Thursday, 15 January 2026
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वन अधिकार कानून के प्रावधानों को लागू करने से पहले अवैध कब्जों पर कारवाई कैसे

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने वनभूमि पर हुए अवैध कब्जों का कड़ा संज्ञान लेते हुए इन कब्जों को तुरन्त प्रभाव से छुड़ाने के निर्देश दिये हैं। उच्च न्यायालय ने प्रदेश के वन विभाग के प्रमुख को इसकी व्यक्तिगत स्तर पर निगरानी करने के निर्देश दिये हैं और 15-11-2016 को इस संद्धर्भ में रिपोर्ट तलब की है उच्च न्यायालय के फैंसले और निर्देशों पर हिमालय नीति अभियान ने यह कहकर एजराज उठाया है कि जब तक वन अधिकार कानून के प्रावधानों की अनुपालना नहीं हो जाती है। तब तक नाजायज़ कब्जों को लेकर कारवाई नही की जा सकती। हिमालय नीति अभियान ने सरकार पर भी आरोप लगाया है कि उसने न्यायालय के सामने इस पक्ष को सही तरीके से नहीं रखा है। हिमालय नीति अभियान ने इस संबंध में मुख्यमन्त्री वीरभद्र, केन्द्रिय आदिवासी मन्त्रालय के मन्त्री और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहूल गांधी को भी पत्र लिखा है। हिमालय नीति अभियान ने लिखा है कि हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने CWPIL No.17/2014 a/w CWP No.3141/2015,   COPC No.161/2012 and CWPIL No.9/2015 में दिनांक 18.10.2016 को वन तथा राजस्व भूमि पर दस बीघा से ज्यादा के कब्जे की बेदखली के आदेश जारी किए और अगली सुनवाई जो 15 नवम्बर को होगी तक बेदखली की पूरी रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने को कहा। ऐसी जानकारी है कि कोर्ट के दबाव में वन और राजस्व विभाग 1 नवम्बर से वन निवासियों की बेदखली की बड़ी मुहिम चलाने जा रहे हैं जिस बारे में स्थानीय अधिकारियों को निर्देश दिए जा रहे हैं।
उच्च न्यायालय में वन विभाग ने वन भूमि पर कब्जे की निम्न रिर्पोट पेश कीः


