एमएसपी की प्रक्रिया को समझना होगा
जब दूसरे उद्योगपति अपने उत्पादों की कीमतें स्वयं तय करते हैं तो किसान के लिए एमएसपी का विरोध क्यों
शिमला/शैल। प्रधानमंत्री ने तीनों कृषि कानूनों को संसद के अगले सत्र में वापस लेने की घोषणा कर दी है। इस घोषणा के साथ ही आंदोलनरत किसानों से घर वापस जाने की अपील की है। परंतु किसानों ने अभी घर वापसी जाने से यह कहकर इंकार कर दिया है कि वह इस घोषणा पर अमल होने तक इंतजार करेंगे। इसी के साथ किसानों ने एम एस पी का वैधानिक प्रावधान किये जाने की भी मांग की है। स्मरणीय है कि केंद्र सरकार ने 10 जुलाई 2013 को पत्र संख्या F.No.-6-3/2012-FEB-ES(VOl-11) के माध्यम से एक आदेश जारी किया था। इस आदेश में कहा गया था कि सरकार ने फसलों की खरीद करने के लिए कम से कम समर्थन मूल्य जारी रखने का फैसला किया है। इसके लिए सरकार की एजेंसियां काम करेंगी और खरीद जारी रखेंगी। इसमें एफसीआई हर प्रकार के अनाज की खरीद करेगी नाफेड, सीडब्ल्यूसी, एनसीसीएफ तथा एसएफएसी दालों और तेल वाले बीजों की खरीदेंगी। नाफेड को कपास खरीदने की भी जिम्मेदारी दी गई थी। लेकिन इन विवादित कृषि कानूनों के आने से यह सारी व्यवस्था तहस महस हो गयी। इस आंदोलन के दौरान भी सरकार यह दावा करती रही की एमएसपी को हटाया नहीं गया है। परंतु व्यवहार में यह कहीं पर भी दिखाई नहीं दिया। इसलिए आज किसान इसका वैधानिक प्रावधान किये जाने की मांग कर रहे हैं।
एमएसपी स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट का परिणाम है और लंबे समय से इस आयोग की रिपोर्ट को लागू करने की मांग चली आ रही है। 2014 के चुनाव में नरेंद्र मोदी ने भी यह वायदा किया था की चुनाव जीतने के बाद कुर्सी पर बैठते ही पहला काम वह इस रिपोर्ट को लागू करने का करेंगे। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। यहां यह भी महत्वपूर्ण है कि सरकार ने 1964 में एक एग्रीकल्चर प्राइसिंग कमीशन बनाया था और इसकी डयूटी लगाई थी की किसान की हर फसल का विक्रय मूल्य तय किया जाये। इस कमीशन नें यह मूल्य तय करते समय किसान की लागत का ध्यान नहीं रखा। इसके लिए 1985 में एक नया एग्रीकल्चर लागत और कीमत कमीशन बनाया गया। इस कमीशन को कीमतें तय करने के लिए 12 बिंदु दिए गये जिनमें एक पैदावार की लागत दो पैदावार के लिए प्रयोग की गई वस्तुओं के मूल्य में बदलाव तीन लागत और पैदावार की कीमतों में संतुलन चार बाजार के झुकाव 5 डिमांड और सप्लाई 6 फसलों का आपसी संतुलन सात तय की जाने वाली कीमत का उद्योग पर असर 8 कीमत का लोगों पर बोझ 9 आम कीमतों पर असर 10 अंतरराष्ट्रीय कीमतों की स्थिति 11 किसान द्वारा दी गई और वसूल की गई कीमत का संतुलन 12 बाजारी कीमतों पर सब्सिडीज का असर। लेकिन इन बिंदुओं को देखने से पता चलता है कि इनमें 4, 5, 7, 9, 10 और 12 का किसान के साथ कोई ताल्लुक नहीं है। इस तरह कीमतें तय करने का नतीजा यह निकला कि किसान का लागत मूल्य एमएसपी से ज्यादा आया। पंजाब हरियाणा उच्च न्यायालय में लंबित किसानों की एक याचिका में इस आश्य के सारे दस्तावेज आ चुके हैं। जिनके मुताबिक लागत और एमएसपी में 300 से लेकर 400 रूपये तक का फर्क है।
न्यूनतम समर्थन मूल्य का अर्थ है कि कम से कम यह कीमत तो मिलनी ही चाहिए। सरकार इसको तीन तरह से तय करती है। A 2 पहले नंबर पर वह लागत जो किसान ने खेत जोतने, बीजने, बीज, तेल और मशीनों के किराये के लिए अपने पास से खर्च की।
