Friday, 16 January 2026
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कर्ज, मंहगाई और बेरोजगारी बनाम विकास


प्रदेश की तीन विधानसभा और एक लोकसभा सीट के लिये उपचुनाव हो रहे है। इन उपचुनावों के लिये प्रदेश के बारह में से आठ जिलों में चुनाव आचार संहिता लागू है । प्रदेश के 68 विधानसभा क्षेत्रों में से 20 में मतदान होगा। विधान सभा के लिये आम चुनाव दिसम्बर 2022 में होना है वैसे यह संभावना भी बनी हुई है कि कहीं यह आम चुनाव तय समय से पहले ही उतर प्रदेश के चुनावों के साथ ही फरवरी-मार्च में ही न करवा लिये जायें। इस व्यवहारिक स्थिति को सामने रखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि इन उपचुनावों के परिणाम आने वाले आम चुनावों के परिणामों का भी साफ और स्पष्ट संकेत एवम संदेश होंगे। 2014 के लोकसभा चुनावों से लेकर 2017 के विधानसभा और फिर 2019 के लोकसभा के लिये हुए प्रदेश के सारे चुनाव भाजपा ने ही जीते हैं यह एक व्यवहारिक सच है। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि 2014 से लेकर 2021 में हुए बंगाल चुनावों से पहले तक प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के नाम पर भाजपा हर चुनाव जीतती आयी है। जहां जीत नही पायी वहां पर तोड़ फोड़ से सरकार बना ली। बंगाल चुनावों में पहली बार नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, जगत प्रकाश नड्डा और आर एस एस के नाम पर ऐसी हार मिली है जिसने मोदी है तो मुनकिन है की धारणा को बुरी तरह तोड़कर रख दिया है। बंगाल चुनावों के बाद जो भी चुनाव देश में हांगे उन पर बंगाल की हार का साया साफ देखने को मिलेगा यह भी स्पष्ट है। क्यांकि बंगाल चुनावों के बाद मोदी सरकार के सारे आर्थिक और राजनीतिक फैसले चर्चा में आ गये हैं। बढ़ती मंहगाई बेराजगारी, भ्रष्टाचार और कर्ज ने आम आदमी को इसके कारणों पर विचार करने के लिये बाध्य कर दिया है।हिमाचल में हो रहे इन उपचुनावों को भी इसी आईने में देखना होगा। विपक्ष मंहगाई और बेरोजगारी को मुद्दा बना रहा है। भाजपा और उसकी सरकार इस दौरान हुए विकास के नाम पर जनता से समर्थन मांग रही है। इसलिये सरकार के विकास के दावे को बिना किसी पूर्वाग्रह को परखना आवश्यक हो जाता है। जयराम सरकार ने दिसम्बर 2017 में चुनाव जीतकर जनवरी 2018 में प्रदेश की सता संभाली और 9 मार्च को विधानसभा में अपना पहला बजट भाषण पढ़ा़। मुख्यम़न्त्री जयराम ठाकुर ने अपने पहले बजट भाषण में यह आंकड़े रखे थें कि दिसम्बर 2017 में प्रदेश का कर्जभार 46385 करोड़ हो गया था जो कि पिछले पांच वर्षां की तुलना में 246% अधिक था। जयराम ने यह आरोप लगाया था कि वीरभद्र सरकार ने 18787 करोड़ का अतिरिक्त ऋण लिया था। दिसम्बर 2012 में सरकार छोड़ते समय यह कर्ज 27598 करोड़ था जो आज 46385 करोड़ हो गया है। लेकिन आज जयराम के ही चार वर्षां से भी कम समय में यह कर्ज 65000 करोड़ से पार चला गया है। जितना कर्ज वीरभद्र सरकार ने पांच वर्षां में लिया था उससे ज्यादा यह सरकार साढ़े तीन वर्षां मे ले चूकी हैं। यह कर्ज लेने के बावजूद इस सरकार को उपचुनाव घोषित होने के बाद खाद्य तेलों की कीमत बढ़ानी पड़ी है। आज प्रदेश भर में सड़कां की हालत क्या