राजस्व विभाग ने सभी 12 जिलों में 4299 मुकद्दमों के चलान किए, जिन में 1277 मुकद्दमों पर फैसले हो चुके हैं, जबकि 908 कब्जे के मुकद्दमों की बेदखली की जा चुकी है।
उच्च न्यायालय ने Principal Chief Conservator of  Forests, (HoFF)  को व्यक्तिगत तौर पर कार्यवाही की निगरानी करने का निर्देश दिया और यह खास कर सुनिश्चित करने को कहा कि शिमला व कुल्लू में वन व सरकारी भूमि पर कबजों की बेदखली का आप ने जो निर्धारित समय का वादा किया है के अन्दर कार्य संम्पन किया जाए। Principal Chief Conservator of Forests,  (HoFF), Himachal Pradesh, Conservator of Forests, Shimla, Rampur and Kullu, including all D.F.Os. of Districts Shimla and Kullu को निर्देश जारी किए गए कि वे अगली पेशी दिनांक 15.11. 2016 को प्रश्नों के जबाव देने के लिए व्यक्तिगत तौर पर कोर्ट में उपस्थित रहे।
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने पहले ही Cr.MP(M)No. 1299 of 2008 के आदेश दिनांक 27.02.2016 को दस बिघा से कम के कब्जाधारकों के विरूध FIR  दर्ज करने के आदेश दिए हैं जबकि अप्रैल 6, 2015 को CWPIL No.17 of 2014 इसी कोर्ट ने दस बिघे से अधिक के कब्जाधारकों की बेदखली के आदेश जारी किए थे।
इसी आड़ में वन विभाग ने 40 हजार से अधिक सेब व दुसरे फलदार वृक्ष काटे, अधिकतर छोटे किसानों के बगीचे तथा खेती नष्ट की, घर तोडे और बिजली व पानी के कनैक्शन पुरे प्रदेश में काट दिए।
परन्तु यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि प्रदेश सरकार के महा अधिवक्ता ने उच्च न्यायालय के यह समक्ष पक्ष नहीं रखा कि वन अधिकार कानून 2006 व सर्वोच्च न्यायालय के नियमगीरी के फैसले के तहत बेदखली पर तब तक अमल नहीं किया जा सकता, जब तक वन अधिकारों की मान्यता और सत्यापन की कार्यवाही पूरी नहीं हो जाती है।
वन तथा राजस्व विभाग द्वारा आदिवासी एवम् अन्य परम्परागत वन निवासियों की वन भूमि से HP& Public Premises & Land ( Eviction & Rent Recovery) Act, 1971 व भू-राजस्व अधिनियम 1954 की धारा 163 के तहत बेदखली की जा रही है। बहुत से लोगों के बिजली व पानी के कनैक्शन काट दिए हैं। ज्यादा तर बेदखलियां उन वन निवासियों की हुई जिन्होंने वर्ष 2002 में दखल/कब्जे के पट्टे के लिए आवेदन किया था।
ऐसे में ज्यादा तर बेदखलियां 13 दिसम्बर 2005 से पहले के दखल/ कब्जों की हुई है। जिस पर लोगों ने रिहायशी घर, खेती, बगीचा, घराट, गौशाला इत्यादी बना रखी है। ये लोग वन अधिकार कानून, 2006 के अंतर्गत आदिवासी एवं अन्य परंपरागत वन निवासी की श्रेणी में आते हैं। बहुत से प्रताडित लोग अनुसुचित जनजाती व जन जातीय श्रेणी से संबन्ध रखते हैं, जिन्हेंScheduled Castes and the Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act,1989- Amendment of section 3 (g)of the principal Act , 31st December 2015 के तहत संरक्षण प्राप्त है, जिसके नियम 14 अप्रैल 2016 से लागू हो चुके हैं।
वन अधिकार कानून, 2006 की धारा 4(5) के तहत वन भूमि से बेदखली तब तक नहीं हो सकती, जब तक वन अधिकार के दावे का सत्यापन और मान्यता की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय के दिनांक 18 अप्रैल 2013WRIT PETITION (CIVIL) NO- 180 OF 2011, Orissa Mining Corporation Ltd-Versus Ministry of Environment & Forest & Others के फैसले में भी आदेश दिया गया है कि जब तक वन अधिकार के दावों का सत्यापन और मान्यता की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती तब तक, अनुसूचित जन-जातीय व अन्य परंपरागत वन निवासी की वन भूमि से बेदखली नहीं की जा सकती और न ही वन भूमि का हस्तांतरण किया जा सकता है। कशांग (किन्नौर) की जल विद्युत परियोजना के मुकद्दमे Civil No 8345 Himachal Pradesh Power Corporation Ltd- versus Paryavaran Sanrakshan Samiti, Lippa पर National Green Tribunal ने 4 मई 2016 को ऐसा ही आदेश जारी किया है।

ऐसे में किसी भी राज्य के कानून जैसे भू-राजस्व अधिनियम 1954 की धारा 163 व HP Public Premises & Land (Eviction & Rent Recovery) Act,1971  के तहत वन निवासियों के विरुद्ध तब तक बेदखली की कार्यवाही व नाजायज कब्जा का मुकद्दमा नहीं चलाया जा सकता है, जब तक वन अधिकार के दावे का सत्यापन और मान्यता की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती।

