Friday, 05 June 2026
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सी.पी.एस. मामले पर शिमला से लेकर दिल्ली तक लगी निगाहें

  • सर्वाेच्च न्यायालय में प्रदेश सरकार की ट्रांसफर याचिका अस्वीकार
  • प्रदेश उच्च न्यायालय पहले भी रद्द कर चुका है ऐसी नियुक्तियां
  • जुलाई 2017 में सर्वाेच्च न्यायालय कह चुका है कि प्रदेश विधायिका को ऐसा कानून बनाने का अधिकार ही नहीं

शिमला/शैल। सी.पी.एस. मामला अब फिर प्रदेश उच्च न्यायालय में ही पहुंच गया है क्योंकि सर्वाेच्च न्यायालय ने प्रदेश सरकार की ट्रांसफर याचिका को अस्वीकार कर दिया है। राज्य सरकार ने सर्वाेच्च न्यायालय में याचिका दायर कर यह गुहार लगाई थी कि पंजाब छत्तीसगढ़ और बंगाल की ऐसी ही यचिकाएं सर्वाेच्च न्यायालय में लंबित हैं। इसलिए हिमाचल के मामले को भी सुप्रीम कोर्ट अपने पास लेकर उन मामलों के साथ सुने। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार का यह आग्रह यह कह कर ठुकरा दिया कि हिमाचल का मामला उनसे भिन्न है। इसलिए इसे प्रदेश उच्च न्यायालय ही सुनेगा। इस मामले का सुप्रीम कोर्ट के लिए स्थानांतर का आग्रह प्रदेश उच्च न्यायालय में लगी पेशी से एक दिन पहले किया गया था। जबकि यह मामला कई दिनों से प्रदेश उच्च न्यायालय में चल रहा था। इसलिए सुप्रीम कोर्ट में दायर किये गये आग्रह को मामले को लम्बाने के प्रयास के रूप में देखा गया। अब जब सुप्रीम कोर्ट ने इस आग्रह को अस्वीकार कर दिया है तब यह सवाल उठ रहा है कि सरकार ने ऐसा किया क्यों? स्मरणीय है कि हिमाचल में एक बार पहले भी स्वर्गीय वीरभद्र सिंह के कार्यकाल में मुख्य संसदीय सचिवों और संसदीय सचिवों की नियुक्तियां की गई थी। इन नियुक्तियों को जब प्रदेश हाईकोर्ट मंे चुनौती दी गई थी तब उच्च न्यायालय ने इन्हें सविधान संशोधन के विपरीत प्रकार रद्द कर दिया था।
इसके बाद प्रदेश सरकार ने इस फैसले के खिलाफ सर्वाेच्च न्यायालय में एक एस.एल.पी. फाइल कर दी। एस.एल.पी. फाइल करने के बाद राज्य सरकार ने एक और अधिनियम लाकर ऐसी नियुक्तियों को लाभ के दायरे से बाहर करके पुनः ऐसी नियुक्तियों का रास्ता निकाल लिया। लेकिन सरकार के इस अधिनियम को भी उच्च न्यायालय में चुनौती दे दी गई जो अब तक लंबित चल रही है। लेकिन इसी मामले में प्रदेश सरकार ने जयराम सरकार के कार्यकाल में यह शपथ पत्र उच्च न्यायालय में दायर कर रखा है कि यदि राज्य सरकार ऐसी नियुक्तियां करने का फैसला लेती है तो उसके लिये उच्च न्यायालय से पूर्व अनुमति ली जायेगी इसी कारण से जयराम के कार्यकाल में ऐसी नियुक्तियां नहीं की गयी थी। यह मामला उच्च न्यायालय में अब तक लंबित चल रहा है। दूसरी ओर जो एस.