Friday, 16 January 2026
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क्या चुनाव जीतने के लिये कुछ भी करना सही है

पांच राज्यों में चुनावों चल रहे हैं असम और बंगाल में दो चरणों का मतदान हो चुका है। इस मतदान के बाद केवल भाजपा ने यह दावा किया है कि वह दोनों राज्यों में सरकार बनाने जा रही है। बंगाल में पहले चरण के मतदान के बाद गृह मन्त्री अमितशाह ने यह दावा किया है कि भाजपा इसमें 30 में से 26 सीटें जीत रही है। दूसरे चरण के बाद भाजपा के कैलाश विजयवर्गीय ने दावा किया है कि भाजपा 30 में से 30 सीटें जीत रही है। दूसरे चरण के मतदान में यह भी देखने को मिला है कि मुख्यमन्त्री ममता को एक पोलिंग बूथ पर जा कर बैठना पड़ा क्योंकि वहां लोगों को वोट देने से रोके जाने की खबरें आ रही थी। ममता ने पोलिंग बूथ से प्रदेश के राज्यपाल से इसकी शिकायत की। चुनाव आयोग से भी इसकी शिकायत की गयी। बंगाल में एक भाजपा नेता का आडियो वायरल हुआ है जिसमें वह चुनाव आयोग को प्रभावित करने की बात कर रहे हैं। जब यह दूसरे चरण का मतदान हो रहा था तब प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी एक चुनावी रैली में ब्यान दे रहे थे कि ममता नन्दीग्राम से चुनाव हार गयी हैं उन्होंने अपनी हार स्वीकार कर ली और वह अब किसी दूसरे क्षेत्र से भी चुनाव लड़ने की सोच रही हैं। प्रधानमन्त्री यह ब्यान उस समय दे रहे थे जब नन्दीग्राम में मतदान चल रहा था। क्या एक प्रधानमन्त्री को इस तरह का ब्यान देना चाहिये? यह इस चुनाव के बाद सार्वजनिक बहस के लिये एक बड़ा सवाल बनना चाहिये।
असम के पहले चरण के मतदान के बाद भी ऐसे ही दावे किये गये हैं। वहां के सारे छोटे बड़े समाचार पत्रों ने पहले पन्ने पर भाजपा के दावों के आंकड़े ऐसे छापे हैं जैसे की वह उनकी खबर हो। लेकिन वास्तव में यह खबर के रूप में भाजपा का विज्ञापन था। कांग्रेस ने चुनाव आयोग से इसकी शिकायत करते हुए असम के मुख्यमन्त्री, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष और राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किये जाने की मांग की है। चुनाव आयोग ने वहां के समाचार पत्रों को इस संबंध में पत्र भी भेजा है। यहां पर दूसरे चरण के बाद ईवीएम मशीन भाजपा उम्मीदवार की पत्नी की गाड़ी में पकड़ी गयी है। इसके लिये संबंधित चुनाव अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है। एक अन्य स्थान पर ईवीएम मशीने एक ट्रक में मिलने की बात भी सामने आयी है। प्रधानमन्त्री जब इन्हीं चुनावों के दौरान जब बंग्लादेश गये थे तब वहां ब्यान दिया कि बंग्लादेश की आजा़दी में उनका भी योगदान रहा है। वह भी इसके लिये जेल गये थे। इस जेल जाने पर आप सांसद संजय सिंह ने प्रधानमन्त्री से सवाल पूछा है कि भारत तो बांग्लादेश के साथ था और युद्ध पाकिस्तान के साथ हो रहा था तो आपको किसने जेल भेजा था भारत ने या पाकिस्तान ने। स्वभाविक है कि प्रधानमन्त्री ने यह ब्यान भी इन चुनावों को सामने रख कर ही दिया है। अन्यथा शायद वह ऐसा कुछ न कहते।
