Friday, 05 June 2026
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आपको प्रमाणित करना होगा कि आप संपत्ति के मालिक हैं

सरकार के प्रस्तावित लैण्ड टाइटल एक्ट से ऊभरी आशंका
इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए भू अधिग्रहण प्रक्रिया सरल करने के लिए लाया जा रहा है यह एक्ट
विवाद की स्थिति में अदालत नहीं ट्रिब्यूनल में जाना होगा
वन नेशन वन रजिस्ट्रेशन है योजना

लैण्ड टाइटल एक्ट के परिदृश्य में

शिमला/शैल। मोदी सरकार अब लैण्ड टाइटल एक्ट लाने जा रही है। नीति आयोग ने इस प्रस्तावित एक्ट का ड्रॉफ्ट बनाकर केंद्र सरकार को भेज दिया है। केंद्र ने यह ड्राफ्ट राज्य सरकारों को भेजकर इस पर उनकी आपतियां और सुझाव आमंत्रित किये हैं क्योंकि लैण्ड राज्यों का विषय है। यदि राज्य सरकार तय समय सीमा के भीतर अपनी प्रतिक्रियायें केंद्र को नहीं भेजती हैं तो इसे उनकी सहमति मान लिया जायेगा। इसके बाद केंद्र कृषि कानूनों की तर्ज पर एक अध्यादेश जारी करके इसे लागू कर देगा। कुछ राज्यों की सहमति आने के बाद केंद्र इसे संसद में पारित करवा लेगा। राज्य सरकारों के पास नीति आयोग का ड्राफ्ट आ चुका है। हिमाचल सरकार को भी 68 धाराओं वाले इस एक्ट का ड्राफ्ट तीन सौ अनुलगकों के साथ मिल चुका है। लेकिन हिमाचल सरकार ने इसे जनता की जानकारी में नहीं लाया है। जनता से उसकी प्रतिक्रियाएं नहीं मांगी गयी हैं। वन नेंशन वन रजिस्टेशन के नाम पर यह एक्ट लाया जा रहा है। माना जा रहा है कि नागरिकता संशोधन अधिनियम में जिस तरह से व्यक्ति को अपनी नागरिकता प्रमाणित करने की वस्तु स्थिति पैदा हो गयी थी उसी तरह व्यक्ति को अपनी अचल संपत्ति का स्वामित्व प्रमाणित करने की स्थिति आ जायेगी।
इस एक्ट के आने से नीति आयोग के ड्राफ्ट के मुताबिक इससे राज्य सरकारों को यह अधिकार मिल जायेगा will provide state governments power to order for establishment, administration and management of a system of title registration of immovable properties नीति आयोग के मुताबिक यह एक्ट आने से इंफ्रास्ट्रक्चर योजनाओं के लिये भूमि अधिग्रहण और उसमें मुआवजा देने की प्रतिक्रिया सरल हो जायेगी। इस समय राज्य सरकार राष्ट्रीय उच्च मार्ग, ट्रेन रेलवे ट्रैक, रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट, विद्युत उत्पादन और संचारण ऑयल और गैस पाइपलाइन टेलीकॉम खनिज व खाने आदि को निजी क्षेत्र को देने की योजना बना चुकी है। निजी क्षेत्र को इसमें अपना इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने के लिए भूमि चाहिये। इस भूमि के अधिग्रहण की प्रक्रिया यह एक्ट आने से सरल हो जायेगी। क्योंकि इसमें आने वाले विवाद का निपटारा करने के लिए कानूनी व्यवस्था भी बदल दी गयी है।
एक्ट में यह दावा किया गया है कि Act to provide for the establishment, administration and management of a system of conclusive property titles with title guarantee and indemnification against losses due to inaccuracies in property titles, through registration of immovable properties and further to amend the relevant Acts as stated in the Schedule. इस दावे में जिन कमियों का कवर लिया जा रहा है वैसी ही गलतियां आगे नहीं होंगी ऐसा दावा कैसे किया जा सकता है। क्या नाम लिखने में उच्चारण के कारण गलती नहीं हो सकती। इस समय सरकार यह दावा कर रही है कि 90 प्रतिशत गांव में अभिलेखों को कंप्यूटरीकृत कर दिया गया है। 655959 चिन्हित गांव में से 591221 गांव का रिकॉर्ड कंप्यूटर पर ला दिया गया है। क्या इसमें नाम आदि लिखने में गलती नहीं हुई होगी। नये एक्ट में तो राजस्व से संबंधित दस्तावेज पहले देखे ही नहीं जायेंगे। इसमें रजिस्ट्रेशन के नाम पर एक आईडी नंबर दे दिया जायेगा। इसमें हुई गलती को ठीक करवाने की जिम्मेदारी संपत्ति के मालिक की होगी। उसके लिए उसे संबंधित कार्यालयों के चक्कर काटने की मजबूरी हो जायेगी। सरकार यह व्यवस्था इसलिये ला रही है क्योंकि न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर और यूके में ऐसा है। क्या यह व्यवस्था लाने के लिए संसद और आम आदमी के साथ एक विस्तृत बहस की आवश्यकता नहीं होनी चाहिये। क्योंकि इसमें हर गांव और संपत्ति मालिक प्रभावित होगा। यदि सीधे नीति आयोग के ड्राफ्ट को एक्ट की शक्ल दे दी गयी तो एक बार फिर नागरिकता आंदोलन जैसे हालात पैदा होने की स्थिति बन जायेगी।