एल.पी. सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई थी उसे 2017 में असम के मामले के साथ टैग करके जुलाई 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दे दिया है कि राज्य विधायिका को ऐसा अधिनियम पारित करने का अधिकार ही नहीं है।
अब प्रदेश उच्च न्यायालय में मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्तियों के खिलाफ तीन यचिकाएं लंबित चल रही हैं। स्मरणीय है कि मंत्रीमण्डलों का आकार जब-जब राजनीतिक कारणों से आवश्यकता से अधिक बड़ा होने लगा और इस पर जनता में आवाज़ उठने लगी तब संसद ने एक संविधान संशोधन लाकर मंत्रिमण्डल के आकार की सीमा तय कर दी थी। उस सीमा के अनुसार हिमाचल में अधिक से अधिक मुख्यमंत्री सहित केवल 12 मंत्री हो सकते हैं। इस समय सुक्खू मंत्रिमण्डल में मंत्रियों के तो तीन पद खाली चल रहे हैं। जबकि छः मुख्य संसदीय सचिव नियुक्त कर रखे हैं। इन नियुक्तियों को चुनौती देती हुई तीन याचिकाएं उच्च न्यायालय में विचाराधीन चल रही है। एक याचिका भाजपा के एक दर्जन विधायकों द्वारा दायर की गई है। माना जा रहा है कि यह याचिका भाजपा हाईकमान के अनुमोदन के बाद ही डाली गयी है। निश्चित है कि भाजपा लोकसभा चुनावों से पहले इस मामले में फैसला आने का प्रयास करेगी। यह भी तय है कि यह फैसला आने के बाद सरकार और कांग्रेस संगठन के समीकरणों में बदलाव आयेगा। लोकसभा चुनावों के लिये भी सत्ता के इस तरह के उपयोग का मामला एक मुद्दा बनेगा। क्योंकि यह सवाल उठेगा कि जब प्रदेश में ऐसा पूर्व में भी घट चुका था और भाजपा ने इसी कारण से ऐसी नियुक्तियां नहीं की थी तो सुक्खू सरकार को कठिन वित्तीय स्थितियों में भी ऐसी नियुक्तियां करने की राजनीतिक आवश्यकता क्यों खड़ी हो गई थी? आज नेता प्रतिपक्ष तो सीधे आरोप लगा रहे हैं कि छः विधायकों का भविष्य जानबूझकर दाव पर लगा दिया गया है। अब प्रदेश उच्च न्यायालय का फैसला आने में भी लम्बा समय लगने की संभावना नहीं मानी जा रही है। यह फैसला आने का सुक्खू सरकार की सेहत पर क्या असर पड़ेगा इस पर शिमला से लेकर दिल्ली तक सबकी नज़रें लग गयी हैं।

