केजरीवाल और मोदी सरकार दोनों अन्ना आंदोलन के परिणाम है
इस नाते केंद्र पर उठते सवालों का जवाब केजरीवाल से मांगना जरूरी हो जाता हैै

शिमला/शैल। पंजाब में आम आदमी पार्टी की जीत के बाद पार्टी ने हिमाचल में भी विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। चुनाव लड़ना उसका अधिकार है इसलिए चुनाव लड़ने पर सवाल नहीं उठाये जा सकते। लेकिन चुनावों से देश/प्रदेश और उसकी जनता का भविष्य तय होता है इसलिए चुनाव लड़ने वाला चाहे कोई राजनीतिक दल हो या व्यक्ति उसकी नीयत नीति और राजनीति को समझना आवश्यक हो जाता है। आम आदमी पार्टी के संदर्भ में यह सवाल इसलिये अहम हो जाते हैं कि उसने पंजाब जीतने के बाद यह दावा किया है कि भाजपा का विकल्प होने का दम कांग्रेस में नहीं वरन आप में है। आप को अभी किसी पूर्ण राज्य में सरकार बनाने और चलाने का पहली बार पंजाब में मौका मिला है। आम आदमी पार्टी दिल्ली मॉडल से देश और राज्यों को चलाने का दावा कर रही है। दिल्ली एक ऐसा केंद्र शासित राज्य हैं जहां पर वहां की सरकार के अधिकार बहुत सीमित हैं। केजरीवाल सरकार का उप राज्यपाल से टकराव चला ही रहता है। केजरीवाल सरकार प्रायः यह आरोप लगाती रहती है कि केंद्र सरकार उसे चलने नहीं देती है। अधिकारों की लड़ाई सर्वाेच्च न्यायालय तक भी पहुंची है। केजरीवाल तीन बार प्रचंड बहुमत के साथ दिल्ली के मुख्यमंत्री बने हैं। लेकिन लोकसभा लगातार हार रहे हैं। दिल्ली की नगर निगम पर भी उसका कब्जा नहीं है। ऐसा क्यों है यह अभी तक रहस्य बना हुआ है। दिल्ली एक ऐसा प्रदेश है जिसका कर राजस्व पूरे देश में सबसे ज्यादा है। दिल्ली में कर्मचारियों के एक बड़े वर्ग को वेतन केंद्र सरकार देती है ऐसा अन्य राज्यों में नहीं है।
अभी आम आदमी पार्टी ने उत्तराखंड और गोवा में भी सरकार बनाने के पूरे दावों के साथ चुनाव लड़ा था। लेकिन वहां पर उसे कोई सफलता नहीं मिली है। बल्कि उसका चुनाव लड़ना भाजपा की जीत का एक बड़ा सहायक सिद्ध हुआ है। उत्तर प्रदेश में भी आप इसी भूमिका में रहा है। लेकिन पंजाब में उसे प्रचंड बहुमत मिला है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि एक ही वक्त में इतना बड़ा विरोधाभास कैसे घट गया? क्या पंजाब की जनता कांग्रेस से मुक्ति चाहती थी क्योंकि पंजाब में जनसंघ से लेकर भाजपा तक की अकाली दल के सहारे ही सत्ता में भागीदारी रही है। इस बार जब कृषि कानूनों के कारण अकाली दल ने भाजपा का साथ छोड़ दिया तो स्वभाविक रूप से वहां पर भाजपा का कुछ भी दांव पर नहीं रहा। भाजपा को जो चुनौती राष्ट्रीय दल कांग्रेस से है वह किसी भी क्षेत्राीय दल से नहीं है। आज भी भाजपा और कांग्रेस में लोकसभा की 200 सीटों पर सीधी टक्कर है। इसलिए भाजपा का यह प्रयास रहेगा कि वह कांग्रेस को कमजोर करने के लिये किसी दल का परोक्ष/अपरोक्ष में साथ ले। इस समय देश एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां पर राष्ट्रीय हितों को दलों के हित से पहले रखना होगा।