इन चुनावों के लिये भाजपा का सीएए पर स्टैण्ड हर राज्य में अलग अलग हो गया है। बंगाल में मन्त्रीमण्डल की पहली बैठक में इसे लागू करने की बात करते हैं तो असम में इस पर पुनर्विचार करने की। तमिलनाडु में इसका कोई जिक्र नहीं है। भाजपा ने जब बंगाल में दो सौ सीटें जीतकर सरकार बनाने का दावा किया था तब चुनाव रणनीतिकार प्रशान्त किशोर ने कहा था कि भाजपा सौ के आंकड़े से पीछे रहेगी। इस पर इण्डिया टूडे के राहुल कंवर ने किशोर से पूछा था कि भाजपा सौ से पार कैसे जा पायेगी। तब किशोर ने कहा था कि यदि केन्द्रिय बलों पर कहीं कोई हमला हो जाता है तो भाजपा सौ से पार जा सकती है। इण्डिया टूडे में किशोर का यह इन्टरव्यू करीब एक माह पहले का है। अब छत्तीसगढ़ में नक्सलीयों का केन्द्रिय बलों पर हमला हो गया है। इस हमले को प्रशांत किशोर के वक्तव्य के आईने में देखते हुए बंगाल चुनावों से जोड़ कर देखा जा रहा है। क्योंकि इन्ही चुनावों में गृह मन्त्री अमितशाह ने यह कहा है कि बंगाल में भाजपा की हार राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये एक बड़ा खतरा होगी।
इस तरह इन चुनावों में अब तक जो कुछ घट चुका है उसको सामने रखते हुए यह स्पष्ट हो जाता है कि आने वाला समय देश के लिये बहुत कठिन होने वाला है। अभी छोटी बचतो पर ब्याज दरें कम करने का फैसला यह कहकर वापिस लिया गया कि गलती से ऐसा जारी हो गया। स्वभाविक है कि जब बड़े उद्योग घरानों को दिया हुआ कर्ज वापिस नहीं आया है तो बैंकों के पास निश्चित रूप से पैसे की कमी है। ऐसे में नया कर्ज देने के लिये यह ब्याज दरें ही कम की जायेंगी। हो सकता है कि पैन्शन में भी कटौती करने की हालत आ जाये। इस तरह इन चुनावों के साथ भविष्य के लिये जो संकेत ईवीएम से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा और छोटी बचतों पर ब्याज दरों को कम करने तक के सामने आये हैं उन्हें गंभीरता से लेना होगा। इसके प्राथमिकता के आधार पर इन मुद्दों पर एक-एक करके राष्ट्रीय बहस उठानी होगी।

क्या आज लोकतन्त्र और प्रहरी दोनों के अर्थ बदल गये हैं

सरकार ने पिछले दिनों लोकतन्त्र के प्रहरीयों को सम्मानित किया है। लोकतन्त्र के यह वह प्रहरी हैं जिन्होंने पैंतालीस वर्ष पहले 26 जून 1975 को लगे आपातकाल का विरोध किया था। इस विरोध के लिये इन्हें जेलों मे डाल दिया गया था। इन पैंतालीस वर्षों में केन्द्र से लेकर राज्यों तक में कई बार गैर कांग्रेसी सरकारें सत्ता में आ चुकी हैं लेकिन इस सम्मान का विचार पहली बार आया है। इस नाते इसकी सराहना की जानी चाहिये क्योंकि असहमति को भी लोकतन्त्र में बराबर का स्थान हासिल है। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि अहसमति स्वस्थ्य लोकतन्त्र का एक अति आवश्यक अंग है। लेकिन क्या आज जिन शासकों ने लोकतन्त्र के इन प्रहरीयों को चिन्हित और सम्मानित किया है वह असहमति को सम्मान दे रहे हैं? क्या आज असहमति के स्वरों को दबाकर उनके खिलाफ देशद्रोह के आपराधिक मामले बनाकर उनको जेलों में नहीं डाला जा रहा है। क्या आज मज़दूर से हड़ताल का अधिकार नहीं छीन लिया गया है। क्या आज पुलिस को यह अधिकार नहीं दे दिया गया है कि वह किसी को भी बिना कारण बताये गिरफ्तार कर सकती है। असहमति के स्वरों को मुखर करने के लिये कितने चिन्तक आज जेलों में है। दर्जनों पत्रकारों के खिलाफ देशद्रोह के मामले बना दिये गये हैं। क्या ऐसे मामलों को असहमति का भी आदर करना माना जा सकता है शायद नहीं। लेकिन आज की सत्ता में यह सबकुछ हो रहा है। उसे लगता है कि केवल उसी की सोच सही है। ऐसे में जब सरकार आपातकाल में जेल गये लोगों को लोकतन्त्र का प्रहरी करार देकर सम्मानित कर रही है तब यह सवाल पूछा जाना आवश्यक हो जाता है कि क्या आज लोकतन्त्र की परिभाषा बदल गयी है। यदि परिभाषा नहीं बदली है तो फिर आज असहमति को बराबर का स्थान क्यों नहीं दिया जा रहा है।
