शिमला/शैल। क्या तीन राज्यों में कांग्रेस की हार का असर हिमाचल पर भी पड़ेगा यह सवाल इसलिये प्रासंगिक और महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कुछ अरसे से प्रदेश भाजपा कर्ज के आंकड़ों को और गारंटीयां पूरी न कर पाने को लेकर सुक्खू सरकार पर हमलावर है। कर्ज के आंकड़ों पर जिस तरह की ब्यान बाजी सरकार की ओर से सामने आ रही है उसे स्पष्ट हो जाता है कि प्रशासन 2022-23 और 2023-24 के बजट दस्तावेजों की भी सही जानकारी सरकार के सामने नहीं रख रहा है। जो गारंटीयां चुनावों में दी थी उनको पूरा करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है। यह सब आम आदमी के सामने है। कर्ज और गारंटीयों पर जो जनधारणा बनती जा रही है उससे स्पष्ट है कि यदि सरकार समय रहते न संभली तो लोकसभा में सुक्खू सरकार के लिये एक भी सीट जीत पाना संभव नहीं होगा। वैसे सुक्खू सरकार और प्रदेश भाजपा में बीते एक वर्ष में इतने अच्छे रिश्ते रहे हैं कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं को तो सरकार से कोई नाराजगी हो सकती है लेकिन किसी भाजपाई को नहीं। क्योंकि व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर कोई बड़ा प्रशासनिक फेरबदल किया ही नहीं गया। जब प्रशासन में काम करने वाले पुराने ही अधिकारी सुरक्षित रहे तो भाजपाइयों को नाराजगी क्यों होती। जब नेता प्रतिपक्ष का चयन विधायकों की शपथ से पहले ही प्रोटैम स्पीकर के हाथों ही हो जाये तो फिर विपक्ष को कोई नाराजगी कैसे हो सकती है। इन्हीं रिश्तों और व्यवस्था परिवर्तन का परिणाम है कि पूर्व सरकार के खिलाफ कांग्रेस द्वारा चुनावों के दौरान जारी किया गया आरोप पत्र आज तक विजिलैन्स में नहीं भेजा गया है। इस सरकार का पूर्व सरकार के खिलाफ सबसे बड़ा आरोप वित्तीय कुप्रबंधन को लेकर था। इस कुप्रबंधन पर लोकाचार निभाते हुये एक श्वेत पत्र भी लाया गया। लेकिन इस श्वेत पत्र पर कोई दाग न पड़ जाये इसलिए किसी कारवाई के कोई आदेश तक नहीं हुये। इससे वित्तीय कुप्रबंधन के आरोपों का सियासी पूर्वाग्रह ही सामने आता है। क्योंकि गंभीर होने पर अपने फिजूल खर्चाे पर रोक लगानी पड़ती है। जो मित्रों के दबाव में नहीं लग सकी। इसके अतिरिक्त जो मुद्दे सरकार ने आते ही भाजपा को थमा दिये वह अब उच्च न्यायालय तक पहुंच चुके है। उनमें अदालत से फैसला आने ही हैं। स्मरणीय है कि सरकार ने शपथ ग्रहण के 24 घंटे के भीतर ही पिछली सरकार द्वारा अंतिम छः माह के लिये फैसला पलटते हुए छः सौ से अधिक संस्थान बन्द कर दिये थे। इस पर आरोप लगा था की राजनीतिक द्वेष से ऐसा फैसला लिया गया है। क्योंकि इतने अल्प समय में छः सौ मामलों की गुण दोष के आधार पर समीक्षा हो पाना संभव ही नहीं है। यह मामला मंत्रिमंडल विस्तार से पहले ही पूरे प्रदेश में मुद्दा बना दिया गया था। मंत्रिमंडल विस्तार के बाद यह मामला उच्च न्यायालय में पहुंचा दिया गया है और लम्बित चल रहा है। आज की बदली परिस्थितियों में कौन सा विधायक यह संस्थान खोले जाने का विरोध कर पायेगा यह सामान्य राजनीतिक समझ का विषय है। इसी के साथ इस सरकार ने मंत्रिमंडल विस्तार से एक घंटा पहले छःमुख्य संसदीय सचिवों को शपथ दिलाकर सबको चौंका दिया था। इन नियुक्तियों को तीन अलग- अलग याचिकाओं के माध्यम से उच्च न्यायालय में चुनौती मिल चुकी है। इसमें एक याचिका एक दर्जन भाजपा विधायकों द्वारा दायर की गयी है। यह याचिकाएं उच्च न्यायालय में लम्बित चल रही है। इससे पहले भी स्व. वीरभद्र के कार्यकाल में भी ऐसी नियुक्तियां की गयी थी उन्हें उच्च न्यायालय में असंवैधानिक ठहराते हुए तुरन्त प्रभाव से रद्द कर दिया गया था। उच्च न्यायालय के इस फैसले को एस.