2014 में अन्ना आंदोलन जिन मुद्दों पर आया था उन में भ्रष्टाचार और महंगाई तथा बेरोजगारी सबसे प्रमुख थे। इन मुद्दों पर कांग्रेस को भ्रष्टाचार का पर्याय करार दे दिया गया था। काले धन के बड़े-बड़े आंकड़े परोस कर हर आदमी के खाते में पन्द्रह-पन्द्रह लाख आने का सपना दिखाया गया था। क्या 2014 के वादे पूरे हुये हैं। हर चुनाव में पुराने मुद्दों को भुलाकर नये मुद्दे गढ़े जाते रहे हैं। लेकिन यह सवाल नहीं पूछा गया कि यह दावे और वादे पूरे क्यों नहीं हुये। जिस चीन का डर देश को लगातार परोसा जा रहा है उसी के साथ व्यापार भी क्यों बढ़ता जा रहा है। 2014 से लगातार देश भाजपा और मोदी पर विश्वास करता आ रहा है। लेकिन इस विश्वास का प्रतिफल जनता को महंगाई और बेरोजगारी के रूप में क्यों दिया जा रहा है। विनिवेश और मौद्रीकरण के नाम पर राष्ट्रीय संपत्तियों को प्राइवेट सैक्टर के हवाले क्यों किया जा रहा है। चुनाव आयोग की विश्वसनीयता क्यों खत्म हो रही है। इसे बहाल करने के लिए पुनः बैलेट पेपर से मतदान की व्यवस्था क्यों नहीं की जा रही है। हिमाचल प्रदेश में ही विपक्ष सरकार से कर्जाें और केंद्रीय सहायता पर श्वेत पत्र की मांग कर रहा है। क्या आप इन सवालों को चुनावी मुद्दा बनायेगा या सिर्फ कुछ चीजें मुफ्त देने के वायदों से ही जनता को ठग लेगा।
आप से यह सवाल इसलिए किये जा रहे हैं क्योंकि केजरीवाल अन्ना आंदोलन का प्रतिफल है। अन्ना आज सारे परिदृश्य से गायब है। लेकिन केजरीवाल भी इन मुद्दों पर खामोश हैं। इसलिए आज जब केजरीवाल की आप प्रदेश में सरकार बनाने के दावे के साथ चुनाव लड़ने जा रही है तो उसके हर आदमी से यह सवाल पूछने आवश्यक हो जाते हैं। अन्ना का आंदोलन संघ से प्रायोजित था यह सामने आ चुका है। उस आंदोलन का अन्ना के बाद दूसरा बड़ा नाम केजरीवाल है। केंद्र की मोदी सरकार इसी आंदोलन का परिणाम है। इसलिए मोदी सरकार पर उठने वाले हर सवाल सवाल का जवाब केजरीवाल और उसकी टीम से मांगना आवश्यक हो जाता है।
नगर निगम चुनावों के आईने में कुछ सवाल
क्या नगर निगम का क्षेत्र विस्तार किया जाना चाहिये
प्रदेश में पिछले 30 दिनों में भूकंप के 32 छटके आ चुके हैं
पिछले एक वर्ष में 250 से ज्यादा भूकंप प्रदेश में आये हैं
क्या इस पर चिंता की जानी चाहिये
क्या नगर निगम चुनाव से पूर्व इन मुद्दों पर राजनीतिक दलों से सवाल नहीं पूछे जाने चाहिये
शिमला/शैल। नगर निगम शिमला के चुनाव मई में होने जा रहे हैं इन चुनावों के लिये कांग्रेस और भाजपा दोनों बड़े राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी चुनाव टीमों की घोषणा कर दी है। वर्तमान में इस नगर निगम पर भाजपा का कब्जा है। इससे पहले महापौर और उपमहापौर दोनों पदों पर सीधे चुनाव में सी.पी.