क्या HPU की नियुक्तियों पर आयी शिकायत की राज्यपाल जांच करवायेंगे

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में पिछले दिनों हुई सहायक प्रोफेसरों की नियुक्तियों को लेकर एक महिला ने राष्ट्रीय महिला आयोग को भेजी शिकायत में सनसनी खेज आरोप लगाये हैं। यह शिकायत चर्चा का विषय बन चुकी है। विश्व विद्यालय के एक छात्र संगठन ने इसकी जांच की मांग की है। शिकायतकर्ता महिला का आरोप है कि वह इन नियुक्तियों के लिये स्वंय भी एक उम्मीदवार थी। उसने दावा किया है कि साक्षात्कार के बाद जो मैरिट सूची बनी थी उसमें दूसरे स्थान पर थी लेकिन जब नियुक्ति पत्र जारी हुए तब उसे नज़र अन्दाज करके 39 स्थान पर जो महिला थी उसे नियुक्त दे दी गयी। शिकायत पत्र में नियुक्त हुई महिला के मोबाईल न. भी दिये गये हैं और आरोप लगाया गया है कि इस महिला की एक शीर्ष अधिकारी से लम्बी बात होती रही है। इन कॉल डिटेलज़ की जांच की मांग की गयी है। यह भी दावा किया गया है कि इस महिला की नियुक्ति का दो प्रोफेसरों ने विरोध भी किया था। इन प्रोफेसरों के नाम भी दिये गये हैं। इन प्रोफेसरों से जुड़े सूत्रों के मुताबिक यह लोग भी इस शिकायत में जांच के पक्षधर हैं।
शिकायतकर्ता महिला ने शिकायत में जो अपना पता लिखा है वह प्रमाणिक नहीं है जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि शिकायतकर्ता ने अपनी सही पहचान छुपाने का प्रयास किया है। क्योंकि स्वभाविक है कि रिश्वत और शोषण के आरोप लगाकर अपनी पहचान को सार्वजनिक करना आसान नहीं होता। इसी कारण हम इस पत्र को सार्वजनिक नहीं कर रहें हैं। लेकिन शिकायत में जो तथ्य दिये गये हैं वह किसी भी जांच के लिये एक पुख्ता आधार हैं। मैरिट की अनदेखी की गई है। इस शिकायत के मुताबिक जिस महिला को नियुक्ति दी गयी है वह उसकी पात्र ही नहीं थी। विश्व विद्यालय में इन पदों के लिये 2011, 2012 और 2013 में आवेदनों और साक्षात्कार की प्रक्रिया पूरी हुई थी। लेकिन इसके परिणाम 23 सितम्बर 2016 को घोषित हुये क्योंकि इस सारी प्रक्रिया पर गंभीर आरोप लगते रहे हैं। मामला प्रदेश उच्च न्यायालय तक पहुचा था। शिकायतकर्ता महिला ने भी 2012 में इन्टरव्यू दिया था और उस समय नियुक्ति के प्रति उसे पूरी तरह आश्वस्त किया गया था। इसी कारण वह इस सब के बारे में खामोश बैठी रही लेकिन अब जब परिणाम सामने आया तो उसके धैर्य का बांध टूट गया। शिकायत के मुताबिक उसने रिश्वत के नाम पर दिये हुये पांच लाख वापिस मांगे तो उसे प्रताड़ना मिली। शिकायत में उसने कहा था कि अगर उसे न्याय ना मिला तो वह आत्महत्या कर लेगी।
यह शिकायत पत्र पूरी तरह सार्वजनिक चर्चा में आ चुका है इस पर जांच की मांग उठ गयी है। यह भी आरोप है कि विश्वविद्यालय के इस बड़े को मुख्यमन्त्री का संरक्षण प्राप्त है। ऐसे में इन आरोपों की जांच सरकार के स्तर पर कितनी संभव हो पायेगी? विश्वविद्यालय एक स्वायत संस्था है इसके प्रबंधन पर ही यह आरोप हैं। ऐसे में इसकी जांच करवाने की जिम्मेदारी राज्यपाल पर आ जाती है क्योंकि वही विश्वविद्यालय के चांसलर हैं। इस शिकायत पत्र को एक सोर्स रिपोर्ट मानकर इसकी जांच की जा सकती है। बल्कि उच्च न्यायालय भी इसका स्वतः संज्ञान लेकर जांच आदेशित कर सकता है।

