Friday, 05 June 2026
Blue Red Green
Home देश

ShareThis for Joomla!

सुक्खु सरकार का पत्रकारों को तोहफा पांच गुणा बढ़ाये मकानों के किराये

  • क्या 65 वर्ष से अधिक के नहीं कर सकते पत्रकारिता
  • क्या यह कांग्रेस की राष्ट्रीय नीति का हिस्सा है
  • क्या विज्ञापनों में भेदभाव कर सकती है सरकार
शिमला/शैल। सुक्खु सरकार ने 16 अगस्त को लिये एक फैसले के पत्रकारों के लिए सरकारी आवास आबंटन नियमों में संशोधन करके उनके किराये में पांच गुणा वृद्धि कर दी है। इसी के साथ प्रस्थापित पत्रकारों की शैक्षणिक योग्यता और आयु प्रमाण पत्र भी मांग लिये हैं। चर्चा है कि 65 वर्ष से अधिक की आयु वालों से आवास खालीकरवा लिये जायेंगे। वैसे जब पत्रकारों को आवास आबंटित होते हैं तब उन्हें ऐसी आयु सीमा की कोई बंदिश नहीं बतायी जाती। क्योंकि पत्रकार कोई सरकारी कर्मचारी तो होता नहीं है। वैसे पत्रकारों को सरकार कोई सुविधा प्रदान करेगी ही ऐसा भी कोई नियम नहीं है। पत्रकार और पत्रकारिता की लोकतांत्रिक व्यवस्था में क्या अहमियत होती है इसका अन्दाजा इसी से लग जाता है की पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा पिल्लर की संज्ञा हासिल है। सरकार की नीतियों की प्रासंगिकता और व्यवहारिकता पर तीखे सवाल पूछना यह पत्रकार का धर्म और कर्म माना जाता है। समाज के हर उत्पीड़ित की आवाज सार्वजनिक रूप से सरकार के सामने रखना पत्रकार से ही अपेक्षित रहता है। भ्रष्टाचार के खिलाफ बेबाकी से आवाज उठाना पत्रकार से ही उम्मीद की जाती है। इसीलिये किसी समय यह कहा गया था की ‘‘गर तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो’’ पत्रकार सरकार का प्रचारक नहीं होता है। परन्तु आज की सरकारों को तो शायद गोदी मीडिया पसन्द है और उनकी आवश्यकता है। इसलिये सुक्खु सरकार ने भी मीडिया को गोदी बनाने की दिशा में यह कदम उठाया है। यह अलग बात है कि कांग्रेस पार्टी ने राष्ट्रीय स्तर पर कुछ गोदी मीडिया कर्मियों को चिन्हित करके उनके बहिष्कार का फैसला लिया है। परन्तु सुक्खु तो व्यवस्था बदलने चले हैं और इसकी शुरुआत पत्रकारों से ही की जा रही है ताकि सरकार में फैली अराजकता और भ्रष्टाचार को दिये जा रहे संरक्षण पर कोई आवाज न उठ सके। इसलिये सुक्खु सरकार का कोई मंत्री या कांग्रेस संगठन का कोई भी पदाधिकारी इस पर कुछ नहीं बोल रहा है।
