड और यूपी में चुनावों से पहले लगभग सभी दलों में तोड़ फोड़ हुई है। दूसरे दलों से कई नेता भाजपा में गये और वहां टिकट पाने में सफल भी हो गये तथा अब मन्त्री भी बन गये हैं। हिमाचल में भी इसी वर्ष चुनाव होने हैं और यूपी तथा उत्तराखण्ड की तर्ज पर यहां भी राजनीतिक तोड़-फोड़ पाले बदलने का दौर शुरू हो रहा है।
चैपाल के निर्दलीय विधायक बलवीर वर्मा जीतने के बाद वीरभद्र सिंह के साथ जा खडे़ हुए थे और कांग्रेस के सहयोगी सदस्य बन गये थे। बलवीर वर्मा की तरह अन्य निर्दलीय विधायक भी कांग्रेस के साथ खडे हो गये थे और कांग्रेस की सहयोगी सदस्यता ले ली थी। यह सहयोगी सदस्यता लेने पर भाजपा के सुरेश भारद्वाज ने इनके खिलाफ विधानसभा स्पीकर के पास एक याचिका भी दायर कर रखी है जो कि अभी तक लंबित है। इस याचिका में इन्हें अयोग्य घोषित करने की मांग की गयी है। लेकिन आज बलवीर वर्मा भाजपा के साथ खड़े हो गये हैं और उनके भाजपा सदस्य बनने की विधिवत घोषणा कभी भी सभंव है। वर्मा की तर्ज पर अन्य निर्दलीय विधायकों के भी भाजपा में शामिल होने की संभावनाएं चर्चा में हैं।अभी जब केन्द्रिय स्वास्थ्य मन्त्री जगत प्रकाश नड्डा शिमला थेे उस समय बलवीर वर्मा और राजन सुशांत का वहां होना इसी दिशा के संकेत हैं। यह भी स्वभाविक है कि विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा को प्रदेश के हर उस मुखर स्वर को जो आज कांग्रेस के साथ नही है, अपने साथ मिलाकर यह संदेश देना होगा कि प्रदेश में भाजपा के लिये कहीं से भी कोई चुनौती नही है। भाजपा के जो लोग नाराज होकर आम आदमी पार्टी में जा बैठे थे उन्हे भाजपा में वापिस लाना एक ऐजैन्डा होगा। इस समय जो राजनीकि माहौल खड़ा हुआ है उसमें यह सब अभी आसानी से हो भी जायेगा।
लेकिन जैसे ही बलवीर वर्मा के भाजपा में शामिल होने की चर्चा बाहर आयी उसी के साथ चैपाल के भाजपा कार्यकर्ताओं में रोष भी मुखर हो गया है। कार्यकर्ता बलवीर वर्मा को आगे उम्मीदवार न बनाये जाने की मांग लेकर होईकमान के पास दस्तक देने का मन बना चुके हैं। कार्यकर्ताओं की ऐसी नाराजगी और भी कई स्थानों पर आने वाले दिनों में देखने को मिल सकती है। भाजपा में जहां राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक स्थितियां काफी सुखद हो गयी हैं वहीं पर हिमाचल में उसका मुकाबला वीरभद्र जैसे व्यक्ति से है। वीरभद्र आज फिर कांग्रेस में प्रदेश के एकछत्र नेता बन गये हैं भाजपा की जीत ने उनका रास्ता बहुत सीधा कर दिया है कांग्रेस के अन्दर उन्हे कोई चुनौती नहीं रह गयी है। जबकि भाजपा नेतृत्व के प्रश्न पर स्पष्ट नही हो पा रही है। धूमल, नड्डा अभी से दो अलग -अलग सशक्त खेमे बनकर सामने हैं। फिर जिस ढंग से यूपी और उतराखण्ड में संघ की पृष्ठभूमि के लोगों को नेतृत्व सौंपा गया है उससे यहां भी कयास लगने शुरू हो गये हैं कि यहां भी कोई संघ की पृष्ठभूमि का व्यक्ति ही नेता होगा। धूमल और नड्डा दोनों ही संघ की हाईलाईन से बाहर के नेता हैं। बल्कि इस कडी में अजय जमवाल का नाम सेाशल मीडिया में वायरल भी हो गया है। ऐसे में पाले बदलने का जो दौर शुरू हुआ है उससे अपने कार्यकर्ताओं की नाराजगी कभी भारी भी पड़ सकती है। क्योंकि ऐसी लहर के दौरान ही सामान्य कार्यकर्ता को उभरने का अवसर मिलता है।