A2+FL यानी A2 में फैमिली लेबर इसमें नकद खर्च के अतिरिक्त परिवार द्वारा की गई मेहनत जोड़ी जाती है। C2 यानी कॉम्प्रिहैंसिव कास्ट (व्यापक लागत) नकद किया खर्च जमा पारिवारिक मेहनत जमा जमीन का ठेका किराया या जमीन की कीमत पर बनता ब्याज आदि।
लेकिन सरकार A2 को गिन कर ही एमएसपी का ऐलान करती है। कभी इसमें फैमिली लेबर जोड़ लेती है लेकिन C2 देने को बिल्कुल तैयार नहीं होती। जबकि स्वामीनाथन कमीशन ने C2+ 50% देने की सिफारिश की है। इस परिप्रेक्ष में यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि जब सरकार ने तीनों कानून को वापस लेने का ऐलान कर दिया है तो अब एमएसपी पर भी किसान प्रतिनिधियों से चर्चा करके इसे तय करने के मानक पर सहमति बनाकर इसके लिए वैधानिक प्रावधान कर दिया जाना चाहिए। क्योंकि आज केवल किसान ही ऐसा उत्पादक है जिस की उपज की कीमत दूसरे निर्धारित करते हैं जबकि अन्य सभी उत्पादक अपने उत्पाद की कीमत स्वंय तय करते हैं।

शिमला/शैल। भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक पर प्रदेश के हर राजनेता की निगाहें लगी हुई थी। माना जा रहा था कि प्रदेश में हुए उप चुनावों के बाद हो रही इस बैठक में मुख्यमंत्रा और अन्य नेताओं के साथ चुनाव परिणामों को लेकर चर्चा होगी। परंतु बैठक में हिमाचल और राजस्थान का नाम तक नहीं लिया गया। हाईकमान द्वारा प्रदेश का जिक्र तक ना किये जाने से नेता लोग परेशान हो गये हैं। जो लोग संघ भाजपा की कार्यशैली से परिचित हैं वह जानते हैं कि ऐसे मामलों में संबंधित राज्य के नेताओं से विचार विमर्श की कोई बड़ी प्रथा नहीं है। राज्य के बारे में सारा फीडबैक संघ के माध्यम से लिया जाता है। संघ के निर्देशों पर ही नेतृत्व को लेकर फैसले किये जाते हैं। हिमाचल में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाएं लंबे समय से चली आ रही हैं। लेकिन शायद नड्डा का गृह राज्य होने के कारण यह सवाल टलता रहा। अब जब सरकार चारों उपचुनाव हार गई है तब इससे बड़ा परिणाम और कुछ हो नहीं सकता है। वर्तमान नेतृत्व से सत्ता में वापसी करने की उम्मीद करना अपने को ही अंधेरे में रखना होगा। बल्कि सम्मानजनक हार की उम्मीद भी अपने को झुठलाना होगा। क्योंकि मुख्यमंत्री जिन सलाहकारों में घिर गये हैं उनके कब्जे से बाहर निकलना उनके बस में नहीं रह गया है।
ऐसी वस्तुस्थिति में हाईकमान के पास भी कोई ज्यादा विकल्प नहीं है। लोकसभा में प्रदेश की कुल चार सीटें जिनको केंद्र की सरकार बनने -बनाने में कोई बड़ा योगदान नहीं माना जाता। इसलिये प्रदेश को उसी के हाल पर भी छोड़ा जा सकता है। यदि केंद्र में सरकार बनाने में एक -एक सीट का भी योगदान होने के सिद्धांत को माना जाये तो हाईकमान को प्रदेश को लेकर कोई फैसला अभी लेना आवश्यक हो जायेगा। क्योंकि हिमाचल की यह हार राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का केंद्र बन चुकी है। क्योंकि कुछ न्यूज़ साईट्स ने जयराम ठाकुर के महंगाई के ब्यान को केंद्र के खिलाफ बगावत तक करार दे दिया है। वैसे इस बैठक में हिमाचल का नाम तक ना लिये जाने को कुछ विश्लेषक यह मान रहे हैं कि नेतृत्व को लेकर फैसला लिया जा चुका है और इसी माह में घोषित हो जायेगा। क्योंकि हाईकमान के सामने कांग्रेस द्वारा यूपी चुनाव में 40% टिकट महिलाओं को देने की घोषणा ने भी कुछ गंभीर सवाल खड़े कर दिये हैं। भाजपा के पास इस समय किसी भी राज्य में कोई महिला मुख्यमंत्री नहीं है।
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