एम. का कब्जा रहा है। उससे पहले लंबे समय तक नगर निगम पर कांग्रेस का कब्जा रहा है। इस नाते नगर की जनता के सामने तीनों के शासनकाल का तुलनात्मक आकलन करने का पर्याप्त अवसर है। कुछ सोशल मीडिया की पोस्टों के माध्यम से यह भी सामने आ रहा है कि आम आदमी पार्टी भी इस चुनाव में उतरने जा रही है। लेकिन उसकी नीयत और गंभीरता का पता इसी से चल जाता है कि जब उसके नेता जनता से आप या भाजपा दोनों में से एक को चुनने की अपील करते हैं। इस अपील का अर्थ है कि यदि आप को नहीं चाहते हो तो भाजपा को समर्थन दे दो। राजनीतिक दलों के इस आपसी तालमेल के बीच शिमला की मुख्य समस्याओं पर चर्चा उठाना महत्वपूर्ण और आवश्यक हो जाता है। क्योंकि इस समय प्रदेश में भी भाजपा की सरकार और नगर निगम पर भी उसी का कब्जा है। इन चुनावों से पहले नगर निगम का क्षेत्र विस्तार किया जा रहा है। शिमला से लगते कुछ पंचायतांे के गांव को इसमें मिलाकर 44 वार्ड बनाये जा रहे हैं। इस प्रस्तावित विस्तार के खिलाफ शहर के विभिन्न भागों से आपत्तियां आयी हैं। जिनमें कैथू, भराड़ी और समरहिल प्रमुख हैं। यह आपत्तियां इस कारण आयी कि निगम प्रशासन वर्तमान क्षेत्र में ही सुविधाओं की आपूर्ति उचित रूप से नहीं कर पा रहा है तो क्षेत्र विस्तार के बाद और कठिन हो जायेगा। जबकि निगम ने अधिकांश कार्य प्राइवेट सैक्टर के हवाले कर रखे हैं। नगर निगम के पास अपनी आय के साधन इतने नहीं हैं जिनसे उसके खर्चे निकल सकें। क्योंकि वन आदि संपत्तियां सरकार ने पहले ही निगम से अपने पास ले ली हैं। ऐसे में खर्चे निकालने के लिए सेवायें महंगी करने और लोगों पर करों का बोझ बढ़ाने के अतिरिक्त और कोई साधन नहीं रह जाता है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कौन सा राजनीतिक दल चुनाव में इस पर बात करेगा।
इससे हटकर इस समय शिमला भवन निर्माणों की सबसे बड़ी समस्या से जूझ रहा है। क्योंकि 1977 में जनता पार्टी के शासन में तब की शांता कुमार सरकार ने प्रदेश को टी.सी.पी. विभाग तो बना कर दे दिया लेकिन इसके लिए कोई स्थाई प्लानिंग पॉलिसी नहीं दे पाये। यह विभाग भी तब इसलिये बनाना पड़ा था कि प्रदेश उससे पहले किन्नौर भूकंप की त्रासदी झेल चुका था और शिमला नगर का भी एक बहुत बड़ा भाग इसकी चपेट में आ गया था। उस समय शिमला के ऐतिहासिक रिज मैदान को जो नुकसान पहुंचा था उसकी भरपाई आज तक सैकड़ों करोड़ खर्च करके नहीं हो पायी है। उस कारण प्रदेश के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लिये एक निश्चित नियोजन नीति लाने का दबाव आया था। लेकिन तब से लेकर आज तक आयी सरकारें यह पॉलिसी नहीं ला पायी। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि शिमला नगर पालिका से नगर निगम बन गया और भवन निर्माणों को नियोजित करने के लिये इसके पास अपने जो नियम कानून थे उन्हें भी सरकारों ने रिटेंशन पॉलिसीयां लाकर स्वाह कर दिया। अवैध निर्माणों को इन पॉलिसियों के सहारे बढ़ावा दिया जाता रहा। प्रदेश में इस दौरान कांग्रेस और भाजपा की ही सरकारी रही हैं। दोनों सरकारों के समय में रिटेंशन पॉलिसीयां लायी गयी। नौ बार यह पॉलिसी लाकर अवैधताओं को प्रोत्साहित किया गया। इन अवैधताओं का संज्ञान लेकर जब-जब प्रदेश उच्च न्यायालय ने इन्हें रोकने का प्रयास किया तभी दोनों दलों ने अपरोक्ष में हाथ मिलाकर राजभवन को भी प्रभावित किया है। राष्ट्रीय स्तर पर इसको लेकर कई बार चिंतायें व्यक्त की गयी और इन्हीं चिंताओं का परिणाम था कि सरकार को अधिकारियों के स्तर पर कमेटी का गठन करना पड़ा। पहली कमेटी आर.