शिमला/शैल। हमीरपुर की भोरंज विधानसभा का उपचुनाव 9 अप्रैल के लिये घोषित हो गया है। प्रदेश विधानसभा के चुनाव भी इसी वर्ष के अन्त तक होने हैं। राज्य में सत्तारूढ़ कांग्रेस के कुछ प्रमुख नेताओं ने वीरभद्र को सातंवी बार मुख्यमन्त्री बनाने की घोषणा और दावा कर रखा है।
दूसरी ओर भाजपा ने देश को कांग्रेस मुक्त बनाने का लक्ष्य घोषित कर रखा है। इस समय भाजपा ने जिस तरह उत्तराखण्ड और यूपी में सत्ता हासिल की है उससे वह इस लक्ष्य की ओर बढ़ती भी नजर आ रही है। भले ही इन राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों का एक बड़ा सन्देश यह भी है कि सभी जगह सत्तारूढ़ सरकारें हारी हैं और उत्तराखण्ड तथा गोवा में तो मुख्यमन्त्री भी हारे हैं लेकिन सत्तारूढ सरकारों की हार से यूपी और उतराखण्ड में मिला
प्रचण्ड बहुमत एक बड़ा सन्देश बन गया है। हालांकि पंजाब में कांग्रेस को भी वैसा ही प्रचण्ड बहुमत मिला है। इस परिदृश्य में होने जा रहे भोरंज विधानसभा के उपचुनाव की राजनीतिक महता प्रदेश के सद्धर्भ में बडी हो जाती है।
पूर्व शिक्षा मन्त्री स्व0 ईश्वर दास धीमान के निधन से खाली हुई सीट पर एक लम्बे अरसे से भाजपा का कब्जा चला आ रहा है। इसमें हमीरपुर से ही प्रेम कुमार धूमल के दो बार मुख्यमन्त्री होने का योगदान भी रहा है। इसमें कोई दो राय नही हो सकती। लेकिन इस बार वीरभद्र और धूमल दोनों के लिये ही राजनीतिक हालात में बहुत बदलाव आ चुका है। वीरभद्र राजनीतिक सफर के आखिरी पडाव पर हैं लेकिन परिवार में उनकी इस विरासत को संभालने वाला अभी कोई स्थापित नही हो पाया है। पत्नी प्रतिभा सिंह दो बार सांसद रहने के बावजूद भी इस गणित में सफल नहीे हो पायी है। अब बेटे विक्रमादित्य सिंह को विधानसभा में देखना उनकी ईच्छा और आवश्यकता दोनों बन चुकी है। इसे पूरा करने के लिये सातंवी बार मुख्यमन्त्री बनने की घोषणा और दावा करना भी उनकी राजनीतिक आवश्यकता है। इस दिशा में जिस तरह से उन्होनें संगठन और सरकार में मन्त्रीयों से इस आश्य के समय-समय पर ब्यान दिलवाये है वह उनकी रणनीतिक सफलता मानी जा सकती है। लेकिन आने वाले चुनाव के मुद्दे क्या होंगे? यह एक बडा सवाल है विकास के नाम पर जितनी घोषनाएं की गयी है उनकी जमीनी हकीकत क्या है? प्रदेश के संसाधन क्या रहे है? चुनावी वायदों को पूरा करने के लिये कितना कर्ज लिया गया है? आज प्रदेश पर जितना कुल कर्जभार हो चुका है उसकी भरपायी के लिये कितना कर्ज भविष्य में साधन कहां से आयेंगे? यदि यह कड़ेऔर कडवे सवाल चुनावी मुद्दे बन गये तो स्थिति सभी के लिये कठिन हो जायेगी। ऐसे में विकास के नाम पर चुनाव लड़ना काफी जोखिम भरा हो सकता है।
इन गंभीर मुद्दों के साथ ही भ्रष्टाचार एक ऐसा मुद्दा हो जाता है जो कि सब पर भारी पड़ जाता है। वीरभद्र के इस कार्यकाल में भ्रष्टाचार को लेकर भाजपा तीन आरोप पत्र सौंप चुकी है।अन्तिम आरोप पत्र में सरकार के मन्त्रीयों से हटकर विभिन्न निगमों-बोर्डो राज्य के सहकारी बैंकों और प्रदेश के विश्वविद्यायलों के साथ -साथ कुछ विधायकों तक का जिक्र इस आरोप पत्र में है। राज्यपाल के अभिभाषण पर हुई चर्चा में भी आरोप पत्र का जिक्र आ चुका है। भ्रष्टाचार इसलिये सबसे बड़ा मुद्दा बन जाता है। क्योंकि जनता यह सहन नही करती कि लिये किये जाने वाले विकास के नाम पर विकास केवल भ्रष्टाचार किया जाये।