Friday, 16 January 2026
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जीडीपी की गिरावट का जवाब खिलौनों/कुत्तों की चर्चा नहीं हो सकता

इस समय देश की जीडीपी शून्य से भी 24% नीचे आ गया है। जीडीपी की यह गिरावट एक गंभीर आर्थिक संकट का संकेत है। फिर यह 24% का आंकड़ा तो संगठित क्षेत्र की वस्तुओं और सेवाओं के आकलन का है। इसमें कितना उत्पादन और सेवाएं कम हुई है, यह उसका आकलन है। जब इसमें असंगठित क्षेत्र का आकलन जुड़ेगा तब यह आंकड़ा इसके दो गुणे से भी बढ़ने की आशंका हैं जीडीपी से हर व्यक्ति परोक्ष/अपरोक्ष में प्रभावित होता है। सरकारें विकास कार्यों के लिये कर्ज के माध्यम से जो धन जुटाती है। वह सीधे जीडीपी से प्रभावित होता है। राज्य सरकारेें सामान्यतः अपने जीडीपी का 3.5% ही कर्ज ले सकती है। यह एफआरवीएम अधिनियम की बंदिश है। अब कोरोना के चलते कर्ज की यह सीमा केन्द्र ने 5% तक बढ़ी दी है। अब जब केन्द्र ने राज्यों को उनका जीएसटी का हिस्सा देने में असमर्थता जताई है तब यह कहा है कि राज्य अपने स्तर पर धन का प्रबन्ध करें या कर्ज ले। ऐसे में यह अनुमान लगाया जा सकता है कि जब देश का सकल घरेलू उत्पाद ही शून्य से 24% तक नीचे चला गया है तब आदमी पर करों का भार बढ़ाने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नही होगा। ऐसे में जब वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन ही नही रहा है तब आम आदमी टैक्स भी कैसे दे पायेगा। इस समय ही 12 करोड़ नौकरियां खत्म हो चुकी हैं तो आने वाले समय में क्या होगा यह सोचकर ही डर लगता है। इसका सीधा प्रभाव मनरेगा में देखा जा सकता है जहां 120 दिन के रोजगार को घटाकर 90 दिन कर दिया गया है। जिन प्रवासी मज़दूरों का रोज़गार छिन गया था उन्हे मनरेगा में काम देने का भरोसा दिया गया था। अब उन करोड़ो लोगों को इन काटे गये 30 दिन में से काम दिया जायेगा। इसके लिये मनरेगा का बजट दस हजा़र करोड़ बढ़ा कर 2019-20 के बराबर कर दिया गया है। इससे अन्दाजा लगाया जा सकता है कि इसमें किसके हिस्से में कितना रोज़गार आ पायेगा और उससे जीडीपी में बढौत्तरी कैसे संभव हो पायेगी।
वित्त मंत्री सीता रमण ने इस स्थिति को ईश्वर की देन कहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने मन की बात संबोधन में इसका जिक्र तक नही किया। प्रधानमंत्री ने आत्मनिर्भर बनने के लिये खिलौने बनानेे और कुत्ते पालने का नया दर्शन लोगों के सामने रख दिया है। खिलौने बनाने और कुत्ते पालने से जीडीपी को स्थिरता तक पहुंचने में ही कितने दशक लगेंगे इसका अनुमान लगाया जा सकता है। वित्त मन्त्री और प्रधानमन्त्री के इन वक्तव्यों से समझा जा सकता है कि वह इस समर्थता के प्रति कितने गंभीर और ईमानदार हैं। क्योंकि इस तरह की धारणाओं का सीधा अर्थ है कि आम आदमी को इस संकट के समय उसके अपने ही सहारे छोड़ दिया गया है। स्पष्ट है कि जब किसी चीज़ को Act of God कह दिया जाता है कि उसका अर्थ कि प्रबन्धन ने यह मान लिया है कि वह इसमे कुछ नही कर सकता है। वित्त मन्त्री और प्रधानमन्त्री के वक्तव्यों के बाद सरकार और संगठन में से किसी ने भी आगे कुछ नही कहा है। इसका सीधा अर्थ है कि पूरी सरकार और संगठन का यही मत है।