26 जून 1975 को आपातकाल लगा था क्योंकि तत्कालीन प्रधानमन्त्री स्व. श्रीमति गांधी ने 12 जून को ईलाहबाद उच्च न्यायालय के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा के फैसले के बाद अपने पद से त्यागपत्र नहीं दिया था। उस समय स्व. जय प्रकाश के नेतृत्व में चल रहे ‘‘समग्र क्रान्ति’’ आन्दोलन ने देश के नागरिकों से सरकार के आदेशों को न मानने के लिये सविनय अवज्ञा का आह्वान कर दिया था। इस स्थिति को टालने के लिये आपातकाल लागू करने का फैसला लिया गया। आन्दोलनकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया। नागरिक अधिकारों पर एक तरह का प्रतिबन्ध लग गया। पूरे देश में गिरफ्तारियों का दौर चला। लेकिन आपातकाल में ऐसा कोई भी फैसला नहीं आया जिससे देश की आर्थिक स्थिति खराब हुई हो। मंहगाई और जमाखोरी के खिलाफ कड़े कदम उठाये गये थे। केवल नसबन्दी का ही एक मात्र ऐसा फैसला था। जिसमें कई लोगों के साथ ज्यादतीयां हुई। बल्कि कई लोगों का मानना रहा है कि यदि नसबन्दी की ज्यादतीयां न होती तो शायद 1977 के चुनावों में भी कांग्रेस न हारती। आपातकाल में विरोध और असहमति को जिस तरह दबाया गया उसका परिणाम हुआ कि 1977 के चुनावों में कांग्रेस को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। इन चुनावों के बाद स्व. मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी। इस सरकार ने आपातकाल के दौरान हुए भ्रष्टाचार और ज्यादतीयों की जांच करवाने का फैसला लिया। इसके लिये केन्द्र में शाह कमीशन का गठन किया गया और इसी तर्ज पर राज्यों ने अपने अपने कमीशन गठित किये।। हिमाचल में जिन्द्रालाल कमीशन गठित हुआ। लेकिन केन्द्र से लेकर राज्यों तक किसी भी कमीशन कोई जांच रिपोर्ट सामने नहीं आयी है। 1980 में जनता पार्टी की सरकार टूट गयी क्योंकि शिमला के रिज पर शान्ता कुमार की पुलिस ने केन्द्र के स्वास्थ्य मन्त्री राजनारायण को गिरफ्तार कर लिया। कांग्रेस फिर सत्ता में आ गयी। क्योंकि उसके पास 1953 में बढ़ी जिमीदारी प्रथा खत्म करने और फिर राजाओं के प्रीविपर्स बन्द करने और बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने जैसे फैसलों की विरासत थी। जबकि इन फैसलों का विरोध राजगोपालाचार्य चौधरी चरण सिंह, जनसंघ के अध्यक्ष बलराज मधोक, मीनू मसानी और रूस्तमजी कावसजी कपूर जैसे नेता कर चुके थे। बैंक राष्ट्रीयकरण पर तो सर्वोच्च न्यायालय ने खिलाफ फैसला दे दिया था। जिसे श्रीमति गांधी ने 25वां संविधान संशोधन लाकर बदला था। इस तरह कांग्रेस के शासनकाल में डा. मनमोहन सिंह तक ऐसा कोई आर्थिक फैसला नहीं आया है जिससे देश की अर्थव्यवस्था पर कुप्रभाव पड़ा हो या गरीब आदमी के हित में न रहा हो।
इसके विपरीत आज मोदी शासन में नोटबन्दी से लेकर कृषि कानूनों तक हर फैसले का अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। मंहगाई और बेरोज़गारी लगातार बढ़ती जा रही है। हर ओर से यह आरोप लग रहा है कि सरकार केवल कुछ पूंजीपतियों की ही हित पोषक होकर रह गयी है। संवैधानिक संस्थानों को योजनाबद्ध तरीके से कमजोर किया जा रहा है। सरकार के फैसलों पर सवाल उठाने और पूछने वाली हर आवाज़ को देशद्रोह करार दिया जा रहा है। सीएए और एनआरसी पर केन्द्र सरकार का बंगाल और असम में अलग-अलग स्टैण्ड सामने आ चुका है लेकिन आन्दोलनों को कैसे दबाया गया यह भी किसी से छिपा नहीं है। किसान आन्दोलन भी उसी दौर से गुजर रहा है। आज के हालात को आम आदमी आपातकाल से तुलना करके देखने लग पड़ा है। यह सवाल उठने लग पड़ा है कि आपातकाल में लोकतन्त्र के प्रहरी का धर्म निभाने वालों के लिये क्या आज लोकतन्त्र और धर्म दोनों के अर्थ बदल गये हैं।