इस परिपेक्ष में भाजपा के आरोपपत्र कांग्रेस और वीरभद्र पर भारी पड सकते हैं। यदि उन्हें चर्चा में ला दिया गया तो। फिर वीरभद्र स्वंय सीबीआई और ईडी जांच का सामना कर रहे है। इस भ्रष्टाचार के संद्धर्भ में वीरभद्र ने धूमल को घेरने के जितने भी प्रयास किये हैं उनमें सफलता की बजाये केवल फजीहत का ही सामना करना पड़ा है।
वीरभद्र ने इन सारे संभावित सवालों से ध्यान बांटने के लिये ही धर्मशाला को दूसरी राजधानी बनाये जाने की घोषणा की है। मन्त्रीमण्डल से भी इस पर मोहर लगवा ली है। इसी के साथ बेरोजगारी भत्ता देने की भी घोषणा कर दी गयी है। अपने गिर्द बने मामलों के लिये वीरभद्र इसे धूमल-अनुराग और जेटली का षडयंत्र करार देते आ रहे हैं। जनता में वह हर संभव मंच से यह कहना नही भूलते है कि एक ही मामले की जांच के लिये केन्द्र सरकार ने उनके खिलाफ तीन-तीन एजैन्सीयां लगा रखी है और यह सच भी है अभी तक वीरभद्र के अपने खिलाफ केन्द्र की कोई भी एजैन्सी बड़ा कुछ नही कर पायी है। अदालत में भी फैसला काफी अरसे से लंबित चला आ रहा है। ऐसे में धूमल और वीरभद्र भोरंज के उपचुनाव में किस तरह के मुद्दों को उछालते है या फिर इसे मोदी लहर के नाम पर छोड़ देते है इस संद्धर्भ में यह उपचुनाव दोनों नेताओं की प्रतिष्ठा और परीक्षा का सवाल बन जायेगा यह तय है।
शिमला/शैल।
नगर निगम शिमला के चुनाव इस वर्ष मई में होंगे। इन चुनावों को प्रदेश विधानसभा के चुनावों का प्रतीक माना जा रहा है। जब से नगर निगम का गठन हुआ है तब से निगम पर कांग्रेस का ही शासन चला आ रहा है। 2012 में धूमल शासन के दौरान भाजपा ने निगम पर कब्जे की रणनीति बनाई थी और इस नीति के तहत मेयर और डिप्टी मेयर के सीधे चुनाव करवाने का फैसला लिया गया। लेकिन चुनावों की घोषणा के साथ ही सीपीएम चुनाव में आ गयी। सीपीएम के चुनाव में आने से मुकाबला तिकोना हो गया। सीपीएम मेयर और डिप्टी मेयर दोनों ही पदों पर भारी बहुमत से जीत गयी। जबकि पार्षदों में बहुमत भाजपा को मिला। सीपीएम की इस जीत से घबरायी कांग्रेस ने मेयर और डिप्टी मेयर के सीधे चुनाव के फैसले को फिर बदल दिया। भाजपा यह फैसला बदले जाने पर खामोश रही। इससे यह प्रमाणित होता है कि सीपीएम की इस जीत से भाजपा भी चिन्तित थी। अब फिर पार्षद ही मेयर और डिप्टी मेयर का चयन करेंगे। इस परिदृश्य में यह स्पष्ट हो जाता है कि इस बार सीपीएम सारी सीटों पर चुनाव लड़ेगी और हर वार्ड में तिकोना मुकाबला होगा। यदि मई तक आते-आते आम आदमी पार्टी भी इस चुनाव में उतरती है तो यह चुनाव और रोचक हो जायेगा। सीपीएम को सारी सीटों पर चुनाव लड़ना राजनीतिक आवश्यकता होगी क्योंकि वह मेयर और डिप्टी मेयर दोनो पदों पर काबिज रही है। इसलिये चुनाव से पहले ही कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला लेना सीपीएम के लिये आसान नही होगा। निगम के 2017-18 के लिये लाये गये बजट से भी यही प्रमाणित होता है।