है यह किसी से छूपी हुई नही है। स्कूलों में अध्यापक नही है और अस्पताल में डाक्टर नही है। इस पर प्रदेश उच्च न्यायालय कई बार चिन्ता व्यक्त कर चुका है। रोजगार के जो आंकड़े आर्थिक सर्वेक्षण के माध्यम से विधानसभा पटल पर रखे गये हैं उनके मुताबिक 2019 में सरकार में नियमित कर्मचारियों की संख्या 1,81,231 थी जो 2020 में 1,81,430 हो गयी है। जिसका अर्थ है कि एक वर्ष में केवल 200 लोगो को नियमित रोजगार मिल पाया है। पार्ट टाईम 2019 में 3334 थे जो 2020 में 3619 हो गये। दैनिक वेतन भोगी 2019 में 7253 थे जो 2020 में 6256 रह गये हैं। यह सदन में रखे आंकड़े हैं । इनके अतिरिक्त जो भी और रोजगार दिया गया है वह सारा आउट सोर्स के माध्यम से है जिसमें रोजगार का माध्यम बनने वाली कम्पनी को हर व्यक्ति पर कमीश्न मिलता है। आज प्रदेश में आउटसोर्स के व्यापार में लगी कम्पनियों की संख्या 100 से ज्यादा हो गयी है। और इन्हें कमीश्न के नाम पर करोड़ों रूपये मिल रहे हैं। आउट सोर्स के माध्यम से लगने वाले कर्मचारी नियमित नही हो सकते क्योंकि वह सरकार के कर्मचारी है ही नही। ऐसे में आउटसोर्स के माध्यम से मिले रोजगार को क्या शोषण की संज्ञा नही दी जानी चाहिये।
मंहगाई के कारण आज पैट्रोल और रसोई गैस के दाम कहां पहुंच गये है यह किसी से छिपा नही है। लेकिन सरकार मंहगाई को यह कहकर जायज़ ठहरा रही है कि यह तो कांग्रेस के समय भी बढ़ी थी परन्तु यह नही बता रही कि तब गैस सिलैन्डर 450 रूपये मिलता था जो आज 1000 से उपर हो गया है। 2014 में जो बैंकों में जमा पुजी पर ब्याज मिलता था वह आज आधा रह गया है। क्योंकि आज बढ़ते एन पी ए के कारण सरकार को बैड बैंक बनाना पड़ गया है। बैड बैंक का स्पष्ट अर्थ है कि देश की बैंकिग व्यवस्था कभी भी फेल हो सकती है। लेकिन सरकार इन कारणों को जनता में ला नही पा रही है। क्योंकि इससे सरकार की आर्थिक नीतियां पर एक सार्वजनिक बहस छिड़ जायेगी जो सरकार के लिये घातक होगी। ऐसे में मंहगाई बेरोजगारी और बढ़ता कर्ज सबके सामने है। अब देखना यह है कि जनता इस सबके बाद भी सरकार को समर्थन देती है या नही।

सरकार की हताशा का प्रमाण है लखीमपुर प्रकरण

किसान आन्दोलन को लम्बाने और असफल बनाने के जितने भी प्रयास किये जायेंगे उससे सरकार के प्रति आम आदमी का रोष उतना ही बढ़ता जायेगा यह लखीमपुर प्रकरण सें प्रमाणित हो गया है। क्योंकि इस प्रकरण से पहले जिस भाषा और तर्ज में गृह राज्य मन्त्री ने किसानों को सबक सिखाने की चेतावनी दी थी उसका विडियो सामने आने से यह स्पष्ट हो जाता है कि सरकार आन्दोलन को हिंसा से कुचलना चाहती थी। प्रकरण घट जाने के बाद जिस तरह मन्त्री अजय मिश्रा अपने बेटे के घटना स्थल पर होने से ही इन्कार कर रहे थे उसका सच भी तब सामने आ गया जब क्राईम ब्रांच ने मन्त्री के पुत्र को लम्बी पूछताछ के बाद इस कारण गिरफ्तार किया कि वह जांच में सहयोग नही दे रहा था। पुलिस के सवालों का जबाव नही दे रहा था। क्राईम ब्रांच की पूछताछ में शामिल होने के लिये आशीष मिश्रा अपने साथ दो वकील लेकर गया था। इसलिये वह पुलिस पर किसी भी तरह का दबाव डालने का आरोप नही लगा सकता। आशीष मिश्रा की गिरफ्तारी के बाद उनके पिता गृह राज्य मन्त्री अजय मिश्रा के त्याग पत्र की मांग बढ़ती जा रही है और बहुत संभव है कि प्रधानमन्त्री उनका त्याग पत्र भी ले लें।