एल.पी. के माध्यम से सर्वाेच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी थी। जिस पर असम के मामले के साथ टैग होकर फैसला जुलाई 2017 में आ गया था। सर्वाेच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि राज्य विधायिका को ऐसा कानून बनाने का कोई अधिकार ही नहीं है। सर्वाेच्च न्यायालय के स्पष्ट फैसले के बावजूद ऐसी नियुक्तियां किये जाने का कोई कारण प्रदेश की जनता के सामने ही नहीं आ पाया है। जनता इसे अवांछित बोझ मान रही है। अब इस मामले में उच्च न्यायालय का फैसला जल्द आने की संभावना बढ़ गई है स्वभाविक है कि एक दर्जन भाजपा विधायकों की याचिका को भाजपा हाईकमान की सहमति रही ही होगी। इसमें फैसला आने पर यह तो माना ही जा रहा है कि पूर्व की तर्ज पर यह नियुक्तियां भी असंवैधानिक करार दी जायेगी। लेकिन यह संभावना भी नकारी नहीं जा रही है कि इनके आचरण के परिदृश्य में कहीं इन्हें विधायकी से भी हाथ न धोना पड़ जाये। भाजपा इस मामले का पराक्षेप हर हालत में लोकसभा चुनाव से पहले करवाने के लिए हर संभव कानूनी कदम उठायेगी यह तय है। इस फैसले से कांग्रेस संगठन और सरकार के समीकरणों में बदलाव आयेगा। मंत्रिमंडल विस्तार और निगमों बोर्डों में ताजपोशियां तथा क्षेत्रीय असंतुलन जो अनचाहे ही खड़ा हो गया है ऐसे मुद्दे होंगे जो सरकार की सेहत पर असर डालेंगे ही। इस वस्तुस्थिति में लोस चुनाव के उम्मीदवारों का चयन भी आसान नहीं होगा।

शिमला/शैल। क्या किसी को प्रदेश के डी.जी.पी. के हाथों या उसके माध्यम से अपनी जान और माल का खतरा हो सकता है? क्या ऐसी शिकायत को डी.जी.पी. अपने ही स्तर पर झूठ का पुलिन्दा कहकर शिकायतकर्ता के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करवा सकता है? क्या ऐसी शिकायत पर अदालत के दखल पर भी पुलिस अज्ञात लोगों के खिलाफ एफ.आई.आर. दर्ज करके अपने निष्पक्ष होने का दावा कर सकती है? क्या डी.जी.पी. के खिलाफ शिकायत आने पर भी सरकार उसी तंत्र पर भरोसा करके एक निष्पक्ष जांच हो पाने का दावा कर सकती है? यह और ऐसे ही कई सवाल निशान्त द्वारा प्रदेश के डी.जी.पी. के खिलाफ एस.पी. शिमला को भेजी शिकायत के बाद उठ खड़े हुए हैं। क्योंकि जान और माल का ही खतरा हो जाने से बड़ा कोई आरोप नहीं हो सकता। जो भाजपा नेतृत्व प्रदेश की बिगड़ती कानून और व्यवस्था पर लगातार सरकार पर हमलावर होता रहा है वह ऐसे आरोपों पर मौन साध ले तो स्थिति और भी गंभीर हो जाती है। आज पूरे प्रदेश की नजरें इस प्रकरण पर लग गयी है। इसलिये इस पर चर्चा करना आवश्यक हो जाता है।