डी.धीमान की अध्यक्षता में बनी और दूसरी तरूण कपूर की अध्यक्षता में। इन कमेटियों की सिफारिशों के आधार पर ही नवम्बर 2017 का एन.जी.टी. का फैसला आया है। इसी फैसले में एनजीटी ने स्थाई प्लानिंग पॉलिसी लाने के निर्देश दिये हैं एन.जी.टी. ने शिमला में नये निर्माणों पर प्रतिबंध लगा रखा है। जिसमें कोर एरिया में तो कड़ा प्रतिबंध है। एन.जी.टी. के फैसले की अनुपालना की जिम्मेदारी स्वभाविक रूप से जयराम सरकार पर आयी। लेकिन भाजपा तो अवैधताओं को बढ़ावा देने में बड़ी भूमिका निभा चुकी है। इसलिये एन.जी.टी. के फैसले के खिलाफ प्रदेश उच्च न्यायालय में याचिका दायर हो गयी।
इसी बीच सरकार ने सचिवालय में स्व.नरेंद्र बरागटा ने एन.जी.टी. से कुछ निर्माणों की अनुमति मांगी जिसे अस्वीकार कर दिया गया। इसके बाद प्रदेश उच्च न्यायालय ने भी अपने पुराने भवन को गिराकर नया निर्माण करने की अनुमति मांगी। लेकिन उच्च न्यायालय को भी यह अनुमति नहीं दी गयी। इस फैसले में भी एन.जी.टी. ने प्लानिंग पॉलिसी लाने में हो रही देरी के लिये सरकार की निंदा की गयी है। इसमें फिर दोहराया गया है कि शिमला को बचाने के लिये यहां से कार्यालयों को प्रदेश के दूसरे भागों में ले जाया जाये। लेकिन सरकार जो अब करीब तीन सौ पन्नों की शिमला के लिये योजना लेकर आयी है वह एन.जी.टी. और सरकार की अपनी कमेटियों की सिफारिशों से एकदम उलट है। सरकार की पॉलिसी को लेकर आये त्रिलोक जमवाल के ब्यान के मुताबिक सरकार कोर एरिया में भी दो मंजिलें, पार्किंग और एटिक के निर्माण की अनुमति होगी। नॉन कोर एरिया में रिहायशी भवनों के अतिरिक्त दुकानों व्यवसायिक परिसर और होटल आदि के निर्माण की भी सुविधा होगी। भवन निर्माण में तीन मंजिल प्लस पार्किंग और एटिक की अनुमति होगी।
इस परिपेक्ष में यह समझना आवश्यक हो जाता है कि आखिर एन.जी.टी. निर्माणों पर प्रतिबंध की सिफारिश क्यों कर रहा है। स्मरणीय है कि हिमाचल भूकंप जोन में आता है। शिमला नगर का भी बहुत बड़ा भाग स्लाइडिंग जोन में आता है और सरकार इसे मानती है। उच्च न्यायालय का अपना भवन इसी जोन में है। रिज के धंसने की समस्या लगातार जारी है। पिछले वर्ष कच्ची घाटी में एक आठ मंजिला भवन गिर चुका है। इससे पहले फिंगास्क स्टेट में भी ऐसा हादसा हो चुका है। सरकार के अपने अध्ययन के मुताबिक शिमला में भूकंप आने पर करीब चालीस हजार लोगों की जान जा सकती है। 70% से अधिक निर्माण प्रभावित हो सकते हैं। इस समय ही अदालत में आयी जानकारी के मुताबिक तीस हजार भवनों के नक्शे तक पास नहीं हैं। ऐसी स्थिति में यदि प्रदेश में आ रहे भूकंपों की बात की जाये तो एन.