जिला परिषद शिमला की बैठक के बाद प्रदेश का खुला शौच मुक्त होने का दावा सवालों में

शिमला/ब्यूरो। हिमाचल प्रदेश ने खुला शौच मुक्त राज्य होने का लक्ष्य तय समय सीमा से पांच माह पहले ही पूरा कर लिया है। इसमें देश के बड़े राज्यों में यह मुकाम हासिल करने वाला हिमाचल पहला राज्य बन गया हैै। यह दावा मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने होटल पीटर हाफ में इस उपल्क्ष में आयोजित एक समारोह में केन्द्रिय ग्रामीण विकास मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर और केन्द्रिय स्वास्थ्य मन्त्री जगत प्रकाश नड्डा की मौजूदगी में किया है। सरकार के इस दावे से हिमाचल विश्व बैंक से स्वच्छता प्रौजैक्ट के लिये स्वीकुत नौ हजार करोड़ की सहायता पाने में भी भागीदारी बन गया है यह एलान ग्रामीण विकास मन्त्री तोमर ने किया है।
सरकार की इस तरह की उपलब्धियां प्रशासन द्वारा जुटाये आंकड़ों पर आधारित रहती हैं। खुला शौच मुक्त होने का दावा भी ऐसे ही आंकड़ों के आधार पर किया गया है। लेकिन यह दावा कितना सही है इसका खुलासा जिला परिषद शिमला की हुई बैठक से हो जाता है। इस बैठक में जिला के कोटखाई वार्ड की सदस्य नीलम सरेक ने आरोप लगाया कि उनके वार्ड के एक भी स्कूल मे शौचालयों का निर्माण नही हुआ है और ऐसे में सम्मपूर्ण खुला शौच मुक्त्त का दावा कैसे किया जा सकता है। नीलम के इस आरोप से बैठक में हड़कंप मच गया। तुरन्त जिलाधीश और दूसरे संवद्ध अधिकारियों ने उतेजित सदस्य को शांत करने के लिये यकीन दिलाया कि इन स्कूलों के लिये आज ही धन का आवंटन कर दिया गया है। जिला परिषद की बैठक में जिस तरह से महिला सदस्य ने अपने वार्ड की व्यवाहरिक स्थिति रखी उससे यह सवाल उठता है कि जिला प्रशासन के पास जव यह जानकारी थी कि उस वार्ड के स्कूलों मे अभी शौचालय का निर्माण नही हो पाया है तो उन्होने इसकी जानकारी सरकार को क्यों नही दी। सदस्य के शोर मचाने पर इसके लिये धन आवंटन किया जाता है। यक निर्दलीय सदस्य इस समय भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिये चुनावी चुनौती बनती जा रही है। संभवतः इसी कारण से इसके वार्ड में ऐसा हुआ है। लेकिन इससे पूरे प्रदेश में अन्य स्थानों पर भी अभी तक ऐसी स्थितियां होने की संभावना से इन्कार नही किया जा सकता है।

