Thursday, 23 April 2026
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मोदी सरकार के लिये घातक होगा अदानी प्रकरण

अदानी प्रकरण और मोदी सरकार का वर्ष 2023-2024 के लिए बजट दोनों करीब एक साथ आये हैं। मोदी सरकार का यह बजट उनके इस कार्यकाल का अन्तिम बजट है। 2024 में लोकसभा के चुनाव होने हैं। इस नाते यह बजट महत्वपूर्ण हो जाता है। आयकर में भी बढ़ाई गयी सीमा अगले वर्ष होने वाले चुनावों के परिदृश्य में ही देखी जा रही है। बजट के सारे परिणामों के पूरा होने के लिये यह कहा गया है कि यह सब कुछ राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। इसलिए बजट पर यह सवाल उठाना बेमानी हो जाता है कि धन का प्रावधान कहां से होगा या यह बजट आम आदमी पर करों का प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष बोझ बढ़ायेगा और सरकार की कर्ज पर निर्भरता बढ़ जायेगी। क्योंकि यह सामने चुका है कि सरकार ने संसाधन जुटाने के लिये पिछले वर्षों में भी विनिवेश, सार्वजनिक उपक्रमां को निजी क्षेत्र को सौंपने आदि के जो लक्ष्य रखें थे वह पूरे न होने के बाद संपत्तियों के मौद्रिकरण की नीति घोषित की है। संपत्तियों की जानकारी जूटाने के लिये पंचायत स्तर तक पत्र भेज दिया गया है। पहले चरण में मौद्रिकरण के नाम पर अठारह लाख एकड़ सरकारी जमीने बेचने का लक्ष्य तय किया गया है। महंगाई पर कितना नियन्त्रण हो पाया है। यह हर रोज बढ़ता कीमतों से सामने आ जाता है। बेरोजगारी के क्षेत्र में दो करोड नौकरियां देने के वादे से चलकर यह सरकार अब 4 वर्ष के लिये अग्निवीर बनाने तक पहुंची है। सरकार की अब तक की सारी योजनाओं का हासिल यही है कि एक सौ तीस करोड़ की आबादी में आज भी करीब साढ़े सात करोड लोग ही आयकर रिटर्न भरने तक पहुंचे हैं और उनमें भी आयकर देने वाले केवल डेढ़ करोड़ लोग ही है। आज भी सरकार अस्सी करोड लोगों को मुफ्त राशन देने को उपलब्धी करार दे रही है। अन्दाजा लगाया जा सकता है कि जब अस्सी करोड लोग अपने लिये दो वक्त का राशन भी न जूटा पा रहे हो तो सारे घोषित लक्ष्यों और उपलब्धियों को दिन में ही सपने देखने से ज्यादा क्या संज्ञा दी जाये। आज कार्यकाल के अन्तिम बजट पर यह सवाल उठाने इसलिये प्रासांगिक हो जाता है क्योंकि देश का सबसे अमीर और विश्व का तीसरा अमीर व्यक्ति गौतम अदानी एक रिपोर्ट आने के बाद ही पन्द्रहवें पायदान पर पहुंच गया है। सरकार ने अदानी समूह के हवाले कितने सार्वजनिक प्रतिष्ठान कर रखे हैं सारा देश जानता है। सार्वजनिक बैंकों ने इस समूह को कर्ज भी दिये और इसके शेयर भी खरीदे। एल आई सी ने भी इसमें निवेश किया और यह सामने आया है कि इतना निवेश करने के लिये प्रधानमन्त्री या वित्त मन्त्री की पूर्व अनुमति चाहिये। हिंडनबर्ग की रिपोर्ट में यह खुलासा सामने आया कि इस समूह ने अपनी कंपनियों के शेयरों में 85 का उछाल दिखाकर निवेशकों को निवेश के लिये प्रेरित किया। बाद में अधिकांश कंपनियां फर्जी और अदानी परिवार के सदस्य द्वारा ही टैक्स हैवन देशों में संचालित के जाने का खुलासा सामने आया। इसके परिणाम स्वरुप समूह के शेयरों की कीमतों में गिरावट आने लगी। विदेशी निवेशकों ने निवेश बन्द कर दिया और अदानी समूह को अतिरिक्त बीस हजार करोड का निवेश जुटाने के लिये जारी किया एफ.