जब किसी परिवार पर आर्थिक संकट आता है तो सबसे पहले वह अपने अनावश्यक खर्चों को कम करता है। यही स्थिति सरकार की होती है वह अपने खर्चे कम करती हैं लेकिन मोदी सरकार इस स्थापित नियम से उल्ट चल रही है। उसका खर्च पहले से 22% बढ़ा हुआ है। प्रधानमंत्री के प्रचार पर ही सरकारी कोष से दो लाख प्रति मिनट खर्च किया जा रहा है। इस समय आरबीआई से लेकर नीचे तक सारी बैंकिंग व्यवस्था संकट और सवालों में है। कर्ज की वसूली ब्याज का स्थगन और एनपीए तक बैंकिंग से जुड़े सारे महत्वपूर्ण मुद्दे सर्वोच्च न्यायालय में हैं। बैंकों को प्राईवेट सैक्टर को देने का फैसला कभी भी घोषित हो सकता है। बैंक में आम आदमी का पैसा कब तक और कितना सुरिक्षत रहेगा इसको लेकर भी स्थिति स्पष्ट नही है। आम आदमी के जमा पर 2014 से लगातार ब्याज कम होता आ रहा है। इस बार तो वित्त मन्त्री ने बजट भाषण में ही कह दिया था कि आम आदमी बैंक में पैसा रखने की बजाये उसे निवेश में लगाये। नोटबंदी से आर्थिक व्यवस्था को जो नुकसान पहुंचा है उससे आज तक देश संभल नही पाया है। रियल एस्टेट और आटोमोबाईल जैसे क्षेत्रों को आर्थिक पैकेज देने के बाद भी उनकी हालत में सुधार नही हो पाया है और यह कोरोना से पहले ही घट चुका है। इसलिये गिरती जीडीपी के लिये ईश्वर पर जिम्मेदारी डालने के तर्क को स्वीकार नही किया जा सकता। फिर इसी वातावरण में अंबानी और अदानी की संपतियां उतनी ही बढ़ी हैं जितना देश का जीडीपी गिरा है। आज सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को प्राईवेट सैक्टर के हवाले करने से आर्थिक स्थिति को सुधारने का प्रयास और घातक सिद्ध होगा। आने वाले दिनों में देश की गिरती जीडीपी और सरकार की आर्थिक नीतियां इक बड़ी बसह का मुद्दा बनेगी यह तय है।

जब एक उपक्रम नही चला सकते तो देश कैसे चलायेंगे

मोदी सरकार विनिवेश और प्रत्यक्ष विदेशी को बढावा देने की नीति पर चल रही हैं विनिवेश में करीब दो दर्जन सरकारी उपक्रमों में अपनी हिस्सेदारी निजिक्षेत्र को बेचने का फैसला है। इन उपक्रमों में रेल और एयरपोर्ट जैसे उपक्रम भी शामिल है। विनिवेश के इस क्षेत्र में दो ही निजि कंपनीयां रिलाॅयंस और अदानी ग्रुप सबसे ज्यदा सफल बोली दात्ता हो रहे है। जिसका अर्थ है कि कई महत्वपणर््ूा उपक्रमों पर आने वाले दिनों में इनका स्वामित्य हो जायेगा। यह सब एक सुनियोजित योजना के तहत हो रहा है या स्वभाविक प्रक्रियाओं एक प्रतिफल है। यह एक महत्वपर्ण विचारणीय बिन्दु हैं लेकिन उसी के साथ यह और भी गंभीर प्रश्न है कि विनिवेश होना भी चाहिये या नही। इसी तरह प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिये लगभग सभी क्षेत्र खोल दिये गय हैं और उसमें कई देशों की सैंकड़ों कंपनीयों का लाखों करोड़ का निवेश देश में आ चुका है। सरकार अपनी योजनाओं को पूरा करने के लिये कर्ज ले रही है। आज देश पर विदेशी कर्ज 580 बिलियन डालर से पार जा चुका है। ऐसे में यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि इस तरह के नीति निर्धारणा पर संसंद के भीतर और बाहर एक विस्तृत बहस हो। लेकिन ऐसा हो नही रहा है बल्कि इस तरह के सवाल उठाने वालों के खिलाफ एक सुनियोजित विरोध खड़ा किया जा रहा है।