वीरभद्र और सुक्खु में चल रहा शह -मात का खेल कहां रूकेगा।

शिमला/शैल। प्रदेश कांग्रेस के दो दिन तक चले जनरल हाऊस के बाद प्रदेश प्रभारी अंबिका सोनी ने पत्रकार सम्मेलन को सम्बाधित करते हुए एलान किया है कि सुक्खु नहीं बदले जायेंगे और विधान सभा का अगला चुनाव वीरभद्र सिंह की ही कमान में लड़ा जायेगा। अंबिका सोनी के साथ ही सुक्खु ने भी यह कहा कि उनके वीरभद्र सिंह के साथ कोई मतभेद नही हैं। लेकिन अंबिका सोनी ने अपने ब्यान के साथ ही यह भी जोड़ा है कि उनके स्तर पर तो यही स्थिति है परन्तु उनसे ऊपर हाईकमान राहूल गांधी और सोनिया गांधी भी है जो कोई भी फैसला ले सकते हैं अंबिका का यह कहना फिर सारी स्थिति को खुला छोड़ देता है। जनरल हाऊस में नेताओं ने जिस तरह से अपने विचार रखे है। उनमें मुख्यमंत्री ने खुलकर संगठन की कार्यशैली पर अप्रसन्नता व्यक्त की है। मुख्यमन्त्री ने स्पष्ट कहा कि संगठनात्मक जिलों के गठन से पूर्व उनसे राय नही ली गयी। अब यदि भाजपा प्रशासनिक जिले बनाने का वायदा कर देती हैं तो सरकार और पार्टी की फजीहत होगी। सचिवों की नियुक्तियों पर बहुत ज्यादा तलख थे। इस पर सुक्खु ने यहां तक कह दिया कि हर पिता पुत्र मोह का शिकार होता ही है। संगठन में सारे लेग चुनकर आये है। बाली ने कांग्रेस के आरोप पत्र पर कोई ठोस कारवाई न होने का मुद्दा उठाते हुए यहां तक कह दिया कि पार्टी लोकसभा की चारों सीटें क्यों और कैसे हार गयी। वरिष्ठ नेताओं के इस तरह के वक्तव्य पार्टी और सरकार के तालमेल की पूरी तस्वीर है।
वीरभद्र अपने बेटे को पूरी तरह स्थापित करने के लिये किसी भी हद तक जा सकते है। यह जगजाहिर हो चुका है। इसी मंशा से उन्होने वीरभद्र ब्रिगेड को अब एक जीओ की शक्ल दी है। ब्रिगेड और अब एनजीओ प्रमुख बलदेव ठाकुर का सुक्खु के खिलाफ मानहानि का मामला दायर किया जाना तथा सुक्खु के खिलाफ आये भाजपा के आरोपों पर मुख्यमन्त्री का तुरन्त जांच पडताल का एलान किया इसी कडी के हिस्से माने जा रहें है। विक्रमादित्य का टिकट आंवटन के मामले में हाईकमान के दखल का विरोध करना भी यही प्रमाणित करता है। क्योंकि रोहडू विधानसभा चुनावों में एक बार वीरभद्र के पूरे प्रयासों के वाबजूद प्रतिभा सिंह को टिकट न मिल पाना वीरभद्र की आशंकाओं का ठोस आधार है। चुनावों में अपना एक छत्र वर्चस्व स्थापित करने के लिये पार्टी अध्यक्ष पर पूरा कब्जा होना आवश्यक है और सुक्खु के रहते यह संभव नही है। इसलिये सुक्खु के खिलाफ हर संभव मोर्चा खोला गया है। अपनी मनवाने के खेल में वीरभद्र किस हद तक जा सकते हैं इसका गवाह 1980 -81 में जनता पार्टी के दल बदल से सरकार बनाये जाने का विरोध 1993 में पंडित सुखराम के विरोध के लिये विधानसभा भवन के घेराव की नौवत आना और 2012 में शरद पवार के साथ जाने की अटकलों का गर्म होना रहा है। फिर इस बार तो सीबीआई और ईडी जांच के परिणामों की आशंका बनी हुई हैं ऊपर से हाईकमान स्वंय भी कमजोर मानी जा रही है। इस परिदृश्य में थोडे से तल्ख तेवर दिखाकर पार्टी पर कब्जा करना आसान मान जा रहा है।
पार्टी और सरकार के बीच इस तरह की वस्तुस्थिति का होना जगजाहिर है। लेकिन इसके वाबजूद अगला चुनाव वीरभद्र के ही नेतृत्व में लड़ा जाना और सरकार की वापसी के दावे किये जाना चर्चा का विषय बन रहे है। 2017 के अन्त में विधानसभा चुनाव होने हैं परन्तु समय पूर्व ही चुनाव हो जाने की संभावनाएं भी बनी हुई है। ऐसे में यह समय चुनावी गणित के साये में देखा जा रहा है। लेकिन इस जनरल हाऊस के लिये आयी पार्टी प्रभारी अंबिका सोनी के स्वागत के लिये कोई बडा उत्साह नही देखा गया जबकि सामान्यतः ऐसे मौको पर खूब ढोल नगाडे बजते थे चुनावों में टिकटों की दावेदारीयों के लिये संभावित उम्मीदवारो के समर्थको का भारी हजूम रहता था। लेकिन इस बार ऐसा कुछ भी देखने को नही मिला। पार्टी कार्यालय में संगठन के पदाधिकारियों बल्कि विवादित बनाये गये पार्टी सचिवों के अतिरिक्त प्रभारी को मिलने कोई नही पहुंचा। इसी तरह पीटरहॉफ में भी सरकार में विभिन्न निगमों /बार्डो में ताज पोशीयां पाने वालों से हटकर और कोई मिलने वाला नही था। प्रभारी दोनों दिन करीब दो-दो घण्टे लगभग खाली रही। पीटरहॉफ में लंच के समय मुख्यमन्त्री के पास कोई भीड नही थी। पार्टी के भीतर की यह स्थिति अपने में ही बहुत कुछ कह जाती है। इस पर मुख्यमन्त्री और पार्टी अध्यक्ष में चल रहा शह और मात का खेल क्या गुल खिलाता है इस पर सबकी नजरें लगी हुई है।