इस लखीमपुर प्रकरण से यह प्रमाणित हो गया है कि किसान आन्दोलन को किसी भी तरह की हिंसा से दबाना संभव नही होगा। 26 जनवरी को भी इसी तरह का प्रयास हुआ था। उससे पहले जिस तरह सड़क पर कीलें गाडकर रोकने का प्रयास किया गया था वह भी सारे देश ने देखा है। जो आन्दोलन जायज मुद्दों पर आधारित होते हैं और हर छोटे-बडे़ को एक समान प्रभावित करते हैं ऐसे आन्दोलन किसी भी डर से उपर हो जाते हैं। ऐसे आन्दोलन को राजनीति से प्रेरित करार देना अपने आपको धोखा देना हो जाता है। राजनीति द्वारा प्रायोजित आन्दोलन और उनके नेतृत्व का अन्तिम परिणाम अन्ना आन्दोलन जैसा होता है। नेता आन्दोलन स्थल तक आने का साहस नही कर पाता है। अन्ना और ममता के साथ यही हुआ था। इसलिये आज सरकार और उसके हर समर्थक को यह अहसास हो गया होगा कि किसानों की मांगे मानने के अतिरिक्त और कोई विकल्प शेष नही रह गया है। क्योंकि इस सरकार के सारे आर्थिक फैसले केवल कुछ अमीर लोगों को और अमीर बनाने वाले ही प्रमाणित हुए हैं। मोदी सरकार ने मई 2014 में अच्छे दिन लाने के साथ देश की सत्ता संभाली थी। लेकिन आज यह अच्छे दिन पैट्रोल सौ रूपये और रसोई गैस एक हजार रूपये से उपर हो जाने के रूप में आये हैं। 2014 में बैंक जमा पर जो ब्याज देते थे वह आज 2021 में उससे आधा रह गया है। आज भी 19 करोड़ से ज्यादा लोग रात को भूखे सोते हैं और इस सच को पूर्व केन्द्रीय मन्त्री शान्ता कुमार ने अपनी आत्म कथा में स्वीकारा है। सरकार की आर्थिकी नीतियों ने सरकार को बैड बैंक बनाने पर मजबूर कर दिया है। किसी भी सरकार के आर्थिक प्रबन्धन पर बैड बैंक के बनने से बड़ी लानत कोई नही हो सकती है।
इस परिप्रेक्ष में यदि कृषि कानूनों पर नजर डालें तो जब यह सामने आता है कि सरकार ने कीमतों और होर्डिंग पर से अपना नियन्त्रण हटा लिया है तो और भी स्पष्ट हो जाता है कि गरीब आदमी इस सरकार के ऐजैण्डों मे कहीं नही है। जो पार्टी किसी समय स्वदेशी जागरण मंच के माध्यम से एफ डी आई का विरोध करती थी आज उसी की सरकार रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में भी एफ डी आई ला चुकी है। आज सैंकड़ों विदेशी कम्पनियां देश के आर्थिक संसाधनों पर कब्जा कर चुकी हैं। कृषि में कान्ट्रैक्ट फारमिंग लाकर इस क्षेत्र को भी मल्टीनेशनल कम्पनियों को सौंपने की तैयारी की गई है। इसलिये आज इन कृषि कानूनों का विरोध करना और सरकार को इन्हें वापिस लेने पर बाध्य करना हर आदमी का नैतिक कर्तव्य बन जाता है। आर्थिकी को प्रभावित करने वाले फैसलों को राम मन्दिर, तीन तलाक, धारा 370 हटाने के फैसलों से दबाने का प्रयास आत्मघाती होगा। बढ़ती कीमतों और बढ़ती बेरोजगारी ने आम आदमी को यह समझने के मुकाम पर ला दिया है कि सरकार की इन उपलब्धियां का कीमतों के बढ़ने से कोई संबंध नही है। इसलिये सरकार को यह कानून वापिस लेने का फैसला लेने में देरी करना किसी के भी हित में नही होगा।

क्यों बनाना पड़ा बैड बैंक