जी.टी. की चिंता को समझा जा सकता है। 4 अप्रैल 1905 को जो कांगड़ा में भूकंप आया था उससे 28000 लोगों की मौत हो गई थी। 1906 में कुल्लू और 1930 में सुल्तानपुर में भूकंप आ चुके हैं। पिछले कुछ अरसे से भूकंप लगातार बढ़ते जा रहे हैं। मेटीरियोलॉजिक सैन्टर के मुताबिक पिछले 30 दिनों में 28-02-2022 तक 4.8 की तीव्रता के 32 झटके प्रदेश में आ चुके हैं। पिछले एक वर्ष में प्रदेश 250 से ज्यादा भूकंप झेल चुका है और हर जिले में भूकंप आ रहे हैं। विभाग के अध्ययन 2018 से बड़े भूकंप की चेतावनी लगातार देते आ रहे हैं। इसका बड़ा कारण पर्यावरण के साथ खिलवाड़ किया जाना माना जा रहा है। इस परिदृश्य में यह सरकार की जिम्मेदारी हो जाती है कि वह राजनीतिक पूर्वाग्रह से ऊपर उठकर इन अध्ययनों के अनुसार फैसले ले और भविष्य में होने वाले संभावित नुकसान से बचने के कदम उठाये। सरकार जो योजना लेकर आयी है उसका आकलन इन व्यवहारिक पक्षों के आईने में किया जाना चाहिये। यह सही है कि इस पॉलिसी पर एन.जी.टी. भी विचार करेगा। लेकिन सरकारें जिस तरह से पूर्व में अदालत और अपनी ही सिफारिशों को नजरअंदाज करती रही है उसको सामने रखकर इन चुनावों में इस पर एक विस्तृत बहस उठाया जाना आवश्यक हो जाता है।
2016 से लग रहे हैं यह आरोप
केजरीवाल को आरोपों का हां या न में जवाब देने में आपत्ति क्यो?
केजरीवाल सरकार का कर्ज भार क्यों बढ़ रहा है और कैपिटल परिव्यय क्यों कम हो रहा है?
शिमला/शैल।आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक रहे डॉ कुमार विश्वास का एक वीडियो वायरल हुआ है। इस वीडियो में दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अरविंद केजरीवाल के खिलाफ संगीन आरोप लगा है कि वह खालिस्तान की मांग करने वालों के समर्थक हैं। खालिस्तान के समर्थक उनके घर आते थे और उन्होंने चुनाव में उनकी मदद की है। कुमार विश्वास 2016 से यह आरोप लगाते आ रहे हैं। 2017 में के.पी.एस. गिल ने भी कुछ इसी तरह की आशंका व्यक्त की हैै। 3 फरवरी 2017 को के.पी.एस. गिल ने इंडियन एक्सप्रेस से इस संदर्भ में बात की है। उस समय मीडिया ने इस आरोप को गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन कुमार विश्वास पर यह आरोप नहीं लगाया जा सकता कि वह पहली बार किसी राजनीति से प्रेरित होकर यह आरोप लगा रहे हैं। इस समय चुनाव हो रहे हैं और आप पंजाब उत्तराखंड और गोवा में सरकार बनाने के दावे के साथ चुनाव में उतरी हैं। इसलिए राजनीतिक पार्टियों के लिए कुमार विश्वास के आरोप एक गंभीर मुद्दा हो जाते हैं। फिर पिछले कुछ दिनों से हिमाचल में भी कई लोगों को खालिस्तान समर्थकों की ओर से धमकी भरे फोन आते रहे हैं। हिमाचल के भी कई क्षेत्रों को खालीस्तान में मिलाये जाने के संदेश दिये जाते रहे हैं।