क्या मंहगाई-किसान आन्दोलन पर भारी पड़ेगी

पैट्रोल और रसोई गैस की बढ़ती कीमतों पर सरकार जिस तरह से बेपरवाह चल रही है और इसके लिये पूर्व सरकारों को जिम्मेदार ठहराया गया उससे यह लगने लगा है कि यह कीमतें बढ़ना किसी निश्चित योजना का हिस्सा है। क्योंकि इन कीमतों के लिये आम आदमी अब यह कहने लगा पड़ा है कि विपक्ष भी इस बारे में कुछ नहीं कर रहा है। आम आदमी विपक्ष से यह चाहता है कि कीमतों के बढ़ने का जो विरोध वह नहीं कर पा रहा है वह काम विपक्ष करे। शायद सरकार भी विपक्ष और आम आदमी को कीमतों के विरोध में व्यस्त करके किसान आन्दोलन की ओर से ध्यान हटवाना चाहती है। क्योंकि कच्चे तेल पर केन्द्र और राज्य सरकारें जो शुल्क ले रही हैं यदि उसे आधा कर दिया जाये तो यही कीमत साठ रूपये लीटर पर आ जायेगी। इस समय कच्चे तेल की कीमत करीब तीस रूपये है जिस पर केन्द्र तेतीस और राज्य सरकारें बीस रूपये शुल्क वसूल कर रही हैं जबकि मंहगाई का एक ही कारण है कि जो लाखों करोड़ का कर्ज बड़े उद्योगपतियों का वसूल नहीं किया जा रहा है यदि वह कर्ज वापिस आ जाये तो मंहगाई भी कम हो जायेगी और सरकार को अपने सार्वजनिक उपक्रम भी बेचने नहीं पड़ेंगे। लेकिन सरकार की नीयत और नीति दोनों ही आम आदमी की बजाये बडे़ उद्योग घरानों को लाभ पहुंचाने की है। सरकार की नीतियों के परिणाम स्वरूप ही तो अदानी को फरवरी माह में आठ अरब डालर का लाभ हुआ है। कोरोना काल में आपदा का जितना लाभ अंबानी -अदानी को हुआ है उससे सरकार की नीतियों का सच सामने आ जाता है। इसी सच के सामने आने से अंबानी -अदानी किसान आन्दोलन में एक मुद्दा बन गये हैं।
किसान आन्दोलन पूरे देश में फैलता जा रहा है क्योंकि जैसे जैसे यह कृषि कानून आम आदमी और किसान को समझ आते जायंेगे उसी अनुपात में यह आन्दोलन गति पकड़ता जायेगा। क्योंकि सरकार की नीतियों के कारण मंहगाई और बेरोज़गारी बढ़ती जा रही है। इसलिये बेरोज़गार युवाओं को इस आन्दोलन का हिस्सा बनने के अतिरक्ति और कोई विकल्प नहीं रह जायेगा। किसान और बेरोज़गार सरकार की इस नीयत और राजनीति को समझ चुका है। इसलिये किसान ने अब अगले चुनावों में सरकार को हटाने का ऐलान कर दिया है। इस समय सरकार मंहगाई, बेरोज़गारी और किसानों की बजाये अपना पूरा ध्यान चुनावों पर केन्द्रित करके चल रही है। चुनावों के लिये सरकार को अंबानी-अदानी से ही इतने संसाधन मिल जायेंगे की उसे किसी तीसरे के पास जाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। इन्ही चुनावों के लिये सारे राजनीतिक दलो में तोड़-फोड़ की जा रही है। हर भ्रष्टाचारी को भाजपा में संरक्षण मिल रहा है बल्कि भाजपा किस हद तक भ्रष्टाचार को संरक्षण देती है इसका सबसे बड़ा प्रमाण शान्ता कुमार ने अपनी आत्म कथा में देश के सामने रख दिया है। पूरी भाजपा इस खुलासे के बाद मौन है। इन खुलासों के परिणामों से बचने के लिये चुनावी सफलता ही सबसे बढ़ा साधन है और उसे हालिस करने के लिये साम दाम और दण्ड की नीति पर चला जा रहा है। बहुत संभव है कि आने वाले दिनों में कांग्रेस का ‘‘जी 23’’ कांग्रेस से बाहर निकल कर भगवा हो जाये। राजनीतिक दलों में तोड़-फोड़ और ईवीएम के भरोसे कितनी चुनावी सफलता मिलती है यह तो आने वाले समय में ही पता चलेगा। क्योंकि ईवीएम की विश्वसनीयता पर उठे सवालों का आज तक कोई जवाब सामने नहीं आया है।
