Friday, 05 June 2026
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क्या आप की इतनी बड़ी कार्यकारिणी अपेक्षाओं पर खरा उतर पायेगी

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश में आप की इकाई की कार्यकारिणी का अंततः गठन हो गया है। यह गठन पूर्व इकाई को भंग करके किया गया है। लेकिन इसमें यह नहीं कहा गया है कि जो नेता पहले से प्रवक्ताओं की जिम्मेदारी निभा रहे थे वही यह जिम्मेदारी अब भी निभाते रहेंगे। न ही यह कहा गया है कि प्रवक्ताओं की सूची अलग से जारी की जायेगी। यह उल्लेख करना इसलिये आवश्यक हो जाता है की नई कार्यकारिणी घोषित करते हुए जो पत्र जारी किया गया उसमें यह कहा गया है कि पहले की कार्यकारिणी को भंग कर दिया गया है। लेकिन जब से आप हिमाचल में नये सिरे से सक्रिय हुई है उसकी सारी गतिविधियों केवल प्रवक्ताओं के माध्यम से ही सामने आती रही हैं। पार्टी के पदाधिकारियों की अपने तौर पर क्या कारगुजारी रही है वह अभी सामने नहीं आयी है। अभी तक पार्टी के प्रवक्ता भी उस संदेश से आगे नहीं बढ़ पाये हैं जो पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने सामने रखा है। सामान्य तौर पर अब तक का सारा संवाद दिल्ली मॉडल की वकालत से आगे नहीं बढ़ पाया है। दिल्ली में जो सेवाएं लोगों को मुफ्त में प्रदान की जा रही हैं वह सेवाएं हिमाचल में भी मुफ्त में उपलब्ध करवाई जायेंगी। इसी केंद्रीय बिंदु के गिर्द प्रदेश की राजनीति और स्थिति को घुमाने की रणनीति पर काम हो रहा है। किसी भी वेलफेयर स्टेट में जन सुविधाएं जनता को सुगमता से और निशुल्क उपलब्ध होनी चाहिये। कम से कम शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं तो निशुल्क होनी ही चाहिये। लेकिन इसमें प्राइवेट सैक्टर का दखल कहां तक और कितना रहना चाहिये यह भी स्पष्ट होना चाहिये।
हिमाचल में आप शिक्षा को केंद्रीय मुद्दा बनाने की रणनीति पर चल रही है। मनीष सिसोदिया ने शिक्षा पर शिमला में जो संवाद शुरू किया था उसके चक्रव्यूह में प्रदेश सरकार फस गई है। उसे जवाब देने पर आना पड़ा है अब हमीरपुर में भी केजरीवाल ने उसी संवाद को आंकड़ों सहित आगे बढ़ाया। इसका जवाब सरकार से आता है या नहीं यह तो आगे पता चलेगा। लेकिन हमीरपुर में जिस तरह से भगवंत मान ने हिमाचल के मिंजर को लेकर अपना ज्ञान लोगों के सामने रखा है उस पर सोशल मीडिया में आ रही प्रतिक्रियाओं ने आप की गंभीरता पर स्वतः ही कई प्रश्न खड़े कर दिये है।ं यही नहीं इसी अवसर पर प्रदेश के नवनियुक्त अध्यक्ष ने जब यह कहा कि पिछले 75 वर्षों से हिमाचल को मुद्दे ही मिल रहे हैं तो उससे भी यही संदेश गया है कि आप का नेतृत्व अभी तक प्रदेश को गंभीरता से नहीं ले रहा है। क्योंकि अभी देश को आजाद हुये ही इतने वर्ष हुये हैं और आप के प्रदेश अध्यक्ष ने एक तरह से भाजपा के ही आरोप को आगे बढ़ाया है कि अब तक देश से लेकर प्रदेश तक जो भी नेतृत्व रहा उसने कुछ नहीं किया है चाहे वह केंद्र में नेहरू काल रहा हो या प्रदेश में डॉक्टर परमार का।