16 अगस्त को जो नीति संशोधन किया गया है उसमें साप्ताहिक समाचार पत्रों का कोई जिक्र ही नहीं किया गया है। क्योंकि इस सरकार ने सबसे पहले साप्ताहिक समाचार पत्रों के विज्ञापन ही बन्द कर दिये। इस सरकार के सलाहकारों और निति नियन्ताओं को यह नहीं पता की साप्ताहिक समाचार पत्रों के लिये भारत सरकार ने अलग से नीति बना रखी है। प्रचार-प्रसार के लिये साप्ताहिक पत्रों की वेबसाइट बनाने की सुविधा दे रखी है। साप्ताहिक पत्रों का भी डीएवीपी विज्ञापनों के लिये पंजीकरण और दर निर्धारण करता है। क्योंकि साप्ताहिक पत्रों का विषय विश्लेषण रहता है न की सूचना देना। यह साप्ताहिक पत्र ही थे जिन्होंने पिछली सरकारों का विश्लेषण करते हुये उनकी हार की गणना की थी। लेकिन सुक्खु सरकार साप्ताहिक समाचार पत्रों का गला घोंटकर उनको बन्द करवाना चाहती है।
पत्रकारिता एक ऐसा क्षेत्र है जहां व्यक्ति अंतिम क्षण तक सक्रिय रहता है क्योंकि उसके अनुभव और लेखन में तथ्यपरक वृद्धि होती रहती है। लेकिन सुक्खु सरकार मीडिया को गोदी बनाने के लिये उससे सुविधायें छीनने पर आ गयी है। जबकि विज्ञापनों को लेकर प्रेस परिषद और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता। क्योंकि विज्ञापनों पर होने वाला खर्च किसी राजनीतिक दल या नेता का व्यक्तिगत पैसा नहीं होता है। उसके आबंटन और खर्च में पारदर्शिता रहना आवश्यक है। लेकिन सुक्खु सरकार तीखे सवाल पूछने वालों का गला घोंटना चाहती है। जबकि यही सरकार अपना साप्ताहिक पत्र प्रकाशित कर रही है। गोदी में बैठने की भूमिका निभाने वालों को एक-एक अंक में लाखों के विज्ञापन दे रही है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि सरकार तीखे सवाल पूछने वालों को सबक सिखाने की नीयत से यह संशोधन लेकर आयी है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या इसे बैक डेट से लागू किया जा सकता है? क्या पत्रकार सरकार के नौकर है या अपने संस्थान के। क्या संस्थाओं को सरकार इस तरह से नियंत्रित कर सकती है। जो प्रश्न पत्रकारों से जानकारी के नाम पर पूछे जा रहे हैं क्या वह उनके संस्थाओं से नहीं पूछे जाने चाहिए? क्या सरकार संस्थान के बिना किसी पत्रकार को मान्यता देती है? क्या कोई भी नियम 65 वर्ष से ऊपर के व्यक्ति को सक्रिय पत्रकारिता से रोक सकता है? जब संस्थान के बिना पत्रकार को मानता नहीं दी जा सकती तब क्या हक संस्थान का नहीं होना चाहिए कि वह अपने किस व्यक्ति को सरकारी सुविधा देना चाहता है? सुक्खु सरकार ने जिस तरह से पत्रकारों का गला दबाने की चाल चली है क्या वह कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय नीति है यह सवाल भी आने वाले समय में पूछा जायेगा।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