केंद्र के अस्पष्ट पत्रों से उलझा हाटी मामला

  • एक वर्ष में स्थिति स्पष्ट न कर पाना राज्य सरकार की असफलता
शिमला/शैल।हिमाचल के सिरमौर जिले के गिरीपार क्षेत्र के हाटियों को पचास वर्ष के लंबे संघर्ष के बाद भारत सरकार द्वारा संसद में संशोधन लाकर जो जनजातिय का दर्जा दिया था उसकी अनुपालना करवाने के लिए भी हाटी समुदाय को आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ रहा है। 154 पंचायतों के तीन लाख हाटीयों को आंदोलन का रास्ता इसलिए अपनाना पड़ा है कि 2022 में भाजपा शासन के दौरान केंद्र ने संविधान संशोधन करके हाटीयों को जनजातिय का दर्जा दिया था। लेकिन राज्य सरकार इस पर अब तक अमल करने के आदेश जारी नहीं कर पायी है। सरकार के अनुसार जो संशोधन राष्ट्रपति से हस्ताक्षरित होकर आया है उसमें कहा गया है कि गिरीपार रहने वाले सभी लोगों को जनजातिय का दर्जा हासिल होगा। लेकिन संबद्ध मन्त्रालय के अवर सचिव से जो पत्र राज्य सरकार को मिला है उसमें इस क्षेत्र में रहने वाले एस सी समाज को इससे बाहर रखा गया है। इसी के साथ केंद्र की ओर से यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि इस फैसले को लागू करने का आधार वर्ष क्या होगा। ऐसे में यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या इन बिन्दुओं पर केंद्र सरकार से कोई स्पष्टीकरण आय बिना इस फैसले को लागू किया जा सकता है या नहीं। क्योंकि ऐसे मामलों में एक आधार वर्ष तो तय किया ही जाता है जो केंद्र ने न तो राष्ट्रपति को भेजें और न ही संसद से पारित संशोधन में स्पष्ट किया है तथा न ही अवर सचिव द्वारा भेजे गये पत्र मे। स्मरणीय है कि गिरी पार क्षेत्र के लोगों द्वारा जनजातीय दर्जा दिये जाने का मुद्दा 1967 में जौनसार बाबर को यह दर्जा मिलने के बाद उठाया जाना शुरू हुआ। क्योंकि दोनों क्षेत्रों की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियां एक जैसी थी। विकास के नाम पर यह क्षेत्र पिछड़े हुये थे। जातिवाद और देव दोष जैसे संस्कृति से जकड़े हुये थे। खाप पंचायत की तर्ज पर खुम्वली के फैसलों से बंधा समाज था। लेकिन आज जब 2023 में इनको जनजाति का दर्जा दिया जा रहा है तब आधा शतक पहले की परिस्थितियां नहीं है। अब तो शायद दूसरे क्षेत्रों के लोग भी वहां के निवासी हो गये है। ऐसी वस्तुस्थिति में फैसले पर अमल के लिए एक आधार वर्ष चिन्हित होना आवश्यक है। दूसरी ओर जब वहां के रहने वाले अनुसूचित जाति के लोगों को भी जनजाति करार दे दिया गया तब उसमें रोष होना स्वाभाविक था। क्योंकि 1950 में अनुसूचित जाति और जनजाति का फैसला और वर्गीकरण हो गया था। इसके अनुसार अनुसूचित जाति को 15 % आरक्षण हासिल है जो इस क्षेत्र के इन लोगों को हासिल है परन्तु अब उन्हें भी जनजाति घोषित कर दिये जाने से उनके इस अधिकार में कटौती हो रही है। इसके लिए गिरी पार अनुसूचित जाति अधिकार संरक्षण समिति के मंच तले प्रदेश उच्च न्यायालय में केंद्र के फैसले को चुनौती दे दी गयी है। उच्च न्यायालय ने इस याचिका पर प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार के तीन मंत्रालयों को नोटिस जारी कर दिया है । 18 दिसम्बर को यह मामला लगा है उधर आन्दोलन हाटी मंच ने इस फैसले पर दीपावली तक अमल करने के लिए राज्य सरकार को चेतावनी दे दी है। उसके बाद आन्दोलन के उग्र होने की घोषणा भी कर दी है। ऐसे में सुक्खु सरकार इस स्थिति से कैसे निपटती है यह देखना रोचक हो गया है। क्योंकि यह आन्दोलन उस समय आया है जब आगे लोकसभा चुनाव होने हैं।

कांग्रेस की गारंटियों पर भाजपा हुई आक्रामक

  • सुक्खू का व्यवस्था परिवर्तन हाईकमान के गले की फांस बना
  • डॉ. संबित पात्रा की वार्ता के बाद गारंटीयां बनी मूद्दा
  • जय राम, बिन्दल और अनुराग सभी हुए हमलावर