आप हिमाचल में भाजपा और कांग्रेस का विकल्प होने का दावा कर रहा है इसलिये उसके नेतृत्व द्वारा कहे गये एक-एक शब्द का आकलन किया जायेगा। उससे प्रदेश को लेकर पूरी जानकारी और समझ होने की अपेक्षा की जायेगी। राष्ट्रीय नेतृत्व से एक सूत्र तो मिलेगा लेकिन उस पर पूरी इमारत खड़ी करना प्रदेश नेतृत्व की जिम्मेदारी होगी। दिल्ली मॉडल तो सही है लेकिन उसको प्रदेश में व्यवहारिक शक्ल देना यहां बैठे आदमी का काम होगा। फिर दिल्ली की जो स्थिति है वह देश के अन्य किसी राज्य की नहीं है। दिल्ली जितना कर राजस्व किसी अन्य राज्य का नहीं है। हिमाचल के संसाधनों और उनके दोहन तथा उपयोग को लेकर एक ठोस समझ बनानी आवश्यक होगी। यहां पर पिछले कुछ वर्षों में रही सरकारों ने प्रदेश के संसाधनों का दुरुपयोग किया है और इसका परिणाम है प्रदेश का कर्जभार 70000 करोड़ के पार हो जाना। आज जयराम सरकार पर सबसे बड़ा आरोप ही यह है कि उसके शासनकाल में कर्ज और बेरोजगारी दोनों इतने बड़े हैं कि शायद यह अपने इतिहास हो जाये। क्योंकि यह दोनों एक साथ तब बढ़ते हैं जब भ्रष्टाचार का आकार इससे भी बड़ा हो जाये। आज हिमाचल में राजनीतिक विकल्प बनने के लिये प्रदेश की इन समस्याओं की प्रमाणिक जानकारी होना और उसे जनता तक ले जाकर जनता को विकल्प की मांग करने तक लाना होगा। लेकिन अभी तक आप से जुड़े किसी भी नेता से यह उम्मीद नहीं बंधी है कि वह भाजपा और कांग्रेस से बेहतर कर पायेगा। यदि आने वाले दिनों में भी आप की गंभीरता इस संदर्भ में सामने नहीं आती है तो उसके लिये अभी दिल्ली दूर है कि कहावत चरितार्थ हो जायेगी।

क्या है केंद्रीय सहायता का सच जयराम के ब्यान से उठा सवाल

मोदी मण्डी में दो लाख करोड का हिसाब मांग चुके हैं
अमित शाह ने चंबा में यह आंकड़ा 1,20,000 करोड बताया था
नड्डा 72 करोड का आंकडा परोस चुके हैं
जयराम ठाकुर ने यह राशि 10,000 करोड़ बतायी है
मोदी अब प्रदेश को कुछ नहीं दे गये हैं

शिमला/शैल। प्रदेश विधानसभा के चुनाव इसी वर्ष के अन्त में होने हैं। जय राम की सरकार अपने चार साल के कार्यकाल में हुए चार नगर निगमों में से दो और उसके बाद तीन विधानसभा और एक लोकसभा का उपचुनाव हार चुकी है। अब नगर निगम शिमला का चुनाव भी उच्च न्यायालय के फैसले के बाद 18 जून तक हो पाना संभव नहीं रह गया है। 18 जून के बाद नगर निगम शिमला पर भी प्रशासक बिठाना अनिवार्य हो जायेगा। नगर निगम शिमला के चुनाव टाले जाने का वातावरण भी उप चुनावों की हार के बाद ही प्रशासन और राजनीतिक गठजोड़ से ही तैयार किया गया। यह अब आम चर्चा का विषय बना हुआ है। नगर निगम शिमला में चुनावी हार होने का डर किस कदर हावी हो चुका है यह अब सामने आ चुका है। इसका असर आने वाले विधानसभा चुनावों पर कितना पड़ेगा यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। विश्लेष्कों की नजर में मोदी की सत्ता में आठ साल पूरे होने पर देश की सारी राज्यों की राजधानियों में आयोजित किये गये गरीब कल्याण सम्मेलन पर प्रधानमंत्री के संबोधन के लिये शिमला का चयन भी इसी लिये किया