इसी विरोध का परिणाम है कि सर्वोच्च न्यायालय प्रशान्त भूषण को वह सवाल उठाने के लिये सत्ता दे रहा है जो सवाल इसी सर्वोच्च न्यायालय के चार कार्यरत न्यायधीश वाकायदा एक पत्र के माध्यम से प्रैस के सामने रख चुके हैं। प्रशान्त भूषण को सज़ा देने के लिये स्थापित न्याययिक प्रक्रिया को भी नज़रअन्दाजा किया गया है। इसी तरह की स्थिति अदानी को दिये जा रहे त्रिवेन्द्रम एयरपोर्ट की है। केरल सरकार इस एयर पोर्ट को स्वयं चलाना चाहती है। इसके लिये शीर्ष अदालत में एक याचिका दायर की गयी। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसे केरल उच्च न्यायालय में उठाया जाये। केरल सरकार उच्च न्यायालय में आ गयी और उच्च न्यायालय ने इसे यह कह कर रद्द कर दिया कि इसे सुप्रीम कोर्ट में उठाया जायें। केरल सरकार फिर सर्वोच्च न्यायालय जा रही थी कि मोदी सरकार ने इस एयरपोर्ट को अदानी के हवाले करने का फैसला सुना दिया। क्या इस तरह की कारवाई से अदालत पर विश्वास कायम रह सकेगा। केन्द्र सरकार किस तरह की जल्दबाजी मे काम कर रही है इसका एक उदाहरण अपराध दण्ड संहिता में संशोधन करने के लिये गठित की गयी कमेटी में भी सामने आया है। इस कमेटी को संशोधन का यह काम छः माह में पूरा करना है और आईपीसी, सीआरपीसी और साक्ष्य तीनों अधिनियमों में संशोधन किया जाना है। देश के पहले लाॅ कमीशन ने ऐसे संशोधन के चार चरणों की प्रक्रिया तय की हुई है। लेकिन अब गठित की गयी कमेटी पहले दो चरणों को नजरअन्दाज करके सीधे तीसरे चरण से अपना काम शुरू कर रही है। इस पर सौ से अधिक विषय विशेषज्ञों ने पत्र लिख कर इसका विरोध किया है और इस कमेटी को तुरन्त प्रभाव से भंग करने की मांग की है।
इस तरह पूरे देश के अन्दर एक ऐसा वातावरण बनता जा रहा है जहां शीर्ष संस्थान विश्सनीयता के संकट में आ खड़े हुए है। कोरोना संकट के कारण आज देश की अर्थव्यवस्था एक संकट के मोड पर आ खड़ी हुई है। करोड़ों लोग रोजगार के संकट से जूझ रहे हैं। ऐसे संकट काल में सरकार का अपने उपक्रमों को निजिक्षेत्र को सौंपना नीयत और नीति दोनों पर गंभीर आक्षेप लगने शुरू हो गये हैं। क्योंकि एक सौ तीस करोड़ की आबादी वाले देश में हर हाथ को काम सरकारी उपक्रमों को निजिक्षेत्र को सौंपने से नही दिया जा सकता है। क्योंकि निजिक्षेत्र व्यक्तिगत स्तर पर मुनाफा कमाने की अवधारणा पर चलता है। इसके लिये वह हाथ को मशीन से हटाने की नीति पर चलता है और कामगारों की छटनी से शुरू करता है। आज सरकार भी उसी नीति पर चलने का प्रयास कर रही है। इसीलिये पचास वर्ष से अधिक आयु के कर्मचारियों को काम की समीक्षा के मानदण्ड से हटाने पर विचार कर रही है। भाजपा ने 1990 में ही यह जाहिर कर दिया था जब शान्ता कुमार हिमाचल के मुख्यमन्त्री थे। तब निजिकरण क्यों के नाम से एक वक्तव्य दस्तावेज जारी किया गया था। इस वक्तव्य में यह आरोप लगाया गया था कि सरकारी कर्मचारी काम चोर और भ्रष्ट हैं। इसी आरोप के सहारे प्रदेश बिजली बोर्ड से बसपा परियोजना लेकर जेपी उद्योग समूह को दी गयी थी तय हुआ था कि बिजली बोर्ड के इस परियोजना पर हुए निवेश को जेपी उ़द्योग सरकार को ब्याज सहित वापिस करेगा लेकिन आज तक कैग की टिप्पणीयों के बावजूद एक पैसा तक वापिस नही हुआ है। आज प्रदेश की बिजली नीति और उद्योग नीति के कारण प्रदेश कर्ज के चक्रव्यूह में फंस चुका है। इसी तरह प्रदेश प्रमुख पर्यटक स्थल वाईल्डफलावर हाल दिया गया था जिससे प्रदेश को आज तक कोई लाभ नही मिला है। निजिकरण की देशभर में यही स्थिति है कर्मचारियों पर उस भ्रष्टता का आरोप लगाकर निजिकरण का आधार तैयार किया जाता है जिसकी उन्हे कभी सज़ा नही दी गयी है। इसी कारण से यह सवाल भी नही उठने दिया गया कि यदि सरकार एक उपक्रम नही चला सकती है तो देश कैसे चलायेगी।