पिछले दिनों मोदी सरकार ने बैड बैंक (Bad Bank) की स्थापना की है और केन्द्र सरकार ने इसमें 36000 करोड़ निवेश करके इसकी शुरूआत कर दी है। भारत में यह प्रयोग पहली बार किया जा रहा है। वैसे वित मंत्री निर्मला सीतारमण इस पर 2017 से विचार कर रही थी। लेकिन अभी सितंबर माह में ही एन पी ए को लेकर जो रिपोर्ट ऐसोचेम और क्रिसील की आयी है उसके बाद यह कदम तुरंत प्रभाव से उठा लिया गया है इसके परिणाम कैसे रहते हैं यह तो आने वाले समय में ही पता चलेगा। वैसे यह प्रयोग पहली बार 1988 में अमेरिका के एक बैंक समूह में हुआ था। उसके बाद 2012 में स्पेन, फीनलैंड, स्वीडन, बैल्जियम और इण्डोंनेशिया में हो चुके हैं लेकिन यह प्रयोग बहुत सफल नहीं रहे हैं। बहुत संभव है कि अधिकांश पाठकों को यह जानकारी ही नहीं है कि यह बैड बैंक की अवधरणा है क्या और इसे स्थापित करने की आवश्यकता क्यों पडती है तथा इसका देश की आर्थिकी पर क्या प्रभाव पडता है। बैड बैंक का सीधा संबंध बैड लोन से हो जाता है जब बैंकों का एन पी ए एक ऐसी सीमा तक पहुंच जाता है जो उनके प्रबंधन के वश में नहीं रहता और उससे बैंको का सामान्य काम काज भी प्रभावित हो जाता है तथा उसे बट्टे खाते में डालकर भी स्थिती सुधारने की संभावना ना रहे तब बैड बैंक का प्रयोग अंतिम विकल्प रह जाता है। किसी भी बैंक या अन्य वितीय संस्थान द्वारा दिए गए कर्ज की वापसी आनी रूक जाती है और ऐसा लगातार तीन माह तक चलता रहे तथा कर्ज वापसी की सारी संभावनाएं धूमिल हो जाऐं तब ऐसे कर्ज को बैंक बैड बैंक को बेच देता है। ऐसे कर्ज को घाटे में बेचा जाता है। इससे कर्ज देने वाले बैंक के रिकार्ड से एन पी ए का दाग हट जाता है और उसकी वर्किंग सामान्य हो जाती है।
दूसरी ओर अब इस कर्ज को वसूलने की सारी जिम्मेवारी बैड बैंक की हो जाती है। बैड बैंक कर्जदार की समंपत्तियां बेचे या गांरटी देने वालां से वसूली करे यह सब बैड बैंक की अपनी कार्यशैली पर निर्भर करता है। यह सब करने के बावजूद भी यदि कुछ कर्ज की वसूली न हो पाये तो इसकी भरपाई करने की गांरटी सरकार की होती है। इस तरह बैड बैंक बैड लोन की वसूली करने का एक और मंच बन जाता है। ऐसे में जो सवाल खडें होते हैं कि जब किसी सरकार को बैड बैंक बनाने की स्थिति खडी हो जाती है तो उसका अर्थ होता है कि अधिकांश बैंक फेल होने के कगार पर पहुंच गये हैं। यह बैंक अपना काम जारी रख पाने की स्थिती में नहीं रह गये हैं। इन्हें लोगों के जमा पर ब्याज घटाने और कर्ज देने की ब्याज दर बढ़ाने की अनिवार्यता हो जाती है। बल्कि नये कारोबार के लिए यह ऋण देने की स्थिती में नहीं रह गए होते हैं। ऐसी स्थिती में ही मंहगाई और बेरोजगारी लगातार बढ़ती चली जाती है। इस समय देश ऐसी ही स्थिती से गुजर रहा है। यह मंहगाई और बेरोजगारी सरकार के नियंत्रण से पूरी तरह बाहर हो जायेगी। इस स्थिति पर कैसे नियंत्रण पाया जाए इस पर विचार करने से पहले कर्ज और एन पी ए के आंकडो पर नजर डालना आवश्यक हो जाता है।