ब्रिगेड के पूर्व अध्यक्ष ने दागा सुक्खु के खिलाफ मानहानि मामला

                   वीरभद्र ब्रिगेड बना अब हिमाचल वीर कल्याण समिति

शिमला/शैल। प्रदेश कांग्रेस में सब कुछ अच्छा नहीं चला रहा है इसका प्रमाण जय हिमाचल वीर कल्याण समिति के गठन के रूप में सामने आया है। क्योंकि इससे पूर्व जब प्रदेश कांग्रेस सेवादल के पूर्व चीफ बलदेव सिंह ठाकुर की अध्यक्षता में कांग्रेस के कुछ सक्रिय कार्यर्ताओं ने वीरभद्र ब्रिगेड का गठन किया था। तब इस गठन को कांग्रेस के भीतर पार्टी विरोधी गतिविधि करार दिया गया था। इसके लिये कुछ लोगों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही करते हुए उन्हें पार्टी से निष्कासित तक कर दिया गया था। पार्टी के भीतर इस ब्रिगेड के गठन को वीरभद्र द्वारा अपरोक्ष में समानान्तर संगठन खड़ा करने का प्रयास माना गया था। लेकिन बड़े पैमाने पर प्रतिक्रियाएं समाने से पहले ही ब्रिगेड को भंग कर दिया गया था। ब्रिगेड भंग होने के बाद इससे जुड़े जिन नेताओं के खिलाफ अनुशासनात्मक कारवाई की गयी थी उसे वापिस ले लिया गया था। लेकिन किन्ही कारणों से इसके अध्यक्ष बलदेव सिंह ठाकुर के खिलाफ कारवाई वापिस नही ली गयी। बलेदव ठाकुर ने इस एकतरफा कारवाई के खिलाफ आवाज उठाई और प्रदेश प्रभारी अंबिका सोनी के दरबार तक मैं फरियाद रखी। सूत्रों के मुताबिक अंबिका सेनी ने इस एकतरफा कारवाई को अनुचित ठहराते हुए प्रदेश अध्यक्ष सुक्खु को अपने फैंसले पर पुनर्विचार करने को कहा जो कि नही हुआ।
अब सुक्खु की एकतरफा तानाशाही कारवाई से आहत होकर ब्रिगेड से जुडे़ लोगो ने विधिवत एक एनजीओ जय हिमाचल वीर कल्याण समिति का गठन घोषित कर दिया है। इस एनजीओ का पंजीकरण 17.8.16 को करवाया गया हैं एनजीओ के गठन से हटकर ब्रिगेड के अध्यक्ष रहे बलदेव ठाकर ने अपने निष्कासन को लेकर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुक्खु के खिलाफ सीजेएम कोर्ट कुल्लु में एक मानहानि का मामला भी दायर कर दिया है। मानहानि का मामला दायर करते हुए स्पष्ट लिखा है। ज्ीम च्संपदजपि ंसवदह ूपजी वजीमते तिंउमक ं छळव् दंउमक टपतइींकतं ैपदही ठतपहंकमए भ्पउंबींस च्तंकमे वित ेचतमंकपदह जीम चवसपबपमे वि जीम च्तमेमदज ळवअमतदउमदज वि बवदहतमे च्ंतजल ंदक टपतइींकतं ैपदही ूव पे ं सपअपदह समहमदक ंदक ीं इममद जीम ब्ीपमि डपदपेजमत वि भ्ण्च्ण् वित ं तमबवतक दनउइमत वि 6 जपउमेण्