2014 से पहले कोरोना होता तो

2014 से पहले कोरोना होता तो प्रधानमन्त्री नेरन्द्र मोदी ने 74वें स्वतन्त्रता दिवस पर लाल किले से देश को संबोधित करते हुए जनता के सामने यह सवाल रखा है कि यदि 2014 से पहले कोरोना आ जाता तो क्या होता। इस सवाल से बहुत सारे सवालों को जन्म दे दिया है। इन सवालों की गिनती करने और उनके जवाब तलाशने से पहले नरेन्द्र मोदी का 15 अगस्त 2013 का एक दृश्य याद आ जाता है। मोदी उस समय गुजरात के मुख्यमन्त्री थे। दिल्ली में जब 15 अगस्त 2013 को लाल किले पर प्रधानमन्त्री डा. मनमोहन सिंह का भाषण समाप्त हुआ था उसके आधे घन्टे के बाद नरेन्द्र मोदी का भुज के लालन काॅलिज के प्रांगण से भाषण शुरू हुआ था। काॅलिज के प्रांगण में मंच की पृष्ठभूमि में लाल किले की दिवार का वृहतचित्र लगाया गया था। उस पृष्ठभूमि में भाषण करते हुए नरेन्द्र मोदी ने डा. मनमोहन सिंह से भारत-चीन से सीमा से लेकर डालर के मुकाबले रूपये की गिरती कीमतों तक हर ज्वलंत समस्या पर सवाल पूछे थे। उन्ही सवालों के मसौदे पर अन्ना का आन्दोलन खड़ा हुआ। कांग्रेस सरकार को भ्रष्टाचार का पर्याय करार दिया गया। जनता को अच्छे दिन आने का भरोसा दिया गया और सत्ता परिवर्तन हो गया। इस परिदृश्य में आज जब नरेन्द्र मोदी ने यह सवाल किया है कि यदि 2014 से पहले देश में कोरोना आ जाता तो क्या होता। इस समय देश कोरोना के संकट से गुजर रहा है। इसके कारण अर्थव्यवस्था पर क्या और कितना असर पड़ा है इसको लेकर कुछ विशेषज्ञों की राय में स्थिति 1947 से भी नीचे चली जायेगी। चालीस करोड़ से भी अधिक के रोज़गार पर असर पड़ा है। इसी वर्ष के अन्त तक एनपीए बीस लाख करोड़ हो जाने का अनुमान है। 2022 तक बैंकों के संकट में आने की आशंका खड़ी हो गयी है। वित्त मन्त्री के निर्देशों के बावजूद बैंक ऋण देने में असमर्थता व्यक्त करने लग गये हैं। अन्र्तराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतों में कमी आने के बावजूद पैट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाये जा रहे हैं। डालर के मुकाबले में रूपये की कीमत सबसे निचले स्तर पर पहुंच गयी है। अर्थव्यवस्था की यह स्थिति और भी बदतर होने की संभावना है क्योंकि कोरोना का आतंक लगातार बढ़ता जा रहा है। इस आतंक के कारण अनलाॅक थ्री में भी बाजा़र 30% तक ही रिस्टोर हो पाया है। इसे 100% तक होने में लंबा समय लगेगा और अब कोरोना के साथ ही जीने की आदत डालने की एडवायजरी जारी की जाने लगी है। क्या अर्थ व्यवस्था के इन पक्षों पर मोदी सरकार की कोई चिन्ता और चिन्तन देश के सामने आ रहा है। शायद नही क्योंकि भाजपा का सरोकार अपने लिये संगठन हर जिले में हाईटैक कार्यालय बनाना, वर्चुअल रैलियां करने और चुनी हुई सरकारे गिराना है। आज कोरोना से निपटने में सरकार कितनी सफल रही है इसकी जांच के लिये सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका के माध्यम से आयोग गठित किये जाने की कुछ पूर्व वरिष्ठ नौकरशाहों द्वारा की गयी है। जब कोरोना