इस समय देश आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक संकट से गुज़र रहा है। आर्थिक संसाधन योजनाबद्ध तरीके से प्राईवेट सैक्टर को सौंपे जा रहे है। एफडीआई के नाम पर विदेशी कंपनीयां आती जा रही हैं। राजनीतिक दलों में तोड़-फोड़ जारी है। असहमति को राष्ट्रद्रोह की संज्ञा दी जा रही है। शीर्ष न्यायपालिका की विश्वयनीयता पर भी सवाल उठते जा रहे हैं। समाज में एक वर्ग हिन्दु राष्ट्र के लिये कोई भी कीमत अदा करने के लिये तैयार है। वह पैट्रोल और गैस इससे भी दो गुणे दामों पर खरीदने को तैयार है। उसे अदानी -अम्बानी सफल व्यापारी नज़र आ रहे हैं। मोदी की वकालत में नेहरू-गांधी परिवार को गाली देना उनका धर्म बन गया है। किसान आन्दोलन उनकी नज़र में देश के लिये घातक है इसे वह कांग्रेस और वाम दलों का खेल मान रहे हैं। मंहगाई और बेरोज़गारी उनके लिये कोई सरोकार नहीं रह गये हैं। सरकार ने बड़ी सफलता के साथ हिन्दुराष्ट्र की वकालत के लिये एक वर्ग खड़ा कर लिया है। कुल मिलाकर एक ऐसा ध्रुवीकरण बनता जा रहा है जिसके परिणामों की परिकल्पना भी भयावह लगती है।

क्या यह कानूनों का काला पक्ष नहीं है

किसान आन्दोलन को दबाने कुचलने और असफल बनाने के लिये सरकार किस हद तक जा सकती है यह देश के सामने आ चुका है। 26 जनवरी से लेकर 6 फरवरी तक जो कुछ घटा है उसको लेकर विदेशों तक मे प्रतिक्रियाएं हुई हैं। विदेशी प्रतिक्रियाओं को कुछ लोगों ने देश के आन्तरिक मामलों में दखल करार दिया है। लेकिन यह लोग उस समय खामोश रहे थे जब हमारे प्रधानमन्त्री अमेरिका में जाकर ‘‘अब की बार ट्रंप सरकार’’ कर रहे थे। किसान आन्दोलन को यदि सर्वोच्च न्यायालय ने शांतिप्रिय और किसानों का अधिकार न कहा होता तो शायद इसका अंजाम भी नागरिकता आन्दोलन जैसा हो चुका होता। किसान गांधी जी के अहिंसा के मार्ग पर चल रहा है। यह चक्का जाम कार्यक्रम में सामने आ चुका है। चक्का जाम में कोई दीपक सिद्धु नहीं घुस पाया इसलिये कोई अप्रिय घटना नहीं घट पायी। यह अहिंसा ही आन्दोलन की सबसे बड़ी ताकत है।
लेकिन अब तक जो कुछ घट चूका है उससे किसान और सरकार पहुंचे कहां है यह समझना महत्वपूर्ण है। किसानों के साथ कई दौर की वार्ताएं करने के बाद भी कृषि मन्त्री नरेन्द्र सिंह तोमर को यह पता नहीं चल पाया है कि इन कानूनों में काला क्या है। कृषि मन्त्री के मुताबिक उन्हें किसान यह बता ही नहीं पाये हैं कि कानूनों में खराबी क्या है जिसे दूर किया जा सके। इतनी वार्ताओं के बाद भी जब सरकार को कालापन समझ नहीं आ पाया है तब किसानों को दो टूक कह दिया है कि वह अपनी मांगे पूरी हुए बिना घर वापिस नही जायें कानूनों की वापसी के लिये सरकार को दो अक्तूबर तक समय दिया गया है उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि यह आन्दोलन लम्बे समय तक चलेगा और यदि दो अक्तूबर तक कानूनों की वापसी न हुई तो आन्दोलन की रूपरेखा में क्या अन्तर आयेगा यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। लेकिन यह तय है कि इस आन्दोलन से समाज के हर वर्ग के हर घर तक एक बहस सोशल मीडिया के मंचो पर इसके पक्ष और विपक्ष में छिड़ चुकी है। यहां तक कि स्वयं किसानों में भी पक्ष-विपक्ष खड़ा हो गया है। पत्रकार, न्यूज चैनल, सिनेमा और क्रिकेट तक सभी जगह पक्ष -विपक्ष बन चुका है। इस पक्ष-विपक्ष बनने को यदि एक तरह के गृह युद्ध की संज्ञा दे दी जाये तो यह कोई अतिशयोक्ति नही। होगी यह स्थिति सरकार के हर आर्थिक