निजी शिक्षण संस्थान नियामक आयोग की कार्यप्रणाली सवालों में

  • अपनी ही रिपोर्टों को दरकिनार करके इण्डस इन्टरनैशनल विश्वविद्यालय को नियामक आयोग ने दिये महत्वपूर्ण कोर्स
  • जबकि अपनी ही रिपोर्ट में अध्यापकों के अयोग्य होने और यू.जी.सी. के वेतनमान न देने के आरोप दर्ज हैं

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश को जब शैक्षणिक हब बनाने के लिये कई निजी विश्वविद्यालय और अन्य शिक्षण संस्थान खोले गये थे तब शिक्षा का बाजारीकरण किये जाने के आरोप लगे थे। यह आशंका जताई गयी थी कि इन संस्थानों में शैक्षणिक मानकों की अनुपालना नहीं की जायेगी और यह संस्थान शिक्षा के बिक्री केंद्र बनकर रह जायेंगे। इनमें छात्रों और अभिभावकों का उत्पीड़न होगा। इन आशंकाओं की गंभीरता को नापते हुए 2010 में इन संस्थानों पर निगरानी रखने के लिये नियामक आयोग का गठन किया गया था। इस आयोग को यह जिम्मेदारी दी गयी थी कि वह इन संस्थानों में तैनात शैक्षणिक और प्रशासनिक स्टाफ को लेकर यह देख की स्टाफ तय मानकों के अनुसार है या नहीं। इन संस्थानों में पढ़ाये जा रहे विषयों में छात्रों की संख्या संतोषजनक है या नहीं। बच्चों के बैठने के लिये आवश्यक स्थान है या नहीं। जब कोई संस्थान तय मानकों के अनुरूप नहीं पाया जाता है तो उसे यह आयोग जुर्माना लगाकर तय समय तक अपनी कमियां पूरी करने के निर्देश देता है। यदि निर्देशों के बाद भी कमियां पूरी नहीं हो पाती हैं तो उससे वही पढ़ाई जाने वाले कोर्स तक छीनने की शक्तियां इस आयोग के पास हैं। कोर्सों में छात्रों की संख्या कभी ज्यादा करने और नये कोर्स देने की शक्तियां आयोग के पास हैं। आयोग अपने सारे कार्यों को अपनी वार्षिक रिपोर्ट में दर्ज करता है। यह रिपोर्ट सरकार से लेकर विधानसभा के पटल पर रखी जाती है। हर विश्वविद्यालय की संचालन समिति में विधानसभा की ओर से विधायक भी मनोनीत किये जाते हैं ताकि पूरी पारदर्शिता सुनिश्चित रहे।
2020 तक इस आयोग की कार्यप्रणाली लगभग ठीक चलती रही है। इसकी वार्षिक रिपोर्ट समय पर छपती रही है और सार्वजनिक होती रही है। लेकिन 2020 से इसकी रिपोर्ट नहीं छप रही है। जब इसी दौरान यह आयोग कई बड़े छोटे आयोजन कर चुका है जिनमें राज्यपाल, मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री तक शामिल हो चुके हैं। इन आयोजनों में निजी विश्वविद्यालयों की भागीदारी भी होती रही है। ऐसे आयोजनों को लेकर आर.टी.आई. एक्टिविस्ट कई जानकारियां भी हासिल कर चुके हैं। इन्हीं जानकारीयों से यह सामने आ चुका है की कई विश्वविद्यालयों को कई कोर्सों में इतनी इतनी सीटें दे दी गयी है जितनी कि वर्षों से चले आ रहे सरकारी संस्थानों में भी नहीं है इनमें शूलिनी विश्वविद्यालय तक का भी नाम सामने आ चुका है। इसी तरह ऊना के बाथू स्थित इण्डस इन्टरनैशनल विश्वविद्यालय की 4-8-2022 और फिर 30-1-2023 को हुई इन्सपैक्शन रिपोर्टों के अनुसार इसमें आयोग्य अध्यापक और केवल 56 प्रतिशत छात्रों द्वारा ही क्लासें लगाने का रिकॉर्ड रिपोर्ट में दर्ज है। रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि यह विश्वविद्यालय अध्यापकों को यू.जी.सी. के मानको अनुसार वेतन नहीं दे रहा है। इन कर्मियों के लिये शायद इसे जुर्माना भी लगाया गया है। मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री को एक अजय कुमार ने ईमेल से शिकायतें भी भेजी है। लेकिन नियामक आयोग ने अपनी रिपोर्टों को नजरअन्दाज करके इस विश्वविद्यालय को 2023-24 के लिये आर्टिफिशियल इंटेलिजैन्स, साईबर सिक्योरिटी, एलएलबी, फूड प्रोडक्शन, डी फार्मेसी और बीएएमएस जैसे महत्वपूर्ण कोर्स भी आवंटित कर दिये हैं। ऐसा क्यों और किस आधार पर किया गया है यह जांच का विषय है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

यह तीन लाख एकड़ जमीन कहां है? सरकार इसका क्या कर रही है

  • सरकार इस तीन लाख एकड़ भूमि मामले में खामोश क्यों है
  • क्या इन जमीनों पर कुछ प्रभावशाली लोग कब्जा करके बैठे हैं?
  • क्या 1973 में लैण्ड सिलिंग लागू होने के बाद भी इस एक्ट में संशोधन की गुंजाईश है?