गया था ताकि इन योजनाओं के सारे लाभार्थियों को मोदी के सामने आम जनता बनाकर पेश किया जा सके। मोदी की इस शिमला यात्रा से हिमाचल और जयराम सरकार को क्या-क्या मिला है अब यह चर्चा का विषय बना हुआ है। चुनावी वर्ष के मध्य में हुये इस आयोजन से भाजपा को क्या मिला यदि इसका आकलन किया जाये तो सबसे बड़ा और पहला सवाल यह आता है कि जिस आयोजन का आमंत्रण देने मुख्यमंत्री स्वयं कांग्रेस अध्यक्षा प्रतिभा वीरभद्र सिंह के आवास पर गये उसी आयोजन से भाजपा के ही पूर्व मुख्यमंत्री शान्ता कुमार और प्रेम कुमार धूमल क्यों गायब रहे? क्या इन्हें आमंत्रित ही नहीं किया गया था यहां उन्होंने इस आयोजन में शामिल होना पसंद ही नहीं किया। इस सवाल का जवाब अभी तक नहीं आया है। यही नहीं इस आयोजन के मंच पर उपस्थित केंद्रिय मंत्री अनुराग ठाकुर का प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में नाम तक नहीं लिया। चर्चा है कि मंच पर किसे बिठाना है और प्रधानमंत्री अपने संबोधन में प्रदेश के किस किस नेता का नाम लेंगे इसकी सूची आयोजकों द्वारा तैयार की जाती है। अनुराग का नाम तक प्रधानमंत्री के संबोधन में न आने से किस तरह का राजनीतिक संदेश प्रदेश की जनता में गया होगा इसका अंदाजा लगाना विश्लेष्कों के लिए कठिन नहीं है। फिर इसी आयोजन पर आये पार्टी के वरिष्ठ नेता गणेश दत्त के ट्वीट ने इसके प्रबन्धन पर गंभीर सवाल उठाये हैं। आरोप लगाया गया है कि कुछ लोगों ने इस आयोजन को हाईजैक करने का प्रयास किया है। कई निगमों/बार्डों में तैनात नेताओं को आमंत्रित ही नहीं किया गया था। एक महिला ने तो इस मामले को उपर तक ले जाने की बात की है। इन नेताओं के इस रोश से यह स्पष्ट हो जाता है कि पार्टी की एकजुटता का भीतरी सच क्या है। शायद इसी कारण से पार्टी की कार्यकारिणी की बैठक अब हमीरपंर में रखी गयी है। जिसमें अनुराग ठाकुर और प्रेम कुमार धूमल को भी आमंत्रित किया गया है। पार्टी के बाद यदि यह देखा जाये कि प्रदेश को प्रधानमंत्री की इस यात्रा से क्या मिला है तो बहुत ही रोचक स्थिति सामने आती है। इस समय प्रदेश का कर्ज भार 70,000 करोड से पार हो चुका है। बेरोजगारी में प्रदेश देश के टॉप छः राज्यों में शामिल हो गया है। इस स्थिति के बाद भी प्रधानमंत्री प्रदेश को कोई राहत पैकेज नहीं दे गये है। बल्कि इस अवसर पर मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर ने चार वर्षों में मिली केंद्रीय सहायता का आंकड़ा केवल 10,000 करोड बता कर सबको चौंका दिया है। 10 हजार करोड़ का आंकड़ा बाकायदा लोक संपर्क विभाग द्वारा जारी प्रेस नोट में दर्ज है। स्मरणीय है कि मोदी ने मई 2014 को सत्ता संभाली थी उसके बाद प्रदेश में 2017 में विधानसभा और 2019 में लोकसभा के चुनाव संपन्न हुये हैं। प्रधानमंत्री इस दौरान मण्डी आये थे। तब उन्होंने एक जनसभा में स्व.