फैसले के बाद खड़ी हुई है। नोटबंदी से लेकर इन कृषि कानूनों तक ने समाज को प़क्ष-विपक्ष में बांटने में एक बड़ी भूमिका अदा की है। बल्कि यह लगता है कि सरकार ने एक बहुत ही योजनाबद्ध तरीके से समाज को यहां तक पहुंचाया है। हर नये फैसले से पूराने सवाल पिछे जाते गये और नये सवाल खड़े होते गये। नोटबंटी से उद्योग प्रभावित हुए यह विशेष पैकेज दिये जाने के बाद भी आज तक पुरानी स्थिति में नहीं आ पाये हैं। इनमें आटोमोबाईल और रियल एस्टेट प्रमुख हैं। नोटबंदी से कितना काला धन बाहर आया या खत्म हुआ इसका कोई आंकड़ा आज तक सामने नहीं है। जो लोग बैंको का लाखों करोड़ डकार कर विदेश भाग गये वह आज तक वापिस नहीं आये। एनपीए बढ़ने का असर आम आदमी पर हुआ उसके सभी तरह के जमा पर ब्याज दरें कम हो गयीं। लेकिन एक भी दिन किसी ने भी इस पर सवाल खड़ा नहीं किया। क्योंकि इसी दौरान लव जिहाद और गौर रक्षा बड़े सवाल बन गये।
हर क्षेत्र में कीमतें बढ़ गयीं। पैट्रोल पर तो भाजपा सांसद डा. स्वामी की टिप्पणी कि ‘‘राम के भारत में पैट्रोल 93रू. सीता के नेपाल में 53रू और रावण की लंका में 51रू’’ सरकार की नीयत और नीति पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा करते हैं। अभी बजट के साथ ही खाद्य पदार्थो की कीमतें बढ़ गयी हैं और इन विवादित कानूनों में आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन का प्रभाव कीमतें बढ़ने पर पड़ेगा यह पहले दिन से कहा जा रहा है। क्योंकि इस अधिनियम से ही कीमतों और जमा खोरी पर नियन्त्रण रखा जाता था जो अब समाप्त कर दिया गया है अब यह नियन्त्रण युद्ध और अकाल की स्थिति में ही किया जा सकेगा। क्या इस मंहगाई का असर हर आदमी पर नहीं पड़ेगा? क्या कानून बनाकर मंहगाई लाने का यह प्रयास इसका काला पक्ष नहीं है? आज कृषि उपज बेचने के लिये एपीएमसी अधिनियम के माध्यम से हर प्रदेश सरकार ने कुछ मण्डीयां बनाने की व्यवस्था की हुई है। इन मण्डीयों पर सरकार के कानून का नियन्त्रण है। यह मण्डीयां किसान से धोखाधड़ी नहीं कर सकती है। लेकिन नये कानून ‘‘किसान उपज व्यापार एवम् वाणिज्य संवर्धन के तहत इन मण्डीयों के बाहर भी कृषि उपज बेचने का प्रावधान दिया गया है। ऐसे खरीदार का किसी नियम-कानून के तहत पंजीकृत होना आवश्यक ही है। ऐसी खरीद करने वाला किसी भी कानून के दायरे में नहीं आयेगा। यदि इसमें किसान के साथ कोई धोखा हो जता है तो उसकी जिम्मेदारी किसान की ही होगी। क्या किसान को संरक्षण देना कहा जा सकता है शायद नहीं। क्या इसे कानून का काला पक्ष नहीं माना जाना चाहिये? तीसरा कानून किसान (सशक्तिकरण एवम् संरक्षण) मूल्य आश्वासन अनुबन्ध एवम् कृषि सेवाएं विधेयक है इसके तहत कोई भी व्यक्ति किसी की भी ज़मीन किराये पर लेकर उस पर अपनी ईच्छानुसार उत्पादन कर सकेगा। इसके लिये दोनों पक्षों के बीच अनुबन्ध होगा। इस अनुबन्ध के आधार पर किराये पर लेने वाला व्यक्ति बैंक से ऋण आदि ले सकेगा। यदि किसी कारण से वह ऋण अदा नहीं कर पाता है तो उस स्थिति में किसान की अनुबंधित ज़मीन का क्या होगा इसको लेकर अधिनियम में कुछ नहीं कहा गया है। वैसे भी अनुबन्ध पर कोई भी विवाद होने की स्थिति में इसकी शिकायत एसडीएम के पास जायेगी दूसरी अदालत में नहीं। फिर इसमें उस एसडीएम का अधिकार क्षेत्र रहेगा जहां से किराये पर लेने वाला होगा। जहां पर ज़मीन स्थित है उस एसडीएम का नहीं। क्या यह व्यवस्था किसान के हित मेें दी जा सकती है? क्या यह भी कानून का काला पक्ष नहीं है?