के मामले का आंकड़ा केवल पांच सौ था तब पूरे देश में लाॅकडाऊन करके सबको घरों के अन्दर बन्द कर दिया गया और जब आंकड़ा पांच लाख पहुंच गया तब इसमें ढील दे दी गयी। सरकार के अन्तः विरोधी फैंसलों के कारण यह लगने लगा है कि कोरोना से ज्यादा इसका प्रचार आतंक का कारण बन गया। कोरोना में ही यह सामने आया है कि छः वर्षों में मोदी सरकार देश में कोई नया बड़ा स्वास्थ्य संस्थान खड़ा नही कर पायी है। जो स्वास्थ्य संस्थान पहले से चल रहे हैं उनमें कितनी क्या सुविधायें हैं इसका खुलासा इसी से हो जाता है कि क्या कोई भी मन्त्री या अन्य बड़ा नेता जो कोरोना की चपेट में आया यह किसी भी सरकारी संस्थान मंे ईलाज के लिये नही गया। क्योंकि यह सरकार सारे संस्थानों को कमजोर करके उन्हें निजि क्षेत्र के हवाले करने की नीति पर चल रही है। इसी नीति का परिणाम है कि 23 सरकारी उपक्रमों को विनिवेश की सूची में डालकर उन्हे प्राईवेट सैक्टर के हवाले किया जा रहा है। शायद यह पहली सरकार है जिसके कार्यकाल में कोई भी सार्वजनिक उपक्रम खड़ा नही किया गया है। सरकार की आर्थिक नीतियों पर कोई सवाल न पूछे जायें इसके लिये बड़े ही सुनियोजित तरीके से प्रयास किये जा रहे हैं इन प्रयासों में मीडिया और उच्च न्यायपालिका भी सरकार का पूरा साथ दे रहा है। सर्वोच्च न्यायालय में प्रशान्त भूषण के मामले में जिस तरह की भूमिका रही है उससे 1976 के एडीएम जब्बलपुर मामले की याद ताजा हो जाती है जब यह कहा गया था कि आपातकाल में मौलिक अधिकारों का हनन किया जा सकता है। मीडिया में सार्वजनिक मुद्दों पर जिस तरह से बहसे आयोजित की जा रही हैं उसका कड़वा सच कांग्रेस प्रवक्ता राजीव त्यागी की मौत के रूप में सामने आ चुका है। आज शायद यह पहली बार हो रहा है कि राजनीतिक सत्ता से लेकर शीर्ष न्यायपालिका और मीडिया सभी पर से एक साथ भरोसा उठ रहा है। मोदी सरकार के आने से पहले भी स्वाईन फ्लू जैसी भयानक महामारीयां देश में आ चुकी हैं जिनमें हजारों लोग मरे भी हैं लेकिन तब लाॅकडाऊन करके लोगों को घरों में कैद करके नहीं रखा गया था। यदि 2014 से पहले कोरोना आ जाता तो शायद हालात इतने बदत्तर न होते। महामारी आती और निकल जाती। लोग रोज़गार और भुखमरी के कगार पर न धकेले जाते।

मर्यादा पुरूषोत्तम के शिलान्यास में हुआ मर्यादाओं का हनन

राम मन्दिर का शिलान्यास होने से अब उन सवालों पर विराम लग जायेगा जिनमें यह पूछा जाता था कि श्रीराम का मन्दिर कहां और कब बनेगा। इस मन्दिर निर्माण के लिये हुए आन्दोलन में भाजपा की चार सरकारों की बलि चढ़ गयी थी। लेकिन इस मुद्दे पर आये सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में जब यह कहा गया कि इस मन्दिर के लिये बाबरी मस्जिद का गिराया जाना गलत था और पुरातत्व विभाग ऐसे कोई साक्ष्य नही दे पाया है कि मन्दिर को गिराकर मस्जिद बनाई गयी थी तब इसी से सारे आन्दोलन की नैतिकता धराशायी हो जाती है। सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला एक ऐतिहासिक धरोहर दस्तावेज बन गया है। आने वाले समय में जब भी कोई अतीत के इन पन्नो को खंगालते हुए आन्दोलन की नैतिकता का आकलन करेगा तो वह इस आन्दोलन के नायकों को साधुवाद नहीं कह पायेगा और न ही हिन्दु पुरोधाओं को निर्दोष करार दे पायेगा। आने वाली पीढ़ीयों के पास इसका