इस परिदृश्य में यदि किसी राजनेता या उसकी पार्टी पर खालीस्तान का समर्थन करने के आरोप लगते हैं तो उन्हें हल्के से नहीं लिया जा सकता ना ही राजनीति के नाम पर उन्हें नजरअंदाज किया जा सकता है। संभवत इसी गंभीरता को देखते हुए पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने इसको लेकर गृह मंत्रालय को इन आरोपों की जांच करवाने के लिए पत्र लिखा। केंद्रीय गृह मंत्री ने भी इसी गंभीरता के कारण इस मामले की जांच करवाये जाने का आश्वासन दिया है। अब यह केंद्रीय गृह मंत्री की जिम्मेदारी हो जाती है कि वह इन आरोपों की जांच के परिणाम को देश की जनता के सामने रखें। लेकिन इन आरोपों का जवाब जिस तरह से केजरीवाल ने दिया है उससे आरोपों की गंभीरता कम नहीं हो जाती है। क्योंकि केजरीवाल ने इसका सीधा जवाब नहीं दिया है कि खालीस्तान के समर्थकों के साथ उनकी कोई बैठक हुई है या नहीं। क्योंकि कुमार विश्वास ने दावा किया है कि उन्होंने अपनी आंखों से इस बैठक को देखा है। यदि कुमार विश्वास की बात पर हास्य कवि होने के कारण विश्वास नहीं किया जा सकता तो केजरीवाल पर मुख्यमंत्री होने के नाम पर ही विश्वास कैसे कर लिया जाये। फिर किसी भी बड़े राजनेता पर अब अविश्वास करने का कोई आधार नहीं रह जाता है। केजरीवाल ने जब यह दावा किया कि उनके खिलाफ केंद्र ने कई जांचें करवा ली है और उनमें कुछ नहीं निकला है। तब यह नहीं बताया गया है कि इन जांचों का मुद्दा यह आरोप नहीं था। इसी के साथ केजरीवाल ने केंद्रीय एजेंसियों की काबिलियत पर भी सवाल उठाया है। लेकिन इन एजेंसियों के संदर्भ में यह भी महत्वपूर्ण है कि एन आई ए जैसी एजैंसी में एक अधिकारी ग्यारह वर्ष काम करने के बाद पकड़ा गया है।
जहां तक दिल्ली में केजरीवाल के प्रशासन और सरकार का सवाल है तो उसके लिए कैग रिपोर्ट में आये तथ्यों से काफी कुछ स्पष्ट हो जाता है। केजरीवाल ने जब सत्ता संभाली थी तब 2010-11 में दिल्ली सरकार का राजस्व 10,642 करोड़ के सरप्लस में था जो 2018-19 में 4465 करोड़ रह गया है। दिल्ली जल बोर्ड और डी टी सी लगातार घाटे में चल रही है दिल्ली मेट्रो भी लाभ नहीं कमा रही है। कैग के मुताबिक आठ लाख नौकरियां देने का दावा भी पूरा नहीं हो सका है। 2013-14 में दिल्ली सरकार का कैपिटल परिव्यय 11,685 करोड था जो 2018-19 में 9908 करोड़ रह गया है। कैपिटल परिव्यय का कम होना यह दर्शाता है कि अब विकास कार्यों पर लगभग विराम की स्थिति आती जा रही है। इसी तरह आर बी आई के मुताबिक दिल्ली सरकार का कर्ज भार जो मार्च 2011 में जी डी पी का 23.5 प्रतिशत था वह मार्च 2019 में बढ़कर 25.1 प्रतिशत हो गया है। स्वभाविक है कि जब कोई सरकार लगातार मुफ्त में सुविधायें देती जायेगी तो उसके पहले के जमा धन में कमी होती जायेगी और इसी के साथ उसका कर्जभार भी बढ़ता जायेगा। इसका परिणाम एक दिन बहुत भयानक होता है। इस परिदृश्य में केजरीवाल के सुशासन पर भी विश्वास करना कठिन हो जाता है।
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