वर्तमान सरकार ने 2014 में सत्ता संभाली थी। उस समय केंद्र सरकार का कर्ज 53.11 लाख करोड़ था जो आज बढ़कर 150 लाख करोड़ से उपर हो गया है। उस समय बैंकों का कुल एन पी ए 2,24,542 करोड़ था जो आज बढ़कर दस खरब करोड़ हो गया है। दिसम्बर 2017 में यह एन पी ए 7,23,513 करोड़ था। यह आंकडे आर टी आई में सामने आये है। 2018 में सरकार ने एक योजना शु़रू की थी प्रधानमंत्री मुद्रा ऋण योजना। इसमें 59 मिनट में एक करोड़ का कर्ज देने की घोषणा की गयी थी। इस योजना के तहत 2019 के मध्य तक खुले मन से बैंको ने एम एस एम ई के लिये कर्ज बांटे हैं। 2019 में ही लोकसभा के लिये चुनाव हुए जिनमें भारी बहुमत से भाजपा फिर सता में आ गयी। अब जो आर टी आई में एन पी ए की सूचना आयी है उसके मुताबिक एम एस एम ई के लिए प्रधानमंत्री मुद्रा ऋण योजना में जो कर्ज दिया गया है उसी के कारण दिसम्बर 2017 का सात लाख करोड़ का एन पी ए सितंबर 2021 में ऐसोचेम की रिपोर्ट के मुताबिक दस खरब को पहुंच गया है। प्रधानमंत्री मुद्रा ऋण योजना में बांटे गए ऋण के अधिकांश लाभार्थियों की तो पूरी जानकारी भी बैंकों के पास नहीं है। हर प्रदेश में ऐसे ऋण दिये गये हैं इनकी वसूली लगभग अंसभव हो गयी है। इसी वसूली के लिये बैड बैंक बनाना पडा है। इसके माध्यम से भी यह वसूली हो पायेगी यह असंभव है। यह भी तय है कि जब बैंक इस हालत तक पहुंच गये हैं तो इसका असर मंहगाई और बेरोजगारी पर पडेगा। अभी आम आदमी को यह जानकारी नहीं है कि सता में बने रहने के लिये ही प्रधानमंत्री मुद्रा ऋण योजना शुरू की गयी थी जो 2019 में ही बंद कर दी गयी अब इस एन पी ए से उभरने के लिए ही कर्ज को बेचने की योजना बैड बैंक के माध्यम से लायी गयी है। आर्थिकी की समझ रखने वालों की नजर में बैड बैंक की नौबत आना एक बडे़ खतरे का संकेत है और इसके प्रभावों से बाहर आ पाना आसान नही होगा।

बड़ा सन्देश है- दलित को मुख्यमन्त्री बनाना

अभी पंजाब में कांग्रेस ने अपना मुख्यमन्त्री बदला है। इससे पहले भाजपा ने उत्तराखण्ड में दो बार फिर कर्नाटक और गुजरात में मुख्यमन्त्री बदले हैं। उत्तर प्रदेश में भी मुख्यमन्त्री बदलने के प्रयास हुए। भाजपा के मुख्यमन्त्रीयों में सिर्फ कर्नाटक और गुजरात में रोष के स्वर उभरे परन्तु उत्तराखण्ड में ऐसा कुछ नही हुआ। पंजाब में यह रोष कुछ ज्यादा हो गया है क्योंकि निवर्तमान मुख्यमन्त्री ने नये बने मुख्यमन्त्री और वहां के पार्टी अध्यक्ष पर कई आरोप लगाये हैं। यह आरोप उनकी व्यक्तिगत हताशा बनते जा रहे हैं। क्योंकि यदि य आरोप सही है जो सबसे पहले इन पर कारवाई करने की जिम्मेदारी भी उसी मुख्यमन्त्री की थी जिसकी पार्टी में यह लोग थे। यही प्रश्न उन दूसरे लोगों पर भी लगता है जो अब इन अरोपों पद सवाल पुछ रहे हैं। इसलिये राजीतिक भाषा में यह आरोप उस बौखलाहट का परिणाम है जो पंजाब जैसे राज्य में एक दलित को मुख्यमन्त्री बनाये जाने से सभी बड़ो के अहम पर चोट बनी है। हटाये गये मुख्यमन्त्री ने पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहूल गांधी और महासचिव प्रियंका गांधी को भी अनुभवहीन और बच्चा कहा है। यहां पर फिर अमरेन्द्र सिंह पर ही सवाल उठता है कि जब राहूल गांधी के चरित्र हनन के लिये सैंकड़ों करोड़ का प्रौजेक्ट विरोधियों द्वारा चलाया गया था जिसका खुलासा कोबरा पोस्ट ने अपने सि्ंटग आप्रेशन में किया था उस पर पार्टी के यह बड़े नेता खामोश क्यों रहे थे? तब इस सिद्धान्त को क्यों भूल गये थे कि राजनीति में उसी विरोधी को गाली दी जाती है जो ज्यादा ताकतवर होता है। फिर अमरेन्द्र को मुख्यमन्त्री भी शायद इसी अनुभवहीन राहुल गांधी ने प्रपोज किया थ तब उन्हे बुरा क्यो नही लगा था। क्या प्रियंका को महामन्त्री बनाये जाने का एक बार भी अमरेन्द्र ने विरोध क्यों नही किया है? इसलिये आज अमरेन्द्र के सारे वक्तव्य उनकी व्यक्तिगत हताशा से अधिक कुछ नही रह जाते हैं।