सीपीएम ने इस कार्यकाल का अन्तिम बजट निगम के हाऊस में रखा है। इसके मुताबिक वर्ष 2017-18 में निगम की कुल आय 40167.27 लाख और कुल खर्च 35713.77 लाख होगा। इन आंकडो के मुताबिक वर्ष 2017-18 में निगम के पास 4453.50 लाख शेष बच जायेगा। यदि यह आंकडे सही साबित होते हैं तो इसका अर्थ होगा कि अगले वर्ष के लिये नगर निगम ने जितने भी कार्य प्रस्तावित किये हैं उन्हे पूरा करने में निगम को कोई परेशानी नही होगी। यदि वर्ष 2015-16 और 2016-17 के आंकडो पर नजर डाले तो 2015-16 में निगम को कुल आय 12625.52 लाख हुई है जबकि खर्च 11722.43 लाख हुआ है और इस तरह 903.09 लाख का लाभ निगम को हुआ। वर्ष 2016-17 के लिये कुल अनुमानित आय 18196.60 लाख और खर्च 21517.52 लाख था। लेकिन पहले नौ महीनों में आय 11552.04 लाख और खर्च 8192.58 लाख रहा है। इन आंकडो के बाद संशोधित आंकडे निगम के हाऊस में रखे गये। इनके मुताबिक अब कुल आय 18103.86 लाख और खर्च 15852.88 लाख रहेगा। इन आंकडो से यह उभरता है कि नगर के वर्ष 2016-17 के लिये आय और व्यय के घोषित अनुमानित लक्ष्य पूरे नहीं हो पाये हैं। पहले नौ महीनों में निगम केवल 81 करोड़ 92 लाख 58 हजार खर्च कर पाया है और शेष बचे तीन महीनों में करीब दोगुणा खर्च का लक्ष्य रखा गया है। क्या तीन महीनों में यह शेष बचा खर्च हो पायेगा? इसको लेकर अभी से सवाल उठने शुरू हो गये है। क्योंकि वर्ष 2015-16 में निगम की कुल आय 12625.52 लाख थी जो कि 2016-17 में 18196.60 लाख अनुमानित थी। यह आय अब वर्ष 2017-18 के लिये 40167.27 लाख अनुमानित दिखायी गयी है। यह पिछले वर्ष के दो गुणा से भी अधिक है। निगम ने 2017-18 के बजट में कोई नये कर नहीं लगाये हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि निगम को यह आय कहां से होगी? क्या निगम की कर वसूली की दर में सुधार लाकर यह आय बढ़ेगी या इसके लिये ऋण लेकर आय को बढ़ाया जायेगा।
निगम को संपति कर से 2015-16 में 2204.10 लाख और 2016-17 में 1502.88 लाख की आय हुई है 2017-18 में इससे 1702.88 लाख का अनुमान है। राज्य वित्तायोग की सिफारिशों से 2015-16 में 2518.18 लाख, 2016-17 में 2580.67 लाख मिले है, 2017-18 में 2614 लाख का अनुमान है। किराये, शराब बिक्री, लीज और पार्किंग फीस आदि से 745.10 लाख, यूज़र चार्जिज़ आदि से 6662.90 लाख, सेल हायर चार्जिज से 35 लाख, केन्द्रिय लोक निर्माण विभाग से 10430.80 लाख, ब्याज से 1 करोड़, बचत खातों के ब्याज से 35 लाख, अन्य साधनों से 22.50 लाख आय का अनुमान है। इस तरह कुल राजस्व आय 22348.48 लाख रहने का अनुमान है। इसके साथ पूंजीगत आय 12818.79 लाख का अनुमान है। इसमें सब्जी मण्डी में शापिंग काम्लैक्स के निर्माण, स्मार्ट सिटी के निर्माण के लिये वित्तिय संस्थानों से 50 करोड का ऋण लेना भी शामिल है। खर्चो के नाम पर निगम का राजस्व व्यय 9551.22 लाख, प्रशासनिक व्यय 292.68 लाख निगम की ढांचागत परिसंपत्तियों के रख-रखाव पर 10586.50 लाख राजस्व अनुदान/उपदान आदि के तहत 264.00 लाख। इस तरह कुल राजस्व व्यय 20700.50 लाख रहने का अनुमान है। इसके साथ वर्ष 2017-18 में पूंजीगत व्यय 15013.27 लाख रहने का अनुमान है। इस वर्ष के अन्त में निगम की कुल आय उसके कुल खर्च से 4453.50 लाख बढ़ जाती है। इस पर फिर सवाल उठता है कि जब खर्च से आय अधिक है तो फिर 50 करोड़ का ऋण लेने का क्या औचित्य है।