पी.ओ. वापिस लेना पड़ा। यह एफ.पी.ओ. वापिस लेने से हिंडनबर्ग की रिपोर्ट की विश्वसनीयता बढ़ जाती है। समूह के शेयरों में गिरावट आने से निवेशकों में हड़कंप होना स्वभाविक है कि क्योंकि जिस लाभ की उम्मीद से निवेश किया गया था उसकी जगह मूल निवेश के भी सुरक्षित रह पाने पर प्रश्नचिंह लगता जा रहा है। एल. आई.सी. और सार्वजनिक बैंकों में देश के आम आदमी का पैसा जमा हैं। आज यह स्थिति पैदा हो गयी है कि अदानी समूह के डूबने से पूरे देश की आर्थिकी पर गंभीर संकट आ जायेगा। बजट के सारे लक्ष्य कागजी होकर रह जायेंगे। लेकिन यह सब होने के बावजूद देश की सारी निगरान एजैन्सियों का मौन बैठे रहना और संसद में विपक्ष के प्रश्नों पर सरकार का बहस से बचना देश के लिये एक अप्रत्याशित स्थिति पैदा कर देता है। यह स्थिति सरकार के भविष्य के लिये निश्चित रूप से घातक होने वाली है। हिंडनबर्ग की रिपोर्ट को देश पर हमला करार देकर तनाव की स्थिति तो बनाई जा सकती है लेकिन उसे देश की आर्थिकी को नहीं बचाया जा सकता है। इसलिये अब प्रधानमन्त्री देश के सामने सही स्थिति रखने और विपक्ष के प्रश्नों का प्रमाणित जवाब देने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं बचा है।

ऐसे नहीं होगा व्यवस्था परिवर्तन

हिमाचल को पूर्ण राज्य बने 53 वर्ष हो गये हैं । 25 जनवरी 1971 को प्रदेश की आबादी 3460434 थी जो आज आधार कार्ड के अनुसार 7316708 हो गयी है। 53 वर्षों के इस सफर में प्रदेश में शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी और सड़क जैसे हर क्षेत्र में पर्याप्त तरक्की की है। इसमें सरकार तथा प्राइवेट सैक्टर दोनों ने पूरा योगदान दिया है। हर तरह के उद्योग प्रदेश में स्थापित हुए हैं । इस दौरान रही सारी सरकारों ने प्रदेश के विकास में भरपूर योगदान दिया है। किसी को भी कम करके आंकना सही नहीं होगा । लेकिन आज 53 वर्ष के बाद जो सरकार आयी है उसने यह घोषित किया है की व्यवस्था बदलने आयी है राज करने नहीं । सुक्खू सरकार और उनकी कांग्रेस पार्टी को यह लगा है कि अब व्यवस्था बदलने की आवश्यकता है। ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी मुख्यमंत्री ने अपनी सरकार का नीति सूत्र व्यवस्था बदलना कहा हो। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि प्रदेश की वर्तमान स्थितियों पर एक निष्पक्ष नजर डाल ली जाये। क्योंकि व्यवस्था राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासन दोनों के तालमेल और विजन का प्रतिफल होता है। हर सरकार प्राय अपने दृष्टि पत्र जारी करती रही है । लंबें भविष्य तक के दृष्टि पत्र प्रशासन से तैयार करवा कर जारी हुए हैं। हर सरकार ने उद्योग नीतियां बदली है। लेकिन आज तक ऐसा एक बार भी नहीं हुआ है कि किसी भी सरकार ने अपने कार्यकाल के अंत इस आशय का कोई श्वेत पत्र जारी किया हो।