लेकिन इसी सबमें यह समझना महत्वपूर्ण हो जाता है कि सत्तारूढ़ भाजपा और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस उस समय अपने मुख्यमन्त्री बदलने की रणनीति पर क्यों आ गये हैं। इस बदलाव का इनके संगठनो और जनता पर क्या प्रभाव पड़ेगा। इसके लिये सत्ता पक्ष से इसका आकलन शुरू करना ज्यादा प्रसांगिक होगा। क्योंक कि इस समय भाजपा इतने बहुमत के साथ सत्ता पर काबिज है जहां पर उसे कोई भी विधेयक पास करवाने मे किसी भी दूसरे दल के सहयोग की आवश्यकता ही नही हैं इसीलिये बिना किसी बहस के कानून बनते जा रहे हैं और सर्वोच्च न्यायालय तक इस पर चिन्ता जता चुके हैं। 2014 से भाजपा की जीत की जो लहर चल रही थी उसे 2021 में आकर बंगाल में ब्रेक लगी है। बंगाल के चुनावों में प्रधान मन्त्री नेरन्द्र मोदी, गृह मन्त्री अमित शाह अैर राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा की सक्रियता जितनी बड़ी हो गयी थी उसके परिदृश्य में इसके परिणामों की भी सीधी जिम्मेदारी इन्ही पर आ जाती हैं भले ही इस बारे योगी आदित्यनाथ के अतिरिक्त किसी ने भी परोक्ष/ अपरोक्ष में सवाल उठाने का सहास न किया हो। बंगाल का हार में पार्टी के मनोबल और मोदी पर अति आस्था दोनों को गहरा धक्का पहुचाया है यह एक स्थापित सच है। यह सर्वेक्षेणों ने ही सामने ला दिया है। कि मोदी की लोकप्रियता 66%से घटकर 24% तक आ पहुंची है। इस घटती लोकप्रियता का असर आने वाले चुनावों पर न पडे यह सबसे बड़ी चिन्ता बन चुकी है। इस घटाव का कारण अब तक लिये आर्थिक फैसले हैं। इन फैसलों पर उपजी लोकप्रियता को हिन्दु मुस्लिम के गुणा-भाग में दबा दिया जा रहा था। लेकिन किसान आन्दोलन ने इस गुणा-भाग पर जिस तरह पर्दा खींचा है उससे भीतर का नंगा सच एकदम बाहर आ गया है । किसान आन्दोलन में सारे प्रयासों के बावजूद भी हिन्दू- मुस्लिम न खड़ा हो पाना एक ऐसा सच बन गया है जिसने सारे किले को ध्वस्त करके रख दिया है। इस गिरते प्रभाव से बचने के लिये अभी से राज्यों में मुख्यमन्त्री बदलने की रणनीति पर चलने की लाईन ली गयी है। इससे 2024 तक आते-आते इस अलोकप्रियता को कितना रोका जा सकेगा यह तो आने वाला समय ही बतायेगा।
इस समय किसान आन्दोलन हर राजनीतिक दल के लिये केन्द्रिय बिन्दु बन चुका है। सत्ता पक्ष और उससे परोक्ष- अपरोक्ष में सहानुभूति रखने वालों के लिये इस आन्दोलन को असफल करना पहला काम हैं सारे विपक्ष के लिये किसान आन्दोलन को सफल बनाना पहली प्राथमिकता है। इस आन्दोलन ने देश की 80ः जनता को आन्दोलन के मुद्दों पर सक्रिय सोच में लाकर खडा कर दिया है। क्योंकि भण्डारण और कीमतों पर से नियन्त्रण हटाना सबको समझ आता जा रहा है। किसान आन्दोलन की सबसे बड़ी जमीन पंजाव है क्योंकि यह किसान और किसानी का केन्द्र हैं । ऐसे में जब पंजाब में कांग्रेस की सरकार होते हुए वहां का मुख्यमन्त्री पंजाब के किसानों को वहां से धरने प्रदर्शन बन्द करने और अंबानी-अदाणी को सुरक्षा देने की बात करे तो क्या यह कदम एक तरह से पूरी पार्टी के खिलाफ राष्ट्रीय षडयन्त्र नही बन जाता है। कैप्टन अमरेन्द्र सिंह के किसान आन्दोलन के विरोध मे आये ब्यान सभी के संज्ञान में हैं। बल्कि यह माना जा रहा है कि कांग्रेस हाई कमान को यह कदम बहुत पहले उठा लेना चाहिये था। 