शिमला/शैल।
मुख्यसचिव की नियुक्ति में नजर अन्दाज हुए प्रदेश के वरिष्ठ आई ए एस अधिकारियों दीपक सानन और विनित चैाधरी को प्रशासनिक ट्रिब्यूनल चण्डीगढ़ द्वारा दी गयी पहली राहत में यह निर्देश हुए थे कि इन अधिकारियों को मुख्यसचिव वी सी फारखा के प्रशासनिक नियन्त्रण से बाहर करते हुए इन्हें समुचित नियुक्तियां दी जायें। कैट के इन निर्देशों के बाद इन अधिकारियों को प्रिंसिपल एडवाईजर बनाकर इन निर्देशों की अनुपालना कर दी गयी। इसके बाद सानन 31 जनवरी को
रिटायर हो गये। इसके बाद जब यह मामला कैट में पुनः सुनवाई के लिये आया तब तक राज्य सरकार ने इसमें पूर्ण जवाब दायर नहीं किया जबकि अन्तरिम जवाब पहले ही दायर कर दिया गया था। अन्तरिम जबाब में राज्य सरकार ने दीपक सानन के खिलाफ चार्जशीट और विनित चैाधरी के खिलाफ सी बी आई में एक पी ई लंबित होने को इनकी नजरअन्दाजी का कारण बताया था। लेकिन संपूर्ण जवाब दायर नही किया गया और कैट ने इसका कड़ा संज्ञान लेते हुए न केवल राज्य सरकार को फटकार लगायी है बल्कि यहां तक कह दिया है कि यदि अगली तारीख तक यह जवाब न आया तो मुख्य सचिव वी सी फारखा की शक्तियां भी छीन ली जायेंगी। इसी के साथ विनित चैाधरी को तुरन्त प्रभाव से मुख्य सचिव के समकक्ष वेतन भत्ते और अन्य सुविधायें प्रदान की जायें।
जिस तरह के आदेश इस मामले में कैट से आ रहे है उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि कैट ने इस प्रकरण का कड़ा संज्ञान लिया है। कैट के निर्देशों के बाद राजनीतिक और प्रशासनिक हल्कों में यह मामला चर्चा का विषय बन गया है। विधानसभा में पूर्व मन्त्री भाजपा विधायक रविन्द्र रवि द्वारा इसका उल्लेख उठाया जाना इसका प्रमाण है। भले ही मुख्यमन्त्री द्वारा इस उल्लेख का कड़ा सज्ञांन लेने के बाद इसे सदन की कारवाई में दर्ज नहीं किया गया है लेकिन इससे इसकी गंभीरता और बढ़ गयी है। माना जा रहा है कि जब सरकार ने अन्तरिम जवाब में सानन और विनित चैाधरी के खिलाफ मामलें लंबित होने का तर्क रखा है तो उसी अनुपात में पर्यटन निगम के पूर्व कर्मचारी नेता गोयल की फारखा के खिलाफ राष्ट्रपति, राज्यपाल, मुख्यमन्त्री और सीबीआई तक को भेजी शिकायतों का संद्धर्भ भी कैट के सामने रखा जा चुका है क्योंकि सीबीआई ने गोयल की शिकायत को विधिवत् प्रदेश की विजिलैन्स को भेज रखा है। इस शिकायत से चैाधरी और फारखा एक ही धरातल पर आ खड़े होते है।
इस परिदृश्य में यह चर्चा उठना स्वाभाविक है कि राज्य सरकार कैट में इस याचिका पर पूरा जवाब क्यों दायर नही कर पा रही है। याचिका में सरकार के खिलाफ ऐसे क्या गंभीर आरोप हैं जिनका जबाब देना कठिन हो रहा है। इस संद्धर्भ में यदि याचिका पर नजर डाली जाये तो उसके मुताबिक प्रदेश में मुख्य सचिव और अतिरिक्त मुख्य सचिव की दो ही काडर पोस्टें है। इनके अनुसार दो एक्स काडर पोस्ट अतिरिक्त मुख्य सचिव के सृजित किये जा सकते हैं। इस तरह मुख्यसचिव और अतिरिक्त मुख्यसचिव के प्रदेश में केवल चार ही काडर पद हो सकते है। राज्य सरकार अपने काम के सुचारू निर्वहन के लिये अतिरिक्त मुख्य सचिव के अन्य पद तो सृजित कर सकती है लेकिन ऐसे पद केवल दो वर्ष के लिये रह सकते हैं और उसके बाद भी इन्हें चलाये रखने के लिये केन्द्र सरकार की अनुमति वांच्छित है और अनुमति के साथ भी केवल अगले तीन वर्ष तक ऐसा किया जा सकता है। लेकिन ऐसे पदों को किसी भी गणित में नियमित काडर करार नहीं दिया जा सकता।