आज तक जो भी विकास प्रदेश में हुआ है उसके बाद आज प्रदेश 75000 करोड के कर्ज तक पहुंच गया है । कैग के मुताबिक लिये जा रहे कर्ज का 74% कर्ज की वापसी पर खर्च हो रहा है । प्रदेश के हर नागरिक पर करीब 1.25 लाख का कर्ज भार खड़ा है । इतने कर्ज के बाद भी प्रदेश बेरोजगारी में देश के पहले छः राज्यों में शामिल है । 1971 से 1980 तक प्रदेश पर कोई कर्ज नहीं था यह 1998 में धूमल सरकार द्वारा विधानसभा सदन में रखे श्वेत पत्र से सामने आ चुका है। उसके बाद आयी किसी भी सरकार ने ऐसा श्वेत पत्र जारी करके प्रदेश की वास्तविक स्थिति से परिचित नहीं करवाया है । आज सुक्खू सरकार ने भी अपने पहले ही विधानसभा सत्र में वित्तीय कुप्रबंधन के आरोप पिछली सरकार पर लगाये हैं । पिछली सरकार पर करीब ग्यारह हजार करोड़ की वेतन और पैंशन की देनदारी छोड़ने का आरोप लगाया गया है । लेकिन प्रशासनिक स्तर पर इस कुप्रबंधन के लिये किसी की भी जिम्मेदारी तय नहीं की गयी है। बल्कि उसी शीर्ष प्रशासन को आगे बढ़ाया गया है जो इस कुव्यवस्था का बड़ा भागीदार रहा है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि इसी प्रशासनिक तंत्र के सहारे व्यवस्था कैसे बदली जायेगी।
कांग्रेस ने चुनाव से पहले जनता को दस गारंन्टियां जारी करके यह भरोसा दिलाया था कि वह उसकी वित्तीय स्थिति सुधारने के लिये यह कदम उठायेगी । इस वायदे के मुताबिक मंत्रिमंडल की पहली बैठक में इस आशय के फैसले भी लिये गये हैं। 73 लाख की आबादी में से कितनों को व्यवहारिक रुप से लाभ पहुंचेगा इसका आंकड़ा तो बाद में आयेगा । लेकिन अभी बजट से पहले ही जो डीजल के दाम और नगर निगम क्षेत्रों में पानी की दरों में जो बढ़ौतरी की गयी है उसका असर तो हर नागरिक पर पड़ेगा । युवाओं को रोजगार कैसे उपलब्ध करवाया जायेगा इसकी रूपरेखा एक मंत्री कमेटी तैयार कर रही है। लेकिन अधीनस्थ सेवाएं चयन बोर्ड से जो युवा परीक्षाएं पास करके नौकरी पाने के कगार पर पहुंच चुके थे वह अब निराश होकर आंसू बहाने पर पहुंच गये हैं । पूरी जनता ने यह आंसू देखे हैं । निकट भविष्य में इसका कोई समाधान निकलता नजर नहीं आ रहा है। सरकार के पास दैनिक खर्च चलाने के लिये पैसा नहीं है यह एक वरिष्ठ मंत्री का ब्यान है । इस सरकार को भी कर्ज लेकर खर्च चलाना पड़ रहा है।
सरकार की इस व्यवहारिक स्थिति के परिदृश्य में जब आम आदमी के सामने मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्तियां और कुछ दूसरे लोगों को की कैबिनेट रैंक में हो रही ताजपोशीयां आ रही हैं तब उसका विश्वास भ्रमित होना स्वाभाविक हो जाता है। जबकि राजस्व और बिजली में ही कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जिन पर काम करने से प्रदेश को कर्ज से भी मुक्ति दिलाई जा सकती है। कल्याणकारी राज्य की अवधारणा में शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय हर व्यक्ति को निशुल्क उपलब्ध होना चाहिये और प्रदेश में यह किया जा सकना बहुत संभव है । इसके लिए सही अध्ययन और राय की आवश्यकता है। इस समय यदि सरकार ने अपने कदम नहीं सुधारें तो आने वाला समय बड़ा कठिन हो जायेगा और व्यवस्था परिवर्तन एक जुमला बनकर रह जायेगा।

जन अपेक्षाओं के आईने में भारत जोड़ो यात्रा

राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा तीन हजार आठ सौ किलोमीटर का सफर करीब पांच माह में पूरा करके पूर्ण होने जा रही है। आज की परिस्थितियों में यदि कोई राजनेता इस तरह की यात्रा का संकल्प लेकर उसे पूरा करके दिखा दे तो निश्चित रूप में यह मानना पड़ेगा कि उस नेता में कुछ तो ऐसा है जो उसे दूसरे समकक्षों से कहीं अलग पहचान देता है। इस यात्रा को यदि तपस्या का नाम दिया जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। क्योंकि पांच माह तक हर रोज करीब पचीस किलोमीटर पैदल चलना और रास्ते में प्रतिदिन सैकड़ों लोगों से संवाद स्थापित करना तथा मीडिया से भी आमने सामने होना कोई आसान काम नहीं है। राहुल गांधी के इस इतिहास को कोई दूसरा नेता लांघ सकेगा ऐसा नहीं लगता। इतनी लम्बी यात्रा में बिना थकान, शांत बने रहकर समाज के हर वर्ग की बात सुनना, उसे राष्ट्रीय प्रश्नों के प्रति जागरूक करना अपने में ही एक बड़ा स्वाध्याय और सीख हो जाता है। पांच माह में यह यात्रा बारह राज्यों और दो केन्द्र शासित राज्यों से होकर गुजरी है। एक सौ उन्नीस सहयात्रियों के साथ शुरू हुई इस यात्रा में रास्ते में कैसे हजारों लाखों लोग जुड़ते चले गये वही इस यात्रा को एक तपस्या की संज्ञा दे देता है। इसी से यह यात्रा अनुभव और ज्ञान दोनों का पर्याय बन जाती है। राहुल ने स्वयं इस यात्रा को नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान करार दिया है।
राहुल एक सांसद हैं और अपनी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं। इस नाते देश की जनता के प्रति उनकी एक निश्चित जिम्मेदारी है। इस जिम्मेदारी के नाते देश की समस्याओं को आम जनता के सामने रखना और उन पर जनता की जानकारी और प्रतिक्रिया को जानना एक आवश्यक कर्तव्य बन जाता है। इन समस्याओं पर जनता से सीधा संपर्क बनाना उस समय और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब लोकतांत्रिक मंच संसद और मीडिया में ऐसा करना कठिन हो गया हो। देश जानता है कि आज प्रधानमंत्री राष्ट्रीय समस्याओं पर जनता से सार्थक संवाद स्थापित नहीं कर पा रहे हैं। क्योंकि मन की बात में अपनी ही बात जनता को सुनायी जा रही है। लेकिन जनता के मन में क्या है उसे सुनने का कोई मंच नहीं है। यहां तक की पिछले आठ वर्षों में मीडिया से भी खुले रुप में कोई संवाद नहीं हो पाया है। यही कारण है कि नोटबन्दी पर आम आदमी का अनुभव क्या रहा है उसकी कोई सीधी जानकारी प्रधानमन्त्री को नहीं मिल पायी है। जीएसटी का छोटे दुकानदार पर क्या प्रभाव पड़ा है और जीएसटी के करोड़ों के घपले क्यों हो रहे हैं। कोविड में आपदा को किन बड़े लोगों ने अवसर बनाया और ताली-थाली बजाने तथा दीपक जलाने पर आम आदमी की प्रतिक्रिया क्या रही है? आज सर्वोच्च न्यायालय में सरकार को शपथ पत्र देकर बार-बार यह क्यों कहना पड़ा है कि वैक्सीनेशन ऐच्छिक थी अनिवार्य नहीं? इसके प्रभावों/ कुप्रभावों की जानकारी रखना वैक्सीनेशन लेने वाले की जिम्मेदारी थी।