शायद कोई जवाब नही होगा। बल्कि जब यह जिक्र आयेगा कि सर्वोच्च न्यायालय ने तथ्यों से इतर जाकर अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए यह स्थल हिन्दु समाज को सौंपा है और मुस्लिम समाज ने इसे अपनी विशालता का परिचय देते हुए स्वीकार कर लिया तो वहां फिर आन्दोलन की राजनीतिक महत्वकांक्षा पर आकर ही बात रूकेगी। उस समय भविष्य की पीढ़ीयां आज के वर्तमान को कैसे आंकेगी यह कहना कठिन है। क्योंकि आज कोरोना के कारण जिस तरह से अभी तक धार्मिक स्थल बन्द चल रहे हैं और पुजारियों को अपने जीवन यापन के लिये सरकारों से आर्थिक सहायता मांगनी पड़ी है उससे निश्चित रूप से आस्था पर भी कई गंभीर सवाल खड़े हुए हैं।
 इस समय देश कोरोना संकट के दौर से गुजर रहा है। तीन लाकडाऊन झेलने के बाद अब अनलाक तीन चल रहा है। लेकिन अनलाक तीन में भी अभी तक बाज़ार की आर्थिक गतिविधियां 30% भी बहाल नही हो पायी हैं। 30% आर्थिक गतिविधियों का अर्थ है कि सरकार का राजस्व संग्रहण भी अभी तक 40% नही हो पाया है। राजस्व की इसी कमी के चलते केन्द्र सरकार ने हिमाचल जैसे राज्य को कह दिया है कि वह पहली सितम्बर से कोरोना के टैस्टों पर होने वाले खर्च को स्वयं उठाये। इसी संकट के कारण एपीएल परिवारों की राशन की सब्सिडी बन्द कर दी गयी है और बीपीएल की मात्रा कम कर दी है। करोड़ों लोग बेरोजगार होकर बैठ गये हैं। हिमाचल में ही इससे पीड़ित आत्महत्या करने लग पड़े हैं। राज्य के डीजीपी ने इस पर गंभीर चिन्ता व्यक्त की है। पूरा देश आर्थिक संकट से गुजर रहा है। लेकिन राम मन्दिर के शिलान्यास को जिस तरह से देशभर में एक पर्व के रूप में मनाते हुए भाजपा-संघ द्वारा मिठाईयां बांटी गयी है उससे सत्तारूढ़दल की मानवीय संवेदनाओं और उसकी प्राथमिकताओं का अन्दाजा लगाया जा सकता है। विश्वभर में इस शिलान्यास के बाद धार्मिक राष्ट्रवाद को लेकर एक बहस छिड़ गयी है। इस शिलान्यास के बाद भी देश के धार्मिक स्थलों पर चल रही पाबन्दी नही हठ पायी है। इसको लेकर मर्यादा पुरूषोत्तम राम कितने प्रसन्न हो रहे होंगे इसका भी आन्दाज लगाया जा सकता है। शिलान्यास को लेकर जब भी कोई निष्पक्ष आकलन होगा तब इन सवालों को नजरअन्दाज कर पाना कठिन होगा। क्योंकि आर्थिक संकट में इस समारोह पर हुआ यह करोड़ों का खर्च यह भूखे पेट की आंखों में सवाल बनकर तो खड़ा रहेगा ही।
 यह शिलान्यास मर्यादा पुरूषोत्तम राम के मन्दिर का हो रहा था। कोरोना काल में हुए इस शिलान्यास के पर्व पर बहुत लोग और कई बड़े नेता कोरोना को लेकर चल रही पाबन्दियों के कारण नहीं आ पाये। क्योंकि कोरोना निर्देशों के उल्लघंन पर सजा और जुर्माने का प्रावधान घोषित है। बहुत लोगों को इसके लिये जुर्माना लगा भी है। लेकिन शिलान्यास समारोह में जो बाबा रामदेव जैसे लोग शामिल थे वह कोरोना निर्देशों का खुला उल्लघंन कर रहे थे। उन्हें कोई इसके लिये इंगित भी नहीं कर रहा था। गृहमन्त्री अमितशाह तीन अगस्त को कोरोना पाजिटिव पाये गये और वह उपचार के लिये मेदान्ता में भर्ती भी हुए। 