वीरभद्र सिंह से प्रदेश को दिये गये दो लाख करोड का हिसाब मांगा था। फिर गृह मंत्री अमित शाह ने अपनी चंबा यात्रा के दौरान एक लाख बीस हजार करोड़ दिये जाने का आंकड़ा परोसा था। इसी दौरान नड्डा ने एक पत्र जारी करके 69 राष्ट्रीय उच्च मार्ग प्रदेश को दिये जाने की जानकारी दी थी। यह राजमार्ग अभी तक सैद्धांतिक अनुमति से आगे नहीं बढ़े हैं। इसका सारा पत्रचार शैल पाठकों के सामने रख चुका है। अभी पिछले दिनों ही नड्डा ने प्रदेश को 72,000 करोड़ दिये जाने का खुलासा किया है। लेकिन अब जयराम ने यह आंकड़ा 10,000 करोड बताकर पुराने सारे दावों पर स्वयं ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। ऐसे में यह सच प्रदेश की जनता के सामने आना ही चाहिये कि डबल इंजन की सरकार का सिंगल सच क्या है। इसके लिये केंद्रीय सहायता और 70,000 करोड़ के कर्ज के खर्च पर श्वेत पत्र जारी किया जाना चाहिये।

क्या प्रधानमंत्री या दूसरे केन्द्रीय नेताओं की यात्राओं से प्रदेश का चुनावी परिदृश्य बदल जायेगा

शिमला/शैल। क्या प्रधानमंत्री की शिमला यात्रा से ही भाजपा की चुनावी वैतरणी पार हो जायेगी? यह सवाल आज प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में एक बड़ा सवाल बनकर चर्चा का केंद्र बना हुआ है। क्योंकि यह एक कड़वा सच है कि प्रदेश के चारों उपचुनाव हारने के बाद जो फजीहत जयराम सरकार की हुई है उससे वह उभर नहीं पायी है। पांच राज्यों में हुये विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को मिली हार से भाजपा का जो मनोबल थोडा संभाला था उसे प्रदेश में घटे पुलिस भर्ती परीक्षा के पेपर लीक और बेच प्रकरण ने फिर से रसातल में पहुंचा दिया है। इसी प्रकरण के बाद चम्बा में विधानसभा उपाध्यक्ष द्वारा स्कूल के छात्रा को थप्पड़ मारने का मामला घट गया। देहरा के निर्दलीय विधायक होशियार सिंह ने जिस भाषा में जनता के बीच ग्रामीण विकास मंत्री वीरेंद्र कंवर और पूरी सरकार को कोसा है उससे हुये नुकसान की भरपाई मुख्यमंत्री द्वारा विधायक का अभिवादन स्वीकार न करने से नहीं हो जाती है। क्योंकि यही विधायक कल तक मुख्यमंत्री और सरकार के कितने निकट और विश्वस्त रहे हैं। यह देहरा में आईपीएच मंत्री के एक प्रोग्राम में सामने आ चुका है। भाजपा में आंतरिक गुटबाजी कितनी ज्यादा रही है इसका खुलासा कांगड़ा में रमेश ध्वाला बनाम पवन राणा और फिर सरवीन चौधरी विवादों तथा ईन्दू गोस्वामी के पत्रों से सामने आ ही चुका है। 2017 के चुनावों में धूमल के खिलाफ षडयंत्र रचा गया था। यह अब धूमल द्वारा जांच की मांग करने और उसे नड्डा द्वारा इंकार कर दिये जाने से भी स्पष्ट हो चुका है। नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाएं कोर कमेटी की विस्तारित बैठक से शुरू हुई थी। इस बैठक के बाद यह बराबर कहा गया कि कुछ मंत्रियों को हटाया जा सकता है और कुछ के विभागों में फेरबदल हो सकता है। इन्हीं चर्चाओं में बिंदल से प्रदेश अध्यक्षता और स्पीकर शीप छीन गयी। परमार से स्वास्थ्य मंत्री का पद ले लिया गया। कई विधायकों और मंत्रियों के टिकट काटे जाने की खबरें आये दिन उछलती रहती हैं। कैसे और कितने लोग पत्र बम्बों के शिकार हुये हैं। यदि पार्टी में घटे इस सब को