अन्ना आन्दोलन में जो लोकपाल की नियुक्ति जन मुद्दा बन गयी थी उसकी व्यवहारिक स्थिति आज क्या है। 2014 के चुनावों में हर भारतीय के खाते में पंद्रह लाख आने का वादा जुमला क्यों बन गया। सार्वजनिक बैंकों से लाखों करोड़ का कर्ज लेकर भाग जाने वालों के खिलाफ आज तक कोई प्रभावी कारवाई क्यों नहीं हुई। जब चीन के साथ रिश्ते सौहार्दपूर्ण नहीं है तो फिर उसके साथ व्यापार लगातार क्यों बढ़ रहा है। दो करोड़ नौकरियां देने का वादा पूरा न होने पर देश के युवा की प्रतिक्रिया क्या है? महंगाई से आम आदमी कैसे लगातार पीड़ित होता जा रहा है? आज के इन राष्ट्रीय प्रश्नों पर दुर्भाग्य से प्रधानमन्त्री या उनके किसी दूसरे निकट सहयोगी का जनता से सीधा संवाद नहीं रह गया है। इस वस्तुस्थिति में आज देश को एक ऐसे राजनेता की आवश्यकता है जो जनता के बीच जाकर उससे सीधा संवाद बनाने का साहस दिखाये। राहुल गांधी ने पांच माह में कन्याकुमारी से कश्मीर तक पैदल चलकर एक संवाद स्थापित किया है जो उनका कोई भी समकक्ष नहीं कर पाया है। इसलिये यह उम्मीद की जानी चाहिये कि वह जन अपेक्षाओं पर खरे उतरेंगे।

क्या हिमाचल जोशीमठ त्रासदी से सबक लेगा

जोशीमठ धंस रहा है। घरों और सड़कों तक हर जगह दरारें आ गयी हैं। यहां रहना जोखिम भरा हो गया है। पीड़ितों और प्रभावितों को दूसरे स्थानों पर बसाना प्राथमिकता बन गया है। देश के हर नागरिक का ध्यान इस ओर आकर्षित हुआ है और इसी से कुछ राष्ट्रीय प्रश्न भी उभर कर सामने आये हैं। यह सवाल उठ रहा है कि क्या जोशीमठ की यह त्रासदी अचानक घट गयी जिसका कोई पूर्व आभास ही नहीं हो पाया या फिर विकास के नाम पर पूर्व चेतावनीयों को नजरअन्दाज करने का यह परिणाम है ? क्या देश के सभी पर्यटक स्थल बने हिल स्टेशनों की देर सवेर यही दशा होने वाली है ? जोशीमठ क्षेत्र के विकास को लेकर एक समय संसद के अन्दर स्व. श्रीमती सुषमा स्वराज का वक्तव्य इस दिशा में बहुत कुछ कह जाता है। पहाड़ी क्षेत्रों के विकास के क्या मानक होने चाहिये इस पर दर्जनों भूवैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों के शोध उपलब्ध हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में निर्माण के क्या मानक होनी चाहिये? प्रदूषण के विभिन्न पक्षों को कैसे नियंत्रित और सुनिश्चित किया जायेगा इसके लिए केन्द्र से लेकर राज्यों तक सभी जगह प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का गठन हो चुका है। बड़ी परियोजनाओं की स्थापना से पहले उन्हें पर्यावरण से जुड़ी हर क्लीयरैन्स हासिल करना अनिवार्य है। जोशीमठ का जब विकास हो रहा था और उस क्षेत्र में बड़ी परियोजनाएं स्थापित की जा रही थी और बड़ी-बड़ी सुरंगों का निर्माण हो रहा था तब यह सारे अदारे वहां कार्यरत थे। आज जोशीमठ क्षेत्र की इस त्रासदी के लिये इन्हीं परियोजना और निर्माणों को मूल कारण माना जा रहा है। इस परिपेक्ष में यह सवाल जवाब मांगता है कि जब यह विकास हो रहा था बड़ी परियोजनाओं और सुरंगे बन रही थी तब क्या इन अदारों ने पर्यावरण और विज्ञान से जुड़ी सारी अनिवार्यताओं की पूर्ति सुनिश्चित की थी या नहीं? क्या बाद में किसी के प्रभाव/दबाव में आकर इन अनिवार्यताओं की सुनिश्चितत्ता से समझौता कर लिया गया? इस समय इस पक्ष पर निष्पक्षता से जांच की आवश्यकता है। ताकि दोषियों को सार्वजनिक रूप से अनुकरणीय सजा दी जा सके।