एस.पी. शिमला को संबोधित और मुख्य न्यायाधीश, मुख्यमंत्री गृह सचिव, महामहिम राज्यपाल, प्रधानमंत्री तथा महामहिम राष्ट्रपति को प्रेषित निशान्त शर्मा की शिकायत प्रदेश के हर संवेदनशील नागरिक के लिये एक गंभीर चिन्ता का विषय बन गयी है। शिकायत के मुताबिक निशान्त शर्मा और उसके परिवार को दो व्यक्ति धर्मशाला स्थित मकलोडगंज में जान और माल की धमकी देते हैं। इस धमकी की शिकायत लेकर वह एस.पी. को मिलते हैं और मामला दर्ज करने का आग्रह करते हैं। इसी दिन डी.जी.पी. का फोन निशान्त शर्मा को आता है और उसे डी.जी.पी. से शिमला आकर मिलने की बात की जाती है। डी.जी.पी. के फोन आने के बाद उसी दिन निशान्त शर्मा को यह धमकी मिलने के बाद उसके साथ पूर्व में घटे कुछ वाक्यों को लेकर निशान्त शर्मा एस.पी. शिमला को एक तीन पन्नों की मेल भेजकर डी.जी.पी. के खिलाफ एफ.आई.आर. करने का आग्रह करते हैं। यह मेल साइट पर आने के बाद डी.जी.पी. निशान्त शर्मा के खिलाफ उन्हें बदनाम करने का आपराधिक मामला दर्ज करवा देते हैं। निशान्त के खिलाफ यह मामला दर्ज होने की जानकारी उसे दो पत्रकार देते हैं। जिनके मोबाइल नम्बर शिकायत में दर्ज हैं। शिकायत में निशान्त शर्मा उसके साथ 25 अगस्त को गुरुग्राम में घटी घटना की जानकारी देता है। इस संबंध में हरियाणा पुलिस के पास दर्ज करवाई गयी शिकायत और जांच में सी.सी.टी.वी. कैमरे की जांच में सामने आये तथ्यों की जानकारी भी अपनी शिकायत में हिमाचल पुलिस को भेजता है। इसमें कुछ लोगों के नाम भी लिखता है। लेकिन यह सामने होने के बाद भी हिमाचल पुलिस कोई मामला दर्ज नहीं करती है। इसी बीच उच्च न्यायालय इस सब का स्वतंत्र संज्ञान लेकर स्टेटस रिपोर्ट तलब करता है।
उच्च न्यायालय में जब स्टेटस रिपोर्ट आती है तब महाधिवक्ता डी.एस.पी. ज्वालामुखी के आश्वासन पर मामले में एफ.आई.आर. दर्ज कर लेने की प्रतिबद्धता अदालत को देते हैं। महाधिवक्ता की प्रतिबद्धता के बाद धर्मशाला पुलिस निशान्त की शिकायत पर कुछ अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर लेती है। निशान्त के आरोपों का बड़ा केन्द्र डी.जी.पी. है। यह सही है कि इस मामले की जांच से पहले डी.जी.पी. को किसी भी तरह से दोषी नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन जिस शिकायत के ज्यादा आरोप डी.जी.पी. के ही खिलाफ हो उस जांच की विश्वसनीयता स्थापित करने के लिये क्या किसी बाह्य एजेन्सी से जांच करवाना श्रेयस्कर नहीं होगा? क्योंकि जिस शिकायत में कुछ लोगों के सीधे नाम लिये गये हों क्या उसमें भी अनाम लोगों के खिलाफ मामला दर्ज करना न्याय संगत हो सकता है? निश्चित है कि पुलिस की नजर में जब डी.जी.पी. का किसी भी तरह से इसमें शामिल होना नहीं पाया गया होगा तभी अनाम के खिलाफ मामला दर्ज किया गया होगा। लेकिन क्या इससे सरकार की निष्पक्षता और जांच की विश्वसनीयता स्थापित हो पायेगी? यदि सरकार ने जांच के दौरान डी.जी.पी. को विभाग से अलग कर दिया होता या यह मामला सी.बी.आई. को सौंप दिया होता तो क्या इससे सभी की प्रतिष्ठा बहाल नहीं रहती? संभव है कि यह सारे सवाल आने वाले समय में अदालत के सामने भी उठें। क्योंकि डी.जी.पी. पर उठने वाले सवालों को तो विभाग अपनी प्रतिक्रिया में पहले ही सोशल मीडिया का प्रचार करार दे चुका है। डी.जी.पी. के अदालत में प्रतिवादी बनने या न बनने की स्टेज तो मामले का चलान दायर होने के बाद आयेगी।
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