इन कानूनों को यदि सरकार और राजनीतिक दलों के आईने से बाहर निकलकर देखने का प्रयास किया जायेगा तो मुझे पूरा विश्वास है कि कोई भी इसका समर्थन नहीं कर पायेगा। लेकिन जब कृषि मन्त्री की नजर में इनमें खराब ही कुछ नहीं है तो सरकार उन्हें वापिस क्यों लेगी। नये बजट के साथ ही दालों की कीमतो में बढ़ौत्तरी होने को यदि इन कानूनों के आईने से देखने/बढ़ने का प्रयास दलगत प्रतिबद्धता से उपर उठकर किया जायेगा तो आसानी से इनका काला पक्ष समझ आ जायेगा। अन्यथा यह सच स्वयं भोगने के बाद समझ आयेगा और तब तक काफी देर हो चुकी होगी। शायद सरकार भी यही चाहती है क्योंकि सच तो सच ही रहेगा और एक दिन सामने आयेगा ही।

किसानो के आगे हारा सरकार का बल और छल

किसान आन्दोलन के ट्रैक्टर मार्च में जो कुछ घटा है उससे जो सवाल उभरे हैं वह आन्दोलन के नेताओं, सरकार और आम आदमी सभी के लिये गंभीर हैं। क्योंकि किसी भी आन्दोलन की सफलता इसी बात पर निर्भर करती है कि वह कितनी देर हिंसा से बचा रहता है। जब भी हिंसा घट जाती है उसके बाद आन्दोलन के मुख्य मुद्दे गौण हो जाते हैं और हिंसा में हुआ नुकसान सर्वोपरि बन जाता है। हिंसा में जब प्रति हिंसा आ जाती है तब वह कानून और व्यवस्था का मुद्दा बन जाती है। ट्रैक्टर मार्च में हुई हिंसा का जवाब न तो किसानों ने प्रति हिंसा से दिया और न ही पुलिस ने। इसके लिये दोनों बराबर प्रशंसा के पात्र हैं। लेकिन इसी के साथ किसान नेताओं के लिये यह महत्वपूर्ण होगा कि यह भविष्य मेे ऐसे तत्वों से बचने के लिये क्या रणनीति अपनाते हैं क्योंकि आन्दोलन लम्बा चलेगा यह तय है। इस हिंसा से पुलिस नेतृत्व पर भी यह सवाल उठता है कि उपद्रवियों से निपटने के लिये पुलिस व्यवस्था पूरी क्यों नहीं थी? जब ट्रैक्टर मार्च तय समय से पहले ही शुरू हो गया और उसने निर्धारित रूट भी बदल लिया तो उसे वहीं पर क्यों नहीं रोका गया। यदि उन्हे वहीं पर रोक दिया जाता तो जो कुछ लाल किले पर घटा वह न घटता। इन सवालों के जवाब एक दिन सामने अवश्य आयेंगे।
इसी हिंसा की निन्दा हर आम आदमी कर रहा है और की भी जानी चाहिये क्योंकि लाल किले पर राष्ट्रीय ध्वज के अतिरिक्त किसी अन्य ध्वज का फहराया जाना राष्ट्रीय अपमान है जिसे कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। आन्दोलन के अधिकारिक नेतृत्व ने भी हिंसा की निन्दा की है ऐसे लोगों को चिन्हित करके उन्हे सज़ा देने की भी मांग की है। ऐसे लोगों ने अपनी असंबद्धता भी प्रकट की है। लाल किले पर निशान साहिब के धार्मिक चिन्ह वाले भगवा झण्डे को फहराने का काम दीप सिद्धु ने किया है यह सामने भी चुका है। उसके खिलाफ भी एफआईआर दर्ज है। दीप सिद्धु का भाजपा सासंद सन्नी दयोल और पूरे परिवार के साथ निकटता भी वायरल हुए फेाटोज के माध्यम से सामने आ चुकी है। इसी निकटता के माध्यम से प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी और गृह मन्त्री अमित शाह के साथ भी सिद्धु के फोटोज़ वायरल हो चुके हैं। किसान नेताओं ने सिद्धु को सरकार का प्लांट करार दिया है। कांग्रेस