एक साथ जोड़ कर देखा और समझा जाये तो कोई भी विश्लेषक यह मानेगा की पार्टी में सब कुछ ठीक नहीं है। आम आदमी पार्टी की आमद नेे भी भाजपा और जयराम सरकार की चिंताएं बढ़ा दी हैं। इसीलिए नड्डा और अनुराग को मैदान में उतारा गया। अनुराग ने आप की प्रदेश इकाई के शीर्ष नेतृत्व को ही तोड़कर भाजपा में शामिल करवा दिया। नड्डा ने रैलियां की। युवा मोर्चा का राष्ट्रीय कार्यक्रम धर्मशाला में आयोजित किया गया। यह क्यास लगायेे जा रहे थे कि कांगड़ा से कांग्रेस के कुछ नेता भाजपा में शामिल हो जाएंगे। कई नाम चर्चा में भी आये लेकिन अंतिम परिणाम शून्य रहा। फिर त्रिदेव सम्मेलन में स्मृति ईरानी को बुलाया गया यहां पर भाजपा के इन त्रिदेवों को ब्रह्मा, विष्णु और महेश की संज्ञा दे दी गई। लेकिन इस प्रयास के परिणाम भी शुन्य रहे। क्योंकि लोग महंगाई और बेरोजगारी से इस कदर तंग आ चुके हैं कि भाजपा के किसी भी प्रयास का कोई परिणाम नहीं निकल रहा है। आप की तर्ज पर जयराम भी मुफ्त बिजली और पानी देने की घोषणाएं कर चुके हैं। इन घोषणाओं को पूरा करने के लिए कर्ज़ का सहारा लिया जा रहा है। लेकिन इस सबके बावजूद लोग यह नहीं भूल पा रहे हैं कि प्रदेश बेरोजगारी में देश के टॉप छः राज्यों में से एक हो गया है। जयराम सरकार और भाजपा इसी सब के चलते आज नगर निगम शिमला के चुनाव करवाने का साहस नहीं कर पा रही है। ऐसा पहली बार हुआ है की सरकार के पक्ष में कुछ भी सकारात्मक न हो। इसी परिदृश्य में प्रधानमंत्री अपनी सरकार के आठ साल पूरा होने पर गरीब कल्याण योजनाओं के नाम से शिमला आ रहे हैं। जयराम सरकार ने भी यह बड़े गर्व से दावा किया है कि इस अवसर के लिए शिमला का चुनाव स्वयं प्रधानमंत्री ने किया है। प्रधानमंत्री इस अवसर पर प्रदेश को क्या देकर जाते हैं इसका पता तो बाद में ही चलेगा। लेकिन इस अवसर पर यह सवाल आवश्यक उछलेंगे कि मोदी सरकार का पहला बड़ा आर्थिक फैसला नोटबंदी का था जिसमें 99.6% पुराने नोट नये नोटों से बदले गये हैं। 0.4% इसलिये रहे कि नेपाल में नोटबंदी प्रभावी नहीं हुई। नोटबंदी से जाली नोटों के छपने पर लगाम लगेगी यह दावा किया गया था। लेकिन अब रिजर्व बैंक द्वारा जारी रिपोर्ट में माना गया है कि अब भी जाली नोट छप रहे हैं। इसके आंकड़े तक जारी किये गये हैं। 2014 में आम जमा पर जो ब्याज मिलता था वह आज 2022 में आधे से भी कम रह गया है। जीरो बैलेंस के नाम पर खोले गये खातों पर न्यूनतम बैलेंस की शर्त क्यों लगायी गई? क्या इससे गरीब आदमी प्रभावित नहीं हुआ है? हिमाचल सरकार के अपने ही आंकड़ों के अनुसार 65% लोग मुफ्त मिले गैस सिलेंडर दूसरी बार नहीं भरवा पाये हैं। स्कूलों में बच्चों को दिये जाने वाले मिड डे मील के लिये फरवरी के बाद कोई किस्त जारी नहीं हो सकी है। मनरेगा में भी नये साल में कोई बजट जारी नहीं हो पाया है। इस वस्तुस्थिति में प्रधानमंत्री का शिमला में लगातार बैठा रहना भीं सरकार को डूबने से नहीं बचा पायेगा यह माना जा रहा है।

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