2014 से लेकर आज 2012 तक यदि भाजपा शासन में कोई सबसे ज्यादा प्रताडित रहा है तो उसमें सबसे पहले नाम दलित ओर मुस्लिम समूदाय के ही रहे हें। आज कांग्रेस ने चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमन्त्री बनाकर न केवल भूल सुधार की है बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर एक सकारात्मक सन्देश भी दिया है। इस सन्देश का लाभ न केवल कांग्रेस बल्कि पूरे देश को होगा।

क्रीमी लेयर के मानक पर अमल क्यों नही

अन्य पिछड़ा वर्गो के लिये 1979 में जब तब की जनता पार्टी सरकार ने वीपी मण्डल की अध्यक्षता मे आयोगा का गठन किया था तब पूर्व जन संघ भी जनता पार्टी और उसकी सरकार में शामिल था। क्योंकि 1977 में कांग्रेस के विरोध में वाम दलों को छोड़कर अन्य लगभग सभी विपक्षी दलों ने अपने को विलय करके जनता पार्टी का गठन किया था। 1979 में जब मण्डल आयोग का गठन किया गया था तब जनता पार्टी में विलय हुए किसी भी घटक ने इसका विरोध नहीं किया था। यदि 1980 में मण्डल आयोग की रिपोर्ट आने से पहले ही जनता पार्टी की सरकार न गिर जाती तो शायद उसी दौरान मण्डल की सिफारिशें लागू हो जाती और कोई विरोध न होता। 1980 के बाद केन्द्र में गैर कांग्रेसी सरकार 1989 में वीपी सिंह की अध्यक्षता में बनी और जन संघ से बनी भाजपा भी इस सरकार में शामिल थी। इसलिये यह आशंका ही नहीं थी कि भाजपा मण्डल की सिफारिशों को विरोध करेगी। बल्कि मण्डल की सिफारिशों का प्रारूप सारी राज्य सरकारों को उनकी राय जानने के लिये भेजा गया था। शायद किसी भी राज्य सरकार ने इसका विरोध नहीं किया। कुछ ने इस पर खामोशी अपना ली भी जिनमें हिमाचल की शान्ता सरकार भी शामिल थी। इस परिदृश्य में जब यह सिफारिशें लागू की गयी तब जो विरोध हुआ उसे भाजपा का प्रायोजित विरोध माना गया जो वीपी सिंह की सरकार गिरने के साथ ही समाप्त हो गया।
इस तरह जो विरोध उस समय शुरू हुआ था वह आज तक किसी न किसी शक्ल में चलता आ रहा है। आरक्षण विरोधीयों में यह धारणा बन चुकी है कि भाजपा की सरकार ही इसे समाप्त करेगी। इसी धारणा के परिणामस्वरूप 2014 में जब से केन्द्र में भाजपा की सरकार आयी है तब से कई राज्यों में आरक्षण को लेकर आन्दोलन हो चुके हैं और यह मांग रही है कि या तो हमे भी आरक्षण दो या सबका बन्द करो। इसीके परिणामस्वरूप आज स्वर्ण आयोग गठित करने की मांग उठनी शुरू हो गयी है। जब कि भाजपा के इसी शासन में सर्वोच्च न्यायालय ने जब प्रोमोशन में आरक्षण पर रोक लगायी तब संसद में इस फैसले को पलट दिया। अब जब महाराष्ट्र सरकार के फैसले को शीर्ष अदालत ने संविधान के खिलाफ करार दिया तो इसे भी संसद में पलट कर राज्यों को अधिकार दे दिया कि वह ओबीसी की सूची अपने अनुसार तैयार कर सकते हैं। स्वभाविक है कि जब इस सूची में नये लोग जुड़ेंगे तब यह अपने लिये और आरक्षण की मांग करेंगे। तब तक रोहिणी आयोग की रिपोर्ट भी आ जायेगी और एक नया विवाद खड़ा हो जायेगा। आरक्षण जारी रहेगा और इसे कोई खत्म नही कर सकता। भाजपा ऐसा नहीं होने देगी इसकी स्पष्ट घोषणा गृहमन्त्री अमितशाह कर चुके हैं। 