शिमला/शैल। क्या सुक्खू सरकार का व्यवस्था परिवर्तन और विधानसभा चुनाव में जारी की गयी गारंटीयों पर अब तक अमल न हो पाना अब हाईकमान के लिए भी राष्ट्रीय स्तर पर गले की फांस बनता जा रहा है। यह सवाल इसलिये प्रासंगिक हो गया है कि जिन पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने जा रहे हैं उन राज्यों में भी कांग्रेस मतदाताओं से इसी तर्ज पर कुछ वायदे करने जा रही है। भाजपा कांग्रेस के वादों पर हिमाचल का उदाहरण देते हुए यह सवाल कर रही है कि जब हिमाचल में ही किये हुये वायदों पर अमल करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया जा सका है तो ऐसे में इन राज्यों में किये जा रहे वायदों पर कैसे विश्वास किया जा सकता है। हिमाचल से ही ताल्लुक रखने वाले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा और सूचना एवं प्रसारण तथा युवा सेवाएं और खेल मंत्री अनुराग ठाकुर इन गारंटीयों के नाम पर काफी आक्रामक हुये पड़े हैं। गौरतलब है कि प्रदेश में गारंटीयों को लेकर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डॉ. राजीव बिन्दल और नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने जब प्रदेश में इन गारंटीयों को लेकर सुक्खू सरकार को घेरना शुरू किया तो इसका संज्ञान लेते हुये भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉक्टर संबित पात्रा ने भी प्रदेश का रुख कर लिया। डॉ. पात्रा ने सारी स्थिति का अध्ययन करके शिमला में एक पत्रकारवार्ता करके प्रदेश सरकार से गारंटीयों पर कड़े सवाल पूछ लिये। डॉ. पात्रा ने इन गारंटीयों को लेकर कांग्रेस की राष्ट्रीय महामंत्री प्रियंका गांधी को भी घेर दिया। क्योंकि कुछ गारंटीयों के वायदे उनसे भी करवा दिये गये थे। लेकिन डॉ. पात्रा के सवालों का जवाब प्रदेश सरकार और संगठन की ओर से कोई नहीं दे पाया। क्योंकि जमीनी सच्चाई यही है की गारंटीयों पर अमल की दृष्टि से कोई काम हुआ ही नहीं है।
बल्कि जिस व्यवस्था परिवर्तन को एक बड़े नारे के रूप में उछाला गया था आज कांग्रेस के मंत्री और दूसरे नेता इस व्यवस्था परिवर्तन को परिभाषित करने से भी डर रहे हैं। क्योंकि व्यवहारिक तौर पर यह व्यवस्था परिवर्तन पिछली भाजपा सरकार द्वारा चलाई गई व्यवस्था को ही ढोये रखने का पर्याय बन कर रह गया है। आज आम सवाल पूछा जा रहा है कि जिन अधिकारियों को लेकर कांग्रेस बतौर विपक्ष कड़े सवाल सदन में उठा चुकी है वही अधिकारी इस सरकार के भी अति विश्वस्तों की सूची में पहले स्थान पर हैं। सत्ता परिवर्तन होते ही बड़े स्तर पर पहले दस दिन में ही प्रशासनिक फेरबदल हो जाता था और जनता में भी सत्ता परिवर्तन का सन्देश चला जाता था। लेकिन व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर इस सरकार ने शिमला के जिलाधीश तक को नहीं बदला। इसी व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर यह सरकार कांग्रेस द्वारा विधानसभा चुनावों के दौरान जारी किये गये आरोप पत्र को आज तक विजिलैन्स को जांच के लिये नहीं भेज पायी है। भ्रष्टाचार को संरक्षण देना शायद इस सरकार की नीयत और नीति दोनों बन गयी है। जिस पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष राजेंद्र राणा को विधानसभा में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के भ्रष्टाचार को लेकर पूछे गये अपने ही सवाल को अन्तिम क्षणों में वापस लेना पड़ा हो वहां भ्रष्टाचार की क्या स्थिति होगी और भ्रष्टाचारी कितने पावरफुल होंगे इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
आज हिमाचल सरकार कांग्रेस की कार्यपद्धति और उसके चुनावी वायदों की व्यवहारिकता का ऐसा प्रमाण पत्र राष्ट्रीय स्तर पर अपने आप ही खड़ा हो गया जिसका कोई जवाब किसी नेता के पास नहीं रह गया है। इस समय कांग्रेस का कोई भी छोटा बड़ा नेता भाजपा के खिलाफ एक शब्द भी बोल पाने की स्थिति में नहीं रहा गया है। जिन सवालों पर यही कांग्रेस भाजपा को सदन में घेरती थी आज एक भी सवाल पूछने का सहास नही कर पा रही है। आज राष्ट्रीय स्तर पर मनीष सिसोदिया की जमानत याचिका सुप्रीम कोर्ट में खारिज होने से विपक्षी राजनीति के समीकरणों में जो बदलाव आया उसके परिदृश्य में कांग्रेस को अपनी राज्य सरकारों पर कड़ी नजर रखने की आवश्यकता है क्योंकि इन्हीं सरकारों की कारगुजारी राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी के लिए गुण दोष सिद्ध होंगी। क्योंकि भाजपा ने सुक्खू सरकार की कथनी और करनी को ऐसे समय राष्ट्रीय प्रश्न बना दिया है जब मुख्यमंत्री स्वस्थ्य कारणों से एम्स में दाखिल है और भाजपा के किसी भी सवाल का सीधे जवाब देने की स्थिति में नहीं है। पांच राज्यों का चुनाव जीतने के लिये भाजपा जिस तरह की गेम प्ले करने पर आ गयी है उसके परिदृश्य में हिमाचल में भी भाजपा द्वारा ऑपरेशन कमल की विसात बिछाने को नजरअन्दाज करना आसान नहीं होगा। क्योंकि मुख्य संसदीय सचिवों का मामला प्रदेश उच्च न्यायालय में चल ही रहा है।


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