इस कथन से स्पष्ट हो जाता है कि ब्रिगेड के गठन में वीरभद्र का पूरा आर्शीवाद ओर सहयोग इसके लोगों को प्राप्त था। ब्रिगेड का उस समय एनजीओ के तौर पर पंजीकरण नही था। अब इसके नाम मे हल्का सा परिवर्तन करते हुए इसका विधिवत पंजीकरण करना लिया गया है। यह एनजीओ घोषित रूप से पूरी तरह गैर राजनीतिक है। इस नाते इसमें हर राजनीतिक संगठन और विचार धारा से जुड़े लोग शामिल हो सकते है और मूल संगठन इन लोगों के खिलाफ पहले की तरह से कोइ अनुशासनात्मक कारवाई भी नहीं कर पायेगा। एक तरह से यह एनजीओ हर विरोध और विद्रोह को मुखरता प्रदान करने का मंच बन जायेगा। इस समय इसका गठन पूरी तरह राजनीतिक शैली में ही किया गया है यह दावा भी किया गया है कि इसमें आने वाले दिनो मे सक्रिय राजनीति से जुड़े लोग शामिल होंगे। इस एनजीओ से जुड़े लोग अलग से किसी भी राजनीतिक दल के तहत चुनाव लड़ने के लिये स्वतन्त्रा रहेंगे। ऐसे मे इस एनजीओ को यदि वीरभद्र की ओर से एक अलग राजनीतिक मंच प्रारूप में देखा जाये तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।
इस समय वीरभद्र जिस तरह के दौर से गुजर रहे हैं उसमे उनकी पहली आवयश्यकता कांग्रेस संगठन पर कब्जा करना हो जाती है। इसके लिए हर संभव प्रयास करके सुक्खु को कांग्रेस के अध्यक्ष पद से हटाना हो जाता है। इस नवगठित एनजीओ के अध्यक्ष और उनके साथियों ने भी इसी आश्य से सुक्खु को अब तक का सबसे कमजोर प्रदेश अध्यक्ष करार दिया है। इसका सीधा सा अर्थ है कि इस एनजीओ के माध्यम से वीरभद्र ने सुक्खु के खिलाफ खुला मोर्चा खोल दिया है। सुक्खु के खिलाफ जब भाजपा नेताओं ने बेनामी संपत्ति के आरोप लगाये थे तो कांग्रेस में विद्यास्टोक्स और जी एस बाली जैसे वरिष्ठ मन्त्रा उसके बचाव में आ गय थे। अब जब सुक्खु के खिलाफ अपरोक्ष में वीरभद्र ने मोर्चा खोल दिया है तो कौन नेता उसके बचाव में आता है यह देखने वाला होगा।
इस एनजीओ के मुख्य सलाहकार पूर्व विधायक कश्मीर सिंह ठाकुर बनाये गये है और मुख्य कानूनी सलाहकार बार कौंसिल के पूर्व अध्यक्ष नरेश सूद है। उपाध्यक्ष देवी सिंह पाल और मनभरी देवी बने है। महामन्त्रा दीपक शर्मा, विजय डोगरा और अनुराग शर्मा, सहसचिव करतार सिंह चौधरी, खुशीराम भूरिया और विजय ठाकुर है। आत्मा राम ठाकुर को हमीरपुर और चन्द्र बल्भ नेगी को कुल्लु का जिला अध्यक्ष बनाया गया है। संगठन का विस्तार शीघ्र किये जाने का दावा किया गया है।

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