2014 से 2021 तक सरकार के आचरण पर यदि नजर डाली जाये तो स्पष्ट हो जाता है कि भाजपा का हर कदम आरक्षण को संरक्षण देने का ही रहा है। इस परिदृश्य मे यह नहीं लगता कि भाजपा की मोदी सरकार स्वर्ण आयोग का गठन करके स्वर्णों के लिये अलग से आरक्षण की कोई व्यवस्था कर पायेगी। पिछले लेख में भी मैंने यह आशंका व्यक्त की थी। उस पर कई पाठकों ने इस समस्या का समाधान सुझाने का आग्रह किया है। इस पर कुछ कहने का प्रयास करूंगा।
स्मरणीय है कि जब इस संद्धर्भ में काका कालेलकर की अध्यक्षता में पहला आयोग 1953 में गठित हुआ था उसने 1955 में अपनी रिपोर्ट सौंपते हुए यह आग्रह किया था कि इस रिपोर्ट पर अमल न किया जाये। काका कालेलकर ने भी अपने पत्र में यह सुझाव दिया था कि इन जातियों/वर्गों को मुख्य धारा में लाने के लिये आरक्षण का नहीं वरन आर्थिक प्रोत्साहन देने का प्रयास किया जाये इसके कुछ सुझाव भी दिये थे। इसके बाद जब दूसरे आयोग की सिफारिशों को 1990 में लागू किया गया और उसका जमकर विरोध हुआ तब आरक्षण का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। इन्दिरा साहनी मामले में इसका फैसला आया। सर्वोच्च न्यायालय ने आरक्षण का आधार आर्थिक संपन्नता करने को कहा। इसके लिये क्रीमी लेयर तैयार करने की बात की और उस समय उसकी सीमा एक लाख रूपये रखी गयी। लेकिन आज मोदी सरकार के आने के बाद इस क्रीमी लेयर की सीमा 2015 में आठ लाख कर दी गयी है। इस पर आज तक चार बार इस सीमा में संशोधन किया गया है। इस पर अगर गंभीरता से विचार करे तो इसका अर्थ यह निकलता है कि हर वह आदमी जिसकी आय आठ लाख नहीं है वह आरक्षण का हकदार है। आज शायद प्राईवेट सैक्टर में काम/ नौकरी करने वाले 90% लोग ऐसे नहीं मिलेंगे जो एक साल में आठ लाख कमा पाते हो या पगार लेते हों। बल्कि सरकारी क्षेत्र में नौकरी करने वालो में भी शायद 80% ऐसे कर्मचारी होंगे जो 8 लाख की बचत नहीं कर पाते हैं। तब प्रति व्यक्ति आय ही अभी तक दो लाख नही हो पायी है तो आठ लाख होने मे तो और कई दशक निकल जायेंगे। जब क्रीमी लेयर की सीमा आठ लाख कर दी गयी है तब आरक्षण का प्रतिशत भी उसी अनुपात में होना चाहिये। जब क्रीमी लेयर की यह सीमा इसी सरकार ने 2015 में की है तब उस पर अमल करने में सरकार को परेशानी क्यों होनी चाहिये। क्या क्रीमी लेयर की इस सीमा का किसी ने विरोध किया है? क्या इसी में सारी जातियां अपने आप ही शामिल नहीं हो जाती। क्रीमी लेयर के मानक पर अमल करने से किसी भी जाति के लिये अलग से कोई व्यवस्था करने की आवश्यकता नहीं रह जाती है क्योंकि यह व्यवस्था तो सुप्रीम कोर्ट ने सुझायी है। आज तो स्वर्ण आयोग की मांग करने की बजाये क्रीमी लेयर पर अमल करवाने के लिये सारी जातियों को एक मंच पर आकर इसकी मांग करनी चाहिये। जब सरकार अपनी ही व्यवस्था पर अमल करने को तैयार न हो तो उससे समझ जाना खहिये की सरकार की नीयत क्या है। इस समय जब सब कुछ आऊट सोर्स किया जा रहा है तब सरकार के पास नौकरी देने के लिये बचेगा ही क्या।

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