क्या प्रतिभा सिंह स्व.वीरभद्र सिंह की भूमिका में आना चाह रही हैं

सिराज में ब्यानों से उठी चर्च
क्या चुनाव से पहले हिमाचल में भी जांच एजेंसियां सक्रिय होंगी

शिमला/शैल । उपचुनावों में चारों सीटों पर जीत दर्ज करने के बाद प्रदेश कांग्रेस में जो कुछ घटना शुरू हुआ है वह राजनीतिक विश्लेषकों के लिए एक रोचक विषय बनता जा रहा है। केंद्र में 2014 में भाजपा ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में कांग्रेस से सत्ता छीनी थी। उस समय हिमाचल में स्व.वीरभद्र सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी। तब कांग्रेस प्रदेश की चारों लोकसभा सीटें हार गयी थी। उसके बाद वीरभद्र के नेतृत्व में ही विधानसभा के चुनाव हुये और पार्टी हार गयी। फिर 2019 के लोकसभा चुनावों में पुनः पार्टी चारों सीटें हार गयी। यह एक कड़वा सच है। तीन चुनावो में वीरभद्र जैसे नेता के नेतृत्व में लगातार हार जाने के कारणों पर आज तक पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक वक्तव्य नहीं आया है। लेकिन तटस्थ विश्लेषकों की नजर में इस दौरान जो कुछ घटा है उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 2014 और 2017 के चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर प्रदेश भाजपा के कार्यकर्ताओं तक ने वीरभद्र परिवार के खिलाफ बने आयकर सीबीआई और ईडी के मामलों को सबने पूरे जोर से उछाला और भ्रष्टाचार की ऐसी छवि बना दी जिससे अंत तक लड़ना पड़ा। दूसरी और पार्टी में प्रदेश अध्यक्षों के साथ लगातार टकराव की स्थिति रही जो एक समय वीरभद्र ब्रिगेड के गठन तक पहुंच गयी। ब्रिगेड के अध्यक्ष और पार्टी के अध्यक्ष में मानहानि के मामले दायर होने तक स्थिति पहुंच गयी। इसी दौरान यह भी सामने आया कि 45 विधान सभा क्षेत्रों में समानान्तर सत्ता केंद्र स्थापित हो चुके थे और वही हार का कारण बने थे। हार के बाद अध्यक्ष और मुख्यमंत्री में हुये संवाद में यह सब कुछ जगजाहिर हो चुका है। यही नहीं 2019 के लोकसभा चुनाव में मण्डी के प्रत्याशी को लेकर यह बयान आ गया कि कोई भी ‘मक्कर झंडू ’ चुनाव लड़ लेगा। वीरभद्र जैसे बड़े नेता के ऐसे ब्यानों का जनता पर क्या और कैसा असर हुआ होगा यह अंदाजा लगाया जा सकता है। इसी परिदृश्य में प्रदेश अध्यक्ष को बदला गया। 2019 की हार के बाद तो यहां तक चर्चाएं चल निकली कि कांग्रेस के कई बड़े नेता पार्टी छोड़कर भाजपा में जाने का जुगाड़ देख रहे हैं। यह माना जाता है कि यदि बंगाल में भाजपा की जीत पर रोक न लगती तो आज कई कांग्रेस नेता भाजपा में जा चुके होते।
इसी परिदृश्य में यदि 2014 से लेकर आज तक प्रदेश कांग्रेस बतौर विपक्ष भूमिका का आकलन किया जाये तो कोई बड़ी उपलब्धि रिकॉर्ड पर नहीं आती है। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि कांग्रेस से ज्यादा सशक्त भूमिका कुछ छोटे अखबारों और स्वयं भाजपाइयों ने निभाई है। जो समय- समय पर पत्र बम्ब दागते रहे। ऐसी वस्तु स्थिति में कांग्रेस ने पहले दो नगर निगम और फिर चारों उपचुनाव जीतकर सही में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। यह एक जमीनी सच्चाई है कि यदि वीरभद्र की मौत के बाद उनके परिवार से किसी को मण्डी से प्रत्याशी न बनाया जाता तो शायद यह सीट हाथ न आती। लेकिन इस जीत में यदि कौल सिंह ठाकुर, सुखविंदर सिंह सुक्खू और पंडित सुखराम के पौत्र आश्रय शर्मा का सक्रिय योगदान न रहता तो भी यह जीत संदिग्ध हो जाती। ऐसे में इस जीत के बाद प्रतिभा सिंह का यह ब्यान कि आश्रय तो सक्रिय राजनीति में ही नहीं है और सिराज से पार्टी उम्मीदवार का ऐलान कर देना पार्टी के लिए नुकसानदेह हो सकता है। क्योंकि आने वाले दिनों में वह नेता कार्यकर्ता जो वीरभद्र ब्रिगेड में शामिल हो गये वह प्रतिभा सिंह और विक्रमादित्य सिंह के सहारे अपने लिये सक्रिय स्थान की मांग करेंगे। अभी शायद प्रतिभा सिंह और विक्रमादित्य मिलकर भी ब्रिगेड के लोगों को स्थापित नहीं करवा पायेंगे। इसी कड़ी में यह व्यवहारिक सच है कि जो लोग स्व. वीरभद्र सिंह के साथ जुड़े हुए थे उनके हितों की रक्षा करने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकते थे। मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने के लिए राजा नालागढ़ विजेंद्र सिंह और फिर पंडित सुखराम को मात देने के लिए किस हद तक चले गए थे यह शायद आज बहुत कम लोगों को जानकारी है। जो वीरभद्र कर गुजरते थे उस मुकाम तक पहुंचने के लिए प्रतिभा सिंह और विक्रमादित्य को समय लगेगा। इस परिपेक्ष में आज जब प्रतिभा सिंह सिराज से आश्रय शर्मा को लेकर बयान देंगे और वहां से अगले उम्मीदवार की भी घोषणा कर देंगी तो निश्चित रूप से उनके ब्यान को शिमला से लेकर दिल्ली तक अलग-अलग अर्थों से पढ़ा जायेगा।
यहीं पर कांग्रेस को यह भी याद रखना होगा कि भाजपा की एक यह भी रणनीति रहती है कि वह चुनाव से पहले अपने विरोधियों के खिलाफ केंद्रीय और राज्यों की जांच एजेंसियों को भी फील्ड में उतार देती है। हिमाचल में भी इस संभावना से इन्कार करना अपने को अंधेरे में रखने जैसा ही होगा। प्रशासन के उच्च हलकों में चल रही गतिविधियों के संकेतों को यदि पढ़ा जाये तो कांग्रेस के आधा दर्जन नेताओं के खिलाफ जांच एजेंसियों को सक्रिय करने की कवायद चल रही है। भाजपा ने बतौर विपक्ष जो आरोप पत्र सौंपे थे उन पर कारवाई किये जाने पर विचार किया जा रहा है। कुछ सूत्रों पर विश्वास किया जाये तो कांग्रेस द्वारा अब तक सरकार के खिलाफ कोई आरोप पत्र न लाया जाना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। कांग्रेस के ही कुछ लोग सरकार के माध्यम से अपने ही लोगों को घेरने का प्रबन्ध करने में लगे हुये हैं। ऐसे में प्रदेश कांग्रेस के भीतर ही एक दूसरे को पटखनी देने की जो बिसात बिछाई जा रही है उसके परिणाम संगठन के लिये सुखद नहीं रहेंगे यह तय है। यदि कांग्रेस की एकजुटता में कहीं से भी कोई छेद नजर आया तो उसे बड़ी खाई बनने में कोई वक्त नहीं लगेगा।

शिमला स्मार्ट सिटी परियोजना के पूरा होने पर उठने लगे सवाल

एनजीटी के फैसले के बाद प्राइवेट निवेशक नहीं आ रहे आगे
क्या हजारों करोड़ का कर्ज लेकर पूरी की जानी चाहिए यह योजना