29 जुलाई को वह प्रधानमन्त्री के साथ मन्त्री परिषद की बैठक में शामिल थे। नियमों के अनुसार उस बैठक में शामिल हर व्यक्ति को संगरोध में होना  चाहिये था लेकिन ऐसा हुआ नही है। देशभर में शिलान्यास के बाद जो जश्न मनाया गया है उसमें कोरोना निर्देशों का खुला उल्लंघन हुआ है। इस जश्न के आगे सारे नियम और निर्देश बौने साबित हुए हैं। समारोह में वह पोस्टर भी पूरा ध्यान आकर्षित कर रहा था जिसमें संघ प्रमुख मोहन भागवत को राज्यपाल और मुख्यमन्त्री से ऊपर स्थान दिया गया था। जबकि मोहन भागवत कोई जनता के चुने हुए प्रतिनिधि नही है। बल्कि उनका संघ तो एक पंजीकृत संस्था भी नही है। यही नहीं एक चित्र में तो भगवान राम को प्रधानमन्त्री अंगूली से पकड़कर मन्दिर की ओर ले जा रहे हैं यह दिखाया गया है कि इस तरह पूरे समारोह में प्रधानमन्त्री और संघ /भाजपा को ही महिमा मंडित करने का प्रयास रहा है। आज कोरोना के कारण आम आदमी इन मर्यादाओं के हनन पर खुल कर नहीं बोल पा रहा है। लेकिन इस समारोह से यह तो सामने आ ही गया है कि कोरोना को लेकर लगाई गयी पाबन्दियां केवल आम आदमी के लिये ही हैं। लेकिन यह तय है कि जिस दिन यह पाबन्दियां हटेगी उस दिन यही समारोह ऐसे सवाल लेकर आयेगा जिनका जवाब देना कठिन होगा क्योंकि मर्यादाओं का जो हनन यहां हुआ है वह अपना असर अवश्य दिखायेगा।

आपदा को अवसर में बदलना है भाजपा के नौ सौ कार्यालयों का निर्माण

भारतीय जनता पार्टी ने 2014 में केन्द्र में पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता संभाली थी। 2014 के चुनावों में अच्छे दिन और प्रत्येक के खाते में पन्द्रह-पन्द्रह लाख आने के वायदे किये गये थे। देश की जनता से कहा गया था कि उसने कांग्रेस को राज करने के लिये साठ वर्ष दिये हैं और उसे केवल साठ महीने दिये जायें। कांग्रेस जो साठ वर्षों में नही कर पायी है भाजपा ने वह सब साठ महीनों में करने का वायदा किया था। 1,76,000 करोड़ के टूजी स्कैम जैसे जो भ्रष्टाचार के मामले उस दौरान सामने थे और उनमें गिरफ्तारीयां तक हुई थी। उनको अंजाम तक पहुंचाने का वायदा किया गया था। देश में लाखों करोड़ों के कालेधन की समस्या से निपटना एक बहुत बड़ी चुनौती थी। पांच वर्ष के कार्यकाल में इतने कामों को अन्जाम देना आसान नही था। फिर इन कामों में रोड़ा अटकाने के लिये तो टूटा फूटा विपक्ष सबसे बड़ी बाधा था। कांग्रेस मुक्त भारत का नारा तो दिया गया था लेकिन इसी से काम हल होने वाला नही था। क्योंकि वामदल, चन्द्रबाबू नायडू, ममता बैनर्जी, बहन मायावती और अखिलेश यादव जैसे भी कई लोग थे जिनसे निपटना कोई आसान काम नही था। इस तरह की बहुत सारी आपदायें थी जिनको अवसर में बदलना बड़ी चुनौती था। इस तरह की  राजनीतिक विरासत से पार पाकर देश को आज आत्मनिर्भरता के मुकाम तक पहुंचाना सही में मोदी सरकार और भाजपा की एक बड़ी उपलब्धि है।
आज भाजपा के देशभर में 900 कार्यालय बनने जा रहे हैं। जब भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने अपने कार्यकर्ताओं को यह जानकारी  दी कि पार्टी के पांच सौ कार्यालयों के निर्माण का कार्य अमितशाह के समय ही पूरा हो गया था और शेष बचे चार सौ कार्यालयों का निर्माण वह शीघ्र ही पूरा कर लेंगे। तो निश्चित रूप से यह कार्यकर्ताओं के लिये एक बहुत बड़े गर्व का विषय था। तब उन्हे सही में यह एहसास हुआ होगा कि जब पार्टी के अच्छे दिन आ गये हैं तो अब आगे कार्यकर्ताओं की ही बारी आयेगी। वैसे तो प्रधानमन्त्री मुद्रा ऋण योजना में दिया गया ग्यारह लाख करोड़ का ऋण भी तो कार्यकर्ताओं के ही काम आया है। इसीलिये