शिमला/शैल। प्रदेश इस समय कठिन वित्तीय स्थिति से गुजर रहा है यह सरकार द्वारा राज्य विधानसभा के पटल पर रखे गये श्वेत पत्र से सामने आया है। इस वित्तीय स्थिति के परिदृश्य में प्रदेश की स्थिति श्रीलंका जैसे होने की आशंका भी मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खु व्यक्त कर चुके हैं। अब प्रदेश में यह आपदा घट गयी है जिसमें करीब बारह हजार करोड़ का नुकसान हो चुका है। केंद्र सरकार से आश्वासनो से अधिक कुछ मिल नहीं पाया है। प्रदेश सरकार अपने संसाधन बढ़ाने के लिये सेवाओं और वस्तुओं के दाम बढ़ाने से अधिक कुछ सोच नहीं पा रही है। जबकि सरकार के पास तीन लाख एकड़ जमीन दो राजस्व भू अधिनियमों में हुये संशोधनों के माध्यम से आ चुकी है। लेकिन राज्य सरकार को यह जानकारी ही नहीं है कि उसकी यह जमीन है कहां पर। कहीं इस जमीन का लाभ कुछ अधिकारियों की मिली भगत से कुछ शातिर लोग ही तो नही उठा रहे हैं। क्योंकि जिस सरकार के पास तीन लाख एकड़ जमीन सरप्लस हो वह इतने बड़े कर्ज के चक्रव्यूह में कैसे फंस सकती है यह अपने में ही एक बड़ा सवाल बन जाता है।

स्मरणीय है कि देश की आजादी के बाद सरकार के पास सबसे बड़ा और प्रमुख सवाल भू-सुधारो का आया था। इन सुधारों के तहत 1953 में बड़ी जिमीदारी प्रथा उन्मूलन के लिये Abolition of Big Landed Estate Act.  लाया गया था। इस अधिनियम के तहत सौ रूपये या इससे भू-लगान देने वालों की सरप्लस जमीने सरकार के पास चली गयी थी। इसमें कई राजे, राणे और बड़े ज़िमीदार प्रभावित हुये थे। इसके बाद 1971 में प्रदेश में लैण्ड सीलिंग एक्ट आया। 1974 में पारित हुआ यह एक्ट 1973 से लागू हुआ। इस अधिनियम के तहत प्रदेश में कोई भी व्यक्ति 300 कनाल/161 बीघे से अधिक जमीन नहीं रख सकता। इन दोनों अधिनियमों के तहत हिमाचल सरकार के पास तीन लाख एकड़ जमीन आयी है। यह सरकार ने सर्वाेच्च न्यायालय में एक समय आयी याचिका में स्वीकार किया हुआ है। जबकि इस याचिका से पहले 1975 में आपातकाल के दौरान हर भूमिहीन को दस-दस कनाल जमीन दी गई थी। ऐसी जमीनों पर उगे पेड़ों की मलकियत भी इन लोगों को दे दी गयी थी। इस जमीन को बेचने का अधिकार इन लोगों को नहीं दिया गया था ताकि यह लोग फिर से भूमिहीन न हो जायें। इसलिए आज भी यदि कोई धारा 118 के तहत अनुमति लेकर जमीन खरीदता या बेचता है तो उसे यह लिखना पड़ता है कि वह उस जमीन को बेचकर भूमिहीन तो नहीं हो रहा है।

हिमाचल का हर राजा इन कानूनों के दायरे में आया हुआ है। लेकिन अब जब सुक्खु सरकार लैण्ड सीलिंग एक्ट में संशोधन लेकर आयी है तो स्वभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि 1973 से लैण्ड सीलिंग अधिनियम लागू होने के बाद भी आज प्रदेश में किसी के पास भी तय सीमा से अधिक जमीन कैसे हो सकती है। निश्चित है कि यह संशोधन लाने पर सरकार ने इस दिशा में वांछित होमवर्क कर लिया होगा। क्योंकि शामलात जमीनें तो पंजाब और हिमाचल में एक अरसे से सरकार के पास चली गयी है। इन जमीनों को विलेज कॉमनलैण्ड कहा जाता है जिन्हें खरीदा या बेचा नहीं जा सकता। बल्कि सर्वाेच्च न्यायालय जनवरी 2011 में एक फैसले में यहां तक कह चुका है कि all though we have dismissed this appeal, it shall be listed before this court from time to time on dates (fixed by us) So that we can monitor implementation of our directions here in. List again before us on 3-5-2011 on which date all chief secretaries in India will submit their reports.