शिमला/शैल। नगर निगम शिमला के चुनाव से पहले इसके वार्डों की संख्या 34 से बढ़ाकर 42 की जा रही है। निगम क्षेत्र के साथ लगते छः पंचायतों के कुछ क्षेत्रों को इसमें मिलाकर नगर निगम का एरिया बढ़ाया जा रहा है। निगम प्रशासन का यह दावा है कि इन क्षेत्रों से इस आशय की मांग आयी है। जिसे स्वीकार करके शहरी विकास निदेशालय को भेज दिया गया है। माना जा रहा है कि सरकार जल्द ही इस प्रस्ताव को मानकर जिला प्रशासन से इसका पुनः सीमांकन करवा देगी। दूसरी ओर इस वार्ड बढ़ौतरी के खिलाफ ग्रामीण क्षेत्रों और शहर के भीतर भी दोनों तरफ रोष है। यह रोष इसलिए है कि निगम प्रशासन इस समय लोगों को आवश्यक सेवाओं की पूर्ति नियमित रूप से नहीं कर पा रहा है तो एरिया बढ़ने पर कैसे कर पायेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में इसको लेकर रोष है कि नगर निगम में शामिल होते ही उन पर वह सारे शुल्क लागू हो जायेंगे जो निगम में देय हैं। यह रोष एकदम सही है और यह बढ़ौतरी कुछ राजनेताओं अधिकारियों के इशारे पर हो रही है। क्योंकि इन क्षेत्रों में कुछ बड़े राजनेताओं और अधिकारियों की संपत्तियां हैं। जिनके लिए निगम क्षेत्रों में मिलने वाली सुविधायें चाहिए।
इस समय की व्यवहारिक स्थिति यह है कि शिमला को स्मार्ट सिटी योजना के तहत लाया गया है। इस पर 2905 करोड़ का निवेश होगा। यहां पर दो सवाल खड़े होते हैं कि यह निवेश आयेगा कहां से और स्मार्ट सिटी को अवधारणा क्या है। स्मार्ट सिटी को इस तरह से परिभाषित किया गया है कि A smart city uses information and communication technology (ICT) to improve operational efficiency, share information with the public and provide a better quality of government service and citizen welfare. इस अवधारणा से स्पष्ट हो जाता है कि स्मार्ट सिटी के लिए जिस तरह के प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल किया जाना है उसके लिये निजी क्षेत्र की सेवाएं लेनी ही पड़ेगी। क्योंकि सब कुछ डिजिटल होना है। इसके लिये निजी क्षेत्र को जो पैसा दिया जायेगा उसका प्रबंध स्मार्ट सिटी प्रशासन को करना होगा। प्रशासन इसे उपभोक्ताओं से वसूलेगा। इस वसूलने में सारी सेवाएं बहुत महंगी हो जायेंगी। उस समय यह सामने आयेगा कि उपभोक्ता यह महंगी सेवायें ले पायेंगे या नहीं। निगम प्रशासन के पास आज ही आर्थिक साधन नहीं है। इस समय जलापूर्ति और गारवेज तथा स्ट्रीट लाइटों का प्रबंधन प्राइवेट सेक्टर के पास है और यह सेवायें लगातार महंगी होती जा रही है और सुचारू रूप से उपलब्ध भी नहीं हो पा रही हैं।
स्मार्ट सिटी परियोजना 2905 करोड़ की है। जिसमें केंद्र ने सिर्फ 500 करोड़ देने की बात की है। शेष 2500 करोड का प्रबंध सरकार और प्रबंधन को कर्ज उठाकर करना पड़ेगा। स्मार्ट सिटी के लिये नये निर्माण करने होंगे। लेकिन पर्यावरण संरक्षण और शिमला की भूकंपीय स्थिति को सामने रखते हुए एनजीटी ने यहां नये निर्माणों पर प्रतिबंध लगा रखा है। प्रदेश उच्च न्यायालय और प्रदेश सरकार को अनुमति नहीं दी गयी है। ऐसे स्मार्ट सिटी के नाम पर कैसे अनुमति मिल पायेगी यह सवाल बना हुआ है। एनजीटी के फैसले के कारण प्राइवेट क्षेत्र स्मार्ट सिटी में निवेश के लिए आगे नहीं आ रहे है। प्रदेश सरकार भी अपने साधनों से इतना निवेश करने की स्थिति में नहीं है। फिर स्मार्ट सिटी पर इतना निवेश करने के बाद भी यहां के हर घर तक फायरब्रिगेड और एंबुलेंस सेवा नहीं पहुंच पायेगी। ऐसे में यह सवाल बड़ा होता जा रहा है कि इतना कर्ज लेकर स्मार्ट सिटी बनाई जानी चाहिए? क्या नये क्षेत्रों को मिलाने से यह निवेश की समस्या सुलझ पायेंगी? क्या स्मार्ट सिटी प्रशासन के पास इतने कर्ज का ब्याज चुकाने और इसके लिए इस्तेमाल होने वाली प्रौद्योगिकी की सेवाओं का भार उठाने के संसाधन हो पायेंगे। इस परिदृश्य में आशंका बनी हुई है कि कहीं यह परियोजना बीच में ही बंद न हो जाये।

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