आज जोशीमठ की तर्ज पर ही हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्र ऐसी ही आपदा के मुहाने पर खड़े है।ं प्रदेश के आपदा सूचना प्रवाह प्रभाग की सूचनाओं के अनुसार पिछले करीब दो वर्षों से प्रदेश के विभिन्न भागों में प्रायः औसतन हर रोज एक न एक भूकंप आ रहा है। प्रदेश भूकंप जोन पांच में है। सरकार की अपनी रिपोर्टों के मुताबिक राजधानी नगर शिमला भूकंप के मुहाने पर बैठा है।
1971 में शिमला के लक्कड़ बाजार क्षेत्र में जो नुकसान हुआ था उसके अवशेष आज भी उपलब्ध हैं। ऐतिहासिक रिज का एक हिस्सा हर वर्ष धंसाव का शिकार हो रहा है। इस स्थिति का कड़ा संज्ञान लेते हुये एन.जी.टी. ने नये निर्माणों पर रोक लगा रखी है। लेकिन एन.जी.टी. की इस रोक की अवहेलना स्वयं सरकार और मुख्यमन्त्री के सरकारी आवास से शुरू हुई है। एन.जी.टी. के फैसले के बाद हजारों भवन ऐसे बने हैं जो इन आदेशों की खुली अवहेलना हैं। पिछली सरकार एन.जी.टी. के आदेशों को निष्प्रभावी बनाने के लिये शिमला का विकास प्लान लेकर आयी थी। लेकिन एन.जी.टी. ने इस प्लान को रिजैक्ट कर दिया है। इस कारण फैसले के बाद बने हजारों मकानों पर नियमों की अवहेलना के तहत कारवायी होनी है। लेकिन वोट की राजनीति के चलते कोई भी राजनीतिक दल सत्ता में आकर ऐसी कारवायी करने से बचना चाहता है। जबकि सरकार की अपनी ही रिपोर्ट के मुताबिक शिमला में भूकंप के हल्के से झटके में ही तीस हजार से ज्यादा लोगों की जान जायेगी और अस्सी प्रतिश्त निर्माणों को नुकसान पहुंचेगा। ऐसे में यह देखना रोचक होगा कि हिमाचल सरकार जोशीमठ से कोई सबक लेती है या नहीं।

कर्ज का जुगाड़ विकास का मानक नहीं है

क्या प्रदेश का संचालन कर्ज लिये बिना नहीं हो सकता ? यह सवाल इसलिये उठ रहा है क्योंकि सुक्खू सरकार ने अपने पहले ही विधानसभा सत्र में राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबन्धन एक्ट में संशोधन करके प्रदेश सरकार की कर्ज लेने की सीमा बढ़ाने का प्रबन्ध कर लिया है। अब तक नियम था कि राज्य सरकार सकल घरेलू उत्पादन का तीन प्रतिशत तक ही कर्ज ले सकती है। अब इस अधिनियम में संशोधन करके कर्ज की यह सीमा बढ़ा दी गयी है। कर्ज की सीमा बढ़ाना वित्तीय कुप्रबन्धन का सीधा प्रमाण माना जाता है। मार्च 2022 में ही यह स्थिति जीडीपी के छः प्रतिशत तक पहुंच गयी थी। सदन के पटल पर आये रिकॉर्ड के मुताबिक प्रदेश की वित्तीय स्थिति वर्ष 2020-21 में ही बिगड़ गयी थी जो लगातार गहराती चली गयी। क्योंकि केन्द्र सरकार से जो राजस्व घाटा अनुदान प्रदेश को मिलता था वह बन्द हो गया है। जीएसटी की प्रतिपूर्ति मिलनी थी वह केन्द्र से नहीं मिल रही है और इसके कारण करीब तीन हजार करोड का प्रदेश को नुकसान हो चुका है। केन्द्र प्रदेश को यह हक देने की बजाये कर्ज लेने के लिये प्रोत्साहित करता रहा है। इसलिये पिछली सरकार सबसे अधिक कर्ज लेने वाली सरकार बन गयी। इन केन्द्रीय अनुदानों की स्थिति सुक्खू सरकार के लिये भी ऐसी ही रहने वाली है। प्रदेश कर्ज लेने की