जगपाल सिंह एवं अन्य बनाम स्टेट ऑफ पंजाब एवं अन्य मामला विलेज कॉमनलैंण्ड को लेकर था। कोर्ट के इस फैसले पर हिमाचल से भी रिपोर्ट गयी होगी और हिमाचल में भी विलेज कॉमन लैण्ड की खरीद बेच नहीं हो रही होगी। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के यह निर्देश प्रशासन के हर स्तर तक फील्ड में गये होंगे।
इस परिप्रेक्ष्य में यदि सरकार इस तीन लाख एकड़ जमीन को चिन्हित करके उसका सदुपयोग करती है तो उसे बढ़ते कर्ज से बाहर निकलने का रास्ता मिल जायेगा। लेकिन इवैक्यू प्रॉपर्टी के मामले की तरह नहीं जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने प्रदेश सरकार को जुर्माना लगाया है। कई जगह में ऐसी भी रिकॉर्ड पर रिपोर्ट है जहां विलेज कॉमन लैण्ड को अधिग्रहण करके सरकार प्राईवेट लोगों को सरकारी जमीन का ही मुआवजा दे रही है। जबकि यह जमीनें भूमिहीनों और एस सी, एस टी में बंटनी थी।

 

More Articles...

  1. सुखविंदर सिंह बनाम निशु ठाकुर मानहानि मामले पर लगी पूरे प्रदेश की निगाहें
  2. क्या मुख्य संसदीय सचिव त्यागपत्र देंगे
  3. महाभारत के संकेत से शुरू होकर खुले पत्र तक पहुंचे राजेन्द्र राणा
  4. क्या यह शिकायत मुख्यमंत्री के स्वास्थ्य का सच सामने लाने का प्रयास है
  5. क्या नड्डा प्रदेश में बतौर राष्ट्रीय अध्यक्ष आये थे या राज्यसभा सांसद के नाते
  6. टीसीपी का 20000 भवन मालिकों को नोटिस
  7. पत्र बम्बों के छींटे मुख्यमंत्री कार्यालय तक आना शुभ संकेत नहीं है
  8. प्रकृति से ज्यादा सरकार की योजनाएं जिम्मेदार रही है इस विनाश के लिये
  9. क्या कांग्रेस में उन विद्रोहियों की वापसी हो रही है जिन्होंने चुनावों में गद्दारी की है
  10. कार्यकर्ताओं की अनदेखी पर प्रतिभा के बाद राठौर भी हुये मुखर
  11. विक्रमादित्य सिंह की अफसरशाही को चेतावनी सरकार में संभावित विस्फोट का पहला संकेत
  12. आपदा में डीजल के रेट बढ़ाने से भाजपा को मिला मुद्दा
  13. आपदा काल में सरकार की गंभीरता सवालों में
  14. भाखड़ा-ब्यास परियोजना पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर अमल क्यों नहीं
  15. राजीव बिन्दल का सरकार पर हमला समान नागरिक संहिता पर स्टैण्ड स्पष्ट करें मुख्यमन्त्री
  16. कांग्रेस की गारंटीयों पर सुक्खू सरकार की परफॉरमैन्स से हाईकमान चिंन्ता में
  17. हिमाचल में कांग्रेस को लोस की एक सीट नहीं पार्टी के सर्वे में खुलासा
  18. वित्त वर्ष के दो माह में ही खजाना खाली क्यों हो गया?
  19. क्या गारंटियां देते समय कांग्रेस को वित्तीय स्थिति का ज्ञान नहीं था भाजपा
  20. क्या सरकार में आपसी तालमेल का अभाव है

Subcategories

  • लीगल
  • सोशल मूवमेंट
  • आपदा
  • पोलिटिकल

    The Joomla! content management system lets you create webpages of various types using extensions. There are 5 basic types of extensions: components, modules, templates, languages, and plugins. Your website includes the extensions you need to create a basic website in English, but thousands of additional extensions of all types are available. The Joomla! Extensions Directory is the largest directory of Joomla! extensions.

  • शिक्षा

    We search the whole countryside for the best fruit growers.

    You can let each supplier have a page that he or she can edit. To see this in action you will need to create a users who is in the suppliers group.  
    Create one page in the growers category for that user and make that supplier the author of the page.  That user will be able to edit his or her page.

    This illustrates the use of the Edit Own permission.

  • पर्यावरण

Facebook



  Search