तो इसमें कागजी औपचारिकताओं को गौण ही रखा गया था। इसी उद्देश्य से तो अब बैकों को निर्देश दिये गये हैं कि वह खुले मन से ऋण बांटे। उन्हें सीबीआई, सीबीसी और सीएजी से डरने की कोई जरूरत नही है। आखिर सरकार इससे ज्यादा उदारता कैसे ला सकती है। वर्ष 2019 में बैंकों में डेढ लाख करोड़ के फ्राड के मामले घटे हैं। आरटीआई में सूचना भी बाहर आ गयी है लेकिन किसी बैंक के खिलाफ कोई बड़ी कारवाई नही की गयी है। इस फ्राड से भी कुछ लोगो ने तो कमाया है। सरकार इसी सबके लिये तो डिजिटल व्यवस्था पर बल दे रही है।
 कालाधन एक बड़ी  समस्या थी। इससे निपटने के लिये नोटबन्दी से बढ़िया कोई दूसरी योजना हो ही नही सकती थी। दो हजार का नोट लाकर संग्रहण और आसान कर दिया गया। 99.6ः पुराने नोट आसानी से नये नोटों के साथ बदल लिये गये और कालेधन से अपने आप छुटकारा मिल गया। इसीलिये 2014 से पहले बाबा रामदेव जैसे व्यापारी जो हर रोज कालेधन के आंकड़ों का ही हिसाब लगाते रहते थे। अब 2300 करोड़ का एनपीए मुआफ करवाकर इस समस्या से निजात पा चुके हैं। ऐसे दर्जनों लोग हैं जिनका लाखों करोड़ का एनपीए खत्म कर दिया गया और देश ने इसे आराम से स्वीकार भी कर लिया है। आज तो एलआईसी में भी तीस हजार करोड़ का एनपीए हो गया है। जीपीएफ, ईपीएफ संकट में आ गये हैं। संासदो/विधायकों के वेतनभत्तों में सरकार को 30ः की कटौती करनी पड़ी है। केन्द्र सरकार का बजट चार माह में ही दम तोड़ गया है। सारी नयी योजनाओं को 31 मार्च तक के लिये स्थगित कर दिया गया है। सरकारें राजस्व की कमी से जूझ रही हैं। महामारी के संकट में कई सरकारें डाक्टरों तक को नियमित वेतन नही दे पा रही हैं। सरकारों की ऐसी हालत के बावजूद भी भाजपा की वर्चुअल रैलियां अपनी जगह नियमित चल रही हैं। हजारों करोड़ का पार्टी कार्यालयों के निर्माण का प्रौजैक्ट पूरी रफ्तार से चल रहा है। नोटबदी के संकट काल में पार्टी कार्यालयों के लिये जमीनें खरीदी गयी। भले ही आम आदमी को उस दौरान नये नोट मिलने में लम्बा इन्तजार करना पड़ा हो लेकिन उस दौरान भाजपा को यह करोड़ो का लेन-देन करने में कोई दिक्कत नही आयी है। अच्छे दिनों की परिभाषा इससे बेहतर और क्या हो सकती है।
 राष्ट्रीय बैंकों की एक बड़ी खेप निजिक्षेत्र को दी जा रही है। यह करके भाजपा अपने जनसंघ के समय के उस वायदे को पूरा करने जा रही है जो उस समय बैंकों के राष्ट्रीयकरण के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में तब के जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. बलराज मद्योक और उनके मित्रों मीनू मसानी तथा रूस्तमजी, कावासजी कपूर ने याचिका डालकर किया था। सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीयकरण के खिलाफ फैसला दिया था जिसे स्व.श्रीमति इन्दिरा गांधी ने संविधान के पच्चीसवें संशोधन से निरस्त किया था। आज मोदी सरकार पूरी मेहनत के साथ देश को उस दौर में ले जाने के लिये दिन रात काम कर रही है। कांग्रेस इस पुनीत कार्य में व्यवधान पैदा कर रही है इसलिये उसकी सरकारें गिराना समय की जरूरत बन गयी है। आज अगर करोड़ो लोग बेरोज़गार होकर भुखमरी के कगार पर पहुंच गये हैं तभी तो वह आत्मनिर्भरता का महत्व समझकर सरकार पर बोझ बनने से परहेज करेंगे।

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