सीमाएं लांघ चुका है और केन्द्र का वित्त विभाग इसकी चेतावनी भी प्रदेश को बहुत पहले जारी कर चुका है। यह चेतावनी का पत्रा हम अपने पाठकों के सामने रख चुके हैं। आज कर्ज की किश्त चुकाने के लिये भी कर्ज लेने की नौबत आ चुकी है। सुक्खू सरकार को अपने संसाधन बढ़ाने के लिये डीजल पर प्रति लीटर तीन रूपये वैट बढ़ाना पड़ा है। इस बढ़ौतरी का हर सामना की ढुलाई पर असर पड़ेगा जिसके परिणामवश महंगाई बढ़ेगी। इस परिदृश्य में जब इस सरकार को अपने चुनावी वायदे पूरे करने पड़ेंगे तो स्वभाविक रूप से धन का प्रबन्ध करने के लिए सेवाओं के दाम बढ़ाने और कर्ज लेने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं होगा। परन्तु यह करने से लोगों में रोष पनपेगा और सरकार की विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल खड़े हो जायेंगे। इस स्थिति में चुनावी वादे पूरे कर पाना आसान नहीं होगा। ऐसे में यह सवाल बड़ा अहम हो जाता है कि सरकार अपने वादे भी पूरे कर दे और जनता पर कर्ज का बोझ भी न पड़े। इसके लिये सबसे पहले प्रदेश की वित्तीय स्थिति पर श्वेत पत्र जारी करके जनता को वस्तुस्थिति से अवगत करवाना होगा। इसी के साथ सरकार की प्राथमिकताओं का भी नये सिरे से निर्धारण करना होगा। प्रदेश की जनता को यह बताना होगा कि पिछली सरकार ने कर्ज का यह पैसा कहां खर्च किया? क्योंकि कर्ज लेकर दान नहीं दिया जाता है। इसी के साथ भ्रष्टाचार को बेनकाब करके दोषियों के खिलाफ कढ़ी कारवाही करनी होगी। क्योंकि डबल इंजन की सरकार से जब प्रदेश को उसका हक भी नहीं मिला है तो इसकी जानकारी जनता के सामने रखना आवश्यक हो जाता है। यह जानकारी सामने रखने के साथ ही अपने अनावश्यक खर्चों पर भी लगाम लगानी पड़ेगी। आज जब सरकार ने राजनीतिक सन्तुलन बनाने के लिये मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्तियां की है तो यह बताना होगा कि ऐसा करने की आवश्यकता क्यों पड़ी। जबकि पिछली दो सरकारों में ऐसी राजनीतिक नियुक्तियां नहीं की गयी थी। जनता में इन नियुक्तियों का कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा है। इन नियुक्तियों के वैधानिक पक्ष को यदि छोड़ भी दिया जाये तो भी राजनीतिक रूप से भी इसका अच्छा प्रभाव नहीं पड़ा है। क्योंकि चुनाव के दौरान जो आरोप पत्र ‘‘लूट की छूट’’ के नाम से जारी किया गया था उसकी दिशा में इस एक माह के समय में कोई कदम उठाने का संकेत तक नहीं आया है। जबकि सरकार लगातार व्यवस्था बदलने की दिशा में काम करने की बातें कर रही है लेकिन व्यवहारिक रूप से उसके प्रशासनिक फैसलों से इस तरह के कोई संकेत सामने नहीं आये हैं। जनता सरकार की हर चीज पर नजर रख रही है क्योंकि इस सत्ता परिवर्तन में कांग्रेस के नेताओं से ज्यादा योगदान दूसरे लोगों का रहा है। आज जयराम सरकार पर सबसे ज्यादा कर्ज लेने का आरोप इसलिये लग रहा है कि उसने प्रदेश के वित्तीय प्रबन्धन से जुड़े तन्त्र पर आंख बन्द करके विश्वास कर लिया था। कर्ज लेना विकास का कोई मानक नहीं है। बल्कि कर्ज लेकर घी पीने का पर्याय बन चुका है।

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