ने हिंसा की जिम्मेदारी गृह मन्त्री पर डालते हुए उनके त्याग पत्र की मांग की है। सिद्धु की राजनीतिक पृष्ठभूमि की बजाये उसका यह कृत्य मुख्य विषय है। इस परिदृश्य में सिद्धु को पकड़कर उसे तुरन्त प्रभाव से जेल में डालकर राष्ट्रद्रोह का मामला चलाया जाना चाहिये। सरकार यह काम कितनी जल्दी और कितनी ईमानदारी से करती है उसका असर उसकी विश्वसनीयता पर पड़ेगा। सिद्धु की जो पृष्ठभूमि सामने आयी है उसके दृष्टिगत सिद्धु के खिलाफ कारवाई सरकार के लिये एक कसौटी होगा क्योंकि कारवाई में किसी भी तरह की ढिलाई का अर्थ किसानों के आरोप को प्रमाणित करना होगा।
सरकार ने किसान नेताओं के खिलाफ दो दर्जन से अधिक एफआईआर किये हैं। धरना समाप्त करवाने और घटना स्थल खाली करवाने के लिये बल प्रयोग के प्रयास पुलिस द्वारा किये गये। बहुत सारे संगठनों द्वारा आन्दोलन छोडकर वापिस जाने के समाचार तक आ गये। धरना स्थल पर भाजपा के कार्यकर्ता भी आ पहुंचे। किसाने नेता राकेश टिकैत गिरफ्तारी देंगे। इस तरह के समाचार आने से लगा पुलिस रात को आन्दोलनकारियों को खदेड़ देगी। लेकिन किसान नेताओं की रणनीति के आगे पुलिस के सारे प्रयास असफल हो गये। मीडिया के आकलन भी फेल हो गये। अब यह साफ होने लगा है कि आन्दोलन ऐसे खत्म नहीं करवाया जा सकता है। ट्रैक्टर मार्च में जितनी संख्या में किसान शामिल हुए हैं वह सरकार और मीडिया के अनुमानों से कहीं ज्यादा रहा है। इस आन्दोलन को असफल करवाने के लिये सरकार और उसके अन्ध समर्थक मीडिया का सारा बल-छल फेल हो गया है। अब किसान नेता इस छल की रणनीति के प्रति और सजग -सर्तक हो जायेंगे यह स्वभाविक है।
ट्रैक्टर मार्च में हुई हिंसा के लिये मुख्य जिम्मेदारी दीप सिद्धु और उसके साथियों की सामने आयी है। दीप सिद्धु की भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के साथ निकटता के फोटो वायरल हो चुके हैं। एफआईआर इन लोगों के खिलाफ दर्ज है। किसान नेता इनकी गिरफ्रतारी की मांग कर रहे हैं। इसलिये दीप सिद्धु की गिरफ्तारी सरकार के लिये एक कसौटी बन गया है। सिद्धु का आचरण आन्दोलन के नेताओं की ताकत और सरकार का कमजोर पक्ष बनता जायेगा यह तय है। जैसे जैसे सिद्धु की भूमिका का प्रचार होता जायेगा उसी अनुपात में आन्दोलन ताकत पकड़ता जायेगा। क्योंकि किसान नेताओं ने सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत जज से इसकी भूमिका की जांच करवाने और उसकी दो माह की काॅल डिटेल सामने लाने की मांग कर दी है। यह प्रकरण पहले से ही सर्वोच्च न्यायालय के पास लंबित है और ट्रैक्टर मार्च के बाद दो और याचिकाएं शीर्ष अदालत में दायर हो गयी है। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय के लिये भी सिद्धु की भूमिका को नज़रअन्दाज करना संभव नहीं होगा। क्योंकि इसी आन्दोलन के परिदृश्य में सोलह विपक्षी दलों ने बजट सत्र पर राष्ट्रपति के भाषण के बहिष्कार का फैसला लिया है। सरकार के बल और छल का हारना किसानो की पहली जीत है।

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