That as already explained in paragraph No. 23, since there is one cadre post of Chief Secretary and one post of Additional Chief Secretary in the State of Himachal Pradesh, therefore, by virtue of powers vested in the State Government, under Rule 9(7) of Pay Rules (supra), two more posts could have been created by the State Govt. in the apex scale. In terms of the said Rules the State Govt. created two ex-cadre posts against the sanctioned strength of State Deputation Reserves vide order, dated 20.08.2007 against which the cadre officers can be posted.
That thus these are the only four posts i.e. two cadre and two ex-cadre posts that are part of the sanctioned strength in accordance with the rules and form part of the State cadre.
That the State Govt., however, has the power to create posts of like nature to cadre posts by virtue of the second proviso to Rule 4(2) of the IAS (Cadre) Rules, 1954, whereby, the State Government may add for a period not exceeding two years and with the approval of the Central Government for a further period not exceeding three years, to a State or Joint Cadre one or more posts carrying duties or responsibilities of a like nature to cadre posts.
That as per Office Memorandum No.11030/4/2012-AIS -II dated 20th January 2015 issued by the Department of Personnel and Training, Govt. of India, clarified in para 3 of the OM ibid that many State Governments have been using the second proviso to Rule 4(2) of IAS Cadre Rules, 1954 for creation of additional ex-cadre posts.The relevant portion of the afore-mentioned OM is reproduced below:
" It is also observed that many State Governments have been using the second provison to Rule 4(2) of IAS Cadre Rules, 1954 for creation of additional ex-cadre posts. The Rule provided that a " State Government concerned may add for a period not exceeding two year [and with the approval of the Central Government for a further period not exceeding three years] to a State or a Joint Cadre one or more posts carrying duties or responsibilities of a like nature to cadre posts". The provision indicates that the temporary posts created may be restricted to one or two posts only. This provision, however, cannot be used for creating a post in the Apex level."
This communication from GOI makes it crystal clear that the temporary posts created may be restricted to one or two posts only. This provision, however, cannot be used for creating a post in the Apex level.
इस वस्तुस्थिति को सामने रखते हुए आज जितने पद इस तरह के सृजित किये जा चुके है उनको चलाये रखने पर भी प्रश्न चिन्ह लग सकता है। पी मित्रा की सेवानिवृति के बाद जब 31-5-16 को फारखा के आदेश हुए थे उस पर प्रोटैस्ट करते हुए चैाधरी 1-6-2016 को 60 दिन के अवकाश पर चले गये थेे। उसके बाद 30-07-16 को मुख्यमन्त्री को इस नजरअन्दाजी पर एक प्रतिवेदन सौंपा गया था। लेकिन आर टी आई में ली गयी जानकरी के मुताबिक यह प्रतिवेदन मुख्यमन्त्री के समक्ष रखने से पहले ही फाईल कर दिया गया। इससे आहत होकर अन्ततः विनित चैाधरी को कैट में दस्तक देनी पड़ी है। अब चैाधरी को फारखा के समकक्ष लाने के निर्देश दिये गये हैं। यदि सरकार उन्हें फारखा के बराबर वेतन भत्ते और अन्य सुविधाएं प्रदान करती है तो इसका अर्थ होगा मुख्यसचिव का एक और पद सृजित करना, जो कि नियमों के मुताबिक संभव नही होगा। बल्कि इस समय प्रिंसिपल एडवाईजर का जो पद दिया गया है वह भी रूल्ज आॅफ विजनैस के तहत परिभाषित नही है। इस तरह यह पूरा मामला बेहद रोचक हो गया है और इसमें जो भी फैसला आयेगा उसका प्रभाव पूरे देश पर पड़ेगा।
शिमला/शैल। सोलन को नगर निगम बनाने की मांग करते हुए सोलन नगर निगम परिषद् के पूर्व अध्यक्ष कुल राकेश पंत और अन्य कांग्रेस नेताओं नेे 28.12.16 को मुख्यमन्त्री वीरभद्र सिंह को पत्र लिखा था। इस पत्रा में मुख्यमन्त्री को स्मरण करवाया है कि जून 2015 को शूलिनि मेले के अवसर पर वीरभद्र सिंह ने स्वयं सोलन को नगर निगम बनाने का आश्वासन दिया था। मुख्यमन्त्री कार्यालय ने यह पत्र आगामी कारवाई के लिये 27 जनवरी 2017 को निदेशक शहरी विकास विभाग को भेज दिया है। सोलन नगर निगम परिषद् भी दो वर्ष पहले इस आश्य का प्रस्ताव पारित करके सरकार को भेज चुकी है। इस समय डा0 धनी राम शांडिल सोलन के विधायक है और वीरभद्र सरकार मे मंत्री है। सोलन कांग्रेस के इन नेताओं ने अब मुख्यमन्त्री को भेजे पत्र की प्रतिलिपि धनीराम शांडिल को भेजकर उनसे सोलन को नगर निगम बनवाने की मांग की है।
स्मरणीय है कि जब धर्मशाला को नगर निगम का दर्जा दिया गया था तो उस समय वहां की आबादी 23 हजार थी। धर्मशाला को नगर निगम बनाने के लिये उसके आस-पास के क्षेत्रों को उसमें मिलाया गया है। जबकि 2011 की जनगणना के मुताबिक सोलन की आबादी उस समय करीब 40 हजार थी जिसका की अब 50 हजा़र तक पहुंचने का अनुमान है सोलन के गिर्द 10 बडे शैक्षणिक संस्थान चल रहेे है और यहां पर प्रतिदिन 20 से 25 हजार के बीच बाहर से लोग आते है। जनसंख्या के आंकड़ो के आधार पर सोलन धर्मशाला से बड़ा है। धर्मशाला नगर निगम बनने के बाद स्मार्ट सिटी की सूची में भी आ गया है। ऐसे में इस समय सोलन को नगर निगम बनाने की जो मांग उठी है उसके राजनीतिक परिणाम दूरगामी होंगे।
इस वर्ष विधानसभा के चुनाव होने है और कांग्रेस को यह चुनाव जीतने के लिये लोगों की जायज़ मांगो को तत्काल प्रभाव से स्वीकार करते हुए उसे अमली शकल देने का प्रयास करना होगा। जब 2015 में मुख्यमंत्राी ने स्वयं सोलन नगर निगम बनाने का आश्वासन दिया था तो आज लोग उस आश्वासन पर अमल चाहेंगे। यदि नगर निगम बनाने का यह आश्वासन पूरा न हुआ तो इसको नुकसान कांग्रेस और धनीराम शांडिल दोनों को चुनावों में होगा यह तय है।
